चातक

आओ खोजें हिंदुस्तान

123 Posts

4032 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1755 postid : 349

बेशर्मी मोर्चा- उमंग सबरवाल की जुबानी

Posted On: 12 Jul, 2011 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

उमंग सबरवाल के कुछ बयानों को अटपटी तरह से तोड़ मरोड़ कर कुछ तो मीडिया और कुछ स्वतंत्र ब्लोगर एक अजब मोर्चा खोले बैठे है| मीडिया उमंग की मुहिम को ना जाने क्यों पश्चिमी तर्ज पर पर ही दिखाने को टूटी पड़ रही है जबकि उमंग का विरोध प्रदर्शन किसी भी तरह से संस्कृति या सभ्यता पर चोट पहुंचाने वाला या नंगई का समर्थन करने वाला प्रतीत नहीं होता| वह सिर्फ और सिर्फ नारी को दी जाने वाली कुत्सित बलात्कार सरीखी पाश्विक प्रताडना का विरोध कर रही है और ये निश्चय ही एक साहसी कदम है|

एक और बात ध्यान देने योग्य है कि उनकी उम्र महज १९ वर्ष है यानी एक ऐसी उम्र जिसमे न तो प्रौढ़ उम्र की धूर्तता है और न ही परिपक्वता| उनके पास है ऊर्जा और समाज को एक नयी राह देने का जज्बा जहाँ वो न तो राजनेताओं की तरह सोची समझी बयानबाजी करने की मंशा रखती हैं और न समाज को स्त्री बनाम पुरुष का युद्ध क्षेत्र बनाना चाहती है|

जरा उमंग के बयानों पर आई खबर पर और स्वयं उमंग के बयान पर गौर करें-

“महिलाओं के खिलाफ रेप जैसे संगीन अपराधों के विरोध में दुनिया भर में तेजी से मशहूर हो रहा स्लटवॉक आंदोलन अब भारत में भी दस्तक दे चुका है। लेकिन भारत में महिलाएं दूसरे देशों की तरह छोटे और तंग कपड़ों में नहीं बल्कि ‘सही कपड़ों’ में स्लटवॉक करेंगी। दिल्ली में स्लटवॉक की शुरुआत करने वाली दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा उमंग सबरवाल का कहना है कि पहनावे को रेप की वजह बताने का विरोध और पीड़ित की जगह अपराधी पर फोकस करना ही उनके आंदोलन का उद्देश्य है। उमंग ने स्लटवॉक को ‘बेशर्मी मोर्चा’ नाम दिया है।”

स्पष्ट है कि ‘सही कपडे’ कहने का उद्देश्य यही है कि स्वयं उमंग भी कुछ कपड़ों को गलत मानती है| मैं इसे उमंग के शब्दों में ही और ज्यादा स्पष्ट करता हूँ|

खुद के छोटे कपड़े पहनकर अपनी बात को वजन देने के सवाल पर उमंग का कहना है,  ‘मैं सही तरह से कपड़े पहनूंगी। स्लटवॉक आंदोलन का यह मतलब नहीं है कि लड़कियां मछली पकड़ने वाला जाल (फिशनेट) पहनकर घूमें। हम बड़े मुद्दों की तरफ लोगों का ध्यान खींचना चाहते हैं।’

फिर ध्यान दें- यहाँ वे स्वयं लड़कियों को ताकीद कर रही हैं कि वे अंग प्रदर्शन करने वाले कपडे न पहने|

थोडा और आगे बढते हैं-

उमंग के मुताबिक, ‘हम सभी जानते हैं कि दिल्ली महिलाओं के लिए कितनी असुरक्षित है। जब भी महिलाओं के साथ कोई अपराध होता है हम अपराध करने वाले को दोषी ठहराने के बजाय महिला को ही सबक सिखाने लगते हैंहम उसे बताने लगते हैं कि उसे क्या पहनना चाहिए और क्या नहीं। हमें बाहर जाने, अपनी मर्जी के मुताबिक कपड़े पहनने, पेशा चुनने और सेक्सुअल पार्टनर की संख्या तय करने का हक है।’ उमंग के मुताबिक दिल्ली में स्लटवॉक जल्द ही एक वेबसाइट लॉन्च करेगा। इसके अलावा नुक्कड़ नाटकों के जरिए भी लोगों में जागरूकता लाई जाएगी।

यहाँ पर उमंग ने ‘दिल्ली को’ यानि व्यवस्था को दोषी बताया है| महिलाओं को दोषी करार देने वाले वर्ग में भी उन्होंने पुरुष शब्द का नहीं वरन हम शब्द का प्रयोग किया है यानी ‘स्त्री व् पुरुष दोनों’ | नुक्कड़ नाटकों के पीछे भी उनका उद्देश्य ‘लोगों’ में जागरूकता लाना है न कि कुछ छद्म नारीवादियों की तरह सम्पूर्ण पुरुष वर्ग से मोर्चा लेकर कलह मचाने का|

इस पूरे प्रकरण को अच्छी तरह से समझने के बाद मुझे उमंग का पक्ष जितना मजबूत और बेहतर लगा उनकी बात को तोड़ मरोड़ के रखने वालों का पक्ष उतना ही खोखला और द्वेष से भरा हुआ| अब जागरण मंच के बुद्धिजीवी ब्लोगर तय करें कि क्या किसी की सही बात को तोड़ मरोड़ कर उसे लोगों की नजर में खलनायक बना कर प्रस्तुत करना उचित आचरण है? क्योंकि उमंग की मुहिम को जिस तरह पुरुष बनाम स्त्री बनाया गया उससे पुरुष वर्ग के बीच एक अच्छी खासी ऊर्जावान व स्त्रीहित चाहने वाली युवती की कैसी तस्वीर बनी ये आप सभी ने देखा|

मेरे ख्याल से अब हमें उमंग ले जज्बे की तारीफ़ करने में संकोच नहीं होना चाहिए और हमें  उनकी मुहिम को नैतिक समर्थन भी देना चाहिए| उनकी कुछ बाते यदि अपरिपक्व लगें तो अभी उनके पास काफी वक्त भी और समझ भी| काश कि जुलाई में मैं उनके इस साहसिक आग्रह को देखने दिल्ली जा पाता क्योंकि ये मार्च हमें सर झुका के नहीं सर उठा के देखनी है|

मेरी ओर से उमंग को शुभकामनाये|

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (6 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

21 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Amit kr. pandey के द्वारा
July 14, 2011

badi kamaal ki baat hai , sexual partner ki sankhyaa tay karane kaa haq hai, vaakai aisi mahilaaon ke baare main ab kyaa shabd praukt karun samajh main nahi aataa,

    chaatak के द्वारा
    July 15, 2011

    स्नेही अमित जी, आपकी निगाहें भी वहीँ जा कर रुकीं और ठीक भी है जो व्यक्ति अपनी संस्कृति के लिए जागरूक है वह ऐसी बातों पर जरूर ध्यान देगा| ये बात बहुत ज्यादा गंभीर भी नहीं है न ही ये किसी बड़ी चिंता का विषय है| इसका स्पष्टीकरण बड़ा ही आसान है थोडा विचार करें तो समझ में आ जाएगा| आपकी प्रतिक्रिया का बहुत बहुत धन्यवाद!

y.dubey के द्वारा
July 14, 2011

आदरणीय चातक जी, आपने जिस पछ को इंगित किया है उसकी जानकारी मुझे नहीं थी इसके लिए आप सराहना के पात्र है, अगर इस नजरिये से ये आन्दोलन होता है तो मै इसका समर्थन करता हूँ,सिवाय एक चीज के की महिलाओ को सेक्सुअल पार्टनर की संख्या तय करने का हक है।महिला हो या पुरुष संख्या तय करने का मतलब होता है गणिका , वेश्याओ को पहले गणिका कहा जाता था क्योकि अंत में वे गणना करती थी की उन्होंने कितने पुरुषो से सम्बन्ध बनाए ,महिला हो या पुरुष सेक्सुअल पार्टनर की संख्या तय करना कानूनन तो कानून का जानकर ही बता सकता है लेकिन सामाजिक अपराध की ही श्रेणी में आएगा और जब तक ये सोच रहेगी यौन कुंठित लोगो की समाज में बढ़ोतरी होती रहेगी और महिलाओ के ऊपर मानसिक और शारीरिक अपराध होते ही रहेंगे.आशा करता हूँ की उमंग के साथ ही साथ समस्त महिला और पुरुष समाज अपनी इस तरह की सोच और तथाकथित आजादी से बाहर आएगा ,इस सोच के बिना उमंग के आन्दोलन की सफलता की कामना करता हूँ.

    chaatak के द्वारा
    July 15, 2011

    स्नेही श्री दुबे जी, इस मुद्दे पर आपकी राय जानकर बेहद ख़ुशी हुई. उमंग के आन्दोलन को आपका समर्थन मैं इस कारण भी विशिष्ट मानता हूँ क्योंकि यह उन तथकथित स्त्रीवादियों के लिए एक करार जवाब है जो स्त्री को ही बदनाम करके स्त्रीवादी होने का दम भरते है| लेख के जिस हिस्से को आपने इंगित किया है मेरे ख्याल से आपके मन भी वही बात है जो मेरे दिमाग में आई है, मैं भी इस हिस्से को पढ़कर हंस पड़ा था और फिर उस पर ध्यान देने की जरूरत नहीं समझी| हंसी आपको भी आई होगी| मैं जल्दी ही इस हिस्से का स्पष्टीकरण भी दूंगा| आपकी इस प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

Anita Paul के द्वारा
July 13, 2011

चातक जी, उम्मीद के विपरीत आपने मुद्दे को ठीक ढंग से पकड़ने की कोशिश की जिसके लिए आप बधाई के पात्र हैं. आपने भारत में स्लट वॉक के आशय को सही समझा लेकिन बात यहीं समाप्त नहीं होती. महिलाओं पर पुरुष वर्ग का वर्चस्व, मर्दवादी अहंकार का प्रदर्शन, उन्हें भोग्या समझा जाना हजारों वर्षों के संस्कारों में शामिल कर लिया गया है. ये संस्कार जब तक पीछा नहीं छोड़ेंगे, जब तक इंसान को इंसान नहीं समझा जाएगा, स्त्री को मुक्ति नहीं मिलेगी. स्त्री-पुरुष का ये संघर्ष पुरुषवादी नजरिए की देन है. पुरुषों ने महिलाओं पर जुल्म ढाने के लिए तमाम कुतर्क गढ़े हैं. कुलटा-छिनाल स्त्री, वेश्या स्त्री, सती-सावित्री की पदवी ये सब ढकोसले पुरुषवादी वर्चस्व की देन हैं जिन्हें स्त्रियों को अपने चंगुल में बांधे रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. जिन स्त्रियों ने अपनी नैसर्गिक स्वतंत्रता को तिलांजलि देकर दासता ओढ़ ली, उन्हें भी आपका समाज शोषित करता है, जिन स्त्रियों ने विरोध की चेष्टा की, उन्हें भी प्रताड़ना द्वारा सजा मिली. अंततः सारा मामला स्त्री के अस्तित्व को खत्म करके उसे हमेशा के लिए मूक-बधिर परिचारिका बनाए रखने से संबंधित है. आशा है आप बात को समझने की कोशिश करेंगे.

    chaatak के द्वारा
    July 13, 2011

    अनीता जी, मुझे लगता है आपको उम्मीद नहीं छोडनी चाहिए फिर भी आप बार-बार नाउम्मीद हो जाती हैं| शायद पुरुषों के साथ आपके अनुभव ने शायद आपके ऊपर ये प्रभाव डाला होगा| आपसे एक शिकायत है कि आप मुद्दे को हमेशा गलत ढंग से पकडती हैं| आपका पुरुष विरोध भी ठीक है लेकिन आप किसी अन्य स्त्री की गलत छवि प्रस्तुत करके अपना उल्लू सीधा क्यों कर रही हैं? आपके साथ शायद कोई छल कर गया और आपने एक कुंठा अपने मन में पाल ली बस वही आपका पीछा नहीं छोडती है| और आप उसे दर्शा कर बार बार इस बात को सिद्ध कर देती हैं कि कुछ महिलायें शारीरिक ही नहीं मानसिक स्तर पर भी बहुत कमजोर होती हैं (पुरुषों से भी ज्यादा)| एक बात है आपका गालियों का इनसाइक्लोपीडिया काफी अच्छा है झट से जान लिया कि ‘कुलटा-छिनाल स्त्री, वेश्या स्त्री’ सब पुरुषों ने बनाया है| किसी स्त्रीवादी की किताब में पढ़ा है या स्वयं के अंतर्ज्ञान से जान लिया? बुरा मत मानियेगा परन्तु जिस तरह का स्त्री दमन आपने लिखा है वह हिंदुस्तान में कम पाश्चात्य देशों में ज्यादा है इसके प्रमाण है मेरे पास लेकिन वे इतने घिनौने हैं कि सार्वजनिक मंच पर नहीं रखे जा सकते| हालाकिं इन बातों से आप भी अच्छे से परिचित हैं लेकिन आप स्वीकार कर लेंगी तो फिर आपकी कुंठा का क्या होगा? पहले अपने अंदर से वैमनस्य की ग्रंथि को हटाइये और फिर खुद से पूछिए कि स्त्री पर अमानवीय अत्याचार हिन्दुस्तान में ही सबसे कम क्यों? जवाब नहीं मिलगा तो फिर मुझसे पूछियेगा प्रमाण सहित बताऊंगा| आशा है आप अपनी बात ऊपर रखने की सोच से जल्द बाहर आकर अपने लेखन कौशल का सही प्रयोग करने की कोशिश करेंगी| आपका चातक

    y.dubey के द्वारा
    July 15, 2011

    अनीता पॉल जी, मुझे लगता है की नारी मुक्ति शब्द ही गलत है,नारी कोई बंधुआ नहीं है ,इसकी जगह लछ्य ये होना चाहिए की महिलाओ को समाज निर्माण में भागीदारी किस तरह से बढाया जाए . जितने भी नारी हिमायती है वो इस पुरे मुहीम को को गलत दिशा में ले जा रहे है,और इसका एक मात्र कारन नारी समाज को ठीक तरह से न समझाना है, प्रो. कुसुमलता केडिया (लेखिका गांधी विद्या संस्थान वाराणसी की निदेशिका हैं) के सुझाव इस विषय में प्रासंगिक मनाता हूँ. भारत में ‘नारी मुक्ति’ के मायने हैं (1)भारतीय इतिहास के विषय में तथ्यों का संकलन (2) क्रिश्चिएनिटी की भयावह मान्यताओं के रेलिजियस और दार्शनिक आधारों की सही समझ (3) उन मान्यताओं के कारण उन्मत्त ‘क्रिश्चियन’ साम्राज्यवाद द्वारा विश्वभर में किए गए बर्बर अत्याचारों और लूट की जानकारी (4) इस लूट और अपमान से हुई क्षति की पूर्ति की मांग ब्रिटेन तथा सम्पूर्ण क्रिश्चियन समाज से करना, (5) भारत से ‘एंग्लो-सेक्सन ला’ की विदाई की मांग करना। जब तक यह ‘एंग्लो-सेक्सन ला’ भारत में राज्य की विधिव्यवस्था का आधार है, तब तक भारत में हिन्दू धर्म को वैसा ही राजकीय संरक्षण दिए जाने का दबाव बनाना जैसा ‘क्रिश्चिएनिटी’ को ‘एंग्लो-सेक्सन ला’ के अंतर्गत सेक्युलर ब्रिटेन में प्राप्त है (6) भारतीय स्त्री की गौरवशाली परम्पराओं की पुनर्प्रतिष्ठा एवं (7) शासन, सेना, प्रशासन सहित विज्ञान प्रौद्योगिकी, कला, व्यवसाय आदि सभी क्षेत्रें में हिन्दू स्त्री की बुध्दि को फलवती होने देने की व्यवस्थाएं बनाने और प्रावधान किए जाने का दबाव बनाना तथा श्रेयस्कर राष्ट्र तथा श्रेयस्कर विश्व के निर्माण में हिन्दू स्त्रियों की भूमिका के लिए पथ प्रशस्त करना। यहां ‘हिन्दू स्त्री’ शब्द का प्रयोग बहुत सोच-विचार कर विवेकपूर्वक किया जा रहा है क्योंकि हिन्दू स्त्रियों का गौरवशाली इतिहास एक तथ्य है और इस सत्य के बल पर ही हिन्दू स्त्री अपनी प्रज्ञा और शील के प्रकाश तथा उत्कर्ष से स्वयं को और शिक्षित भारतीय समाज को भ्रांत धारणाओं से मुक्त रख सकती है। वह भारत की मुस्लिम और क्रिश्चियन स्त्रियों के दुख भी बांट सकती है। करुणा भाव तथा मैत्री भाव से उनकी सहायक भी बन सकती है। कम्युनिस्ट तथा अन्य यूरोख्रीस्त मत के प्रभावों वाली हिन्दू स्त्रियों की भ्रांति और विचलन को भी दूर करने में आत्मगौरव सम्पन्न हिन्दू स्त्री ही समर्थ हो सकती है। ऐसी हिन्दू स्त्री वीरता, कंटकशोधन, भारत के वैभव-विस्तार, सुसंस्कार, समृध्दि, विपुलता के प्रवाह की पोषक और संरक्षक के नाते वैविधयपूर्ण रूपों में पुन: प्रतिष्ठा पाएगी, यही भारत में नारी मुक्ति के सच्चे मायने हैं।

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
July 13, 2011

चातक भाई देखना है आगे आगे होता है क्या यदि उनकी बातें जैसी आप ने लिखी कुछ हो जाये तो ..ठीक ही होगा …तंग नहीं होगा तो कोई तंग नहीं होगा खुद के छोटे कपड़े पहनकर अपनी बात को वजन देने के सवाल पर उमंग का कहना है, ‘मैं सही तरह से कपड़े पहनूंगी। स्लटवॉक आंदोलन का यह मतलब नहीं है कि लड़कियां मछली पकड़ने वाला जाल (फिशनेट) पहनकर घूमें। हम बड़े मुद्दों की तरफ लोगों का ध्यान खींचना चाहते हैं।

    chaatak के द्वारा
    July 13, 2011

    स्नेही भ्रमर जी, एक छोटे से वाक्यांश की आवृत्ति से चमत्कार कर दिया आपने ‘तंग नहीं होगा तो कोई तंग नहीं होगा’ ! सही पकड़ा आपने आशा करते हैं कि कुछ अच्छा हो जाएगा| प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया!

vasudev tripathi के द्वारा
July 13, 2011

भाई चातक जी, इस समाज में कोयल की मधुर कुहू-कुहू को भी कौए की कावं कावं बनाकर छोड़ने बाले लोग कम नहीं हैं, कारण मात्र इतना ही है की वो अपने कावं कावं प्रेम से छुटकारा नहीं पा सकते और उनकी दृष्टि में यही दुनिया का सर्वोत्कृष्ट ध्वनि, संगीत और विचार है… शेष आपने कह ही दिया जिसके लिए आप बधाई स्वीकार करें.!

    chaatak के द्वारा
    July 13, 2011

    स्नेही बंधु वासुदेव जी, आपने कौए और कोयल का उदाहरण बिलकुल सही दिया| इस आत्म-मुग्ध होने वाली प्रवृत्ति से तो राम बचाए| लेख पर आपकी प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

Abdul Rashid के द्वारा
July 13, 2011

मेरे नजरो के सामने मंजर बड़ा अजीब था वाही घर जल रहा था जो समंदर के करीब था जिसने जिंदगी दी चले है उन्ही को सबक सिखाने. आपने सही मुद्दा उठाया है हर छपने वाली खबर सच हो ऐसा नहीं. बेहतरीन लेख http://singrauli.jagranjunction.com

    chaatak के द्वारा
    July 13, 2011

    भाई राशिद जी, दो पंक्तियों ने काफी कुछ कह दिया| ख़बरों की बात पर और नेता की जात पर यकीन करना यानि ख़ुदकुशी का विकल्प अपनाना और इससे ज्यादा कुछ नहीं| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

nishamittal के द्वारा
July 13, 2011

बहुत अच्छा प्रयास चातक जी,मेरी शुभकामनाएं नव उत्साह से भरपूर उमंग के अभियान की सफलता को,परन्तु मेरा मानना यह भी है कि आत्मरक्षा के लिए स्वयं आत्मनिर्भर होना भी आवश्यक है

    chaatak के द्वारा
    July 13, 2011

    निशा जी, आशा है की आपकी शुभकामनाएं उमंग तक जरूर पहुंचेंगी| महिलाओं को अपनी सुरक्षा के लिए आत्मनिर्भर बनाना एक अच्छी पहल हो सकती है परन्तु इतना ही काफी नहीं क्योंकि पुरुष सक्षम होते हुए भी कितनी ही बार अपनी खुद सुरक्षा नहीं कर पाता| प्रतिक्रिया द्वारा समर्थन का हार्दिक धन्यवाद!

anoop pandey के द्वारा
July 12, 2011

चातक जी नहले पर ये था तथ्य का दहला……सिर्फ सनसनी फैलाना और वो भी एक छोटे से मंच पर किसलिए? किसी के कुत्सित प्रयास ने उमंग के आन्दोलन पर कीचड़ तो जरूर उछाला है. अतः उन्हें मंच पर ही माफ़ी मांगनी चाहिए. दूसरी बात मेरे जो भी मित्र दिल्ली से है वो सभी दिल्ली को महिलाओ के लिए असुरछित मानते है. वहां आन्दोलन की आवश्यकता थी….आज उमंग अगुवा बनी है तो निश्चय ही बधाई की पात्र है. आपके साथ साथ हमारी भी शुभकामनाएं.

    chaatak के द्वारा
    July 13, 2011

    स्नेही अनूप जी, लेखन का मकसद जब सिर्फ हंगामा फैलाना हो तो फिर उसमे किसी और उद्देश्य की जरूरत ही क्या है? दिल्ली इतनी असुरक्षित हो चुकी है कि अब जिंदगी पनाह मांग रही है मैं ये नाराजगी एक कविता ‘बीप-बीप’ में प्रकट भी कर चुका हूँ| स्वयं में सुधार ले आना ही पर्याप्त होगा पूर्वाग्रही व्यक्ति के लिए माफ़ी माँगना बड़ी हिम्मत का काम है| उमंग को हमारा नैतिक समर्थन सिर्फ उमंग को नहीं बल्कि पूरे समाज को दुराचार के विरुद्ध एक मानसिकता विकसित करने का हौसला देगा| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

Rajkamal Sharma के द्वारा
July 12, 2011

आदरणीय चातक जी …सादर अभिवादन ! आपका यह लेख पढ़ने के बाद मन में यह विचार उठे की *क्यों कुछेक लोग सिर्फ सनसनी पैदा करने के लिए सही बातो को अपना हित तथा स्वार्थ साधने के लिए तोड़ मरोड़ कर पेश करते है ….. *जब इनको इस मंच से कुछ प्राप्त होने वाला नहीं है तो फिर हम किस मुंह से ऐसी हरकते करने वाले नेताओं को दोष देने का अधिकार रखते है …. *यह देख कर ताज्जुब तथा अचरज होता है की इतनी छोटी सी उम्र में एक बालिका में कितनी परिपक्वता है ….. सच में ही उसका कहा गया एक एक शब्द सोचने पर मजबूर तो करता ही है शर्मिन्दा होने की बजाय सर को गर्व से ऊँचा करने का एक अवसर भी प्रदान करता है ….. इस सच्चाई को सभी ब्लागरों के सामने लाकर आपने एक नेक तथा सराहनीय कार्य किया है इसके लिए आप मुबारकबाद के पात्र है धन्यवाद :) :( ;) :o 8-) :|

    chaatak के द्वारा
    July 13, 2011

    प्रिय राजकमल जी, मशहूर होने की लालसा अक्सर बेवकूफी भरे और आश्चर्यजनक कार्य करवाती है शायद एक कारण ये भी हो सकता है और दूसरी बात ये कि इंसान के अंदर किसी बात की ग्रंथि बन जाए तो फिर वह उससे जल्दी निजात नहीं पाता| सुना तो होगा आपने कि चक्कर खुद हो आता है और आदमी कहता है दुनिया घूम रही है| उमंग के बारे में मेरी भी राय कुछ ऐसी ही है वह दूसरों की पीड़ा को समझ रही हैं और उनके लिए कुछ अच्छा करने का प्रयास कर रही हैं| नेताओं वाली बात अच्छी कही आपने| सराहना एवं प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

RaJ के द्वारा
July 12, 2011

चातक जी पश्चिम के तौर तरीकों यदि आजके युग में भी भारत की आवश्यकता है यह दुर्भ्ग्यपूर्ण है | यह हंगामे एक अभिजात्य वर्ग के प्रतिनिधित्व करने वालों के चोंचले हैं जहाँ प्रगतिशील नवयुवकों योवनाओं द्वारा सेक्स के लगातार स्वक्ष्न्दाता को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मानक माना जा रहा | भारत को किसी सोलिड वाक की जरुरत है कि युवतिया मार्शल आर्ट और देसी आर्ट से लैस होकर स्व रक्षा करके , उनको सबक सिखाएं | लेख के लिए बधाई

    chaatak के द्वारा
    July 13, 2011

    स्नेही राज जी, इस बात से मैं भी इत्तेफाक रखता हूँ की भारत को किसी सॉलिड मोर्चे की जरूरत है और युवतियां जहाँ तक हो सके आत्मरक्षा के लिए भी आत्मनिर्भर हों| सेक्स की स्वछंदता बिलकुल अलग मुद्दा है जिसपर एक स्वस्थ निर्णय लेने की जरूरत है वैसे लिव-इन-रिलेशन के प्रकाश में आने से सरकारी और अभिजात्य वर्ग की सोच स्पष्ट हो चुकी है| जहां तक दुराचार का सवाल है हमें इस बात को स्वीकार करना होगा कि ये जितना पीड़ादायक एक सीधी-सादी स्त्री के लिए है उतना ही एक वेश्या के लिए भी ऐसे में स्त्री के चरित्र को आधार बना कर पीड़ा को आंकना मेरी नजर में अन्याय भी है और क्रूरता भी| दुराचार के विरुद्ध यदि सिर्फ वेश्याएं भी मोर्चा निकालेंगी तो मैं उसे भी पूरा समर्थन दूंगा| लेकिन वह यदि वेश्यावृत्ति को जायज ठहराने की कोशिश करे तो मैं उसका विरोध करूँगा| आपकी इस प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!


topic of the week



latest from jagran