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ज़िंदा देश की घुटती आवाज़

Posted On: 23 Dec, 2014 Others में

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विविधताओं से भरा देश जिसमें रहने वाले अधिकाँश भारत को एक जागृत और सजीव राष्ट्र के रूप में स्वीकार करने वाले, पूजने वाले देशवासी हैं| बड़ा अद्भुत है! लेकिन अटपटा और विचित्र भी! क्योंकि इस देश की पहचान इसकी सामरिक, राजनीतिक या आर्थिक शक्ति कभी नहीं रही है| इसकी पहचान रही है- वैचारिक और सांस्कृतिक शक्ति| आज उसी पहचान को पूरी तरह से नष्ट कर देने की मंशा का हिलोरें मारना बड़ा दुखद है| दुखद है कि देश का नव-प्रबुद्ध वर्ग (इन्हें स्वयं-भू प्रबुद्ध कहना बेहतर होगा) राष्ट्र की आवाज को झूठ और भ्रमकारी संवादों की अदाकारी बना चुका है|
राष्ट्र यदि सजीव है तो इसकी आवाज है पत्रकारिता और जिस तरह का चरित्रिक पतन भारत की मीडिया रूपी पत्रकारिता का हुआ है वह दयनीय है| जिस राष्ट्र की आवाज़ ही झूठी हो जायेगी उस राष्ट्र का पतन किस गर्त की ओर अग्रसर होगा कल्पना से परे है| मीडिया के इस मिथ्या आचरण पर गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर की लिखी एक पंक्ति याद आती है “जहाँ चित्त भयमुक्त हो और सर गर्व के साथ उठा हो , जहाँ ज्ञान निशुल्क हो, जहाँ संसार को संकीर्णता की दीवारों से टुकड़ों में बांटा नहीं गया हो, जहाँ शब्द सत्य की गहराइयों से प्रस्फुटित होते हों….” आज इस विचार-प्रधान राष्ट्र के शब्द खोखले हो चुके हैं सत्य की गहराइयाँ नहीं सत्य की सतह को भी स्पर्श करने का साहस नहीं रहा इसकी आवाज में क्योंकि मीडिया (पत्रकारिता) ने राष्ट्र की आवाज़ का कॉपी-राईट खरीद रखा है और उसे अपने आर्थिक लाभ के लिये ऊँचे दाम पर बेच रही है| खबरें बनाई जा रही हैं, ख़बरें खरीदी और बेची जा रही हैं| कलम बिक चुकी है, देश की आवाज की नीलामी भरे बाजार हो रही है| पत्रकार फनकार बन चुके हैं और समाचार वाचक न्यूज एक्टर और न्यूज एक्ट्रेस बन भाव-भंगिमाओं को प्रदर्शित कर रहे हैं| अब तो कुछ नये जुमले भी वायरल हो रहे है- ‘छोटा पत्रकार छोटा दलाल, बड़ा पत्रकार बड़ा दलाल’, ‘रेड-लाईट एरिया में सिर्फ जिस्म बिकते हैं, ईमान खरीदना है तो मीडिया का दफ्तर अगले चौराहे पर है”| देश और जनता की आवाज बनने की जगह राजनीति की रक्काशा की भूमिका निभाने में ज्यादा फायदा नजर आया और इसने मंच की परवाह किये बिना चोला बदल लिया| काश कि देश के इस स्वघोषित प्रबुद्ध वर्ग को एक बात याद रहती कि देश की आत्मा झूठ की आवाज़ पर सिसकती है| भारत माता के दिल से निकली बात को उनका गला दबा कर उनकी जुबान काटकर तोड़ना, मरोड़ना फायदे का खेल बन चुका है इनके लिए| दुखद है, शर्मनाक है, वीभत्स है, राष्ट्र का दुर्भाग्य है, फिर भी आजाद हिंदुस्तान की आजाद मीडिया है, कुछ और नहीं पत्रकारिता का उपहास है| धंधा बन चुकी पत्रकारिता में शर्म है जो आती नही, और बेशर्मी है जो जाती नहीं| जिस तरह से भ्रष्ट राजनीति पर अंकुश के लिए एक लोकपाल की आवश्यता है ठीक उसी तरह भ्रष्ट पत्रकारिता के ईलाज के लिए एक पत्र-लोकपाल की उससे भी अधिक आवश्यकता है क्योंकि राजनीति को हर पांच वर्ष में एक बार शुद्धिकरण का मौका मिलता है लेकिन पत्रकारिता में शुद्धिकरण का कोई मौका नहीं होता| मेरे विचार से होना चाहिए|

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15 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pratik waghmare के द्वारा
August 28, 2015

में yah janna chahta हु की kab आपको ऐसा लगता है की मीडिया बिकी हे ….में मीडिया के साथ हु…aur मुझे लगता ह मीडिया आजकल में is दुनिया में सबसे बड़ा रोले प्ले कर रही ह…तो आपको किन केसेस में ऐसा लगा की मीडिया झूठी या बिकी ह???

sadguruji के द्वारा
January 2, 2015

जिस तरह से भ्रष्ट राजनीति पर अंकुश के लिए एक लोकपाल की आवश्यता है ठीक उसी तरह भ्रष्ट पत्रकारिता के ईलाज के लिए एक पत्र-लोकपाल की उससे भी अधिक आवश्यकता है ! आदरणीय चातक जी ! बहुत सही आपने कहा है ! एक बहुत विचारणीय लेख के सृजन के लिए बधाई ! नववर्ष आपके और आपके परिवार के लिए मंगलमय हो ! नववर्ष में भी आपकी सार्थक लेखनी अनवरत यूँ ही चलती रहे !

    chaatak के द्वारा
    January 2, 2015

    स्नेही सद्गुरु जी, सादर अभिवादन, आपको भी नव-वर्ष की हार्दिक शुभकानाए! आप बंधुओं का सहयोग और मार्गदर्शन मिलता रहेगा,कोशिश जारी रहेगी | हार्दिक धन्यवाद!

jlsingh के द्वारा
December 31, 2014

आदरणीय चातक जी, सादर अभिवादन! मैंने इस ब्लॉग को काफी पहले पढ़ा था, पर मेरी प्रतिक्रिया दीख नहीं रही ..आपका यह ब्लॉग दैनिक जागरण में भी छपा. आप बहुत ही सारगर्भित लिखते हैं आपको नए साल की मंगलकामनाएं!

    chaatak के द्वारा
    January 1, 2015

    स्नेही जे.एल. सिंह जी, सादर अभिवादन, ब्लॉग पर आपकी राय जानकर हार्दिक ख़ुशी हुई| मैं तो सिर्फ एक अति साधारण भारतीय की दशा और मनोभाव लिखता हूँ, अच्छा लगता है कि इस प्रयास में कुछ सार होने की अनुभूति आप अग्रजों सुधी अग्रजों को भी होती है| आपको भी नव-वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं !

yamunapathak के द्वारा
December 31, 2014

चातक जी आज यह ब्लॉग प्रकाशित देखा मैंने सच लिखा है टी वी के न्यूज़ तो न्यूज़ काम नाटक ज्यादा लगते हैं और उनके शीर्षक तो और भी हास्यास्पद . साभार

    chaatak के द्वारा
    December 31, 2014

    यमुना जी, आपकी बात सौ फीसदी सत्य है टी.वी. चैनल सिर्फ खबरिया कारोबारी हैं और बुरा ये है कि इनके इस धंधे में हर झूठ जायज बन चुका है|

yogi sarswat के द्वारा
December 28, 2014

धा बन चुकी पत्रकारिता में शर्म है जो आती नही, और बेशर्मी है जो जाती नहीं|बहुत सही कहा चातक जी ! वाही पुराना रुतबा , वो ही पुराना तीखापन ! गजब लिखते हो

    chaatak के द्वारा
    December 28, 2014

    स्नेही योगी जी, सादर अभिवादन, ब्लॉग पर आपके विचार जानकर अत्यधिक प्रसन्नता हुई! तीखापन मेरा है बाकी सब आप बंधुओं का स्नेह है| हार्दिक धन्यवाद!

Imam Hussain Quadri के द्वारा
December 27, 2014

बहुत खूब बहुत सही लिखा आपने अफ़सोस ये है के हमारे देश में बहुत सी ऐसी बीमारियां आ गयीं हैं जो कैंसर की तरह होती जा रही हैं जिसे खत्म करने का तरीका नज़र ही नहीं आ रहा है पता नहीं हमारे देश का क्या होने वाला है .

    chaatak के द्वारा
    December 28, 2014

    स्नेही इमाम हुसैन जी, सादर अभिवादन, मीडिया के इस आचरण की तुलना कैंसर से करना उपयुक्त प्रतीत हुआ, ये बीमारी मुझे भी फिलहाल लाइलाज लग रही है, हमारे देश को गर्त में धकेला जा रहा है और हममे से अधिकतर लोग आँख-कान मूँद कर बैठे हैं, काश जल्दी कोई राह निकल सके ताकि सत्य वास्तविक रूप में सामने आये| हार्दिक धन्यवाद!

आर.एन. शाही के द्वारा
December 27, 2014

स्नेही चातक जी जब पत्र ही गौण हो चुके तो पत्रकारिता रही कहाँ । पत्र पत्रिकाएँ जो कभी समाज की दिशा तय करती थीं उन्हें पढने का आज किसी के पास समय ही नहीं है । आज तो बस मीडिया है जिसका माध्यम टीवी और इंटरनेट है । यहाँ सभी वही लोग हैं जिनका आपने बखूबी चित्रण अपने सुन्दर लेख में किया हुआ है । ये जानते हैं कि भागदौड़ कर घर घुसे आदमी को तर्क नहीं तरावट की ज़रूरत है, इसलिए सनसनीयुक्त तरावट परोसते लाज कैसी । जब बीते कल की कोई चीज़, यहाँ तक कि मौसम भी असली नहीं रहा, तो ये भी धंधे और सिर्फ धंधे की सोच कर कौन सी गलती कर रहे हैं । मैं आपसे पूर्णतया सहमत हूँ ।

    chaatak के द्वारा
    December 28, 2014

    स्नेही शाही जी, सादर अभिवादन, आपने पत्रकारिता के इस नए कलेवर को अच्छी तरह से परिभाषित किया| पूर्णतयः दूषित हो चुकी मीडिया पर समान विचारधारा जानकर अच्छा लगा| हार्दिक धन्यवाद!

sudhajaiswal के द्वारा
December 24, 2014

आदरणीय कृष्ण जी, सादर अभिवादन, इस लेख को पढ़कर ऐसा लगा जैसे आपने मेरे मन की बातें लिख दी हों इसके लिए आपको हार्दिक धन्यवाद| पूर्ण सहमति है आपके विचारों और सुझाव से, उम्दा लेख के लिए हार्दिक बधाई!!

    chaatak के द्वारा
    December 24, 2014

    स्नेही सुधा जी, सादर अभिवादन, ब्लॉग पर आपके विचार जानकर प्रसन्नता हुई| पत्रकारिता का गिरता हुआ स्तर और मीडिया के अनर्गल प्रलाप अब नेताओं के कर्मो से ज्यादा दूषित हो चुके हैं, ऐसे में देश में आशा की किरण दिखे भी तो कैसे? कई बार सोचा न लिखूं फिर भी रहा न गया| प्रतिक्रिया और समान विचारधारा जानकर अच्छा लगा| हार्दिक धन्यवाद!


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