चातक

आओ खोजें हिंदुस्तान

123 Posts

4032 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1755 postid : 420

हिन्दू और हिंदुत्व का मुद्दा

Posted On: 31 Aug, 2012 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

एक सवाल सुप्रीम कोर्ट ने पूछा- ‘जब बात हिन्दू धर्म की हो तभी क्यों बदलने लगते हैं क़ानून?’ जवाब किसी के पास नहीं था। होता भी कैसे, जब सर्वोत्तम मेधा प्रश्न करे तो जवाब देना आसान नहीं होता। लेकिन इस बार जवाब मुश्किल नहीं था फिर भी कायर सांसदों से कोई जवाब नहीं मिला। लोकतंत्र की आत्मा तिलमिला के रह गई, अपने गर्भ में बैठे कायर, व्यभिचारी और घोटालेबाज़ सांसदों की इस चुप्पी पर। क्या जवाब इतना मुश्किल था? नहीं! किसी हिन्दू से पूछो जवाब मिलेगा, बशर्ते वह हिन्दू हो


सारे प्रतिबन्ध- तिरंगे को सलामी देने से लेकर संविधान को अपने धर्म-ग्रंथों से भी बढ़कर सम्मान देने तक सारे प्रतिबन्ध हिन्दू पूरी निष्ठा से स्वीकार करता है। यही कारण है कि हर प्रतिबन्ध उसी पर आरोपित होता है।


राष्ट्र की सेवा का दायित्व- हिन्दू समाज को बांटने वाले आरक्षण से लेकर उसकी वोट-शक्ति (जनसँख्या) तक को सीमित करने वाली परिवार नियोजन की गुजारिश पर सिर्फ हिन्दू अमल करता है।
देश की रक्षा के लिए कुर्बानी- यहाँ मुझे यह लिखते हुए अधिक गर्व का अनुभव हो रहा है कि हिन्दुओं के अग्रज, सिख हमें अकेला नहीं पड़ने देते। चाहे वह देश की सीमाओं की पहरेदारी करने की बात हो या आन्तरिक सुरक्षा को खोखला बना चुकी सेकुलर पुलिस के आगे खड़े होकर आतंकियों की गोलियां झेलने की।


आपदा एवं विपदा काल- हिन्दुस्तान अपनी स्वाधीनता के समय से ही हादसों और विपदाओं का देश रहा है, और हर संकट की घडी में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व-हिन्दू परिषद् और बजरंग-दल जैसे हिंदुत्व-वादी संगठनों ने ही जाति, धर्म और सम्प्रदाय को भुलाकर हर हिन्दुस्तानी की सहायता को हाथ बढाया। किसी अन्य देश में ऐसे राष्ट्रवादी संगठन होते तो उन्हें सम्मानों और तमगों से लाद दिया जाता लेकिन हिन्दुस्तान में इन संगठनों को सिर्फ अपमान का विष मिलता है।
आज आवश्यकता है इस बात की कि हर हिन्दू यह प्रश्न उठाये कि मुसलमान स्वयं को मुसलमान कहे तो भाईचारा बढ़ता है; ईसाई खुद को ईसाई कहे तो राष्ट्र का सेकुलर तंत्र और मजबूत हो जाता है; लेकिन हिन्दू स्वयं को हिन्दू कहे तो सेकुलाराई की चूलें क्यों हिलने लगती है?
क्या इसलिए तो नहीं कि– “हादसात ने ज़ुल्म इतने ढाए हैं, जुबाँ लरजती है हकीकत बयान करने से।।

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (17 votes, average: 4.47 out of 5)
Loading ... Loading ...

32 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Anil Saxena के द्वारा
October 16, 2012

बहुत ज्वलंत मुद्दे पर सकारात्मक लिखा है आपने. हमें किसी धर्म से बैर भाव नहीं , लेकिन जब अकेले हिन्दू के बोलने पर उसे सांप्रदायिक कहा जायेगा तो आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है. अभी दो दिन पहले बरेली में बी. टेक. के एक छात्र को महज इसलिए जेल में डाल दिया गया क्यों कि उसने फेस बुक पर मुसलमानों द्वारा हमारे देवी देवताओं को गाली लिखने पर मोहम्मद साहब के बारे में कुछ ‘अभद्र’ लिख दिया. मुसलमान खिसिया गए और मुसलमानों की हिमायती सपा सरकार के कारिंदों ने सांप्रदायिक सौहार्द के नाम पर उस बेचारे छात्र के जीवन को अंधकारमय बना दिया. शहर का हिन्दू ख़ामोशी से सब हज़म कर गया. आखिर क्या है इस देश का भविष्य ? हिन्दू होने की प्रताड़ना हम कब तक झेलते रहेंगे. इस देश के सौहार्द को वास्तव में यह नेता, ये लोकतंत्र खाए जा रहे हैं. चातक जी कृपया इसका कोई सार्थक समाधान बताये , मुझे तो अन्धकार ही अन्धकार दिखाई दे रहा है.

    chaatak के द्वारा
    October 16, 2012

    स्नेही अनिल जी, सादर अभिवादन, पिछले तिरसठ साल की सेकुलाराई अब घातक विष वृक्ष बन चुकी है और इसका इलाज़ न तो इतिहास को गाली देने से होगा और न प्रतिकार छोड़ने से होगा, जरूरत है कि हर हिन्दू ना सिर्फ स्वयं जागे बल्कि जहाँ तक संभव हो हर हिन्दू को जगाये और बाताये- धर्म छोड़ने पर सिर्फ पतन होता है| एक मुसलमान आपके लिए घृणा का नहीं बल्कि आदर्श का प्रतीक होना चाहिए जो अपने धर्म पर अडिग है तो शासन और सत्ता भी उसके साथ है| आप सेकुलर (बल्कि कायर) हो चुके हैं इसलिए आपकी कोई नहीं पूछता| सिर्फ एक समाधान- धर्म के साथ कोई समझौता नहीं| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

Satyendra Singh के द्वारा
October 12, 2012

विचारोत्तेजक एवं सत्य

    chaatak के द्वारा
    October 12, 2012

    स्नेही सत्येन्द्र सिंह, जी वैचारिक सहमति का कोटिशः धन्यवाद!

shailesh001 के द्वारा
September 9, 2012

हिंदू क्या करेगा अभी तो उसे अपनी ही मौत से जागना है…. आपका प्रयास सशक्त है

    chaatak के द्वारा
    September 9, 2012

    स्नेही शैलेश जी, आपकी बात से इनकार नहीं किया जा सकता है| हार्दिक धन्यवाद

Rita Singh, 'Sarjana' के द्वारा
September 4, 2012

चातक जी, राष्ट्र की सेवा का दायित्व- हिन्दू समाज को बांटने वाले आरक्षण से लेकर उसकी वोट-शक्ति (जनसँख्या) तक को सीमित करने वाली परिवार नियोजन की गुजारिश पर सिर्फ हिन्दू अमल करता है। बिलकुल ठीक प्रश्न उठाया आपने ,

    chaatak के द्वारा
    September 6, 2012

    सर्जना जी, लेख पर आपकी सकारात्मक राय जानकर बहुत ख़ुशी हुई| कोटिशः धन्यवाद!

rekhafbd के द्वारा
September 3, 2012

आदरणीय चातक जी ,आपके विचारों से पूर्णतया सहमत ,हिन्दुस्तान में रहते हुए हिंदुयों से ही भेदभाव क्यों ?

    chaatak के द्वारा
    September 3, 2012

    रेखा जी, सादर अभिवादन, आपकी वैचारिक सहमति किसी महती प्रेरणा से कम नहीं काश स्त्र्योचित हो रहे हिन्दू मुखर होने की प्रेरणा भी नारियों से ले पाते ! प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

yogi sarswat के द्वारा
September 3, 2012

आदरणीय श्री चातक जी , हिन्दू वो निरीह प्राणी है जिसका अपना कोई वजूद ही मालूम नहीं होता ! हर नियम उस पर लागू होगा किन्तु उसे कोई अधिकार नहीं मिलेगा ! हमारे मंदिर कोई तोड़ दे , कुछ नहीं होगा , हमारी अमर जवान ज्योति कोई तोड़ दे , कुछ नहीं होगा , हमारे स्मारक कोई तोड़ दे , कुछ नहीं होगा , हमें कोई मार दे कुछ नहीं होगा ! बेहतरीन , आँखें खोलने वाला लेख

    chaatak के द्वारा
    September 3, 2012

    स्नेही श्री योगी जी, सादर अभिवादन, आपके शब्दों के पीछे दबी टीस पूरी उग्रता के साथ झलक रही है कुछ नहीं होगा की पुनरावृत्ति में कहीं विस्फोट के चरम तक पहुँचने की गूँज मुझे स्पष्ट सुनाई दे रही है, जहाँ मैं ये चाहता हूँ की हिन्दुओं को नींद से जागकर एक सिंहनाद करना चाहिए वहीँ मेरी हार्दिक इच्छा यह है कि वह विस्फोट न हो तभी अच्छा है जिसको बार-बार उकसाया जा रहा है क्योंकि ये अत्यंत प्रलान्कारी होगा| लेख पर बेबाक राय देने का हार्दिक धन्यवाद!

Ramesh Bajpai के द्वारा
September 3, 2012

प्रिय श्री चातक जी तुस्टीकरण का खेल व सत्ता की हसरत का घिनौना बाद सूरत अंजाम सामने है | आपने जो भी लिखा है सत्य लिखा है | इस वास्तविक तस्वीर का शुक्रिया | लिखना बहुत था ,पर कमेन्ट नहीं जा रहा था | शुभकामनाओ सहित | ५\५

    chaatak के द्वारा
    September 3, 2012

    आदरणीय बाजपेयी जी, सादर अभिवादन, तुष्टिकरण ने देश को खोखला बनाने की कसम खा रखी है| सत्ता को हथियाने का ये हथियार दोधारी तलवार की तरह हमारे देश की शान्ति और सहिष्णुता को दीमक की तरह चाट रहा है| आज जबकि समय हमें आत्मोत्थान के प्रयासों की और ले जाना चाहता है राजनीति हमें वैमनस्य और घृणा के दलदल में धकेल रही है| हिन्दू लगभग पूरे भारत में असुरक्षित हो चुका है क्या इसी स्वराज की कल्पना तिलक और सुभाष ने की थी? प्रतिक्रिया द्वारा वैचारिक समर्थन का हार्दिक धन्यवाद!

Santosh Kumar के द्वारा
September 2, 2012

आदरणीय चातक जी ,.सादर नमस्ते सच्ची सीधी पोस्ट ,..धर्मनिरपेक्षता के नाम पर आतंक फैलाने वाले देश भक्त और सेवा करने वाले ….. आखिरी लाइन में अआपने सबकुछ कह दिया ,.अच्छी पोस्ट पर हार्दिक बधाई

    chaatak के द्वारा
    September 2, 2012

    स्नेही मित्र संतोष जी, सादर अभिवादन, मेरे विचारों को अपनी सहमति का संबल प्रदान करें के लिए हार्दिक धन्यवाद!

manoranjanthakur के द्वारा
September 2, 2012

जमीनी हकीकत को बया करती यथार्थ लेखन बधाई

    chaatak के द्वारा
    September 2, 2012

    स्नेही मनोरंजन जी, सादर अभिवादन, लेख पर आपकी राय जानकर हार्दिक प्रसन्नता हुई| धन्यवाद!

vikramjitsingh के द्वारा
September 2, 2012

आप का आलेख निशिचित ही एक गंभीर मुद्दा है……. आने वाली पीढ़ियों के लिए ये नीतियाँ निस्संदेह घातक सिद्ध होने वालीं हैं…… सादर…..चातक जी……

    chaatak के द्वारा
    September 2, 2012

    स्नेही विक्रमजीत जी, सादर अभिवादन, आपका आंकलन बिलकुल सही है| हमने आपने आज को ना संभाला तो हमारे पास अपने बच्चों को देने के लिए कोई कल नहीं होगा| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

akraktale के द्वारा
September 2, 2012

आदरणीय चातक जी                           सादर, पूरी सहमति है मैंने भी कई बार इन बातों को उठाया है. किन्तु कभी अधिक उग्रता से नहीं लिख पाया क्योंकि अन्य समाज यह गलतफहमी ना पाल लें की यह उनके विरुद्ध उठायी बात है. क्योंकि इसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार की है जो लगातार ६५ वर्षों से  समाजवाद के नाम पर हिन्दुओं पर बेइन्तहा जुल्म कर रही है, सिर्फ इस कारण की यह समाज वर्ग और जाति के नाम पर खंड खंड है. 

    chaatak के द्वारा
    September 2, 2012

    आदरणीय रक्तले जी, सादर अभिवादन, आपका लेखन हमेशा से ही हमें दिशा देता रहा है सही तरीका तो आपका ही है क्योंकि हमें भी पता है उग्रता चाहे विचारों में हो या कर्म में हमेशा अच्छी नहीं होती और वैसे भी लोग अक्सर बातों को गलत समझने के आदी हो चुके हैं| समाजवाद से बड़ा राजनीतिक परिहास मैंने आजतक नहीं सुना| साम्यवाद और समाजवाद उस मृगतृष्णा की भांति है जिसका ना तो वास्तविकता से कोई लेनादेना है और ना ही समाज से| ये तो हवा में लहरें दिखाकर वक्त से पहले व्यक्ति को आत्महत्या करने की और प्रेरित करने की कला है| आपकी प्रतिक्रया का हार्दिक धन्यवाद!

Chandan rai के द्वारा
September 2, 2012

चातक जी , एक बेहतरीन लेख के लिए हार्दिक अभिनन्दन स्वीकारे

    chaatak के द्वारा
    September 2, 2012

    स्नेही चन्दन जी, सादर अभिवादन, लेख पर आपकी राय का हार्दिक धन्यवाद!

bharodiya के द्वारा
September 1, 2012

चातकभाई नमस्कार —–मुसलमान स्वयं को मुसलमान कहे तो भाईचारा बढ़ता है; ईसाई खुद को ईसाई कहे तो राष्ट्र का सेकुलर तंत्र और मजबूत हो जाता है; लेकिन हिन्दू स्वयं को हिन्दू कहे तो सेकुलाराई की चूलें क्यों हिलने लगती है? क्या इसलिए तो नहीं कि– “हादसात ने ज़ुल्म इतने ढाए हैं, जुबाँ लरजती है हकीकत बयान करने से।।“—- लोगों के दिमाग का कबजा कर लिया गया है । अभी क्या क्या करवाया जायेगा देख लिजीयेगा ।

    chaatak के द्वारा
    September 2, 2012

    स्नेही भरोदिया जी, सादर अभिवादन, आपकी राय से पूरी तरह इत्तेफाक रखता हूँ यही सत्य है कि हिन्दुओं की आत्म-मंथन और आत्म सुधार-प्रथम की साधुवादी सोच ने इनकी राजनीतिक धार कुंद कर दी हैं| लगातार हो रहे राजनीतिक पराभव ने तुष्टिकरण के आगे राष्ट्रवाद जो कि वास्तव में भारत के लिए सिर्फ हिंदुत्व है को हाशिये पर धकेल दिया है अफजल गुरु से लेकर अजमल कसाब तक पर सरकारी रुख इस सत्य को बयान कर रहा है| प्रतिक्रया का हार्दिक धन्यवाद!

R K KHURANA के द्वारा
September 1, 2012

प्रिय चातक जी, बहुत हे सुंदर लेख ! व्यंग और सच के संगम के साथ अच्छा लेख ! राम कृष्ण खुराना

    chaatak के द्वारा
    September 2, 2012

    आदरणीय खुराना जी, सादर अभिवादन, आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

vasudev tripathi के द्वारा
August 31, 2012

चातक जी, संक्षेप में जिस प्रकार से आपने रस को सीधे और सरल शब्दों में प्रस्तुत किया है वह आपकी शैली की सराहना करने को सहज ही विवश करता है| आपदा और विपदकाल में आपने जो लिखा वह विश्व राजनीति का सत्य है| प्रत्येक देश अपने हितों के लिए आक्रामक होता है, भारत के सन्दर्भ में विपरीत है| संघ जैसे संगठन को बाढ़ जैसी स्थितियों में मैंने काम करते देखा है, वे उस समय जीतनी सेवाएं हिन्दू ग्रामों में देते हैं उतनी ही मुस्लिम ग्रामों में भी! तुष्टिकरण की राजनीति देश के लिए वास्तविक विष है…

    chaatak के द्वारा
    August 31, 2012

    स्नेही वासुदेव जी, सादर अभिवादन, आपकी प्रतिक्रिया पाकर हर्ष हुआ जहाँ पर भी हादसे हुए हैं या किसी प्रकार की प्राकृतिक विपदा आई है ये हिंदुत्ववादी संगठन केन्द्रीय भूमिका का निर्वहन करते हुए सेवा और सहायता करते नज़र आये हैं शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने हादसात के स्थलों पर पहुँचने का कष्ट उठाया हो और वहां पर इन संगठनों को कार्यरत न पाया हो एक बार सिर्फ इनकी सेवाओं को स्वयं देखने की जरूरत है इंसान की सोच बदल जायेगी उसे मानव-सेवा और राष्ट्रवाद का मतलब समझ आ जाएगा| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

    jlsingh के द्वारा
    September 2, 2012

    वासुदेव जी, और चातक जी, आप दोनों का हार्दिक अभिवादन! हम सबको अभी बहुत काम करने हैं. हिन्दुओं के बीच की दूरी, जैसे जातिवाद, छुआछूत, क्षेत्रवाद आदि को दूर भगाना है … विभिन्न हिन्दुनाम सस्थाओं को एक मंच पर लाना है तभी भारत में हिन्दुओं की रक्षा या भलाई हो सकेगी … प्रयास करते रहना है! आप दोनों को मेरी शुभकामना और समर्थन!

    chaatak के द्वारा
    September 2, 2012

    स्नेही जे.एल. सिंह जी, सादर अभिवादन, आपकी राय जानकर बहुत ख़ुशी हुई हम इसी तरह समग्र परिवर्तन की ओर बढ़ सकते हैं जबकि हम १ और १ जुड़ कर ११ और ११ और ११ जुड़ कर ११११ होते रहे| जहाँ तक बात जातिवाद, छुआछूत, क्षेत्रवाद आदि की है मैं आपकी बात से पूर्ण सहमत हूँ लेकिन ये घटक हमारी एकता में बाधक नहीं हैं| इनका राजनीतीकरण हमें बांटने में सहायक ही क्यों हो? हर सम्प्रदाय में ये घटक मौजूद हैं मुसलामानों में शिया, सुन्नी, अहमदिया, वहाबी और फिर आगे शैख़, सैय्यद, मुग़ल, पठान और बेहना इत्यादि; ईसाइयों में कैथोलिक, प्रोटेस्टेंट, काले और गोरे आदि मौजूद हैं जिनमे खासी आपसी रार पाई जाती है फिर भी सम्प्रदायवाद की राजनीति उनके साथ क्यों नहीं है| कारण स्पष्ट हैं कि बात जब राजनीतिक हित की आती है तो वे सारे एक साथ खड़े होते हैं जबकि हिन्दू सामाजिक रूप से तो एक दूसरे से अत्यंत निकटस्थ होते हैं परन्तु राजनीतिक हित के समय ये बँट जाते हैं| यानी हम उल्टा प्रयोग कर रहे हैं| प्रतिक्रिया द्वारा मार्गदर्शन का हार्दिक धन्यवाद!


topic of the week



latest from jagran