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न्यायालय कब इतिहास रचेगा?

Posted On: 13 Jan, 2013 Others में

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राजनीतिक अपराधीकरण, तुष्टिकरण, आरक्षण, भ्रष्टाचार, और बलात्कार जैसे जघन्य अपराध करने वाले हर रोज़ नया इतिहास लिख रहे हैं| अपराधी अपनी पहुँच और ताकत का इस्तेमाल करके आज बड़ा और ताकतवर अपराधी नेता बन चुका है जिसके सामने नतमस्तक दलाल मीडिया सिर्फ उसे बाहुबली नेता कहकर अपना पल्ला झाड लेती है| तुष्टिकरण आज राजनीति में सफल होने के सबसे बड़े मन्त्र के रूप में अपनी पहचान बना चुका है इसी की बदौलत ओबीसी जैसे लोग अब खुलेआम हिन्दुस्तान के लोकतंत्र को चुनौती दे रहे हैं और हिन्दुस्तान की कोख में ना जाने कितने ‘छोटे पाकिस्तान’ पल रहे हैं कतिपय राजनीतिक दल तो इसकी बदौलत साँसें ले रहे हैं अन्यथा हिन्दुस्तान और राजनीति के वास्तविक रूप की इसकी शुचिता के बारे में कुछ भी न जानने वाले मुख्यमंत्री तो क्या किसी शहर के वार्ड मेंबर तक ना चुने जाते| आरक्षण हमारी जड़ों का कितना खोखला बना चुकी हैं इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार और छुट्टी को छोड़कर कोई दूसरा काम नहीं होता, समाज में अब इंसान नही सिर्फ और सिर्फ जाति देखी जाती है एक सवर्ण आरक्षितों के लिए मुसीबत और शोषक है तो आरक्षित सवर्णों के लिए उनका हक़ खाने वाले मुर्दखोर| बच्चे से जन्म से लेकर आदमी की मृत्यु तक कुल रिश्वत की राशि आज आदमी की ८० वर्षो की जायज जरूरतों के खर्च २ से ३ गुना तक ज्यादा है| बलात्कार के आंकड़े नहीं उसके तरीके और बर्बरता इंसान के जेहन को तीरों की तरह हर रोज़ छेदते रहते हैं| हर जघन्य अपराध हर रोज नए मुकाम हासिल कर रहा हो कल जिस बर्बरता से एक गुनाह हुआ था उससे ज्यादा बर्बर और संगीन गुनाह कल के अखबार में मिलता है| नया घाव मिलते ही पुराने का दर्द कम होने लगता है हिन्दुस्तानियों का नहीं हिन्दुस्तान की संवेदनहीन राजनीति का, न्याय का, प्रशासन और सबसे पहले मीडिया का|
जब इतना सबकुछ हो रहा है तो फिर न्यायालय क्यों सो रहा है अपराधों का इतिहास रचने वालों से कुछ तो बेहतर होने चाहियें न्यायाधीश! अपराधियों से कुछ कदम आगे की सोच तो होनी चाहिए इनके पास! क्यों नहीं रचते एक न्याय का इतिहास? क्यों नहीं रखते ताक पर वो काला चोंगा? क्यों नहीं अदालत के दरवाज़े बंद करके अपराधियों के शरीर में सलाखें डाल दी जातीं? क्यों नहीं एक न्यायाधीश अपनी ‘नौकरी’ का मोह छोड़कर घसीट लाता बलात्कारी को चौराहे पर और जिन्दा दाह करवाता बलात्कारी का?
क्यों नहीं रचता है न्यायालय इतिहास??????

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26 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sumandubey के द्वारा
January 21, 2013

चातक भाई नमस्कार , न्यायलय की एक सीमा है खास तौर से निचली अदालतों के और दूसरी बात पुलिस समय पर न जाच कर पाती है और गवाह समय आने पर मुकर जाता है कभी तो पीड़ित भी पासो के लालच में आकर समझौता कर लेते है दुसरे वकील भी अपनी कमाई के चक्कर में जल्दी फैसले नहीं चाहते और जनता से ही समाज से ही जज भी जाते है सच तो यह है जो बलात्कारी है इसी समाज का है इसलिए समाज की सोच बदलना जरूरी है जिसका निर्माण बचपन से ही शुरू करना होगा और लडको को चरित्रवान बनना होगा जो हम खाली लडकियों को सिखाते है .इतिहास हम सबको रचना है न्यायालय तो कानून से बंधा हुआ है .

    chaatak के द्वारा
    January 21, 2013

    स्नेही बहन सुमन जी, सादर अभिवादन, आपने न्यायालय के मार्ग में जितनी बाधाएं बताई हैं कमोवेश ये दर्शाई जाती हैं लेकिन हैं नहीं| जिस तरह राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने संसद और विधानसभाओं को सिर्फ जनता को बेवक़ूफ़ बनाने और लूटने का अखाड़ा बना रखा है उसी तरह न्यायालय की इच्छाशक्ति की कमी ने न्याय को कमजोर कर रखा है बहुत हद तक जवाब आपने ही दे दिया है- जिस कानून का इस्तेमाल न्यायाधीश अपनी कमजोर इच्छाशक्ति के कारण दोषी को दंड देने में नहीं कर पाता है उसी कानून का इस्तेमाल करके वकील केस का फैसला नहीं होने देता क्योंकि उसकी कमाने की इच्छाशक्ति, न्यायायाधीश के न्याय करने की इच्छाशक्ति से ज्यादा प्रबल है| समाज तो साथ साल पहले ही इतिहास रच चुका है आज किसी भी तरह का असामाजिक कृत्य समाज को स्वीकार नहीं है रही बात लड़कों को चरित्रवान बनाने की तो क्या किस एक माँ के बारे में या किसी एक पिता के बारे में आप बताएं जो सामाजिक है फिर भी अपने पुत्र को चरित्रहीन बना रहा हो? अब बात करते हैं असामाजिक माता-पिता की तो आप ही बताएं असामाजिकता रोकने के लिए समाज को अधिकार दिए गए हैं या फिर कानून, राजनीति और प्रशासन को? मुझे हिन्दुस्तान के समाज पर पूरा यकीन है और मुझे बिलकुल संदेह नहीं है कि ये समाज अपने अन्दर की सभी बुराइयों को दूर करके इतिहास रच चुका है लेकिन राजनीति और न्यायालय इसके असामाजिक इकाइयों को संरक्षण देकर इसके ऊपर मानसिक दबाव डालती हैं और आत्म-मंथन की सलाह देकर इसकी जुबान में गाँठ डालने की हरकत करती है| आपने कुछ और बेहतरीन बिन्दुओं को उठा कर ब्लॉग पर विचार का क्रम आगे बढाने में जो सकारात्मक योगदान दिया है उसके लिए आपको हार्दिक धन्यवाद!

rekhafbd के द्वारा
January 19, 2013

आदरणीय चातक जी क्यों नहीं अदालत के दरवाज़े बंद करके अपराधियों के शरीर में सलाखें डाल दी जातीं? क्यों नहीं एक न्यायाधीश अपनी ‘नौकरी’ का मोह छोड़कर घसीट लाता बलात्कारी को चौराहे पर और जिन्दा दाह करवाता बलात्कारी का? क्यों नहीं रचता है न्यायालय इतिहास??????,सार्थक और बेबाक लेखन,हार्दिक बधाई

    chaatak के द्वारा
    January 20, 2013

    आदरणीय रेखा जी, सादर अभिवादन, बीमार पड़ चुकी क़ानून व्यवस्था को अब कुर्बानियाँ चाहियें लेकिन इस बार अच्छे लोगों की नहीं इन अपराधियों और दरिंदों की| हमें सबक लेना होगा सजा के सार्वभौम प्रभाव से- आजादी के दीवानों ने भले ही हिन्दुस्तान को आज़ाद करा दिया हो लेकिन उन्हें वीभत्स मौत की सजा देकर अंग्रेजों ने जो डर हमारे दिलों में पैदा किया था उसी का परिणाम है कि हम चाहते तो हैं कि क्रांतिकारी पैदा हों लेकिन हामारे घर में नहीं, पडोसी के घर में! इसका मतलब है कि ये एक सिद्ध तथ्य है कि मौत की भयानक सजा यदि क्रांतकारियों को धरती पर दुबारा जन्म लेने से रोक सकता है तो फिर अपराधी और दरिंदों की क्या बिसात है? मुझे इस सिद्धांत पर पूरा विश्वास है और किसी भी भारतीय को इस पर संदेह भी नहीं होना चाहिए| आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

aman kumar के द्वारा
January 17, 2013

सार्थक लेखन ! न्यायालय की अपनी समय होती है | सबसे बड़ी भूमिका तो संसद की है जो तुरन कानून बना सकती है | आजम -इ गुलिस्ता क्या होंगा ? हर साख पर उल्लू बेठा है | आखिर मे बात लोकतंत्र मे जनता पर ही आती है | जो चुनावो मे फिर ………………………………| गलत मतदान करती है | ये बात सारी पार्टियों को पता है | फिर चिंता कोन करे ?

    chaatak के द्वारा
    January 18, 2013

    स्नेही अमन जी, आपकी बात हद दर्जे तक सही है लेकिन इस समय सारी हदें टूट चुकी हैं| यदि न्याय नहीं मिल रहा है तो आप इसका दोष वोट देने वालों पर कैसे डाल सकते है जबकि मतदान का कुल प्रतिशत ४० से कम और सरकार को मिलने वाले वोट कुल जनसँख्या के १० प्रतिशत से भी कम हैं| ये सिर्फ हमें और आपको बेवकूफ बनाने की बात है जो लोग कहते हैं- इन्हें चुना किसने है? जवाब है ९० प्रतिशत लोगों ने नहीं चुन है १० प्रतिशत चोर, गुनाहगार और बलातिकारी लोगों द्वार किया गया चुनाव हमारी मंशा नही सिर्फ हमारी मजबूरी दर्शाता है वो भी इसलिए कि हमारे पास इसका कोई इलाज इन्हें लोगों ने नहीं दिया है| अगर है तो नेगेटिव वोटिंग का बटन किसी मशीन पर क्यों नहीं है???? क्या वो बटन भी जनता लगाएगी???

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
January 15, 2013

हर जघन्य अपराध हर रोज नए मुकाम हासिल कर रहा हो कल जिस बर्बरता से एक गुनाह हुआ था उससे ज्यादा बर्बर और संगीन गुनाह कल के अखबार में मिलता है|.. चातक भाई कानून की देवी की आँखों में पट्टी बंधी है ??? न जाने कब ……सुन्दर विचारणीय आलेख …न्यायाधीश को भगवान् सा लोग देखते हैं लेकिन …. भ्रमर ५

    chaatak के द्वारा
    January 16, 2013

    स्नेही भ्रमर जी, आपके विचार हिन्दुस्तान की अवाम के विचार का प्रतिनिधित्व करते हैं और बेहतर होगा कि न्यायालय अपनी गरिमा अपने विश्वास को कायम रखने के लिए ठोस कदम उठाये!

seemakanwal के द्वारा
January 15, 2013

अभी इन लोगों को और हादसों की प्रतीक्षा है .

    chaatak के द्वारा
    January 15, 2013

    सीमा जी, हादसों का नहीं ये उस समय का इंतज़ार कर रहे हैं जब किसी नेता, जज, पुलिसवाले के घर में घुसकर उसके साथ यही होगा| काश कि मैं प्रार्थना कर पाता कि हे ईश्वर ये जल्दी हो जाए, लेकिन सोचता हूँ तब भी कष्ट हम आम आदमियों को ही होगा क्योंकि ये स्वयं तो संवेदनहीन है इसलिए सिर्फ इतना कहूँगा कि ईश्वर इन निर्लज्जों की बेटियों को भी सुरक्षित रखना वरना आहत तो नारी ही होगी!

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
January 15, 2013

आपने अपनी बात कही. पर देखा जाए तो वर्तमान में महत्वपूर्ण मुद्दों पर देश न्यायपालिका पर ही निर्भर है. वर्ना सविधान की धाजिया उड़ाने में कोर कसार शेष कहाँ . बधाई

    chaatak के द्वारा
    January 15, 2013

    आदरणीय कुशवाहा जी, सस्दर अभिवादन, यही तो दुर्भाग्य है इस देश का जो ये उस लंगड़े घोड़े पर निर्भर हैं तो कभी अस्तबल से बाहर निकला ही नहीं और अगर हिनहिनाया भी तो उस स्वर में जिस स्वर में मालिक चाहता है| इस पोस्ट में बात सिर्फ मेरी नहीं अगर आज लोकतांत्रिक तरीके का इस्तेमाल करके वोटिंग भी करा ली जाए तो सिद्ध हो जाएगा कि ये राय एक अरब जनसँख्या की है| हमें इस समय न्याय चाहिए सिस्टम का चरखा नहीं|

yogi sarswat के द्वारा
January 15, 2013

जब इतना सबकुछ हो रहा है तो फिर न्यायालय क्यों सो रहा है अपराधों का इतिहास रचने वालों से कुछ तो बेहतर होने चाहियें न्यायाधीश! अपराधियों से कुछ कदम आगे की सोच तो होनी चाहिए इनके पास! क्यों नहीं रचते एक न्याय का इतिहास? क्यों नहीं रखते ताक पर वो काला चोंगा? क्यों नहीं अदालत के दरवाज़े बंद करके अपराधियों के शरीर में सलाखें डाल दी जातीं? मैं इस विषय में ज्यादा नहीं जानता श्री चातक जी ! किन्तु मुझे लगता है न्यायलय अपने अधिकारों का उपयोग संविधान के अनतर्गत ही कर सकता है इसलिए उसके सामने एक सीमा बन जाती है ! सार्थक लेखन !

    chaatak के द्वारा
    January 15, 2013

    स्नेही योगी जी, सादर अभिवादन, न्यायालय के बारे में बहुत बड़ी जानकारी होने की आवश्यकता नहीं है न्याय और अन्याय दोनों नंगी आँखों से दिखने वाली हकीकत है लेकिन कानून के किताबी कीड़े स्पष्ट दिख रही अन्याय व्यवस्था को रद्दी की टोकरी बनचुकी पंक्तियों से छनकर सिर्फ अपने आपको बड़ा मेधावी दिखाने की कोशिश में लगे हैं| संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि पीड़ित को न्याय देने में अपराधी को बचाने वाले तर्क बाधा हैं| क़ानून की किसी किताब में नहीं लिखा है कि इंसानियत की हदें पार कर जाने वाले दरिंदों पर इंसानी क़ानून का सुरक्षा कवच पहनाया जाए हाँ ये जरूर लिखा है कि वादी का पक्ष सर्वोपरि है और इसी आधार पर मैं कह सकता हूँ कि मेरे द्वारा जो मांग की गई है वो कतई असंवैधानिक नहीं है|

    yogi sarswat के द्वारा
    January 16, 2013

    श्री चातक जी , आपकी प्रतिक्रिया भी ज्ञानवर्धक होती है !

    chaatak के द्वारा
    January 16, 2013

    स्नेही योगी जी, सब आप बन्धुओ का प्रेम और माँ वाग्देवी की कृपा है!

    chaatak के द्वारा
    January 15, 2013

    शालिनी जी, आपकी सहमति जानकर अच्छा लगा| आपकी पोस्ट पर मैं अपनी राय रख चुका हूँ और आपसे सहमत भी हूँ !

ashvinikumar के द्वारा
January 14, 2013

बहुत ही सुंदर विचार ,,लेकिन देश मे उच्च पदों पर आसीन बहुत से लोग माया से त्रस्त हैं बेचारे उसकी पूर्ति के लिए निरंतर तलवे चाटने मे तल्लीन हैं देश मे बलात्कार हो रहा है उनकी बेटियों के साथ तो नही मटरू का मन डोला जैसी मिल्म आज समाज दिशा दे रही है और समाज उसी राह पर चल भी रहा है भाई इस फिल्म का प्रोमो देखना कल एक इंटरव्यू मे कहा गया था की इस फिल्म के निर्देशक एक्सपेरीमेंटल निर्देशक हैं लेकिन मुझे तो आज के लगभग सभी निर्देशक न जाने क्यों मेंटल प्रतीत हो रहे हैं …जय भारत

    chaatak के द्वारा
    January 14, 2013

    स्नेही अग्रज, सादर अभिवादन, आपकी राय से पूरी तरह सहमत हूँ आज न्याय की बात करना सिर्फ अपने आक्रोश को व्यक्त कने से ज्यादा कुछ नहीं है लोकतंत्र का असली चेहरा दुनिया ने अभी देखना शुरू किया है तब ये हालात है जब ये पूरे रंग में आएगा तो कितना डरावना होगा इसका अंदाजा अभी हमें ठीक से हो जाना चाहिए|

shashibhushan1959 के द्वारा
January 14, 2013

आदरणीय चातक जी, सादर ! “”क्यों नहीं रचता है न्यायालय इतिहास??????”" आपका यह प्रश्न देश की सवा अरब जनता का प्रश्न है ! सादर !

    chaatak के द्वारा
    January 14, 2013

    स्नेही शशिभूषण जी, सादर अभिवादन, देश की सवा अरब जनसँख्या लोकतंत्र के पिंजरे में कैद वह जानवर बन चुकी है जिसे सर्कस तक से रिटायर कर दिया गया है अब इसमें ना रोष है न होश, कानून और व्यवस्था ने इन्हें इन्सान से वो जानवर बना दिया है जो न अपनी इज्जत समझता है न सम्मान, ना इसे दूसरों का दर्द महसूस होता है और न इनके अन्दर गैरत जागती है, शर्म आनी चाहिए मोमबत्ती ढोने वाले युवाओं को!

January 13, 2013

सवाल तो आपका जायज है…………………दूसरा सवाल यह भी उठता है कि क्या न्यायलय इंसानों से नहीं चलता ? क्या वह अपराधीकरण, तुष्टिकरण, आरक्षण, भ्रष्टाचार, और बलात्कार नहीं करता? दूसरा सवाल ….क्यों नहीं एक आम आदमी………….दरवाज़े बंद करके अपराधियों के शरीर में सलाखें डाल देता? क्यों नहीं एक आम आदमी जीवन का मोह छोड़कर घसीट लाता बलात्कारी को चौराहे पर और जिन्दा दाह करवाता बलात्कारी का? क्यों नहीं एक बाप………….दरवाज़े बंद करके अपने अपराधी बेटे के शरीर में सलाखें डाल देता? क्यों नहीं एक बाप बेटे का मोह छोड़कर घसीट लाता बलात्कारी बेटे को चौराहे पर और जिन्दा दाह करवाता बलात्कारी का? क्यों नहीं अभी और कुछ भी है …………..आप बेहतर समझ सकते हैं……………………मतलब एक ही हैं हम में से कोई भी स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व से ऊपर नहीं उठना चाहता………………….

    chaatak के द्वारा
    January 14, 2013

    स्नेही अलीन जी, आपने जो कहा है वह देश के आदर्श स्थिति में पहुँचने के बाद की बात है आप नैतिकता की इतनी लम्बी छलांग नहीं लगा सकते इसलिए स्वप्नलोक से बाहर निकल कर एक ठोस शुरुआत की जरूरत है, एक बाप यदि चाहे भी तो ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि कानून फिर लंगड़ी मारने चला आएगा क्योंकि ये ठेका कानून ने खुद उठा रखा है इसलिए करना भी उसी को पड़ेगा| जिस बाप की नैतिकता इस स्तर की होगी उस बाप का बेटा बलात्कारी तो दूर की बात बदतमीज़ तक नहीं हो सकता मैंने कमीने बापों की कमीनी संतानों पर सवाल उठाया है जिनकी दरिन्दिगी को कानून, सरकार और न्यायालय मिलकर दामादों की तरह पाल रहे हैं| मैं सीधे सादे इलाज को कठिन करके देखने के पक्ष में कतई नहीं हूँ| ये समस्या विकट नहीं है इसे क्षद्म बुद्धिजीवी और बलात्कारी कानून व्यवस्था मिलकर कठिन बना रही है|

jlsingh के द्वारा
January 13, 2013

प्रिय चातक जी, सादर अभिवादन! आपकी चिंता जायज है …. इतना हो हंगामा के बाद भी दामिनी के केस की सुनवाई वही मंथर गति से चल रही है और अखबार में और टी वी चैनलों पर नित नए दुष्कर्म की खबरें आ रही हैं … हमें तो लगता है कि कुछ नहीं सीखा हमने कानून को हाथ में लेकर महिलाओं को ही अपना हिशाब चुकता करना होगा जैसा की रूपम पाठक ने किया था!

    chaatak के द्वारा
    January 14, 2013

    स्नेही जे.एल. सिंह जी, सादर अभिवादन, सिर्फ एक से यदि शुरुआत कर दी जाय तो तौबा करने वालों की लाइन लग जायेगी लेकिन कायर माओं की कोख से जन्म लेने वाले कूबत कहाँ से लायेंगे???


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