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जुवेनाइल: किशोर या छिछोर

Posted On: 10 Aug, 2014 Others में

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हत्या के मामले में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में उतने अधिक संशोधन की आवश्यकता नहीं है जितनी बलात्कार, सामूहिक बलात्कार और उसके पश्चात् हत्या करने के मामलों में| तेरह वर्ष की उम्र पूरी करते करते कोई भी किशोर ऐसी शारीरिक और मानसिक स्थिति में होता है कि सही-गलत, नैतिक-अनैतिक इत्यादि बातें अच्छी तरह से समझने लगता है यही कारण है कि उसे जुवेनाइल जस्टिस एक्ट में छिपा अपना हित और उसके द्वारा किया गया अपराध दोनों अच्छी तरह से पता होता है| हत्या जैसे मामले में किशोरावस्था का तूफानी मानसिक संवेग भी विचारणीय है लेकिन तब जबकि हत्या अचानक उत्पन्न हुए किसी मनोभाव के कारण की गई हो| परन्तु बलात्कार कभी भी अचानक उत्पन्न हुए किसी मनोभाव का कारण नहीं होता, ये एक ऐसी प्रताड़ना है जिसे बिना सोचे समझे, और बिना वयस्क शारीरिक और मानसिक स्थिति के किया ही नहीं जा सकता इसलिए इन मामलों में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का लाभ देकर आज तक न जाने कितनी लडकियों/महिलाओं को नारकीय कष्ट, जिल्लत की जिंदगी और क्षोभ से भरी मृत्यु भुगतने पर विवश किया है| आज एक मौका शासन और न्याय व्यवस्था को भी मिला है कि वे लम्बे समय से एक विवेकहीन और लैंगिक पक्षपात वाले कानून की आड़ में अपने द्वारा किये गए अन्याय का पश्चाताप करें और एक ऐसा सख्त कानून बनायें जिससे प्राकृतिक और सामाजिक न्याय की पुनर्स्थापना हो, एक बार फिर से न्याय और संसदीय व्यवस्था में लोगों की आस्था बलवती हो|
जुवेनाइल कानून एक अच्छी सोच की उत्पत्ति था लेकिन वो कानून तब बनाया गया था जब भारत जैसे देश पर न तो पाश्चात्य संस्कृति हावी थी और न ही मीडिया की नंगई| इसे लाने के पीछे एक मात्र कारण था उस समय सबसे बुरे किस्म के लोगों में भी अपने बच्चों को अच्छा बनाने की ललक जिससे लगभग १८ वर्ष की उम्र तक के लड़कों को शातिर अपराधी मस्तिष्क मिल पाना दुर्लभ संयोग या कुसंगति ही हो सकती थी| उस समय न तो समाचार के नाम पर स्त्री देह का व्यापार होता था और न ही मूवी इत्यादि में फूहड़ता की गुंजायश थी| ऐसे में किशोरों के द्वारा जो दुर्लभ अपराध होते थे वे सिर्फ इसलिए कि या तो उनके किसी सगे सम्बन्धी के साथ कोई अत्याचार होता था या फिर किसी प्रौढ़ व्यक्ति का सोचा समझा माइंड-वाश, और परिणाम अधिकतर हत्या और हत्या की कोशिश जैसे अपराध ही थे| लैंगिक अपराध तो गिनती की भी नहीं थे| प्रशंसा करनी होगी उन लोगों की जिन्होंने समय रहते उन किशोरों को एक अच्छा कानून देकर समाज में उनकी सार्थक वापसी का रास्ता खोला और साथ ही उन अपराधियों के विरुद्ध भावनात्मक सुरक्षा भी जो किशोरों को या उनके संबंधियों को लाचार मानकर अत्याचार करते थे|
परन्तु वर्तमान परिवेश में वह सुरक्षा छूट जो किशोरों को मिली थी, अब महिलाओं को चाहिए, क्योंकि अब भारतीय समझ संस्कृति-विहीन समाज के रूप में स्त्रियों के लिए चुनौती बना खड़ा है| एक ओर उन्हें बाजार का प्रोडक्ट बना कर खड़ा कर दिया गया है जिसमे उन्हें स्वयं अपने जिस्म की नुमाइश करके पैसा कमाना सबसे आसान लगता है तो दूसरी तरफ उस प्रोडक्ट का साइड इफ़ेक्ट समाज के हर तबके की महिलाओं को फब्तियों से लेकर सामूहिक बलात्कार तक झेलकर चुकाना है| हलाकि इसमें स्त्री स्वयं से कहीं भी किसी भी स्तर पर जरा सी भी जिम्मेदार नहीं है, ये पूरा खेल उन कुत्सित राजनीतिज्ञों, मीडिया, फिल्मकारों, छद्म दार्शनिको, समाज-शास्त्रियों और सफेदपोशों का है जो हर स्तर पर हर जगह पर स्त्री को सिर्फ और सिर्फ एक बाजारू प्रोडक्ट के रूप में देखते हैं और उसे आधुनिकता के या स्त्री सशक्तिकरण के लिफ़ाफ़े में लपेटकर इस तरह पेश करते हैं जैसे इससे बढ़कर स्त्री हित कोई दूसरा नहीं हो सकता|
मुझे यहाँ पर किंग आर्थर का एक वाक्य याद आता है-
“Old order changeth, yielding place to new;
Lest one good custom should corrupt the world.”
स्पष्ट है कि हर एक रीति, रिवाज, कानून, सिद्धांत चाहे जितना भी अच्छा क्यों न हो एक नियत समय तक ही रहना चाहिए अन्यथा वह पूरी दुनिया को भ्रष्ट कर देगा| आज हमारे देश में जुवेनाइल क़ानून एक वाईल (सड़े हुए) कानून से ज्यादा कुछ नहीं है| इसका कारण भी स्पष्ट है कि समाजशास्त्रियों की अवधारणा (कि बालक की अवस्थाएं सिर्फ पांच होती होती हैं- शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, प्रौढ़ावस्था, और वृद्धावस्था) नवीन परिवेश में सही नही है| यदि आज हम विकास के इस प्रक्रम का सही-सही अवलोकन करें तो किशोरावस्था (जिसके कारण जुवेनाइल कानून का उद्भव हुआ) अब दो भागों में बंट चुकी है जिसे आप किशोरावस्था व् छिछोरावस्था (जैसा कि जीव-विज्ञान के मेरे एक शिक्षक मित्र ने इस अवस्था का नामांकन किया है) के रूप में परिभाषित कर सकते हैं| इस अवस्था का जिक्र भले ही कुछ लोगों को अटपटा लगे लेकिन यही आज हमारे भारतीय समाज और पूरी स्त्री जाति के लिए चुनौती बन गई है| कानून का काम सिर्फ घिसे-पिटे कानून को लागू करना नहीं साथ ही साथ उनकी सार्थकता और प्रभाव का आंकलन करना भी होना चाहिए वर्ना हम बातें चाहे जितनी करें न्याय कभी नही दे पाएंगे| आज जीवित इंसानों पर मुर्दे (मृत कानूनों के मृत निर्माता) निष्कंटक शासन कर रहे हैं और न जाने कब तक ऐसे ही तांडव करते रहेंगे|

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28 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

As के द्वारा
August 25, 2014

सही और सामयिक प्रस्तुति।

    chaatak के द्वारा
    September 7, 2014

    हार्दिक धन्यवाद!

आशा जोगलेकर के द्वारा
August 22, 2014

हलाकि इसमें स्त्री स्वयं से कहीं भी किसी भी स्तर पर जरा सी भी जिम्मेदार नहीं है, ये पूरा खेल उन कुत्सित राजनीतिज्ञों, मीडिया, फिल्मकारों, छद्म दार्शनिको, समाज-शास्त्रियों और सफेदपोशों का है जो हर स्तर पर हर जगह पर स्त्री को सिर्फ और सिर्फ एक बाजारू प्रोडक्ट के रूप में देखते हैं और उसे आधुनिकता के या स्त्री सशक्तिकरण के लिफ़ाफ़े में लपेटकर इस तरह पेश करते हैं जैसे इससे बढ़कर स्त्री हित कोई दूसरा नहीं हो सकता| लेकिन स्त्री जो पढी लिखी है सोच तो सकती है। फिर क्यूं अपनी देह का प्रदर्शन करने पर उतारू है।

    chaatak के द्वारा
    August 23, 2014

    आशा जी, आपकी बात सही है लेकिन यहाँ पर एक बार फिर मैं स्त्री को दोषमुक्त करना चाहूँगा- “Who in this world is so firm that cannot be seduced.” स्त्री कभी गुमराह होकर तो कभी पैसे के लिए पागल होकर ये कर रही है| खूबसूरत और आकर्षक दिखना नारी मन की कमजोरी भी है और उसकी विशेषता भी :) लेकिन इसके लिए उसे अमानवीय ढंग से प्रताड़ित किया जाए ये जघन्य है| आपकी राय जानकर बहुत ख़ुशी हुई, हार्दिक धन्यवाद !

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर के द्वारा
August 22, 2014

ब्लॉग बुलेटिन की गुरुवार २१ अगस्त २०१४ की बुलेटिन — बच्चों के साथ बच्चा बनकर तो देखें – ब्लॉग बुलेटिन — में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है … एक निवेदन— यदि आप फेसबुक पर हैं तो कृपया ब्लॉग बुलेटिन ग्रुप से जुड़कर अपनी पोस्ट की जानकारी सबके साथ साझा करें. सादर आभार!

    chaatak के द्वारा
    August 22, 2014

    स्नेही डॉ. सेंगर जी, सादर अभिवादन, ब्लॉग बुलेटिन में स्थान देने का हार्दिक धन्यवाद! मैं फेसबुक पर सक्रिय हूँ और शीघ्र ग्रुप में जुड़ने की कोशिश करूंगा|

rajanidurgesh के द्वारा
August 21, 2014

चातकजी , बधाई साप्ताहिक सम्मान के लिए .बहुत ही सार्थक आलेख

    chaatak के द्वारा
    August 22, 2014

    रजनी जी, ब्लॉग को समय देने का हार्दिक धन्यवाद ! ब्लॉग पर आपकी राय जानकर अच्छा लगा

yogi sarswat के द्वारा
August 21, 2014

एक गंभीर और सार्थक लेख के लिए बधाई चातक जी ! बहुत कुछ ऐसा घटित हो रहा है जिसको परिभाषित करना या समझ पाना मनोवैज्ञानिकों के लिए बहुत मुश्किल होता जा रहा है इसलिए एकदम से किसी निष्कर्ष पर पहुँच पाना बहुत मुश्किल होगा !

    chaatak के द्वारा
    August 22, 2014

    स्नेही योगी जी सादर अभिवादन, ब्लॉग पर राय देने का हार्दिक धन्यवाद! मेरी राय में मनोवैज्ञानिकों को मुश्किल हो रही है तो उन्हें थोड़ी और मेहनत करनी चाहिए और निष्कर्ष पर पहुँचने में जिन लोगों को मुश्किल हो रही हो उन्हें न्याय व्यवस्था से दूर रहना हितकर होगा क्योंकि अपराध कभी भी कामचोरों और भ्रमितों के लिए थमता नहीं और पीड़ित को राहत तब मिलनी चाहिए जब उसे दर्द हो रहा हो, झूठे बहाने और लुंज-पुंज रवैये ने बहुत जाने ली हैं अब बेवक़ूफ़ मनोवैज्ञानिकों और नाकारा न्याय और कानून के लिए कितनी औरतें प्रैक्टिकल का सामान बने?

Santlal Karun के द्वारा
August 19, 2014

आदरणीय चातक जी, यह लेख आप ने गंभीरतापूर्वक तथा मौलिक विचारों के साथ लिखा है | यह बात लगभग नजरअंदाज की जाती रही है कि किशोर अपराधियों द्वारा अधिक संख्या में हर तरह के छोटे-बड़े अपराध किए जाते रहे हैं और उम्र के हवाले से तथा सुधर के नाम पर उन्हें छूट मिल जाया करती है | पर उसके प्रति न्याय का क्या कि जिसकी ज़िन्दगी तहस-नहस हो चुकी होती है | उक्त सम्बन्ध में कथ्य को आप ने प्रबल तर्कों के साथ प्रस्तुत किया है | इस वैचारिक लेख के लिए सहृदय साधुवाद तथा ‘बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ द वीक’ के चयन पर हार्दिक बधाई !

    chaatak के द्वारा
    August 22, 2014

    स्नेही संतलाल जी, सादर अभिवादन, ब्लॉग को समय देने का और विचारों पर राय प्रकट करने का हार्दिक धन्यवाद! आप बंधुओं के चर्चा में शामिल होने से ही हमारे विचारों को गति और प्रसार मिलता है और हो सकता है आगे चलकर हमारी आपकी राय भी इस तरह से अपराधों के प्रति नज़रिये में परिवर्तन लाने में कुछ योगदान भी कर सकें!

s.p. singh के द्वारा
August 19, 2014

चातक जी, सादर अभिवादन! सार्थक और विचारणीय आलेख के साथ साप्ताहिक सम्मान की बधाई! जुवेनाइल कानून एक अच्छी सोच की उत्पत्ति था लेकिन वो कानून तब बनाया गया था जब भारत जैसे देश पर न तो पाश्चात्य संस्कृति हावी थी और न ही मीडिया की नंगई| इसे लाने के पीछे एक मात्र कारण था उस समय सबसे बुरे किस्म के लोगों में भी अपने बच्चों को अच्छा बनाने की ललक जिससे लगभग १८ वर्ष की उम्र तक के लड़कों को शातिर अपराधी मस्तिष्क मिल पाना दुर्लभ संयोग या कुसंगति ही हो सकती थी| उस समय न तो समाचार के नाम पर स्त्री देह का व्यापार होता था और न ही मूवी इत्यादि में फूहड़ता की गुंजायश थी ! दूसरी ओर आज के युग में किशोर आयु को बच्चों को सबसे अधिक भृमित आधुनिक तथा कथित सोसल साइट के द्वारा भी किया जाता – एक जाति विशेष के तो १० वर्ष तक के बच्चे भी सेक्स का उतना ज्ञान रखते है जितना कोई युआ व्यक्ति रखता होगा ?

    chaatak के द्वारा
    August 22, 2014

    आदरणीय एस.पी. सिंह जी, सादर अभिवादन, ब्लॉग पर आपके विचार जानकर बहुत ख़ुशी हुई! काश कि हमारे देश में कानून कुछ सही मामलों में भी संवेदनशील होता और मानवाधिकार की बात सिर्फ जानवरों के लिए न होकर इंसानो के लिए भी होती!

TUFAIL A. SIDDEQUI के द्वारा
August 19, 2014

आदरणीय चातक जी, सादर अभिवादन! सार्थक और विचारणीय आलेख के साथ साप्ताहिक सम्मान की बधाई! साथ ही जे.एल. सिंह साहब की बात का मैं भी समर्थन करता हूँ. सादर

    chaatak के द्वारा
    August 22, 2014

    स्नेही बंधु तुफैल जी, सादर अभिवादन, ब्लॉग पर आपके विचारों को जानकर बेहद ख़ुशी हुई काश कि हम सभी की राय कुछ इस तरह एक हो जाए कि दरिंदगी जैसी चीजें हिन्दुस्तान की सीमाओं के आस पास भी न फटकें! हार्दिक धन्यवाद !

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
August 16, 2014

चातक जी अभिनंदन अजीब मानसीकताए होती हैॆ । किसी के माॅ बाप के लिए छिछोरापन चिंता का विषय होता है तो किसी के लिए गलतियां हो ही जाती हैं कोई बिगडेल मानता है तो कोई होनहार ..नई उपज है कुछ तो बनेगी समय सब सामंजष्य कर देता ओम शांति शांति 

    chaatak के द्वारा
    August 22, 2014

    स्नेही हरिश्चंद्र जी, आपकी बात से हम भी पूरी तरह इत्तेफाक रखते हैं! नारायण! नारायण!

Sumit के द्वारा
August 16, 2014

सुन्दर प्रस्तुति और बेस्ट ब्लॉगर बनने हेतु बधाई

bhagwandassmendiratta के द्वारा
August 15, 2014

माननीय चातक जी,अनेकों अनेक साधुवाद, निसंदेह आप दोहरी बधाई के पात्र हैं, ज्वलंत सामाजिक समस्या पर ऐसा सम्मानीय व सारगर्भित लेख जो मन एवं बुद्धि दोनो को झींझोड़ कर रख दे, साप्ताहिक सम्मान तो आपका अधिकार है| सच है कि सभी किशोरों को एक ही तराजू में नहीं तोलना चाहिए लेकिन चिंता का विषय ये है कि ये अपराध एक छूत के रोग की तरह तेज़ी से बढ़ता जा रहा है|इस रोग का उन्मूलन शीघ्रातिशीघ्र होना चाहिए| फिर से आपको नमन|  भगवान दास मेहन्दीरत्ता, गुड़गाँव

    chaatak के द्वारा
    August 22, 2014

    स्नेही भगवान दास जी, सादर अभिवादन, ब्लॉग पर समय एवं राय देने का हार्दिक धन्यवाद! काश कि हम सभी कि यह आशा शीघ्र पूरी हो !

jlsingh के द्वारा
August 14, 2014

आदरणीय चातक जी, सादर अभिवादन! सार्थक और विचारणीय आलेख के साथ साप्ताहिक सम्मान की बधाई! साथ ही मैं एक बात और जोड़ना चाहता हूँ, कानून बनाना हमारी संसद का काम है और उसपर न्याय देना न्यायपालिका का. न्यायपालिका अपना काम जिस गति से गर रही है मुझे नहीं लगता की हमारे देश में अपराध काम होने वाले हैं.चर्चित निर्भया कांड के दोषियों/आरोपियों को अब तक सजा नहीं हुई. उसके बाद से कितने अपराध हुए किसी की सजा उतना प्रचार भी नहीं होता किअपराधी में भय पैदा हो…सादर!

    chaatak के द्वारा
    August 22, 2014

    आदरणीय जे.एल. सिंह जी, सादर अभिवादन, अदालतें सुस्त हो और कानून नींद में रहे तो अक्सर संसद में नीले चलचित्रों को समाज में उतारने के दौर चलते हैं न कि किसी अच्छे कानून को बनाने की कवायद के …. पता नही … शायद सब उल्टा-पुल्टा हो गया… :D ब्लॉग पर राय देने का और अपराधियों के विरूद्ध आवाज उठाने का हार्दिक धन्यवाद!

एल.एस. बिष्ट् के द्वारा
August 14, 2014

चातक जी, सबसे पहले आपको बधाई साप्ताहिक सम्मान हेतु । आपका लेख पढा , विचारों से पूरी तरह सहमत हूं । मेहनत से एक अच्छा लेख लिखा है आपने । शुभकामनाएं ।

    chaatak के द्वारा
    August 22, 2014

    स्नेही सुमित जी, सादर धन्यवाद!

    chaatak के द्वारा
    August 22, 2014

    स्नेही बिष्ट जी, सादर अभिवादन, ब्लॉग में रखे गए विचारो से सहमति का हार्दिक धन्यवाद! अपने ब्लॉग पर वक्त दिया ये मेरे लिए सम्मान की बात है!

sadguruji के द्वारा
August 14, 2014

हम विकास के इस प्रक्रम का सही-सही अवलोकन करें तो किशोरावस्था (जिसके कारण जुवेनाइल कानून का उद्भव हुआ) अब दो भागों में बंट चुकी है जिसे आप किशोरावस्था व् छिछोरावस्था (जैसा कि जीव-विज्ञान के मेरे एक शिक्षक मित्र ने इस अवस्था का नामांकन किया है) के रूप में परिभाषित कर सकते हैं| इस अवस्था का जिक्र भले ही कुछ लोगों को अटपटा लगे लेकिन यही आज हमारे भारतीय समाज और पूरी स्त्री जाति के लिए चुनौती बन गई है| आपने सही कहा है ! आदरणीय चातक जी ! बहुत सार्थक,विचारणीय और उपयोगी लेख ! इस लेख के लिए और बेस्ट ब्लॉगर ऑफ़ दी वीक चुने जाने के लिए बधाई !

    chaatak के द्वारा
    August 22, 2014

    स्नेही सदगुरु जी, सादर अभिवादन, ब्लॉग पर आपके विचार जानकर बहुत ख़ुशी हुई! वैचारिक समर्थन और उत्साहवर्धन का हार्दिक धन्यवाद!


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