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कैसे-कैसे वैलेंटाइन!

Posted On: 9 Feb, 2013 Others में

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बात नई नहीं तो बहुत पुरानी भी नहीं है। मुझे अच्छी तरह से याद है किशोरावस्था की शुरुआत के साथ ही साहित्य, राजनीति और समाज की परख भी जवान होने लगी थी। ये वो वक्त था जब आँखों को श्वेत-श्याम टी.वी. पर भी बहुत कुछ रंगीन दिखने लगा था। लेकिन भला हो हमारे उन अध्यापकों का जो पूरे मनोयोग से हमें साहित्य, समाज और राजनीति की बारीकियां व्याख्यानों के दौरान प्रदान करते रहते थे, और महती कृपा थी हमारे अनपढ़ माता-पिता की जिन्होंने कालेज से छुट्टी लेने और किसी भी तरह की सिफारिश करने पर प्रश्न उठाने तक पर तानाशाही रोक लगा रखी थी। फिर भी वैलेंटाइन डे की खुशबू कहीं न कहीं दिल तक पहुँच ही जाती थी। दोस्तों की जुगाडू मशक्कत और उनकी सखियों की विद्रोही हिमाकत हंसने और मुस्कुराने के अवसर उपलब्ध कराती रहती थी। लेकिन इन सभी क्रियाकलापों के बीच जब मित्र-मंडली परिचर्चा में होती थी और सखियों और सखाओं के प्रेम का मूल्यांकन शुरू होता था तब बातचीत ख़ासा दिलचस्प और ज्ञानवर्धक हो जाती थी। ऐसे मौकों पर मैं अक्सर उस समाज का एक जरूरी आलोचक बन जाया करता था और मुझे जिम्मेदारी मिलती थी मित्रों के प्रेम संबंधों के भविष्य पर राय रखने की। ऐसा नहीं था कि मैं लव-गुरू था बल्कि मित्रों को मेरे तर्कों के बीच कहीं थोड़ी हकीकत और थोडा फ़साना मिलता था जो शायद उन्हें अच्छा होने पर मुझपर हंसने का मौका देता था और बुरा होने पर पहले से कुछ संकेत देता था।
यहाँ पर मैं सारे तो नहीं लेकिन एक दोस्त (जो मेरे सबसे करीब था और है) के साथ हुए अनुभवों को इस मंच पर उपस्थित मित्रों से साझा करना चाहूँगा।
इस प्रेम-कथा की शुरुआत होती है कालेज से निकलने के बाद। हम दोनों ही अपने भविष्य की योजनाओं में व्यस्त रहते हुए भी एक दूसरे के काफी निकट थे। मुझे उसका प्रेम किसी बेहतरीन परीकथा की तरह प्रतीत होता है क्योंकि उसने अपनी प्रेयसी को कभी इस बात की भनक भी नहीं पड़ने दी थी कि वह उससे प्रेम करता था। दोनों के बीच उम्र का भी ख़ासा अंतर था। वह अभी कालेज में ही थी और आगे की पढाई के लिए शहर से बाहर जा रही थी। उससे ज्यादा खुश तो मेरा दोस्त था। अगस्त का महीना था जब उसके जाने से कुछ दिनों पहले मैंने दोनों को बड़े औपचारिक ढंग से इस मुद्दे पर बात करे देखा। अपने दोस्त का हाले दिल मुझे मालूम था लेकिन ये देखकर आश्चर्य होता था कि उसके दिल की बात उसके चेहरे पर झलती तक नहीं थी जबकि उसकी अघोषित प्रेमिका के चेहरे पर जो भाव हुआ करते थे वो कभी-कभी उसके हाले-दिल की चुगली कर जाते थे। खैर बात यहाँ तक ही सीमित थी। प्रेमिका के शहर छोड़ने के बाद भी काफी कुछ सामान्य सा ही चल रहा था लेकिन सितम्बर आते-आते अचानक मानो भावनाओं का तूफ़ान सा आया सुबह से लेकर शाम तक मेरा दोस्त मुझे समझाने की कोशिश करता रहा कि उसे इश्क वाला लव हो गया था और मैं उसे समझाता रहा कि अब उसे थोडा समझदार होना चाहिए और समझना चाहिए कि सच्चा प्रेम जैसी कोई चीज़ नही होती। उसे थोडा प्रैक्टिकल रहते हुए प्रेम में आगे बढ़ना चाहिए ताकि अगर आगे जोर का झटका लगे तो भी थोडा धीरे से लगे।
उसके बाद शुरू हुई एक ऐसी प्रेम कहानी जिसके हर पल का गवाह मैं था। शायद दोनों ने मुझे एक साझा राजदार रख छोड़ा था। मुझे भी आश्चर्य होता था उनके संबंधों पर दोनों सचमुच प्रेम की पराकाष्ठा को ना सिर्फ शिद्दत से महसूस कर रहे थे बल्कि जीवन के हर पल को अंतिम पल की तरह जी रहे थे। कई बार चर्चा हुई कि आखिर इस प्रेम का पता यदि समय से पहले किसी को चल गया तो क्या होगा। दोनों सारा इल्ज़ाम अकेले अपने सर पर लेकर दूसरे को सुरक्षित करने की बात करते थे। अलग-अलग शहरों में होने के बावजूद दोनों के बीच काफी बातचीत होती रहती थे और अक्सर दोनों की मुलाकातें भी होती थीं, सभी जानने पहचानने वालों की नज़रों से परे। फिर एक और राजदार जुड़ गया और ये थी उसकी प्रेमिका की छोटी बहन। हलाकि उसे दोनों के सम्बन्ध समझ में नहीं आये लेकिन उसे कोई ऐतराज हो ऐसा भी नहीं लगता था। अब तक दोनों के बीच प्रेम काफी परिपक्व हो चुका था दोनों एक ओर सामाजिक और पारिवारिक मान्यताओं और स्वीकृतियों के समक्ष नतमस्तक थे तो दूसरी ओर अपने प्रेम को आजीवन बरकरार रखने के लिए दृढ प्रतिज्ञ भी। २ वर्ष बीतते-बीतते ये तय हो चुका था कि इस प्रेम-कथा का अंजाम शादी और मिलन नहीं था। मेरे जीवन का ये पहला अनुभव था जिसे मैं सच्चे प्रेम की संज्ञा देने को मजबूर हो रहा था, हलाकि दोनों के बीच कोई दैहिक दूरी नहीं थी लेकिन इस प्रेम में अभी तक मुझे वासना का अंश मात्र भी नहीं दिखा था दोनों एक दूसरे के साथ बिलकुल बेफिक्र, खुश और जीवन की तरंगों से लबरेज दिखते थे। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि जब इन दोनों के अलगाव को मैं नहीं सोच पा रहा हूँ, जब इनके अलग होने की कल्पना से मैं सिहर जाता हूँ तो ये दोनों इस अवश्यम्भावी अलगाव को कैसे झेल पायेंगे। याद नहीं कि कितनी बार मैंने स्वयं उनके इस अलगाव को रोकने के लिए मन्नतें माँगी। मुझे पता था विधर्मी की दुआ क़ुबूल नहीं होती फिर भी मैंने उस दौरान परामानवीय ताकतों से इस अलगाव को रोकने की सिफारिशें की।
फिर एक दिन सबकुछ बदरंग हो गया मैं स्वयं सन्न रह गया जब दोस्त ने बताया कि वो तो किसी और से प्रेम करती है और अब वह उस पर तरह-तरह के आरोप भी लगाना शुरू कर चुकी है। हद तो तब हो गई जब उसने कहा कि उसने अपनी माँ से कहा है कि वह उसे परेशान कर रहा है और माँ थोड़ी देर में उसे फोन करने वाली है, उसकी भलाई इसी में है कि मेरा दोस्त उस पर कोई आरोप न लगाए। मैं साथ में मौजूद था और अपने मिजाज के अनुकूल मेरा क्रोध चरम सीमा पर था। फोन कटते ही मैंने अपने दोस्त को कोई अपराध बोध ना करके सच्चाई बयान करने की सलाह दी लेकिन हमेशा मेरी बात मानने वाला मेरा दोस्त पक्का आशिक निकला उसने फोन आते ही अपना ‘गुनाह’ क़ुबूल कर लिया और माफी माँगी। वह आवाज आज भी मेरे कानों में गूँज रही है उसका वह चेहरा आज भी मेरी यादों में ताजा है। चेहरे पर वहशत और आँखों में छलकती लाचारी किस तरह वीभत्स होती है मैंने देखा और हतप्रभ रह गया। ये क्या हो रहा था! क्या ये वही प्रेमिका थी जिसने किसी भी तरह के दुःख को, किसी इलज़ाम को उस तक न पहुँचने देने का अहद किया था? क्या ये वही दोस्त था जिसे हर पल मालूम था कि इस प्यार में सिर्फ अलगाव है? क्या ये उसी तरह का अलगाव था जिसकी कल्पना उसने की थी? अगर उन दोनों में प्रेम था तो फिर किसी अन्य के बीच में आने की गुंजायश कैसे हो गई? यदि वह प्रेम वासना रहित और निष्कपट था तो फिर प्रेमिका के दिल में दूसरी बार प्रेम उपजने के क्या कारण थे? आखिर उस सोच में कितनी सच्चाई थी कि वह सामाजिक और पारिवारिक मान्यताओं का सम्मान भी करती थी और अपने प्रेम को आजीवन बरकरार रखने के लिए दृढ प्रतिज्ञ भी? स्वयं को एक अन्य प्रेमी के साथ सुरक्षित करने के लिए जिस तरह के झूठ और फरेब का इस्तेमाल वह अपनी माँ और प्रेमी दोनों के साथ कर रही थी, क्या ये वही लडकी थी जो दिन में सैकड़ों बार प्रेम की कसमे खाया करती थी?
इन प्रश्नों के उत्तर मैं कभी नहीं पा सका हाँ बाद में एक बात मेरे दोस्त ने जरूर बताई कि उसने आखिरी बार हुई बात के दौरान ये जरूर कहा था कि प्यार एक बार नहीं दो बार होता है पहला जल्दबाजी और नादानी में होता है, जो उसे मेरे दोस्त के साथ हुआ था और दूसरी बार वाला सच्चा होता है जो उसे अब हुआ था। उसके बाद मेरा दोस्त कहाँ गया किसी को नहीं मालूम, वैसे भी उस अनाथ को पूछने वाला कोई नहीं था। आशा है जहाँ भी होगा अच्छा होगा, उसकी डायरी मुझे उसकी याद कराती रहती है। खैर कभी तो लौटेगा मैं इन्जार करूंगा।
इस घटना के कुछ ही दिनों के बाद उस लड़की की भी शादी हो गई लेकिन ये नहीं समझ में आया कि उसका पति एक तीसरा व्यक्ति क्यों है, वो दूसरा प्रेमी क्यों नहीं जिससे उसे सच्चा वाला प्रेम हुआ था। शायद उसका जवाब भी मुझे पता है- ‘प्यार तीन बार होता है!’ खैर जो भी हो इसी के साथ इस दुनिया में सच्चे प्रेम की तलाश का मेरा शगल समाप्त हो गया और मैं वापस उसी धारणा पर आकर पूरे विश्वास के साथ ठहर गया ‘व्यापारियों की दुनिया में प्यार जैसी कोई चीज़ नहीं सिर्फ दुकानें लगी हैं। व्यापार हो रहा है- कोई किसी के साथ व्यापार शुरू करता है, तो किसी के साथ बंद कर देता है।’


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37 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

manoranjanthakur के द्वारा
February 21, 2013

सुंदर …bachpan se aaj tak ka velentine…. gujar di aapne lekhni me ..badhiya …badhai

    chaatak के द्वारा
    February 22, 2013

    स्नेही मनोरंजन जी, सादर अभिवादन, उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

atharvavedamanoj के द्वारा
February 17, 2013

प्रिय मित्र चातक जी… पहले सोचा था की इस आलेख पर कोई टिप्पडी नहीं करूँगा क्योंकि आप तो विधर्मी (नास्तिक नहीं) हैं और मैं एक हिंदू आतंकवादी (दिग्विजयी मानकों के अनुसार)..फिर सोचा प्रिती भी तो दो विपरीत धुरियों के ही मध्य होता है (सम वाली मानसिकता राम राम राम) ..बहरहाल मेरी यह मान्यता है की काम जगद्विजयी और उसके तीन फलक वाले त्रैलोक्य विजयी तीक्ष्ण शरों से या तो हनुमान ही बच सकते हैं या फिर भगवान शंकर…उर्ध्वरेता की स्थिति प्राप्त करना सहज नहीं हैं…नर हो अथवा नारी…विह्वल दोनों ही होते हैं फिर दोष केवल एक को नहीं दिया जा सकता…थोडा सा अंतर अवश्य है…पुरुष जब धोखा खाता है तो उसकी सम्पूर्ण हत्या हो जाती है (यदि भावनाएं निःस्वार्थ हुई तो) और स्त्री बहुधा परिस्थितियों से तालमेल बिठा लेती है किन्तु वर्तमान संदर्भो में यह दोनों ही बेमानी हो गए हैं क्योंकि जमाना ही यूज एंड थ्रो का हो चूका है…परदे का सौंदर्य अद्वितीय होता है यह बात आधुनिकों के समझ में नहीं आती..जन्मदिन कि हार्दिक शुभकामनाएं नहुष का सर्पः सर्पः…पुरु का आजीवन भोग और कमातुराणां न भयं न लज्जा वाली बात तो प्रसिद्द है ही

    chaatak के द्वारा
    February 17, 2013

    स्नेही मित्र मयंक जी, सादर अभिवादन, आपकी बात से पूर्णतयः सहमत हूँ, भाई बहुत से लोग शायद इस बात को नहीं समझते हैं लेकिन हमें इस सच्चाई का अंदाजा है कि स्वयं को विधर्मी घोषित करना और फिर भी धर्म से सेकुलर न होना और स्वयं को आतंकी घोषित करना और एक चींटी को भी दुःख पहुंचाने की मंशा न रखना सिर्फ हिन्दुओं के वश की बात है| यही कारण है कि आप एक विधर्मी के मित्र और मैं हिन्दू आतंकी का मित्र हूँ| वन्देमातरम !

akraktale के द्वारा
February 15, 2013

भाई चातक जी शुकर करो की यह सब शादी के पहले हुआ. प्यार पहले वाला दुसरे वाला, सच्चा झूठा. ये सब नहीं मन बहलाव का याराना है.प्यार जब होता है तो प्यार होता है. हाँ मगर एक तरफा कई बार होता है. आपके नादाँ दोस्त के प्रति संवेदनाएं. सादर.

    chaatak के द्वारा
    February 16, 2013

    स्नेही रक्तले जी, सादर अभिवादन, आपकी बात से इनकार नहीं किया जा सकता लें दिल का क्या करें सोचिये जब राजनीति जो कि पूर्णतयः दिमाग से सम्बंधित है उसमे हम बार बार धोखा खाते है तो अगर कोई प्यार जैसी बहुमूल्य चीज का प्रलोभन दे कर धोखा दे तो इससे कैसे बचें? :) अच्छी प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

div81 के द्वारा
February 14, 2013

बहुत ही अफ़सोस हुआ उस लड़की कि मानसिकता को पढ़ के | प्यार के जिन अर्थो को आज पूजा जा रहा है वो बहुत ही अफसोसजनक है | आप के दोस्त के साथ हमारी संवेदनाये है ऊपर वालसे से प्रार्थना है कि आप के दोस्त कहीं भी हो वो खुश और सफल इंसान हो और इन सब से उबर चुके हो |

    chaatak के द्वारा
    February 14, 2013

    दिव्या जी, सादर अभिवादन, मैं स्वयं भी आज तक नहीं समझ पाया हूँ कि ऐसा क्यों हुआ और कैसे हुआ| हम तो किसी डाल से एक काँटा तोड़ते डरते है लोग न जाने कैसे दिलों को तोड़ने के शगल पाले बैठे रहते हैं| एक अच्छी प्रतिक्रिया और संवेदना के लिए हार्दिक धन्यवाद!

alkargupta1 के द्वारा
February 13, 2013

चातक जी , भावपूर्ण कहानी है दोस्त की…..आज शायद यही सार रूप है प्यार का जो आपने आलेख के अंत में एक पंक्ति दी है…’आज प्यार का व्यापार हो रहा है- कोई किसी के साथ व्यापार शुरू करता है , तो किसी के साथ बंद कर देता है…..’ पवित्र प्रेम की गरिमा को जो समझ ले वही सफल है पर कितने समझ पाते यह भी समझ पाना थोडा कठिन है… अर्थपूर्ण आलेख

    chaatak के द्वारा
    February 13, 2013

    अलका जी, सादर अभिवादन, सही कहा आपने बड़ा मुश्किल है प्रेम की गरिमा को समाज पाना काश कि हम इसे समझ पाते !!! अच्छी प्रतिक्रया का हार्दिक धन्यवाद!

yogi sarswat के द्वारा
February 13, 2013

श्री चातक जी , प्यार क्या होता है , क्या रंग दिखाता है ! बड़ी अजीब सी पहेली है ! आपने जो कहानी बतायी , वो ज्यादातर की कहानी है ! प्यार की कहानिया बड़ी विचित्र होती हैं , नयी होती हैं ! सुन्दरतम लेखन

    chaatak के द्वारा
    February 13, 2013

    स्नेही योगी जी, सादर अभिवादन, आपके विचारों से सहमत हूँ फिर भी जोड़ना चाहता हूँ, आज के दौर में प्यार रंग दिखाए न दिखाए, प्यार करने वाले एक दूसरे को दिन में तारे और रात में सूरज जरूर देखते और दिखाते रहते हैं!! :)

Malik Parveen के द्वारा
February 13, 2013

चातक जी प्यार तो प्यार है ये तो दिलों का व्यापार है जिसको मिल जाये वो भाग्यवान है

    chaatak के द्वारा
    February 13, 2013

    परवीन जी, आपकी राय से असहमत नहीं हो सकता, आशा करता हूँ इस खेल में लोग भाग्यवान हों!

sinsera के द्वारा
February 12, 2013

चातक जी नमस्कार, ऊपर जिस घटना का ज़िक्र आपने किया है उसमे अधूरी सच्चाई है..प्यार एक या दो या तीन बार नहीं बल्कि कुछ लोगो को बार बार होता है और वो भी सच्चा वाला.. वो तथाकथित सच्चे प्रेम से भरी हुई प्रेमिका जो दूसरी पादान से चढ़ कर तीसरे माले पर पहुँच गयी, कोई आश्चर्य नहीं कि इस समय किसी अन्य तल पर हो ..भला हो कि वो कहीं टॉप फ्लोर से कूद न चुकी हो…

    chaatak के द्वारा
    February 13, 2013

    सरिता जी, सादर अभिवादन, आपके ब्लॉगस की तरह आपकी टिप्पड़ी में भी बड़ी मारक तारतम्यता है, मेरी अद्यतन जानकारी के अनुसार अभी प्रेयसी टॉप फ्लोर पर विद्धमान है, ईश्वर न करे उन्हें कभी वहां से छलांग लगानी पड़े| अच्छी और सकारात्मक प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
February 12, 2013

अगर उन दोनों में प्रेम था तो फिर किसी अन्य के बीच में आने की गुंजायश कैसे हो गई? यदि वह प्रेम वासना रहित और निष्कपट था तो फिर प्रेमिका के दिल में दूसरी बार प्रेम उपजने के क्या कारण थे? आखिर उस सोच में कितनी सच्चाई थी कि वह सामाजिक और पारिवारिक मान्यताओं का सम्मान भी करती थी और अपने प्रेम को आजीवन बरकरार रखने के लिए दृढ प्रतिज्ञ भी? बहुत खूब. बधाई आदरणीय चातक जी सादर

    chaatak के द्वारा
    February 12, 2013

    स्नेही कुशवाहा जी, सादर अभिवादन, पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रिया पाकर हार्दिक प्रसन्नता हुई!

seemakanwal के द्वारा
February 11, 2013

प्यार को प्यार ही रहने दो ,कोई नाम न दो .. भावुक प्रेम कहानी ,,या …. हार्दिक धन्यवाद ..

    chaatak के द्वारा
    February 11, 2013

    सीमा जी, इतनी खूबसूरत बात को एक लाइन में कहने का हार्दिक धन्यवाद !

rita singh'sarjana' के द्वारा
February 10, 2013

चातक जी , बहुत दुखत कथा आपके दोस्त के पढ़कर भावुक हो गई l उस लड़की ने ऐसा क्यों किया पता नहीं परन्तु उसने प्रेम का अर्थ समझा ही नहीं अगर ऐसा होता तो शायद प्रेम जिन्दा रहता चाहे वहां लाख तूफान क्यूँ न आता l खैर आपके दोस्त के लिए दिल से यही दुआ हैं कि वह जहाँ भी रहे खुश रहे l

    chaatak के द्वारा
    February 10, 2013

    रीता जी, आपकी प्रतिक्रिया का हार्दिक आभार| आशा करता हूँ के आप लोगों की दुआएं कुछ अच्छा जरूर करेंगी!

    Rita Singh, 'Sarjana' के द्वारा
    February 10, 2013

    आमीन

February 10, 2013

‘व्यापारियों की दुनिया में प्यार जैसी कोई चीज़ नहीं सिर्फ दुकानें लगी हैं। व्यापार हो रहा है- कोई किसी के साथ व्यापार शुरू करता है, तो किसी के साथ बंद कर देता है।’.सच तो यह है की हरेक चीज का अब व्यवसायीकरण होता जा रहा है…………………….इस भाग-दौड़ के युग में हम भौतक रूप से जितने नजदीक हो रहे हैं, मानसिक रूप से उतने ही दूर होते जा रहे हैं……………………हमसे पूछिये तो प्यार न सच्चा होता है, न झूठा होता है…….न एक बार होता है न हजार बार होता है……………..प्यार तो बस प्यार होता है………………

    chaatak के द्वारा
    February 10, 2013

    स्नेही अलीन जी, सादर अभिवादन, आपकी बात से सहमत हूँ प्यार सिर्फ प्यार होता है इसमें न कुछ दिया जाता है ना लिया जाता है इसमें न मिलन होती है ना जुदाई होती है, इसमें सिर्फ एक विश्वास होता है जो यकीन नहीं दिलाता सिर्फ महसूस कराता है कि हम आपके साथ हर हाल में हैं विचारों में ख्यालों में हवाओं में खुशबू में हर उस जगह पर जहां तुम्हे मेरी जरूरत है जहाँ तुम्हे मेरी जरूरत नहीं है, मैं हमेशा तुम्हरे लिये एक भावनात्मक ताकत की तरह तुम्हारे साथ हूँ जो तुम्हे टूटने नहीं देगा, बिखरने नहीं देगा| लेकिन अफ़सोस ये प्यार इस दुनिया में राधा और कृष्ण के बाद न किसी ने किया न किसी से हुआ ! एक अच्छी प्रतिक्रया का हार्दिक धन्यवाद!

February 10, 2013

‘व्यापारियों की दुनिया में प्यार जैसी कोई चीज़ नहीं सिर्फ दुकानें लगी हैं। व्यापार हो रहा है- कोई किसी के साथ व्यापार शुरू करता है, तो किसी के साथ बंद कर देता है।’.सच तो यह है की हरेक चीज का अब व्यवसायीकरण होता जा रहा है…………………….इस भाग-दौड़ के युग में हम भौतक रूप से जितने नजदीक हो रहे हैं, मानसिक रूप से उतने ही दूर होते जा रहे हैं……………………हमसे पूछिये तो प्यार न सच्चा होता है, न झूठा होता है…….न एक बार होता है न हजार बार होता है……………..प्यार तो बस प्यार होता है……………… कोई मुझसे भी तो पूछे प्यार क्या होता है? http://merisada.jagranjunction.com/2012/04/30/%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%88-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%9d%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9b%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b0/

    chaatak के द्वारा
    February 10, 2013

    आपके ब्लॉग पर जल्द अपनी राय देने की कोशिश करूंगा हार्दिक धन्यवाद!

shashibhushan1959 के द्वारा
February 10, 2013

आदरणीय चातक जी, सादर ! जीवन बहुत कठोर और निर्दयी होता है ! और जहां तक प्यार की बात है, तो जिसे अपने परिवार से, अपने माता-पिता से, अपने भाई-बहनों से प्यार नहीं, वह और किसी से क्या प्यार करेगा ? सादर !

    chaatak के द्वारा
    February 10, 2013

    आदरणीय शशिभूषण जी, सादर अभिवादन, सही कहा आपने जीवन बेहद कठोर है, निर्दयी है और जिसने अपने माता-पिता भाई-बहन को से प्यार न किया वो किसी और से प्यार क्या करेगा! हार्दिक धन्यवाद!

nishamittal के द्वारा
February 10, 2013

आपके मित्र के साथ अपनी संवेदनाएं (चाहे वह जहाँ भी हो ) व्यक्त करते हुए यही कहना चाहूंगी कि दिल तो उसका निश्चित रूप से टूटा था परन्तु शायद उसकी प्रेम कहानी उसके इर्दगिर्द रहने वालों को कुछ शिक्षा डे गई होगी.

    chaatak के द्वारा
    February 10, 2013

    निशा जी, ये प्रेम के हादसे हर जगह होते हैं फिर भी ना जाने कैसी बला है की इन हादसों से कोई सबक नहीं लेता | एक सुलझी हुई अच्छी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद!

jlsingh के द्वारा
February 10, 2013

अब मैं कहूं, चातक जी, आपने बड़ी भावुकता के साथ प्रसंग को साझा किया है! बस एक पंक्ति याद आ रही है – दुनिया इसी को कहते है , दुनिया इसी का नाम है! अगर इस तरह के प्रेम सचमुच के होते तो क्या आप इसे लेखनी-बद्ध करते?

    chaatak के द्वारा
    February 10, 2013

    स्नेही जे.एल. सिंह जी, एक पंक्ति में आपने बहुत कुछ स्पष्ट कर दिया है कुछ और नहीं सिर्फ इतना कहूँगा- यदि दुनिया ऐसी है तो ये अच्छी नहीं और यदि ईश्वर ऐसे ही दुआओं को अस्वीकार करता है तो मुझे उससे शिकायत है|

    chaatak के द्वारा
    February 10, 2013

    शालिनी जी, मुझे भी ऐसा ही लगा क्योंकि या तो प्यार होता है या फिर नहीं होता है| बीच की स्थिति नहीं हो सकती!

roshni के द्वारा
February 9, 2013

नमस्कार चातक जी जैसे की बहुत सी प्रेम कहनियों में होता है वही यहाँ हुआ .. मगर आपका ये अंत में सवाल की उसकी शादी उसके दुसरे सच्चे प्यार से क्यों नहीं हुई तो शायद जिस से उसे प्यार हुआ होगा वोह लड़की उसके लिए पहला प्यार होगी .. (पहला जल्दबाजी और नादानी में होता है, जो उसे मेरे दोस्त के साथ हुआ था और दूसरी बार वाला सच्चा होता है ) खैर कहते है जो किसी का दिल तोड़ता है अपना भी कहाँ बचा पता है … आभार

    chaatak के द्वारा
    February 9, 2013

    रौशनी जी, सादर नमस्कार, पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रिया पाकर बेहद ख़ुशी हुई, आपकी बात सच हो काश वो भी अपना दिल न बचा पाए जिसने दिल तोडा हो, आमीन! एक अच्छी प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद!


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