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रेलगाड़ी और महिलायें (सर्वोच्च न्यायालय को एक खुला पत्र)

Posted On: 1 Oct, 2012 Others में

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ट्रेन में महिलाओं के साथ होने वाली बद्सलूकियों के बारे में अक्सर खबरे आती रहती है लेकिन आज तक (सांस्कृतिक सम्पन्नता की डींग हांकने वाले) हमारे देश की शासन, प्रशासन और कानून व्यवस्था ने ना तो इन मामलों पर कोई प्रतिक्रिया की है और ना ही कोई योजना बनाई है। स्त्रीवादी संगठन और नारी-मुक्ति का ठेका उठाने वाले संगठन [जो अक्सर मेरे जैसे लिक्खाडों (वरिष्ठ ब्लॉगर और मित्र श्री अरविन्द पारीक जी के शब्दों में) को समाज का ठेकेदार कहकर विभूषित करते रहते हैं] इन मामलों पर पहल करने के लिए भी समाज के ठेकेदारों का मुंह ताक रहे हैं।


शासन और प्रशासन से कोई पहल की उम्मीद करना तो बेईमानी होगी क्योंकि सबसे ज्यादा नारी-कल्याण यही लोग कर रहे हैं [नेता (एन० डी० तिवारी से लेकर गोपल कांडा तक) खूबसूरत कमसिन लड़कियों को अपने पैसे और रुतबे से रिझा कर उनका शशक्तिकरण करते हैं, तो प्रशासन अपने डंडे के जोर पर (कोतवाली और चौकी से लेकर मैदानों और झाड़ियों तक में) नाबालिक बालिकाओं तक का।] इसलिए इन दोनों संस्थाओं से तो कोई उम्मीद वैसे भी नहीं की जा सकती।


मुझे तो हैरानी है न्यायपालिका, जो आम आदमी की सबसे बड़ी उम्मीद है, की शिथिलता और संवेदनहीनता पर। क्या ये उस दिन का इंतज़ार कर रहे हैं जब रेलगाड़ियों में दिन-दहाड़े दसियों सामूहिक बलात्कारों की खबर आएगी? मैंने तो पढ़ा है कि मामला जब जनहित का हो तो सर्वोच्च न्यायालय किसी पोस्टकार्ड को या अखबार में छपी किसी खबर की कटिंग को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार करके उसकी सुनवाई कर सकता है और निर्णय दे सकता है। जब हमारा संविधान ये प्रावधान देता है तो फिर सर्वोच्च न्यायालय किस याचिका की प्रतीक्षा में है? ये मामला सिर्फ आधी आबादी का नहीं है वरन ९९.९९% आबादी का है क्योंकि यात्रा के दौरान होने वाली छेड़-छाड़ और शारीरिक व् मानसिक यातनाएं सिर्फ किसी एक स्त्री की व्यक्तिगत यातना नहीं होती बल्कि हर उस व्यक्ति की यातना होती है जो बलात्कारी और नपुंसक नहीं है।


आये दिन हम सार्वजनिक स्थलों, बसों और ट्रेनों में इस तरह की घटनाओं के बारे में पढ़ते हैं और लगभग हर रोज इन घटनाओं को अपनी आँखों से देखते हैं। खासकर वे स्त्रियाँ क्या करें जिन्हें अपनी रोटी-रोजी के लिए या पढाई के लिए हर रोज एक ही रास्ते से एक ही समय पर एक ही बस या ट्रेन से गुजरना होता है? क्या उनके परिवार के लोग हर रोज मारपीट या क़त्ल करें? और जिन परिवारों में कोई लड़ने या हथियार उठाने वाला भी नहीं है उनका क्या? ये बात ऊंची-ऊंची कुर्सियों पर बैठे मूर्धन्य विद्वानों के समझ में क्यों नहीं आती? क्या इंसानियत काले हर्फों की जटिल पंक्तियों में उलझकर सिर्फ और सिर्फ मोटी तनख्वाह खाने तक सिमट कर रह गई है?


हमारा सर्वोच्च न्यायालय क्यों ऐसे व्यवस्था नहीं देता कि सार्वजनिक स्थलों, सड़कों, वाहनों इत्यादि पर पहला हक़ स्त्रियों का है और उनकी बेज्जती करने वाले किसी भी व्यक्ति को यदि वहां मौजूद समाज दंड देता है तो सिर्फ क़त्ल को छोड़कर शेष सम्पूर्ण दंड न्यायोचित है? न्यायालय को इस देश की शासन और प्रशासन व्यवस्था का पूरा हाल मालूम है और न्यायालय इस बात को भी अच्छी तरह से समझती है कि ये अधिकार यदि उन्हें दे दिए गए तो निश्चय ही वे इसका गलत फायदा उठाने से भी नहीं चूकेंगे; परन्तु ये अधिकार जब सीधे आम आदमी के हाथ में आएंगे तो इनका दुरुपयोग होने की बात ही नहीं होगी और कतिपय मामलों में यदि इनका दुरुपयोग होगा तो भी वह उस पीड़ा से बहुत ही कम होगा जो हर रोज हमारी महिलाओं को होती है।


ख़बरें जिस तरह आती है वो बयान करने की मजबूरी है, शब्द नाकाफी होने की मजबूरी है, मजबूरी है कि कहें तो कैसे कहें कि छेड़छाड़ का मतलब क्या है? क्या करते हैं वे हाथ, वे निगाहें और वे जुबान जिनके बारे में लिखा जाता है- “लड़की से छेड़छाड़/बदसलूकी की!” जो लोग अख़बारों में छपी और मीडिया द्वारा बताई गई छेड़छाड़ की खबरों के पीछे असली दर्द को नहीं समझते वे स्वयं ट्रेन या बस में यात्रा करके इस हकीकत को देख सकते है कि आज इन साधनों में यात्रा करने को विवश स्त्रियों के खूबसूरत लिबास के नीचे अंग-प्रत्यंग पर कितनी खरोंचें हैं।


मैं इन अनदेखे निशानों को उन असामाजिक और कुत्सित लोगों के हाथों की खरोंच नहीं बल्कि देश की वर्तमान शासन, प्रशासन और न्याय व्यवस्था के अपाहिज और घृणित नाखून के जख्म कहूँगा।

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18 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Anil Saxena के द्वारा
October 15, 2012

चातक जी वाकई आपकी लेखनी में बहुत दम है. छोटी छोटी बातों पर इतनी पैनी निगाह वाकई काबिले तारीफ़ है. ट्रेनों में महिलाओ के साथ छेड़खानी और अभद्रता रोजमर्रा की बात है. हम सब देखते है और खामोश रह जाते है. लेकिन जब हमारे परिवार की किसी महिला के साथ छेड़खानी और अभद्रता होती है तो हमारा खून खौल जाता है. शायद उस वख्त अगर कोई हथियार हमारे पास हो तो उसका इस्तेमाल करने से भी नहीं चूकेंगे. बाद में हश्र चाहे कुछ भी हो. शासन और प्रशासन की कार्य प्रणाली से तो सभी वाकिफ है. पिछले दिनों एक सिपाही ट्रेन में महिलाओ से छेड़खानी कर रहा था, महिला के घर वालो ने बहुत मना किया लेकिन वर्दी के रोब में वो घर वालो को भी गालिया बकने लगा. तब उन लोगो ने उसको बुरी तरह पीट दिया . अगले स्टेशन पर सिपाही ने पुरे परिवार को उतार कर आर पी ऍफ़ थाने में बीसिओ धाराओ में मुकदमा लिखा दिया. परिवार वालो की सुनने वाला कोई नहीं था. यह सब देखकर आक्रोश भर जाना स्वाभाविक है. अगर वाकई कोर्ट कोई समुचित व्यवस्था लागू कर दे तो कुछ हद तक आंसू पूछ सकते है.

    chaatak के द्वारा
    October 15, 2012

    स्नेही अनिल जी, सादर अभिवादन, सार्वजनिक यातायात के साधनों में महिलाओं को जिस तरह की बेज्जती का सामना करना पड़ता है उसका अंदाजा सभी को है उसके बावजूद ना तो शासन कुछ करता है ना प्रशासन क्योंकि हमारे समाज का सबसे असामाजिक तत्व शासन में होता है और जिनका चरित्र बिलकुल खत्म हो चुका हो वे प्रशासन में होते हैं| कारण है कि सार्वजनिक जीवन और प्रशासनिक सेवाओं दोनों की चयन प्रणाली दूषित है परिणामतः यहाँ पर असामाजिक तत्वों की भरमार है| थोड़ी बहुत गुंजायश जो न्यायालय से न्याय मिलने की बची है अगले कुछ दशकों में ये भी पूरी तरह लुप्त होती प्रतीत होती है क्योंकि जिस तरह से बाहुबली और धनपशुओं द्वारा चालाये जा रहे कालेजों में क़ानून की डिग्री बांटी जा रही है आम आदमी की एकलौती आशा को भी ग्रहण लगाने की शुरुआत है| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

shashibhushan1959 के द्वारा
October 6, 2012

आदरणीय चातक जी, सादर ! “हमारा सर्वोच्च न्यायालय क्यों ऐसे व्यवस्था नहीं देता कि सार्वजनिक स्थलों, सड़कों, वाहनों इत्यादि पर पहला हक़ स्त्रियों का है और उनकी बेज्जती करने वाले किसी भी व्यक्ति को यदि वहां मौजूद समाज दंड देता है तो सिर्फ क़त्ल को छोड़कर शेष सम्पूर्ण दंड न्यायोचित है? “”"” जिस दिन ऐसा हो जाएगा, उस दिन ऐसे अपराधों का ग्राफ तत्काल नीचे चला आयेगा, और फिर धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा ! काश ! ऐसा ही हो ! बहुत सार्थक रचना ! हार्दिक धन्यवाद !

    chaatak के द्वारा
    October 6, 2012

    आदरणीय शशिभूषण जी, सादर अभिवादन, उच्चतम न्यायालाल से मेरे आग्रह को स्वर प्रदान कर आपने मुझे आश्वस्त कर दिया कि मैं इस रोग के इलाज के लिए सही दिशा में प्रयास कर रहा था| आज खबर आई है कि इन घटनाओं का संज्ञान लेते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार से जवाबदेही मांगी है और दिशा निर्देश भी दिए है| अच्छा होगा यदि सरकार भी सकारात्मक रवैय्या अपनाए| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

rekhafbd के द्वारा
October 5, 2012

आदरनीय चातक जी मैं इन अनदेखे निशानों को उन असामाजिक और कुत्सित लोगों के हाथों की खरोंच नहीं बल्कि देश की वर्तमान शासन, प्रशासन और न्याय व्यवस्था के अपाहिज और घृणित नाखून के जख्म कहूँगा।,महिलाओं की व्यथा को बहुत अच्छे से प्रस्तुत किया है आपने ,सार्थक लेख ,बढ़िया प्रस्तुति

    chaatak के द्वारा
    October 5, 2012

    आदरणीय रेखा जी, ब्लॉग पर समय देने और प्रतिक्रिया द्वारा राय देने का हार्दिक धन्यवाद !

Mohinder Kumar के द्वारा
October 3, 2012

चातक जी, आपकी व्यथा अनुचित नहीं है… हर कोई वही चाहता है जो आप चाहते हैं. दुर्भाग्य यह है कि इन घटनाओं को अन्जाम देने वाले हम में से ही कुछ होते हैं जिन्हें चिन्हित करना अत्यन्त कठिन है. ऐसी घटनाये सिर्फ़ पुलिस चौकी, बसों या ट्रेनों में ही नहीं घटती ब्लकि घरों में अधिकतर घटती है और अपराधी कोई करीबी ही होता है. सार्थक लेख के लिये बधाई… लिखते रहिये.

    chaatak के द्वारा
    October 3, 2012

    स्नेही मोहिंदर जी, सादर अभिवादन, आपकी बात बहुत हद तक सही है| निकट सम्बन्धियों के द्वारा किया गया कृत्य दुर्लभ से भी दुर्लभतम है फिर भी हम इसे जघन्यतम अपराध की श्रेणी में रखते हैं और इसे भी स्वीकार नहीं किया जा सकता कम से कम भारतीय परिपेक्ष्य में| और जब कभी भी इस तरह की घटनाएं सामने आई है समाज और न्यायालय दोनों ने भयानक दंड भी दिए हैं| मेरी मंशा किसी भी प्रकार के अत्याचार को शून्य तक लाकर खड़ा करना है और उसके लिए न्यायालय को ही बड़ा कदम उठाना होगा| जब मंत्रियों, सांसदों, विधायक, नौकरशाह और उद्योगपतियों को भयंकरतम दंड सार्वजनिक रूप से मिलने लगेंगे तो आम आदमी और सड़क छाप आवारा अपने आप इस तरह गायब होंगे जैसे गधे के सर से सींग| आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

sudhajaiswal के द्वारा
October 2, 2012

परम आदरणीय कृष्णजी, सादर प्रणाम | वर्तमान शासन, प्रशासन और न्याय-व्यवस्था के अपाहिज और घृणित नाख़ून के जख्म कहा बिलकुल सही कहा | न्याय-व्यवस्था अपनी ज़मीर को बेच चुकी है उसने मोटी रकम खाकर कुकर्मी नेताओं के दाग धुलने का व्यवसाय जो शुरू कर दिया है | दुःख की बात तो यह है कि आम आदमी की पीड़ा आज आम आदमी भी नहीं समझना चाहता | उन भद्र पुरुषों के बारे में आप क्या कहेंगे जो ट्रेन और बस में छेड़खानी का शिकार होती महिलाओं को देखकर अपनी आँखें सेंकते रहते हैं और अपनी जगह छोड़ने का कष्ट नहीं करते न ही विरोध करते हैं | सार्वजानिक स्थल पर एक विरोध की आवाज उठाने की पहल कोई भी करे तो कुछ लोग तो साथ देनेवाले आगे जरुर आयेंगे | आपकी बातें सटीक और तर्कसंगत हैं ईश्वर से प्रार्थना है कि आपका खुला पत्र सोये हुए प्रशासन की आँखें खोल दे | उम्दा लेख के लिए बधाई और हार्दिक धन्यवाद |

    chaatak के द्वारा
    October 2, 2012

    स्नेही सुधा जी, सादर अभिवादन, समझ में नहीं आता आपके प्रणाम का जावाब किन शब्दों में दूं, क्योंकि मैं न तो आपसे श्रेष्ठ हूँ और ना महान| मैं सिर्फ आम आदमी की व्यथा की आवाज हूँ जो पिंजरे में कैद सिंह की भाँति आँखों में आक्रोश और पूँछ की फटकार दर्शाता है लेकिन दिखाई देती है सिर्फ उसकी बेबसी| जिन भद्र पुरुषों के बारे में आपने लिखा है उन्ही के बारे में मैंने बलात्कारी और नपुंसक शब्द का प्रयोग किया है क्योंकि हर वह व्यक्ति जो इन घटनाओं को देखकर चुप्पी साध जाता है वो या तो देखकर भी अनदेखा करने वाला मजबूर व्यक्ति होता है या फिर मजा लेने वाल बलात्कारी| हमारे देश में पुरुष वैसे भी अपेक्षाकृत कायर होते है आशा है महिलायें जरूर विरोध दर्ज करेंगी| आपकी बेबाक राय और स्पष्ट विचारों के लिए हार्दिक धन्यवाद!

akraktale के द्वारा
October 2, 2012

चातक जी              सादर, अच्छा विषय है. शरीर कि खरोचों से भी महत्वपूर्ण है मन पर पड़ी खरोंचे.अवश्य ही व्यवस्था में सुधार के लिए सरकार को पहल करना ही चाहिए. क्योंकि समाज में बढती विकृतियाँ अब महिलाओं कि सुरक्षा पर कोई हल निकाल लेंगी लगता नहीं है.

    chaatak के द्वारा
    October 2, 2012

    आदरणीय रक्तले जी, सादर अभिवादन, सरकार पूरी तरह से बलात्कारियों की संरक्षक रही है जो सरकार आतंकियों को संरक्षण और देशद्रोहियों के मानवाधिकार की बात करती है उसके लिए महिलाओं की पीड़ा सिर्फ हास-परिहास का विषय है| मुद्दे पर आपकी राय जानकार बहुत ख़ुशी हुई| हार्दिक धन्यवाद!

nishamittal के द्वारा
October 2, 2012

ऐसी पीड़ा ,जिसको केवल भुक्तभोगी या उसके परिजन ही समझ सकते हैं.सुन्दर पोस्ट के लिए साधुवाद.

    chaatak के द्वारा
    October 2, 2012

    निशा जी, कहा जाता है- जिनके पाँव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई! लेकिन मैं तो हतप्रभ इसलिए हूँ कि ये बिवाइयाँ हर पैर में है फिर भी कोई इस पीर को समझने को तैयार नहीं, खासकर न्यायालय जैसी संस्था जो मानो इन मामलों में पूरी तरह से संवेदनहीन हो चुकी है| इसकी संवेदना जागती है लेकिन सिर्फ बलात्कार होने के बाद! लानत है ऐसी संवेदना पर जो उस बात पर दंड देने में अपने कर्तव्य की इतिश्री करती है जिसकी भरपाई हो ही नहीं सकती|

jlsingh के द्वारा
October 1, 2012

priy chatak jee, namaskaar! aapkee peeda ९९.९९% आबादी का है क्योंकि यात्रा के दौरान होने वाली छेड़-छाड़ और शारीरिक व् मानसिक यातनाएं सिर्फ किसी एक स्त्री की व्यक्तिगत यातना नहीं होती बल्कि हर उस व्यक्ति की यातना होती है जो बलात्कारी और नपुंसक नहीं है। behad hee samvedansheel hai. nishchit hee nyayalay ko kadam uthane chahiye.

    chaatak के द्वारा
    October 2, 2012

    स्नेही जे.एल. सिंह जी, सादर अभिवादन, यदि अब भी न्यायालय सख्त कदम उठाने को तैयार नहीं होता है तो इसे आम आदमी का दुर्भाग्य ही माना जाएगा| सहमति के लिए हार्दिक धन्यवाद!

pitamberthakwani के द्वारा
October 1, 2012

चातक जी, बहुत लिख कर आपने पूरे समाज के गालों पर कई कई थप्पड़ जड़ कर दिखाए हैं, पूरे समाज के आभार से व्यक्त करा रहा हूँ !

    chaatak के द्वारा
    October 1, 2012

    स्नेही पीताम्बर जी, आपकी इस त्वरित प्रतिक्रिया और वैचारिक सहमति का हार्दिक धन्यवाद!


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