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इस्लाम मेरी जेब में!

Posted On: 21 Sep, 2011 Others में

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आश्चर्य! अद्भुत! पता नहीं मुझे आश्चर्यचकित होना भी चाहिए या नहीं! मोदी ने उपवास समाप्त किया| सद्भावना को व्यक्तिगत और राजनैतिक सीमाओं से जोड़ने का अद्भुत प्रयास किया और ऐसा करने में उनकी मंशा प्रधानमन्त्री बनने की महात्वाकांक्षा भी हो तो क्या फर्क पड़ता है! इस लोकतंत्र में एक कठपुतली तक को प्रधानमंत्री बनने की चाह होना भी गुनाह नहीं तो फिर मोदी सा पुरुषार्थी प्रधानमंत्री बने तो हर्ज ही क्या है?

मुझे एक बात और समझ में नहीं आती है कि ये मौलाना जी इस्लाम की इज्जत अपनी जेब में रखकर किस अधिकार से मोदी के मंच पर सरप्राइज़ गिफ्ट बन कर पहुँच गए? क्या वहां कोई मझाभी सम्मलेन चल रहा था? क्या मिंया जी का खुद का किरदार दागदार नहीं है कि वे एक गैर-इस्लामिक परन्तु धर्मपरायण हिन्दू को टोपी पहनाने की तिकड़म लगा रहे थे? मुझे तो लगता है टोपी ना स्वीकार करके जहाँ मोदी ने अपनी, अपने धर्म की और विभिन्नता में एकता वाले हिन्दुस्तान का मान रखा वहीँ मुल्ला जी ने इस्लाम को सिर्फ और सिर्फ एक सियासी हनक के लिए बेज्जत करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी|

जिस आदमी को इतना भी नहीं मालूम कि अपने धर्म को दूसरों पर थोपने से नहीं बल्कि अपने धर्म पर अडिग रहते हुए दूसरों के धर्मों का सम्मान करने से सद्भावना मजबूत होगी, उसे इस्लाम मानने वालो ने इस्लाम से बेदखल करने का फतवा जारी क्यों नहीं किया?
यदि मुल्ला ये कहते हैं कि उनका प्रयोजन धार्मिक नहीं था बल्कि वो एक आम आदमी की तरह मोदी से सद्भावना कायम करने गए थे तो भी उनका आचरण मर्यादित नहीं था| मुझे पूरा विश्वास है कि मोदी उस टोपी को पूरी श्रद्धा से पहनते यदि मौलाना ने प्रदेश के मुख्यमंत्री का चरण-स्पर्श करके उसकी पद-गरिमा व उसकी संस्कृति को वही सम्मान दिया होता जो वे अपने जेब में रखी टोपी के लिए चाहते थे|

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132 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
April 27, 2015

बहुत खूब सुन्दर आलेख काफी कुछ कहता हुआ बधाई कभी इधर भी पधारें

Hamza के द्वारा
November 13, 2011

“जात ना पूछो चातक की” २५ करोड से ज्यादा मुस्लिम… लगभग हर बड़े शहर में मस्जिद…. आमिर खान, शाहरुख खान… सलमान खान से लेकर तकरीबन फील्ड में मुस्लिमों का वजूद….अब क्या करें तुम्हारा…. ऐसे ही जलो सालों

    KRISHNA के द्वारा
    November 21, 2011

    सही कहा है हम्ज़ा जी आपने २५ करोड से ज्यादा मुस्लिम… लगभग हर बड़े शहर में मस्जिद…. आमिर खान, शाहरुख खान… सलमान खान से लेकर तकरीबन फील्ड में मुस्लिमों का वजूद……… मगर एक बात आप भूल गयी की उनको इस सम्मानित जगह पर लाने वाला राष्ट्र हिंदुस्तान ही है. यह हमेशा याद रखिये की हीरे की परख जोहरी को ही होती है स्वयं हीरे को इसका ज्ञान नहीं होता है. आपनें जिन महानुभावों के बारे में जिक्र किया है उनको उनकी पहचान हिन्दुस्तान ने दी है और हिन्दुस्तान का वजूद धरम सम्प्रदाय को ताक पर रखने वाले हिन्दुस्तानियों से ही है. मीडिया की टी आर पी दर्शकों से बढती है न की “चंद मुट्ठी भर लोगों” लोगों से. अगर दर्शक वर्ग यह बात ध्यान में रखे की वो हिन्दू या मुसलमान है तो उसी की फिल्मे देखेंगे तो यकीन मानिए इन कलाकारों का कोई वजूद ही नहीं होता और न ही नसीरुद्दीन शाह जैसा एक मंच का अभिनेता बॉलीवुड के दिग्गज अमिताभ बच्चन को टक्कर दे पाता मैं स्वयं फिल्मे बिना किसी भेद भाव के देखता हूँ सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन के लिए. साथ ही इस बात का ध्यान रखता हूँ की hamare samaj को इनसे क्या शिक्षा मिलती है. मगर शायद लोग धर्म जात के चक्कर में शिक्षा को ताक पर रख देते हैं. आपसे अनुरोध है के आपको भी जिसका गुनगान करना चाहिए उसकी तौहीन न करें.

malkeet singh "jeet" के द्वारा
October 2, 2011

“मोदी ने टोपी नहीं पहनी ” विवाद पैदा करने वालों से कोई पूछे क्या टोपी पहनाने वाले सौहार्द बनाये रखने के लिए बदले में मोदी के हांथो जनेऊ पहन सकते है ????????

    chaatak के द्वारा
    October 3, 2011

    स्नेही मलकीत सिंह जी, मुझे पूरा विश्वास है की आपके इस प्रश्न का जवाब किसी भी प्रुबुद्ध व्यक्ति के पास नहीं है| सौ बात की एक बात वाला सवाल पूछने का शुक्रिया!

    shashi kant agarwal के द्वारा
    October 6, 2011

    बिलकुल सही कहा आपने यदि वे तथाकथित सेकुलर पहले जनेऊ पहन कर दिखाये फिर  हम भी उनकी टोपी पहन कर घुमेंगें..

pramod chaubey के द्वारा
October 2, 2011

सारगर्भित लेख के लिए साधुवाद। अनुचित प्रतिक्रिया देने वालों से नाराज होने की जरूरत नहीं है। आगे बहुत कुछ करना है।  लोगों को आपसे बहुत अपेक्षाएं हैं…उनपर खरे उतरने की कोशिश सदैव करते रहें।  हमारी शुभकामनाएं।

    chaatak के द्वारा
    October 5, 2011

    स्नेही प्रमोद जी, उत्साहवर्धन और मार्गदर्शन का हार्दिक धन्यवाद. आप बंधुओं का स्नेह और मार्गदर्शन यूँ ही मिलता रहे मेरी कोशिश रहेगी कि सुधिजनो को निराश न होना पड़े! वन्देमातरम!

mukundchand के द्वारा
October 2, 2011

वे एक गैर-इस्लाठठमिक परन्तु धर्मपरायण हिन्दू को टोपी पहनाने की तिकड़म लगा रहे थे? मुझे तो लगता है टोपी ना स्वीकार करके जहाँ मोदी ने अपनी, अपने धर्म की और विभिन्नता में एकता वाले हिन्दुस्तान का मान रखा वहीँ मुल्ला जी ने इस्लाम को सिर्फ और सिर्फ एक सियासी हनक के लिए बेज्जत करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी|……………अफ़सोस लोग अपने मूल से भटक कर कहाँ कहाँ दुःख पा रहे हैं, सामने ही गंगा बह रही हैं और सदियां हो गयीं नहाये. अपने पुरखों का भी इतिहास जानते हैं और उन के ऊपर क्या जुल्म किये विदेशियों ने वह भी जानते हैं लेकिन कितना बड़ा आश्चर्य है की जिन्होंने जुल्म किया उन्ही को पूजते हैं. अशिक्षा, अज्ञानता का इससे बढ़ कर क्या उदाहरण होगा. मुझे मेरे भईयों की इस दारूण स्थिति को देख कर कष्ट होता है. नफरत की आग पहले अपना ही घर जलाती है, पाक पडोसी की हालत देखिये. पता नहीं कब भाई की वापसी होगी, पता नहीं कब ह्रदय मिलेंगे. रामराज्य में ही संभव है.

    chaatak के द्वारा
    October 5, 2011

    स्नेही श्री मुकुंद जी, सादर वन्देमातरम! कुछ लोग एक बार गलती करके सीख लेते हैं और महान कहलाते हैं और कुछ होते हैं जो बार-बार एक ही गलती करके भी नहीं सीख पाते उन्हें क्या कहते हैं बताने की जरूरत नहीं| मूल ही समूल गायब है पहचानेंगे कहाँ पिता का शौर्य धमनियों में बहता है तब इंसान के अन्दर सत्य और साहस का संचार होता है जिनकी धमनियों में नाजायज कायरता भरी हो उन्हें सत्य से आँखें मिलाने में भय तो लगेगा ही| आपकी चिंता बिलकुल सही है आशा है इसी के अन्दर से आशा प्रस्फुटित होगी! जय हो !

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
September 30, 2011

सटीक और सच कहा आप ने चातक भाई हमें दिखावा से परहेज करना चाहिए और केवल वोट के लिए ही नहीं मरना चाहिए इंसानियत के लिया जीना और मरना चाहिए …समाज को एक नयी दिशा और विकास देना चाहिए ….अपनी संस्कृति को याद करके मानवता सिखाना चाहिए लेकिन ऐसा लचीलापन और ढीलापन नहीं जिसका फायदा सब लेते मजा लेते रहे …. भ्रमर ५ जिस आदमी को इतना भी नहीं मालूम कि अपने धर्म को दूसरों पर थोपने से नहीं बल्कि अपने धर्म पर अडिग रहते हुए दूसरों के धर्मों का सम्मान करने से सद्भावना मजबूत होगी, उसे इस्लाम मानने वालो ने इस्लाम से बेदखल करने का फतवा जारी क्यों नहीं किया?

    chaatak के द्वारा
    October 5, 2011

    स्नेही बंधु भ्रमर जी, दिखावे में अपने आपको भुला कर सांस्कृतिक पतन की इस सीमा तक तो आ गए हैं जब हमारे अन्दर दहाड़ने का साहस कौन कहे सत्य को पहचानने तक में डर लगने लगा है| पतन की पराकाष्ठा और कितना नीचे गिराएगी पता नहीं| मेरा प्रश्न अभी भी वही है और यहाँ लोगों ने मुझे पूरी दुनिया घुमा डाली सिर्फ इस प्रश्न का जवाब नहीं दिया ”उसे इस्लाम मानने वालो ने इस्लाम से बेदखल करने का फतवा जारी क्यों नहीं किया?” और अब लगता है ये प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाएगा| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

Ramika Raghuvanshi के द्वारा
September 30, 2011

असल में मेरा बचपन सरस्वती शिशु मंदिर कि छत्रछाया में बीता तो कोई “कॉनवेंट नुमा” व्यक्ति मेरी जड़ो पर हमला करे मुझसे बर्दाश्त नहीं होता. क्या आप धर्मनिरपेक्ष हैं ? जरा फ़िर सोचिये और स्वयं के लिये इन प्रश्नों के उत्तर खोजिये….. १. विश्व में लगभग ५२ मुस्लिम देश हैं, एक मुस्लिम देश का नाम बताईये जो हज के लिये “सब्सिडी” देता हो ? २. एक मुस्लिम देश बताईये जहाँ हिन्दुओं के लिये विशेष कानून हैं, जैसे कि भारत में मुसलमानों के लिये हैं ? ३. किसी एक देश का नाम बताईये, जहाँ ८५% बहुसंख्यकों को “याचना” करनी पडती है, १५% अल्पसंख्यकों को संतुष्ट करने के लिये ? ४. एक मुस्लिम देश का नाम बताईये, जहाँ का राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री गैर-मुस्लिम हो ? ५. किसी “मुल्ला” या “मौलवी” का नाम बताईये, जिसने आतंकवादियों के खिलाफ़ फ़तवा जारी किया हो ? ६. महाराष्ट्र, बिहार, केरल जैसे हिन्दू बहुल राज्यों में मुस्लिम मुख्यमन्त्री हो चुके हैं, क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि मुस्लिम बहुल राज्य “कश्मीर” में कोई हिन्दू मुख्यमन्त्री हो सकता है ? ७. १९४७ में आजादी के दौरान पाकिस्तान में हिन्दू जनसंख्या 24% थी, अब वह घटकर 1% रह गई है, उसी समय तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब आज का अहसानफ़रामोश बांग्लादेश) में हिन्दू जनसंख्या 30% थी जो अब 7% से भी कम हो गई है । क्या हुआ गुमशुदा हिन्दुओं का ? क्या वहाँ (और यहाँ भी) हिन्दुओं के कोई मानवाधिकार हैं ? ८. जबकि इस दौरान भारत में मुस्लिम जनसंख्या 10.4% से बढकर 14.2% हो गई है, क्या वाकई हिन्दू कट्टरवादी हैं ? ९. यदि हिन्दू असहिष्णु हैं तो कैसे हमारे यहाँ मुस्लिम सडकों पर नमाज पढते रहते हैं, लाऊडस्पीकर पर दिन भर चिल्लाते रहते हैं कि “अल्लाह के सिवाय और कोई शक्ति नहीं है” ? १०. सोमनाथ मन्दिर के जीर्णोद्धार के लिये देश के पैसे का दुरुपयोग नहीं होना चाहिये ऐसा गाँधीजी ने कहा था, लेकिन 1948 में ही दिल्ली की मस्जिदों को सरकारी मदद से बनवाने के लिये उन्होंने नेहरू और पटेल पर दबाव बनाया, क्यों ? ११. कश्मीर, नागालैण्ड, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय आदि में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, क्या उन्हें कोई विशेष सुविधा मिलती है ? १२. हज करने के लिये सबसिडी मिलती है, जबकि मानसरोवर और अमरनाथ जाने पर टैक्स देना पड़ता है, क्यों ? १३. मदरसे और क्रिश्चियन स्कूल अपने-अपने स्कूलों में बाईबल और कुरान पढा सकते हैं, तो फ़िर सरस्वती शिशु मन्दिरों में और बाकी स्कूलों में गीता और रामायण क्यों नहीं पढाई जा सकती ? १४. गोधरा के बाद मीडिया में जो हंगामा बरपा, वैसा हंगामा कश्मीर के चार लाख हिन्दुओं की मौत और पलायन पर क्यों नहीं होता ? १५. क्या आप मानते हैं – संस्कृत सांप्रदायिक और उर्दू धर्मनिरपेक्ष, मन्दिर साम्प्रदायिक और मस्जिद धर्मनिरपेक्ष, तोगडिया राष्ट्रविरोधी और ईमाम देशभक्त, भाजपा सांप्रदायिक और मुस्लिम लीग धर्मनिरपेक्ष, हिन्दुस्तान कहना सांप्रदायिकता और इटली कहना धर्मनिरपेक्ष ? १६. अब्दुल रहमान अन्तुले को सिद्धिविनायक मन्दिर का ट्रस्टी बनाया गया था, क्या मुलायम सिंह को हजरत बल दरगाह का ट्रस्टी बनाया जा सकता है ? १७. एक मुस्लिम राष्ट्रपति, एक सिख प्रधानमन्त्री और एक ईसाई रक्षामन्त्री, क्या किसी और देश में यह सम्भव है, यह सिर्फ़ सम्भव है हिन्दुस्तान में क्योंकि हम हिन्दू हैं और हमें इस बात पर गर्व है, दिक्कत सिर्फ़ तभी होती है जब हिन्दू और हिन्दुत्व को साम्प्रदायिक कहा जाता है । १8.विश्व में कितने देश है जिनका हिन्दी, उर्दू और अँग्रेज़ी मे नाम हो?जैसे हमारे देश का हिन्दी नाम भारत, उर्दू नाम हिन्दुस्तान और अँग्रेज़ी नाम इंडिया है. 19.क्या विश्व के किसी भी मुस्लिम देश का कोई हिन्दी नाम है? 20. हिंदूओ को धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम या ईसाई बनाया जाताहै,क्या कभी हिंदूओ ने ऐसा किया है? 21.हिंदू धन का लालच देकर या जबरन किसी विधर्मी को हिंदू नहीं बनाते क्योकि या तो वो इतने धनवान नहीं या उन्हें अपने धर्म की चिंता नहीं (मिटता है तो मिट जाए) या तो वो कट्टर है जो किसी नीच को अपने धर्म मे शामिल नहीं करते. 22.भारत मे ८४% हिंदू हैं,फिर भी राजनैतिक पार्टियाँ “मुस्लिम वोट बैंक” के लिए क्यो मरी जाती हैं (यहाँ तक कि भा.ज.पा भी). 23.कॉंग्रेस सत्ता मे आकर देश के अहित में अपनी मनमानी,मुस्लिमो का लालन पालन करती है,तो भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता मे आने के बाद ८४% हिंदूओ के लिए क्या कर लिया,क्यो राम मंदिर का निर्माण नहीं करा पाई? 24.चाहे कॉंग्रेस जैसी भी हो देश पर पनौती (राहुल गाँधी) थोपने पर सभी एकमत हैं,पर क्या नीतीश कुमार,आडवाणी आदि के चलते नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो पाएँगे? 25.क्या हिंदूओमें इतनी बुद्धि और हिम्मत हैं की मुसलमानों की नफ़रत के बावजूद मोदी को प्रधानमंत्री बना पाए. ये प्रश्न मेरे लिए सिरदर्द हैं कृपया उत्तर देकर समाधान करें,व मुझे इतना सक्षम बनाए की पूरे विश्वास के साथ,बिना किसी संशय के मैं अपने लोगो की सोच देशहित व जनहित में बदल पाऊँ.

    Lahar के द्वारा
    September 30, 2011

    सच कहा आपने इन प्रश्नों के उत्तर तो भारत सरकार भी नहीं दे सकती |

    चन्द्र पाल के द्वारा
    October 1, 2011

    हिन्दु समाज एक असंगठित समाज है। एक ऐसा समाज जो घोर सद्गुण विकृतियों का शिकार है  (जैसे क्षमाशील होना सद्गुण है, किन्तु एक दुष्ट स्वभाव वाले मनुष्य को क्षमा दान की बात करना  सद्गुण विकृति, सच बोलना सद्गुण है पर जो सच बोलने से अनर्थ हो जाए ऐसा सच बोलने पर  दृढ़ रहना विकृति है, शुचिता सद्गुण है, किन्तु शुचिता के नाम पर अस्पृश्यता को बढ़ावा देना सद्गुण विकृति )।  हिन्दुओं की दयनीय दशा का कारण हिन्दु स्वयं हैं। फ्रांस का राष्ट्रपति भारत के इसाईयों के संरक्षण  के लिए दबाव बना सकता है। पर हिन्दु समाज अपने नेताओं तक को गलत चुनता है (गांधी-नेहरू जैसे)।  ऐसा समाज किसी चमत्कार से ही आने वाली दो शताब्दियों तक बचा रह सकता है। इस समस्त  समाज को बहुत शीघ्र मोक्ष मिलने वाला है जिसके पीछे यह पड़ा रहता है।

    chaatak के द्वारा
    October 5, 2011

    स्नेही रघुवंशी जी, इन प्रश्नों का उत्तर देना किसी के वश की बात नहीं जबकि हकीकत है कि उत्तर सबके पास है बोलने की हिम्मत नहीं ”हिन्दुओं में जयचंदों और विभीषनो की संख्या इतनी अधिक रही है कि धर्म के लिए उत्सर्ग करना इनके वश की बात नहीं ये सिर्फ नष्ट होना और मन, वाणी और कर्म से विश्वासघात करके अपने ही बंधुओं और धर्म के पतन का कारण बन सकते हैं और उसी का परिणाम है कि ये कभी पूरे एशिया में थे और अब हिन्दुस्तान में भी इन्हें अपने अस्तित्व से जूझना पड़ सकता है| चर्चा में हिस्सा लेकर इसे आगे बढाने और एक और दृष्टि प्रदान करने का शुक्रिया!

    chaatak के द्वारा
    October 5, 2011

    स्नेही चन्द्र पाल जी, सादर अभिवादन, सही कहा आपने किसी भी कौम के पतन का कारन उसमे व्याप्त बुराइयां ही होती हैं, परन्तु कुछ और कारक भी साथ में काम करते हैं मेरा प्रयास है कि नए ब्लोग्स में कुछ चर्चा उन बिन्दुओं पर भी की जाय| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

    krishna के द्वारा
    October 5, 2011

    ऐसा तो सिर्फ हिन्दुस्तान में ही संभव हो सकता है पर शायद किसी गैर हिन्दुस्तानी देश में कभी भी नहीं. ये सवाल तो सच में हिंदुस्तान के माथे पर प्रश्न चिन्ह के ही सामान हैं…….. हे राम……. कितन कठिन सवाल कर दिया आपने……. हज करने के लिये सबसिडी मिलती है, जबकि मानसरोवर और अमरनाथ जाने पर टैक्स देना पड़ता है… धन्य है हिंद और धन्य हैं भारत के वो सपूत….. जिन्होंने समानता लाने वाले देश में रहने वालो को ही समानता की दौड़ से बाहर कर दिया…. जय हिंद जय भारत…..

    rajesh kumar के द्वारा
    October 5, 2011

    आर एस एस के स्कूल से शिक्षा लेने के बाद…आप जैसे लोग ऐसे ही प्रश्न उठाते हैं… सरस्वती शिशु मंदिर में मुसलमनों के बारे में क्या पढ़ाया जाता है जरा ये भी लोगों  को बताइये

    chaatak के द्वारा
    October 5, 2011

    राजेश जी, आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर ऐसा लगा जैसे आपने बिना सोचे समझे राहुल बाबा (भगवान जाने ये बड़ा होगा भी या सिर्फ बाबा ही बना रहेगा!) की तरह वाली बचकानी बात कह दी| हो सकता है रघुवंशी जी इस ब्लॉग को दोबारा पढ़ें ही न और आपको आपके प्रश्न का उत्तर न मिले इसलिए मैं बता दूं कि आप किसी भ्रम का शिकार हैं सरस्वती शिशु मंदिर में ऐसा कुछ चाह कर भी नहीं पढ़ाया जा सकता है क्योंकि वह सिर्फ दर्जा पांच तक के बच्चों के लिए होता है और अब आते हैं आपके संदेह पर सरस्वती विद्या मंदिर (जो कि दर्जा छः से लेकर दर्जा बारह तक होता है) में सिर्फ शासन द्वारा निर्धारित पुस्तकें ही पढ़ाई जाती हैं और इन दोनों विद्यालयों में कभी जाकर देखिये यहाँ हिन्दुओं के साथ मुसलमान एवं अन्य धर्म के छात्र भी पढ़ते हैं| अच्छा होता कि आप आर.एस.एस. द्वारा संचालित विद्यालयों और मदरसों में दी जाने वाली शिक्षा का तुलनात्मक विश्लेषण देते आपको अपने सभी सवालों का जवाब मिल जाता| आशा है आप आगे से किसी भी उत्कृष्ट शिक्षा के मंदिर पर राहुल बाबा की तरह लांक्षन लगाने की भूल नहीं करेंगे| मान्यता है कि वाग्देवी पर झूठ बोलने से वो मति हर लेती हैं राहुल बाबा साक्षात उदाहरण है गलत बयानी करने के बाद मट्टी पलीद हो चुकी है सिर्फ उन्ही की नहीं पूरी कांग्रेस और खुद सोनिया की| सुना है ”लागा चुनरी मा दाग” छुड़ाने के लिए सर्ज़री करवानी पड़ी वो भी ऐसी की बताते नहीं बन रहा कि काटा कहाँ गया और क्यों| यदि संस्था के बारे में कोई संशय है तो आप मेरे शहर में आ जाइए और जिस विद्यालय में कहिये आपके रहने और यदि कर सकते हों तो अध्यापन करें तक की पूरी व्यवस्था करवा दूं और बिलकुल निकट से देख भी लीजिये और सुन भी लीजिये कि क्या पढ़ते हैं और क्या पढ़ाते हैं|

    shashi kant agarwal के द्वारा
    October 6, 2011

    आपके सवालो के जवाब किसी के पास नहीं है क्योकि यह वह भारत है जहां इटली का शासन चलता है और हम मुर्ख उसे सहन करते है  क्या करे हम सहिष्णु जो ठहरे. 

    shailesh001 के द्वारा
    February 29, 2012

    मित्रों दुख के साथ कहता हूं कि इस्लाम तो एक धर्म भले होगा, पर अभी हिन्दुत्व की लाश हमारे साथ है।

RK Sinha के द्वारा
September 29, 2011

मैं कृष्ण जी के कमेंट से सहमत हूँ ! हर किसी को अपनी मान्यताओ के अनुसार प्रार्थना करने का हक़ होना चाहिए, मैं भी उनकी ही तरह खाड़ी के एक देश मे करीब 20 साल से काम कर रहा हूँ और मैंने कभी भी मुस्लिम समाज को अपनी पुजा मे बाधक नहीं पाया, मैं ही नहीं बल्कि लाखो हिन्दू जो खाड़ी देशो मे है , सुख और शांति पूर्वक अपना जीवन बिता रहे है, मेरा मानना है की हमारा हिन्दी मीडिया का एक वर्ग मुस्लिम समाज से दुराग्रह रखता है , आप देखे उनके गलत कामो को हमेशा उनके धर्म से जोड़ दिया जाता है ! भारत मे कोई घटना हो अब उसके तार खाड़ी देशो से जोड़ने का नया फंडा निकाला जा रहा है ! परंतु एलटीटीई के लोग जो ब्रिटेन मे या सिख अलगाव वादी जो कनाडा मे है इन देशो को कभी निशाने पर नहीं लिया जाता है , इस ही तरह स्वयं इस मंच पर “हर मुसलमान हत्यारा है” जैसे लेख लिखे गए और लोकप्रिए हुए ! मेरा कहना है की इस समाज मे घुल कर तो देखिये यह इतने बुरे नहीं है जितना मीडिया इनको या इनके धर्म को बताता है !

    chaatak के द्वारा
    September 29, 2011

    स्नेही श्री सिन्हा जी, आपके और कृष्ण जी के कम्नेट में लगभग विपरीत भाव लिखे हैं (कुछेक सार्वभौम जुमलों को छोड़कर)| इस बात को इंसानियत के आधार पर भी सही कहा जायेगा कि सभी को अपनी मान्यताओं के अनुसार प्रार्थना करने का हक़ है| रही आपकी खाड़ी में काम करने की बात तो आप वहां के नागरिक नहीं हैं लिहाजा आपका वहां के वासियों के साथ कोई दुराव होने का मतलब आ बैल मुझे मार वाली बात होगी| आपकी एक बात पर मुझे ऐतराज है ”हिंदी मीडिया मुस्लिम समाज से दुराग्रह रखता है|” ये पूर्वाग्रह से ग्रसित बात है और हमारी उस भाषा पर कलंक लगाने जैसी बात है जो आप जैसे जहीन व्यक्ति को शोभा नहीं देती मीडिया की बात समग्र में भी करते तो बात समझ में आती आपने तो हिंदी मीडिया को ही कमुनल घोषित करने की बात कही है जो वैसा ही हास्यास्पद है जैसे राहुल और उनके चमचों को भगवा आतंकवाद दिखाई देता है क्या रंगीन आतंकवाद पैदा किया है माइनो के वंशजों ने! मुसलमानों के गलत कामों को इस्लाम के साथ न हिंदी जोडती है, न हिन्दू और न हिन्दुस्तान बल्कि इस्लाम का नाम लेकर सारे गलत काम ये स्वयं करते हैं| सबसे नई जानकारी के लिए अजमल कसाब और अफजल गुरु के बयानों का अध्ययन करें| आपने जिस पोस्ट का जिक्र किया है उसकी एक पंक्ति को प्रस्तुत क्यों कर रहे हैं? मैं तुलसीदास जी की लिखी एक पंक्ति लिखता हूँ यदि अर्थ एक पंक्ति से निकाल दीजिये तो अभी इस्लाम क़ुबूल कर लूं- “मीन मरै गहिरे जल मा,” क्या हुआ? है न असंभव! आपने भी यही किया है| शायद जल्दबाजी में आपने पूरी बात न पढ़ी हो मैं लिख देता हूँ और आप ही अर्थ बताइयेगा- ”जब तक आदर्श लुटेरे हैं,जब तक जेहादी प्यारा है| इसमें कोई शक नहीं यहाँ हर मुसलमान हत्यारा है|” मीडिया कभी भी किसी धर्म को बुरा नहीं बता सकता और यदि बताया है तो कृपया वह उदाहरण साक्ष्य समेत पेश करें क्योकि आपके इस तरह मीडिया के मुस्लिम विरोधी होने का दावा करना भ्रम उत्पन्न कर रहा है| मेरे ख्याल से मंच पर जितने भी प्रबुद्ध ब्लोगर हैं वे आपके इस दावे की हकीकत जरूर जानना चाहेंगे| खाड़ी देशों के बारे में जो आपने बताया है वह जानकारी भी अधूरी है और मुझे पूरा विश्वास है कि मैं अगर जानकारी को पूरा करूँगा तो आपको बुरा लग सकता है जो कि मैं बिलकुल नहीं चाहता| आपकी टिप्पड़ी के लिए अपनी राय को प्रकट करने के लिए हार्दिक धन्यवाद!

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 30, 2011

    he estimated figures for the Hindu population in several Arab countries is as follows. Saudi Arabia 500,000 United Arab Emirates 450,000 Oman 300,000 Kuwait 200,000 Bahrain 100,000 Qatar 90,000 Yemen 6,000  Total: 2.7 million The number of Hindus in other Arab countries, including the countries of the Levant and North Africa, is thought to be negligible, though Libya has an Indian community of about 10,000 [2] individuals, many of whom are likely to be Hindu. It is not known whether any Hindu temples exist in these countries. Historically, links between Arabia and the western coast of India have been strong and persistent. Arab sailors were using the southwest monsoon winds to trade with western Indian ports before the first century CE. An Arab army conquered Sindh in 711. Arab traders settled in Kerala in the 8th century, becoming the ancestors of the Mappilas. In the opposite direction, medieval Gujaratis and other Indians traded extensively with Arab and Somali ports, including Ormuz, Socotra, Mogadishu, Merca, Barawa, Hobyo and Aden. Arab merchants were the dominant carriers of Indian Ocean trade until the Portuguese forcibly supplanted them at the end of the 15th century. Indo-Arabian links were renewed under the British Empire, when many Indians serving in the army or civil service were stationed in Arab lands such as Sudan. The current wave of Indian immigration to the Arab states of the Persian Gulf dates roughly to the 1960s. Hinduism in Oman Oman has a immigrant Hindu minority. The number of Hindus has declined in the 20th century although it is now stable. Hinduism first came to Muscat in 1507 from Sindh. The original Hindus spokeKutchi language. By early 19th century there were at least 4,000 Hindus in Oman, all of the intermediate merchant caste. By 1900, there numbers had plummeted to 300. In 1895 the Hindu colony in Muscat came under attack by the Ibadhis. By the time of independence, only a few dozen Hindus remained in Oman. The historical Hindu Quarters of al-Waljat and al-Banyan are no longer occupied by Hindus. Hindu temples once located in Ma’bad al Banyan and Bayt al Pir, no longer exist; the only active Hindu temples today are the Muthi Shwar temple located in Al-Hawshin Muscat, the Shivatemple located in Muttrah, and the Krishna temple located in Darsait. The only Hindu crematorium is located in Sohar, northwest of Muscat. The most prominent immigrant Hindus (Kutchi), are Khimji Ramdas, Dhanji Morarji, Ratansi Purushottam and Purushottam Toprani. source…wikipedia भैया सिन्हा जी खाड़ी की इससे अधिक जानकारी मैं नहीं जुटा पाया अखेद है|प्रार्थना और इबादत में थोडा सा अंतर है, खैर भैंस और गाय दूर से एक ही जैसे लगते हैं|शेखों की बकरी चराना निहायत ही बड़ा काम होता है, इससे मुझे कोई भी ऐतराज नहीं|मंदिर होगा तब न पूजा करेंगे जनाब?वैसे आँख और नाक बंद करके भी कुछेक साधनाएं की जाती है|आमतौर पर खतरा सामने देख कर आँखों का बंद हो जाना लाजिमी भी है, जब की आप उसका मुकाबला ही नहीं कर सकते|वहां झटका तो मिलता नहीं होगा, कभी कभी डिब्बा बंद बीफ भी मिल जाती होगी..मैंने तो कभी चखा नहीं, शायद लाजवाब हो?वैसे जीतनी सुख शान्ति अपना मुल्क छोड़कर रुपया कमाने में है वैसी शांति हिमालय की ख़ाक छानने में थोड़े ही होगी?अब भैया आग्रह होगा तो दुराग्रह होगा ही, वैसे सत्याग्रह की मार्केटिंग में भी काफी पैसा है|छद्म हिन्दू नामों से अंग्रेजी वाले भी खुबई लिखा करते हैं…अब तो हिंदी में भी मक्काती खूब चलता है|धर्म से तो जोड़ा ही नहीं गया, इसी बात का तो दुःख है जनाब|शायद आप मजहब की बात कर रहे हैं?तार काहे पाइप लाइन जोड़ेंगे, पाकिस्तान जोड़ने दे तब न…सुना है इरान तक पहुँच गया है|एलटीटीइ अबहूँ जिन्दा है का हो?और बब्बर तो यार पाकिस्तान से मदद पाता था न|मुझे लगता है फिर से हिस्ट्री पढनी पड़ेगी| “हर मुसलमान हत्यारा है” इ लोकप्रिय हो गया क्या गुरु?अमा मुझे तो पहली बार पता चलीस है|अब कितना घुलूँगा यार चमड़ी उधर गयी…कमरी उतर गयी|खैर, और घुल के देखता हूँ|एक गो मथानी लेते आइयेगा|

    Santosh Kumar के द्वारा
    September 30, 2011

    आदरणीय चातक जी ,.सादर नमस्कार इन भाई साहब का जबरदस्ती समर्थन जुटाने की कोशिश ही इनकी सच्चाई को स्पष्ट कर रही है ,..

    Manoj Kumar Sharma के द्वारा
    October 4, 2011

    सिन्हा जी, कौन से कड़ी देश में हैं? पूजा करने पर वापस भेज दिया जाता है. सामान में अगर मूर्ति हो तो कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है. मैं भी एक कड़ी देश में हूँ, परन्तु पूजा करने की स्वतंत्रता नहीं है. मुझे इस बार राखी नहीं मिल सकी. क्योंकि उस पर गणेश जी बने थे. मैं मुसलामानों का विरोधी तो नहीं हूँ पर जो आपने लिखा है असलियत से परे है. UAE बहरीन, ओमान में ही आप पूजा कर सकते हैं वो भी सीमित मात्रा में. क्या सउदी अरब, कुवैत, इरान, क़तर, मिस्र आदि देशों में आप पूजा कर सकते है? जवाब का इन्तजार है. भ्रामक बातें न फैलाएं. इस्लाम तलवार के जोर पर स्थापित हुआ है. तैमुर और चंगेज खान का नाम आप जानते ही होंगे.

    RK Sinha के द्वारा
    October 4, 2011

    मित्र मनोज ,,अगर आप को खाड़ी देश मे इतनी समस्या है तो मेरी राय मे आप तुरंत वह जगह छोड़ दे, आप का वहाँ रहना इस बात का सुबूत है की आप वहा पर कुछ पा ही रहे है खो नहीं रहे है ! तो महाशय भ्रम आप फैला रहे है मैं नहीं !! मैं खाड़ी के लगभग हर देश मे गया हूँ, भारत से आने वाली उड़ाने हमेशा भरी ही रहती है और आने वालों मे ज़्यादा तर हमारे हिन्दू भाई ही होते है !

    chaatak के द्वारा
    October 5, 2011

    स्नेही मनोज जी, आपके द्वारा दी गई जानकारी शायद यहाँ किसी के लिए भी नई नहीं है| बर्बरता के उदाहरण ढूँढने भी नहीं पड़ते इतिहास चीख-चीख कर गवाही देता है लेकिन कुछ लोग हकीकत का सामना करना ही नहीं चाहते| मुझे अनायास ही एक पंक्ति याद आ गयी- दम नहीं आवाज में या कान बहरे हो गए, क्यों हमारी बात का उनपर असर होता नहीं! प्रतिक्रिया द्वारा स्थिति को स्पस्ट करने के लिए हार्दिक धन्यवाद!

    chaatak के द्वारा
    October 5, 2011

    स्नेही सिन्हा जी, सादर अभिवादन, सही कहा है आपने खाड़ी देशों में आप कुछ तो पा रहे हैं तभी वहां है मनोज जी ने अभी तक जवाब नहीं दिया है लेकिन मैं कुछ कहना चाहूंगा- ”मनोज जी खाड़ी देश में रोजी रोटी की तलाश में गए हैं और उन्हें वह उन्हें वहां मिला है इसलिए वे वहां पर रह रहे होंगे| लेकिन जब धार्मिक आस्था की बात आती होगी तो भावनाएं जरूर आहत होती होंगी हर व्यक्ति अपनी आत्मा को मार कर नहीं रह सकता इसलिए उन्होंने यहाँ पर अपनी आस्था पर लगने वाली चोट का जिक्र किया और आप एक तरफ तो हिन्दू भाई कहते हैं और दूसरी तरफ एक हिन्दू की आस्था पर लगी चोट आपको दिखाई नहीं देती क्यों? यदि इस्लामिक राष्ट्र इतने ही उदारवादी हैं जितना आप कहते हैं तो क्या वो राखी उन तक नहीं पहुंचनी चाहिए? या फिर आप ये कहना चाहते हैं वे झूठ बोल रहे हैं| आपसे एक उचित प्रतिक्रिया की आशा थी आपने निराश किया रह गई बात खाड़ी देशों की तो हममे से कोई भी वहां की दशा से और वहां पर दुसरे धर्मों के साथ हो रहे व्यवहार से अनजान नहीं| आपकी प्रतिक्रिया ने थोडा विचलित जरूर किया परन्तु आपसे कुछ और सीखने को मिला इसके लिए आपका धन्यवाद!

    RK Sinha के द्वारा
    October 5, 2011

    स्नेही चातक जी और मनोज जी, यदि मेरी बातों से आपको ठेस पहुची तो मुझे दुख है मेरे कहने का मतलब यह था की मुस्लिम समाज इतना बुरा नहीं है जितना उसको पेश किया जाता है, इस समाज मे भी वही बुराइया है जो विश्व के अन्य धर्म के मानने वालों मे, यदि आप आतंकवाद को ही ले ले तो इसकी जड़ जो पाक और अफगान मे है उसका कारण कोई और नहीं खुद पश्चिमी देश है जिन्हों ने रूस को तोड़ने के लिए आतंक के अड्डे बनाए और इनको मुजाहिदीन का नाम दिया, अब इंका लगाया हुआ यह पौधा इस कदर बढ़ गया की इनके लिए ही मुसीबत बन गया तो इनको बुरा लगने लगा और कल के मुजाहिद आज के आतंकवादी हो गए ! अब भारत पर आते है, मुझे याद है 9/11 से पहले जब भी भारत ने यह मुद्दा उठाया अमेरिका ने भारत को दर किनार करके पाकिस्तान का साथ दिया अब जब अपने बनाए दलदल मे खुद फंसे तो पूरी दुनिया को अपना साथ देने पर मजबूर किया ! इन सारी बातो और घटनाओ मे मुस्लिम धर्म कही नहीं शामिल था ! जहां तक भारत की बात है और आपके कमेंट “हर मुसलमान हत्यारा है” या ऐसे अन्य लेखो की बात है जिसमे भारत की हर समस्या के लिए मुस्लिम समाज को कोसते है यहाँ तक की बाबा रामदेव के आंदोलन पर लाठी चार्ज को भी तो साहब इस तरह की बातो और लेखो से हिन्दू समाज का भला होने वाला नहीं है, भारत सरकार मे और सरकारी कर्मचारियो मे 90% हिन्दू समाज के ही लोग है तो वह हिन्दू विरोधी कैसे हो सकते है ? सरकार पर आप आरोप लगा सकते है लेकिन सरकारी अधिकारी और कर्मचारी पर तो नहीं ! अब जो 90% लोग देश की नीतिया बनाते है और भ्रष्टाचार मे बुरी तरह शामिल है और देश को लूट रहे है क्या इनके ऊपर कोई कविता “हर हिन्दू भ्रष्टाचारी है” लिखने को उचित कहा जा सकता है, नहीं, जबकि भ्रष्टाचार आतंकवाद से ज़्यादा नुकसान देश को पाहुचा रहा है ! आप देखे के छोटे छोटे देश आज बिजली पानी पे आत्मनिर्भर हो गए है लेकिन हम कहाँ जा रहे है यदि आप का संबंध यूपी या बिहार से है तो आप इससे भली भाति परिचित होंगे, नेता और सरकारी लोग सिर्फ और सिर्फ लूटने पर लगे है, फिर इससे निकले तो जाती वाद की जड़े अभी भी हमारे समाज मे मौजूद है ! मेरा मानना यह है की हिन्दू समाज और देश का भला तब हो ग जब हम पहले खुद सही हों अपने अंदर व्याप्त बुराइयो को दूर करे, फिर इधर उधर देखे ! खाड़ी देशो मे बहुत कामिया है परंतु यदि हमे अपने देश रोजगार मिलता तो यहाँ क्यो आते, हमारी प्रतिभाए तो आरक्षण, सिफारिश और रिश्वत की भेट हो जाती है तो अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए सब कुछ सहना पड़ता है, आप तो कवि और विद्वान है दो पंक्तीय आप को समर्पित करता हूँ ! तर्के वतन युही करता नहीं कोई परदेश मे न पूछिये किस दिल से आए है

    RK Sinha के द्वारा
    October 5, 2011

    ** संशोधन तर्के वतन खुशी से तो करता नहीं कोई परदेश मे न पूछिये किस दिल से आए है आशा करता हूँ की आप मेरी भावनाओ को सही अर्थो मे समझेगे

    chaatak के द्वारा
    October 5, 2011

    स्नेही श्री सिन्हा जी, सादर अभिवादन, आपकी किसी भी बात से हमें कष्ट नहीं हुआ है और आपको यदि हमारी भाषा थोड़ी भी कठोर लगी हो तो ऐसा इसलिए होगा कि हमारे पास कुछ बातों को कहने के लिए कभी कभी सीमित शब्द ही होते है और वे अक्सर कठोर होने का भ्रम कराते हैं बुरी सिर्फ एक बात लगी और वह मैंने स्पष्ट बता भी दिया कि आपने मनोज जी का दर्द नहीं समझा कि उन्हें अपनी बहन की राखी नहीं मिली| लेकिन अब आपकी ये दो पंक्तियाँ बहुत अच्छी तरह से बता रही हैं कि हकीकत क्या है अंततः आपने भी लिखा यही ”हमारी प्रतिभाए तो आरक्षण, सिफारिश और रिश्वत की भेट हो जाती है तो अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए सब कुछ सहना पड़ता है,” मैं स्वयं यू.पी से हूँ और कई अन्य मित्र बिहार से हैं और आपकी बताई समस्याएं भी सही है लेकिन कोई एक देश ऐसा बताएं जहां ये समस्याएं नही है? समस्याएं अपनी जगह है और अन्य सामाजिक व् धार्मिक कर्त्तव्य अपनी जगह हम एक की आड़ में दूसरे को नजरअंदाज करते रहे है और परिणाम सामने है (न माया मिली न राम) मेरे कहने का मतलब ये नहीं कि सभी लोग अपनी रोजी रोटी और परिवार छोड़ दें ऐसा तो तब भी नहीं था जब आजादी की लड़ाई चल रही थी लेकिन हम कम से कम सत्याग्रह करने वाले लोगों को अच्छी नज़र से देखते तो थे और आजादी पाने में उस नज़र का योगदान ही सबसे ज्यादा था आज भी कुछ ऐसा ही है जो सत्य का आग्रह करे कम से कम एक बार उसे समझने की कोशिश तो करनी ही चाहिए| आपको एक और गलत जानकारी दी गई है बाबा रामदेव एक आन्दोलन का बर्बर दमन मुसलमानों से कभी जोड़ा ही नहीं गया और न ही किसी ने ऐसी कोई अनर्गल बात कही है आप किसी एक साक्षात्कार या खबर का प्रमाण नहीं पायेंगे मुझे समाज नहीं आता ये अफवाह आपको मिली कहाँ से कृपया सूत्र का हवाला जरूर दें मुझे जानकारी नहीं है लेकिन पूरी विनम्रता के साथ जानना चाहूंगा और यदि हिन्दू समाज ने ये किया है तो ”हिन्दू कायर अपराधी है” इस बार मयंक जी नहीं मैं लिखूंगा| लेकिन यह सिर्फ अफवाह है और आपके पास कोई प्रमाण नहीं तो सिर्फ एक पंक्ति में सही लेकिन ”कोई प्रमाण नहीं मिल सका” जरूर लिखियेगा| आपकी टिप्पड़ियों का हमेशा स्वागत है|

    RK Sinha के द्वारा
    October 6, 2011

    चातक जी, आपने मेरे कमेंट को सही अर्थो मे समझा ! हिन्दू समाज का ना तो कोई बैर है और ना ही हिन्दू समाज का अभी इनता पतन हुआ है ! मेरे एक मित्र ने शिशु मंदिर मे बारे मे जो लिखे है तो आप को बता दूँ की मैं मे शिशु मंदिर और आरएसएस के स्कूल मे पढ़ा हु और स्वामी विवेकानंद मेरे आदर्श है मेरे स्कूल मे कई मुस्लिम छात्र थे और हम सब साथ रहते थे कई खेलो और वाद विवाद प्रतियोगताओ मे यह मुस्लिम छात्र स्कूल का प्रतिनिधित्व करते थे और स्कूल के प्रबंधन से इनको हमेशा प्रोत्साहन और पुरुस्कार मिलता था, इशी तरह बिहार मे कुछ मदरसे है जहां हिन्दू छात्र भी पढ़ते है ! इशी तरह एक ने लिखे है की एक मोलवी का नाम बताए जिसने आतनवाद के वीरुध फतवा दिया हो तो आप को तो मालूम होगा की एक बार नहीं कई बार बड़ी बड़ी कॉन्फ्रेंस हुयी है मुस्लिम धर्म गुरुओ की और आतंकवाद को ग़ैर इस्लामिक करार दिया गया है और ऐसे लोगों के इस्लाम से खारिज कर दिया गया है यहाँ तक की दफन तक न करने को कहा गया है ! अब तो इंटरनेट का ज़माना है चाहे तो सर्च करले ! मैंने कई ब्लॉग और कमेंट देखे है जहां यह लिखा गया है की बाबा रामदेव पर बार्बर अत्याचार सिर्फ मुसलमानो को खुश करने के लिए किया गया है जो मेरे खयाल से एकदम गलत है ! अब मयंक जी की बात तो उनकी रचनाए अत्यंत उच्च कोटी की होती है परंतु मुस्लिम समाज के प्रति उनका कठोर नज़रिया मेरे गले नहीं उतरता है, यदि आप की उनसे मित्रता है तो मेरा यह शेर उनको पाहुचा दे ! यह मसाएले तजस्सुस यह तेरा बयान ग़ालिब (मयंक) तुझे हम वली समझते जो न बादखार (मुस्लिम विरोधी) होता अब इस बहस को समाप्त करता हूँ और आपके अगले लेख का इंतज़ार

avanzalove के द्वारा
September 27, 2011

मुझे ऐसा लगता है की आपको खुद के महान लेखक होने की ग़लतफहमी हो गयी है…. पर सच्चाई यह है की आप जैसे कई कलम घसियारे हैं मुल्क में जो बुनियादी समझ के बावजूद लिखते हैं रहते हैं… गोया की बन्दर के हाथ उस्तरा लग गया है, जहा तक मेरे भयभीत होने की बात है तो मैंने सिर्फ अपना विचार व्यक्त किया था, एक शालीन बहस हर विषय पर हो सकती है.. बहरहाल पर आपके तेवर भी मोदी की तरह मध्ययुगीन बर्बरता लिए हुए मालूम होते हैं… जिस तरह मोदी को अपनी धार्मिक भावनाओं की रक्षा करने की स्वतन्त्रता है जो उन्होंने टोपी नहीं पहन कर की है उसी तरह वंदे मातरम नहीं कहकर (मतलब मात्र भूमि की वंदना/इबादत करना) किसी वर्ग द्वारा अपने ईमान की रक्षा करना भी गलत नहीं… और वंदे मातरम कहकर कई लोग इस देश को घुन की तरह खाने में लगे हैं सिर्फ किसी कोरी शपथ या छद्म राष्ट्रीयता के प्रदर्शन से कुछ हासिल नहीं हो सकता

    chaatak के द्वारा
    September 27, 2011

    आप कितने बड़े कायर हैं वह आपके हर शब्द से झलक रहा है और बन्दर जैसी हरकत भी दिखाई दे रही है क्यों नाहक उछलकूद मचा रहे हैं? शालीन बहस की मंशा या फिर कूबत आपके पास होती तो आपकी इस तरह की उछलकूद के बजाय आपका एक ब्लॉग होता जिस पर बाकायदा आपकी पहचान और कुछ नहीं तो आपकी माहान कलम के कुछ छींटे जरूर होते, डरिये मत सामने आने की हिम्मत करिए फिर आपको ये भी पता चल जाएगा की मातृभूमि की इबादत न करने से ईमान की रक्षा नहीं होती बल्कि मातृभूमि के गद्दार पैदा होते हैं| और हाँ एक और जरूरी बात आप बन्दर भी हैं तो मेरे ब्लॉग पर तमीज से दायरे से बाहर निकलने की कोशिश दोबारा मत करना क्योंकि मैं एक ही बार माफ़ करता हूँ दूसरी बार बोलने लायक नहीं छोड़ता| क्षद्म राष्ट्रीयता यतो नेताओं का आवरण होता है या फिर आप जैसे लोगों के लिए जिनके लिए मातृवंदना ईमान के आड़े आती है जिनका नाम और काम दोनों क्षद्म हैं हम जैसे लोगों के लिए नहीं जिनका नाम भी असली फोटो भी और राष्ट्रीयता भी| पहले कथनी और करनी का फर्क हटाओ फिर गाल बजाने आना कलम की मर्यादा समझना आपके वश की बात नहीं| कम कहे को ज्यादा समझना और चिट्ठी को तार| वन्देमातरम!

    atharvavedamanoj के द्वारा
    September 28, 2011

    परम कुचलनीय, श्रीमान एवानजाप्रणयी महोदय| सादर वन्देमातरम| बड़े ही हर्ष का विषय है की आपकी परम अपावन मोहम्मदी पादुका लेखन के क्षेत्र में भी शोहरत के दीदार करना चाहती है|आगे यूहन्ना का सुसमाचार यह है की जब अहराम के दिन बीत जाएँ अथवा इद्दत की मुहलत बीत जाय तो मुशरिकों के दीदार कर लिया करें, कलेजे को ठंडक प्राप्त होगी …आप तो टोपी ही पहनाने लगे|लाहौल विला कुव्वत….शिर्क है मियां…आपसे दारुले हरब को दारुले अरब करने की ताकीद की गयी थी…आपने एहतराम तोडा है…’’सुनों दिलजानी मेरे दिल की कहानी तुम ..दस्त ही बिकानी बदनामी भी सहूंगी मैं, नन्द के कुमार बदनाम तेरी सूरत पे हौं तो मुगलानी हिन्दुवानी ह्वै रहूंगी मैं’’ यार अपने पुरखों से तो पूछ लिया होता? यहाँ तो वन्देमातरम क्या? बेख़ौफ़ बुतपरस्ती की गयी है मियां ….समझा आप ‘’हमें वाइजों ने यह तालीम दी है की काम दीनी है या दुनियावी है, मुखालिफ की रीस उसमेँ करनी बुरी है, न ठीक उनकी कोई बात समझो, वे दिन को कहें दिन तो तुम रात समझो’’ वाली बिरादरी के हैं|कोई बात नहीं, यही सही तो भाई झंडू बाम, करो थोडा आराम, नहीं तो जब जागेंगे राम, तो समझो हुए विधाता वाम| चातक जी ने लिखा तो समझ लीजिए मैंने ही लिखा…हरफ द हरफ शुरू हो जावुंगा तो फिर खैर ही मनाइयेगा| मकतूल फाय्लान, मकाइल फाईलून, शीशे से नाप नाप गजल लिख रहा हूँ मैं|

    chaatak के द्वारा
    September 29, 2011

    प्रिय मनोज भाई, सादर वन्देमातरम, अनुवाद करने की आपकी शैली ख़ासा हास्य उत्पन्न करने के साथ-साथ व्यंग-बाण भी छोड़ रही है| न वेदों में लिखा है, न उपनिषदों में, न गीता, रामायण महाभारत में पढ़ा फिर कब वन्देमातरम किसी एक धर्म या सम्प्रदाय से जुड़ गया पता ही ना चला लकिन इस बात की बेहद प्रसन्नता है कि दुनिया के इस एक मात्र पूर्ण मंत्र को हिंदुत्व से जोड़कर लोगों ने कुछ पाया हो न पाया हो हमें इस राष्ट्र मन्त्र को जरूर शिरोधार्य किया और अब तो आत्मसात हो गया है| उन सभी विरोधियों को नमन जिन्होंने इस पर हिन्दुओं की बपौती होने की मुहर लगा दी| आपको भी मुबारक हो! वन्देमातरम!

roshni के द्वारा
September 27, 2011

चातक जी नमस्कार .. मोदी जी ने टोपी सवीकार न करके एक शुद्ध हिन्दू का धर्म निभाया है जो की राजीनीतिक फायेद के लिए किसी और धर्म को नहीं अपनाता … सिर्फ अपने धर्म और कर्म पे चल रहा है … कर्म किये जा फल की चिंता मत कर……. यु भी मोदी के कर्म यानि की उनके कार्य ही उन्हें एक दिन जरुर प्रधानमंत्री के पद पर ले जायेगे .. और जिस तरह उन्होंने गुजरात का विकास किया उसी तरह भारत देश का भी विकास होगा … बिना किसी लाग लपेट के …….बिना किसी और धर्म की चापलूसी किये ……. इससे सब धर्मो के नेतओं को सबक लेना चाहिए की धर्म के पीछे न लग कर अपने दम और कार्य के आधार पर राजनीती करे ……. बहुत अच्छा लिखा अपने

    chaatak के द्वारा
    September 27, 2011

    रौशनी जी, सादर अभिवादन, मैं भी आपसे सहमत हूँ राजनीतिक फायदे के लिए अपने धर्म को छोड़ना या किसी दुसरे धर्म को अपमानित करना नेताओं के प्रमुख शौक रहे हैं आज जब मोदी किसी धर्म को अपमानित न करके एक स्वच्छ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं तो उनके इस व्यवहारिक उदाहरण को भी राजनीती और सम्प्रदाय के चश्मे से देखा जा रहा है. मोदी जैसा व्यक्ति यदि प्रधानमंत्री बने तो कमसेकम इतना तो हो ही जायेगा कि राजनीतिक गंदगी को धर्म में स्वीकार्य बनाने वाले मंशाओं को हतोत्साहित होना पड़ेगा. आपकी बात से सहमत होते हुए मैं स्वीकार करता हूँ ‘बन्दे में हैं दम !’ मुद्दे पर अपने विचार स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद!

Avanzalove के द्वारा
September 26, 2011

नरेन्द्र मोदी वो शख्स है जिसके तेवर और बातों में घिनौनी मध्ययुगीन बर्बरता नज़र आती है… किसी तरक्की का कोई मायना नहीं अगर नीयत में आदमखोरी हो… टोपी नहीं पहनना या नहीं पहनना मोदी का एक व्यक्तिगत विचार है… इसमें किसी को कोई हर्ज नहीं होना चाहिए… वंदे मातरम कहना या ना कहना भी ठीक इसी तरह व्यक्तिगत विचार है…

    Lahar के द्वारा
    September 26, 2011

    टोपी पहनना या ना पहनना तो वक्तिगत विचार है ये बात तो समझ में आती है ! लेकिन जहा तक वन्देमातरम का मुददा है | ये राष्ट्र से सम्बंधित है | वन्दे मातरम का इतिहास भारत की स्वतंत्रता से रहा है ! इसको कहना या ना कहना उसी प्रकार है जिस प्रकार अपने पिता को पिता कहना या ना कहना |

    chaatak के द्वारा
    September 26, 2011

    आपकी टिप्पड़ी पढ़कर लगा आप या तो स्वयं भयभीत हैं या भी दूसरों को भयभीत करने की कोशिश करने के लिए काल्पनिक कहानियाँ गढ़ने वाले व्यक्ति हिन्दुस्तान में सरकार चाहे कितनी भी निकम्मी क्यों न हो यहाँ के न्यायालयों में भले ही न्याय देर से मिले लेकिन इस व्यवस्था में इतना दम हमेशा रहा है की कोई भी आदमखोर और घिनौना व्यक्ति जिसने मध्ययुगीन बर्बरता (लिखा तो आपने है लेकिन क्या आपको पता भी है कि वो मद्यायुगीन बर्बर लोग कौन थे? मुझे पूरा विश्वास है कि आपने बिना जाने लिख दिया है वर्ना आप ये शब्द किसी कीमत पर न लिखते! हड़बड़ी में अक्सर गड़बड़ी हो ही जाती है|) का परिचय दिया हो वो एक सम्मानित नागरिक बनकर भी जी सके किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री होना तो दूर की बात है| रही बात वन्देमातरम की तो वन्देमातरम मादरे-वतन की पूजा है ,उसका सजदा है, शब्द नहीं नाद है जिसे सुनकर देशद्रोहियों का कलेजा काँपता है और साम्प्रदायिक शक्तिओं के सीने पर सांप लोट जाता है| आप यदि विदेशी हैं तो इस बात को समझ नहीं पायेंगे और यदि देशी हैं तो किसी न किसी दिन आपको ये बात जरूर समझ में आएगी कि राष्ट्रधर्म किसी भी दूसरी भावना से ऊंचा है और वन्देमातरम उसी राष्ट्रधर्म का ॐ है, अलिफ़ है| इसमें इन्कलाब का घोष भी है और भारतमाता की जयकार भी है|

    chaatak के द्वारा
    September 26, 2011

    स्नेही लहर जी, ‘वन्देमातरम’ घोष की बिलकुल सही व्याख्या की है आपने! आशा है लोग इस मर्म को समझने की कोशिश करेंगे! वन्देमातरम!

    चन्द्रपाल के द्वारा
    September 27, 2011

    इस देश की मिट्टी में पैदा हो कर, यहां का अन्न खा कर व जल पीकर भी वंदे मातरम न कहने वालों से घिनौना कोई हो नहीं सकता….

    chaatak के द्वारा
    September 27, 2011

    वन्देमातरम नाद पर प्रश्न यहाँ उठा है तो आवश्यक है कि भ्रम को दूर करने वाली मित्र मयंक के उद्गारों का एक अंश यहाँ प्रस्तुत कर दिया जाय (उन्ही की अनुमति से)- यह वंदेमातरम शब्द नहीँ यह भारत माँ की पूजा है। माँ के माथे की बिँदिया हैश्रृंगार न कोई दूजा है॥ इसमेँ तलवार चमकती है मर्दानी रानी झाँसी की। इसमेँ बलिदान मचलता है,दिखती हैँ गाँठे फाँसी की॥ मंगल पाण्डे की यादेँ हैँ।शिवराज नृपति की साँसेँ हैँ॥ यह बिस्मिल के भगवान वेद।यह लौह पुरुष का रक्त स्वेद॥ यह भगत सिँह की धड़कन है।आजाद भुजा की फड़कन है॥ यह गंगाधर की गीता है, चित्तू पाण्डे सा चीता है। जलियावाला की साखी है।हुमायूँ बाहु की राखी है॥ यह मदनलाल की गोली है।मस्तानी ब्रज की होली है॥ यह चार दिनोँ के जीवन मेँ चिर सत्य,सनातन यौवन है। यह बलिदानोँ की परम्परा अठ्ठारह सौ सत्तावन है॥ हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसा के बन्दे सब इसको गाते हैँ। सब इसे सलामी देते हैँ,इसको सुन सब हर्षाते हैँ॥ लेकिन कुछ राष्ट्रद्रोहियोँ ने है इसका भी अपमान किया। इस राष्ट्रमंत्र को इन लोगोँ ने सम्प्रदाय का नाम दिया॥ जाओ,जाकर पैगम्बर से पूछो तो क्या बतलाते हैँ? वे भी माता के पगतल मेँ जन्नत की छटा दिखाते हैँ। यह देखो सूली पर चढ़कर क्या कहता मरियम का बेटा। हे ईश्वर इनको क्षमा करो जो आज बने हैँ जननेता।। ये नहीँ जानते इनकी यह गल्ती क्या रंग दिखलायेगी। इस शक्तिमंत्र से वञ्चित हो माँ की ममता घुट जायेगी॥ गोविन्द सिँह भी चण्डी का पूजन करते मिर जायेँगे। शिव पत्नी से वर लेकर ही संघर्ष कमल खिल पायेँगे। फिर बोलो माँ की पूजा का यह मंत्र कम्यूनल कैसे है? माँ को महान कहने वाला शुभ तंत्र कम्यूनल कैसे है? तुम केवल झूठी बातोँ पर जनमानस को भड़काते हो। गुण्डोँ के बल पर नायक बन केवल विद्वेष लुटाते हो॥ लेकिन,जब यह घट फूटेगा।जब कोप बवंडर छूटेगा॥ जब प्रलय नटी उठ नाचेगी।भारत की जनता जागेगी॥ तब देश मेँ यदि रहना होगा।तो वंदेमातरम कहना होगा॥ मनोज कुमार सिँह ‘मयंक’

    Santosh Kumar के द्वारा
    September 27, 2011

    .इन्होने ने तो अपनी मानसिकता और बौद्धिकता दोनों बखूबी दिखा दी ,… काश सद्बुद्धि आये .. वन्देमातरम नाद करता नरेन्द्रमोदी ,……….मध्युगीन बर्बरता का प्रतीक क्या है ?

krishna के द्वारा
September 26, 2011

चातक जी सादर नमस्कार कुछ दिनों पहले मैंने “मोदी जी ने ठुकराई टोपी” पर अपने कमेंट्स के जरिये यह कहना चाहा था की हर देश में स्वदेशी अपने सम्मान के लिए हर संभव प्रयास करता है अगर हिन्दू देश की बात करें तो हिंदुस्तान में अगर मोदी जी ने ऐसा किया तो शायद हिंदुत्व को ध्यान में रखते हुए किया था. मैं अभी ओमान जैसे देश में कार्यरत हूँ. पेशे से मैं एक मरीन इंजिनियर हूँ और अक्सर इरान, इराक, ओमान और पाकिस्तान के लोगो से मिलता हूँ अपने यहाँ के मुसलमानों और यहाँ के मुसलमानों में एक भिन्नता देखी और वो यही है के प्रवासियों के साथ उनका बर्ताव कुछ खास इज्ज़त देने वाला नहीं होता है जबकि अपने यहाँ के मुसलमानों में कम से कम तहजीब तो है. एक मुसलमान अगर अपने धर्म पर कायम रह सकता है तो फिर अगर एक हिन्दू अपने धर्म पर टिका रहे तो इसमें बुराई क्या है? शायद मुझमे राजनीती की उतनी समझ नहीं हो जैसा की कोई दूसरा राजनीतिज्ञ रखता है पर शायद उस टोपी के जवाब में अगर मोदी जी ने उनको अगर किसी हिन्दू देवता का प्रसाद या किसी मंदिर पर मत्था टेकने के लिए कहा होता तो क्या वो ऐसा कर पाते, शायद नहीं क्यूंकि अगर वो ऐसा करेंगे तो शायद इस्लाम उनसे नाराज़ हो जाएगा, मुसलमान उनसे खफा हो जायंगे, अगर लोक प्रभाव के कारन अगर कोई मुस्लमान ये नहीं कर सकता है तो हिन्दू करे ऐसा संभव तो नहीं है………… अच्छा तो यह होता की मुल्ला जी मोदी जी को भारत का झंडा ये कोई गुलाब भेट करते……कोई भी सच्चा हिन्दुस्तानी उसको नहीं ठुकराता……. वास्तव में कोई हिन्दू या मुस्लमान होने से हिन्दुस्तानी नहीं होता है. मेरा यही मत है के जो सच्चे दिल से देश प्रेम को सर्वोपरी रखे वही सच्चा देशभक्त है, ये धर्म जात तो हमने ही बनाये हैं पर परमात्मा ने जो धर्म बनाया उसको हम भूलते जा रहे हैं जो की ” इंसानियत” है……. जय हिंद जय भारत…….

    chaatak के द्वारा
    September 26, 2011

    स्नेही कृष्ण जी, सादर अभिवादन, आपकी टिप्पड़ी और आपकी राय उन कूप-मंडूकों के लिए वरदान हो सकती हैं जो हर एक चीज़ को साम्प्रदायिक नज़र से देखते हैं| इंसानियत को छोड़ हैवानियत पर उतर आये लोगों को सत्य दिखाई नहीं देता और राष्ट्र की आवाज सुनाई न दे इसलिए वे कान खुद बंद कर लेते हैं| कुछ अच्छे आसार नजर जरूर आ रहे हैं क्योंकि जैसे जैसे शिक्षा के प्रति लोगों का रुझान बढ़ रहा है वैसे वैसे अब लोगों की धर्मभीरुता कम और राष्ट्रवादिता ज्यादा प्रेरित हो रही है| पंडितों, पुजारियों का प्रभाव कब का समाप्त हो चुका है और अब मुल्ला, मौलवियों को भी अपनी साख ख़त्म होते दिख रही है| कुछ दिन ये ऐसे ही उपद्रव करेंगे लेकिन अब ज्यादा दिनों तक लोगों को गुमराह नहीं कर पायेंगे| अब वह समय आ रहा है जब हर मुसलमान नौजवान अपने धर्मग्रंथों को स्वयं पढ़कर समझ रहा है और अपने विवेक से उसकी सही व्याख्या कर रहा है गति धीमी है लेकिन यही मंथर गति बहुत जल्द अर्थ का अनर्थ कर आतंकी तैयार करने वाली मानसिकता का वध करेगी| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद! वन्देमातरम !

चन्द्र पाल के द्वारा
September 26, 2011

पिछले एक हजार वर्षों से भारत वर्ष में तलवार के जोर पर बहुत टोपियां पहनाईं गई और सर कंधों से उतार लिए गए। सत्ता की टोपी पहनने की जल्दी में 1947 में राष्ट्रमाता का सर व भुजा का विच्छेद कर दिया। आज जब आमने सामने की टक्कर का वक्त आ गया तो विदेशी ताकतों के पैसे पर पलनें वाले जयचन्दी मिडिया  के  कंधों पर चढ़ कर और तुष्टिकरण की घिनौनी राजनीति की ढाल लेकर फिर टोपी पहनाना चाहते हैं। एक सेनानी को जिन्ना की टोपी पहना कर उसका सर भी ले लिया। लेकिन  अब पाला लौहपुरूष से नहीं अपितु वज्रपुरूष से है।

    chaatak के द्वारा
    September 26, 2011

    स्नेही चन्द्रपाल जी, मेरी भी हार्दिक इच्छा है कि हमारे लौह पुरुष भले ही हिन्दुस्तान के प्रधानमंत्री न बन पायें हो लेकिन कोई वज्रपुरुष जरूर जल्द से जल्द हिन्दुस्तान के शासन की बागडोर संभाले और ये वज्र-पुरुष मोदी साबित होते हैं तो वे भी सर-आँखों पर परन्तु अब हिन्दुस्तान की ये पीड़ा समाप्त होनी चाहिए| वन्देमातरम!

ashvinikumar के द्वारा
September 26, 2011

प्रिय अनुज सुप्रभात ,,कुछ लिखुंगा तो बहुतो के लिए अधिक हो जाएगा ,,,,,,,अभी इसे ही सुन रहा था तो लिख देता हूँ ,,,,,,हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो पी ली है,, डांका तो नही डाला चोरी तो नही की है……और भारतीयों की तो हमेशा से यही सोच रही कि सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः तभी तो सभ्यताओं का विनाश करने वाले आज इस देश में आजादी से विचरण कर रहे हैं और अगर यही आलम रहा तो (सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः) सुनने को नही मिलेगा ,,, बात करते हैं जो मोदी की गुजारिश है उनसे अपने हाथ की रंगीनियों को भी देखें ,,,,कभी शमशीरों के नीचे सर था आज अगर तलवारें हैं कभी चीत्कार जहां पर थी आज वहां हुंकारे हैं……………….जय भारत

    ashvinikumar के द्वारा
    September 26, 2011

    यार शीषक में कुछ और दे देता ……..और क्या देता तुम जान रहे हो :)

    chaatak के द्वारा
    September 26, 2011

    स्नेही अग्रज, सादर अभिवादन, दो पंक्तियों में आपने सबकुछ तो कह दिया ‘समझने वाले समझ गए हैं, ना समझे वो अनाड़ी है’ भारतीय संस्कृति का पूरी दुनिया में कोई विकल्प नही और यही बात हमें सबसे अलग बनाती है. काफी दिनों बाद अग्रज से वार्ता करने का मौका मिला, कभी-कभी आपके चैट मेसेज मिलते हैं लेकिन उस समय आप ऑनलाइन नहीं होते. मेरे फेसबुक अकाउंट में कुछ समस्या है हमेशा मुझे ऑनलाइन ही दिखाता है. इस गूढ़ प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद! मुझे शायद पता है कि आप किस शीर्षक की बात कर रहे हैं. वन्देमातरम!

Lahar के द्वारा
September 25, 2011

चातक भाई सप्रेम नमस्कार , आपने सही कहा की भारत को मोदी जैसे विकासवादी मानसिकता वाले राष्ट्र भक्त की जरुरत है | मैंने इस पोस्ट के सारे कमेंट्स देखे ! आपका लेख तो खुबसूरत है ही , आपने जिस अंदाज में प्रतिक्रियाओं का उत्तर दिया है उसे पढ़ कर बहुत अच्छा लगा | आप बहुत खुबसूरत तरीके से अपनी बात कहते है ! लास्ट में एक JW का कमेन्ट देखा बहुत दुःख हुआ | इस जागरण ब्लॉग पर भी इस तरह के लोग है | भारत का अगला प्रधानमंत्री कोई भी बने लेकिन दिली इच्छा है की उसकी सोच मोदी जैसे विकासवादी हो |

    chaatak के द्वारा
    September 26, 2011

    स्नेही बंधु लहर जी, सादर अभिवादन, आपकी राय जानकर अत्यंत हर्ष हुआ. कभी-कभी कुछ तो ऐसा होता ही है जिससे मन खिन्न हो उठता है खासकर तब जब कोई व्यक्ति वाद-विवाद वाले बिन्दुओं पर अपनी खीझ प्रकट कारन शुरू कर देता है परन्तु आप मित्रों का स्नेह अपेक्षाकृत इतना अधिक है कि कुछ फर्क नहीं पड़ता. आपके राष्ट्रवादी विचारों को जानकर अतीव प्रसन्नता हुई ईश्वर करे आपकी प्रार्थना स्वीकार हो जाए और हमारे देश को भी एक विकासवादी और जुझारू प्रधानमंत्री मिल जाए! वन्देमातरम !

Rajkamal Sharma के द्वारा
September 25, 2011

प्रिय चातक जी …… saadr abhivadn ! असल में मैं आपकी इस पोस्ट पर कमेन्ट करने से कतरा रहा था क्योंकि जो बात मैंने कहनी थी आप सुन कर कहते की इससे अच्छा तो यही था की मैं चुप ही रहता ….

    chaatak के द्वारा
    September 25, 2011

    स्नेही राजकमल जी, अभिवादन, मेरी कभी भी इच्छा ये नहीं होती कि मेरी बात से सभी सहमत हों या सिर्फ मेरा समर्थन ही करें, आप आजतक प्रेषित मेरी किसी भी पोस्ट को देखेंगे तो आपको यह अंदाजा हो जाएगा कि मैं सिर्फ उन लोगों से विचार न रखने की अपील करता हूँ जिनके पास कोई विचार ही नहीं होते. मैंने हमेशा हर तरह की टिप्पड़ी का स्वागत किया है सिर्फ बेहूदी और बेतुकी (या कहूं गाली गलौज वाली) टिप्पड़ियों का मैं विरोधी हूँ बदतमीजी मैं किसी के साथ करता नहीं और कोई अमर्यादित होकर बात करे वह मैं सहन भी नहीं करता. और मेरे विचार से आपके कमेन्ट में ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए जिसे मैं ये सोचूँ कि आप न बोलते तो अच्छा होता. यदि आपके पास सचमुच कुछ विचारणीय बात कहने को है तो जरूर कहिये स्वागत है. मेरे विचार यदि कहीं पर गलत हैं तो मैं जरूर स्वीकार करूंगा और मुझे लगा कि आपको सिर्फ शंकाएं है और मेरे वश में है तो उनका समादान करने की कोशिश भी करूंगा.

    rajkamal के द्वारा
    September 25, 2011

    प्रिय चातक जी ……सादर अभिवादन ! हम लोग अगर किसी धार्मिक औरत/पुरुष से मिलते है तो सबसे पहले उसका भेष (भेख ) देखते है और उसी के कारण उसको सबसे पहले नमन करते है ….. उसका आचरण हम बाद में देखते है या फिर हमारे सामने ही बाद में आता है ….. आपके लेख की अंतिम पंक्तिया की मुल्ला जी को मोदी जी को नमन (चरण स्पर्श ) करना चाहिए थे मुझको किसी भी नजरिये से उचित और तर्कसंगत नहीं लगा ….. असल बात तो यह है की मुल्ला जी को वहां पर जाना ही नहीं चाहिए था …… धार्मिक व्यक्ति का स्तर इतना ऊँचा होना चाहिए की वोह किसी के पास न चल कर जाए बल्कि दूसरे उसके पास चल कर आये ….. मुझको जो आपति थी मैंने बता दी है आप कुछ न कहने के लिए भी स्वंतत्र है ….. जय हिंद

    chaatak के द्वारा
    September 26, 2011

    प्रिय राजकमल जी, अभिवादन, इतनी छोटी सी शंका व्यक्त करने में इतना सोच रहे थे आप ये जानकर आश्चर्य हुआ. खैर अभी तो आपकी शंका पर बात करते हैं- हम साधारण जन हैं और किसी भी धर्म से ताल्लुक रखने वाले से हम सबसे पहले अभिवादन करते हैं ये भी सही है लेकिन मोदी साधारणजन में नहीं आते वे भारत के एक प्रदेश के मुखिया हैं जो किसी भी धार्मिक व्यक्ति को सम्मान तो दे सकते हैं परन्तु उनके सामने नतमस्तक नहीं हो सकते. सदियों पहले हमारे शासकों के दरबार में राजपुरोहित हुआ करते थे और राजा उनके सामने नतमस्तक होता था लेकिन आप यदि गौर से उन ग्रंथों को पढेंगे तो आपको पता चलेगा कि प्रथम अभिवादन हमेशा राजपुरोहित ही करता था. कोई भी नवागंतुक सन्यासी या धर्मगुरु तो शासक के समक्ष दंडवत करता था, अपना परिचय देता था तत्पश्चात शासक अपने विवेक तथा मर्यदानुरूप उसका स्वागत या अभिवादन करता था. उदाहरण के लिए आप राजा शुद्दोदन को उस सन्यासी द्वारा किये गए अभिवादन का अध्ययन कर सकते हैं जो बड़ी आसानी से आपको दी लाईट ऑफ़ एशिया बुक-३ में पढ़ सकते हैं. अब आते हैं मेरे द्वारा लिखी गई बात पर तो मैंने ये नहीं कहा है कि मुल्ला जी को मोदी के चरण स्पर्श कने चाहिए बल्कि मैंने कहा है ‘यदि मुल्ला ये कहते हैं कि उनका प्रयोजन धार्मिक नहीं……….यदि मौलाना ने प्रदेश के मुख्यमंत्री का चरण-स्पर्श करके उसकी पद-गरिमा व उसकी संस्कृति को वही सम्मान दिया होता जो वे अपने जेब में रखी टोपी के लिए चाहते थे|’ यानी यहाँ मैंने मुल्ला जी को धार्मिक प्रतिनिधि नहीं बल्कि एक आम हिन्दुस्तानी कहा है. आशा है आपकी शंका का समाधान हो गया होगा. आपके द्वारा उठाया गया प्रश्न निःसंदेह पोस्ट में लिखी गई बात पर किसी के भी मन में उत्पन्न हुई जिज्ञासा को शांत करने में सहायता करेगा. आपका हार्दिक धन्यवाद!

    chaatak के द्वारा
    September 25, 2011

    स्नेही जमाल जी, आपकी सभी बाते निहायत उम्दा और काबिले तारीफ़ हैं और कोई भी व्यक्ति आपसे असहमत हो ही नहीं सकता. निश्चय ही आप एक बेहद ज़हीन और सुलझे हुए इंसान है और मुझे ये कहने में भी कोई ऐतराज़ नहीं कि प्रकरण पर आपकी दृष्टि बिलकुल जायज है, लेकिन भाई एक बात समझ में नहीं आती है कि गुड़ जैसे इस लेख में (कमेन्ट नहीं कहूँगा क्योंकि आपने यहाँ पर अपनी पोस्ट को ही पेस्ट किया है) एक कील क्यों छुपा रखी है? ‘वैसे भी नाराज तो उससे हुआ जाता है जिससे प्यार का कोई रिश्ता हो।’ मेरे ख्याल से प्यार का रिश्ता तो हर हिन्दुस्तानी से होना चाहिए भले ही हम उससे कितने भी नाराज क्यों न हों. हम तो नफरत सिर्फ उससे करते हैं जो हमारे राष्ट्र का गद्दार हो और मोदी ने ऐसा कुछ नहीं किया जिसे आप मुल्क से गद्दारी कह सकें. जो भी हो आपकी विद्वता और शैली ने ख़ासा प्रभावित किया. प्रतिक्रिया को प्रकट करने का हार्दिक धन्यवाद!

RK Sinha के द्वारा
September 24, 2011

सच कहना मुश्किल होता है, परन्तु इसको छुपाना और मुश्किल, मुस्लिम समाज से मोदी और उनकी पार्टी की नफरत बीजेपी के छुपे हुए एजेंडे का एक हिस्सा है जो कभी कभी खुल कर सामने आ ही जाता है ! जब वह मंच पर अन्य धर्मो की पगड़ी धारण कर सकते है तो फिर मुस्लिम टोपी से परहेज़ क्यों ? फिर मुस्लिम धर्मगुरूओ को बुलाना और मुस्लिम समाज को इस सध्भावना (?) मिशन से जोड़ने के लिए विशेष तय्यारी क्यों ? यदि मुस्लिम टोपी से इतनी नफरत तो फिर बीजेपी मुस्लिम बहुल शहरो में रोज़े अफ्तार का आयोजन क्यों करती है उसके नेता इसमें क्यों शामिल होते है ? आप के द्वारा मोदी के जो गुण गान किये गए है तो एक बात समझ ले इतनी संकीर्ण मानसिकता वाला व्यक्ति भारत की मिली जुली संस्कृति को साथ लेकर चल पायेगा यह एक बड़ा सवाल है !

    chaatak के द्वारा
    September 24, 2011

    स्नेही श्री आर के सिन्हा जी, आपने बिक्लुल सही कहा कि सच कहना मुश्किल होता है परन्तु इसको छिपाना और भी मुश्किल लेकिन आगे लिखते समय आप थोडा सा पूर्वाग्रही हो गए आपको भी कहीं न कहीं ग़लतफ़हमी है कि मोदी और उनकी पार्टी मुस्लिम समाज से नफरत करती है आप जरा गौर करेंगे तो आपको भी सच्चाई पता चल जाएगी भा.ज.पा. में शाहनवाज हुसैन और अब्बास नकवी भी हैं और मुझे नहीं लगता कि पार्टी मुसलमानों से नफरत करती है इसलिए ये प्रबुद्ध राजनेता मोदी के साथ कंधे से कन्धा मिला कर हमेशा चलते हैं क्या आपको लगता है कि ये ऐसे मुसलमान हैं जो अपने धर्म से नफरत करने वालों के साथ रहते हैं सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने के लिए? दूसरी बात- मोदी किसी भी दुसरे धर्म की पगड़ी धारण करते हैं ऐसा आपको किसने बता दिया भाई? हिन्दू और सिक्खों को छोड़कर कोई दूसरा पगड़ी धारक नहीं होता और इन दोनों में भी पगड़ी सिक्खों की धार्मिक आस्था का प्रतीक है हिन्दुओं की नहीं! आपने शायद ध्यान नहीं दिया ओसामा बिन लादेन भी पगड़ी पहनता था! तो क्या वो हिन्दू या सिक्ख बन गया था? लेकिन टोपी (सारी नहीं सिर्फ नमाजी टोपी) इस्लाम की धार्मिक निष्ठा का प्रतीक है| तीसरी बात सद्भावना कार्यक्रम में मुस्लिम धर्मगुरुओं को सद्भावना के साथ बुलाया गया था और उन्हें भरपूर स्वागत और महत्व भी दिया गया (क्योंकि मोदी सिर्फ हिन्दुओं के नहीं पूरे गुजरात के मुख्यमंत्री हैं) परन्तु ये कार्यक्रम मोदी ने इस्लाम स्वीकार करने के लिए नहीं बुलाया था और न ही उन्होंने कोई धार्मिक मुद्दा मंच पर उठाया फिर धार्मिक टोपी कहाँ से निकल आई? चौथी बात जिसका जवाब शायद मुझे नहीं देना चाहिए क्योंकि मैंने पोस्ट में भा.ज.पा. का जिक्र नहीं किया है फिर भी आपकी जिज्ञासा शांत करना चाहूँगा- भा.ज.पा. के मुखिया वही लालकृष्ण जी हैं जिन्होंने पाकिस्तान में जाकर जिन्ना को सेकुलर बताया था और उन्हें आज भी अपनी राजनीती की दूकान चलानी है सो वे कभी खुद इफ्तार की दूकान खोल देते हैं तो कभी राजनीती के लोभी लोगों के द्वारा आयोजित इफ्तार में शामिल हो जाते है और कौन नहीं जानता कि वो सिर्फ खाने के लिए जाते हैं क्योंकि रोजा तो इनमे से कोई रहता नहीं| :) पांचवी बात- आपको फिर गलतफहमी हुई है मैंने मोदी का गुणगान नहीं किया है एक कठपुतली की तुलना में एक पुरुषार्थी को देश की बागडोर दिए जाने की बात पर अपनी सहमति व्यक्त की है और वह भी खासकर इसलिए कि वह ‘पाकिस्तान जैसे नासूर का जड़ से इलाज करने की बात डंके की चोट पर करता है प्रेम पत्र लिखने की नहीं’ छठी बात- किसी भी व्यक्ति द्वारा यदि अपने धर्म में अडिग रहते हुए राष्ट्रसेवा की जिजीविषा होना संकीर्ण मानसिकता है तो इस सिद्धांत के पोशको को एक बार समाज और इतिहास की प्रयोगशाला में फिर से इसका परीक्षण करना चाहिए| ‘एक ज़माना था जब धर्मग्रंथों में लिखा था सूरज धरती का चक्कर काटता है’ ये तथ्य उतना ही गलत है जितना ये मानना कि वह व्यक्ति देश की टोपी की इज्जत बचा पायेगा जो अपने धर्म को बेच आया हो| राष्ट्रधर्म वह धर्म है जिसका निर्वाह वही कर सकेगा जो अपने धर्म का निर्वाह करना जानता होगा| आशा है आप किसी बात का बुरा नहीं मानेगे और मेरे द्वारा प्रस्तुत विनम्र आग्रह को समझने की और यदि मैं गलती कर रहा हूँ तो उसे व्याख्यित करने की कोशिश करेंगे| प्रतिक्रिया द्वारा विषय पर चर्चा आगे बढाने का हार्दिक धन्यवाद!

    RK Sinha के द्वारा
    September 25, 2011

    स्नेही चातक जी, आपका उत्तर पा कर हर्ष हुआ, स्वस्थ बहस ही नए निष्कर्ष और नयी सोच देती है ! जहाँ तक बीजेपी और मुस्लिम समाज का सम्बन्ध है तो पिछले ७-८ सालो से यही दोनों नाम शाहनवाज हुसैन और अब्बास नकवी के अलावा कोई नहीं सुनने को मिला, और इन दोनों व्यक्तियों का इनके समाज में क्या प्रभाव है जग ज़ाहिर है ! नेताओ का सिर्फ एक धर्म होता है वह है सत्ता हथियाना , आप देखे मुलायम सिंह भी हिन्दू है लेकिन उन्होंने कारसेवको पर गोली चलवाई, मायावती दलित है लेकिन दलितों के लिए क्या किया ? तो शाहनवाज हुसैन और अब्बास नकवी का होना बीजेपी के मुस्लिम प्रेम का सुबूत नहीं है ! पगड़ी वाली बात इशी मंच पर जागरण ब्लॉग में एक दो दिन पहले थी आप देखे तो मिल जायेगी अभी कल की ही एक न्यूज़ है की अडवाणी ने मोदी के बढ़ते क़द को कम करने के लिए अपनी रथ यात्रा बिहार से निकालने का फैसला किया और २० सालो में पहली बार २५/०९ को सोमनाथ यात्रा पर नहीं गए ! ८४ साल की आयु में सत्ता का यह मोह ? कहने का मतलब यह है की सभी को बस सत्ता चाहिए ! जहाँ तक धर्म परायणता की बात है तो एक अच्छा और सच्चा धार्मिक व्यक्ति हमेशा अच्छा शासक हो गा शर्त यह है की वह धर्म को चोला सिर्फ दिखावे के लिए ना पहने हो, कोई भी धर्म हिंसा का पाठ नहीं देता है और ना ही अपने गुण गान के लिए झूट का सहारा लेता है ! जस्टिस सच्चर ने साफ़ कह दिया की मोदी अपने भाषण में झूट बोले ! बहरहाल यह बहस ऐसे ही चलती रहेगी और सब को अपने विचार रखने का अधिकार है बस उद्देश्य स्वस्थ होना चाहिए और किसी की भावनाओं को ठेस न पहुचे यह ध्यान रखना चाहिए !

    chaatak के द्वारा
    September 25, 2011

    स्नेही श्री सिन्हा जी, आपका उत्तर पढ़कर बहुत अच्छा लगा कि आपने मंच पर स्वस्थ बहस कैसे हो इसका बिलकुल सटीक उदाहरण प्रस्तुत किया, कभी कभी हमरे बीच में मतभेद होते हैं लेकिन ये हमारे बीच कडवाहट का सबब नहीं हो सकते (यदि हम ऐसा करने को तत्पर हों) यहाँ पर एक चीज़ खुल कर सामने आई और वह ये है कि कम से कम आडवाणी के बारे में हमारी राय एक जैसी है और राजनीतिक पार्टियों के बारे में भी हम एक जैसे ही खयालात रखते हैं. एक थोडा सा अंतर दिखा मोदी के बारे में हमारी और आपकी राय के बीच और उसका कारण भी एक सामान है यानी हम विचार के केंद्र को देखें तो आप और हम दोनों फिर एक ही चीज़ के लिए चिंतिति हैं और वह है राष्ट्रहित, आर्थात हमारे व्यक्तिगत या धर्मगत पक्ष फिर गौड़ है. मेरी यही मंशा है कि जब बात राष्ट्र की हो तो धर्म गौड़ हो जाना चाहिए यानी मुल्ला अपनी टोपी और नमाज़ न छोड़े और पंडित अपना तिलक और शंखनाद और ये तभी हो सकता है जब आप मुल्ला से किसी मूर्ति के चरणस्पर्श की और पंडित से टोपी पहनने की आशा न रखें. हमारे सामने उदाहरण स्वरुप अशफाक उल्ला खान और रामप्रसाद बिस्मिल की बेमिसाल दोस्ती का उदाहरण है. एक बार फिर दोहराना चाहूँगा- ‘आओ सभी दीवारों को तोड़ दें!’ का नारा कागज़ पर लिखने से अच्छा परिणाम देता है लेकिन इंसान अभी देवदूतों से बहुत नीचे का प्राणी है इसलिए दीवारें तोड़ने पर व्यव्गारिक जीवन में सिर्फ नंगापन और वैमनस्य मिलेगा. व्यवहारिक जीवन को जो चीज़ संतुलित और सौहार्दपूर्ण बना सकती है वह है ‘Good fences make Good neighbours!’ यानी हमारे बीच सम्बन्ध उतने ही मजबूत हो सकते हैं जितनी कि हमारे बीच की दीवार. प्रतिक्रिया द्वारा एक स्वस्थ बहस को दिशा देने का हार्दिक धन्यवाद!

    ghanshyam prasad gupta (rashmi) के द्वारा
    September 26, 2011

    किसी vyakti का समर्थक बात aksar karata है निरर्थक..आपकी बात sach के काफी karib है .मोदी को ऐना दिखाती नजर आती है..पुण्य करता है पाप करता है सुविधानुसार प्रभु का jaap करता है.logo की अपनी अपनी भाषा है .हर शब्द की अपनी अपनी परिभाषा है अपने स्वार्थ को ध्यान में रख्कर्मोदी किसी से अलग नहीं हा देश रक्त है khati vot bhakt jantaa के sine par sawar होने के liye

abodhbaalak के द्वारा
September 23, 2011

चातक जी एक बार आपके ब्लॉग पर उपस्थित हूँ, ये जानते हुए की आप आप इन विषयों पर मेरे विचार से अवगत हैं, ये जानते हुए की आप कभी भी मुझ आउट कास्ट के ब्लॉग पर अपने विचार ….. खैर जाने दें.. पहली बात, मोदी जी को लेकर देश में तो बड़े एक्सट्रीम ग्रुप हैं, एक उन्हें मसीहा और युगपुरुष मानता है और दूसरा…… रही बात टोपी और मुल्ला जी, तो भाई मेरे, दोनों ही खेल रहे हैं, मुल्ला जी को उन्हें टोपी पहनना ही गलत था, और मोदी जी को ढेरो मुसलमां धर्मगुरुओं को मंच पर बुलाना, वो भी, अब वो अपनी इमेज कुछ और बनान छह रहे हैं. सबसे राजनीति के हथकंडे हैं भय्या मेरे, हम तो बस चुपचाप देखते रहगें, कहेंगे तो लोग कहेगे की अबोध ………. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    chaatak के द्वारा
    September 23, 2011

    प्रिय अबोध जी, मैं काफी हद तक आपके विचारों से अवगत हूँ और इस ब्लॉग पर आपकी टिप्पड़ी की सार्थकता से भी इनकार नहीं कर सकता| एक बात जिसने मुझे सबसे ज्यादा आहत किया वह है आपको स्वयं को आउटकास्ट कहना- भले ही आजकल अतिव्यस्तता के कारण मैं मंच पर यदा-कदा ही उपस्थित हो पाता हूँ और शायद यही कारण है कि मैं मित्रों की पोस्ट पर अपनी राय भी जाहिर नहीं कर पाता लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि मैं अपने मित्रो को भूल जाऊँगा या फिर उन्हें नजरअंदाज करूंगा| आशा है आप मित्र की मजबूरियां समझेंगे| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद और यदि मेरे आचरण से आपको कष्ट हुआ तो मैं क्षमा-प्रार्थी हूँ|

    abodhbaalak के द्वारा
    September 24, 2011

    चातक जी, मेरे लिए बड़े गर्व की बात है की आप मुझे अपना मित्र कहते हैं, ( मेरा मानना है की इस मंच का वास्तविक सुपर स्टार कोई है तो वो आप ही हैं, जिसकी लेखनी में इनती शक्ति है की अगर वो केवल दो शब्द भी लिखे तो वो अनगिनत कमेंट्स का …., और फीचर तो हर हाल में होता है, ये मै आपसे इश्यवश नहीं कह रहा हूं बल्कि आपके विद्वानता, ज्ञान, और लेखन की उस ओज को नमन कर रहा हूँ जो की जगविदित है ) और आपने कहा की समय की अति व्यस्त के कारण … …., पर जब मै मंच पर लिखे और ब्लॉग पर देखता हूँ तो आपके कमेंट्स की बारिश अक्सर जगहों पर नज़र आ जाती है, सूखा केवल इस अबोध के …….., मैंने अपने को आउट कास्ट कहने के पहले कई ब्लोग्स पर आपके कमेंट्स देखते तब ही ये कहा … वैसे आपका लास्ट कमेंट्स मेरे ब्लॉग पर ४ जुलाई को आया था …., और उसके बाद मेरी कई पोस्ट आ चुकी है, मेरे ख्याल से, आंकड़े आपको ……….. फिर भी आपका आभारी हूँ की आपने कम से कम मुझे मित्र कहा, (माना हो ये पता नहीं). मेरे विचार से प्रारंभ से ही मै आपके हर पोस्ट पर, भले ही मै आपसे मतभेद रखता हूँ, पर अपने विचार अवश्य रखता आया हूँ, एक बार से आपका आभारी हूँ की आपने मुझे मित्र की संज्ञा दी और और मेरे विचार पर अपने उत्तर से ….

    chaatak के द्वारा
    September 24, 2011

    प्रिय अबोध जी, ये आपकी जर्रानवाजी है जो आपने मुझे इतने सारे अलंकरण से विभूषित कर दिया वास्तविकता तो ये है कि मैं अपने आपको इस मंच पर चमकने वाले बहुत से सितारों (जिनमे से आप भी एक हैं) से मिलने वाली रौशनी में प्रकाशित एक रेत का कण मात्र समझता हूँ जिसे आप सितारों का अगाध स्नेह प्राप्त होता है| आपने जब मेरी टिप्पड़ी के बारे में लिखा तो मैं स्वयं भी बहुत हैरान हो गया और थोडा शर्मिंदगी का भी अहसास हुआ कि मैं समझता हूँ कि मैं आपसे बहुत स्नेह करता हूँ लेकिन आपको जिस तरह मेरी आखिरी टिप्पड़ी की तारीख तक याद है वह दर्शाता है कि आप का स्नेह मुझ पर कहीं ज्यादा है ऐसे में मैं सिर्फ इतना कह सकता हूँ कि आपकी शिकायत और आपका ये स्नेह सर आँखों पर कोशिश करूंगा कि आगे से आपको शिकायत का मौका न दूं!

Abdul Rashid के द्वारा
September 23, 2011

आदरणीय चातक जी सादर प्रणाम राजनीती जो खुले मंच पर होता है उसका मकसद खास होता चर्चा होना चाहिय चाहे विरोध में चाहे समर्थन में आज वाही हो रहा है अर्थात मकसद अपने अंजाम तक पहुंचा. न तो मोदी दूध के धुले है न मुल्ला राजनैतिक लोग राजनीती करे ये बात समझ में आता है लेकिन मुल्ला जी का टोपी पहनना या तो अक्ल का दिवालियापन है या सस्ती लोकप्रियता पाने का बेहूदा प्रयास. चातक जी धर्म का नशा अफीम के समान होता है अच्छे अच्छे को बौरा देता है http://singrauli.jagranjunction.com

    chaatak के द्वारा
    September 23, 2011

    स्नेही श्री राशिद जी, सादर अभिवादन, सही कहा है आपने कि सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए ओछी हरकत करना मानसिक दिवालियापन दिखाता है ये हरकत चाहे कोई धर्मगुरु करे या फिर राजनेता| आपकी बात से मैं १००% सहमत हूँ कि ‘धर्म अफीम है’ और इससे हमें पूरे हिन्दुस्तान को उबारने के लिए प्रयास करना चाहिए| दो टूक सीधी बात और सक्षम राय से अवगत कराने का तहे-दिल से शुक्रिया!

Harish Bhatt के द्वारा
September 23, 2011

आदरणीय चातक जी सादर प्रणाम. बहुत सटीक लेखन के लिए हार्दिक बधाई. मुझे ये प्रकरण अच्छी तरह से मालुम नहीं है. लेकिन अगर भारत जैसे शक्तिशाली देश के भविष्य में होने वाले प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने मुल्ला जी की टोपी नहीं पहनी तो कौन से आफत आ गयी. अब समय आ गया है मोदी जैसे सक्षम व्यक्तिव के हाथ में देश की बागडोर सौपने का. अपना देश अपनी माटी तो फिर डर काहे का……………

    chaatak के द्वारा
    September 23, 2011

    स्नेही श्री हरीश भट्ट जी, सादर अभिवादन, निःसंदेह मोदी एक सक्षम राजनेता है और हम उनके हाथों में हिन्दुस्तान का सुरक्षित भविष्य देखते हैं| संभव है कि कुछ लोगों को ये विचार पसंद न हों या उन्हें मोदी पर संदेह हो लेकिन जबकि हमारे सामने गुजरात का विकास और सौहार्द का उदाहरण है तो जो लोग उन्हें भारत का प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं उनके तर्कों को भी जरूर देखना चाहिए| भय की कोई बात नहीं हम तख़्तनशीं करने की ताकत रखते हैं तो हमारे अन्दर तख्तापलट करने की कूबत भी तो है, जरूरत है कि हर हिन्दुस्तानी भय का परित्याग कर राष्ट्र-निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाए| प्रतिक्रिया द्वारा वार्ता को आगे बढ़ने का हार्दिक धन्यवाद!

manoranjanthakur के द्वारा
September 22, 2011

देर से\ पढने का मिला मोका बहुत सुंदर बधाई

    chaatak के द्वारा
    September 23, 2011

    स्नेही मनोरंजन जी, आपकी प्रतिक्रिया मिली यही मेरे लिए संतुष्टि की बात है, तारीफ़ का तहे-दिल से शुक्रिया!

akraktale के द्वारा
September 22, 2011

चातकजी नमस्कार. बहुत ही अच्छी बात कही.सम्मान मांगने से नही, परिस्थितियां बनाने से मिलता है. वरना तो सभी ने देखा एक निर्बुध्दि के कारण पूरा समाज  शर्मिंदा हुआ.

    chaatak के द्वारा
    September 23, 2011

    स्नेही रक्तले जी, सादर अभिवादन, आपकी बात से मैं पूर्ण सहमत हूँ, परिस्थितयां बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा| वो कहावत शायद ऐसे ही लोगों के लिए कही गई है- ‘बर्बाद गुलिस्ताँ करने को बस एक ही उल्लू काफी है….’ प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

rakeshsrivastav के द्वारा
September 22, 2011

ऩाीबुदद्

    Santosh Kumar के द्वारा
    September 22, 2011

    भाई मेरे ,..बुदबुदाने से कुछ नहीं होने वाला है ,..जो कहना है साफ़ साफ़ कह दो ,..वैसे भी भ्रमित लोग कम नहीं हैं ,..इसी भ्रम का फायदा उठाकर ही तो वो हमें लूट रहे हैं

    chaatak के द्वारा
    September 22, 2011

    स्नेही राकेश जी, शायद सही भाषा का चुनाव न होने के कारण आपको असुविधा हुई है. आशा है आप अपने विचारों से अवगत कराएँगे. ब्लॉग पढने के लिए आपका शुक्रिया!

    chaatak के द्वारा
    September 22, 2011

    स्नेही संतोष जी, आपने सही कहा हमारी ज्यादातर समस्याएं स्पष्ट अभिव्यक्ति में कमी के कारण होती है परन्तु यहाँ शायद तकनीकी खामी के कारण ऐसा हुआ है. राकेश जी का ध्यान इस और आकृष्ट करने के लिए आपको साधुवाद!

    akraktale के द्वारा
    September 24, 2011

    संतोषजी नमस्कार, कहते है देनेवाला जब देता है तो छप्पर फाड़ के देता है. चताकजी को एक नहीं दो दिए है रात में दोनों काँधे पर बैठा कर चलेंगे तो अँधेरे में भी सफ़र आसान हो जायेगा.

Ramesh Bajpai के द्वारा
September 22, 2011

प्रिय श्री चातक जी भारतीय संस्कृति ने सहज औदर्य से शिष्टता को आत्मसात ही नहीं किया बल्कि उसका अनुपालन भी सुनिश्चित किया है | किसी को सम्मानित करने के लिए पुष्प मालाये किसी थाली में सजा कर रखी जाती है , सिन्दूर या चदन ,चावल किसी पात्र में रख कर ही उपयोग में लाये जाते है | जेब में रखी गयी पुष्प माला भी किसी को सम्मानित करने योग्य नहीं होती | स्वयं ओढ़ी हुयी चादर भी इस तरह के कार्य के लिए निषिद्ध मानी गयी है |

    chaatak के द्वारा
    September 22, 2011

    आदरणीय बाजपेयी जी, आपने बड़ी अच्छी तरह से भारतीय संस्कृति और परंपरा को स्पष्ट किया है. आशा है कि मामले को नाहक तूल देने वाले हिन्दुस्तानी संस्कृति एक इस पहलू को भी समझने की कोशिश करेंगे. प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

Krishna Gupta के द्वारा
September 21, 2011

चातक जी अच्छा लेखन साधुवाद

    chaatak के द्वारा
    September 22, 2011

    स्नेही कृष्ण जी, प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

alkargupta1 के द्वारा
September 21, 2011

चातक जी , ये सारे ही नेता राजनीति की आड़ में हर समय कोई न कोई नाटक करते ही रहते हैं सभी अपने -अपने स्वार्थ में लगे रहते हैं…..आपने बहुत अच्छा लिखा है…..सत्यता को दर्शाता हुआ सार्थक आलेख !

    chaatak के द्वारा
    September 21, 2011

    स्नेही अलका जी, आपके विचार जानकर बहुत ख़ुशी हुई काश कि हम इन छद्म वेशधारियों से अपने देश को मुक्त कर पायें! प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

Amita Srivastava के द्वारा
September 21, 2011

चातक जी , जितनी समझदारी से यह नेता नौटंकी करते है , काश भगवान इनको बुद्धि दे और यह देश के लिए भी कुछ सोचे ,कुछ करके दिखाए | अब इनके नाटको को जनता समझ चुकी है |

    chaatak के द्वारा
    September 21, 2011

    अमिता जी, सादर अभिवादन, नेता नौटंकी करे तो बात समझ में आती है लेकिन इस बात तो नौटंकी धर्म के ठेकेदारों ने की है और ऐसे में आवश्यक है कि नेताओं से नाटकों को समझ चुकी जनता से हम ये भी उम्मीद करें कि वे इन धर्म के ठेकेदारों की नौटंकी को भी पूरी समझदारी से समझे और किसी भी घटना के लिए सिर्फ शासन और प्रशासन को कोसने की जगह इन्हें अपना रहनुमा न बनाकर अपनी भागीदारी भी तय करे. प्रतिक्रिया द्वारा विचार प्रकट करने का हार्दिक धन्यवाद!

vasudev tripathi के द्वारा
September 21, 2011

चातक जी, सादर अभिवादन| जहाँ तक मेरा विस्तार है तो मैं उन लोगों के विचार से सहमत नहीं हूँ जो किसी भी राजनैतिक घटना कार्य प्रतिक्रिया को राजनैतिक ढोंग कहकर खंडन करने मे बुद्धिमत्ता समझते हैं| क्या आज का पढ़ा लिखा वर्ग बिना राजनीति का भारत चाहता है…..? जहां राजनीति है वहाँ कुटिलता स्वाभाविक है, हमारे राष्ट्रनायक चाणक्य की भारत दिग्विजय उनकी कौटिल्य संज्ञा और इसकी यथार्थ पर ही सिद्ध हुई| प्रश्न यह मौलिक और प्रासंगिक है कि कुटिलता का उद्देश्य स्वार्थ है स्वार्थियों का प्रतिरोध……!! मैं मोदी जी के ऐसे किसी भी प्रयास को इसलिए उचित मानता हूँ क्योंकि काँग्रेस और अन्य छद्म-निरपेक्षों के इतने दिनों के कुटिल राष्ट्रघाती प्रयासों के विरुद्ध वे एक सबल प्रतिरोध हैं| राजनैतिक ढकोसले के प्रतिफल मे विकास और राष्ट्र-सम्मान देना राष्ट्र लूटने वाले ढकोसलों से श्रेष्ठ है|

    chaatak के द्वारा
    September 21, 2011

    स्नेही वासुदेव जी, सादर अभिवादन, आपके विचार जितने सटीक हैं उतने ही स्पष्ट भी. राजनीति के दूषित पक्ष की आलोचना और उसका बहिष्कार करना जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक है कि इसके राष्ट्रवादी रूप का सम्मान करना और उसे समर्थन देकर राजनीतिक प्रदूषण को हटाने में मदद करना. मोदी के प्रयासों की मैं भी सराहना करता हूँ और छद्म धर्म-निरपेक्षों के उलट उनकी स्पष्टवादी सोच और कर्म का भी मैं प्रशंसक हूँ. आज ज्यादातर लोगों को जब उनके प्रधानमंत्री बनने की मंशा पर संदेह होता है तो मुझे या शायद हर राष्ट्रवादी हिन्दुस्तानी को हर्ष की अनुभूति होती है कि एक ऐसा पुरुषार्थी हमारे देश का प्रधानमन्त्री बने जो गरजते हुए कहता है कि पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देना होगा बजाय इसके कि उन आतंक-पोशाकों को प्रेम-पत्र लिखे जाएँ. मोदी के ऐसे विचार यदि किसी को सांप्रदायिक प्रतीत होते हैं तो मैं इस सम्प्रदायवाद का समर्थन करता हूँ यदि ये विचार नौटंकी हैं तो मुझे लगता है ऐसे नौटंकी-बाजों को ही हिन्दुस्तान की सरकार चलाने का अवसर हमें प्रदान करना चाहिए. आपकी बेबाक टिप्पड़ी का हार्दिक धन्यवाद!

    bharodiya के द्वारा
    September 22, 2011

    वसुदेवभाई, चातकभाई आप दोनों से मै सहमत हुं । मेरी बात मै नीचे लिख चुका हु , देख लेना । बधाई दोनो को ।

    Santosh Kumar के द्वारा
    September 22, 2011

    आदरणीय वासुदेव जी ,..आदरणीय चातक जी मैं आप दोनों से सहमत हूँ ,..कांग्रेस को कुवराज के रास्ते में सिर्फ मोदी जी ही कांटा लगते हैं,..इसलिए …… मैंने सवाल इसलिए उठाया क्योंकि,. मेरा मानना है की अब धार्मिक प्रतीकों की राजनीति नहीं होनी चाहिए ,….साजिशों को पहले से समझना होगा ….हार्दिक बधाई

    chaatak के द्वारा
    September 22, 2011

    स्नेही बंधु, भरोदिया जी, एवं संतोष जी, ब्लॉग को सार्थक वार्ता की ओर ले जाने और स्नेही जनों के संशयों का समाधान करने के लिए मैं आप दोनों का अत्यंत आभारी हूँ. आपने न सिर्फ विचारों से सहमती जताई बल्कि तमाम तरह के सवालों पर अपने सटीक विचार रख कर ब्लॉग को सार्थक बनाया आप दोनों का हार्दिक धन्यवाद!

krishnashri के द्वारा
September 21, 2011

विचारों में विरोध होना जरुरी है ,समाज के विकास का यह स्वस्थ संकेत है .आतंकवादी बन्दुक से अपनी बात मनवाने का प्रयास करते हैं ,इस कारण वे आतंकवादी हैं .jw द्वारा अपनी प्रकृति का संकेत दे दिया गया है .किसी भी नई विधा में प्रारंभ में काफी उठा पटक होती है फिर स्थिरता आती है .ब्लाग लेखन अभी शैशवावस्था में है अभी इसे परिपक्व होने दीजिये .

    chaatak के द्वारा
    September 21, 2011

    स्नेही कृष्ण जी, विचारों में यदि विरोध-प्रतिरोध, तर्क-वितर्क न होंगे तो फिर सत्य के प्रकट होने की संभावनाएं भी समाप्त हो जाएँगी. हम अपने विचार किसी पर थोपें या फिर अपनी मान्यताओं के साथ समझौता करें तो दोनों ही स्थितियां अतिरेक कहलाएंगी जो एक सभ्य समाज के निर्माण में बाधक ही होंगी. ब्लॉग लेखन अभी परिपक्व नहीं है ये बात भी सही है लेकिन बात करने का सलीका और अच्छी मंशा इसे बेहतर तो बना ही सकती है. हमारा प्रयास रहेगा कि परस्पर विरोधी विचारों को भी हम सलीके से मंच पर रख सकें और एक स्वस्थ बहस को आगे बढ़ा सकें. धन्यवाद!

    bharodiya के द्वारा
    September 22, 2011

    कृष्ण जी विचारों में विरोध होना जरुरी है ,समाज के विकास का यह स्वस्थ संकेत है | जरूर कभी ये बात सच होगी , आज नही है । जब विचार करने वाले सिध्ध पुरुष , ज्ञानी या विज्ञाने होते है तब ये बात जरूर सत्य है । वो एक दुसरे के विरोधी विचारों का अध्ययन कर के सही निचोड निकाल लेते है । अपने गलत विचार को सुधार लेते है, समाज के लिये अच्छा है । लेकिन आज किस के विचार टकराते है ? न कोई सिध्ध, न ज्ञानी न विज्ञानी, सब अलेल टप्पु । कोई अपनी बात छोडता नही । टकराव चालु, लडाई चालु । लडाई से किस समाज का विकास होगा । आतन्कि को सजा देना नही देना विचारों का विरोध है । ये समाज का विकास तो क्या समाज का नाश करेगा । अब ज्यादा जरूरत है एकता की ।

ashutosh के द्वारा
September 21, 2011

bahut sahi likha hai bhai

    chaatak के द्वारा
    September 21, 2011

    स्नेही आशुतोष जी, प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

nishamittal के द्वारा
September 21, 2011

चातक जी,अभिवादन, यूँ तो राजनीति प्राय कुटिल होती है और कुटिलता का उत्तर सज्जनता से देना हमारी ऐतिहासिक परम्परा रही है,जिसका परिणाम दुर्दशाको प्राप्त होता हमारे देश है.और हम इसके दुष्परिनामों से शायद ही कभी मुक्त हो सकें.ये उदाहरण टोपी विषयक यही दर्शाता है कि किसी व्यक्ति को जेब गर्म कर वहां भेजा गया और भेजनेवाले ने तथा माध्यम दोनों ने अपनी असलियत का प्रदर्शन कर दिया

    chaatak के द्वारा
    September 21, 2011

    स्नेही निशा जी, सादर अभिवादन, आपकी राय का और आपकी तटस्थ दृष्टि का कायल हूँ मैं| मसला सामजिक हो, ऐतिहासिक या फिर राजनीतिक आपकी बेबाक और स्पष्ट राय हमेशा सही राह दिखाती है| पूर्वाग्रह से ग्रसित लोगों के विचार चाहे जो भी हों लेकिन एक बात सोलह आने सच है कि इस घटना में यदि कोई बेनकाब हुआ है तो वे हैं कुत्सित षड्यंत्रकारी और बिका हुआ वह मोहरा जिसने धर्म को अपनी गन्दी हरकत का माध्यम बनाने का जघन्य अपराध कर दिखाया है| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

suman dubey के द्वारा
September 21, 2011

चातक जी नमस्कार्। छोटा परन्तु सत्य की व्याख्या करता आलेख । आपका मेरे ब्लाग स्वागत है।

    chaatak के द्वारा
    September 21, 2011

    सुमन जी, सादर अभिवादन, सत्य पर मुहर लगाने और ब्लॉग पर आमंत्रित करने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद!

Tamanna के द्वारा
September 21, 2011

चातक जी, यहां बात धर्म से संबंधोत तो थी ही नहीं. मोदी केवल प्रधानमंत्री पद तक पहुंचने के लिए उस मंच पर बैठे थे. गोधरा कांड और वडोदरा में भड़के दंगों के इतने वर्षों बाद उन्हें अपनी भूल और पश्चाताप करने का अहसास हुआ. मुझे तो यह बात समझ नहीं आती कि क्यों हम जैसे पढ़े-लिखे लोग उनकी फिराक को समझ नहीं पाते. टोपी पहनना नहीं मोदी सिर्फ सिर्फ हमें टोपी पहनाना जानते हैं.

    chaatak के द्वारा
    September 21, 2011

    तमन्ना जी, यही तो मैं भी कह रहा हूँ की जिस मंच पर मोदी को टोपी पहनाने की कोशिश की गई वह कोई धार्मिक मंच नहीं था वहां या तो राजनीति हो रही थी या भी राष्ट्रनीति (जैसा की मोदी ने कहा) ऐसे में धार्मिक भावनाओं को उत्तेजित करके या किसी धर्म विशेष को लज्जित करवा कर मुल्ला जी अपना कौन सा उल्लू सीधा कर रहे थे? रह गई बात मोदी की तो गुजरात एक बहुत ही पढ़े लिखे और जागरूक लोगों का प्रदेश है और वहां के लोग उन्हें स्पष्ट बहुमत दे रहे हैं इसका मतलब सीधा है- गुजराती गुमराह नहीं बल्कि उन्हें अपनी राह पता है और उन्हें ये भी मालूम है ‘दंगा करने के लिए दंगाई यानि कातिल गुनाहगार थे मोदी नहीं’ वर्ना इतनी आसानी से वे बहुमत में न आ पाते| आपकी विस्तारित एवं संतुलित प्रतिक्रिया का तहे-दिल से शुक्रिया!

    bharodiya के द्वारा
    September 22, 2011

    तमन्ना जी दंगे सिर्फ वडोदरा नही पूरे गुजरात भडके थे । और बडे पैमाने पे थे । कोई भी प्रशासन उसे रोक नही पाता । गुजरात का प्रिंट मिडिया पूरा कोन्ग्रेसी है, टी.वी. भी कम नही है । मोदी के प्रशासन की विफलता को बडी चालाकी से दूसरी दिशा दी गई । दंगे की चिनगारी, गोधरा की ट्रेन मे हिन्दुओं का सामुहिक कत्लेआम भुला दिया गया और मुस्लिमों की मौतों को बार बार दिखाया गया । ऐसी अफवाहें फैला दी की दंगे मोदीने करवाये । जनून का समय था , मुस्लिमों को तो मानना ही था, कुछ मुर्ख हिन्दुओं ने भी मान लिया । ऐसे ही १४-१५ मुर्ख मोदी के ही गांव के, मेरे यहा काम करते थे । वो सब भी टी.वी देख के जोश मे आ गये थे । सबने सुना की दंगा मोदी ने करवाया है, तो सीधा ठप्पा ही मर दिया, हा, ऐसा करना ही चाहिये, जरूर करवाया होगा । लोगोंने देखा नही ये बात कौन, किस मकसद से केह रहा है, बस किया-करवाया के चक्करमे मोदी को बदनाम कर दिया । लोग भूल, पश्चाताप और माफी की बात करते है । किस बात की माफी ? बात उनकी विफलता की होती तो मांग लेते पर हत्यारे का आरोप लगा दिया था । कौन स्वाभिमानी नेता मुर्खों के सवाल के जवाब देता और अपना बचाव भी करता । कोर्ट को ही जवाब देना था जो दे दिया । मोदीने भी अनशन से ईशारा कर ही दिया । समजदार तो साथ हो लिए मुर्ख अभी आशा लगाए बैठे है के मोदी अभी माफी मांगेंगे, उनकी टोपी देंगे हमारी लेंगे । ये टोपा-टोपी का खेल नही था बस चेक कर लिया कौन कहां है।

    chaatak के द्वारा
    September 22, 2011

    भरोदिया जी, यहाँ आपकी बात में मैं एक और तथ्य जोड़ना चाहूँगा- मोदी विरोधी (राष्ट्र विरोधी) ताकतों ने मीडिया का भी जबरदस्त गलत इस्तेमाल किया था. मोदी के ऊपर आरोप लगाया गया कि उन्होंने गोधरा में जलाये गए ४९ हिन्दुओं की लाशें अहमदाबाद में मंगवा कर जनता के आक्रोश को भड़काया और नतीजा ये हुआ कि सांप्रदायिक हिंसा को रोकना मुश्किल हो गया. लेकिन मीडिया ने ये नहीं लिखा कि वे ४९ लाशें इसलिए अहमदाबाद लाई गयीं थी क्योंकि वे सभी अहमदाबाद के ही निवासी थे. क्या हम ये मान लें कि यदि कोई हिन्दू इस तरह के धार्मिक उन्माद का शिकार हो तो उसकी लाश भी उसके घर न भेजना सेकुलरिज्म कहलायेगा? लानत है ऐसे सेकुलर लोगों पर और ऐसी सोच वाले राजनीतिक दलों पर!

jw के द्वारा
September 21, 2011

बीप-बीप चक्कर! जरा बीप-बीप बीप-बीप !

    Aakash Tiwaari के द्वारा
    September 21, 2011

    आदरणीय श्री JW जी, आपकी पहचान सिर्फ इतनी है की आपका नाम JW है.आप अगर थोडा भी पढ़े लिखे होते तो जरूर इस मुद्दे पर आदरणीय श्री चातक जी से बहस करते लेकिन आपने ऐसी बात लिख कर अपना बहुत ही अच्छा परिचय दिया….जनाब जब मुद्दे पर बहस नहीं कर सकते तो..जाइए कहीं हांथों में केतली लेकर चाय बेचिए ये पढ़े लिखों का मंच है..अनपढ़ों का नहीं…. आकाश तिवारी

    chaatak के द्वारा
    September 21, 2011

    भाई जरा बात को खुलासा कहो और अच्छा होगा कि बिना गंदगी फैलाए कहो| ये मेरा ब्लॉग है आपकी खाला का घर नहीं जो जहां जो मन आये करो| तनिक भी अक्ल है तो बात समझ गए होगे|

    chaatak के द्वारा
    September 21, 2011

    प्रिय आकाश जी, आपकी राय से मैं भी इत्तेफाक रखता हूँ, इस तरह के गन्दी मानसिकता के लोग यदि केतली लेकर चाय बेचने निकल जाएँ तो देश का काफी भला हो सकता है| इस तरंगी प्रतिक्रिया को पढ़कर अनायास ही हंसी आ गई| बहुत बहुत धन्यवाद बंधु!

    Santosh Kumar के द्वारा
    September 21, 2011

    आकाश जी ,.नमस्कार आपका बहुत धन्यवाद ….बहुत सुन्दर जबाब देने के लिए

    bharodiya के द्वारा
    September 21, 2011

    चातकभाई तुण्डे तुण्डे मतिर्भिन्ना । ये तो बीप बीप की शुरुआत मात्र है । आगे चल के ईस फोरम मे अब्युज बटन भी लगाना पडेगा ।

    chaatak के द्वारा
    September 22, 2011

    बंधु भरोदिया जी, नाना-मुनि, नाना-मति वाली कहावत बिलकुल ठीक कही आपने! मैं भी इस बात से सहमत हूँ कि इस प्रतिष्ठित ब्लॉग-मंच पर ऐसी गन्दी हरकतों को रोकने के लिए एक एब्यूज विकल्प भी होना चाहिए.

sadhana thakur के द्वारा
September 21, 2011

चातक भाई …….मुझे राजनीती की ज्यादा समझ तो नहीं पर जो देखती और सुनती हूँ उसके आधार पर तो सिर्फ इतना ही कह सकती हूँ की ये वो भट्टी हैं जनाब जिसमें हर कोई अपनी रोटियां सेकना चाहता हैं ..आपका बेबाक स्पस्टीकरण बहुत अच्छा लगा ………….

    chaatak के द्वारा
    September 21, 2011

    बहन साधना जी, अच्छा है कि सामान्य हिन्दुस्तानियों को राजनीती समझ नहीं आती वर्ना देश में शायद कभी शान्ति ही न रहे आपकी लेख का बेबाक अंदाज पसंद आया इसके लिए आपका शुक्रगुजार हूँ| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

Paarth Dixit के द्वारा
September 21, 2011

प्रिय चातक जी, बहुत सुन्दर आलेख..बधाई हों.. paarth.jagranjunction.com

    chaatak के द्वारा
    September 21, 2011

    स्नेही पार्थ जी, लेख की सराहना करने का हार्दिक धन्यवाद!

rkpandey के द्वारा
September 21, 2011

प्रिय चातक जी, बहुत दिनों बाद मंच पर उपस्थित हुआ हूं और आप की मौजूदगी देखकर हर्ष का अनुभव हो रहा है. इसी विषय पर मैं भी लिखने जा रहा था इसलिए आपके ब्लॉग पर अपनी प्रतिक्रिया जरूर देना चाहता हूं. कठमुल्लापन और रुढ़िग्रस्तता से पीड़ित मुस्लिम धार्मिक गुरुओं ने जहालत की महान परंपरा स्थापित की है. अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों को साधने की कोशिश के कारण राष्ट्र के प्रति उनकी निष्ठा हमेशा संदेह के घेरे में रही है. दुखद ये है कि आम मुसलमान भी इनके जाल में फंसा हुआ है. उसे विकास और राष्ट्र दोनों नहीं दिखते. मीडिया हो या राजनीतिज्ञ दोनों गुजरात दंगों की बात करते हैं किंतु उन्हें गोधरा नरसंहार  नहीं दिखता. हर क्रिया की प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से होती है. लोगों को निष्पक्ष होना चाहिए तभी न्यायसंगत बात की जा सकती है. आपका आलेख राष्ट्रवाद से ओतप्रोत होने के कारण अति प्रशंसनीय है. धन्यवाद

    chaatak के द्वारा
    September 21, 2011

    स्नेही श्री पाण्डेय जी, इस ब्लॉग पर आपकी इतनी सकारात्मक प्रतिक्रिया पढ़कर उस विश्वास को बल मिलता है की पत्रकारिता में अभी भी सत्य और तथ्य सामने रखने का जज्बा भी है और साहस भी| ‘कठमुल्लापन और रुढ़िग्रस्तता से पीड़ित मुस्लिम धार्मिक गुरुओं ने जहालत की महान परंपरा स्थापित की है’ इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता| ये प्रश्न क्यों नहीं उठाया जाता की गुजरात दंगों के बीज जिस गोधरा नरसंहार ने बोये वो क्या समाजसेवा थी? न्याय निष्पक्ष और आलोचना निर्भीक होनी चाहिए लेकिन राजनीती और राष्ट्रनीति में विभेद कर पाने वालों की खासी कमी है प्रबुद्ध वर्ग में भी, शासन में भी और प्रशासन में भी| आपकी इस विस्तारित प्रतिक्रिया ने लेख को जो पूर्णता प्रदान की उसका हार्दिक धन्यवाद! आपके लेख का इन्तजार रहेगा|

    arvindavasthi के द्वारा
    September 23, 2011

    प्रिय पाण्डेय जी , मुस्लिम धर्म गुरुयों के लिए कही गयी बात से सहमत हूँ परन्तु आम मुस्लिम ने भी गुजरात में विकास देखा है और उसे भोग रहा है निश्चित रूप से उसका श्री मोदी जी में विश्वास बढ़ा है धर्म के एवं राजनीति के ठेकेदारों को कुछ भी कहने दीजिये श्री मोदी जी द्वारा गुजरात के लिए किया गया विकास कार्य जिसने गुजरात की जनता का जीवन स्तर ऊँचा किया है मुस्लिम जनता समान रूप से उसमे भागी दार है श्री मोदी जी यह सोंच ही उन्हें देश का प्रधानमंत्री बनाएगी धन्यवाद

Santosh Kumar के द्वारा
September 21, 2011

आदरणीय चातक जी ,.सादर अभिवादन कारण कोई भी हों ,..मैं मानता हूँ की मोदी जी और मुल्ला जी दोनों के आचरण में दिखावा ही था ,..किसी की गंभीरता नहीं दिखी http://santo1979.jagranjunction.com/

    chaatak के द्वारा
    September 21, 2011

    स्नेही संतोष जी, आपकी बात से तो मैं भी सहमत हूँ नेता तो होते ही पैदाइशी नौटंकीबाज इन्हें तो गिरगिट का अवतार कहा ही जाता है लेकिन मुल्ला जी….. कौन सी टोपी और क्यों पहनाने चले आये? प्रतिक्रिया द्वारा चर्चा को आगे बढ़ने का हार्दिक धन्यवाद!

    Santosh Kumar के द्वारा
    September 21, 2011

    आदरणीय चातक जी ,.मुझे लगता है की नेतागिरी से ज्यादा खतरनाक होता है इसका चस्का,..मुल्ला जी को भी लगा होगा कि शायद बात बन जाये,…नहीं बनी तो विपक्षी तो बना ही देंगे ,…आपने देखा होगा .टोपी पहनने से इनकार करने पर मुल्ला जी ने बाखुशी अपनी शाल समर्पित कर दी ,…लेकिन वहां से निकलते ही सुर बदल लिए …जब फ्रिक्वेंसी बदल जाये तो चैनल तो बदलेगा ही ………बिलकुल सही कहा है आपने ,..इस्लाम को जेब में रखने वाले मुल्ला ही इस्लाम के सबसे बड़े दुश्मन हैं ,.. कभी समय मिले तो मेरे ब्लाग पर भी नजर मार लीजिये ,..उम्मीद करता हूँ आप निराश नहीं होंगे ,…हार्दिक धन्यवाद

    chaatak के द्वारा
    September 21, 2011

    स्नेही श्री संतोष जी, सादर अभिवादन, “जब फ्रिक्वेंसी बदल जाये तो चैनल तो बदलेगा ही…” बिलकुल सटीक व्याख्या की आपने दोगले आचरण की| मैंने भी जब मुल्ला जी का बयान देखा तो आश्चर्यचकित रह गया कि ये आदमी है या गिरगिट! सच तो ये है कि ऐसे गंदे लोगों के लिए फतवा जारी होना चाहिए न कि सलमान रुश्दी और तसलीमा नसरीन जैसे लोगों के लिए| ब्लॉग पर आमंत्रित करके आपने जो इज्ज़त बख्शी है उसका हार्दिक धन्यवाद| शीघ्र आपसे आपके ब्लॉग पर संवाद करूंगा|

krishnashri के द्वारा
September 21, 2011

बहुत सुन्दर , आगे क्या कहूँ ,बहुत सुन्दर ,बधाई |

    chaatak के द्वारा
    September 21, 2011

    स्नेही कृष्ण जी, पोस्ट पर सकारात्मक प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

    ramesh के द्वारा
    October 2, 2011

    हिंदू लतखोर हैं उन्‍हें इसी  में आनंद आता है ।तभी तो अफगानिस्‍तान से लेकर इंडोनेशिया तक  हिंदू इतिहास की किताबों में  सिमट कर रह गए हैं। यदि  अपनी लतखोरी नहीं छोड़ी तो भारत में भी इस्‍लामी राज्‍य कायम होगा।


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