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संहारक का उपसंहार

Posted On: 4 Jul, 2013 Others में

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उत्तराखंड में हुई त्रासदी हृदय विदारक है कुछ भी समझ में नहीं आता कि इस विनाशलीला को क्या कहें! इलेक्ट्रॉनिकी मीडिया ने सर्वज्ञ होने का ठेका उठा रखा है और जब कभी भी इस दैवीय त्रासदी के बारे में चैनलों की अलग-अलग रिपोर्ट देखता/सुनता हूँ, मन में इनके लिए पहले से भी ज्यादा वितृष्णा का भाव उत्पन्न हो जाता है| लेकिन किसी भी तरह एक पल को भी ये विचार मन में नहीं आता कि प्रकृति ने अथवा दैवीय शक्तियों ने कुछ भी गलत किया है| साथ ही साथ जब छोटे-छोटे बच्चों और असहाय बुजुर्गों की बेचारगी से भरी आँखों को देखता हूँ तो मन बागी हो उठता है और सबकुछ छोड़ कर उस संहारक की इस विनाशलीला पर उससे कुछ बहुत ही कडवे प्रश्न भी करता है लेकिन अगले ही पल अपनी कमजोरी का अहसास होता है और खुद से ही प्रश्न करता हूँ- ‘क्या दुनिया का कोई भी कड़वा प्रश्न संहारक के द्वारा कंठ में धारण किये गए हलाहल से ज्यादा कड़वा हो सकता है? जिस संहारक ने मनुष्य ही नहीं बल्कि सुरों और असुरों के भलाई के लिए विषपान किया क्या उसकी आलोचना इस विनाश के लिए की जा सकती है? क्या ये जीवन हमारा अपना है? क्या हम हमेशा के लिए इस दुनिया में आये हैं? तो अन्तर्मन उत्तर देता है- हम संहारक की विनाशलीला पर प्रश्न उठाकर सिर्फ और सिर्फ मानवप्रेमी होने का ढोंग कर रहे हैं और वे कड़वे प्रश्न सिर्फ और सिर्फ हमारे जैसे ही तुच्छ इंसानों द्वारा दुखों में डूबे पीड़ितों का भावनात्मक शोषण करने के उपकरण मात्र हैं जिनसे हम स्वयं को महान और परपीड़ा को गहराई से समझने वाला सिद्ध करने की कोशिश कर रहे है| संहारक के समक्ष ये प्रश्न वैसे ही हैं प्रभाव और महत्वहीन हैं जैसे धूल के वे असंख्य कण जो हमारी साँसों के साथ हमारी देह में प्रविष्ट तो होते है परन्तु हम इसका संज्ञान तक नहीं लेते| हमारा जीवन हमारा अपना नहीं ये उसी संहारक का है वह इसका असली स्वामी है उसका जब जी चाहे जैसे जी चाहे इसे लेने के लिए भी अधिकृत है| हम अल्प समय के लिए इस धरती पर उसकी मर्जी से आये हैं और उसी की मर्जी से हमें जाना भी पड़ेगा|
अब मन कुछ शांत होने लगता है और संहारक के लिए उत्पन्न हुई कड़वाहट ख़त्म हो जाती है और फिर मन भागता है कारण की ओर- आखिर संहारक ने इतनी बड़ी विनाशलीला की पटकथा क्योंकर लिखी? तभी रोती चीखती महिलाओं का झुण्ड (जो किसी बुद्धिजीवी नेता या फिर मानवता के सबसे बड़े रक्षक चैनलों के सर्वज्ञ रिपोर्टरों की प्रेरणा से झुण्ड में अपने आंसुओं और दर्द का सार्वजानिक प्रदर्शन करने निकली हैं) मेरे मन में उत्पन्न हुई इस जिज्ञासा को भी शांत कर देता है- वे अश्रुपूरित नेत्रों और विलाप करते कंठ से कैमरे के सामने आती हैं, और कहती हैं ‘केदारनाथ की पूजा शरू करने की इतनी जल्दी क्या है? पहले हमारे आंसुओं को तो सूख जाने दो!’ (भले ही प्रायोजित है) पर ये हृदय को चीर देने वाली बात है जो नाग के विष सा असर करती है और देखने/सुनने वाले के मस्तिष्क को कोई मौका न देते हुए सीधा उनके दिलों पर असर करती हैं और इसी के साथ पूरा हो जाता है प्रसारण करने वाले चैनलों का अधिकतम टी० आर० पी० लक्ष्य!
अब तनिक भी संदेह नहीं रह जाता कि संहारक ने देवभूमि की पटकथा में इतनी बड़ी विभीषिका का उपसंहार क्यों लिखा! अलकनंदा, भागीरथी और मंदाकिनी की लहरों में गूंजने वाला स्वर उसी संहारक का था जो हमें उसके अट्टहास सा प्रतीत हुआ परन्तु वास्तव में वो संहारक की हृदयविदारक गर्जना थी जो इन्हीं तुच्छ इंसानों के दिए जख्मों के कारण उठी थी| केदारनाथ की पूजा पर प्रश्न उठाने वालों अभी भी तुम्हे लगता है कि तुम उसकी पूजा करके कोई अहसान कर रहे हो! उस विराट स्वरुप को तुम्हारी पूजा की आवश्यकता कभी नहीं थी उसकी पूजा तुम हमेशा अपनी गरज से करते आये हो और उस पर जबरदस्ती थोपी गई पूजा के साथ-साथ तुमने उसे सिर्फ आहत ही किया है| फिर भी अपेक्षा करते हो कि संहारक गंगा को अपनी जटाओं में कैद रखकर तुम्हे विनाश से बचाएगा? या तो तुम बिलकुल बेवक़ूफ़ हो या फिर बेहद मक्कार !

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20 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

yogi sarswat के द्वारा
July 31, 2013

पैसा कमाने की अंधी दौड में कई कई मंजिला ईमारत खड़ी कर दी गयी … नदी के मुहानो में दुकाने होटल बना दिए गए… तब भी सरकरी तन्त्र सो रहा था जब अवैध निर्माण हुआ और तब भी तब विनाश हुआ, जगा तो अब है सरकारी महकमा क्यूँ कि आपदा के नाम पे रहत कोष में धन जो बरस रहा है .. प्रकृति ने हमको बहुत कुछ दिया है मगर हम उसका दोहन ही कर रहे है और अब जब प्रकृति रोद्र रूप में आई तो दोष भगवान के सर कर दिया जा रहा है ये दिव्या जी की बात है श्री चातक जी और मुझे लगता है बहुत कुछ कह दिया है उन्होंने !

    chaatak के द्वारा
    August 2, 2013

    स्नेही योगी जी, सादर अभिवादन, आपकी राय जानकर बहुत ख़ुशी हुई दिव्या जी ने जो कुछ भी कहा वह सत्य है अब हमें स्वयं से प्रकृति की याद नहीं आती तो भला प्रकृति कब तक हमारी धृष्टता को सहे|

ajaykr के द्वारा
July 7, 2013

अलकनंदा, भागीरथी और मंदाकिनी की लहरों में गूंजने वाला स्वर उसी संहारक का था जो हमें उसके अट्टहास सा प्रतीत हुआ परन्तु वास्तव में वो संहारक की हृदयविदारक गर्जना थी जो इन्हीं तुच्छ इंसानों के दिए जख्मों के कारण उठी थी| केदारनाथ की पूजा पर प्रश्न उठाने वालों अभी भी तुम्हे लगता है कि तुम उसकी पूजा करके कोई अहसान कर रहे हो! उस विराट स्वरुप को तुम्हारी पूजा की आवश्यकता कभी नहीं थी उसकी पूजा तुम हमेशा अपनी गरज से करते आये हो और उस पर जबरदस्ती थोपी गई पूजा के साथ-साथ तुमने उसे सिर्फ आहत ही किया है| CHATAK JI……BAHUT HI SATIK ARTICLE क्या केदारनाथ में मानव ही मरे ? जब 5 रुपए के बिस्कुट के 100 रुपए… जब 15 रुपए के दूध के 200 रुपए….. कुछ महिलाओं के साथ बलात्कार…. लाशों के अंग भंग करके गहने उतर लेना….. नहीं जनाब ….वहाँ मानवता भी मरी… काश कोई इस मानवता को भी राहत दे पाता !

    chaatak के द्वारा
    July 7, 2013

    स्नेही अजय जी, जो कुछ भी हुआ वीभत्स था और सबकुछ मानव रचित था परन्तु सारा दोष मढ़ा जा रहा है पवित्र जीवनदायी नदियों और निर्विकार संहारक को मुझे ऐतराज है ऐसी धृष्ट और कलुषित मानसिकता पर| प्रतिक्रिया द्वारा पोस्ट पर विचार व्यक्त करने का हार्दिक धन्यवाद!

div81 के द्वारा
July 7, 2013

सभी लोग ये सवाल कर रहे भक्तो के साथ ऐसा क्यूँ कर हुआ ….उत्तराखंड में आई आपदा,  प्रकृति के साथ खिलवाड़ का परिणाम है……….. और मानव निर्मित ही कहूँगी मैं इसको…….. जहाँ पर सडक बनने की इजाजत नहीं है वहाँ रोजाना हेलीकॉप्टरों से यात्री आ जा रहे है…. विकास के नाम पे हम विनाशलीला ही रच रहे हैं…. पैसा कमाने की अंधी दौड में कई कई मंजिला ईमारत खड़ी कर दी गयी … नदी के मुहानो में दुकाने होटल बना दिए गए… तब भी सरकरी तन्त्र सो रहा था जब अवैध निर्माण हुआ और तब भी तब विनाश हुआ, जगा तो अब है सरकारी महकमा क्यूँ कि आपदा के नाम पे रहत कोष में धन जो बरस रहा है .. प्रकृति ने हमको बहुत कुछ दिया है मगर हम उसका दोहन ही कर रहे है और अब जब प्रकृति रोद्र रूप में आई तो दोष भगवान के सर कर दिया जा रहा है

    chaatak के द्वारा
    July 7, 2013

    दिव्या जी, मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ, ये विनाशलीला संहारक ने नहीं बल्कि हमने खुद तय कर रखी थी, हम स्वयं ही भस्मासुर बने बैठे है नाहक दोष दे रहे है प्रकृति और दैवीय शक्तियों को| पोस्ट पर प्रतिक्रिया व्यक्त करने का हार्दिक धन्यवाद!

manoranjanthakur के द्वारा
July 7, 2013

आग उगलती …परते खोलती …बढ़िया पोस्ट

    chaatak के द्वारा
    July 7, 2013

    पोस्ट का अवलोकन कर विचार व्यक्त करने का हार्दिक धन्यवाद!

bhagwanbabu के द्वारा
July 6, 2013

हम सिर्फ पूजा का ढ़ोंग करते है… ईश्वर न तो किसी मूर्ति मे है न पूजा मे… लोग सिर्फ भय के मारे पूजा का ढ़ोंग करके अपने भय को भगाकर ईश्वर को वश में करना चाह्ते है उसी मे से कुछ पंडित-पुरोहित या शंकराचार्य खुद को ईश्वर बताकर लोगो को गुमराह करके अपना व्यवसाय चलाते है जिसकी वजह से प्रकृति के नियमो मे व्यवधान उत्पन्न होता है और आपदाएँ आती है … आपने बहुत अच्छा लेख लिखा है…. आज दैनिक जागरण के सम्पादकीय पृष्ठ पर भी ये लेख प्रकाशित हुआ है … आपको शुभकामनाएँ.. बधाई..

    chaatak के द्वारा
    July 6, 2013

    स्नेही भगवन बाबू, ईश्वर तो हर कण में है सर्वव्यापी, अक्षय, अविनाशी उसे समझना और परिभाषित करना मूर्खता है जिसे जहां ईश्वर दिखता है उसे वहां देखने दें, खोजने दे, सिर्फ अपने आपको सही मानकर दूसरों की मान्यताओं का मजाक उड़ाने या उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास न करें संदेह प्रकृति भी साकार है और इसके अलग अलग रूप बेहद खूबसूरत मूर्तिया ही तो हैं जिन्हें समय तराश रहा है सदियों से तराश सकें तो हम भी तराशे लेकिन उसके मार्ग में बाधा बनकर नहीं उसके साथी उसके मित्र उसके सेवक बनकर| वे पंडित पुरोहित और शंकराचार्य सचमुच ईश्वर है, हाँ हो सकता है वे हमारे और आपके लिए ईश्वर ना हों ठीक उसी तरह जैसे हमारे माता-पिता हमारे लिए ईश्वर हैं परन्तु अन्य लोगों की नजर में सिर्फ इंसान तो कुछ अन्य लोगों की नजर में बहुत ही बुरे लोग……… पोस्ट पर राय देने का हार्दिक धन्यवाद!

nishamittal के द्वारा
July 5, 2013

त्रासदी पर हार्दिक संवेदनाओं की प्रस्तुति बहुत सुन्दर ढंग से प्रस्तुत की है आपने

    chaatak के द्वारा
    July 6, 2013

    निशा जी, पोस्ट पर राय व्यक्त करने का हार्दिक धन्यवाद !

priti के द्वारा
July 5, 2013

आदरणीय चातक जी ,आपने बेहद मार्मिक ढंग से अपनी बात कही है ,जो सीधे ह्रदय को छूती है ….कम शब्दों का उत्तम आलेख …..बधाई ! मैंने भी एक आलेख पोस्ट किया है इसी विषय पर ..पढ़ कर बताएं

    chaatak के द्वारा
    July 6, 2013

    प्रीति जी, पोस्ट आपको पसंद आई ये जानकर बहुत ख़ुशी हुई शीघ्र आपकी पोस्ट पढ़कर अपनी बात रखने का प्रयत्न करूंगा| हार्दिक धन्यवाद!

sudhajaiswal के द्वारा
July 5, 2013

अब तनिक भी संदेह नहीं रह जाता कि संहारक ने देवभूमि की पटकथा में इतनी बड़ी विभीषिका का उपसंहार क्यों लिखा! अलकनंदा, भागीरथी और मंदाकिनी की लहरों में गूंजने वाला स्वर उसी संहारक का था जो हमें उसके अट्टहास सा प्रतीत हुआ परन्तु वास्तव में वो संहारक की हृदयविदारक गर्जना थी जो इन्हीं तुच्छ इंसानों के दिए जख्मों के कारण उठी थी| केदारनाथ की पूजा पर प्रश्न उठाने वालों अभी भी तुम्हे लगता है कि तुम उसकी पूजा करके कोई अहसान कर रहे हो! उस विराट स्वरुप को तुम्हारी पूजा की आवश्यकता कभी नहीं थी उसकी पूजा तुम हमेशा अपनी गरज से करते आये हो और उस पर जबरदस्ती थोपी गई पूजा के साथ-साथ तुमने उसे सिर्फ आहत ही किया है| फिर भी अपेक्षा करते हो कि संहारक गंगा को अपनी जटाओं में कैद रखकर तुम्हे विनाश से बचाएगा? या तो तुम बिलकुल बेवक़ूफ़ हो या फिर बेहद मक्कार ! आदरणीय कृष्ण जी, सादर अभिवादन, तीर्थस्थल को विकास के नाम पर पर्यटन स्थल बना दिया गया है, प्रकृति के साथ जिस क्रूरता से इन्सान पेश आया है ये उसी का परिणाम है| आस्था के नाम पर सैर-सपाटा किया जा रहा है कितने लोग मन में सच्ची आस्था रखते हैं किसी जरूरतमंद की मदद के लिए अपने आस-पास तो मदद का हाथ नहीं बढ़ाते उतनी दूर क्या ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए जाते हैं या अपनी जरूरतों के लिए मन्नत मांगने? पूर्ण सहमती है आपके विचारों से | बहुत ही विचारणीय और सार्थक पोस्ट के लिए हार्दिक बधाई| |

    chaatak के द्वारा
    July 6, 2013

    स्नेही सुधा जी, सादर अभिवादन, आपकी बात से मैं पूरी तरह से सहमत हूँ| जैसे जैसे इंसानों का तथाकथित वैज्ञानिक ज्ञान बढ़ रहा है उतनी ही तेजी से वह स्वार्थी, धृष्ट, कृतघ्न और निरा बेवक़ूफ़ भी होता जा रहा है, प्रकृति कभी अन्याय नहीं करती और शिव कभी दुःख नहीं देता| पोस्ट पर विस्तारित विचार देने का हार्दिक धन्यवाद !

jlsingh के द्वारा
July 5, 2013

उस विराट स्वरुप को तुम्हारी पूजा की आवश्यकता कभी नहीं थी उसकी पूजा तुम हमेशा अपनी गरज से करते आये हो और उस पर जबरदस्ती थोपी गई पूजा के साथ-साथ तुमने उसे सिर्फ आहत ही किया है| फिर भी अपेक्षा करते हो कि संहारक गंगा को अपनी जटाओं में कैद रखकर तुम्हे विनाश से बचाएगा? या तो तुम बिलकुल बेवक़ूफ़ हो या फिर बेहद मक्कार ! इसके अलावा और क्या कहा जाय! चातक जी, सादर अभिवादन! बेहतरीन शैली में लिखा गया आपका पोस्ट मर्मस्पर्शी है!

    chaatak के द्वारा
    July 5, 2013

    आदरणीय जे.एल. सिंह जी, सादर अभिवादन, पोस्ट पर आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया से बेहद ख़ुशी हुई, मुझे सचमुच बड़ा ही आश्चर्य होता है आस्तिकों और आस्थावानों के इस दोहरे चरित्र को देखकर ये ईश्वर के समक्ष भी अपनी ढिठाई और चतुराई छोड़ने को तैयार नहीं ! हार्दिक धन्यवाद!

    chaatak के द्वारा
    July 5, 2013

    शालिनी जी, त्वरित प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद, गतिशील होना ही जीवन और आशा को बनाए रखना है आंसू हमारे जीवन की एक सच्चाई है लेकिन ये भी सच है कि जीवन उन अश्रुओं पर ठिठक जाने के लिए नहीं जो खुद भी एक पल से ज्यादा ना आँखों में ठहरते हैं ना गालों पर|


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