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आदाब अर्ज़ है!

Posted On: 7 Sep, 2011 Others में

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“आदाब अर्ज़ है! अमाँ मियां तुम ऐसे शुतुरमुर्ग की तरह मुंह लटकाए क्यों बैठे हो?” हमेशा की तरह मिर्ज़ा ने आँखें नचाते हुए कहा| “क्या कोई सगे वाला अल्लाह को प्यारा हो गया?”
ग़ालिब ने नज़रें ऊपर उठाई और मिर्ज़ा को बैठने का इशारा करते हुए बोले- मौके की नजाकत को समझो मियां अभी सियासी सरगर्मियां और बढ़नी हैं और न जाने कितना तिया-पांचा होना है ऐसे में दिल्ली हाई-कोर्ट में हुए धमाकों ने तो मानो सियासतदानों को एक और मौका दे दिया है|
अच्छा, तो आपने भी खबर सुन ही ली, लानत भेजो इन शैतान की औलादों को! नामुराद इस्लाम का नाम ले के सारी गैर इस्लामिक हरकतें करते हैं और जलालत हम उठाते हैं| हमें तो ये भूले भी ज़माना गुजर गया कि हमारी नस्लें गैर मुल्क में पैदा हुई थीं| दादे-परदादे यही कहते-कहते जन्नत नशीं हो गए कि हिन्दुस्तान ही मादरे-वतन है, इससे गद्दारी कौम से गद्दारी होगी, लेकिन पाकिस्तानी कठमुल्ले न जाने कौन सी घूटी पिलाते हैं लोगों को कि वे अपने मुल्क और कौम से गद्दारी करके हमारे लिए रोज़ नयी मुसीबतें पैदा करते रहते हैं| मिर्जा ने अपनी सफ़ेद दाढ़ी में उंगलियाँ फेरते हुए कहा|
सही कहते हो मिर्ज़ा, मानो अपनी पुरानी यादों को ताजा करते हुए ग़ालिब ने अपने लगभग गंजे हो चले सर पर हाथ फिराया, मैं तो ये भी नहीं कह सकता कि किसी गैर मुल्क की यादें हमारी रगों में होंगी| हमारी तो जड़ें भी यहीं हैं तने, टहनियां और पत्ते भी यहीं हैं|
“लेकिन क्या इस बात से इनकार कर सकते हो कि हर बार आतंकी हमले हमारे बीच रह रहे गद्दारों की कारगुजारियों के कारण ही होते हैं?” मिर्ज़ा के चेहरे पर अब स्वाभाविक खुशमिजाजी की जगह चिंता की लकीरें नज़र आने लगीं|
क्या जवाब दूं? ग़ालिब ने मानो सवाल से बचने की कोशिश की|
‘जवाब देने की जरूरत भी नहीं| सही तो ये हैं कि हमारे रहनुमाओं ने हमें हिन्दुस्तानी बनने ही नहीं दिया|’ मिर्ज़ा की कडवाहट मानो दिल से निकल कर जुबान पर आने लगी| अव्वल तो बुखारी जैसे कौम के रहनुमा हैं जिन्हें बोलने तक की तमीज नहीं और उस पर हमारे खैरख्वाह सियासतदान जिन्हें हमारे बीच फैली अशिक्षा का फायदा उठाना खूब आता है| पिछले ६४ साल से हम सिर्फ कठपुतली वोट बैंक बनकर रह गए| न हमने कोशिश की और न इन लोगों ने हमें मुल्क की मुख्य धारा से मिलने दिया| हम सिर्फ मुसलमान बनकर रह गए अपनी नजर में भी और दूसरों की नज़र में भी|
मिर्ज़ा ने मानो ग़ालिब की सोच को दिशा दे दी- हमारी मजबूरी भी देखो कि हम इस बात को इस चारदीवारी में तो कर सकते हैं लेकिन मंच पे खड़े होकर नहीं| आश्चर्य नहीं कि मुल्क का समर्थन करने के लिए हमें काफिर ही घोषित कर दिया जाय| हमें शायद आदत हो चुकी है कि हम कभी कौम के ठेकेदारों के तो कभी सियासी रहनुमाओं के हाथ की कठपुतली बने रहें और हर बार जब आतंकी हमले हों तो अपने गिरहबानों में झाँक कर तय करे कि कोई छीटा हमारे ऊपर तो नहीं पड़ रहा|
आदत ही कह सकते हो मियां वरना क्या ऐसा है कि जुबान में हकीकत बयानी की जुर्रत नहीं आती| जब भी कोई हादसा होता है तो दर्द कितना भी हो लगता है दर्द नहीं शर्म छिपा रहे हैं| कहते-कहते मिर्जा का लहजा फिर से व्यंगात्मक हो गया और दिल के किसी कोने में टीस को दबाते हुए सफ़ेद दाढ़ी के बीच से मुस्कुराए और बोले- इन हादसों के बहाने ही सही कम से कम दिल की बात जुबान तक आई तो सही, चलता हूँ मियां अगले हादसे का इंतज़ार रहेगा, देखते हैं हम इन गद्दारों के किये की जलालत कब तक उठा पाते हैं| आदाब अर्ज है! कहते हुए मिर्ज़ा बाहर निकल गए लेकिन ग़ालिब चाह कर भी खुदा-हाफ़िज़ न कह पाए|

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44 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Kineedurparia के द्वारा
October 27, 2011

हाँ, सही ढंग से .

Abdul Rahman के द्वारा
October 1, 2011

चातक जी नमस्ते आपका लेख पढ़ कर दिल खुश हो गया! आपने व्यंग के माध्यम से जिस खूबसूरती से हक़ीक़त बयाँ किया है उसकी जितनी तारीफ की जाये कम है! ‘जवाब देने की जरूरत भी नहीं| सही तो ये हैं कि हमारे रहनुमाओं ने हमें हिन्दुस्तानी बनने ही नहीं दिया|’ ये तो और काबिले तारीफ है ! अगर इन जैसे रहनुमा नही होते और हम इनकी गन्दी राजनीति को पहले समझ गये तो आज अपना हिंदुस्तान कहीं और होता ! काश की हर हिन्दुस्तानी इस बात को समझता ! जय हिंद जय भारत

    chaatak के द्वारा
    October 5, 2011

    रहमान जी, सादर अभिवादन, आपकी इस टिप्पड़ी ने आशा दिलाई कि जागृति की लहर तेज हो चुकी है जल्द ही हम सभी मिलकर हिन्दुस्तानी होने के गर्व के साथ कदम से कदम और कंधे से कंधा मिलायेंगे और एक ऐसी अर्थी उठाएंगे जिसपर जनाज़ा होगा इस गन्दी राजनीती का और कंधे होंगे चार एक हिन्दू का दूसरा मुसलमान का और तीसरा सिख का और चौथा ईसाई का| आमीन !

sadhana thakur के द्वारा
September 13, 2011

चातक भाई ,पहली बार आपकी रचना पढ़ी ,कायल हो गई ,,बहुत अच्छा लगा ……आदाब अर्ज हैं ………….

    chaatak के द्वारा
    September 14, 2011

    साधना जी, अभिवादन, आपको ब्लॉग पसंद आया ये जानकर बेहद ख़ुशी हुई| तारीफ़ और हौसला-अफजाई का शुक्रिया|

deepika के द्वारा
September 9, 2011

“पिछले ६४ साल से हम सिर्फ कठपुतली वोट बैंक बनकर रह गए|” सच है ये पंक्तियाँ पर अधूरा सच क्यूंकि और भी तो काम है इनके पास.ये कहाँ समझते है इन चाँद पंक्तियों को चाहे जो धर्म तुम्हारा हो , चाहे जो हो वादी यदि नहीं जी रहे देश हित तो निश्चय ही अपराधी हो बहुत सही सोच के साथ लिखा है आपने अच्छी पोस्ट

    chaatak के द्वारा
    September 9, 2011

    दीपिका जी, आपकी नज़रें ठीक उस लकीर पर पड़ी हैं जो बहुत ही धुंधली सी दिखती है| हम तर्क चाहे जितने दें लेकिन सच तो यही है कि कारण कुछ भी हो लेकिन वह जीवन जो राष्ट्रहित से नहीं जुड़ा है निश्चय ही अपराधी है| प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद! वन्देमातरम!

akraktale के द्वारा
September 8, 2011

दादे-परदादे यही कहते-कहते जन्नत नशीं हो गए कि हिन्दुस्तान ही मादरे-वतन है, चातकजी बहुत सुंदर तमाचा है.मगर ये गांधी का देश है, एक गाल पे मारोगे तो ये दुसरा आगे कर देंगे पर ये ना बोलने की कसमें खाये बैठे हैं देख सुन के भी क्या करेंगे.

    chaatak के द्वारा
    September 8, 2011

    स्नेही अशोक जी, काफी हद तक आपका आंकलन सही है और इसका कारण है निहित स्वार्थ का राष्ट्रहित पर हावी होना| सहन करने की सभी सीमाएं अब टूटने लगी हैं संकेत अच्छे हैं फिर भी अभी काफी लम्बा रास्ता है या आप ये भी कह सकते हैं की सुबह होने से पहले अन्धकार एक बार और ज्यादा गहरा हो जाता है और अपने देश की स्थिति कुछ ऐसी ही है| ईश्वर राष्ट्र को इस अन्धकार से लड़ने की शक्ति दे! प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

Lahar के द्वारा
September 8, 2011

आप बहुत बेहतरीन लिखते है , हमे बहुत अच्छा लगा ! आपके शब्द गजब के है ! दिल्ली बम बिस्फोट दुखद तो है लेकिन हिंदुस्तान में सुरक्षित रहने का अधिकार सिर्फ राजनेताओं को है | आम जनता तो लावारिश की तरह है ! कुछ मुठी भर लोग सरहद पार से आते है और जाने कितनी बहनों के भाई , सुहागिनों के सिंदूर और जाने कितनी माँ की औलादे छीन ले जाते है और हमारे सियासी नेता आश्रितों को कुछ रूपये देकर सहनुभूति के वोट फिर पा जाते है और भारत के लोगो को भूलने की बीमारी बचपन से होती है | और ये धमाके इसी तरह चलते रहते है |

    chaatak के द्वारा
    September 8, 2011

    स्नेही लहर जी, आपकी चिंता भी जायज है और निष्कर्ष भी| आम आदमी सिर्फ कहने को आम आदमी होता है इसके पास हर दुःख को भुला लेने वाला दिमाग और हर सदमे को सह लेने वाला दिल होता है| न जाने कितनी तकलीफों से हर रोज सैकड़ों मौत मरता ये आदमी आज भी मुस्कुराने के पल खोज लेता है| यदि युवा जागृत रहा तो धमाकों से निजात मिल जाएगी| आमीन!

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
September 8, 2011

प्रिय चातक भाई मिर्जा का कहना ही तो चिंता का सबब बना है और सब खून के कतरे बहे जा रहे पता नहीं दुनिया से पागलपन का ये दौर कभी ख़तम भी होगा या यों ही हमें देखते जाना होगा ….सुन्दर व्यंग्य भरा सार्थक गंभीर मुद्रा का लेख….. कठमुल्ले न जाने कौन सी घूटी पिलाते हैं लोगों को कि वे अपने मुल्क और कौम से गद्दारी करके हमारे लिए रोज़ नयी मुसीबतें पैदा करते रहते हैं| भ्रमर ५

    chaatak के द्वारा
    September 8, 2011

    स्नेही बंधु भ्रमर जी, सही कहा आपने ये वहशियाना हरकतें सिर्फ जहालत और घ्रणित मानसिकता को दर्शाती हैं| इंसानों का खून बहा कर सिर्फ दरिन्दे अपनी बात कहते हैं ये न तो सभी समाज की सोच है और न ही इंसानी मानसिकता| इन्हें तो आदमखोर शैतान कहना ही शायद उचित होगा| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

संदीप कौशिक के द्वारा
September 8, 2011

चातक जी, कड़वी हक़ीक़त के अंदर से होकर गुज़रता प्रयास आपका ।

    chaatak के द्वारा
    September 8, 2011

    स्नेही संदीप जी, आपकी राय जानकर बेहद ख़ुशी हुई| कोटिशः धन्यवाद!

sumandubey के द्वारा
September 8, 2011

चातक जी सच लिखा आपने भारतीय मुसलमानों की यही तो पीड़ा है, कि कभी कौम के रहनुमा और कभी देश के राज नेताओं ने उन्हे एक हिन्दूस्तानी बनने ही, नही दिया कभी धर्म के नाम पर कभी वोट बैक के नाम पर बस इस्ते माल ही करते रहे।यह हमारे देश की एकता के लिये बहुत बड़ा दुर्भाग्य है।

    chaatak के द्वारा
    September 8, 2011

    सुमन जी, हमारे देश की सबसे बड़ी विडम्बना यही है की हम एकता की बात तो करते हैं लेकिन इसकी जिम्मेदारी नागरिकों पर न डाल कर सम्प्रदायों का मुंह देख कर तय की जाती है ऐसे में देश में युवा शक्ति ही हमेशा चिंतित और कदम कदम पर पराजित और हताश होती हैं| जो बदल सकती है इस दुनिया के मौसम का मिजाज़, उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये|

Harish Bhatt के द्वारा
September 8, 2011

चातक जी सादर प्रणाम. हमारे रहनुमाओं ने हमें हिन्दुस्तानी बनने ही नहीं दिया|’ मिर्ज़ा की कडवाहट मानो दिल से निकल कर जुबान पर आने लगी| अव्वल तो बुखारी जैसे कौम के रहनुमा हैं जिन्हें बोलने तक की तमीज नहीं और उस पर हमारे खैरख्वाह सियासतदान जिन्हें हमारे बीच फैली अशिक्षा का फायदा उठाना खूब आता है| पिछले ६४ साल से हम सिर्फ कठपुतली वोट बैंक बनकर रह गए|

    chaatak के द्वारा
    September 8, 2011

    स्नेही हरीश जी सादर अभिवादन, ब्लॉग पर आपकी राय जानकर बहुत ख़ुशी हुई काश कि ये बात युवाओं को समझ में आ जाए कि मिटटी की तासीर किसी भी व्यक्तिगत स्वार्थ से ज्यादा पोषक होती है तो सारा मामला ही ख़तम हो जाए| आमीन !

वाहिद काशीवासी के द्वारा
September 8, 2011

चातक जी, कॉंग्रेस की सदाबहार तुष्टिकरण की नीति का उघड़ा हुआ रूप दिखा दिया है आपने। जब तक मुसलमान भाई इन बेग़ैरत सियासतदानों से छुटकारा नहीं पा लेते तब तक तो स्थिति में कोई सुधार नहीं होने वाला। जागृति की सख़्त ज़रूरत है।

    chaatak के द्वारा
    September 8, 2011

    स्नेही वाहिद जी, आपकी बात से मैं भी अक्षरशः सहमत हूँ| स्थिति में सुधार लाने के लिए युवा शक्ति को ही एकजुट होना होगा| अन्ना का आन्दोलन ज्वलंत उदाहरण है| वन्देमातरम!

div81 के द्वारा
September 8, 2011

कमजोर इन्सान भी तब चिन्हुंक उठता है जब उसके अपने या अपनों के ऊपर जान पर बन आती है एक ये सत्ता में बैठे लोग है जिनको न तो गलती महसूस होती है न ही शर्म महसूस होती है संसद में बम विस्फोट हुआ अफजल गुरु को सिर्फ इस लिए सजा नहीं दी जारही क्यूंकि एक तबके के वोट बैंक नाराज हो जायेंगे, (अफजल गुरु को संसद हमला मामले में दोषी ठहराते हुए 18 दिसंबर 2002 को एक स्थानीय अदालत ने फांसी की सजा दी थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने 29 अक्तूबर 2003 को दिए फैसले में इस सजा को बरकरार रखा। इसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट में अपील की जो 4 अगस्त 2005 को नामंजूर हो गई। सेशन जज ने तिहाड़ जेल में उसकी फांसी की तारीख (20 अक्तूबर 2006)भी तय कर दी थी। मगर, उसके बाद उसने राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर कर दी जहां से इसे गृह मंत्रालय के पास भेजा गया। मंत्रालय ने अभी तक याचिका अपने पास ही रखी है।) उसी अफजल को बचाए रखने का नतीजा कल दिल्ली में निकल गया “हूजी की धमकी, अफजल गुरु की फांसी रोको वरना सुप्रीम कोर्ट उड़ा देंगे”

    chaatak के द्वारा
    September 8, 2011

    दिव्या जी, आपके शब्द बता रहे हैं- पीर पर्वत सी हुई अब ये पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकालनी चाहिए| अभी तक भ्रष्टाचारी राजनेता समझते थे कि उनका बाल भी बांका नहीं होगा और हमेशा इनकी पौ बारह रहेगी लेकिन कुछ गिरफ्तारियां होते ही सभी के चेहरों पे पौने बारह बज रहे हैं| यही स्थिति जल्द ही इन आतंकियों की होनी है| प्रतिक्रिया और सरकार का बेबस चेहरा दिखने वाली प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद!

abodhbaalak के द्वारा
September 8, 2011

चातक जी यदपि आपने इस पूरे लेख को हास्य और व्यंग के रस में लिखा है पर इससे इस विषय की गंभीरता को नकारा नहीं जा सकता है, मुझे यकीन है की ये दर्द जो की आपने बयाँ किया है इस देश के बहुत सरे मुस्लिम लोगों का दर्द है, जब तक हमारे देश में आतंकवादियों को दामाद बना कर रखा जायेगा और उन पर …., तब तक ऐसा ही होगा भाई मेरे…. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

    chaatak के द्वारा
    September 8, 2011

    प्रिय अबोध जी, आपकी राय जानकर बेहद ख़ुशी हुई| हम सभी आम हिन्दुस्तानी हैं और इस लिहाज़ से हमारे दर्द भी एक जैसे हैं आशा है जल्द ही सरकार भी इस दर्द को समझेगी| आमीन!

Amita Srivastava के द्वारा
September 8, 2011

कब तक आम आदमी सब कुछ सहता रहेगा , खुदा हमारे मुल्क सहित सारे जहाँ को चैने -सुकून बक्शे |

    chaatak के द्वारा
    September 8, 2011

    अमिता जी, आपकी इस छोटी सी प्रतिक्रिया में एक आम हिन्दुस्तानी का दर्द स्पष्ट हो रहा है| आपकी दुआ में एक स्वर हमारा भी शामिल कर लें| आमीन !

alkargupta1 के द्वारा
September 8, 2011

चातक जी , देश की राजनीति पर बहुत ही सुन्दर व्यंग्य किया है……पात्र के मुख से बहुत ही कड़वा सत्य कहलवाया है…..हमारे रहनुमाओं ने हमें हिन्दुस्तानी बनने ही नहीं दिया……..ग़ालिब चाह कर भी खुदा हाफिज़ न कह पाए…….उत्कृष्ट रचना है !

    chaatak के द्वारा
    September 8, 2011

    आदरणीय अलका जी, आपने जिस तरह इस ब्लॉग के मुख्य बिंदु को सामने रखा है उससे पता चलता है कि आप कितनी गहराई से चीजों को समझती हैं आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए आपका कोटिशः धन्यवाद!

ashvinikumar के द्वारा
September 8, 2011

बड़ी देर कर दी मेहरबां आते आते ,,कल दो चीजें एक साथ हुईं दोनों मतलब समझो भाई ,,,एक तो वो बड़ा वाला तरबूज जैसा जैसा बम ,,और दूसरा भारत ने दिया एक तोहफा अपने माँ जाए भाई बंगलादेश को भारतीय भूमि बंगलादेश के 1,70,000 मुसलमानों को भारत में शरण दी जाएगी जिनकी कुल भूमि है 5400 एकड़ ,,,,,और भारत के 30000 हिन्दुओं की 17500 एकड़ भूमि बंगलादेश को दी जा रही है ,,,, और साथ में भारत के हिन्दुओं के ऊपर एक शर्त भी थोपी गयी है की यदि आप भारत सरकार से अपनी भूमि पर कोई दावा नहीं करते हैं तो आप भारत में कहीं भी रह सकते हैं ,,,,,ये देश हमारा है ? है न दोहरी खुशी,,, धर्मनिर्पेक्क्ष्ता की जय हो ,,नही राम नाम सत्य हो ………………………………………….जय भारत ………यार गुस्सा तेरे पर ही निकाल दिया अब सतत मशाल जलाए रखना :)

    chaatak के द्वारा
    September 8, 2011

    स्नेही अग्रज, आपकी विचार जानकर जहाँ एक और ख़ुशी हुई वहीँ दूसरी और आपके द्वारा दी गई जानकारी से पीड़ा भी हुई| आपके लिए दुष्यंत कुमार जी की दो पंक्तियाँ- मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए; वन्देमातरम!

nishamittal के द्वारा
September 8, 2011

चातक जी ,आपने सही कहा है,ये तातःकथित धर्मगुरु ,तथा नेता अपने स्वार्थ के लिए हमेशा बांटने वाली राजनीति करते हैं.

    chaatak के द्वारा
    September 8, 2011

    निशा जी, इस बात से हम सभी वाकिफ हैं फिर भी ये हमारे ऊपर अपनी राय और हुकूमत चलाते हैं कैसे? मुझे तो लगता है इस देश में सोने वाले ज्यादा और जागने वाले कम हैं इसीलिए हमारे चारो तरफ अच्छे रहनुमा भी कम और गद्दार ज्यादा हैं| सटीक प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद!

Santosh Kumar के द्वारा
September 8, 2011

आदरणीय चातक जी ,..दर्दनाक मंजर में ग़मगीन सब हैं ,..ग़ालिब ,मिर्जा तिहरे दर्द को ढो रहे हैं ,..रहनुमाओं को पता नहीं कब अकल आएगी ,… आएगी भी या …??????????

    chaatak के द्वारा
    September 8, 2011

    स्नेही श्री संतोष जी, अक्ल रहनुमाओं को नहीं अनुगामियों को आनी चाहिए| जब तक हम स्वयं मानसिक दासता से मुक्त नहीं होना चाहेंगे तब तक उन लोगों को होश कहाँ आएगा जो हमारी गफलत से अपनी हुकूमत चलाते हैं| इन्हें ऐसे अक्ल नहीं आएगी इनकी अक्ल ठिकाने लगानी पड़ेगी|

    Santosh Kumar के द्वारा
    September 20, 2011

    चातक जी,..आपकी बात से पूरा सहमत हूँ ,..साभार

    chaatak के द्वारा
    September 21, 2011

    संतोष जी, आपकी सहमति जिस राष्ट्रवाद के लिए है वह निःसंदेह अनुकरणीय है जैसे जैसे ये कारवाँ बनता जायेगा विघटनकारी शक्तिया कमजोर होती जाएँगी. एक बार फिर हार्दिक धन्यवाद!

Ramesh Bajpai के द्वारा
September 8, 2011

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    Ramesh Bajpai के द्वारा
    September 8, 2011

    कमेन्ट ही गायब हो गया प्रिय श्री चातक जी मै कह रहा था की कायराना करतूतों से माँ भारती का ह्रदय विदीर्ण करने वाले नर पिशाचो का अंत निश्चित ही होना है | इस आग में सियासत का खेल खेलने वाले रहनुमाओ पर जनता का कुफ्र टूटेगा ही | इस निदनीय कृत्य की जितनी भर्थना की जाय कम है |

    chaatak के द्वारा
    September 8, 2011

    आदरणीय श्री बाजपेयी जी, सादर प्रणाम, जब सत्ता ऐसे कायरों के हाथों में हो जो अपने ही पति, अपने ही पिता को सजा न दिला सके तो जनता के लिए आप अपेक्षा भी क्या कर सकते हैं| कायरो के हाथों में देश की बागडोर हो तो मेंढकी तो नाल ठुंकाने का दम भरेगी ही| त्वरित प्रतिक्रिया द्वारा प्रोत्साहन का धन्यवाद!

Rajkamal Sharma के द्वारा
September 7, 2011

आप सभी ख्वातीन और हजरात को चाचा ग़ालिब करता आदाब अर्ज है बम धमाकों में जन्नतनशीं हुए सभी को खुदा हाफिज कहना फर्ज है…. प्रिय चातक जी सादर अभिवादन ….. आइये उन सभी पीडितो के दुःख में हम सभी शामिल होकर दहशतगर्दो के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करे ….

    chaatak के द्वारा
    September 7, 2011

    जो भी हुआ वो कायराना और वीभत्स है| इसकी पीड़ा और ज्यादा बढ़ जाती है क्योंकि हम सबको पता है कि इसके पीछे हथियार भी हमारा है और हाथ भी सिर्फ प्रेरणा दुश्मन की है| प्रश्न ये नहीं कि खून क्यों बहा? प्रश्न ये है कि खून को अपनों ने ही क्यों बहाया? समय आ गया है जब सभी को अपने गिरेहबान में झाँक कर देखना होगा वरना न कौमें होंगी न राष्ट्र| अत्यंत कष्टकारी हैं ये घटनाएं|

manoranjanthakur के द्वारा
September 7, 2011

बहुत सुंदर मिया बहुत बधाई

    chaatak के द्वारा
    September 7, 2011

    जर्रानवाजी का शुक्रिया! आदाब अर्ज है!


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