चातक

आओ खोजें हिंदुस्तान

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मुम्बई को फिर लहूलुहान किया आतंकियों ने

Posted On: 13 Jul, 2011 Others में

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यारो अब मेरा साथ दो जरा !

आइये सरकार से मांग करें कि सभी कानूनी प्रक्रियाओं और नपुंसकता को छोड़कर अजमल कसाब को उसी जगह पर खड़ा कर के गोलियों से भूना जाए जहां आज आतंकियों ने मासूम हिंदुस्तानियों का क़त्ल किया है ! जनता के दिल से खौफ मिटाने का और आतंकियों के कृत्य पर अंकुश लगाने का सिर्फ यही एक तरीका है| इतने मासूम हिदुस्तानियों के क़त्ल करने वालों के साथ न्यायिक प्रक्रिया नहीं ऑन दी स्पॉट फैसला चाहिए| यदि सरकार की आँख में जरा भी शर्म है तो कसाब को मुम्बई के लोगों के हवाले करें ! क़त्ल जनता हुई है फैसला भी वही करेगी !

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23 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

krishna के द्वारा
September 29, 2011

चातक जी सादर नमस्कार………. विषय वास्तु बहुत साधारण होने के बावजूद हमारी देश की सरकार इस मुद्दे पर कोई ठोस कदम नहीं ले पा रही है. इसका अभिप्राय तो यही निकलता है के शायद वो इसका फैसला नहीं कर सकती है. तो फिर वो इस देश के सही और गलत का फैसला कैसे कर सकती है? जिन लोगों को अपने आस्तीनों में काला धन भरने से फुर्सत नहीं है वो भला कोई काम सफ़ेद (सही) कैसे कर सकते हैं. पर क्या करे जनता को तो ये हक़ भी नहीं है के वो रास्ट्र के हक के फैसले खुद नहीं ले सकती है. न जाने कब वो दिन आएगा जब देश पर उठने वाली हर बुरी नज़र को नज़रबंद करने में हम कामयाब होंगे… जय हिंद जय भारत…..

vivekgoel के द्वारा
July 23, 2011

टूटे ख्वाब रूठे नसीब! रात भर बैठ कर अब रोता है वो, याद कर कर अपने बीते अतीत को, कैसे सजते थे वहां उसके रौनक मेले, लोग जलते थे देख कर,उसके नसीब को, जब खुशियाँ मुड़ वापिस आती हर-पल, ढूंढ़ने उसे या शायद चूमने उसकी दहलीज़ को, वक्त का पहिया घूम घूम कर तेज़ भागता, लौट कर आने को हो, खोजता किस तरतीब को, वो हर शह को समझता था अपना गुलाम, लुभाता था वो एक सा, अपनों को या रकीब को, रातों के काले साए भी नो छू पाए , उसे कभी, रौशनी के दौर चलते सदा, होकर उसके करीब को, पर जैसे बदलते है यारों मौसम के भी हर दौर, पड़ गए उसके नसीब के धागे भी कुछ कमज़ोर, रातें भी आने लगी अब होकर स्याह उसके करीब, टूट गए थे सब ख्वाब, रूठ गए सब उसके नसीब ./….

    chaatak के द्वारा
    July 25, 2011

    स्नेही विवेक जी, इन पंक्तियों को टिप्पड़ी के रूप में लिखने पर आपको हार्दिक धन्यवाद!

Abdul Rashid के द्वारा
July 14, 2011

सच कहा आपने लेकिन सत्ता के रखवाले अंधे बहरे गूंगे हो गए है इनको जगाने के लिए शंखनाद करना ही होगा. http://singrauli.jagranjunction.com

    chaatak के द्वारा
    July 14, 2011

    स्नेही राशिद जी, सही कहा आपने कि सत्ता के रखवाले अंधे बहरे गूंगे हो गये हैं| इस मंच के सभी ब्लोगर साथ दें तो हम वह शंखनाद कर सकते हैं जिससे बहरे भी जागने पर मजबूर हो जायेंगे| क्या हमारे अंदर है इतनी एकजुटता? यदि हाँ तो राह न मुश्किल है न हल बहुत दूर| वन्देमातरम !

santosh kumar के द्वारा
July 14, 2011

आदरणीय चातक सर , बिलकुल सही कहा आपने …….हम खौफ में जी रहे हैं …..इसे मिटाना होगा ….हम सब आपके साथ हैं …

    chaatak के द्वारा
    July 14, 2011

    स्नेही संतोष जी, हम लोगों में से सिर्फ कुछ लोग है जिनकी कायरता के कारण हम अपने आपको खौफज़दा महसूस कर रहे है यदि सभी ब्लोगर साथ आने को तैयार हों तो मेरे पास उपाय है इस खौफ को जवाब देने का| एक एक स्वर मिला कर सिंहनाद कैसे बनता है हम दिखा सकते हैं| वन्देमातरम!

Tamanna के द्वारा
July 14, 2011

बिल्कुल ठीक कह रहे हैं आप…लेकिन आपके या हमारे कहने से कुछ नहीं होगा…हमारा देश लोकतंत्र और दयावान देश हैं.. ऑन द स्पॉट फैसला एक मजबूत सरकार ही ले सकती हैं..हमारी सरकार से ऐसी उम्मीद रखना बेकार हैं. http://tamanna.jagranjunction.com/2011/07/09/homosexuality-and-gay-rights-in-india/

    chaatak के द्वारा
    July 14, 2011

    तमन्ना जी, देश दयावान है लेकिन कायर नहीं सच बाताइये जब आपने मासूम हिंदुस्तानियों के क़त्ल की बात सुनी तो क्या आपके दिल ने नहीं कहा कि काश मेरे हाथ में थोड़ी सी भी प्रशासनिक शक्ति होती तो आज कातिलों की भी रूह कांपती? क्या उन क्षत-विक्षत मानव अंगों को देखकर आपके दिल में नहीं आया कि काश एक बार अजमल कसाब मेरे सामने आ जाता? कुछ नहीं तो कम से कम इतना तो दिल जरूर भर आया होगा कि आँखें नम हुई होंगी, एक हूंक तो जरूर उठी होगी, नहीं चीख तो एक सिसकी जरूर घुटी होगी? क्या नहीं हुआ ऐसा? क्या दया जैसी कोई भावना या माफ कर देने जैसा कोई विचार आया दिल में? सरकार यदि नाकारा है तो कहिये नाकारा है और हमें इसकी कोई जरूरत नहीं, जिस विधान में आतंकियों के लिए दया है कहिये कि वो विधान नपुंसक है जिन्हें मासूमों की मौत पर फर्क नहीं पड़ता कहिये कि वे राक्षस हैं| कहने से ही बात निकलेगी और बात निकलेगी तो दूर तलाक जायेगी| वन्देमातरम!

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
July 14, 2011

चातक जी बहुत सुन्दर विचार और आह्वान आप का जब तक ये देश का कानून इस तरह लचीला रहेगा लाख कानून हम झोली में भर घूमते फिरें सब वृथा -दुसरे देशों की तरह फैसला आन दी स्पोट हो कुछ भले ही सीधे साधे एक बार मरेंगे फसेंगे लेकिन एक कानून का राज्य कायम हो जायेगा – एक पापी जो की दुनिया के आईने में पापी सिद्ध हो चूका हो उस पर करोड़ों खर्च करना जनता का पेट काटना और वोट की खातिर उसे अभी तक न लटकाना निश्चित ही शर्मनाक है लोग चुल्लू भर पानी में डूब भी नहीं मरते – अगर हमारे आप के चिल्लाने से ये हो जाये तो अधिकतर लोगों की मंशा यही है लेकिन कठपुतली को क्या असर … बधाई हो बेबाक कथन – भ्रमर ५

    chaatak के द्वारा
    July 14, 2011

    स्नेही भ्रमर जी, हमने ६० वर्षों से अधिक समय तक हिन्दुस्तानियों की लाशों पर होती राजनीति देखी है लेकिन अब चुप नहीं रह सकते हमारे हाथ में यदि लिखना है हम कलम से बोल सकते हैं तो वचन से और चल सकते हैं तो कलम से, यानी जो भी हमारी क्षमता है उसका इस्तेमाल इन नेताओं और आतंकियों का प्रतिकार करना है| गोली और बम नहीं चला सकता तो चीत्कार से ही और आवाज चली जाए तो आंसुओं से लेकिन प्रतिकार अब बंद नहीं होगा|

nishamittal के द्वारा
July 14, 2011

चातक जी,शांति सहनशीलता दिव्या गुण हैं,परन्तु जब पानी इतना ऊपर चढ़ आया हो तो चुप बैठना कायरता है.

    chaatak के द्वारा
    July 14, 2011

    आपने बिलकुल ठीक कहा निशा जी, अब सरकारी अकर्मण्यता कायता की सभी सीमाए लांघ चुकी है| अब सारे फैसले इन बेईमान कायरों पर नहीं छोड़ सकते| वन्देमातरम!

anoop pandey के द्वारा
July 14, 2011

यारा जैसे बोलो वैसे साथ हूँ. वैसे भी कल मुंबई जाना है…..

    chaatak के द्वारा
    July 14, 2011

    अनूप भाई, हम इसी तरह एक-एक जुडकर एक अरब होते है| बस इन जख्मों को भुलाना नहीं है ताकि हर रोज मर रहे हिंदुस्तानियों की लाशों पर अब राजनीति न हो सके| आपकी मुम्बई यात्रा शुभ हो! वन्देमातरम

swtantranitin के द्वारा
July 13, 2011

प्रिय चातक जी ! सरकार को अब भी अकल न आये तो फिर तो बहुत ही शर्म की बात होगी ! वैसे मैं आपके इस मिशन में आपके साथ हूँ | भारत वासियों के लिए शोक वन्देमातरम

    chaatak के द्वारा
    July 13, 2011

    प्रिय नितिन जी, सरफरोसी की तमन्ना अब दिल में नहीं जुबान पर लानी होगी| हम कब तक मासूम लोगों के छिन्न भिन्न शवो के गवाह बनेंगे| आपका जज्बा देखकर ख़ुशी हुई मुझे विशवास है की हम सभी एक साथ बोलेंगे तो आवाज दिल्ली तक जरूर जायेगी! वन्देमातरम!

atharvavedamanoj के द्वारा
July 13, 2011

कभी धधकती है दिल्ली तो कभी बनारस जलता है| रोज रोज की बात यही है, ऐसे शासन चलता है|| स्नेही चातक जी….मुंबई का फैसला जनता को ही करना चाहिए…..प्रतिनिधियों ने प्रतिनिधित्व का धर्म ही भुला दिया है|देखिये आगे क्या होता है?

    chaatak के द्वारा
    July 13, 2011

    धूँ-धूँ जलता देश हमारा, रोज भड़कती ज्वालायें, फिर भी हम हैं धन्य द्रोहियों (नेताओं) को पहनाते मालाएं, पहनाना है तो अब इनको अंतिम माला पहनाओ, इनको फेंको पीछे अब खुद लड़ने को आगे आओ| वन्देमातरम!

    surendra shukla bhramar5 के द्वारा
    July 14, 2011

    चातक जी आप की ये फुंफकारती कविता पढ़ मन वीर रस से उछल पड़ा -बहुत खूब पहनाना है तो अब इनको अंतिम माला पहनाओ,

    chaatak के द्वारा
    July 14, 2011

    भ्रमर जी, आपको पंक्तियाँ पसंद आईं जानकर खुशी हुई| पंक्तियाँ दिल से निकली हैं तो जज्बात तो होंगे ही और जिनके पास अपने मुल्क के लिए जज्बात नहीं उन मुर्दों के लिए क्या कहें! वन्देमातरम!

Rajkamal Sharma के द्वारा
July 13, 2011

आदरणीय चातक जी ….सादर अभिवादन ! इसके लिए कोई मुस्लिम देश सा शासक भी चाहिए धन्यवाद :) :( ;) :o 8-) :|

    chaatak के द्वारा
    July 13, 2011

    बिलकुल सही कहा आपने, शायद इसी विचार के दृष्टिगत विवेकानन्द ने ऐसे हिन्दुस्तान की कल्पना की थी जिसका शरीर इस्लाम और मस्तिष्क सनातन हो| वन्देमातरम !


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