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खाप पंचायतें, मीडिया और मैं

Posted On: 19 Jan, 2013 Others में

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पिछले कुछ वर्षों से गावों-देहातों की खाप पंचायतें काफी सुर्ख़ियों में रही हैं। मीडिया तो अदालत की बैसाखी लेकर खापों के पीछे बिना नहाए-धोये पड़ी है। कुछ समय तक तो मैं भी खापों को ‘दुश्मन ज़माना’ या ‘खलनायक’ [आप चाहें तो दाल-भात (प्रेमी-प्रेमिका) में मूसलचंद (अमरीशपुरी) भी कह सकते हैं!], समझ बैठा था। दरअसल मैं स्वयं भी किसी हीरो से कम तो हूँ नहीं (जैसा कि मेरी प्रेमिका नंबर ०१ कहती थी, हलाकि बाद में उनकी राय में मैं ‘अमरीश पुरी’ बन गया), क्योंकि हमारी भी कुछ चार-पांच अदद (इससे कम बताने पर इन्सलटी हो जाएगी!) प्रेमिकाएं हुआ करती हैं। कहने का अभिप्राय ये है कि जब हमारी नज़रें सभी स्त्रियों में संभावित प्रेमिकाएं या बाहरवाली तलाश करने लगे तो असमंजस में फंसी अदालतें हमें ‘फेयर वेदर फ्रेंड (अच्छे समय का दोस्त)’ और खापें ‘खलनायक’ ही नजर आएँगी। तो भाई, ये था मेरा विचार जो मैंने मीडिया और अखबारों को देखकर अपने हितों की रक्षा हेतु, खापों के विरुद्ध अंतर्मन में पाल रखा था।
फिर एक दिन मेरी नज़र क़त्ल के एक जटिल केस पर पड़ी जिसको पढने के बाद मुझे एक ही बात समझ में आई- ‘किसी भी अच्छे या बुरे काम के पीछे एक ‘मोटिव’ होता है।’ बस यहीं से मेरी सोचने की दिशा और चीजों को परखने की दृष्टि बदलने लगी।
अब इस दृष्टि का पहला शिकार था मैं स्वयं। मुझे ये समझते तनिक भी देर नहीं लगी कि नज़र किसकी गन्दी है- लड़कियों को अपनी माँ, बहन और बेटी की निगाह से देखने वाली खाप पंचायतों की या मेरे जैसे सभ्य, शालीन, और चरित्रवान प्रेमी की जो हर लड़की में अपनी संभावित प्रेमिका, भोज्या या नया आइटम तलाश करती हैं। तस्वीर बदल चुकी थी- मैं स्वयं अब ‘शक्ति कपूर’ बन चुका था और खापें वे झुंझलाए हुए पिता, भाई और बेटे जो अदालतों में जाकर अपनी बेटी, बहन और माँ के बलात्कार पर उनके अपहरण और दमन पर दस-दस साल तक न्याय की भीख नहीं माँगना चाहते, बल्कि किसी-न-किसी तरह अपनी स्त्रियों की (झूठी???) इज्जत सुरक्षित देखना चाहते हैं।
मेरा चिंतन आज इतने पर थमने वाला नहीं था। अब मन उस मीडिया की तरफ भागने लगा जिसने प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक ख़बरों के नाम पर कमाई करने और पार्श्व में रहकर सरकार और प्रशासन पर नियंत्रण करने में पूरी सफलता अर्जित कर ली है। अब मैं ये समझने की कोशिश कर रहा था कि आखिर खापों को निशाना बनाने के पीछे मीडिया का मोटिव क्या हो सकता है? एक बार तो ऐसा लगा जैसे मीडिया तटस्थ होकर ‘नारी कल्याण’ में लगा है। लेकिन जब मैंने कुछ न्यूज़ चैनलों और पत्र-पत्रिकाओं को खंगाला तो इनका ‘मोटिव’ भी आईने की तरह साफ़ और मंशा बनारस की अलकनंदा या कानपुर की गंगा से ज्यादा मैली और दुर्गन्धयुक्त थी [इन पवित्र नदियों का नाम तुलना के लिए इस्तेमाल करने का उद्देश्य यह है कि मैं लोगों का ध्यान मीडिया की पूर्ण गंदगी की तरफ आकृष्ट कर सकूं, जो सिर्फ परम्परागत सोच के कारण पवित्र मानी जा रही है।] अब मुझे दिखाई दिए अर्ध(पूर्ण)नग्न स्त्रियों के ‘बोल्ड’ चित्र और मादक अदाएं जिनके सहारे आज का मीडिया ‘दिख रहा है तो बिक रहा है’। न्यूज़(ड) चैनलों पर सार्थक ख़बरों से ज्यादा थीं नग्नता ओढ़े विज्ञापनों की बाढ़, मूवी, इंटरटेनमेंट, और टैलेंट हंट के नाम पर थिरकते नग्न अंगों की नुमाइश (की ख़बरें)। कहते हैं न- ‘पहले रोजी, फिर रोजा’। तो आजकल पत्रकारिता वह दुकान बन चुकी है जिसका सबसे बिकाऊ आइटम है स्त्री, जो ‘जितनी ज्यादा खुलेगी उतने ज्यादा दाम में बिकेगी’; कभी खबर बनकर, कभी सनसनी।
अब मुझे समझ में आ चुका था कि मीडिया कितनी दूरदर्शी है। वर्तमान में बिक रही मसाला आइटम बासी होने से पहले ताजे आइटम ढूँढने में व्यस्त मीडिया के हितों को खापें यदि अपनी चिंताओं से इसी तरह नुकसान पहुंचाती रहेंगी, तो इन दुकानों के शटर बंद नहीं हो जायेंगे? मुझे तो जवाब मिल चुका था लेकिन तब तक मेरी प्रेमिका नंबर ०२ के खूबसूरत बिकनी फिगर को मीडिया परख चुका था और बॉलीवुड के महान विचारकों के साथ उसे नई सनसनी के रूप में प्रचारित करने के लिए दस्तावेज साइन हो चुके थे। कपडे उतरवाने के साथ कुछ करोड़ मीडिया के खाते में और कुछ लाख नई सनसनी के अकाउंट में जमा हो चुके थे। मीडिया फिर अपनी मंशा में कामयाब रहा था, खापें अपनी बदनीयती की सफाई देने के लिए अदालत के सामने पेश थीं, और फिलहाल मेरे पास भी अपनी शेष प्रेमिकाओं के साथ खुश रहने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था।


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11 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

ashvinikumar के द्वारा
January 27, 2013

प्रिय अनुज समग्र चिंतन के साथ लिखा गया व्यंगात्मक लेख अपने लक्ष्य को भेदने मे सफल रहा ,,अभी कुछ दिनो पहले टी वी पर चर्चा चल रही थी जिसमे फ़िल्मकार कलाकार निर्देशक इत्यादि तमाम मूर्धन्य लोग विराजमान थे चर्चा का विषय था समाज मे मीडिया का प्रभाव उक्त विषय पर फिल्म क्षेत्र के तमाम लोग एक जुट होकर केवल और केवल समाज को परिपक्व होने की ही बात कर रहे थे और माँ बाप को बच्चे को उचित संस्कार न दे पाने का दोषी का ठहरा रहे थे ,,, मुझे समझ नही आया प्रस्तोता ने यह प्रश्न क्यों नही किया की मीडिया या फिल्मों का दायित्व क्या है कुछ लोगों ने यह भी कहा की लोग जो देखना चाहते हैं हम वही दिखाते हैं < तो यार अभी ताजा ताजा करीना की शहादत हुई है और पक्का सर्वे करावा लिया जाये बहुत से लोग करीना का बेड सीन देखना चाहते हैं तो दिखाएंगे /अपनी ही बात को मै काटता हूँ हाँ एक समय ऐसा आयेगा की वह भी दिखायेंगे / फिर सेंसर का दायित्व क्या है अब बात आती है अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की तो भाई मै रोड पर खड़ा होकर माँ बहन करू ,,फिर बोलूँ मेरे अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का हनन किया जा रहा है  भाई मेरे प्रश्न तो तमाम है ,,,एक समय वह था जब ;;यह देश है वीर जवानो का ;;आदि गीतों से सैनिक उत्साहित होते थे तो आज की फिल्मों से लोग प्रभावित होते हैं तो गलत क्या है ………………….जय भारत

akraktale के द्वारा
January 23, 2013

भाई चातक जी सादर, बचपन में हमने पढ़ा है कि किसी बात को समझाने के लिए चित्र या चलचित्र का सहारा लिया जाए तो वह शीघ्र समझ आती है. इस बात को समझ कर मीडिया ने इसका उपयोग के बाद दुरुपयोग शुरू कर दिया. आज चाहे विज्ञापन हों या धारावाहिक आधे से अधिक ऐसे चल रहे हैं जो गलत शिक्षा दे रहे हैं, अश्लीलता पर नजर रखने वाला कोई नहीं. खाप हमेशा से समाज में रहा है और रहेगा. किन्तु कुछ गलत फैसलों के कारण इसको भी बदनाम होना पड़ा, इसका मोटा कारण यहाँ भी कुछ ऐसे लोगों कि उपस्थिति जो गलत हैं. सुधार सभी जगह जरूरी है.

    chaatak के द्वारा
    January 23, 2013

    स्नेही रक्तले जी, सादर अभिवादन, बात अच्छे और बुरे की नहीं है बल्कि जिम्मेदारियों की है संविधान प्रदत्त जिम्मेदारी का निर्वहन करने वाले को लेशमात्र भी छोट इसलिए नहीं दी जा सकती कि वह समाज से आया है या समाज का हिस्सा है खाप सही है या गलत लेकिन नैतिकता को इस तरह ताक पर नहीं रखती जिस तरह संवैधानिक संस्थाए और मीडिया| सुधार की बात जायज है लेकिन यहाँ पर भी ‘पहले वे सुधरें’ वाला रवैय्या चल रहा है ये गलत है| सबसे पहले संवैधानिक संस्थाएं अपने आपको त्रुटि-शून्य और विवाद रहित बनाए फिर वे समाज पर उंगली उठायें और मीडिया पहले स्वयं अपना चरित्र शुद्ध करे फिर वह दूसरों को उंगली करे|

yogi sarswat के द्वारा
January 22, 2013

बहुत कुछ कह डाला आपने और आपके साथ श्री शशि भूषण जी ने भी ! भड़ास निकालने का बेहतर माध्यम है ये ! यानी ये मंच !विचार इस पर होना चाहिए कि क्या समाज इनपर अंकुश लगा सकता है ! समाज की इच्छाएं और क़ानून की धाराएं इन्हें कब बदल पाएंगी, यह देखना है ! बहुत शानदार और समयोचित व्यंग्य ! आपने गंभीर विषय को इतना हल्का फुल्का बनाकर पेश किया है बस पढ़ते ही जाओ ! और हाँ ! एक बात और पूछनी है ५-६ कम पड़ जाती होंगी ? कैसे संभालते हैं आप ? लेकिन जब मैंने कुछ न्यूज़ चैनलों और पत्र-पत्रिकाओं को खंगाला तो इनका ‘मोटिव’ भी आईने की तरह साफ़ और मंशा बनारस की अलकनंदा या कानपुर की गंगा से ज्यादा मैली और दुर्गन्धयुक्त थी [इन पवित्र नदियों का नाम तुलना के लिए इस्तेमाल करने का उद्देश्य यह है कि मैं लोगों का ध्यान मीडिया की पूर्ण गंदगी की तरफ आकृष्ट कर सकूं, जो सिर्फ परम्परागत सोच के कारण पवित्र मानी जा रही है।] अब मुझे दिखाई दिए अर्ध(पूर्ण)नग्न स्त्रियों के ‘बोल्ड’ चित्र और मादक अदाएं जिनके सहारे आज का मीडिया ‘दिख रहा है जो दीखता है वाही बिकता है श्री चातक जी !

    chaatak के द्वारा
    January 22, 2013

    स्नेही श्री योगी जी, सादर अभिवादन, ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया ने अभिभूत कर दिया| भाई आजकल शगल है ज्यादा संख्या बताने का और अपनी हालत ये है कि जीवन भर गाते रहे ‘अपनी भी सूरत बुरी तो नहीं!’ लेकिन एक अदद नारी ने ‘झूठा ही सही’ तक पर ध्यान नहीं दिया सच्चा वाला क्या होता है अपनी समझ से परे की चीज़ है! समय देने और उत्साहवर्धन करने का हार्दिक धन्यवाद!

Tufail A. Siddequi के द्वारा
January 21, 2013

आदरणीय चातक जी सादर अभिवादन, बहुत सुन्दर व्यंग्य ! अफ़सोस कि इन्हें स्व-नियंत्रित रहने को कहा जाता है. – तुफैल ए. सिद्दीकी http://siddequi.jagranjunction.com

    chaatak के द्वारा
    January 21, 2013

    स्नेही तुफैल जी, सादर अभिवादन, मजे की बात ये है कि सभी को पता है कि नियंत्रण किस पर और कितना होना चाहिए लेकिन राजनीति और धन की लिप्सा समस्याओं के समाधान से बुझती नहीं दिखती सो सारी कोशिशें घाव को नासूर करने की कवायद बन जाती है| हार्दिक धन्यवाद!

shashibhushan1959 के द्वारा
January 20, 2013

आदरणीय चातक जी, सादर ! आपकी यह रचना पढ़ कर मुझे बेहद ख़ुशी हो रही है कि अब इन तथाकथित “भद्र भडुओं” और उनके चमचों के चेहरे से मुखौटा उतरने लगा है, और हम उनके असली चेहरे की झलक देखने लगे हैं ! विचार इस पर होना चाहिए कि क्या समाज इनपर अंकुश लगा सकता है ! समाज की इच्छाएं और क़ानून की धाराएं इन्हें कब बदल पाएंगी, यह देखना है ! बहुत शानदार और समयोचित व्यंग्य !

    chaatak के द्वारा
    January 21, 2013

    आदरणीय शशिभूषण जी, सादर अभिवादन, ब्लॉग पर आपकी इस बेबाक प्रतिक्रिया को पढ़कर किसी को भी सहज अंदाजा हो सकता है कि सही कौन है और हिन्दुस्तान का समाज और अवाम किस विचारधारा के साथ है| हार्दिक धन्यवाद !

jlsingh के द्वारा
January 20, 2013

स्नेही चातक जी, सादर अभिवादन! अब मैं क्या प्रतिक्रिया दूं? आज मुझे गुरुदेव (श्री राजकमल जी) की बहुत याद आ रही है. आपने बहुत ही सधे शब्दों में सबकी खिंचाई कर डाली है! महात्मा जी का तोता रटता था – शिकारी आयेगा, जाल बिछाएगा, दाना डालेगा, लोभ से उसमे फंसना नहीं. ताज्जुब तो तब हुआ जब जाल में फंसने के बाद भी वह भूला नहीं था … तब भी वह रट लगा रहा था … शिकारी आयेगा …… आपने भी बड़ा आहिस्ता आहिस्ता, धीरे धीरे … सब कुछ कह डाला है! बहुत बहुत बधाई, अत्यंत रोचक व्यंग्य लेखन के लिए!

    chaatak के द्वारा
    January 20, 2013

    स्नेही श्री जे.एल. सिंह जी सादर अभिवादन, सबसे पहले जर्रानवाजी का शुक्रिया| व्यंग मेरी लेखन विधा नहीं है लेकिन इस ब्लॉग के विषय को बिना असभ्य हुए व्यक्त करना बेहद मुश्किल था सो मुझे व्यंग का सहारा लेना पड़ा| व्यंग के मामले में इस मंच पर मैं हमेशा एक मित्र को याद करता हूँ श्री के.एम्. मिश्रा जी जिनके व्यंग की धार की तुलना आप सीधे परसाई जी से कर सकते हैं|


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