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फैसला-पालिका, बड़ी-अदालत, फैसलाधीश !

Posted On: 18 Jul, 2013 Others में

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अफ़सोस है! तरस आता है देश की सर्वोच्च फैसला पालिका के फैसलाधीशों की समझ पर! सिर्फ एक शब्द ‘बाल-अपराध’ की व्याख्या नहीं कर पाई शीर्ष अदालत!
मामला निर्भया के साथ हुए बलात्कार का नहीं है, मामला है देश की राजनीति और क़ानून व्यवस्था की नासमझी और संवेदनहीनता का| जिस तरह शीर्ष अदालत ने साठ करोड़ आबादी के साथ पिछले कुछ दिनों में मजाक किया है वह देश के लाइसेंसी प्रबुद्ध वर्ग की विद्वता पर तरस खाने के लिए पर्याप्त है| इस बिंदु पर बहुत विस्तार में न जा कर यदि हम सिर्फ उन बिन्दुओं की बात करें जिनपर अदालत को व्याख्या/निर्णय देना था तो हमें पता चलता है कि आज हमारी अदालते उन लोगों के कब्जे में हैं जो सरल से सरल कानून की व्याख्या करने में अक्षम है| शीर्ष अदालत में बैठने वाले लोग अब उसकी गरिमा को कायम रखने में भी अक्षम हैं ये बात भी अब खुलकर सामने आ रही है, इसमें बैठे फैसलाकर्ता आये दिन अदालत को कभी नेताओं तो कभी जनता के मखौल का सबब बना रहे है| इसी शीर्ष अदालत से फुर्सत पाए एक जज साहब अपने बेतुके बयानों के लिए मशहूर भी हो चुके हैं और अब मीडिया के कंधे पर बन्दूक रखकर राजनीतिक हितो को साधने/सधवाने का काम कर रहे हैं|
बात करते हैं उस कानून की जिस पर निर्भया बलात्कार के बाद बड़ी अदालत के बड़े फैसला-प्रमुखों को फैसला देना था| बात थी ‘बाल-अपराध’ और ‘बाल-अपराधी’ की विवेचना और व्याख्या, की और ‘तर्क’ था कि वयस्कता की उम्र घटा दी जाए जिससे ऐसे तथाकथित बाल अपराधों पर रोक लगाई जा सके और उल्लंघन कंरने की दशा में उन्हें कठोर दंड दिया जा सके|
इस पूरे मामले को बड़ी अदालत ने मजाक बना डाला| विवेचना के बिंदु को छोड़कर तर्क पर फैसला दिया और वह भी कम-से-कम छह माह का जबरदस्त वेतन और सुविधाओं का उपयोग करते हुए| मुझे समझ में नहीं आता कि तथाकथित मूर्धन्यों के नाक के नीचे से हाथी निकल रहा था और उन्होंने सिर्फ पूँछ देख कर निर्णय दिया कि बाल अभी कोमल हैं इन्हें अच्छे शैम्पू से धोना चाहिए|
क्या ये आवश्यक नहीं था कि अदालत ‘बाल-अपराध’ की व्याख्या करती| बहुत सरल है- ‘बच्चों द्वारा किये जाने वाले अपराध’| फिर व्याख्या करनी थी ‘बाल-अपराधी’ की| ये भी कठिन नहीं था- ‘ऐसा अवयस्क जो ‘बाल-अपराध’ करता है’| अब देखिये कितना आसान है दोनों का सम्बन्ध और पारस्परिक व्याख्या- कोई भी अवयस्क बाल-अपराधी सिर्फ तभी है जब वो किसी बच्चे (यहाँ वयस्क और अवयस्क नहीं बल्कि बच्चे की बात है) के द्वारा किये जा सकने वाले अपराध को करता है| यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि किसी भी अपराधी के लिए उम्र का निर्धारण सिर्फ तब विचारणीय हो सकता है जबकि उसका कृत्य (अपराध) बच्चों के द्वारा किये जा सकने वाले अपराधों में से हो|
अब देखते हैं निर्भया के मामले को [जिसमे एक अपराधी को बाल-अपराधी साबित करने की सारी कोशिशें कामयाब हो चुकी हैं]
सिर्फ एक सवाल का जवाब चाहिए- क्या उस अपराधी के द्वारा किया गया अपराध किसी भी तरह से बच्चे के द्वारा किये जा सकने वाला अपराध है? यदि हाँ तो निःसंदेह उसे अवयस्क होने का लाभ मिलना ही चाहिए और इसके लिए किसी क़ानून को लाने या बदलने की आवश्यकता नहीं है| परन्तु यदि अपराधी के द्वारा किया जाने वाला अपराध बच्चे के द्वारा किये जा सकने वाले अपराध से इतर है तो इसका मतलब है कि पिछले छह माह से इस देश के फैसलाधीशों ने न्याय को ताकतवर और देश की स्त्रियों को सुरक्षित करने के लिए तनिक भी अध्ययन, तनिक भी परिश्रम नहीं किया है बल्कि इस काम को करने के एवज में मिलने वाली मोटी धनराशि और सुविधाओं पर ऐश की है और डकार मारते हुए एक फैसला लिख मारा है जिसकी कोई आवश्यकता भी नहीं थी !

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
August 5, 2013

बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी …बेह्तरीन अभिव्यक्ति …!!शुभकामनायें. आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

    chaatak के द्वारा
    August 6, 2013

    स्नेही मदन मोहन जी, सादर अभिवादन, आपको ब्लॉग में समाहित विचार ठीक लगे ये जानकर बेहद ख़ुशी हुई| प्रयास जारी रहेगा| हार्दिक धन्यवाद!

harirawat के द्वारा
August 4, 2013

चातक जी शायद पहली बार आपके ब्लॉग पर आने का अवसर मिला है ! आपके बिचारों से मैं पूरी तरह सहमत हूँ ! १६ दिसम्बर को जब यह हादसा हुआ था, जनता की भीड़ सडकों पर उतर आई थी, पार्लियामेंट से होकर जनता की आवाज संयुक्त राष्ट्र तक पहुँच गयी थी और लगता था की चन्द रोज लगेंगे कोर्ट का फैसला आएगा और सारे क्रिमिनल फांसी के फंदे पर लटके होंगे, लेकिन अफसोस आज पूरे आठ महीने होने को आए अभी तक कोर्ट ‘बाल अफ़राध’ के दायरे में कितनी उम्र आंकी जाय, सुई अभी तक यहीं पर रुकी हुई है ! निर्भया की आत्मा फैसले के इन्तजार में अभी तक तड़प रही है और न्याय पालिका ….. ऊपर वाला देख रहा है भारतीय न्याय व्यवस्था को और हंस रहा है ! सार्थक और जनता को जगाने वाला लेख बहुत सारी बधाई ! हरेन्द जागते रहो !

    chaatak के द्वारा
    August 4, 2013

    हरीरावत जी, सादर अभिवादन, पोस्ट पर आपकी राय जानकर प्रसन्नता हुई, इस पोस्ट को लिखने के बाद मैंने कई बार इसे पब्लिश करने से अपने आपको रोका लेकिन बार बार यही लगा कि मैं इस पोस्ट को नहीं बल्कि न्याय के नाम पर हो रही नंगे और धोखाधड़ी को सम्मान देने के नाम पर देश की आत्मा की आवाज को रोक रहा हूँ, देश को बालिग़ और नाबालिग का व्याख्यान नहीं चाहिए न्याय चाहिए विशुद्ध न्याय| प्रतिक्रिया द्वारा समर्थन देने का हार्दिक धन्यवाद!

seemakanwal के द्वारा
July 28, 2013

विचारशील लेख हार्दिक धन्यवाद .

    chaatak के द्वारा
    August 2, 2013

    ब्लॉग को समय देने का हार्दिक धन्यवाद !

sudhajaiswal के द्वारा
July 19, 2013

आदरणीय कृष्ण जी, सादर अभिवादन, हमारे देश का कानून सिर्फ अँधा ही नहीं मनोरोगी भी हो चुका है तो उससे सही-गलत, भले-बुरे की समझ की उम्मीद हम कैसे कर सकते हैं | संविधान के अनुसार भारतीय कानून व्यवस्था कठोर और लचीला दोनों है, कठोर आम आदमी के लिए और लचीला अमीरों के लिए जो कानून को अपनी जेब में लिए घूमते हैं | आम आदमी के लिए इस देश में न्याय पाना आसमान के तारे तोड़ लाने जैसा है जो इसकी आस लिए खुद आसमान के तारों के पास पहुँच जाते हैं | मीडिया को सरकार अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करती है, उसे अपनी जेब में रखती है | मीडिया के लिए कोई कड़े नियम वो क्यूँ नहीं लागू करती उल्टे-सीधे, बेसिर पैर के कार्यक्रमों की बाढ़ सी है जिसे देखकर बच्चे उम्र से पहले बड़े हो रहे हैं | जब वक़्त तेजी से बदल रहा है तो कानून को भी तो उसके अनुसार बदलना ही चाहिए पर यहाँ अब लोकतंत्र रहा कहाँ आपके हमारे लिखने-पढने और कहने-सुनने का कोई फायदा होगा क्या? सब बेकार है यहाँ अब भ्रष्टतंत्र का साम्राज्य है आम जनता का चैन सुकून सब राम भरोसे है | हमारी हालत ऐसी है कि भैंस के आगे बीन बजाओ भैंस रही पगुराय और सरकार अपनी धुन में मगन है जिसकी लाठी उसी की भैंस | माफ़ कीजियेगा प्रतिक्रिया थोड़ी ज्यादा ही बड़ी हो गई, आपके विचारों से पूर्ण सहमती है, उम्दा आलेख |

    chaatak के द्वारा
    July 19, 2013

    स्नेही सुधा जी, सच कहें तो आपकी प्रतिक्रिया बड़ी नहीं है अगर मैं गलत नहीं हूँ तो जो आक्रोश इन स्वघोषित लाइसेंसी विद्वानों के प्रति पूरे देश की स्त्रियों के मन में उपजा है वह यदि व्यक्त करे तो तथाकथित विद्वानों की सम्पूर्ण बुद्धिमत्ता सैलाब में सूखे पत्ते की तरह बह जायेगी| राजनीति बहुत पहले ही आम आदमी का विश्वास खो चुकी थी अब अदालतों ने भी अपनी विश्वसनीयता को गँवा दिया है, ये सभी मिलकर अराजकता को न्योता दे रहे है, राजनीति को जिन्दा रखने के लिए लोगों का क़त्ल होता था अब तथाकथित विद्वान् अपनी कुंठाओं को न्यायोचित ठहराकर स्त्रियों का दैहिक और मानसिक दमन करने को कानूनी बल प्रदान कर रहे हैं| वैचारिक सहमति का हार्दिक धन्यवाद!

    sudhajaiswal के द्वारा
    July 19, 2013

    कृष्ण जी, आपने बिलकुल सही समझा कि मुझे और भी बहुत कुछ कहना था अगर सारी बातें मैं लिखती तो आपके इस पोस्ट से भी दुगुनी बड़ी मेरी प्रतिक्रिया होती पर मुझे वाकई ऐसा लगता है कि कुछ भी लिखना या पढ़ना सब अब बेमानी बातें हैं वो ज़माने लद गए जब कलम की ताक़त तलवार की ताक़त से बड़ी होती थी अब तो कलम भी भ्रष्ट नेताओं ( जिन्हें अपनी मातृभाषा तक का ज्ञान नहीं ) के भाषणों को लिखने के काम आ रही है कुछ विद्द्वान अपनी मातृभाषा और कलम तक को बेच रहें हैं | आपने इतने उम्दा आलेखों को लिखा है पर क्या फायदा सब बस कहने और सुनने की बातें रह गई हैं | सच कहूँ तो एक पंक्ति में यही कह देना काफी था कि आपके विचारों से पूर्ण सहमत हूँ |

    chaatak के द्वारा
    July 19, 2013

    स्नेही सुधा जी, ये दर्द सिर्फ आपका नहीं है ये एक अरब हिन्दुस्तानियों का दर्द है| बड़ा कष्ट होता है कहते हुए लेकिन आज हालत ऐसे हैं कि लगता है इससे अच्छी न्याय व्यवस्था गुलामी के दौर में थी, कम-से-कम जनता के आक्रोशित होने पर अदालतें सुनती तो थीं और तब तक बिलकुल सही निर्णय देती थीं जबतक कोई मामला ब्रिटिश हुकूमत बनाम हिन्दुस्तानी अवाम नहीं होता था| इन काले अंग्रेजों ने तो किसी भी नैतिकता को नहीं बख्शा| लानत है इन पर|

jlsingh के द्वारा
July 19, 2013

‘सब धान साढ़े बाईस’- बहुत ही पुरानी कहावत है … मतलब है, गुण दोष का ध्यान दिए बिना एक ही मोल लगाना. त्वरित अदालत का क्या मतलब होता है यह भी ये न्यायाधिपति बतला देते तो भी कुछ समझ में आता. १६ दिसंबर के बाद १६ जुलाई आ गया … फैसला … कुछ नहीं …तब से अब तक प्रतिदिन सामूहिक दुष्कर्म हो रहे हैं किसी को कोई फर्क पड़ रहा है. क्यों फर्क पड़ेगा … यह घटना न तो किसी संभ्रांत, कुलीन, उच्च पदासीन लोगों की बच्चियों/ महिलाओं के साथ हो रहा है, नहीं किसी को सजा हो रही है …फिर अपराध क्यों कम होने लगे. अभी कल की ही बात लीजिये जिस कोर्ट ने निर्णय दिया था कि अपराधी न तो चुनाव लड़ सकेंगे न ही वोट दे सकेंगे, पर आज उसी अदालत ने कम से कम तीन सजायाफ्ता कैदी विधायक को झारखण्ड विधान सभा में वर्तमान हेमंत सोरेन सरकार के पक्ष में वोट देने के लिए जमानत पर छोड़ा …. हम सब कानून नहीं जानते. जो अपराधी हैं, वही कानून बनाने के काबिल हैं. सब गोलमाल है …….

    chaatak के द्वारा
    July 19, 2013

    आदरणीय जे.एल. सिंह जी, सादर अभिवादन, राष्ट्र की अस्मिता का सौदा हो रहा है स्त्री को भोग विलास की सामग्री से अधिक कुछ नहीं माना जा रहा है और अब हालात ये हैं कि किसी भी स्त्री का बर्बरता पूर्वाक बलात्कार करके उसको क़त्ल कर देना आम बात बन चुकी है मुझे समझ में नहीं आता ये कैसे बुद्धिजीवी हैं जिनकी बुद्धि पर एक चुटकुलों की किताब गिर पड़ी तो इनकी बुद्धि घुटनों में खिसक गई| लानत भेजिए ऐसे मुर्द्खोरों पर!


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