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राजनीति के सॉफ्ट टारगेट

Posted On: 3 May, 2014 Others में

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हिन्दुस्तान की राजनीति अपनी शैशवावस्था से ही शिकारी प्रवृत्ति की रही है, यानी लोकतंत्र की शक्तियों को छोड़कर केवल उसकी कमजोरियों का इस्तेमाल किया गया है| परिणाम यह रहा कि जो देश बड़ी आसानी से विकसित होकर आज पूरी दुनिया का रोल-मॉडल बन चुका होता, उसमे आज भी भुखमरी, गरीबी, बीमारी, लाचारी, और अशिक्षा बुरी तरह व्याप्त है|
हिन्दुस्तान के लोकतंत्र को खोखला बनाने की शुरुआत नेहरु की बांटो और राज करो (भारत का बंटवारा), लड़ाओ और राज करो (आज़ाद हिन्दुस्तान के पहले सांप्रदायिक दंगे) की नीति से ही हो गई थी| पहली धार्मिक टूट से काग्रेस को लम्बे समय तक सत्ता का लाभ नही मिल सकता था इसीलिए नेहरु की सत्ता प्राप्त करने की मंशा पूरी होते ही धर्मनिरपेक्षता जैसे भ्रमकारी शब्द को देश की आत्मा में नासूर की तरह डाल दिया गया और वह सॉफ्ट टारगेट जिसने देश का बंटवारा करवाया, नेहरु की इस कृपा का कायल होकर लम्बे समय तक के लिए कांग्रेस का वोट बैंक बन गया| भविष्य की विघटनकारी राजनीति के प्रमुख अधिष्ठाता रहे नेहरु ने न केवल ओछी राजनीति की आधारशिला रखी बल्कि देश के सम्पूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक ताने-बाने को कमजोर और रुग्ण भी बना दिया| इसके सबसे आसान शिकार थे वे लोग जो लम्बे समय से अशिक्षा, शोषण, बीमारी, गरीबी, और तिरस्कार झेल रहे थे| मुग़ल और बरतानिया हुकूमतें तो ख़त्म हो चुकी थी इसलिए इन नए कर्णधारों ने उनके द्वारा फैलाए गिये भ्रष्टाचार, शोषण और दमन के जख्मो का जो आक्रोश था उसे बड़ी आसानी से तथाकथित उच्च जातियों की और मोड़ दिया गया| परिणाम यह रहा कि भारतीय समाज राष्ट्र के रूप में संगठित होने के बजाय जातियों में दरकना शुरू हो गया| मुगलों और अंग्रेजों के अत्याचार को वामपंथी इतिहासकारों ने न्यायप्रिय शासन व्यवस्था, स्थापत्य कला का स्वर्णकाल, उदारवाद, परिष्कृत शिक्षा-प्रणाली बताकर महिमा-मंडित किया| बड़े ही योजनाबद्ध तरीके से दमनकर्ताओं और शोषकों को सुधारक, उद्धारक, महान और प्रतापी बनाकर स्थापित किया गया| राजनीति की इसी विभाजनकारी प्रवृत्ति को साधन बनाकर मुलायम सिंह यादव ने मुसलमानों को पुचकारा तो कांसीराम ने जाने-अनजाने तथाकथित निम्न जातियों को, क्योंकि दोनों को पता था कि हिन्दुस्तान के दो वर्ग ही सबसे आसन शिकार (सॉफ्ट टार्गेट) हैं- एक मुसलमान तो दूसरा तथाकथित दलित एवं पिछड़ा वर्ग| कहना गलत नहीं होगा कि रचनात्मक राजनीति की जो जगह एक संप्रभु राष्ट्र में होनी चाहिए वह हिन्दुस्तान में कभी नहीं दिखाई पड़ी| मुसलमान देशभक्त है ये बताने के लिए आज भी अब्दुल हमीद के नाम का सहारा लेना पड़ता है या फिर मुलायम के लेफ्टिनेंट आज़म खान की तरह ये बताना पड़ता है कि हिन्दुस्तान की सरहदों की रक्षा मुसलमानों के रहमो-करम पर है| मायावती को बार-बार ये बताना पड़ता है कि दलित सिर्फ दलित होता है और हमेशा दलित ही रहता है क्योंकि वह यदि राष्ट्र की मुख्यधारा में चला गया तो उनकी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का क्या होगा| किसी भी गैर हिन्दुस्तानी व्यक्ति को ये सुनकर हँसी आ सकती है या आश्चर्य भी हो सकता है कि गरीबी, कमजोरी और समस्याएं जाति देखती है और सिर्फ मुलायम और मायावती के वोट बैंक को ही आती है| जाति और धर्म की राजनीति करने वाले इन नेताओं के पास कोई भी योजना ऐसी नहीं है कि वे अपने इन्ही वोट बैंकों की समस्याओं का समूल निस्तारण एक निश्चित समयावधि में करने की घोषणा करें| ऐसी घोषणा इनके राजनीतिक व्यवसाय के प्रतिकूल है क्योंकि इन्हें अनन्त काल तक का शासन चाहिए या कम से कम अपने जीवित रहते तो ये ऐसा कदापि नहीं चाहेंगे|

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10 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rajesh Dubey के द्वारा
May 12, 2014

लोकतंत्र को राजनैतिक पार्टिया अपने ढंग से विश्लेसित करती है, और इसकी कमजोरियों के माध्यम से मनमाने काम करती है. आज भारत एक मजबूत और शक्तिशाली देश होता अगर इसे जाति और सम्प्रदायों में नहीं बता गया होता.

    chaatak के द्वारा
    May 12, 2014

    स्नेही राजेश जी, देश में राजनीति समस्याओं को उत्पन्न करती है जबकि जाति राजनीति के हाथों का एक खिलौना कमोवेश मेरा अगला ब्लॉग भी जातिवाद पर ही आधारित है जल्द पोस्ट करूंगा और आपकी राय चाहूँगा\ धन्यवाद!

yogi sarswat के द्वारा
May 10, 2014

कहना गलत नहीं होगा कि रचनात्मक राजनीति की जो जगह एक संप्रभु राष्ट्र में होनी चाहिए वह हिन्दुस्तान में कभी नहीं दिखाई पड़ी| मुसलमान देशभक्त है ये बताने के लिए आज भी अब्दुल हमीद के नाम का सहारा लेना पड़ता है या फिर मुलायम के लेफ्टिनेंट आज़म खान की तरह ये बताना पड़ता है कि हिन्दुस्तान की सरहदों की रक्षा मुसलमानों के रहमो-करम पर है| मायावती को बार-बार ये बताना पड़ता है कि दलित सिर्फ दलित होता है और हमेशा दलित ही रहता है क्योंकि वह यदि राष्ट्र की मुख्यधारा में चला गया तो उनकी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का क्या होगा| बहुत दिनों के बाद आपको दोबारा एक सार्थक , तेजतर्रार पोस्ट के साथ पढ़ रहा हूँ ! yogi-saraswat.blogspot.in

    chaatak के द्वारा
    May 10, 2014

    स्नेही योगी जी, सादर अभिवादन, काफी दिनों बाद ब्लॉग पोस्ट कर पाया हूँ आपकी राय ने सुखद अहसास कराया, हार्दिक धन्यवाद !

jlsingh के द्वारा
May 5, 2014

आज के दैनिक जागरण में इस ब्लॉग का मुख्यांश छपा …आदरणीय चातक जी, आपको बधाई! आलेख का उद्देश्य भी सही है.

    chaatak के द्वारा
    May 5, 2014

    आदरणीय जे०एल० सिंह जी, सादर अभिवादन, ब्लॉग को समय देने का हार्दिक धन्यवाद!

Santosh Kumar के द्वारा
May 3, 2014

आदरणीय कृष्णा जी ,..सादर प्रणाम …. कम शब्दों में पूरी बात लिखना कोई आपसे सीखे !….आशा करनी चाहिए की हमें अपनी मूरखता और उनकी साजिशों से निजात जल्दी मिलेगी !….धन्यवाद सहित सादर वन्देमातरम !

    chaatak के द्वारा
    May 3, 2014

    स्नेही संतोष जी, सादर अभिवादन, मैं भी चाहता हूँ कि अब इन साजिशों से निजात मिले और हिन्दुस्तान के राष्ट्र के रूप में संगठित होकर आगे बढे। ब्लॉग पर राय देने का हार्दिक धन्यवाद। वन्देमातरम

    rameshbajpai के द्वारा
    May 4, 2014

    मायावती को बार-बार ये बताना पड़ता है कि दलित सिर्फ दलित होता है और हमेशा दलित ही रहता है क्योंकि वह यदि राष्ट्र की मुख्यधारा में चला गया तो उनकी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का क्या होगा| किसी भी गैर हिन्दुस्तानी व्यक्ति को ये सुनकर हँसी आ सकती है या आश्चर्य भी हो सकता है कि गरीबी, कमजोरी और समस्याएं जाति देखती है और सिर्फ मुलायम और मायावती के वोट बैंक को ही आती है| प्रिय श्री चातक जी पोस्ट का हर शब्द हर लाइन हिंदुस्तान की आत्मा को झकझोर रही है | कटाक्षः कर रही है इन रहनुमाओ पर | दिल से दुआ आपके लिए |

    chaatak के द्वारा
    May 4, 2014

    आदरणीय बाजपेयी जी, सादर अभिवादन, ब्लॉग पर आपकी राय जानकर बहुत ख़ुशी हुई काश कि देश इस तरह के नेताओं से निजात पा सके! हार्दिक धन्यवाद!


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