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मानवाधिकार की अमानवीय राजनीति

Posted On: 2 Jan, 2016 Others में

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नफरत करने के लिए कितने बहाने हैं हमारे पास, क्या कोई ऐसा बहाना नहीं जिसके जरिये हम इंसानों की इस दुनिया को थोड़ा सा इंसानों के रहने लायक भी बना सकें? बात इतनी भी मुश्किल नहीं है फिर भी हमें अपनी ही दुनिया को पेचीदा और अमानवीय बनाने में कुछ ज्यादा ही आनंद आता है, जबकि ईश्वर हर रोज हमें अपनी मंशा से अवगत कराता रहता है|


विश्व शान्ति के लिए चुनौती बन चुके आतंकवाद की जड़ें कब हमारे बीच इतनी गहरी हो गईं इस बात का हमारे नेताओं को पता ही नहीं चला| ऐसा प्रतीत होता है कि जनता के बीच जाकर आंसू बहाने और उनके दर्द में शामिल होने का ढोंग विश्व के सभी देशो में चलता रहा लेकिन ये सब कुछ सामान्यजन को सिर्फ इस बात का अहसास कराने के लिए था कि ये हमेशा से उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है और ये कोई बड़ी बात नहीं जिसपर किसी तरह के निर्णायक कारवाही की आवश्यकता हो| घडियाली आंसू बहाने वाले राजनेताओं का बड़ा वीभत्स और घृणित राजनीतिक चेहरा सामने आता है जब आतंकवाद जैसे मुद्दे पर इनकी शातिर चाल की हकीकत पता चलती है कि कितने संगठित और योजनाबद्ध तरीके से आतंक के शिकार सामान्यजन को इस प्रकार सांत्वना दी जाती है कि वे मानने लगें कि हत्या (एवं सामूहिक नरसंहार) भी स्वाभाविक रूप से मौत आने के कुछ उन तरीकों में से है जिन्हें हम दुर्घटना मान कर बर्दाश्त करने को विवश हैं| जब विश्व के बड़े राजनेता आतंकवाद को मिटाने का वादा करते हैं तो मैं उस दुनिया के बारे में सोचकर परेशान हो उठता हूँ जिसमें कहीं आतंकवाद का नामो-निशान नहीं होगा, सोचकर सिहर उठता हूँ कि दुनिया इंसानों के क़त्ल के एक तरीके से वंचित हो जायेगी, ईश्वर की कृपा से ये बातें राजनेताओं की लफ्फाजियों से अधिक कुछ नहीं है| मेरे इस विश्वास का एक पुख्ता आधार भी है जो आशा की एक किरण के रूप में टिमटिमाता रहता है- ‘मानवाधिकार’| भला हो इस मानवाधिकार का जिसने हमारे सभ्य समाज को कभी भी आतंक और अपराध से मुक्त नहीं होने देने की शपथ उठा रखी है, वर्ना भारत जैसे असहिष्णु देश में तो लोग न्यूज़ चैनलों के बंद होने के कारण आत्मदाह तक की धमकी दे डालते| भारत स्वर्ग बन जाता और भारतीय स्वर्गवासी! खैर ये कपोल कल्पना मात्र है या सिर्फ एक दुखद स्वप्न जिसका टूटना ही उसकी परिणिति है और फिर आँखे खुलते ही हम मानवाधिकार की छत्र-छाया के अनुपम अहसास में अपराधियों और आतंकियों को पूरी तरह सुरक्षित पाते हैं; एक अजीब सी तसल्ली का अहसास करते हुए करीने से चौपरते अखबार की परत-दर-परत खोलते हुए विभिन्न मानवतावादी, जिहादी, आतंकी और अपराधी लोगों की समाज के प्रति की गई सेवा का रसास्वादन करते हैं| अख़बार के कुछ हिस्सों को छोड़कर सभी पन्नों पर हमें करुण, वीभत्स, भयानक इत्यादि रसों की चटनी प्राप्त होती है इसलिए सूखी ब्रेड का नाश्ता भी सुपाच्य और तृप्तिदायक बन जाता है| इसके भी अपने राजनीतिक फायदे हैं| महंगाई और भ्रष्टाचार के मानवाधिकार नहीं होते इसलिए इनके समाप्ति के प्रयास सफल हो सकते हैं अतः इनकी और से ध्यान हटाने के लिए भी मानवाधिकार का संरक्षण पाए इन प्रतिष्ठित पेशों (अपराध/आतंक) को बेहतर तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, ताकि जनता महंगाई से जूझने में व्यस्त रहे और शोषक भ्रष्टाचार हटाने में यानी बिना किसी तरह के रोजगार का सृजन किये सभी को व्यस्त कर दिया और स्वयं भी मस्त हो गए|
शेष फिर कभी ….

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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Lainey के द्वारा
October 17, 2016

Sharp thngkini! Thanks for the answer.

Shyam Aswal के द्वारा
January 8, 2016

चातक जी आपको बहुत बहुत धन्यवाद की आपने इन बेमान राजनेताओ के बारे मै इतना लिखा की मन खुश हो गया I

    chaatak के द्वारा
    January 8, 2016

    श्याम जी, ब्लॉग को समय देने और प्रतिक्रिया प्रकट करने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद, मुझे विश्वास है कि आज जितनी भी समस्याओं से सामान्य जनता जूझ रही है वे वास्तविक न होकर राजनीति द्वारा उत्पन्न की गई समस्याएं हैं ताकि व्यक्ति इन नेताओं के मक्कारियो की और ध्यान ही न दे सके.

yamunapathak के द्वारा
January 7, 2016

चातक जी सुन्दर बात …यह सच है की हम हर मसले पर हाथ बाँध कर तब तक बैठते हैं जब तक कि चीख हमारे आँगन से न उठे …किसी भी नेता का नाम बताइये जिनकी संतानों में से किसी एक ने भी देश सेवा के लिए राजनीति छोड़ कर सरहदों पर जाकर लड़ना चुना हो ….एक सैनिक बनाने की उनकी काबिलियत नहीं या फिर मंशा नहीं …. देश सेवा का दम्भ भर लेना तो आसान है पर सैनिक बनना आसान क्यों नहीं ??? सारे नेताओं से मेरा एक यही सवाल है … साभार

    chaatak के द्वारा
    January 7, 2016

    यमुना जी, आपके प्रश्न का उत्तर किसी नेता के पास नहीं क्योंकि ये रंगे सियारों से अधिक कुछ भी नहीं है| एक उम्मीद की किरन मोदी जी लगे थे लेकिन अब तो ये लगता है कि इतिहास में मोदी की पहचान ‘दूसरा नेहरु’ के नाम से होगी| दुखद है कि जनता का विश्वास पाने वाला नेता अपनी पहचान तक कायम नहीं रख पायेगा|

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
January 6, 2016

चातक भाई विचारणीय आलेख ,,सुन्दर सारगर्भित …जो कोई कुछ हिम्मत भी कभी करता है कुछ करने की तो मानवाधिकार ..बड़ा अलबेला है अपना देश ..जीवन भर मुक़दमा साँसे चली जाएँ फैसला न हो .. भ्रमर ५

    chaatak के द्वारा
    January 6, 2016

    भ्रमर जी, नीतियों में इतना भटकाव और हर अच्छे कानून का प्रयोग अप्रधियों के हित में करने की मंशा ही है जो पठानकोट के एयर-बेस पर ६ आतंकी हमारी पूरी फौज पर भारी पड़े और जब तेजी दिखाई तो हाथ आया एक पागल जिसने पुलिस और फोर्सेस के मन पर छाई दहशत को और स्पष्ट करके दिखा दिया सफलता के नाम पर टांय-टांय फुस्स …


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