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बिटिया के प्रश्न (पिता के उत्तर)

Posted On: 3 Mar, 2015 Others में

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बिटिया की आँखों से प्रश्न छलकते हैं बहुतेरे;
होठों तक कुछ आते हैं और घुट जाते बहुतेरे|
शायद सब्र का बाँध आज टूटा यूँ बिटिया तेरा;
जैसे रोष से भरी दामिनी पर मेघों का घेरा|
तेरे हर सवाल का उत्तर समय कदाचित देता;
धैर्य जो तू न खोती तो शायद मैं उपकृत होता|
सिर्फ पिता मैं नहीं तेरा, न जननी तेरी माता;
तेरी खातिर बने गुरु, सेवक, संरक्षण दाता|
हर सवाल हैं जहर बुझे नश्तर सम बिटिया तेरे;
दिल को चाक किया फिर भी हम हैं आभारी तेरे|
जन्म हुआ जब तेरा तो हम हर्षाये, मुस्काए;
कदम बढ़ाये जब तूने हम फूले नहीं समाये|
तेरी सारी इच्छाओं को नजरों से पढ़ते थे;
अपनी लाचारी पर रोज कहानी हम गढ़ते थे|
मौन तेरा जब भी देखा, दिल रोया, आँख न रोई;
ख्वाब तेरे पूरे करने को, आँख न मेरी सोई|
माँ तेरी लोरी में गा कर सिखलाती मर्यादा;
जीवन का है मन्त्र यही जिसको तू समझी बाधा|
मर्यादा में पिता बंधा है, मर्यादा में माता;
मर्यादा में धरती, नभ, जीवन और स्वयं विधाता|
पिता नहीं मर्यादित तो परिवार बिखर जाता है;
माता मर्यादित न हो तो राष्ट्र बिखर जाता है|
धरती छोड़े मर्यादा तो बंजर कहलाती है;
अम्बर न हो मर्यादित तो सृष्टि कष्ट पाती है|
स्वयं विधाता मर्यादित होकर ही पूज्य बना है;
उसका त्याग मानवों से चौरासी लाख गुना है|
तुझे पराई कहकर माँ खुद को धोखा देती है;
हेतु तेरा, निज हृदय शिला विछोह का वो ढोती है|
बिटिया होती विदा उसे परिवार नया मिल जाता है;
जीवन साथी उसकी दुनिया में खुशियाँ ले आता है|
लेकिन माँ-बाबा जीवन भर टीस वही सहते हैं;
जिस विछोह से सिर्फ हृदय में आह के आंसू बहते हैं;
वस्तु नहीं तू जिसे किसी भिक्षुक को दान दिया है|
रत्न है तू जिसको हमने पूरा सम्मान दिया है;
तेरी हर अभिलाषा पूरी हो खुशियाँ ही बरसें;
भले हमारी नजर तेरी सूरत को हरपल तरसे|
छल प्रपंच से भरी ये दुनिया तुझे न छलने पाए;
तेरी खुशियों पर कोई भी दाग न लगने पाये|
हेतु इसी को बना तुझे सदमार्ग दिखाया हमने;
तेरी राह के हर कांटे पर हाथ बिछाया हमने|
तू न समझी माँ का रोना, न उसका हर्षाना;
अग्नि जिसे तू समझी उसका मर्म न तूने जाना|
बहकी अभिलाषाओं को तू ख़ुशी समझ बैठी है;
माता-पिता लगें बाधा, तू इसीलिए रूठी है|
हम नेता, न अभिनेता, न छलना, न रक्काशा;
मर्यादा है जीवन अपना, मर्यादा ही भाषा|
यही सिखाते, यही चाहते और चाहते तुझको;
भेंट चढ़ाना ध्येय नहीं, भेंट सर्वस्व समर्पित तुझको|

[बिटिया के प्रश्नों को जानने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें]

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17 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Deandre के द्वारा
October 17, 2016

A rolling stone is worth two in the bush, thanks to this arlietc.

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
March 25, 2015

समसामयिक अभिव्यक्ति ! चातक जी बधाई !

    chaatak के द्वारा
    March 26, 2015

    आचार्य विजय गुंजन जी, ब्लॉग पर अपनी राय प्रकट करने का हार्दिक धन्यवाद!

yogi sarswat के द्वारा
March 25, 2015

मर्यादा में पिता बंधा है, मर्यादा में माता; मर्यादा में धरती, नभ, जीवन और स्वयं विधाता| पिता नहीं मर्यादित तो परिवार बिखर जाता है; माता मर्यादित न हो तो राष्ट्र बिखर जाता है| धरती छोड़े मर्यादा तो बंजर कहलाती है; अम्बर न हो मर्यादित तो सृष्टि कष्ट पाती है| स्वयं विधाता मर्यादित होकर ही पूज्य बना है; उसका त्याग मानवों से चौरासी लाख गुना है| तुझे पराई कहकर माँ खुद को धोखा देती है; हेतु तेरा, निज हृदय शिला विछोह का वो ढोती है| बिटिया होती विदा उसे परिवार नया मिल जाता है; जीवन साथी उसकी दुनिया में खुशियाँ ले आता है| गज़ब प्रतिभा के धनि हैं आप श्री चातक जी ! बहुत ही सुन्दर और प्रशंसनीय रचना ! बहुत बहुत बधाई

    chaatak के द्वारा
    March 25, 2015

    स्नेही योगी सारस्वत जी, सादर नमस्कार, ब्लॉग पर अपने राय देकर मेरी प्रसन्नता को कई गुना बड़ा दिया है| हार्दिक धन्यवाद!

jlsingh के द्वारा
March 24, 2015

स्नेही चातक जी, सप्रेम नमस्कार ! कब से और कितनी बार आपको बधाई देना चाहा पर जे जे की तकनीकी गड़बड़ी के चले सम्भव न हो सका आज देखता हूँ, यह हो पाता है या नहीं बहुत सुन्दर रचना और यथोचित सम्मान भी

    chaatak के द्वारा
    March 25, 2015

    स्नेही जे.एल. सर, सादर नमस्कार, ये समस्या तो कभी न कभी आती रहती है :) ब्लॉग पर आपकी राय जानकर हार्दिक प्रसन्नता होती है| सम्मान माँ वाग्देवी और आप शुभेक्षुओं को सादर समर्पित|

vaidya surenderpal के द्वारा
March 24, 2015

बहुत ही सुन्दर, सारगर्भित और विचारणीय रचना कविता ,हार्दिक बधाई .

    chaatak के द्वारा
    March 24, 2015

    वैद्य जी, ब्लॉग को समय देने का हार्दिक धन्यवाद! आपके विचार जानकर अत्यंत प्रसन्नता हुई|

nirmala singh gaur के द्वारा
March 23, 2015

पिता नहीं मर्यादित तो परिवार बिखर जाता है; माता मर्यादित न हो तो राष्ट्र बिखर जाता है| धरती छोड़े मर्यादा तो बंजर कहलाती है; अम्बर न हो मर्यादित तो सृष्टि कष्ट पाती है| स्वयं विधाता मर्यादित होकर ही पूज्य बना है; उसका त्याग मानवों से चौरासी लाख गुना है| एक ह्रदय स्पर्शी , व्यवहारिकता के धरातल पर एवं स्तरीय प्रस्तुति ,हार्दिक बधाई .

    chaatak के द्वारा
    March 24, 2015

    निर्मला जी, ब्लॉग को समय देने और प्रतिक्रिया द्वारा राय प्रकट करने का हार्दिक धन्यवाद !

Jitendra Mathur के द्वारा
March 22, 2015

अत्यंत सुंदर एवं मर्मस्पर्शी रचना । बहुत-बहुत अभिनंदन ।

    chaatak के द्वारा
    March 22, 2015

    हार्दिक धन्यवाद जितेंद्र जी :)


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