चातक

आओ खोजें हिंदुस्तान

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फिर सफल रहे आतंकी

Posted On: 13 Feb, 2013 Others में

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अजमल आमिर कसाब और अफज़ल गुरु दो ऐसे नाम हैं जिन पर लम्बे समय तक राजनीति हुई और अंततः वह हुआ जो वास्तव में बहुत पहले होना चाहिए था। फांसी चाहे कसाब को हुई या फिर अफज़ल को, राजनेताओं से लेकर मीडिया तक ने इसकी तारीफ़ की। नेताओ ने न्यायाधीशों द्वारा किये गए कार्य का राजनीतिक फायदा उठाने में कसर नहीं छोड़ी तो मीडिया ने ये बताने में कि जब गुनाह हुआ तो भी सबसे पहले हमने बताया और जब फांसी हुई तो भी हमने ही खबर फैलाई। और इस तरह एक वर्ग ने ‘वोट’ खोजने की मानसिकता की हद कर दी तो दूसरे ने ‘नोट’। जनता तो मजबूर है ताली बजाने और ‘वाह-वाह क्या बात है’ कहने के लिए। हद तो तब हो गई जब अफजल की फांसी के समर्थन और विरोध प्रदर्शन भी शुरू हो गए। आतंकियों की कार्यवाही और देश की लचर सुरक्षा व्यवस्था का प्रश्न जो सारे घटनाक्रम के केंद्र में था किसी ने ना उठाया और न ‘इन दोनों लाइलाज बीमारियों का इलाज कैसे होगा?’ पर कोई चर्चा हुई। इस सारी कसरत का एक और पक्ष है ‘आम-हिन्दुस्तानी’ जिसकी हालत और हालात दोनों दयनीय हैं ये वही आम हिन्दुस्तानी है जो किसी भी आतंकी कार्यवाही में या तो सीधा निशाना बनता है या फिर (माननीयों की सुरक्षा में) परोक्ष रूप से। इसके बारे में सोचने की न तो जहमत उठाई गई और न आवाज। मुझे आश्चर्य होता है इस बात पर कि आतंकियों को फांसी पर लटकाने के पीछे जो मुख्य सोच होनी चाहिए वह ये कि हर हिन्दुस्तानी इस बात का अहसास करे कि वह इस देश में आतंकित नहीं बल्कि सुरक्षित है। लेकिन इन दोनों फांसियों के बाद जो स्थितियां उत्पन्न हुई या मैं ये कहूं कि जानबूझ कर सरकार और प्रशासन ने उत्पन्न की गईं उससे आतंकियों का उद्देश्य पूरा हुआ और उनका आतंक, उनकी खौफ की ताकत और ज्यादा गहराई से हिन्दुस्तानियों के दिल में बैठ गई है। सरकार और प्रशासन को इस बात का तनिक भी अहसास है तो दोनों को सार्वजनिक रूप से अपनी इस असफलता के लिए हिन्दुस्तान की आवाम से क्षमा मांगनी चाहिए।
जिस तरह से गुपचुप किसी गोपनीय साजिश की तरह दोनों आतंकियों को फांसी दी गई है वह देश के लिए अपमानजनक है और देश के नागरिकों में आपसी द्वेष फैलाने की सोची समझी राजनीतिक साजिश भी।
किसी आतंकी को फांसी देने में गोपनीयता बरतने के पीछे यदि ये सोच है कि पाकिस्तान जैसे आतंकी देश हमारे देश में कुछ उत्पात कर सकते हैं तो फिर ये अपमानजनक है कि हमारा देश एक दो कौड़ी के देश से भयभीत है। और यदि आतंरिक सुरक्षा का खतरा है तो ये विशुद्ध रूप से देश में विद्वेष फैलाने की राजनीतिक साजिश है जिसके तहत हर मुसलमान पर बिना कहे उंगली उठाई जा रही है कि वे सारे आतंकियों के समर्थक हैं।
आज जबकि शिंदे से लेकर दिग्विजय (कृपया दिग्विजय ही पढ़ें) तक सारे हिन्दू बहुसंख्यको को भगवा आतंकी कहकर ये सिद्ध करते हैं कि ‘हम किसी से नहीं डरते’, ‘देखो हम किस ढिठाई से साथ इन्हें गालियाँ देते है।’ ऐसे में अल्पसंख्यक मुसलमानों के बारे में बोलने में इनका साहस कहाँ चला जाता है? कुछ अतिउत्साही हिन्दू और मुसलमान दोनों इन नेताओं के इस आचरण को ‘मुसलमानों का हिन्दुस्तान में बोलबाला’ या ‘संगठित’ होना समझते हैं लेकिन सच्चाई ये नहीं है। सच्चाई ये है कि ऐसा करने से दो हित अपने आप सिद्ध हो जाते है-
(१) हिन्दुओं के मन में मुसलमानों ले लिए एक नफरत पैदा होती है और आम तौर पर उनके मन में ‘मुसलमान देश का गद्दार है’ जैसी बात एक सर्वमान्य तथ्य की तरह बैठ जाती है। और साथ में बैठ जाता है एक आतंक जो ना सिर्फ सीमा पार से आने वाले आताकियों से है बल्कि पड़ोस में रहने वाले हिन्दुस्तानी मुसलमान से भी, कि वह या तो आतंकी है या फिर आतंकियों का वह हिमायती जिसके कारण हिन्दुस्तान में कसाब और अफज़ल जैसे आतंकियों को गुप-चुप फांसी देनी पड़ती है।
(२) मुसलमानों के बीच ‘स्वयं को अलग रखकर ही मजबूत रहेंगे’ जैसी मान्यता पनपने लगती है और उनमे एक ऐसा तबका जन्म ले लेता है जो अकबरूदीन ओबैसी जैसी हरकते करके स्वयं को मुसलमानों का मसीहा सिद्ध करने की कोशिश करता है और सिर्फ वोट बैंक बनकर रह जाता है।
अफजल गुरु को गुपचुप फांसी देने और तिहाड़ में चुपके से दफ़न कर देने के बाद कश्मीर से लेकर काशी तक जिस तह के हाई-अलर्ट घोषित हुए और कर्फ्यू घोषित हुए वह कांग्रेस की साम्प्रदायिक वैमस्य की खाई को गहरा करने की एक ऐसी सफल साजिश है जिसे अब पूरा हिन्दुस्तान मिलकर दशकों तक नहीं पाट पायेंगे।

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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

atharvavedamanoj के द्वारा
February 16, 2013

प्रिय मित्र चातक जी… सादर वंदे मातरम यदि आज के परिप्रेक्ष्य में एक लचर बनाम एक मजबूत देश की बात की जाय तो हिंदुस्तान कहीं से भी मजबूत नहीं नजर आता…सत्तारूढ़ दल ने घोटालों का शतक बनाया है..प्रमुख विपक्षी दल विचारधारा के नाम पर शून्य हो चुकी है और अन्य भी लूट खसोट में लगे हुए हैं..जितना तुष्टिकरण वर्तमान में किया जा रहा है वह अपने सारे विगत कीर्तिमानों को ध्वस्त कर चुका है..भारत और भारतीयता की बात किये जाने पर …उल्टा चोर कोतवाल को डांटे जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है..आपका लेख सत्य को स्थापित करने का एक सार्थक प्रयास है..बधाई हो

    chaatak के द्वारा
    February 16, 2013

    स्नेही मित्र मयंक जी, सादर अभिवादन, देश आज इतने टुकड़ों में बनता है कि हर गली एक हिन्दुस्तान तो एक पाकिस्तान बन चुकी है (मैं नहीं कहता सरकारी दस्तावेज़, बिजली और टेलीफोन बिल कह रहे है) और नेताओं को सिर्फ सत्ता सूझ रही है, अन्ना का आन्दोलन केजरीवाल खा गए और बाबा रामदेव को कांग्रेस का छोड़ा सी.बी.आई. नाम का जिन्न| परिणाम ये हुआ कि ओबैसी फिर मुक्त है और पूरी कांग्रेस अब्दुल्ला की दाढी सहलाने में ही अपनी भलाई समझ रही है| लगता है जो काम अंग्रेज नहीं कर पाए थे वो कांग्रेस अब पूरा करेगी वो भी विपक्ष के सहयोग से! वन्देमातरम !

आर.एन. शाही के द्वारा
February 16, 2013

सराहनीय विश्लेषण चातक जी । देश में जबतक आतंकवाद और उग्रवाद को दो आँख से देखे जाने की परिपाटी ज़ारी रहेगी, सम्भवत: आपके कथन का अभिप्राय भी तबतक जीवित रहेगा । चरमपंथ बिना किसी भेद-भाव के निन्दनीय है और पूरी ताक़त से कुचल दिये जाने के योग्य । अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद हो, या फ़िर हमारे मुल्क़ में कश्मीर और खालिस्तान का अलगाववादी आतंकवाद, चाहे माओवादी उग्रवाद । प्रकारान्तर से सभी सभ्य समाज और मानवता के दुश्मन हैं । अमेरिका दूसरे देश में घुसकर अपने दुश्मन को उसकी मांद में ज़मींदोज़ कर सराहना का यदि पात्र बनता है, तो इसका श्रेय उसकी आंतरिक एकजुटता और राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर कोई समझौता न करने की नीतियों को जाता है । जबकि हमारे यहाँ गम्भीर से गम्भीर प्रकरण को भी राजनीतिक फ़ायदे-घाटे के दृष्टिकोण से तौलने की रीति बन चुकी है । यह दोगलापन और राष्ट्रवादी सिद्धांतों के बिल्कुल उलट है । हमारी संसद का हमलावर चाहे देशी हो या विदेशी, हमारी अ-स्मिता पर चोट पहुँचाने वाला आततायी है, और त्वरित कार्रवाई के तहत मार गिराए जाने के योग्य है । किसी भी ढुलमुलपने के कारण यदि न्यायिक कार्रवाई में विलम्ब होता है, तो चर्चाओं और बहस का वातावरण बनने में मदद मिलेगी ही । कसाब जैसे विदेशी दरिन्दों को भी हमें दुनिया से छुपा कर यदि फ़ाँसी देनी पड़ती है, तो यह हमारी भीरुता और साफ़्टनेस ही है । धन्यवाद !

    chaatak के द्वारा
    February 16, 2013

    आदरणीय शाही जी, सादर अभिवादन, हमारा देश बहुत सारे संकटों से गुजरा और ना जाने कितनी बाधाओं ने इसकी परीक्षा ली लेकिन अब जिस प्रकार एक संगठित साजिश को लोकतंत्र का मुखौटा लगाकर थोपा जा रहा है इससे पार निकलना हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है| हमें लड़ना है और वो भी निहत्थे, वोट और चुनावों रुपी रस्सी में हमारे हाथ पैर तक जकड दिए गए है और द्रोहियों को हर तरह की ताकत और हथियार पकडाए जा रहे है इससे वीभत्स और क्या होगा| पोस्ट पर विस्तारित राय प्रकट करने का हार्दिक धन्यवाद!

alkargupta1 के द्वारा
February 15, 2013

चातक जी, अर्थपूर्ण आलेख…. सरकार पंगु और नेता भ्रष्ट हो चुके हैं……

    chaatak के द्वारा
    February 16, 2013

    आदरणीय अलका जी, आपकी राय से पूरी तरह सहमत हूँ| काश कि हमें कोई विकल्प मिल पाता|

vasudev tripathi के द्वारा
February 15, 2013

आस्तीन के साँप जब तक इस देश में खुले आम फन फैलाकर फुंफकारेंगे तब तक आतंकी निःसन्देह जीतते रहेंगे…. सटीक लेख॥

    chaatak के द्वारा
    February 16, 2013

    स्नेही वासुदेव त्रिपाठी जी, सादर अभिवादन, इन आस्तीन के साँपों से फिलहाल तो प्रशासन भयभीत और शासन मंत्रमुग्ध नज़र आ रहा है| आशा करता हूँ कि इस देश के एक और विभाजन से पहले क़यामत आयेगी! हार्दिक धन्यवाद!

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 15, 2013

आदरणीय चातक जी, सादर सार्थक लेख बधाई

    chaatak के द्वारा
    February 15, 2013

    आदरणीय कुशवाहा जी, सादर अभिवादन, पोस्ट पर आपकी सकारात्मक राय जानकर अच्छा लगा| हार्दिक धन्यवाद!

shashi bhushan के द्वारा
February 13, 2013

आदरणीय चातक जी, सादर ! “”किसी आतंकी को फांसी देने में गोपनीयता बरतने के पीछे यदि ये सोच है कि पाकिस्तान जैसे आतंकी देश हमारे देश में कुछ उत्पात कर सकते हैं तो फिर ये अपमानजनक है कि हमारा देश एक दो कौड़ी के देश से भयभीत है।”" इस भ्रष्ट और नपुंसक सरकार से हम और उम्मीद भी क्या कर सकते हैं ? चूहे की तरह बिल में बैठे ये अपनी ही देश की जड़ों को कुतर रहे हैं !

    nishamittal के द्वारा
    February 14, 2013

    शशि भूषण जी से सहमत हूँ चातक जी.विचारपूर्ण लेख

    chaatak के द्वारा
    February 14, 2013

    आदरणीय शशिभूषण जी, निशा जी, सादर अभिवादन, आप दोनों की राय से पूरी तरह सहमत हूँ और चाहता हूँ अब अमूल चूल परिवर्तन हो जाए| अब भरने को आहें भी कम पड़ने लगी हैं!


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