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राम का न्याय

Posted On: 20 Apr, 2013 Others में

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एक थे राम बड़े ही दयालु, कर्तव्यनिष्ठ, माता-पिता की आज्ञा का पालन करने वाले और नेकदिल। बचपन से ही उनकी बुद्धि प्रखर और देह बलिष्ठ थी। अपने पिता और तीन माताओं के चार पुत्रों में सबसे बड़े होने के नाते परिवार से जुड़ी सारी जिम्मेदारियों को स्वयं संभालना बचपन से ही आदत में शुमार हो गया था। उन्हें अपने माता-पिता और भाइयों से अगाध प्रेम था। कुछ समय के पश्चात उनका विवाह एक अत्यंत गुणवान और रूपवती राजकुमारी सीता से हुआ। राम के परिवार में उनकी और उनके भाइयों की पत्नियां आयीं तो परिवार और ज्यादा संपन्न हो गया। कुछ पारिवारिक मतभेद और ईर्ष्या के कारण राम को अपनी पत्नी समेत चौदह वर्षों के लिए बनवास जाना पड़ा। ऐसे में पारिवारिक प्रेम-और स्नेह का वह बीज जो उनके कुल में था एक मजबूत दरख़्त के रूप में दिखा, लक्ष्मण ने भी राजमहल छोड़कर बड़े भाई के साथ बनवास जाने का निर्णय लिया। और इस तरह राजपरिवार के तीन सदस्य बनवासी हो गए। वन में रहते हुए उन तीनों को कभी किसी तरह के कष्ट का अनुभव नहीं हुआ क्योंकि दुनिया की सबसे आवश्यक नियामत उनके साथ थी ‘आपसी प्रेम’। और इस प्रेम को संबल था राम का जिनकी बुद्धि, बल, साहस और जीवट लक्षमण और सीता के ऊपर साए की तरह बना था। वक्त ने एक बार फिर से अपना खेल दिखाया। एक मायावी शैतान रावण उनके जीवन में आया और सीता का अपहरण कर ले गया। राम के पास ना तो सेना थी और ना ही पर्याप्त अस्त्र-शस्त्र परन्तु वे एक ऐसे राजपरिवार से ताल्लुक रखते थे कि यदि वे मदद की गुहार लगाते तो बहुतेरे राजा अपनी सेनाओं के समेत उन्हें न्याय दिलाने पहुँच जाते। राम ने विचार किया- ‘मैं तो ऐसा कर सकता हूँ लेकिन जो मेरे साथ हुआ है वह तो किसी साधारण इंसान, अधिकार-हीन और निर्धन व्यक्ति के साथ भी हो सकता है फिर वह रावन जैसे किसी ताकतवर शैतान से अपने परिवार की रक्षा कैसे करेगा?’ उन्होंने निर्णय किया कि वे इस लड़ाई को एक साधन-हीन, अधिकार-हीन, साधारण इंसान की तरह लड़ेंगे और अपने परिवार के अपनी पत्नी और अपने प्रेम के अपमान का बदला लेंगे। उन्होंने अपने राज्य से या मित्र और नातेदारों से कोई मदद ना मांगकर बंदरों और भालुओं की मदद से लंका पर चढ़ाई कर दी। चौदह दिनों में अजेय मानी जाने वाली लंका की सारी चूलें हिलने लगीं। अपनी ताकत और मायावी शक्तियों से देवताओं को थर्रा देने वाले शूरवीर मोम के पुतलों की तरह कट कर गिरने लगे। पारिवारिक प्रेम की शक्ति ने शिव द्वारा प्रदान किये गए अमृत को भी भस्म कर दिया। कहते हैं कि राम ने रावण के शरीर से दस सिर और बीस भुजाओं को काट कर अलग कर दिया था और जब उसकी असहनीय पीड़ा ने सीता के अपहरण का क़र्ज़ अदा कर दिया तो राम के अंतिम तीर ने उसके नाभि में प्रवेश कर उसकी आत्मा को भी मुक्त कर दिया।
मैं जब कभी भी विचार करता हूँ तो मुझे यही समझ में आता है कि इस दुनिया में किसी के दस सिर और बीस भुजाएं नहीं होती। राम ने अपनी पत्नी के अपमान का दंड देने के लिए जरूर रावण के सिर के दस और भुजाओं के बीस टुकड़े करके उसका वध किया होगा। राम किसी से न्याय मांगने नहीं गए और जब उन्होंने अपने परिवार की रक्षा के लिए एक पूरे साम्राज्य को वंश-विहीन किया उस समय वे ना तो अधिकार संपन्न थे और ना ही उनके पास संसाधन थे। राम यदि पूरी अयोध्या और मिथिला को साथ मिलाकर भी लंका के सामने कैंडिल मार्च करते तो अपने परिवार के विश्वास और उसके सम्मान की रक्षा न कर पाते। संभव था कि युद्ध में वे स्वयं भी मारे जाते परन्तु उस दशा में भी उन्हें ये ग्लानि तो न होती कि वे अपने परिवार की रक्षा नही कर पाए।
आज देश में हर तरफ अपहरण और बलात्कार हो रहे है लेकिन एक भी व्यक्ति साहस नहीं कर पा रहा है कि वह स्वयं उठकर अपने परिवार को न्याय दे, विश्वास दिलाये अपनी माँ, बहन, प्रेमिका, पत्नी और बेटी को कि यदि देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति भी तुम्हारी ओर हाथ बढ़ाएगा तो पहले उसके वंश का समूल विनाश करूंगा फिर अदालत अपना काम करेगी। जब परिवार को स्वयं ही अपनी महिलाओं के दर्द का अहसास नहीं होता, उनका कलेजा नहीं फटता तो फिर पडोसी क्या करेगा? क्या करेगा गाँव और क्या करेगा शहर?
बड़ी पुरानी कहावत है ‘नीबरे कै मेहरी सबकै सलहज’ किस बात के कमजोर हो कायर! तुम्हारे पास हाथ पैर नहीं हैं, दिमाग नहीं है, या कमी हो गई इस देश में औजारों और हथियारों की! बिटिया अगर जिन्दगी और मौत से जूझ रही है तो भीख मांगोगे न्याय की! किस साहस से सूरत दिखाओगे उसे कि तुम उसके बाप हो, भाई हो! अरे लाओ काट के दरिन्दे का सर और दे दो बिटिया को फ़ुटबाल खेलने के लिए। तुम्हारा जीना क्या इतना जरूरी है कि तुम्हारे परिवार की महिलायें चाहे जितना दर्द उठायें तुम अपने हाथ में हथियार नहीं लोगे। बने रहोगे रद्दी के पन्नो पर लिखे चुटकुलों के गुलाम। आज बिटिया का सवाल अपने बाप से, अपने भाई से, अपने प्रेमी से, अपने पति से है। किसी और को जवाब नहीं देना है सिर्फ ये अपने लोग जवाब दें- कितना मोह है तुम्हे अपने जीवन से, और कितना मोह है तुम्हे अपनी महिलाओं से? पिता कहता है बिटिया जान से प्यारी है, बिटिया दर्द से मर रही है और पिता पड़ोसियों की मोमबत्ती की आशा में है, लानत है! भाई राखी बंधवाता है और सौ प्रतिबन्ध लगाता है, बहन के साथ दरिंदगी हुई और भाई पड़ोसियों की मोमबत्ती की आशा में है, लानत है! प्रेमी कहता है तुम्हारे लिए चाँद-तारे तोड़ लाऊंगा, तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊंगा, प्रेयसी कोम़ा में है और प्रेमी पड़ोसियों की मोमबत्ती की आशा में है, लानत है! पति कहता है तुम्हारे साथ सात जनम का रिश्ता है, पत्नी सदमे में है और पति पड़ोसियों की मोमबत्ती की आशा में है, लानत है!

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42 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

roshni के द्वारा
May 2, 2013

शब्द नहीं इस पर कहने को .. जो कहा है सच कहा है आपने .. कुछ लिख रही हूँ ऐसा ही कविता की शकल में … सार्थक लेख चातक जी

    chaatak के द्वारा
    May 2, 2013

    पोस्ट पर aapne वैचारिक सहमति व्यक्ति की यह ख़ुशी की बात है और ज्यादा ख़ुशी होगी आपकी कविता पढ़कर| हार्दिक धन्यवाद!

rekhafbd के द्वारा
April 29, 2013

आदरनीय चातक जी ,सार्थक आलेख ,हार्दिक बधाई

    chaatak के द्वारा
    April 30, 2013

    आदरणीय रेखा जी, सादर अभिवादन, पोस्ट पर आपकी राय जानकर बहुत ख़ुशी हुई| हार्दिक धन्यवाद!

sanjvee के द्वारा
April 29, 2013

वाह चातक जी वाह.. इस लेख को तो अखबार में प्रकाशित होना चाहिए था.. ना जानें जंक्शन वालों ने इसे फीचर किया या नहीं पर यकीन मानिएं यह लेख बेस्ट ब्लॉग होने के लायक है. जो तेज और ओजपूर्ण शब्दावली आपने लेख के अंत में प्रयोग की वह गजब की है.. लेख के लय को तो सौ सलाम.. राम से लेकर आम इंसान को इतनी बारीकी से जोड़ा की एक पल के लिए मैं भी उत्साही हो उठा… इस लेख को एक बड़ा प्लेट्फॉर्म दें. इसे लोगों को बांटे, फेसबुक और ट्विटर पर डालें.. प्लीज

    chaatak के द्वारा
    April 30, 2013

    स्नेही संजीव जी, सादर अभिवादन, आपकी इस उत्साहवर्धक प्रतिक्रया के साथ जो वैचारिक समर्थन मिला है उसे मैं स्वयं बयान नहीं कर सकता, एक हार्दिक इच्छा है कि आप ही की तरह प्रत्येक भारतीय उत्साही हो और वह सत्य और संघर्ष से पीछे न हटने को प्रतिबद्ध हो| मैं जागरण का भी आभारी हूँ कि उन्होंने इस पोस्ट को फीचर करके मंच पर उपस्थित ज्यादा से ज्यादा ब्लॉगर बंधुओं तक इसे पहुंचाने में मेरा साथ दिया| हार्दिक धन्यवाद!

shashi bhushan के द्वारा
April 29, 2013

आदरणीय चातक जी, सादर ! “”एक भी व्यक्ति साहस नहीं कर पा रहा है कि वह स्वयं उठकर अपने परिवार को न्याय दे, विश्वास दिलाये अपनी माँ, बहन, प्रेमिका, पत्नी और बेटी को कि यदि देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति भी तुम्हारी ओर हाथ बढ़ाएगा तो पहले उसके वंश का समूल विनाश करूंगा फिर अदालत अपना काम करेगी। जब परिवार को स्वयं ही अपनी महिलाओं के दर्द का अहसास नहीं होता, उनका कलेजा नहीं फटता तो फिर पडोसी क्या करेगा? क्या करेगा गाँव और क्या करेगा शहर?”"”" मेरा भी यही कहना है…….. “अनाचारियों के विरुद्ध अब शस्त्र उठाना होगा ! क्रूर भेड़ियों से अपना घर स्वयं बचाना होगा !”” अहिंसा की प्रवृति और कानूनों के मकडजाल में उलझकर आज का आदमी महाकायर और भीरु हो गया है ! मान-सम्मान की परिभाषाएं और मर्यादाएं बदलती जा रही हैं ! इस कापुरुषता का अंत कहाँ होगा………. यह भविष्य के गर्भ में है ! एक अच्छी रचना ! सादर !

    chaatak के द्वारा
    April 30, 2013

    आदरणीय शशिभूषन जी, सादर अभिवादन, पोस्ट के बारे में आपकी राय जानकर अत्याधिक प्रसन्नता हुई, आशा करता हूँ कि देश देर हो जाने से पहले कायरता पर काबू पा लेगा| वैसे अहिंसा की बात करने वाले ये भूल जाते हैं कि अहिंसा के पुजारी गांधी जी न स्वयं कहा है कि कायर की अहिंसा, अहिंसा नहीं है| पोस्ट पर प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

dhananjaynautiyal के द्वारा
April 28, 2013

आपका विचार सही है चातक जी

    chaatak के द्वारा
    April 28, 2013

    स्नेही धनञ्जय जी, सादर अभिवादन, वैचारिक सहमति के लिए हार्दिक धन्यवाद!

Ravinder kumar के द्वारा
April 27, 2013

चातक जी, सादर नमस्कार. मैंने आपके लेख को बार-बार पढ़ा. आज जिस प्रकार का वातावरण देश में बना है, उसमे ऐसी तेजस्वी प्रतिक्रिया होनी ही चाहिए. मैं आपके विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ. लेकिन एक प्रश्न उठता है के क्या ये संभव है ? आपने रामायण का उदाहरण दिया, लेकिन कोई ये मान सकता है के राम संसाधन हीन थे ? राम विष्णु के अवतार थे, उनके भाई लक्षमण शेष नाग के अवतार थे. राम के पास विश्वामित्र द्वारा दिए गये तेजस्वी और भयंकर अस्त्र थे. राम के साथ हनुमान और सुग्रीव जैसे न जाने कितने ही योद्धा थे. तो एक गरीब, दिन भर मजदूरी करने वाले व्यक्ति की तुलना आप राम के तेज से कैसे कर सके हैं ? जो लोग संपन है. जिनके पास बल, बुद्धि और धन की ताकत है उनके साथ रेप जैसी घटनाएँ नहीं होती (एकाध को छोड़ कर) और वहां जैसा आप चाहते हैं वैसी प्रतिक्रिया भी होती है. एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास ना जाति का गौरव है, जिसके पास ना धन की लाठी है, जिसको पेट भरने से ही फुर्सत नहीं, ऐसा आदमी बदले के बारे में कैसे सोच सकता है ? अगर उसको ऐसा करना पड़े तो शासन प्रशासन किस काम के ? अगर ये काम नहीं करते तो बंद करना चाहिए इन दुकानों को. इसका भार हम अकेले पीड़ित पर नहीं डाल सकते. हम ये नहीं कर सकते के हम तो बेड पर पसर कर टीवी पर चटपटे समाचारों का आनद लेते रहें और पीड़ित अकेला अपनी लड़ाई लड़ता रहे. रेप एक सामाजिक अपराध है. इसके लिए दंड भी समाज को निर्धारित करना चाहिए . अकेले पीड़ित के सम्बन्धी बदला लें, ऐसा करना उनके प्रति एक और अपराध होगा. नमस्ते जी.

    chaatak के द्वारा
    April 28, 2013

    स्नेही रविन्द्र जी, सादर अभिवादन, आपकी बात काफी हद तक सही है मैंने इस बात को और ज्यादा स्पष्ट करना चाहूँगा कि हमारे देश में दो तरह के परिवार हैं एक तो मध्यमवर्गीय और वे कथित संपन्न लोग जो रद्दी के पन्नो (संविधान) पर लिखे चुटकुलों (संविधान द्वारा दिए गए आश्वासन) के गुलाम बन चुके हैं (दामिनी जैसी बेटियों का परिवार और उनके माडर्न प्रेमी) और दूसरे वे गरीब जिनके पास न खाने को पर्याप्त भोजन है न सर पे ढंग की छत और है भी तो परिश्रम से कमर टूट रही है, यानी सुरक्षा के नाम पर दोनों के पास कुछ नहीं| लेकिन ये बात उतनी ही गलत है जितनी ये कि हम राम और कृष्ण को अवतार मान कर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेते हैं| मैंने आज तक नहीं देखा ना सुना कि कोई ईश्वर किसी निरीह और कायर कि मदद को आया हो| ईश्वर है ये एक हकीकत है लेकिन उसे कायरता पसंद नहीं ये उससे बड़ी सच्चाई है गरीबी, संसाधन-हीनता, जिम्मेदारी, दुनियादारी ये सब अपनी कायरता पर डाले गए परदे हैं सही तो ये है कि आज हमारे दिल में किसी के लिए प्यार ही नहीं है तो जब सबसे बड़ी ताकत हमारे पास है ही नहीं तो हम कुछ करेंगे भी कैसे| आपकी इस विस्तारित प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

Rachna Varma के द्वारा
April 26, 2013

चातक जी मैंने बहुत दिनों के बाद आपको पढ़ा दरअसल भगवान राम के बारे में लिखा था तो थोड़ी उत्सुकता बढ़ी यह माना जाता है कि राम तो स्वयं भगवान् विष्णु के अवतार थे साधारण मानव के रूप में उनके अवतार का कारण भी यही था कि एक मानव बुराइयों तथा जीवन की कठिनाइयों का सामना भी अगर चाहे तो किस तरह से धैर्य पूर्वक और हर वर्ग ,हर प्राणी को साथ ले कर कर सकता है वह तो मर्यादा पुरुषोत्तम थे मगर आज का मानव तो जितना दिन -हीन हो चुका है की उसके अंदर का स्वाभिमान , अहं तथा मानवी प्रवृत्तियां सब कुछ खत्म हो रही है वह अपनी जड़ो तथा संस्कृतियों से कट रहा है ऐसे में उससे भला क्या उम्मीद की जा सकती है |

    chaatak के द्वारा
    April 26, 2013

    रचना जी, सादर अभिवादन, पोस्ट में रखे गए विचारों पर आपकी राय जानकर हर्ष हुआ| आपकी राय से सहमत होते हुए एक बात मैं और जोड़ना चाहूँगा इस देश में अंग्रेज जिस स्वाभिमान को कुचल नहीं पाए थे वो काम स्वतंत्र भारत में कांग्रेस ने कर दिखाया जिस तरह भीख में बटोरे गए चुटकुलों को इकट्ठा करके हमारे ऊपर थोप गया और जिस ग्तारह अपनी संस्कृति और सभ्यता को ताक पे रखकर हमें इस सड़ी-गली चीज के प्रति निष्ठावान बनाने की कवायद ६० वर्षों तक की गई अब बहुतों के खून में दौड़ना शुरू कर चुकी है और उसी का परिणाम है आज का दीन-हीन इंसान ये सफ़ेद पानी खौले भी तो कैसे? कितना भी ताप दो ये सिर्फ बुजबुजाता है ज्वालामुखी की तरह फटता नहीं है|

alkargupta1 के द्वारा
April 26, 2013

चातक जी , आज के समाज की परिस्थितियों का समयानुसार यथार्थ चित्रण किया है …..अब तो यही समय आ गया है कि किसी बेटी ,बहन ,पत्नी , या फिर किसी अन्य महिला के साथ ऐसे दुष्कर्म युक्त घटनाएँ घटित होती हैं तो इस पंगु सरकार से न्याय की भीख न माँगते हुए इन्हीं के पारिवारिक सदस्यों पुरुष और महिलाओं द्वारा कठोरतम दंड देकर दुष्कर्मियों को न्याय दे देना चाहिए और अब आगे आने वाले समय में यही होने वाला है ……..आप-के साथ मेरी पूर्ण सहमतिहै … साभार

    chaatak के द्वारा
    April 26, 2013

    आदरणीय अलका जी, सादर अभिवादन, पोस्ट में व्यक्त किये गए विचारों से आपकी सहमति दर्शाती है कि हमारी स्त्रियाँ पुरुषों से सिर्फ पुरुषोचित आचरण का की अपेक्षा रखती हैं और कायरों को तरह कोमल दंड की बात को अस्वीकार करती हैं, लगता है ये बात सत्ता में बैठे शिखंडी-पुत्रों को समझ में नहीं आती है| सहमति और विचार-अभिव्यक्ति का हार्दिक धन्यवाद!

seemakanwal के द्वारा
April 25, 2013

बहुत ही सार्थक और ओजपूर्ण लेख . साभार .

    chaatak के द्वारा
    April 26, 2013

    पोस्ट पर प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

priti के द्वारा
April 25, 2013

वाह!एकदम बेबाक,दोटूक बात. …..पूर्ण समर्थन.

    chaatak के द्वारा
    April 26, 2013

    हार्दिक धयवाद प्रीती जी,

Manisha Singh Raghav के द्वारा
April 25, 2013

चेतक जी , आपने लिखा है कि अच्छी व योग्य सरकार लायें । पर आजकल तो हर नेता ने जनता का भरोसा तोड़ कर रख दिया है और जनता की हालत उस भैंस के जैसी हो गयी है जिसके आगे कितना भी बीन बजालो कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला

    chaatak के द्वारा
    April 26, 2013

    पूर्ण सहमति, और इसका कारण है शिक्षा की दुर्दशा जो शिक्षा के साथ हो रही राजनीति का परिणाम है| हार्दिक धन्यवाद!

Manisha Singh Raghav के द्वारा
April 25, 2013

चेतक जी , आपका लेख” राम का न्याय ” पढ़ा । आपने बिल्कुल सही कहा है हम सरकार से या किसी से उम्मीद ही क्यूँ रखते हैं ? क्योंकि हम कायर हैं और सच्चाई भी यही है । एक बात मुझे आज तक समझ में नहीं आयी क्या आपने गौर क्या है कि जिस बच्ची के साथ दुष्कर्म होता है उसके माता पिता मुख्य मंत्री से मिलने की जिद में अनशन क्यों करते हैं ? क्या मिलेगा नेता लोगों से मिलकर क्या पैसे या सहानुभूति , क्या चाहिए उन्हें ? और क्यों , क्या वे नहीं जानते कि आजकल नेताओं में इंसानियत नाम की कोई चीज नहीं रही । इसका जबाब अगर आपके पास हो तो मुझे जरुर दीजियेगा । कभी हमारे ब्लॉग पर भी आइयेगा ।

    chaatak के द्वारा
    April 26, 2013

    मनीष जी, सादर अभिवादन, पोस्ट पर आपके विचार जानकर अतीव प्रसन्नता हुई | कायरता को बिलकुल सही पहचाना आपने| आपकी राय से सहमत हूँ, मैं ये तो नहीं कह सकता कि sabhi लोग मेरी राय से इत्तेफाक रखेंगे लेकिन ऐसे माता-पिता के बारे में मेरे पास कुछ ठोस जवाब जरूर हैं आगामी पोस्ट में मैं उन विचारों को समाहित करने का प्रयत्न करूंगा| आपके ब्लॉग पर अति-शीघ्र उपस्थिति दर्ज करने की कोशिश करूंगा| हार्दिक धन्यवाद!

yamunapathak के द्वारा
April 23, 2013

चातक jee बहुत ही प्रासंगिक बात स्पष्टता से कही गई साभार

    chaatak के द्वारा
    April 24, 2013

    यमुना जी, सादर अभिवादन, पोस्ट पर आपकी राय जानकर बेहद ख़ुशी हुई| हार्दिक धन्यवाद!

yogi sarswat के द्वारा
April 22, 2013

आज देश में हर तरफ अपहरण और बलात्कार हो रहे है लेकिन एक भी व्यक्ति साहस नहीं कर पा रहा है कि वह स्वयं उठकर अपने परिवार को न्याय दे, विश्वास दिलाये अपनी माँ, बहन, प्रेमिका, पत्नी और बेटी को कि यदि देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति भी तुम्हारी ओर हाथ बढ़ाएगा तो पहले उसके वंश का समूल विनाश करूंगा फिर अदालत अपना काम करेगी। जब परिवार को स्वयं ही अपनी महिलाओं के दर्द का अहसास नहीं होता, उनका कलेजा नहीं फटता तो फिर पडोसी क्या करेगा? क्या करेगा गाँव और क्या करेगा शहर? यही तो हो रहा है हर जगह ! हम इस उम्मीद में बैठे हैं की कोई कृष्णा आएगा जो कभी गोवेर्धन पर्वत उठाएगा हमारी रक्षा के लिए और कभी द्रोपदी को बचाने आएगा ! हमने औरों से अपनी रक्षा की उम्मीद पाले राखी है ! लेकिन शायद काली रात जाए , उजियारा भी होगा चातक साब और मैं कहता हूँ जरुर होगा !

    chaatak के द्वारा
    April 22, 2013

    स्नेही योगी जी, सादर अभिवादन, मुझे भी पूरा यकीन हैं कि अँधेरा खत्म होगा और उजाला फिर से आयगा और इसे लाने के लिए किसी भगवान् की आवश्यकता नहीं होगी सिर्फ इंसान के जमीर की जागृति ही काफी होगी| कुछ ख़ास नहीं करना है- मोमबत्ती को छोड़कर हाथ में पत्थर उठाना है| पोस्ट पर बहुमूल्य प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

sudhajaiswal के द्वारा
April 22, 2013

आदरणीय कृष्ण जी, सादर अभिवादन, जैसे विचार रखेंगे वैसे ही बन जायेंगे अगर अपने आप को निर्बल मानेंगे तो निर्बल हो जायेंगे और यदि समर्थ मानेंगे तो समर्थ बन जायेंगे | उस समय रामराज्य में एक ही रावण था आज रावणराज्य है अनेकों रावण हैं और राम कितने हैं?

    chaatak के द्वारा
    April 22, 2013

    स्नेही सुधा जी, सादर अभिवादन, आपकी बात सौ प्रतिशत सही है लोगों के मन में दहशत है, लाचार और बेबस दिखना इस वक्त का फैशन है| हमदर्दी पाने का नशा अफीम के नशे से ज्यादा खराब है और आज लोगों को लत पड़ गई है इसकी| मुझे विश्वास है कि आज भी राम की संख्या रावण से ज्यादा है और जिनके दिल में राम हैं उनकी महिलायें आज भी सुरक्षति हैं मैंने अभी सुना कि (शायद) राजस्थान में कोई ऐसी ही घटना हुई हैं और बच्ची के परिवार वालों ने एक बलात्कारी के पहले नाक और कान काट दिए और फिर न्याय की पूरी जिम्मेदारी उठाते हुए उसकी गंदी आत्मा को उसके जिस्म से बलपूर्वक खींच कर बाहर निकाल लिए और फिर फेंक दिया रास्ते पर| न्याय हो गया !

    sudhajaiswal के द्वारा
    April 23, 2013

    आदरणीय कृष्ण जी, सादर अभिवादन, मेरे विचार से लाचार या बेबस दिखने जैसा कोई फैशन नहीं है ना ही हमदर्दी पाने जैसा कोई नशा या लत | यही विश्वास मेरा भी है कि आज भी राम कि संख्या रावण से ज्यादा है और ऐसे सारे लोग जिनके दिल में राम हैं अपने परिवार के साथ न्याय करते हैं, एक उदाहरण आपने ही बताया | किसी भी पीड़िता का परिवार किसी पड़ोसी के मोमबत्ती की आशा में नहीं रहता न्याय और हमदर्दी की भीख नहीं मांगता विरले अगर ऐसा कोई है तो वो रावण से भी बदतर है | किसी भी पीड़िता के परिवार का हर सदस्य असहनीय पीड़ा महसूस करता है उनके मन की हालत विक्षिप्त सी होती है और ऐसे में हर संवेदनशील इन्सान स्वयं उनसे हमदर्दी से रखता है, कोई नाता न हो तब भी इंसानियत के नाते उनको न्याय दिलाने एवं राहत पहुँचाने का प्रयास करता है | आज रावणराज्य है इसलिए कहा क्योंकि हमारे देश की शासन-व्यवस्था राम जैसे इन्सान के हाथों में नहीं है |

    chaatak के द्वारा
    April 24, 2013

    स्नेही सुधा जी, सहमत हूँ आपकी बात से और यही कारण है कि मैं कहता हूँ दूसरों के लिए हमदर्दी दिखाने के लिए मोमबत्ती न जलाएं बल्कि रावण को हटाने के लिए अच्छी सरकार चुने| लाचारी पर दया दिखाने से लाचारी ख़त्म नहीं होगी, लाचार बानाने वाले कारणों को हटाने में युवा आगे आयें न्याय दे सकने योग्य सरकार लाने के लिए लोग आगे आयें ना कि बेदम और भ्रष्ट लोगों की सरकार बनाकर फिर उनके आगे न्याय की भीख मांगें| प्रतिक्रिया द्वारा वार्ता को एक दिशा प्रधान करने का हार्दिक धन्यवाद!

    sudhajaiswal के द्वारा
    April 25, 2013

    जग में सुन्दर है दो नाम चाहे कृष्ण कहो या राम, शतक पूरा होने पर हार्दिक बधाई!

    chaatak के द्वारा
    April 26, 2013

    Thanks a lot Sudha ji, मेरा तो ध्यान ही नहीं गया, यानि अब हम भी शतकवीर हो ही गए! :)

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
April 22, 2013

स्नेही चातक जी सादर ऐसा क्यों नही हो सकता हो सकता है. अगर खून सफ़ेद न हुआ हो तो. बधाई

    chaatak के द्वारा
    April 22, 2013

    आदरणीय कुशवाहा जी, सादर अभिवादन, मैं आश्चर्य इसी बात पर व्यक्त कर रहा हूँ कि इन्सान का खून सफ़ेद कैसे हो गया है| क्या अपनी जिम्मेदारी दूसरों पर थोपने से कभी किसी समस्या का हल निकला है जो आज निकलेगा? पोस्ट पर विचार देने का हार्दिक धन्यवाद!

jlsingh के द्वारा
April 21, 2013

स्नेही चातक जी, रामायण की इतनी अच्छी व्याख्या मैंने कभी न सोची थी न सुनी थी. एक बार पुन: आपका आभार! इसीलिये राम मर्यादा पुरुषोत्तम तो थे ही, आज भी हम सबके आदर्श हैं!

    chaatak के द्वारा
    April 21, 2013

    आदरणीय जे. एल. सिंह जी, सादर अभिवादन, हमारे महाकाव्यों और शास्त्रों में हर एक समस्या का उदाहरण सहित समाधान लिखा हुआ है और वह कालजयी है जब भी हम उन्हें छोड़कर रद्दी कागज़ पर लिखे चुटकुलों के प्रति निष्ठा दिखाएँगे तब तब हमारे हाथ में मोमबत्ती होगी और हमारे अपनों के हिस्से में सिर्फ दर्द और आंसू, स्वामी दयानंद सरस्वती बेवक़ूफ़ नहीं थे जब उन्होंने कहा था ‘वेदों की और लौटो’ हमें अपनी जड़ों की और लौटना होगा अन्यथा हमारे हाथ जिल्लत की जिन्दगी और अपमानजनक मौत के सिवा कुछ नहीं होगा|

jlsingh के द्वारा
April 21, 2013

स्नेही चातक जी, सादर अभिवादन! जबतक ऐसा नही होगा, अनाचार नहीं रुकेगा! हम थोड़ी सी संपत्ति के लिए अपने भाई, यहाँ तक कि अपने माता-पिता का भी खून बहाने से नहीं चूकते. पर अपनी, बहु, बेटी, बहन की इज्जत के लिए इंतज़ार करते हैं, किसी पड़ोसी का, अंधे कानून का और बहरी सरकार का…. हम अपना कमाया खाते हैं, पहनते हैं, फिर इज्जत के लिए क्यों किसी के ऊपर मोहताज रहते हैं…

    chaatak के द्वारा
    April 21, 2013

    आदरणीय जे.एल. सिंह जी, सादर अभिवादन, आपकी राय से शत-प्रतिशत सहमत हूँ, ‘हम अपना कमाया खाते हैं, पहनते हैं, फिर इज्जत के लिए क्यों किसी के ऊपर मोहताज रहते हैं’ हमारी संस्कृति हमें कायर होना नहीं सिखाती हमें स्वयं साहस करना होगा तभी हम कुछ कर पायेंगे| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्याद!

bhagwanbabu के द्वारा
April 20, 2013

क्या बात है चातक जी.. बड़े ही आसान लफ्ज़ो मे पूरी रामायण कह डाली … साथ ही साथ इसे तत्कालीन समाज मे होने वाली घटनाओ से समानता दिखाकर इसे हल करने के लिए एक राह दिखाने का प्रयास बहुत ही सराहनीय रहा…. बहुत सुन्दर लेख… बधाई.. http://bhagwanbabu.jagranjunction.com/2013/04/20/%E0%A4%B8%E0%A5%87%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B8-%E0%A4%95%E0%A5%80-%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%96-%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8B-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%AD/

    chaatak के द्वारा
    April 21, 2013

    स्नेही भगवन बाबू, सादर अभिवादन, इंसान ने स्वयं को इतना जटिल बना लिया है कि सीधा, उचित और सही रास्ता उसे पसंद ही नहीं आता है| इंसान के सामने शैतानी दुष्प्रवृत्तियाँ हमेशा चुनौती बनती रही हैं और हर बार उसका समाधान एक ही रहा है स्वयं उनका सामना करना| राम के लिए ये कार्य मुश्किल था क्योंकि उनके समक्ष आई हुई चुनौती अपूर्व थी फिर भी उन्होंने अपनी आत्मा के न्याय का अनुसरण किया और मिसाल कायम की| हमारे सामने उनके जैसी दुष्कर स्थिति नहीं है बल्कि उनके द्वारा किया गया साहसिक कृत्य हमारा पथ-प्रदर्शक है फिर हम हर मोर्चे पर सिर्फ मोमबत्ती क्यों जलाते हैं? आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रया का हार्दिक धन्यवाद!


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