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कौन रोकेगा बलात्कार

Posted On: 10 Jul, 2011 Others में

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‘बलात्कार’ एक ऐसा जघन्य अपराध जिसकी सजा कितनी भी कड़ी क्यों न हो कम होगी| हमारे देश के हालात तो इस मामले में बद से बदतर हो चले हैं| आप जितना ज्यादा शहरों और तथाकथित सभ्य नगरों की तरफ बढते चलें उतना ही ये ग्राफ बढ़ता जाएगा और महानगरों में इसकी संख्या असभ्य-आदिवासी इलाकों से भी ज्यादा नज़र आएगी| बलात्कार के विरुद्ध क़ानून हर रोज कड़े बनाए जा रहे हैं| पीडिता को दर्द से राहत देने के लिए मोटी रकम के तोहफे दिए जा रहे है, संभवतः इसके पीछे अभिजन सामाज की वह ओछी सोच जिम्मेदार है कि ‘पैसा ही सम्मान है’|

जो भी हो, एक बात स्पष्ट है कि इतनी कोशिशों के बावजूद हिन्दुस्तान में बलात्कारों की फेहरिश्त दिन-ब-दिन बढती जा रही है| हम ये सोच के बैठे रहें कि बलात्कार को रोकने का कोई प्रभावी क़ानून आ जायेगा या फिर बलात्कार की कोई चमत्कारिक दवा ईजाद हो जायेगी और उसे लगाते ही पीडिता का सम्मान पुनः वापस आ जायेगा तो फिर ये बुराई कभी दूर नहीं होगी| हमें इस समस्या पर गंभीरता से विचार करना होगा और कई तरह के निर्णय लेने होंगे| चूंकि ये बुराई सामाजिक है और इसे असामाजिक तत्व अंजाम देते है इसलिए फैसला समाज द्वारा होना चाहिए ‘ऑन दि स्पॉट’ बजाय इसके कि अदालत का चक्कर लगा के पीडिता अपने गवांए हुए सम्मान की कीमत ले|

दूसरी महत्वपूर्ण बात ये कि इस कृत्य के लिए कौन-कौन से लोग जिम्मेदार है- प्रथम-दृष्टतयः तो बलात्कारी स्वयं इसके लिए जिम्मेदार है और जिस तरह हम किसी पागल कुत्ते को जीने का हक नहीं देते उसी तरह इस समाज में एक बलात्कारी को भी जीने हक नहीं होना चाहिए| ठीक इसी तरह हमें उन कारकों पर भी ध्यान देना होगा जिनकी वजह से कोई आदमी बलात्कारी बन जाता है| कोई भी बच्चा बलात्कारी पैदा नहीं होता उसे कुछेक उद्दीपन बलात्कारी बनाते है| यहाँ पर मैं उन स्त्रीवादियों का ध्यान आकृष्ट करना चाहूंगा जो दिन रात पुरुष जाति को कोसने का बीड़ा उठाये जी रहे हैं और इस घिनौने कृत्य का ठीकरा पुरुषों के अकेले माथे पर फोडकर ही अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेते है| आइये जरा कुछ कारणों पर नजर डालें के अधिकतम बलात्कारी कौन पैदा कर रहा है|

ग्रामीण क्षेत्रों में बलात्कार को अंजाम देने वाले ज्यादातर वहशी उन माताओं की संताने हैं जो खुले आम फूहड़ किस्म के मजाक करती हैं और जिनके घर में स्त्री पुरुष अश्लील, द्विअर्थी और आपत्तिजनक संवाद और आचरण करते हैं और ये भी ध्यान नहीं देते कि वहाँ पर कोई बच्चा या किशोर मौजूद है| इस तरह की हरकतें शहरी क्षेत्रों में भी देखीं गई हैं और इनका उद्दीपन सर्वाधिक अपने ही सगे सम्बन्धियों पर होने वाले बलात्कार को जन्म देता है|

शहरी क्षेत्रों में बलात्कार एवं सामूहिक बलात्कार के तीन बड़े कारण हैं -

(१) परिवार में माँ या बहिन का दुश्चरित्र या आडंबरपूर्ण होना- किशोरों और नवयुवकों में कुंठा ज्यादातर घर की महिलाओं के स्वछन्द आचरण जैसे अमर्यादित भाषा, संबंधों और पहिनावे में अत्याधिक खुलापन या घर की महिलाओं के नाजायज सम्बन्ध से उपजती है और वह बलात्कार जैसे जघन्य अपराध कर राहत का अहसास करता है |

(२) प्रेम में धोखा- आजकल प्रेम करने का तो सरकारी फरमान निकला है लिहाजा प्रत्येक नर एक अच्छी मादा और प्रत्येक मादा एक अच्छे नर की तलाश में दिन रात एक किये रहते हैं| अब तलाश दोनों ओर से जारी है तो फिर मिलने में देर कैसी ! लेकिन जब मादा कुछ दिनों के बाद किसी अन्य योग्य नर का हाथ थाम कर पहले को छोड़ देती है तो फिर एक कुंठा जन्म लेती है और ये उसे शराबी, कवि या बलात्कारी बना देती है| बलात्कारियों में एक बड़ी संख्या इन कुंठित मजनुओं की भी है|

(३) नशाखोरी- अधिकतर ऐसे परिवारों में जहाँ माता-पिता के पास बच्चों के लिए समय नहीं है, बच्चे नशे की ओर आकर्षित हो जाते हैं और नशे के साथ उन्हें मिलता है असामाजिक तत्वों का साथ| नशे के मद में तो देवता भी बलात्कारी बन जाता है इंसान की क्या बिसात है, खासकर तब जबकि युवतियां हूरों का लिबास पहनकर जलवे बिखेर रही हों |

मेरे इस लेख में दिए गए तर्कों का अभिप्राय बलात्कारी की तरफदारी नहीं है उसके लिए तो सिर्फ और सिर्फ सजाये-मौत (वो भी हो सके तो पीडिता के ही हाथों) है| मेरा अभिप्राय उन तथ्यों पर विचार करना है जिन पर ध्यान दे कर हम भविष्य में पैदा होने वाले बच्चों को बलात्कारी बनने से रोक सकें| क्योंकि मेरा मानना यही है कि बलात्कारी पैदा नहीं होता उद्दीपन द्वारा बनाया जाता है|

अभी भी यदि हम अपने लिए कठोर निर्णय लेने के लिए तैयार नहीं हैं तो फिर बलात्कार को न तो कोई क़ानून रोक पायेगा और न ही धन पीडिता का कष्ट कम कर पायेगा| समाधान है सिर्फ संयम! पुरुष के लिए भी और स्त्री के लिए भी जहां पुरुष स्त्री का सम्मान कर अपने बालकों को स्त्री का सम्मान करना सिखाएं वहीँ स्त्री स्वयं भी बात-बात पर कपडे उतारकर और लघु-वस्त्रों की नुमाइश कर अपने बच्चों को कुंठित और बलात्कारी को प्रेरित न करें|

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46 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Prakash के द्वारा
July 25, 2011

beep तुम सब लोग beep हो  पहले पूजा करते हो और बाद में ……….. कृष्ण करे तो चमत्कार हम करे तो बलात्कार। ऐसे मैं बलात्कारी नही हुँ और नहीं इसका supporter

    chaatak के द्वारा
    July 25, 2011

    प्रकाश जी, आप काफी क्रोध में प्रतीत होते हैं और जब बहस एक ऐसे मुद्दे पर हो तो क्रोध लाज़मी भी है परन्तु इस तरह का प्रदर्शन कुछ अच्छा नहीं लगा इसीलिए आपके कुछ शब्दों की बीप-बीप तो करनी ही होगी| आप अपने विचार रखें, तर्क रखे, सहमति, या असहमति प्रकट करें ये तो अच्छा है लेकिन इस तरह से करें, कम से कम मेरे ब्लॉग पर तो नहीं! रह गई कृष्ण की बात तो वे अपने समय के सर्वश्रेष्ठ थे ‘समरथ को नहीं दोष गोसाईं!’ पढ़ा तो होगा| फिर भी एक बार कृष्ण के व्यक्तित्व से अपनी तुलना करके देखिये, आपको तो आपके गाँव या मोहल्ले में भी सारे लोग नहीं जानते (कितने मशहूर हैं आप!), कृष्ण से पूरे जीवन कोई जीत न सका ऐसा महायोद्धा था वह (आप सिर्फ चार घर ट्राई कर लो शायद पड़ोस में ही कोई इतना ताकतवर मिल जायेगा कि आपको महीनों होश न आये) कृष्ण ने गीता के उपदेश दिए जिनकी व्याख्या कर पाना इस समय के सर्वोत्तम विद्वान के लिए भी टेढ़ी खीर साबित हो जायेगी (आपकी उपलब्धि क्या है भाई?) छोडो सारी बड़ी-बड़ी बातें आपकी छोटी बात लेते है- सिर्फ एक प्रेमिका के नखरे झेल के दिखा दो तो जाने, कृष्ण तो सभी की ख्वाहिशें पूरी करते थे :) ! अभी मैंने कृष्ण के मानवीय पक्ष की ही बात की है देवत्व की नहीं| हैं आप किसी कोने भर के भी? तो बाबू पहले किसी की तुलना अपने आप से करने से पहले देखो तो कि कर क्या रहे हो आपकी अपनी लम्बाई तो नाप लो सुमेर परवत को बौना बताने की कोशिश बाद में करना| एक बार प्रेम से कहो राधे-राधे ! ॐ शांतिः शान्तिः शान्तिः !

vivekgoel के द्वारा
July 21, 2011

हे पार्थ , आओ जुल्म का करो तुम अंत, चला दो चक्र श्रीकिशन जी के तेज़ का, मिटा दो धरती से पापियों बलात्कारियों को मिले न सुख उन्हें किसी सेज का, जो मासूमों की अस्मिता से खेल करें और संग विच्छेद करे,नन्हे पावन संबंधो को, आओ उस पापी की वध करें , छीन भिन्न अंग विहंग करे, सबक दे ऐसे दुर्बंधों को, उनका जो साथ दे , पापी का हाथ बने, ऐसे दुराचारियों को भी नाश करे आज हम, रुक न जाए कभी, रोध्ररूप धर के बस , ऐसे समाज का भी विनाश करे आज हम, जो प्रतिहारी और प्रतिकार भी करे हमारा प्रतिरोध, दे उनको भी आज हम रोंद के रख, न्याय की प्रत्रिक्षा नहीं, कोई अनुरोध, विनती नहीं , न्याय स्वयं बन जाये कोंध के हम, ऐसे दुराचारी को केवल मृत्यु का भास् हो उससे कोई परिहास या हास न कर सके यहाँ, ऐसे समाज का निर्माण हो, देविस्वरूप कन्या का मान सम्मान हो, प्रेम मिले हर जगह ////

    chaatak के द्वारा
    July 25, 2011

    स्नेही विवेक जी, ईश्वर करे आपकी दुआ क़ुबूल हो और हम एक सुसंस्कृत समाज के निर्माण की ओर अग्रसर हो सकें!

ashutosh के द्वारा
July 15, 2011

bhai chatak ji apne jo kuch apne blog me likha hai wo kaafi hai hamare prashasan ki kalai kholne ke liye……thankyou

    chaatak के द्वारा
    July 15, 2011

    स्नेही आशुतोष जी, वर्तमान प्रशासन को दुरुस्त करने के लिए युवाओं को पूरी जिजीविषा के आगे आना पड़ेगा वह भी हर क्षेत्र में जैसे- प्रशासन, समाज और राजनीती| ये तीन क्षेत्र ही सारे देश को प्रभावित करते हैं और तीनो में परिवतन चाहिए पहले में मध्यम दूसरे में अल्प और तीसरे में आमूल चूल| आशा है हम अपने अपने क्षेत्र में ऐसा जरूर करेंगे| वन्देमातरम !

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
July 12, 2011

प्रिय चातक भाई बहुत ही सार्थक और गंभीर विषय आप का -इस के एक नहीं अनेक कारण होते है जिसमे शुरुआत तो हमारे घर परिवार से नैतिक आचरण सिखाने से होती है अगर कोई हमारी भारतीय संस्कृति को गले लगाये प्यार से रह माँ बहनों के बीच में पला है सिखा है पढ़ा है नैतिक आचरण तो सभ्य होगा शिष्ट होगा चन्दन सा होगा विष नहीं भरेगा -न वह अपनी बहन बेटियों माताओं को इस तथाकथितआधुनिक सभ्यता के चरम पर जाने देगा पुरुष हो या स्त्री दोनों अपने घर से ही बनते बिगड़ते हैं कुछ ही मित्रों और बाहरी परिवेश में कुछ मानसिक विकृतियों के कारण -सब का इलाज है -जहाँ गलत दिखे विरोध शुरू हो -शुरू से ही -उन्हें प्यार से सिखाएं -समझाएं -गलत राह न पकड़ें- जड़ मजबूत होगी तो तना बचेगा – हमारा नैतिक आचरण-संयम -कठोर दंड -विकृत मानसिक वालो का इलाज सहायक होगा – केवल निम्न समाधान जो आप ने सुझाया काफी नहीं है -(वहीँ स्त्री स्वयं भी बात-बात पर कपडे उतारकर) ये लिखना जायज नहीं है – समाधान है सिर्फ संयम! पुरुष के लिए भी और स्त्री के लिए भी जहां पुरुष स्त्री का सम्मान कर अपने बालकों को स्त्री का सम्मान करना सिखाएं वहीँ स्त्री स्वयं भी बात-बात पर कपडे उतारकर और लघु-वस्त्रों की नुमाइश कर अपने बच्चों को कुंठित और बलात्कारी को प्रेरित न करें पुरुष भी बराबर का भागीदार है इसमें पुरुष ही पिता पुरुष ही साथी पुरुष ही बेटा है जो ये karta करवाता है …. स्त्रियाँ भी खुलेपन से बचें और सीता सी मर्यादा सीखें -

    chaatak के द्वारा
    July 12, 2011

    स्नेही भ्रमर जी, आपकी प्रतिक्रिया में आपने लेख की एक लाइन पर ऐतराज जताया है जबकि मुझे स्वयं पूरे लेख पर ही ऐतराज है हिन्दुस्तान जैसे संस्कारी राष्ट्र में अपसंस्कृति की पैदायाशों ने इस लेख को लिखने पर विवश किया है| इसी एक पंक्ति पर आपसे जवाब चाहूंगा मैंने स्त्री के बात-बात पर कपडे उतारने को अमादा होने की बात कही तो आपको बुरा लगा लेकिन जब पूजा भट्ट, मधु सप्रे, ममता कुलकर्णी, और अब पूनम पाण्डेय हर खुशी और विरोध कपडे उतार कर ही जाहिर कर पाती हैं तो आपका क्या दृष्टिकोण है| क्या ये जायज है? इस तरह की ओछी हरकतें नारी सशक्तिकरण के ढोंग के पीछे कुंठित महिलाओं की कामपिपासा का परिणाम नहीं है? नारीसशक्तिकरण जिस्म की नुमाइश करने से होगा ऐसा मानने वाले किस कदर कुंठित है इसका अंदाजा लगाना क्या कठिन है| नारी गुलाम नहीं ये दर्शाने के लिए एवरेस्ट फतह करने की बात क्यों नहीं आई क्या महिलाओं ने पहले भी ऐसे उदाहरण पेश नहीं किये हैं? जिन लोगों को आज स्त्री का देह प्रदर्शन उसकी अंतर्निहित शक्ति का प्रदर्शन लगता है, आश्चर्य नहीं कि कल मानसिक रूप से बीमार इन लोगों को पुरुष द्वारा किया जाने वाला बलात्कार उसकी मासूमियत का प्रदर्शन प्रतीत होने लगे| आपकी टिप्पड़ी ने लेख के इस बिंदु को विस्तार देने में सहायता की इसके लिए आपका धन्यवाद!

Ramesh Bajpai के द्वारा
July 12, 2011

प्रिय श्री चातक जी ‘ समाधान है सिर्फ संयम! पुरुष के लिए भी और स्त्री के लिए भी ‘ दुःख का विषय तो यह है की यहाँ समाधान पर ध्यान देने के बजाय स्त्री व पुरुष के नजरिये से दोषारोपण हो रहा है जो शायद इस विचार वान मंच व विद्वान् जनों की गरिमा के अनुकूल नहीं लग रहा | नारी हमारे संस्कारो में बेटी ,बहन या माँ के साथ सामाजिक परिपेक्ष्य में परिवार की रीढ़ यानि पत्नी होती है | ‘ किसी भी नारी के साथ हुआ अन्याय या बलात्कार सभ्य समाज के ऊपर करार प्रहार होता है जिसका दंस कहा न कही किसी न किसी रूप में पुरुष को झेलना ही पड़ता है ,चाहे भाई ,पिता या पति के रूप में ही सही | सभ्य समाज के इस घिनौने व घ्रणित कलंक से बेटियों .बहनों को को बचाने के उपाय पर सार्थक चिंतन होना ही चाहिए |

    chaatak के द्वारा
    July 12, 2011

    आदरणीय बाजपेयी जी, सादर अभिवादन! इस विचार से कि नारी हमारे संस्कारों में बेटी, बहन, माँ और पत्नी होती है, कम से कम मैं तो इनकार नहीं कर सकता| यहाँ पर आपने वह बात कुछ और स्पष्ट कह दी है जो मैंने लेख में लिखी है यहाँ मैं फिर यह जोड़ना चाहूंगा कि जितनी पीड़ा एक स्त्री को बलात्कार से होती है उससे कम पीड़ा उसके पिता, पति, भाई या पुत्र को नहीं होती ये पीड़ा उस समय भी वह महसूस करता है जब घर की महिलाएं फूहड़ वस्त्र धारण कर अपनी स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति करती हैं या अनैतिक आचरण को स्त्री की स्वतंत्रता सिद्ध करने की कोशिश करती है| आपकी इस सुलझी हुई प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

atharvavedamanoj के द्वारा
July 11, 2011

प्रिय मित्र चातक जी…. सादर वन्देमातरम…मुझे लगता है थोडा अतिरेक हो गया है|उन्मुक्त यौनाचार और बलात्कार में जमीं आसमान का अंतर है|हां, यह देखने वाले के लिए एक उद्दीपक का काम जरुर करता है किन्तु सामाजिकता का भी स्पष्ट प्रभाव पडता है|मनुष्यों में यौन अभिव्यक्ति सामाजिकता से ही प्रभावित होती है, अन्यथा एक श्वान और एक मनुष्य में कोई अंतर नहीं|अधिकाँश मामलों में बलात्कार की पीडिता ही स्वतः बलात्कार को प्रोत्सहित करती हैं किन्तु कुछ मामलों में एक बेबस का मजबूर आत्मसमर्पण ही होता है|जहाँ तक मैं मानता हूँ की बलात्कार एक स्त्री का सम्पूर्ण आत्मिक हनन है और उसके आरोपी को सजाये मौत से कम किसी भी हालत में नहीं देना चाहिए किन्तु झूठे आरोप लगाने वाले को भी एक सामान ही सजा का प्रावधान होना चाहिए, क्योंकि इस तरह का मिथ्या आरोप भी एक पुरुष के आत्मा का सम्पूर्ण हनन ही है|मीडिया का क्या कहूँ कुपही में इहाँ भांग पड़ी है|जय भारत, जय भारती|

    chaatak के द्वारा
    July 11, 2011

    स्नेही मित्र मनोज जी, सादर अभिवादन! उन्मुक्त यौनाचार एक ऐसा मुद्दा है जहां सिर्फ पुरुष दोषी नहीं है वहां स्त्री भी बिलकुल बराबर मात्र में दोषी है इसीलिए मैंने इस प्रकार के यौनाचार को लिखते समय इस लेख में स्त्री और पुरुष शब्द का प्रयोग न करके ‘नर’ और ‘मादा’ शब्द का प्रयोग किया है यानी मैं उन्हें सभ्य समाज का हिस्सा नहीं मानता और बलात्कार एक असामाजिक कृत्य है जो एक स्त्री पर जबरन एक वहशी द्वारा किया जाता है और आप भी इस कृत्य को सजाये-मौत से कम के लायक नहीं मानते| चूंकि इस लेख में मैंने सिर्फ बलात्कार की समस्या को ही उठाया है इसलिए उन्मुक्त आचरण पर ज्यादा लिखना मुनासिब नहीं था| मीडिया के लिए ऐसी ख़बरें सिर्फ मसाला आइटम हैं क्योंकि कई बार ऐसा लगता है मानो कोई संवेदनहीन नुमाइश को कैश करने की कोशिश कर रहा हो| विचारों के इस क्रम को आगे बढ़ाने के लिए हार्दिक धन्यवाद! वन्देमातरम!

Anita Paul के द्वारा
July 11, 2011

चातक जी, आपके पूरे आलेख को पढ़ने के बाद ये बात साफ साफ कही जा सकती है कि आप पुरुषवादी मानसिकता से गंभीर रूप से पीड़ित हैं. आपने बलात्कार से बचने के लिए महिलाओं की आजादी बाधित करने वाले जो सुझाव दिए हैं उनसे मैं कतई सहमत नहीं. आखिर मर्द अपनी कामपिपाशा पर, अपनी यौन कुंठा पर स्वयं लगाम क्यूं नहीं लगा सकता? इसके लिए उसे नारी को मर्यादा की शिक्षा देने की जरूरत क्यों पड़ती है? होना तो ये चाहिए कि नारी कभी भी एक सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में ना देखी जाकर एक श्रद्धा और सम्मान की पात्र के रूप में देखी जाए तभी जाकर नारी को उसका सही स्थान मिल सकेगा. यहॉ भी उसे उपकृत करने की भावना ना होकर सहज वृत्ति के रूप में घटित होने वाली भावना का उदय जरूरी है. मुझे उम्मीद है कि आप अपने विचारों में यथासंभव बदलाव लाकर आलेख में तदानुरूप परिवर्तन अवश्य करेंगे.

    atharvavedamanoj के द्वारा
    July 11, 2011

    और अनीता जी…..जब भी मैंने आपके आलेख को पढ़ा है आप घनघोर स्त्रीवादी मानसिकता से पीड़ित नजर आई हैं? मैं पूछता हूँ कसूर किसका नजर का या नजरिया का? नारी की स्वतंत्रता उसके गरिमामय और श्लील वस्त्रधारण में ही है, अगर आप इसको स्वतंत्रता को संकुचित करना मानती हैं तो क्षमा कीजियेगा, सभ्य समाज में किसी को नंगा घूमने की इजाजत नहीं दी जा सकती|

    bharodiya के द्वारा
    July 11, 2011

    अनिता आप सभ्य समाज की बात कर रही है । आदमी अभी सभ्य नही हुआ है । सभ्य आदमी कानून से डरता नही मान रखता है । समाज का मान रखता है । अपने धर्म, भगवान का मान रखता है । ईस केस मे आप को कुछ भी नजर आता है ? अभी तो आदमी को प्राणी समज समज कर ही कानून बनाये जाते है उसे कन्ट्रोल करने । धर्म भी उसे प्राणी समज कर उसे सुधार के की कोशीश कर रहे है ताकी उसके आचरन मे कुछ नैतिकता आए और पाप कर्म ना करे । ये कानून और धर्म की बुदरत के साथ लडाई है । ये चाहते है कुदरत का बनाया मानव प्राणी अच्छा ईन्सान बने लेकिन बार बार हार जाते है । वही मानव प्राणी पशुता पर आ ही जाता है । पशु तो पशु है वो हमारी या आपकी सलाह क्यो मानेगा की वो कन्ट्रोल मे रहे । ऐसे पशु को भडकानेवाली कोई चीज पशु से दूर रखा जाये ईसमे ही सलामती है । ईस की मूल जड है समाज खूद । अजगर जैसा हो गया है । हर सुख डकारना चाहता है, अपना या पराया ।

    chaatak के द्वारा
    July 11, 2011

    अनीता जी, आपने काफी आवेश में (या कहूँ क्रोध में) एक फुंकार मारती टिप्पड़ी की और अपने नारीवादी होने का फ़र्ज़ निभा दिया| आपके विचार से यदि मैं पुरुषवादी मानसिकता से पीड़ित हूँ तो आपको भी तो नारीवादी मानसिकता की कुंठा चैन से नहीं बैठने देती| दूसरी बात ये की आपने लेख को पढ़ा भी नहीं और समझा भी नहीं और अपनी असहमति जाहिर करने में जल्दबाजी कर गईं| आप जैसी नारीवादी विचारक से ये आशा नहीं थी| आपने कामपिपासा वाली बात बिलकुल सही कही है परन्तु आप यदि सही अर्थों में नारीहित सोचती हैं तो बताइये क्या महिलायें कामपिपासु नहीं हैं? ( मैं ये मजबूरी में लिख रहा हूँ क्योंकि वैसे बात आपको समझ में नहीं आयगी) सम्मान का हकदार तो पुरुष भी है लेकिन जब उसका चरित्र सम्मान के काबिल हो (क्या आप अपने पिता या अपने भाई का सम्मान नहीं करती? या फिर वे पुरुष नहीं?) ठीक इसी तरह स्त्री को भी सम्मान तभी मिलेगा जब उसका चरित्र इस लायक होगा| सिर्फ एक देह प्राप्त कर लेने से यदि आप सोचती हैं कि आप सम्मान की पात्र हो गयीं तो आप हमेशा इसी तरह सम्मान पाने के लिए भटकती रहेंगी| मैं किसी भी सकारात्मक बदलाव के लिए तत्पर हूँ यदि ये आपके मार्गदर्शन से ही संभव हो तो मुझे बड़ी ख़ुशी होगी अतः एक बार और लेख को पढ़ें और बिना किसी पूर्वाग्रह के अपनी राय दें| आपकी राय उचित होगी तो परिवर्तन अपने आप हो जाएगा| जरूरी नहीं कि आप ब्लॉग पर ही राय दें आपकी मेल का भी स्वागत है|

    santosh kumar के द्वारा
    July 11, 2011

    अनीता जी ,आपका नारीवादी होना बहुत अच्छी बात है , लेकिन क्या आप कम कपडे पहनने को ही नारी की आजादी मानती हैं ? ?? आपने अपने लेख ” बदचलन औरतों का स्ल्ट वाल्क ” पर मेरी प्रतिक्रिया का जबाब देना भी उचित नहीं समझा

    anoop pandey के द्वारा
    July 11, 2011

    अनीता जी न तो नारी अल्पसंख्यक है और न ही समाज कांग्रेसी सरकार की तुस्टीकरण होता रहे……आप जो भी कहे वो ठीक और दूसरा कुछ कहे तो गलत. घूँघट की आंड में होने वाले कुकृत्यों ने कितनो की जान ली और कितने बदनामी के डर से आत्महत्या के रस्ते चले गए कुछ भान है आपको? बलात्कार से ज्यादा खबरे इस बात पर आती है की दो या तीन बच्चों की माएं किसी के साथ भाग गयीं, बिनब्याही बालाओं की गिनती नहीं.यदि आप किसी पर एक ऊँगली उठाते है तो भी चार आपकी तरफ होती हैं और यहाँ तो आप सभ्य गालियों का उपयोग कर रहीं है……यदि आपके साथ पूर्व में किसी ने कुछ गलत किया है तो उसके लिए पूरी पुरुष जाती को दोष देना कहा तक उचित है? ऐसा मैंने इसलिए कहा की आपके अन्दर जितनी कुंठा है पुरुषो को ले कर उसका कोई और कारण समझ नहीं आता.

shaktisingh के द्वारा
July 11, 2011

कुछ लचर कानून और आस-पास का वातावरण ही बलात्कार जैसी घटनाओं को जन्म देती है. इन पर नियंत्रण करके ही बलात्कार पर नियंत्रण किया जा सकता है.

    chaatak के द्वारा
    July 11, 2011

    शक्ति जी, आपकी बात से मैं भी इत्तेफाक रखता हूँ इस समस्या पर नियंत्रण पाने के लिए हमें व्यवस्था का भी मंथन करना होगा और आत्ममंथन भी समस्या विकराल जरूर है लेकिन प्रतिबद्धता के आगे घुटने टेक देगी| आज भी हमारे देश में बहुत से क्षेत्र ऐसे हैं जहां बलात्कार जैसी घटनाएं कभी भी नहीं घटीं| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

Abdul Rashid के द्वारा
July 11, 2011

किसी भी समस्या का समाधान ढोल पीटने से नहीं होगा.यदि स्त्री खुद को मुह तोड़ जवाब देने के लिए तैयार कर ले तो शायद इस समस्या का समाधान हो जाए. क्योंकि बलात्कारी जहाँ बलात्कार करता है वहां कानून व मददगार यदि हो तो ऐसी घटना होगा ही नहीं जो की संभव नहीं.रही सख्त कानून की बात तो कानून का डर किया अपाहिज मानसिकता के लोग पर असर करेगी क्या ? http://singrauli.jagranjunction.com

    chaatak के द्वारा
    July 11, 2011

    भाई राशिद आपके रोष को पढ़कर बहुत अच्छा लगा, यही रोष तो जगाना है हर युवा हर किशोर के मन में इसके लिए चाहे ढोल पीटना पड़े चाहे अपराधी को| दूसरी बात कि स्त्री खुद मुह तोड़ जवाब दे यहाँ आप गलती कर गए किसी भी स्त्री के अन्दर जबतक दम रहता है वह बलात्कारी को सफल नहीं होने देती| बलात्कार स्त्री के शारीरिक सामर्थ्य और उसके प्रतिरोध की ताकत टूट जाने के बाद ही होता है और स्त्री छोडिये किसी हाथी के भी असीम ताकत नहीं होती वह भी प्रतिकार करते करते अंततः थक कर हार जाता है| आपने लोगों की अपाहिज मानसिकता की बात भी काफी हद तक ठीक कही है परन्तु जहाँ ये अपाहिज है वहां हमारे आप जैसे युवा भी तो हैं जो न शरीर से लाचार हैं न मन से| हम इन अपाहिजों को जगाने और इन्हें अपनी शक्ति पहचानने के लिए प्रेरित तो कर सकते हैं| आप भी शुरुआत करें छुब्ध न हों परिवर्तन रातों रात नहीं होगा लेकिन होगा जरूर| आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद!

Meenakshi Srivastava के द्वारा
July 11, 2011

चातक जी , आपने ” कौन रोकेगा बलात्कार ” में बहुत ही महत्वपूर्ण विवेचना किया ; जैसे :- विचारों का १- ” पीडिता को दर्द से राहत देने के लिए मोटी रकम के तोहफे दिए जा रहे है, संभवतः इसके पीछे अभिजन सामाज की वह ओछी सोच जिम्मेदार है कि ‘पैसा ही सम्मान है’| ” 2– ” फैसला समाज द्वारा होना चाहिए ‘ऑन दि स्पॉट’ बजाय इसके कि अदालत का चक्कर लगा के पीडिता अपने गवांए हुए सम्मान की कीमत ले| ३- ” कोई भी बच्चा बलात्कारी पैदा नहीं होता ” निःसंदेह , आप जैसे लोग ही क्रन्तिकारी ( प्रगतिशील ) परिवर्तन ला सकेंगें . मेरे विचार से – तीन बातें अथवा तीन कारण और भी बड़े प्रभावशाली है अ- फिल्मो में जरूरत से ज्यादा बढती अश्लीलत्ता-फूहड़ता . ब- टीवी में – सीरियल्स के द्वारा -तरह-तरह के षड्यंत्र – नाजायज़ सम्बन्ध और विज्ञापन के माध्यम से सेक्स का प्रदर्शन ( बढ़ावा ) तथा स- इन्टरनेट व मोबाइल की ऐसी unlimited sites आज एक खुली – किताब की तरह है – जो बालिग -नाबालिग सभी को अपनी गिरफ्त में करती ही जा रही है . और दिन-रात लोगों के भीतर अपराधिक प्रवृत्ति जाग्रत कर रहीं हैं . शायद व्यापार एवं धन की लोलुपता के कारण इस पर न कोई कानून लागू है न कोई जुर्माना और न ही कोई दंड . सोचने की बात है -कि जब चारों -ओर अपराध को बढ़ावा देने वाले कारक हों तो ……कैसे रुक पायेगा अपराध ? वैसे आपने बहुत अच्छा लेख लिखा है – आपने लेख के माध्यम से जो सुझाव दियें हैं वो जल्द ही वास्तविकता में आयें और इस ” असह्य ” अपराध का समाज से शीघ्रातिशीघ्र अंत कराने में मददगार साबित हो सकें -यही मेरी बधाई है . मीनाक्षी श्रीवास्तव

    chaatak के द्वारा
    July 11, 2011

    मीनाक्षी जी, आपके विचार जानकर अपार हर्ष हुआ एक छोटी सी शुरुआत एक बहुत बड़ी क्रांति का कारण बन सकती है हम सभी उस दिन बेहद प्रसन्नता का अहसास करेंगे जिस दिन हमारे समाज को बलात्कार जैसे घिनौने शब्द से निजात मिल जायेगी| हाँ इसके लिए आत्म-संयम को सर्वाधिक बढ़ावा देना होगा और ये कार्य परिवार नाम की सामजिक इकाई ही कर सकती है अर्थात हमें कमजोर पड़ते हुए परिवारों को फिर से मजबूती से जोड़ना और उन्हें संस्कार का अमृत पिलाना होगा| ये कडवी घुट्टी है बच्चे सहज ही इसे नहीं पियेंगे हमें स्वयं इसे बार बार उनके सामने स्वयं पी कर ही उन्हें प्रेरित करना होगा| मेरा विश्वास है कि जब आप जैसी महिलायें जब हमारे समाज में मौजूद है तो हम बड़ी तेजी से इस समस्या पर काबू पाने की राह में बढ़ सकेंगे| आपके द्वारा दिए गए इस नैतिक समर्थन का हार्दिक धन्यवाद!

allrounder के द्वारा
July 11, 2011

प्रिय भाई चातक जी, आपका लेख पढ़ा आपने बेहद ज्वलंत विषय पर लेख लिखा है बलात्कार आज जिस गति से हो रहे हैं लगता है कोई एक्सप्रेस ट्रेन अपनी गति से चल रही है, किन्तु भाई आपका लेख पढ़कर मैं कुछ दिग्भ्रमित सा हो गया हूँ, एक ओर आप बलात्कारी को मृत्यु करक दंड के पक्षधर है दूसरी ओर इस घिनौने कृत्य को करने वाले के पीछे कारक बताकर मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया है क्योंकि मेरी नजर मैं बलात्कारी व्यक्ति मानसिक रूप से विकृत है और उसके साथ किसी भी प्रकार की सहानुभूति उसके घिनौने कृत्य पर पर्दा डाल सकती है ! आपने जो कारण दिए हैं जिनके कारण मनुष्य मै बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को अंजाम देने की स्तिथि पैदा होती है, उनसे मै कुछ हद तक सहमत हूँ ! यहाँ मेरे विचार से आज जो सबसे बड़ा कारण बलात्कार के पीछे मुझे समझ मै आ रहा है वेह है आज का तकनीकी युग ! आज आप इन्टरनेट पर एक सर्च मारे हजारों गंदगी से भरी sites मिलेंगी जिनसे किशोर नारी को मात्र भोग्या के रूप मै देख रहे हैं और उम्र के जोश मै वे भी ऐसा ही करने की चेष्टा करते हैं और जब कोई लड़की सहमति नहीं देती तब शायद वे ऐसा घिनौना काम अंजाम देने से भी नहीं चूकते, इसके अलावा मोबाइल फ़ोन इस प्रकार के आ गए हैं जिनमे तमाम गंदगी भरी पड़ी है जिससे मानसिक रूप से विकृत लोग नारी का सम्मान करने के बजाय बलात्कार कर रहे हैं ! हाँ बंधू और यहाँ आपने अपने एक कारण मैं लिखा है निराश प्रेमी शराबी कवि या बलात्कारी बन जाता है ? भाई कवि कौम को इस बलात्कारी कौम से मत जोड़ो कवि हृदय बड़ा ही कोमल होता है भाई ! एक विकराल समस्या पर आलेख लिखने के लिए आपका हार्दिक अभिनन्दन !

    chaatak के द्वारा
    July 11, 2011

    स्नेही अग्रज सचिन जी, सादर अभिवादन! आपको जिस स्थान पर भ्रम हुआ है वह मैं समझता हूँ | वास्तव में ये लकीर इतनी बारीक है कि सहज दिखाई नहीं देती| मैं एक छोटे से उदाहरण से इस बात को स्पष्ट करने की कोशिश करता हूँ – एक कुत्ता जिसे हम बहुत प्यार करते है वह किसी दूसरे पागल कुत्ते के संक्रमण से पागल हो जाये तो हम उसे क़त्ल ही करेंगे (यानी रोगी होने पर सजाये मौत) लेकिन साथ ही साथ हम सहानुभूतिपूर्वक उसके पागल होने के कारणों पर विचार करेंगे तभी हम अपने अन्य कुत्तों को बचा पायेंगे कि वे उन कारणों से पागल न हो| आपने ये भी बिलकुल सही कहा है कि इंटरनेट और मोबाइल फोन पर तमाम ऐसी गन्दगी मौजूद है जो बच्छों और नवयुवकों को बलात्कारी बनने की दिशा में प्रेरित करती हैं| एक और बात शायद आपने ध्यान न दिया हो इन सामग्रियों को उपलब्ध कराने वाली ७० से ८० प्रतिशत तथाकथित आधुनिक महिलायें ही हैं| आपकी इस विस्तारित प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद!

R K KHURANA के द्वारा
July 11, 2011

प्रिय चातक जी, बहुत दिनों बाद आपकी रचना पढने को मिली बलात्कार जैसे विषय पर अभूत सुंदर रचना ! हमारे देश के कानून ही कुछ ऐसे हैं ही किसी भी अपराध के लिए अपराधी साफ निकल जाते है और उसका कोइ सबूत नहीं मिलता ! सरे ही ढांचे को बदलने के जरुरत है ! राम कृष्ण खुराना

    chaatak के द्वारा
    July 11, 2011

    आदरणीय खुराना जी, क़ानून अंधा होता है ये कहकर क़ानून के रखवालों की कमजोरियों पर एक लम्बे अरसे से पर्दा डाला जा रहा है और अब तो ये क़ानून बहरा और गूंगा भी हो चुका है| जबकि वास्तविकता ये है कि कानून सही हाथों में हो तो दूसरों से ज्यादा देखता भी है और सुनता भी है| अपराधी आज इस लिए साफ़ बच जाता है क्योंकि कानून कमजोर और चरित्रहीन लोगों के हाथों में है| इस ढाँचे को बदलना होगा| आपकी प्रतिक्रिया के लिए सादर धन्यवाद!

    bharodiya के द्वारा
    July 11, 2011

    खुरानाभाई मफ करना ये कोइ कविता या वार्ता नही है , ये नन्गा सत्य दिखानेवाला लेख है । ईसमे दिखाया हर सत्य काला ही है । कही कोइ चीज अभूत सुंदर नही है । ताला तो शरिफो के लिये होता है, चोरो के लिये नही । वो तो कोइ भी ताला तोड देगा । बिलकुल ऐसे ही बलात्कार के कानून का है । पशु जैसा आदमी कानून से नही डरता । लेकिन हम और आप जैसे डरते है । ईस मे कानून सफल रहा है । हम और आप जैसे लोगो का आबादी मे बहुत बडा हिस्सा है । ये हिस्सा ईस पापसे बच गया वो कानून की बडी सफलता है । पशु जैसा आदमी कानून तोडता है उसे अपवाद मानना चाहीये ।  आदमी मे पशुता रहेगी तब तक ये चलता ही रहेगा । मानव अधिकारवालो को तो ईन पशुओ मे भी आदमी नजर आता है । वो फान्सी की बात, खसीकरण की बात ( जातिय अन्ग काटना ) या कोई बडी सजा हजम नही कर सकता । दुनिया की सरकारे मानव अधिकारवालो के ईशारे चलती है । है कोई गुन्जाईश ।

alkargupta1 के द्वारा
July 11, 2011

चातक जी , सामजिक यथार्थ को उजागर करता हुआ बहुत ही बढ़िया लेख है ! अच्छा विश्लेषण किया है किसी भी व्यक्ति को इस स्थिति तक पहुँचाने के लिए उसका पारिवारिक वातावरण व उसके आसपास का माहौल ,उसकी संगत काफी कुछ ज़िम्मेदार हैं…….! स्त्री पुरुष दोनों के लिए विचारणीय व सुझाये गए समाधान भी पूर्णरूपेण ध्यातव्य हैं उत्कृष्ट लेख !

    chaatak के द्वारा
    July 11, 2011

    आदरणीय अलका जी, आपकी टिप्पड़ी ने काफी हद तक सिद्ध कर दिया है की मेरे विचार सही दिशा में जा रहे हैं | मैं हर बार यही कहने की कोशिश करता हूँ ‘अपराध चाहे जो हो वह मानवता बनाम अमानवीयता या सामाजिक बनाम असामाजिक होता है कभी भी स्त्री बनाम पुरुष नहीं हो सकता|’ आपकी इस विस्तारित प्रतिक्रिया ने सोचने के लिए कुछ और नए आयाम और नैतिक बल प्रदान किया है| हार्दिक धन्यवाद !

Santosh Kumar के द्वारा
July 11, 2011

आदरणीय चातक सर , सादर प्रणाम ……. बहुत ही सार्थक लेख के लिए बधाई

    chaatak के द्वारा
    July 11, 2011

    स्नेही संतोष जी, सादर अभिवादन! आपने लेख को समय दिया और लेखन को नैतिक बल इसके लिए आपका तहे-दिल से शुक्रिया!

anoop pandey के द्वारा
July 10, 2011

चातक जी ये अनीता जी ने जो बहस छेड़ी और उसके बाद आपका लेख…….सच बोलता हूँ मित्र दिमाग के सारे कीड़ो को खाद दे गया……’ विचारोत्तेजक’ ये शब्द अच्छा रहेगा. वैसे हम पर भी पुरुषवादी का ठप्पा लगा हुआ है…….तो ज्यादा कुछ नहीं कह सकता पर बधाई तो दे ही सकता हूँ.

    chaatak के द्वारा
    July 11, 2011

    प्रिय अनूप जी, आपकी टिप्पड़ी पढ़कर तो मेरे भी दिमाग की सारी हरी और लाल बत्तियां जलने बुझने लगीं| आपके ऊपर यदि पुरुषवादी का ठप्पा लग चुका है तो आप बधाई के पात्र हैं क्योंकि नारीवादी का अर्थ यदि नारी के हितों की चिंता है तो पुरुषवादी का अर्थ पुरुष हितों की चिंता होगा और यदि पहला अपराध नहीं बल्कि प्रशंसा का वायस है तो दूसरा भी सराहना का पात्र होगा| आपकी प्रतिक्रिया के लिए तहे-दिल से शुक्रिया!

vasudev tripathi के द्वारा
July 10, 2011

चातक जी, समस्या और उसके समग्र समाधान को बता दिया आपने| सही है अकेला कानून कुछ नहीं कर सकता क़ानून उनके लिए जो बिगड़ चुके हैं और जो विकसित हो रहे युवा हैं उनके लिए संस्कार. सार्थक लेख के लिए बधाई|

    chaatak के द्वारा
    July 11, 2011

    प्रिय वासुदेव जी, आपकी राय जानकर बेहद ख़ुशी हुई जब तक युवा स्वयं सही रास्ते पर चलने की और गलत का प्रतिकार करने की पहल नहीं करता है तब तक स्थिति बदलने वाली नहीं है | प्रतिक्रिया का बहुत बहुत धन्यवाद!

RaJ के द्वारा
July 10, 2011

बढते अपराध का एक सिला ये भी है | सामाजिक वर्जनाएं ध्वस्त हो रही है | बलात्कार की वे घटनाये जिसमें दबंगों द्वारा घरों से लड़किओं उठा लिया जाता है तथा कंही बंधक बना कर महीनो अत्याचार करा जाता वे वास्तव में सजा ए मौत के हकदार हैं | बाकी रेव पार्टी से निकलने वाले युवक युवती क्या कुछ करें जिसमें जोर जबर्स्ती हो जाये उसको दुसरे रूप देखा जायेगा , विचारोत्तेजक लेख के लिए बधाई http://www.jrajeev.jagranjunction.com

    chaatak के द्वारा
    July 11, 2011

    स्नेही राज जी, आपने बलात्कार के दो अलग अलग रूपों का बिलकुल सही विवेचन किया है| लेकिन मेरी राय में आपसी सहमति को छोड़कर अन्य किसी भी दशा में शारीरिक संबंध बलात्कार है और बलात्कार किसी वेश्या का भी हो तो सजा सिर्फ सजा-ए-मौत होनी चाहिए| हम बलात्कार को जोर-जबरदस्ती कहकर उसकी जघन्यता पर पर्दा डालने की और जाएँ ही क्यों| आपकी राय के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद!

rajkamal के द्वारा
July 10, 2011

इंसान की क्या बिसात है, खासकर तब जबकि युवतियां हूरों का लिबास पहनकर जलवे बिखेर रही हों | aadrniy chaatk ji ….सादर अभिवादन ! ऐसे पुरुषों अनीता पाल जी जैसी महिलाओं का भी आभारी होना चाहिए जिन्होंने की अपने नवीनतम लेख में पुरुषों को महिलाओं को कम कपड़े पहनने पर डांट +फटकार तथा रोकने पर जम कर कोसा है …. जय हो !

    chaatak के द्वारा
    July 11, 2011

    प्रिय राजकमल जी, सादर अभिवादन ! आपकी ये शैली वास्तव में मुझे हमेशा प्रभावित करती रही है आप हलकी सी चुटकी लेते हुए गंभीर बातें कह जाते हैं और इसे ना समझने वाले इस बात पर नाराज भी हो सकते हैं| अनीता जी ने क्या सोचकर ऐसा लिखा ये मैं नहीं जानता लेकिन यदि उन्होंने महिलाओं को कम कपडे पहनने पर पुरुषों द्वारा उन्हें डाटने फटकारने से रोका है तो गलत नहीं किया क्योंकि ये अधिकार किसी भी पुरुष को नहीं बल्कि उस महिला की माता-पिता या फिर भाई-बहिन का है| यहाँ भी मेरी राय अपने घर को सुधारने की है न कि पडोसी के घर को| दोनों ही बातों के बीच बहुत पतली लकीर है और इसे हमें पहचानना ही होगा क्योंकि बात समस्या को हल करने की है न कि ये सिद्ध करने की कि किसकी बात ऊपर रहेगी| आशा है आपकी बेबाक टिप्पड़ियां इसी तरह राह दिखाती रहेंगी| जय हो!

rajkamal के द्वारा
July 10, 2011

आदरणीय चातक जी ….सादर अभिवादन आपने अपने स्तर के अनुरूप ही एक बेहद उम्दा लेख लिखा है लेकिन एक बात आप शायद जानबूझ कर छोड़ गए है नर और नारी की जनसँख्या में असंतुलन हो सकता है की अगर पुरुष और नारी का अनुपात अगर सुधर जाए तो इस प्रकार की घटनाओं में काफी हद तक कमी आ जाए ….. बाकी आप बेहतर जानते होंगे , क्योंकि मेरा तो यह सिर्फ अनुमान ही है …. धन्यवाद

    chaatak के द्वारा
    July 11, 2011

    प्रिय राजकमल जी, जनसँख्या असंतुलन बलात्कार की समस्या को अपवादस्वरूप ही जन्म देता है हाँ एक असंतुलन का व्यापक प्रभाव हमारे समाज पर पड़ता है| अपने अगले ब्लॉग में मैं इस असंतुलन के कारण और इसके प्रभावों पर ही प्रकाश डालने की कोशिश करूंगा| आपकी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद !

nishamittal के द्वारा
July 10, 2011

चातक जी बहुत अच्छा आलेख समाज की ज्वलंत समस्या पर.सही कहा आपने कोई बच्चा बलात्कारी नहीं पैदा होता प्रदूषित विचारधारा,माहौल ,सांस्कृतिक प्रदूषण यही सब सिखाता है.समय मिले तो कुछ समय पूर्व लेख लिखा था “रोती पीडिता खिलखिलाता बलात्कारी “आप [पढने का कष्ट करें.

    chaatak के द्वारा
    July 11, 2011

    निशा जी, इस विषय पर आपकी राय ख़ासा महत्व रखती है क्योंकि आपने समाज और इसकी व्यवस्था का अवलोकन काफी नजदीकी से किया है आपकी इस बात के कोई नाइत्तेफाकी संभव नहीं कि प्रदूषित विचारधारा, माहौल और सांस्कृतिक प्रदूषण बच्चे को दुर्दांत बनाता है| आपका लेख पढ़कर जल्द ही आपसे ब्लॉग-संवाद करूंगा| सामाजिक सरोकार के इस नाजुक मसले पर आपकी स्पष्ट राय का हार्दिक धन्यवाद!


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