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गाँधी: एक शख्शियत, एक विचार

Posted On: 3 Oct, 2012 में

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‘गांधी’ एक ऐसा नाम है जिसे लेते ही चर्चा बर्फ की ढलान पर लुढ़कने वाली बर्फ की गेंद बन जाती है, जितना आगे बढती है उतनी ही विशाल होती चली जाती है। मुझे हमेशा ही उनका व्यक्तित्व और उनका जीवन आकर्षित करता रहा है मैं बार-बार अपने मन में इस चरित्र से वैमनस्य जगाने की कोशिश करता हूँ और बार-बार मुझे इसी चरित्र से आकर्षण या कहूँ स्नेह होता जाता है।

गांधी जी का पूंजीपतियों से साथ रहना और उनके हितों की बात करना सर्वहारा वर्ग को थोडा अखर सकता है लेकिन गांधी जी के विचार एकांगी कभी नहीं थे इस बात को मानने से भी हमें परहेज बिलकुल नहीं करना चाहिए। यदि वे पूंजीवादी हितों के समर्थक थे तो निश्चित रूप से आजीवन वे दलितों और महिलाओं के अधिकारों के लिए भी संघर्षरत रहे। गांधीजी स्वाधीनता संग्राम के दौरान अकेले ऐसे आन्दोलनकारी थे जिन्होंने धर्म, समाज, शिक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था सभी क्षेत्रों में अपना बहुमूल्य योगदान दिया। साम्यवाद और पूँजीवाद दोनों ही परस्पर विपरीत विचारधाराएँ हैं और दोनों में से कोई भी अपने आप में परिपूर्ण नहीं है। लेकिन यदि दोनों के बीच का एक संतुलित मार्ग पूरी ईमानदारी से खोजा जाए तो निश्चय ही एक आदर्श राज्य की नीव पड़ेगी और शायद गांधीजी ऐसे ही एक आदर्श राज्य की परिकल्पना मन में संजोये थे जिसे उन्होंने रामराज का नाम दिया था। दुर्भाग्यवश उनकी परिकल्पनाए साकार रूप नहीं ले सकीं क्योंकि इससे पहले कि वे रामराज का एक सम्पूर्ण खाका खींच पाते नेहरु और जिन्ना की महत्वाकांक्षाओं ने गांधीजी को ही निगल लिया। यही विडम्बना है हमारे देश की कि ये मझधार से तो निकल आया लेकिन किनारे पर डूब गया।

गांधी जी का आर्थिक दर्शन ना तो पूरी तरह से पूंजीवादी है और ना ही पूरी तरह से साम्यवादी। वे जब पूँजीवाद के हितों की बात करते हैं तो निश्चय ही उनके जेहन में भारत के अतुलनीय नव-निर्माण, नव-सृजन और नयी वैज्ञानिक उन्नति की तस्वीर होती होगी और जब वे सर्वहारा और दलित वर्ग की बात करते हैं तो जरूर उनके जेहन में भारत के हर निवासी को मिलने वाली शिक्षा, औषधि, रोजगार और उन्नति के संसाधन की समुचित व्यवस्था की योजनायें उभरती होंगी। ऐसी एक व्यवस्था में पूँजीवाद और साम्यवाद एक दूसरे के परस्पर विरोधी खेमे नहीं बल्कि सहायक और अनिवार्य अंग होंगे।

अहिंसा और स्वदेशी का उनका विचार भी इसी संतुलन का महत्वपूर्ण और अनिवार्य घटक है। लोग राष्ट्र और समाज के हित में उतना ही अधिक सोच सकेंगे जिंतना उनके विचार अहिंसक होंगे क्योंकि शान्ति और सद्भाव का यही सबसे अच्छा रास्ता है। स्वदेशी का विचार लोगों में अपने उत्पादों और अपने लोगों में विश्वास पैदा करेगा और साथ ही साथ राष्ट्रवाद को ज्यादा से ज्यादा बल भी प्रदान करेगा।

आजकल तो गांधी जी के विरोध की बहार आई हुई है। बहती गंगा है जो हाथ ना धोये उसे मलाल होने की पूरी सम्भावना है और हम हिन्दुस्तानी ऐसा कोई मौका नहीं गंवाते। मुझे तो आश्चर्य होता है कि कुछ लोग तो गांधी जी के बारे में कुछ भी नहीं जानते फिर भी उनसे नफरत करने की बात कहते हैं। वैसे मैं यहाँ सिर्फ उन लोगों की बात करूंगा जिनके पास गांधी जी से नफरत करने के पुख्ता कारण और सुबूत हैं। ऐसे आलोचक पहले गांधी जी के घोर विरोधियों के विचारों से अवगत होते हैं फिर उसमे वे अपने तर्क-वितर्क और कुतर्क जोड़ना शुरू कर देते हैं और ये भी भूल जाते हैं कि उन्हें गुण और दोष दोनों पर सामान दृष्टिपात करना है, परिणामस्वरूप उन्हें हर जगह गांधीजी में दोष निकालना अपना सबसे बड़ा कर्तव्य लगने लगता है और हिन्दुस्तानी थोडा भी सेंटीमेंटल हो जाए तो फिर कर्तव्यपरायणता में उसका तो कोई सानी हो नहीं सकता।

वर्तमान समय में भी गांधीजी के विचार पूरी तरह से प्रासंगिक हो सकते हैं बशर्ते हम पूरी ईमानदारी से काल, परिस्थिति और उपयोगिता को ध्यान में रखकर सकारात्मक परिवर्तनों के साथ उन्हें अमल में लायें और संतुलन के उस सिद्धांत को वास्तविकता में परिणित करने की कोशिश करें जिसे गांधी जी साकार करना चाहते थे। इसमें कोई शक नहीं कि आज हमारे बीच गांधीजी से भी बेहतर सोच रखने वाले लोग होंगे; तो अच्छा यही होगा कि वे आगे आयें और गांधीजी के अधूरे विचारों को पूर्णता प्रदान करें अथवा सिरे से खारिज कर एक नवीन, सर्वहितवादी एवं सर्वमान्य विचारधारा को अमली जामा पहनाये, क्योंकि राष्ट्र को दिशा गांधीजी को गरियाने से नहीं मिलेगी बल्कि राष्ट्रवाद को सम्मानपूर्वक बढ़ाने से मिलेगी।

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47 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
October 18, 2012

बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी … बेह्तरीन अभिव्यक्ति …!! शुभकामनायें. प

utkarsh singh के द्वारा
October 13, 2012

गांधी जी के विरोध की बहार आ गयी है ( पूर्ण सहमति ) विशेष रूप से अंतरताना के माध्यम पर , अब इसके क्या निहितार्थ है इस पर भी विचार की आवश्यकता है | गांधी के बारे में आलोचना करने से पूर्व यह जान लेने की जरुरत है की अहिंसा उनके लिए एक स्वयंसिद्ध प्रमेय के सामान थी और उनके बारे में कोई भी बात इस विचार के बरक्स ही करनी चाहिये | गांधी में निहित भारतीयता और आध्यात्मिकता का विचार ही समकालीन परिस्थितियों में प्रकाशस्तंभ के सामान है | आज राष्ट्रवाद पूजीवाद और हिंदुत्व को गांधी के आलोक में समझने की आवश्यकता है | जिस बात को जनरल स्मट्स ( द.अफ्रीका ) जैसे उनके प्रथम विरोधी ने समझ लिया ( मे उनके जूते में खड़े होने योग्य भी नही हूँ ) उसे हम उनके अपने देश के लोग आज तक नही समझ पाए |

    chaatak के द्वारा
    October 13, 2012

    स्नेही उत्कर्ष जी, आपकी बात सर्वता उचित और ध्यान देने योग्य है हमें गांधी के दर्शन को समझने के लिए भी यदि विदेशियों की ओर देखना पड़े तो इससे बड़े शर्म की और क्या बात होगी| अच्छा है कि लोग आत्म-मंथन करें, एकांगी आलोचनाएँ नहीं| हार्दिक धन्यवाद!

Satyendra Singh के द्वारा
October 12, 2012

उनका अपना दल कांग्रेस ही गांधीवाद को नहीं पचा पाया , गांधीवाद एक आदर्श परिकल्पना है और सामाजिक वर्जनाएं कडवी सच्चाई , आज के दिन गाँधी जी जीवित होते तो रामराज्य की बात करने पर उन्हें भी सांप्रदायिक करार कर दिया गया होता , मुस्लिम लीग समर्थक उस काल में भी उन्हें हिन्दू नेता ही कहते थे .गांधीवाद भारत के बंटवारे के समय ही दम तोड़ गया था…. भारतीय राजनीतिक पटल पर उनके बहुमूल्य योगदान को नाकारा नहीं जा सकता , वो महान ज्ञानी थे , लेकिन प्रक्टिकल नहीं. देश वास्तविकता के धरातल पर चलता है ….. वैसे भी अगर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम , आज़ादी और उसके बाद हुई पिछले ६५ वर्ष की घटनाओं पर गौर करें तो अंग्रेजों ने आसपास के देशों में उन्हीं नेताओं को सत्ता में रहने दिया है जिन्होंने उनके कानून और डेमोक्रेटिक सिस्टम को follow किया है , और गाँधी नेहरु एवं कांग्रेस कहीं न कहीं अंग्रेजों द्वारा ही पोषित थी , शिक्षा से लेकर संस्कारों तक.. यदि उनकी पार्टी कांग्रेस उनके आदर्शों पर चली होती तो हमें गांधीवाद को किताबों के पन्नों में नहीं खोजना पड़ता…. गांधीजी के पार्थिव शरीर को समाप्त करने में यदि नाथू राम गोडसे जिम्मेदार कहा जायेगा तो गांधीवाद को सिसक सिसक कर मारने के लिए कांग्रेस ही दोषी मानी जानी चाहिए जो आज तक उनके नाम पर सत्ता सुख ले रही है… व्यक्ति से विचार ज्यादा महत्वपूर्ण होता है….. इसलिए गांधीवध के लिए कांग्रेस को नाथूराम गोडसे से ज्यादा बड़ा दोषी मन जाना चाहिए……. आइये गांधीवाद को उसके असल रूप का जमा पहिनने के लिए आगे बढ़ कर इनकी सजा का भी निर्धारण करें ! एक अच्छे सामायिक लेख के लिए साधुवाद !

    chaatak के द्वारा
    October 12, 2012

    स्नेही सत्येन्द्र जी, सादर अभिवादन, मैं ऐसी ही किसी टिप्पड़ी के इन्तजार में था| जब कभी भी गांधी पर पक्षपात रहित सोच के साथ विचार किया जाएगा यही निष्कर्ष बार बार दोहराना पड़ेगा कि दुनिया ईश्वर के द्वारा भेजे गए संतों को स्वीकार करें योग्य अभी नहीं हुई है| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

aman kumar के द्वारा
October 10, 2012

गाँधी जी को जिन्दा करने के लिए बधाई ! चिंतन की मोलिकता की भरपूर दाद !

    chaatak के द्वारा
    October 11, 2012

    स्नेही अमन जी, सादर अभिवादन, प्रयास आपको अच्छा लगा, मुझे बेहद ख़ुशी हुई ब्लॉग पर राय जाहिर करने का हार्दिक धन्यवाद!

manoranjanthakur के द्वारा
October 10, 2012

गांधी को दो मिनट के लिए फ्लाश्बैक में ले चलते है … फिलहाल बात कुछ और करते है …. माफ़ कीजियेगा … राजेश जी … आप हिंदी के जानकर है … और अंग्रजी भी बढ़िया लिख लेते है …… काश यही बात गाँधी के बारे में हिंदी में देते तो स्नेही चातक जी के इस गाँधी दर्शन में चार चाँद लग जाता … माफ़ी के साथ … सुंदर पोस्ट के लिए बधाई ….

    chaatak के द्वारा
    October 11, 2012

    स्नेही मनोरंजन जी, सादर अभिवादन आपकी बात से सहमत ना होना बड़ा मुश्किल है खासकर जब आप तारीफ़ कर रहे हों| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

sumandubey के द्वारा
October 9, 2012

चातक भाई नमस्कार , बढिया लेख गाँधी जी के विचार आज भी मान्य हो सकते हैयदि हम माने तो अच्छाई बुराई तो हर जगह है , किसे हम ज्यादा अपना पाते है यह स्वय पर निर्भर करता है , ,बधाई

    chaatak के द्वारा
    October 9, 2012

    सुमन जी, सादर अभिवादन, आपकी बात से अक्षरशः सहमत हूँ| स्पष्ट राय रखने का हार्दिक धन्यवाद!

Rajesh shukla के द्वारा
October 8, 2012

 dear All we should know about theory of Gandhi ji. His philosophy is releated to our life, it is not only that time, but it is useful tody also. Who comments on him first He/She should peep him/Herself. Regards Rajesh Shukla Hindi Teacher

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2012

    Dear Rajesh ji, Thanks for your precious comment. I do agree with you that we must peep into our own conduct before criticizing others.

yogi sarswat के द्वारा
October 8, 2012

आजकल तो गांधी जी के विरोध की बहार आई हुई है। बहती गंगा है जो हाथ ना धोये उसे मलाल होने की पूरी सम्भावना है और हम हिन्दुस्तानी ऐसा कोई मौका नहीं गंवाते। मुझे तो आश्चर्य होता है कि कुछ लोग तो गांधी जी के बारे में कुछ भी नहीं जानते फिर भी उनसे नफरत करने की बात कहते हैं। वैसे मैं यहाँ सिर्फ उन लोगों की बात करूंगा जिनके पास गांधी जी से नफरत करने के पुख्ता कारण और सुबूत हैं। ऐसे आलोचक पहले गांधी जी के घोर विरोधियों के विचारों से अवगत होते हैं फिर उसमे वे अपने तर्क-वितर्क और कुतर्क जोड़ना शुरू कर देते हैं और ये भी भूल जाते हैं कि उन्हें गुण और दोष दोनों पर सामान दृष्टिपात करना है, परिणामस्वरूप उन्हें हर जगह गांधीजी में दोष निकालना अपना सबसे बड़ा कर्तव्य लगने लगता है और हिन्दुस्तानी थोडा भी सेंटीमेंटल हो जाए तो फिर कर्तव्यपरायणता में उसका तो कोई सानी हो नहीं सकता। सही लिखा आपने ! गाँधी को गाली देकर लोग सत्ता तक पहुँच रहे हैं और अमेरिका में गाँधी को पूज्य बनाकर लोग सत्ता हथियाना चाहते हैं ! गाँधी हमेशा प्रासंगिक रहे हैं और रहेंगे भी

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2012

    स्नेही योगी जी, वैचारिक समर्थन का हार्दिक धन्यवाद!

seemakanwal के द्वारा
October 7, 2012

ष्ट्र और समाज के हित में उतना ही अधिक सोच सकेंगे जिंतना उनके विचार अहिंसक होंगे क्योंकि शान्ति और सद्भाव का यही सबसे अच्छा रास्ता है। स्वदेशी का विचार लोगों में अपने उत्पादों और अपने लोगों में विश्वास पैदा करेगा और साथ ही साथ राष्ट्रवाद को ज्यादा से ज्यादा बल भी प्रदान करेगा. और यही सच्ची श्रधान्जली होगी .

    chaatak के द्वारा
    October 7, 2012

    सीमा जी, ब्लॉग का अवलोकन करने, एक अच्छी राय देने और वैचारिक सहमति प्रदान करने का हार्दिक धन्यवाद!

shashibhushan1959 के द्वारा
October 7, 2012

आदरणीय चातक जी, सादर ! देश की गुलामी की जंजीरों को तोड़ने के लिए हुए असंख्य प्रहारों में गांधी जी का प्रहार सबसे करारा था, इस बात से इनकार किया ही नहीं जा सकता ! देश इसके लिए उनका सदैव आभारी रहेगा ! परन्तु उनकी समस्त विचारधाराएँ उपयोगी थीं, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता ! एक सार्थक रचना ! हार्दिक बधाई !

    chaatak के द्वारा
    October 7, 2012

    आदरणीय शशिभूषण जी, सादर अभिवादन, आपकी राय से मैं भी पूरी तरह से इत्तेफाक रखता हूँ और यही कारण है कि मैं गांधीजी से नफरत नहीं कर पाता गांधीजी ने अपनी भूमिका को बखूबी निभाया और अब हमारी बारी है कि हम अपने समय की मांग को उन्ही की तरह कर्मठता से राष्ट्रहित में पूरा करें भले ही हमें उनके मार्गों से विचलन की आवश्यकता हो हम उनके ऊपर कीचड़ उछलने के बजाय कीचड को साफ़ करने की और कदम बढ़ाएं| आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

    shashibhushan1959 के द्वारा
    October 7, 2012

    आदरणीय चातक जी, बस इसी वाक्य में समस्या का समाधान निहित है कि.. “अब हमारी बारी है कि हम अपने समय की मांग को उन्ही की तरह कर्मठता से राष्ट्रहित में पूरा करें भले ही हमें उनके मार्गों से “विचलन” की आवश्यकता हो !

    chaatak के द्वारा
    October 7, 2012

    आदरणीय शशिभूषन जी, वैचारिक सहमति का हार्दिक धन्यवाद!

ashishgonda के द्वारा
October 6, 2012

प्रणाम गुरूजी! गाँधी जी के बारे में सराहनिए दृष्टिकोण,,,, मैं बहुत क्या लिखूँ मुझसे पहले ही लोगो ने बहुत कुछ कह दिया है,, मैं अपग्य क्या कह सकता हूँ…. सुन्दर और सार्थक आलेख के लिए आभार……..

    chaatak के द्वारा
    October 6, 2012

    प्रिय आशीष जी, सस्नेह आशीर्वाद, गांधी जी के बारे में आपकी राय जानकर बेहद ख़ुशी हुई| प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद!

vasudev tripathi के द्वारा
October 5, 2012

चातक जी, गांधी जी की कार्यशैली, विचारधारा व कई बड़े निर्णयों से विरोध हो सकता है, किन्तु गाँधी जी की राष्ट्रनिष्ठा पर संदेह नहीं किया जा सकता ऐसा मेरा मानना है| मुझे नहीं पता जागरण junction को किन ऐतिहासिक बिन्दुओं अथवा इतिहासकारों के आधार पर गाँधी जी में पूंजीवादी व्यक्तित्व दिखाई दिया..!! इसी मंच पर मैंने एक आध लेख गाँधी जी को पूंजीवादी बताते देखे थे किन्तु वे बचकाने थे| मंच संचालकों को ऐसे विषय रखने से पूर्व बिन्दुओं को वास्तविक परिप्रेक्ष्य में कस लेना चाहिए, बहस के लिए भी वह विषय अच्छा रहता है जो वास्तविक बहस का केंद्र हो… मेरा इतिहास का ज्ञान बहुत उथला है किन्तु फिर भी मुझे पता है कि गाँधी जी पूँजीवाद के विरोध में मशीनरी के प्रयोग तक के विरोध में थे.. जिन पूंजीपतियों से गाँधी जी की निकटता थी वे पूंजीवादी नहीं वरन वे पूंजीपति थे जिनकी खाली चेक गाँधी जी के पास पड़ी रहती थी कि जितना चाहिए स्वतंत्रता आन्दोलन के लिए भर लीजिये.. इतिहास में उतरने पर विस्तार बढ़ता चला जायेगा संक्षेप में कहना चाहूँगा कि गाँधी जी ने महान और भयानक भूलें की जिनका परिणाम राष्ट्र ने भुगता और अभी भी भुगत रहा है किन्तु गाँधी जी पूंजीवादी थे ऐसा कहना गाँधी के दर्शन से अनभिज्ञता मात्र है.!

    chaatak के द्वारा
    October 6, 2012

    स्नेही वासुदेव जी, सादर अभिवादन ये एक ऐसा बिंदु है जहाँ पर मैं आपसे सहमत हूँ गांधीजी पूंजीवाद के प्रणेता किसी भी तरह से नहीं थे और जो लोग ऐसा मानते हैं वे गांधीजी के दर्शन से अपरिचित है ऐसा मुझे भी लगत है| प्रतिक्रिया द्वारा बिंदु पर प्रकाश डालने का हार्दिक धन्यवाद!

nikhilpandey के द्वारा
October 5, 2012

चातक जी नमश्कार , महीनो बाद आज जागरण के मंच पर आया और पहली रचना आपकी पढ़ी …मेरे प्रिय चरित्र पर लेख पढ़कर अच्छा लगा … आपकी लेखनी निरंतर निखरती जा रही है …लगभग १ साल बाद मै मंच पर आया हु…आपको पढ़कर हमेशा सुकून मिलता है आप एक मंझे हुए लेखक है… आपका लेख बेहतरीन है इसपर टिप्पड़ी क्या करू …गाँधी का समर्थक होना हमारे अपने भविष्य के हित में है पर दुखद रूप से ये समझना कोई नहीं चाहता … बस एक बात कहूँगा …. की वो मुतमईन है की पत्थर पिघल नहीं सकता , मै बेकरार हु आवाज के असर के लिए .. गाँधी न सही ,,गाँधी का ख्याल सही ,, कोई सहारा तो है सहर के लिए .

    chaatak के द्वारा
    October 6, 2012

    स्नेही निखिल जी, सादर अभिवादन, आपकी वापसी जानकर बहुत ख़ुशी हुई| आप मित्रों के मंच पर ना होने से कुछ कमी हमेशा अखरती थी| आपकी ही तरह मैं भी गांधी के दर्शन को जितना समझ पाता हूँ उनसे उतना ही प्रेम बढ़ता जाता है| सहमत हूँ कि गांधीवाद हमारे हित में है और दुखद है कि कोई इस बात को समझना नहीं चाहता है| प्रतिक्रिया द्वारा उत्साहवर्धन का हार्दिक धन्यवाद!

yamunapathak के द्वारा
October 5, 2012

चातक जी आपकी बात से सहमत हूँ किसी भी व्यक्ति को समझाने के लिए उसकी नीतियों का हर दृष्टिकोण से आकलन ज़रूरी है. साभार

    chaatak के द्वारा
    October 5, 2012

    यमुना जी, सादर अभिवादन, वैचारिक सहमति के लिए हार्दिक धन्यवाद!

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
October 4, 2012

वर्तमान समय में भी गांधीजी के विचार पूरी तरह से प्रासंगिक हो सकते हैं बशर्ते हम पूरी ईमानदारी से काल, परिस्थिति और उपयोगिता को ध्यान में रखकर सकारात्मक परिवर्तनों के साथ उन्हें अमल में लायें और संतुलन के उस सिद्धांत को वास्तविकता में परिणित करने की कोशिश करें जिसे गांधी जी साकार करना चाहते थे। बहुत सुन्दर बात कही आप ने चातक भाई पूर्ण सहमती किसी की खाली आलोचना नहीं कर के हमें शोध कर अच्छाई की तरफ बढ़ना होगा अच्छा करना होगा अच्छा खोजना होगा .. सुन्दर भ्रमर ५

    chaatak के द्वारा
    October 5, 2012

    स्नेही बंधु भ्रमर जी, सादर अभिवादन, ब्लॉग पर आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया से बेहद ख़ुशी हुई| हार्दिक धन्यवाद!

sudhajaiswal के द्वारा
October 4, 2012

आदरणीय कृष्णजी, सादर अभिवादन | मैं गांधीजी की अंधभक्त नहीं हूँ और आप भी नहीं दिखते, उनके मानवीय गुणों- प्रेम, सत्य, अहिंसा, विनम्रता, दृढ इच्छा-शक्ति इत्यादि की प्रबल समर्थक हूँ | गान्धीजी से सम्बंधित जानकारी एवं देशहित में उनके योगदानो को आपने बहुत ही कुशलता से प्रस्तुत किया है | जो लोग उन्हें कोसने में खुद का बड़प्पन समझते हैं दरअसल वे लोग “अधजल गगरी छलकत जाये” का उदहारण हैं, कुछ बातों से असहमति उन्हें कोसकर नहीं बल्कि राष्ट्रहित में ठोस कदम बढाकर दिखाएँ कम से कम नैतिक मूल्यों और अपने कर्तव्यों का पालन ही कर लें तो बड़ी बात होगी | इतने अच्छे लेख के लिए हार्दिक बधाई!

    jlsingh के द्वारा
    October 4, 2012

    “कुछ बातों से असहमति उन्हें कोसकर नहीं बल्कि राष्ट्रहित में ठोस कदम बढाकर दिखाएँ कम से कम नैतिक मूल्यों और अपने कर्तव्यों का पालन ही कर लें तो बड़ी बात होगी” – बहुत ही उच्च विचार हैं आपके! साभार!

    chaatak के द्वारा
    October 5, 2012

    स्नेही सुधा जी, सादर अभिवादन, आपकी राय से मैं पूरी तरह से इत्तेफाक रखता हूँ और आपके विचार कितने सार्थक हैं इस पर भाई जे०एल० सिंह जी पहले ही संस्तुति प्रदान कर चुके हैं| पोस्ट पर चर्चा को एक सही और सार्थक दिशा देने के लिए आप दोनों को हार्दिक धन्यवाद!

annurag sharma(Administrator) के द्वारा
October 4, 2012

बहुत ही अच्छीश्रधान्जली बापू को ,,,बधाई

    chaatak के द्वारा
    October 5, 2012

    आदरणीय अनुराग जी, पोस्ट को पसंद करने का हार्दिक धन्यवाद!

santosh kumar के द्वारा
October 4, 2012

आदरणीय चातक जी ,.सादर अभिवादन राष्ट्र को दिशा गांधीजी को गरियाने से नहीं मिलेगी बल्कि राष्ट्रवाद को सम्मानपूर्वक बढ़ाने से मिलेगी।…. प्रेरणास्पद विचार के लिए हार्दिक अभिनन्दन ,……..गांधीजी के धुर विरोधिओं में मूरख भी है ,..लेकिन उनके विचारों का सम्मान करता हूँ ,…उनको क्या करना चाहिए था !..यह हम नहीं तय कर सकते हैं ,…..उस काल के समाज और परिस्थिति के अनुसार उन्होंने सबकुछ ठीक ही किया होगा ,..यह मानने पर भी उनकी महाभूलों और कतिपय दोहरे मानदंडो को बिसराया नहीं जा सकता है ,…क्रूर इतिहास सिर्फ परिणाम देखकर सवाल उठाता है ,…. हम उनकी आलोचना या प्रशंसा में व्यस्त होकर गलत ही कर रहे हैं ,…अब समय परिस्थिति जरूरत सब जुदा है ,…गांधीजी का सपना रामराज्य था ,..मौजूदा दौर में उसकी संभावना यक्ष प्रश्न है ,…उत्तर भी कहीं न कहीं अवश्य होगा .,…प्रेरणास्पद लेख के लिए पुनः सादर आभार

    chaatak के द्वारा
    October 5, 2012

    स्नेही संतोष जी, जी आपकी विस्तारित प्रतिक्रिया अच्छी लगी, मेरा निवेदन है कि गांधी जी पर एक ठोस चर्चा जो एकांगी बिलकुल न हो मूराख्मंच पर भी होनी चाहिए| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

    santosh kumar के द्वारा
    October 5, 2012

    आदरणीय चातक जी ,..आपकी इच्छा से मूरखों को अवगत कराना मेरा फर्ज है ,..विश्वास करता हूँ कि वो अवश्य ऐसा करेंगे ,…बहुत आभार

manoranjanthakur के द्वारा
October 4, 2012

गाँधी क्या आज प्रासंगिक नहीं हो सकते ….. मेरा भी नमन बहुत बहुत बधाई

    chaatak के द्वारा
    October 5, 2012

    स्नेही मनोरंजन जी, गांधी जी की प्रासंगिकता पर सकारात्मक टिप्पड़ी का हार्दिक धन्यवाद!

    nikhilpandey के द्वारा
    October 5, 2012

    गाँधी कभी अप्रासंगिक नहीं हो सकते …. विशेष रूप से भारतीय परिप्रेक्ष्य में गाँधी सदा प्रासंगिक रहेंगे …. गाँधी दर्शन पूर्ण व्यावहारिक है और रहेगा .. भारत के बारे में जितनी बेहतर समझ गाँधी को थी उतनी किसी और को नहीं हो सकी ये दुर्भाग्य ही है की गाँधी की उंगली पकड़ कर सत्ता पाने वालो ने गाँधी को ही अप्रासंगिक कर दिया …गाँधी दर्शन एक राष्ट्र तक सीमित न होकर सम्पूर्ण मानव जाति से जुड़ा है .. गाँधी ने कमजोरो के लिए लड़ने से ज्यादा उन्हें मजबूत करने पर जोर दिया …इसलिए उन्हें सत्याग्रह का ब्रह्मास्त्र दिया .ताकि वो अपनी लडाई खुद लड़े …

    chaatak के द्वारा
    October 7, 2012

    निखिल जी, मैं आपके विचारों से पूरी तरह से सहमत हूँ और कोई भी व्यक्ति जो राष्ट्रहित चाहता है वह आपकी राय से जरूर इत्तेफाक रखेगा|

nishamittal के द्वारा
October 4, 2012

गांधी दर्शन पर सुन्दर विवेचना के लिए बधाई चातक जी.

    chaatak के द्वारा
    October 5, 2012

    पोस्ट पर वैचारिक सहमति का हार्दिक धन्यवाद !

jlsingh के द्वारा
October 4, 2012

आदरणीय चातक जी, सादर अभिवादन! आपके तार्किक और शोधपूर्ण आलेख के लिए बधाई! वर्तमान समय में भी गांधीजी के विचार पूरी तरह से प्रासंगिक हो सकते हैं बशर्ते हम पूरी ईमानदारी से काल, परिस्थिति और उपयोगिता को ध्यान में रखकर सकारात्मक परिवर्तनों के साथ उन्हें अमल में लायें और संतुलन के उस सिद्धांत को वास्तविकता में परिणित करने की कोशिश करें जिसे गांधी जी साकार करना चाहते थे। बहुत ही सार्थक!

    chaatak के द्वारा
    October 4, 2012

    स्नेही श्री जे०एल० सिंह जी, सादर अभिवादन, आपकी इस प्रतिक्रिया को पढ़कर और गांधी जी के बारे में आपके विचार जानकर बहुत ख़ुशी हुई वरना आजकल तो लोग ये बाताते हैं कि गांधी जी को क्या करना चाहिए जबकि स्वयम को पता नहीं कि उन्हें क्या करना चाहिए| हार्दिक धन्यवाद!


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