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आरक्षण विरोधी गधे !

Posted On: 17 Dec, 2012 में

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आरक्षण विरोधी आन्दोलन करने वाले सरकारी मुलाजिम अपनी एड़ी-चोटी लगाकर भी इस जंग को नहीं जीत पायेंगे इसमें कोई संदेह नहीं था। हाँ आन्दोलन के नाम पर हुडदंग करना, फिकरे-बाजी करना और नारे लगाना इन दिनों प्रचलन में है और कोई दो-राय नहीं कि कार्यालय छोड़कर छुट्टी और मटरगस्ती करने को खूब मिली और नाम आन्दोलन करने का रहा। यानी हींग लगे न फिटकरी और रंग आये चोखा।
सच कहूँ तो तरस आता है इन विरोधियों की नूराकुश्ती को देखकर और तरस आता है इस बात पर कि ये स्वयं को मेधा, हुनर और विशिष्टता के प्रतीक कह कर ऐसी लड़ाई लड़ रहे हैं जैसे भाड़े के टट्टू! आरक्षण समर्थकों के संगठन कौशल और रणनीति के आगे धाराशाई हो चुके ये विरोधी किस मुंह से स्वयं को बेहतर बताते हैं मुझे समझ नहीं आता। मुझे तो ऐसा लगता है जैसे इन किताबी कीड़ों ने किताबी ज्ञान को रट-रट कर अपने आपको श्रेष्ठ समझ लिया है और ये भूल चुके हैं कि दुनिया व्यवहारिक ज्ञान से चलती है और व्यावहारिक ज्ञान से चलाई जाती है।
एक सीधा और निर्णायक रास्ता था और यदि आज भी अक्ल काम कर जाए तो कल की तस्वीर बदल जायेगी लेकिन न तो किसी तथाकथित आरक्षण विरोधी ने वह रास्ता सुझाया और न ही उस पर विचार करने को तैयार हुआ। भेंड-बकरियों की तरह नारे मिमियाने और नचनियों की तरह जुलूस निकालने से अच्छा था ‘सौ मौखिक न एक लिखित’ का सिद्धांत अपनाते और पकड़ा देते इस्तीफ़ा लेकिन हराम की मुंह लगी है किसी की सौ लातें खा लेंगे लेकिन हराम में मिलने वाले सरकारी धन का मोह कैसे छोड़ेंगे?
अभी वक्त नहीं गुजरा है कल सुबह होगी, कल फिर कार्यालय खुलेंगे, कल का दिन हिन्दुतान की क्रान्ति का दिन हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को अगर संसद में बैठे गधे बदल सकते हैं तो गधों के निर्णय को अडिग निष्ठा और मेधा बदल सकती है।
कार्यालय खुलते ही सभी विरोधी अपने इस्तीफे मेज पर रखो, और जो भी कार्य आता है उस कार्य को करने निकलो भीड़ मत बनाओ जिसे रिक्शा चलाना आता है वो किराए का रिक्शा लेकर निकलो जिन्हें खाना बनाना आता है वो पूरी-सब्जी का ठेला लेकर निकलो, जिन्हें कुछ नहीं आता वो मजदूर की तरह काम मांगने निकलो और शाम को कमाई लेकर घर पहुँचो और अपने परिवार की जरूरतें पूरी करो। देखो २४ घंटे में देश की क्या हालत होती है।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश से लेकर अनारक्षित चपरासी तक सभी इस्तीफ़ा दो और लौट जाओ कार्यालय से, कायरों की तरह घर मत जाना। बहुत काम है हिन्दुस्तान में और मेधावी हो तो १०० रूपया तो कमा ही लोगे। ये कार्य एक दिन का नहीं जरूरत पड़े तो जिन्दगी भर करना लेकिन सरकारी नौकर तब तक न बनना जब तक जातीय और धार्मिक विभाजन की ये रेखा पूरी तरह से मिट ना जाए।
हिम्मत और मेधा है तो जीत तुम्हारी, साहस और मेरिट की सिर्फ डींग हांकते हो तो तुम्हारे वश का कुछ नहीं। हराम की तनख्वाह का खून मुंह में लग चुका है तो जूते साफ़ करने और मुंह की खाने में लाज नहीं आएगी। जाओ चुप-चाप अपनी नौकरी देखो चार दिन छुट्टी उड़ा के हुडदंग कर चुके हो अब फिर १० से ४ कुर्सी तोड़ो।

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13 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

rdverma1 के द्वारा
December 25, 2012

Dear Chatak Ji Please Control your passion.Your cause may be justified .Your Anger may be justified But no sensible man can digest your Language. Such language may harm your cause. The Bill is to be passed in Parliament.You are saying Gadhe(Donkeys) to the persons sitting there. If you are against parliamentary democracy you will make many friends foe. Your leader Ms. Mayawati never uses such language

    chaatak के द्वारा
    December 26, 2012

    Dear RD Verma ji, If you feel it was my passion or anger then I must accept that I am not so good with my pen as I should be, because my chief purpose was not show my anger or passion but to express the unrest of those who feel offeded by the wrong attitude of the statesmen. You have well sensed that I do not pay any respect to this parliamentary democracy of India. Ms. Mayawati is undoubtedly a good leader but she is not good enough to be my leader. Thanks for your valuable comment.

sudhajaiswal के द्वारा
December 22, 2012

आपके करारे व्यंग और शब्दों के प्रहार से तो मुर्दों का भी ज़मीर जाग जाये, इस लेख के दो शब्दों से मुझे एतराज़ है मुझे लगता है कि उनके बिना भी लेख उतना ही प्रभावी होता| जागृति का अलख जगाता हुआ आलेख है|

    chaatak के द्वारा
    December 22, 2012

    स्नेही सुधा जी, लेख पर आपके विचार जानकर ख़ुशी हुई| मुर्दों से भी गए गुजरे है ये नेता आपका ऐतराज सही है लेकिन ये सबसे हलके शब्द थे जो मैंने प्रयोग किये अभी भी मर्यादा रोकती है काश हम भी इन्ही निर्लज्ज नेताओं की तरह आचरण कर पाते!

akraktale के द्वारा
December 21, 2012

आदरणीय चातक जी                          सादर, जब मन में आक्रोश हो तो फिर ऐसी बात जबान पर आना स्वाभाविक हि है. किन्तु जब इसको हकीकत में तब्दील करने की बात आती है तो कई और नए प्रश्न खड़े हो जाते हैं. एक बार आदरणीय ओ पी पारिक जी ने भी कुछ इसी तरह का सुझाव दिया था कि सब टैक्स जमा करना बंद करदें तो सरकार दो दिन में सही रास्ते पर आ जायेगी. किन्तु इस प्रकार की बातें  आदर्श उदाहरण तो हो सकती हैं किन्तु जमीनी विफलता इसमें निश्चित है. क्योंकि इस तरह के क़ानून से तात्कालिक लाभ हानि जब नही दीखता तो कई लोग आपके विरुद्ध हो जाते हैं. जिन लोगों कि तत्काल लाभ होने वाला है वे आपका साथ नहीं देते.                                  हाँ ऐसे क़ानून कि मुखालफत तो होना ही चाहिए और ठोस तरीके से होना चाहिए. यह क़ानून देश को एक जातीय विभाजन की ओर ले जा रहे हैं. लोकसभा ने फिलहाल इसे रोक दिया है किन्तु यह बोतल में बंद जिन्न कि तरह ही है. इसका नुक्सान भि मै पिछले सप्ताह हि भुगत भि चुका हूँ जब मुझसे १०-१२ वर्ष बाद लगा साथी लगातार तीन आउट ऑफ टर्न प्रमोशन लेकर मुझसे भी आगे निकल गया दुःख इस बात का हुआ कि एक साथी जो मात्र कुछ कुछ माह बाद सेवानिवृत होने वाला है वह सीधे सीधे प्रभावित हुआ.                                    आपका आक्रोशित होना जायज है और मेरी भी आपसे सहमति है दिल्ली सरकार वोट कि राजनीति से ऊपर उठकर विचार करे अब सिर्फ गुजरात ही नहीं पूरे देश कि जनता जाग चुकी है. वे इसका खामियाजा भुगतने तैयार रहें.

    chaatak के द्वारा
    December 21, 2012

    स्नेही रक्तले जी, सादर अभिवादन, इस पीड़ा को समझ तो हर व्यक्ति रहा है लेकिन कोई कारगर उपाय कर नहीं पा रहा है और उसका कारण है कि संघर्ष आरक्षण विरोध और आरक्षण समर्थन पर केन्द्रित हो गया है जबकि बात समर्थन और विरोध की नहीं बल्कि न्याय की है और हिन्दुस्तान में न्याय यदि मिल भी जाए तो संसद अतातई की भूमिका में आ जाता है और फिर वोट और नोट पर केन्द्रित नंगई के अलावा और कुछ न कहा जाता है न सुना जाता है| जब अदालतें सही फैसला लेने में अक्षम हैं तो भंग कर दो इन्हें और चलने दो मुक़दमे नेताओं के दरबार में वही समस्या सुने और वही फैसले दें कम से कम अदालतों का बोझ तो हमारे मन और जेबों से हटेगा|

December 19, 2012

चातक भाई………………………जबरदस्त लिखा है आपने …चरों खाने सबके चित कर दिया…………………………………………………………………………कार्यालय खुलते ही सभी विरोधी अपने इस्तीफे मेज पर रखो, और जो भी कार्य आता है उस कार्य को करने निकलो भीड़ मत बनाओ जिसे रिक्शा चलाना आता है वो किराए का रिक्शा लेकर निकलो जिन्हें खाना बनाना आता है वो पूरी-सब्जी का ठेला लेकर निकलो, जिन्हें कुछ नहीं आता वो मजदूर की तरह काम मांगने निकलो और शाम को कमाई लेकर घर पहुँचो और अपने परिवार की जरूरतें पूरी करो। देखो २४ घंटे में देश की क्या हालत होती है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश से लेकर अनारक्षित चपरासी तक सभी इस्तीफ़ा दो और लौट जाओ कार्यालय से, कायरों की तरह घर मत जाना। बहुत काम है हिन्दुस्तान में और मेधावी हो तो १०० रूपया तो कमा ही लोगे। ये कार्य एक दिन का नहीं जरूरत पड़े तो जिन्दगी भर करना लेकिन सरकारी नौकर तब तक न बनना जब तक जातीय और धार्मिक विभाजन की ये रेखा पूरी तरह से मिट ना जाए। हिम्मत और मेधा है तो जीत तुम्हारी, साहस और मेरिट की सिर्फ डींग हांकते हो तो तुम्हारे वश का कुछ नहीं। हराम की तनख्वाह का खून मुंह में लग चुका है तो जूते साफ़ करने और मुंह की खाने में लाज नहीं आएगी। जाओ चुप-चाप अपनी नौकरी देखो चार दिन छुट्टी उड़ा के हुडदंग कर चुके हो अब फिर १० से ४ कुर्सी तोड़ो……………………मजा आ गया …..सुबहान अल्लाह…………….

    chaatak के द्वारा
    December 20, 2012

    स्नेही अलीन जी, आरक्षण पर आपकी वैचारिक सहमति जानकर हार्दिक प्रसन्नता का अहसास हुआ. अभी काफी कुछ कहना शेष है क्या हुआ जो आज हिन्दुस्तान में कोई बात नहीं सुनता लेकिन हम तो कहेंगे भाई ये हमारा अधिकार है| हार्दिक धन्यवाद!

nishamittal के द्वारा
December 18, 2012

आपके आक्रोश से सहमती चातक जी.

    chaatak के द्वारा
    December 20, 2012

    निशा जी, आपकी सहमति जानकर हार्दिक प्रसन्नता हुई. धन्यवाद!

Santosh Kumar के द्वारा
December 17, 2012

आदरणीय कृष्णा जी ,..सादर अभिवादन क्या लिखूं ?…घिनौने जातिवाद की पीड़ा की बहुत तीखी सच्ची प्रतिक्रिया ,.ये करने की इनमें हिम्मत नहीं है ,…दस से चार कुर्सी ही तोड़ेंगे !….सादर वन्देमातरम

    jlsingh के द्वारा
    December 18, 2012

    आदरणीय संतोष जी के विचारों से सहमत!

    chaatak के द्वारा
    December 20, 2012

    स्नेही संतोष जी, जे०एल० जी, आरक्षण के मुद्दे पर आप दोनों की सामान राय जानकर हार्दिक प्रसन्नता हुई| धन्यवाद!


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