चातक

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अब क्या खरीदूं !

Posted On: 2 Aug, 2011 Others में

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आते जाते मैं अक्सर उस दुकान पर ठिठक जाता था और उसमे करीने से सजाई चीजों को बड़ी हसरत से देखा करता था| ये दुकान थी सपनो की, अन्य दुकानों से बिलकुल अलग! काफी गहमा-गहमी का माहौल रहता था पर मेरी निगाहें सीधे अपने सपनों पर ही जाकर टिक जाती थीं| हर बार मन करता था कि उनमें से कोई सपना साथ लेता चलूँ लेकिन मजबूरी थी मैं चाह कर भी कुछ नहीं खरीद सकता था| मैं ही क्यों वहां आने वाला कोई भी व्यक्ति आसानी से कुछ भी नहीं खरीद पाता था क्योंकि आपको एक सपना खरीदने के लिए कम से कम दो सपने बेचने पड़ते थे और मुझे तो बहुत सारे सपने खरीदने थे, कुछ अपने लिए और कुछ अपनों के लिए | कम से कम एक सपना तो पापा के लिए जरूर लेना था फिर अम्मा की याद आती, उनके लिए भी एक सपना खरीदना है, दीदी के सपने भी तो मुझे पता हैं उनके लिए कुछ ख़ास लेना होगा और छोटा भाई उसने भी तो कुछ सपने देख रखे हैं कम से कम एक तो उसे दे सकूं! समझ में नहीं आता था कि कौन से सपने बेंच दूं तो इनमें से सभी के लिए कुछ न कुछ जरूर ले जा सकूं! काफी सोचने के बाद भी कुछ न सूझता और मैं बिना कुछ बेंचे, बिना कुछ खरीदे वापस आ जाता|
एक दिन जब मैं उस दुकान पर पहुंचा तो देखता हूँ कि मेरा एक छोटा सा सपना अपनी जगह पर नहीं था| मैं बेचैन हो उठा| आज रहा नहीं गया और मैं सीधे दुकानदार के पास पहुंचा और उससे अपने सपने के बारे में जानना चाहा| दुकानदार ने बिना कुछ कहे उस दीवार की ओर इशारा किया जहां वह लोगों द्वारा बेंचे गए सपने लगाता था| मैंने नजर घुमाई- वहां मेरे पापा और अम्मा के बहुत सारे सपने सजे थे|

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34 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

malkeet singh "jeet" के द्वारा
August 15, 2011

चातक जी बहुत ही अच्छी शब्द रचना ,सचमुच माँ बाप हमारे लिए सब कुछ होम कर देते है और आज की संताने छोटी छोटी बातो के लिए उनके विश्वाश को तार तार कर देते है

    chaatak के द्वारा
    August 15, 2011

    स्नेही मलकीत जी, सही कहा आपने आज के परिवेश में बच्चे आधुनिकता और पाश्चात्य नक़ल की अंधी दौड़ में जिस तरह से माता-पिता के सपनो को कुचल रहे हैं और उनके विश्वास को न सिर्फ तोड़ते हैं बल्कि उन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन बता कर भरे बाज़ार रुसवा भी करते हैं वह दयनीय भी है और चिंताजनक भी| आपकी इस प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

rahulpriyadarshi के द्वारा
August 11, 2011

शब्द नहीं हैं,या यूँ कहें तो उचित शब्द नहीं मिल रहे,जिनसे मैं ठीक ठीक प्रशंसा कर सकूं,इतना ही कह सकता हूँ की अद्भुत,इतना संक्षिप्त और गूढ़ अर्थ वाली रचना लिखना वास्तव में सार्वजनिक प्रशंसा का विषय है…आपने यह लिख कर अपने आप से हमारी उम्मीदें बढ़ा दी है.

    chaatak के द्वारा
    August 11, 2011

    स्नेही राहुल जी, कहानी के भावों पर आपकी इस उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए आपका तहे-दिल से शुक्रिया! मेरा प्रयास रहेगा कि आप स्नेही बंधुओं की उम्मीद पर खरा उतर सकूं| माँ वाग्देवी की कृपा से आप सभी का स्नेह इसी तरह मिलता रहे!

पीयूष पंत के द्वारा
August 10, 2011

भ्राता चातक जी….. छोटी किन्तु बहुत ही भावप्रधान कथा है ये… कई दिनों से प्रतिक्रिया देने की सोच रहा था पर समयाभाव के कारण नहीं दे सका ……. इस कहानी को पढ़ कर लगा की शायद ये अब नई पीढ़ी पर लागू न हो…… अपने बहुत करीब लगी ये कहानी….. हमने इस भाव को महसूस किया है की जब माता पिता ने अपने सपने हम बच्चों के लिए छोड़ दिये……. पर हम बच्चों ने भी उन सपनों का सम्मान किया॥ पर अब बच्चे खुद अपने माता पिता के सपने बेचने को तैयार हैं……. कई लड़के देखे 16-17 साल के मुह पर सिगरेट, बाइक लहराते हुए भरी सड़कों पर खतरनाक स्टंट करने का प्रयास करते हुए….. उनको समझाने पर उनको इस बात से कोई नहीं पड़ता की अगर उनको कुछ हो जाए तो उनके माता पिता के सपनों का क्या जो उन्होने उसके लिए देखे हैं…… वो बस ऐसे ही जीना चाहते हैं………

    chaatak के द्वारा
    August 10, 2011

    स्नेही बंधु पीयूष जी, जिस तीव्रता से हमारे देश के कर्णधार हमारी संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों का बंटाधार कर रहे हैं उससे तो यही लग रहा है कि आने वाले समय में जब पुत्र कहीं अपने पिता का नाम लिखेगा तो उस फ़ार्म में कई कालम हो जायेंगे (जैसे- जन्म से पहले संभावित पिता का नाम, जन्म के समय माता का पति, बच्चे के पालक पिता का नाम, व् अन्य (यदि लिव-इन-कभी लागू हुआ हो तो), और अंत में होगा डी.एन.ए. रिपोर्ट की सत्यापित प्रति| इस तरह के परिवार में हम अपनों के लिए किसी तरह के त्याग की कल्पना भी करें तो हमारी नादानी होगी| ईश्वर का धन्यवाद कि हमें शायद उसके पहले इस दुनिया से कूच कर जाना है, ये भी एक तरह कि आनर किलिंग ही है| एक विचारपरक टिप्पड़ी द्वारा उत्साहवर्धन का हार्दिक धन्यवाद!

वाहिद काशीवासी के द्वारा
August 7, 2011

प्रिय चातक जी, आपकी यह लघु कथा सच्चे मायनों में पढ़ते पढ़ते सीधे दिल में उतर गयी| साधुवाद आपको..

    chaatak के द्वारा
    August 7, 2011

    वाहिद जी, इस लघु कथा को आपने समय दिया और प्रयास को टिप्पडी से नवाजा, आपका हार्दिक धन्यवाद!

Dr. SHASHIBHUSHAN के द्वारा
August 4, 2011

लेकिन अब समय आ गया है, सपनों की दुकानदारी करनेवाले अब अपने सपनो को खरीदने के लिये तरसेंगे, और हम उनकी दुकान लगाकर बैठेंगे।  सपने देखेंगे तभी तो साकार करने का प्रयास भी करेंगे।

    chaatak के द्वारा
    August 5, 2011

    डॉ. साहब त्वरित प्रतिक्रिया का धन्यवाद, वास्तव में ये लघु कथा एक एलेग्री है आशा है पुनरवलोकन पर आपको जरूर पसंद आएगी|

Ramesh Bajpai के द्वारा
August 4, 2011

प्रिय श्री चातक जी सपनों का सुनहरा संसार ,हकीकत से कितना दूर होता है | आपके संवेदनशील ह्रदय से लिखी गयी यह अनमोल पोस्ट तो बस पढ़ते ही बनी है | हर आँखों में पलता सपना ……मन भर गया …….. इस बेमिशाल तोहफे के लिए ,तमाम लोगो के सपनो के लिए …बस दुवाये दे प् रहा हु | बहुत बहुत बधाई |

    chaatak के द्वारा
    August 4, 2011

    आदरणीय बाजपेयी जी सादर अभिवादन, सपनो का तो बहाना है ध्येय तो उन बहके कदमो को जमीन पर लाना है जो साक्षात ईस्वर को छोड़कर उनका अपमान कर या उन्हें कष्ट देकर सुख पाने की और पत्थरों और कब्रों को पूज कर ईष्ट को पाने की असंभव कोशिश कर रहे हैं| आपकी इतनी अच्छी प्रतिक्रिया पाकर विश्वास हो गया कि मैं सही दिशा में जा रहा हूँ| हार्दिक धन्यवाद!

atharvavedamanoj के द्वारा
August 3, 2011

प्रिय मित्र और बंधू चातक जी… पता नहीं कितनों ने सपने देखे और पता नहीं कितनों के सपने चकनाचूर हुए|सत्ता हस्तानान्तरण से पूर्व देखे गए सपनों को निर्मम सत्ता ने अपने कुटिल पैरों तले कुचल दिया…आज से कुछ ही दिन बाद इन सपनों की वर्षगाँठ मनाई जायेगी…कुछेक घरियाली आंसू बहाए जायेंगे|शहीदों की चिताओं पर मर्सिया पढ़ा जाएगा|जीते जी जिन्होंने पुरे राष्ट्र को सपना दिखाया, मरने के बाद उनकी पीढियाँ उन्हें विकास का सपना दिखाएंगी|एक ही दिन के लिए सही पुरे राष्ट्र की आँखों में सपना होगा|एक ही दिन में सदियों से भूखी आँखों को अफीम का इतना ओवरडोज दिया जाएगा की कम से कम छह महीने तक लोग एक ही तरह का सपना देखते रहें|कहना न होगा की सपनों का यह व्यापारी हद से ज्यादा शातिर और चालाक है..हमें गर्व है की यह व्यापारी हमारा माबूद है|वन्देमातरम|बहुत ही भावपूर्ण किन्तु आज की परिस्थितियों में इसका कोई मोल नहीं है मेरे भाई|

    chaatak के द्वारा
    August 4, 2011

    स्नेही बन्धु मनोज जी सादर वन्देमातरम, आपकी टिप्पड़ी में राष्ट्र की पीड़ा और आम आदमी का दर्द दोनों बयां हो रहा है परन्तु हताश होने जैसी कोई बात नहीं जब तक दिल में कहीं आग जल रही हो| अदम जी भी सिर्फ एक ही स्थिति से डरते हैं- “जो बदल सकती है इस दुनिया के मौसम का मिजाज, उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये..” मजबूत राष्ट्र की इकाई होता है मजबूत परिवार और इस बात को ये काले अंग्रेज भली भांति जानते हैं इसीलिए कभी अधिकार के नाम पर कभी जुल्म और सितम का झूठा बहाना करके तो कभी रिश्तों के बीच क़ानून को जबरदस्ती घुसा कर ये कुत्सित लोग परिवार नाम की संस्था को कमजोर करते रहते हैं व्यक्तिगत स्वार्थ जिसका हमारी जीवन पद्धति में कोई स्थान ही नहीं है उसे ये बदतमीज मानवाधिकार कहकर पेश करते हैं यही कारण है की ना तो हम अपने परिवार के लिए कोई त्याग कर पाते हैं और न राष्ट्र के लिए| कैसी अजीब विडम्बना है कि आज हमारे लिए हमारी लड़ाई हम स्वयं नहीं बल्कि एक नेपाली संत लड़ रहा है और हंस कर तमाम कष्ट उठा रहा है| मेरे ख्याल से बालकृष्ण का विश्वबंधुत्व किसी भी भारतीय से ज्यादा सराहनीय है और उनकी भारत निष्ठा किसी भी भारतीय कहलाने वाले धरती के बोझ से ज्यादा बलवती है| वन्देमातरम!

surendra shukla Bhramar5 के द्वारा
August 3, 2011

प्रिय चातक जी -सार्थक और मन को छूता हुआ आप का लेख -लेकिन कुछ तो खरीदिये हिम्मते मर्दां मद्दे खुदा …निम्न पंक्तिया बहुत कुछ कह गयीं कम से कम एक सपना तो पापा के लिए जरूर लेना था फिर अम्मा की याद आती, उनके लिए भी एक सपना खरीदना है, दीदी के सपने भी तो मुझे पता हैं उनके लिए कुछ ख़ास

    chaatak के द्वारा
    August 3, 2011

    स्नेही भ्रमर जी, आपकी प्रतिक्रिया पढकर सुखद अनुभूति हुई| खरीदने में ज्यादा दिक्कत नही है समस्या है कि एक सपने की कीमत के सपने बेचकर चुकानी है| यही तो होता है हमारी असल जिंदगी में और हम अपने ही माता-पिता की खुशिया और उनकी चाहतें सिर्फ बिकते हुए देखते हैं स्वयं किसी भी चीज़ का त्याग नहीं करते हम| प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद!

संदीप कौशिक के द्वारा
August 3, 2011

प्रिय  चातक जी, शब्द दर शब्द…..पंक्ति दर पंक्ति दिल में उतरती रचना । और अंतिम पंक्ति तो बस मानो….क्या कुछ नहीं कह गयी हो !! बहुत-बहुत बधाई इस अति उत्तम कृति के लिए !! :) http://sandeepkaushik.jagranjunction.com/

    chaatak के द्वारा
    August 3, 2011

    प्रिय संदीप जी, कहानी को गहराई से पढने और समझने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद!

nikhil jha के द्वारा
August 3, 2011

प्रिय चातक भाई, हर शब्द भावनाओं का सागर लिए, हर पंक्ति स्वयं में एक संपूर्ण कथा को समेटे हुए. मुझे मेरे सपनों को साकार करने की प्रेरणा देने के लिए आभार. एक सपना मेरा भी है भीड़ में तनहा सा, हर कदम के साथ उसे पाने की चाहत है, एक छूटा मेरे हाथों की लकीरों से तो क्या, हर मोड़ पर दुसरे के आने की आहट है.

    chaatak के द्वारा
    August 3, 2011

    स्नेही भ्राता निखिल, आपकी राय जानकर बहुत ज्यादा ख़ुशी मिली| ईश्वर से प्रार्थना है कि वो आपके सपनो को पूरा करे| जो हाथ से मिट गयी वो लकीर अपनी नहीं; जो सितारों की हो मोहताज़ वो तकदीर अपनी नहीं| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

deepika के द्वारा
August 3, 2011

चातक जी, बहुत ही बेहतरीन लघुकथा है आपकी वास्तव में बस दिल को छू जाने वाली बात है इस रचना में. पर सच तो यह दुकान बहुत मंहगी है जाने कितने ही क्या खरीदू की दुविधा में कुछ भी नहीं खरीद पाते. या कहे की सोच विचार करने में ही उनका खरीद करने का वकत निकल जाता है. एक बार फिर बहुत खूब!

    chaatak के द्वारा
    August 3, 2011

    दीपिका जी, सही कहा आपने ये दुकान बहुत महंगी है मैं आज तक कुछ खरीद नहीं पाया क्योंकि मैंने अपनों के लिए अपना कोई सपना नहीं बेंचा| शायद इसी को लिखा गया है- रहिमन ये घर प्रेम का खाला का घर नाय| शीश उतारे हाथ कर सो पैठे घर मांहि| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

चातक भाई ,, बहुत ही भावुक लेख ( अगर कोई समझने वाला हो तो ) , सच यही है की माँ बाप अपने सपने, अपना आराम और अपनी ख्वाहिशात बेच कर अपने बच्चो के सपनो को साकार करने में जुटे रहते है मगर अक्सर देखा गया है की बच्चो को इस बात का एहसास नहीं होता है और वह आधुनिकता के अंधी दौड़ में सब कुछ भूल जाते है ! काफी दिनों से JJ पर लिखा या प्रतिक्रिया देना बंद सा था परन्तु इस भावुक लेख को देख कर खुद को रोक नहीं पाया ! राशिद

    chaatak के द्वारा
    August 3, 2011

    स्नेही राशिद भाई, माता-पिता तो साक्षात् ईश्वर हैं मैंने कई बार देखा है कि तनिक सा भी कष्ट आने पर लोग सबसे पहले माता-पिता को कोसते हैं| कुछ उनका असम्मान करते हैं तो कुछ उनके सभी अरमानों को कुचल देते हैं कुछ तो बाकायदा उन्हें बेघर भी कर देते हैं| इस कहानी पर आपकी प्रतिक्रिया को पाकर बेहद ख़ुशी हुई| हार्दिक धन्यवाद!

नंदिनी के द्वारा
August 3, 2011

चातक जी, इस लघु किन्तु गहन अर्थ लिए कथा ने दिल को छू लिया| सच में आज जीवन का यही अर्थ रह गया है| अगर हम अपने, अपनों और दूसरों के प्रति ज़रा सा भी संवेदनशील हैं तो यह यथार्थ है| यदि स्वार्थ ही दिल में घर कर जाए तो बात ही दूसरी है| शुक्रिया इस सुन्दर रचना के लिए|

    chaatak के द्वारा
    August 3, 2011

    नंदिनी जी, आपकी बात से मैं भी सहमत हूँ शायद संवेदनहीनता अब इस हद तक जा चुकी है कि रिश्तों का कोई वजूद ही नहीं दिखता| थोड़े से रिश्ते जो सांस लेते दिखाई दे रहे हैं उनका भी कब दम घुट जाएगा कोई पता नहीं| विचारपरक टिप्पड़ी के लिए हार्दिक धन्यवाद!

Alka Gupta के द्वारा
August 3, 2011

चातक जी , आपकी इस मर्म स्पर्शी रचना के लिए मैं निशब्द हूँ ! आज के परिदृश्य मेँ अधिकाँश परिवारों का यही स्वरूप दृष्टिगत है जहाँ पर अपनी भारतीय संस्कृति, पारस्परिक प्रेम , सद्भावना , सम्मान किसी अँधेरी गलियों मेँ विलुप्त हो गए हैं……उत्कृष्ट रचना के लिए धन्यवाद !

    chaatak के द्वारा
    August 3, 2011

    अलका जी, जिस तरह से हमारी पारिवारिक और सांस्कृतिक मान्यताएं नष्ट हो रही हैं वह चिंताजनक है| जेनरेशन गैप के नाम पर जिस तरह का फूहड़ प्रदर्शन हो रहा है वह आने वाले समय के भयानक दृश्य को दिखा रहा है जहाँ परिवार नाम की संस्था को छिन्न-भिन्न होते देख रहा हूँ ये कहानी भी उन्ही दृश्यों से प्रेरित है| इतनी अच्छी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद!

Abdul Rashid के द्वारा
August 3, 2011

सुन्दर अति सुन्दर रचना http://singrauli.jagranjunction.com/

    chaatak के द्वारा
    August 3, 2011

    स्नेही राशिद जी, कथा की सराहना का हार्दिक धन्यवाद!

Santosh Kumar के द्वारा
August 3, 2011

आदरणीय चातक जी , बहुत सुंदर रचना ,..आत्मिक प्रेम में सपनों की दूकान ……..बेहतरीन ,.. सादर आभार

    chaatak के द्वारा
    August 3, 2011

    स्नेही संतोष जी, टूटते और कमजोर होते रिश्तों के बीच यदि किसी को ये याद आ जाए कि उसके प्रकट ईश्वर कितने सपने कुर्बान करते हैं उसकी एक छोटी सी हसरत के लिए तो काफी कुछ आसन हो सकता है| कहानी पर आपकी प्रतिक्रिया से बड़ी ख़ुशी हुई| हार्दिक धन्यवाद!

Vinita Shukla के द्वारा
August 3, 2011

बहुत मार्मिक और सुन्दर रचना. हमारे भारतीय परिवारों की धुरी भी, उनके सदस्यों के परस्पर प्रेम और त्याग पर टिकी है.

    chaatak के द्वारा
    August 3, 2011

    कहानी के मर्म को और स्पष्ट करने का शुक्रिया| आज के समय में अपने आप को आधुनिक और प्रगतिगामी कहने वाले युवा जिस तरह से अपने माता-पिता को हाशिये पर रखते जा रहे हैं वह दुखद है काश की उन्हें इस बात का अहसास हो कि उनकी एक छोटी सी ख्वाहिश के लिए माता-पिता ने कितने सपनो को कुर्बान किया है| प्रतिक्रिया के लिए आपका एक बार फिर धन्यवाद!


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