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मैं बाली, मैं राम

Posted On: 16 Sep, 2014 Others,कविता में

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कर्म किये, अपकर्म किये, और काटा बनबास;

बिन आयुध निःशक्त भी होकर सहा महासंत्रास|

मर्यादा सर्वोपरि रखकर त्यागा सुख, विश्राम;

आज उपेक्षित हूँ क्योंकि मैं हूँ बाली, मैं राम||

गृह रक्षा, हो नगर सुरक्षित, निर्भय हों सब बंधु;

कृश तन लेकर नाद किया कि कापें थर-थर सिंधु|

रौद्र रूप और कल्पित मंडल दिखा बचाया धाम;

आज उपेक्षित हूँ क्योंकि मैं हूँ बाली, मैं राम||

रोका बंधु गुफा के बाहर स्वयं बढ़ा आगार;

मरने को प्रस्तुत था क्योंकि था बैरी परमार|

बल तोला, बैरी था भारी, लड़ा मगर अविराम;

आज उपेक्षित हूँ क्योंकि मैं हूँ बाली, मैं राम||

उसका आधा बल था कल्पित मैं न था द्वि, एक;

क्या होगा गृह, नगर मेरा जो देता घुटने टेक!

साहस द्विगुणित करके बैरी को भेजा सुर-धाम;

आज उपेक्षित हूँ क्योंकि मैं हूँ बाली, मैं राम||

कितने बरस बनबास दिया ये पिता ने न बतलाया;

कुनबा जल्दी दृढ हो जायेगा, खुद को समझाया|

नहीं दिया था वक्त पूछने का- क्या करना काम;

आज उपेक्षित हूँ क्योंकि मैं हूँ बाली, मैं राम||

न गिन पाया घड़ी-दिवस न गिनती की बरसों की;

सींच रहा था आशा धरे हथेली ज्यों सरसों की|

विचलित नहीं हुआ, न सोचा क्या होगा परिणाम;

आज उपेक्षित हूँ क्योंकि मैं हूँ बाली, मैं राम||

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4 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sudhajaiswal के द्वारा
December 24, 2014

इस रचना की जितनी प्रशंसा करूँ कम होगी, अति सुन्दर! अति उत्तम!

    chaatak के द्वारा
    December 24, 2014

    स्नेही सुधा जी, सादर अभिवादन, कविता पर आपकी अच्छी राय जानकर अच्छा लगा, मुझे भी लगा कविता थोड़ी क्लिष्ट या गूढ़ जरूर है लेकिन मनोभावों को व्यक्त करने और साम्य बनाये रखने की पूरी कोशिश की है| हार्दिक धन्यवाद!

jlsingh के द्वारा
December 23, 2014

उच्च कोटि की कविता और भाव आदरणीय चातक जी, के आपने साम्य दिखाया है बाली और राम के चरित्र में …अद्भुत!

    chaatak के द्वारा
    December 24, 2014

    स्नेही जे.एल.सिंह जी, सादर अभिवादन, कविता पर आपके विचार जानकर बहुत ख़ुशी हुई| हार्दिक धन्यवाद!


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