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बिटिया के प्रश्न

Posted On: 1 Oct, 2010 Others में

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हिन्दुस्तानी समाज आज जिस सामजिक संक्रमण काल से गुजर रहा है उसमे माता-पिता और बेटी का रिश्ता अच्छी खासी बहस का मुद्दा बन चुका है आज बेटियों के पास माता-पिता के लिए किसी भी दूसरी भावना से ज्यादा सवाल हैं जबकि माता-पिता के पास या तो जवाब नहीं, या फिर हतप्रभ सूनी आँखें हैं | मेरा प्रयास है कि मैं बेटियों के सवालों और माता-पिता की खामोश गुनाहगार निगाहों को निष्पक्ष रूप में इस मंच पर रखूँ | वाग्देवी का आह्वान है ‘माँ इस रचना में एक बार फिर चातक के सर पर हाथ रखना ताकि शलाका पक्षपात न कर सके’|

__________________________________________________________________________

इतने ज़ख्म दिए हैं दिल पर, उसने जीना छोड़ दिया ;
जज्बातों को कुचल दिया, उसने रोना भी छोड़ दिया |
कितनी है मासूम वो देखो, कितनी भोली – भाली है ;
किसी का दिल ना दुखने पाए, सबकी बला उतारी है |
मौन रही कुछ भी ना बोली, कितनी हसरत टूट गई ;
अपने ही कुनबे की खातिर, वो अपनों से छूट गई |
तू एक रोज़ पराई होगी, बचपन से दिखलाती थी ;
लोरी में भी माँ उसको, बस मर्यादा सिखलाती थी |
उसके सपने पर ना खोलें, खुली हवा में उड़ जाएँ ;
बस इसकी ही खातिर, उसके ख्वाबों पर पाबंदी थी |
उसको पाला मगर पराया, बचपन से ही कर डाला ;
उसके जीवन को खुद, माँ-बाबा ने तर्पण कर डाला |
बहुतेरी अभिलाषा टूटी, कितनी खुशियाँ छूट गईं ;
उसके सब सपनो को उसकी, अपनी दुनिया लूट गई |
उसने कभी ना प्रश्न किया कि- वस्तु बन गई मैं कैसे ?
मुझको क्यूँकर दान किया, मूरत बेजान सी हो जैसे ?
दुनिया के छल-प्रपंच से भी, मानव का मान नहीं घटता ;
बेटी की खुशियाँ देख भला फिर, बाबा का क्यूँ मन दुखता ?
जब काँटों पर वो चलती है, तो माता हर्षित होती है ;
उसकी मुस्कान पे वो ही माँ, क्यों खून के आंसू रोती है ?
जब जीवन का अधिकार उसे, वो भाग्य-विधाता देता है ;
तो क्योंकर दुनिया वालों को, वह इसे छीनने देता है ?
उसकी दोहरी नीति पर अब, शंका ‘चातक’ को होती है ;
राधा ही हर युग में आखिर, क्यूँ अंगारों पर सोती है ?
ना ही माता, ना पिता और ना परमपिता करुणा करते ;
वो पल-पल मरती-जीती है और ये अपनी तृष्णा भरते |
उपहास बना डाला उसको, निर्लज्ज हैं कितने ये देखो ;
मर्यादाहीन जगत में वो, मर्यादा भेंट बनी देखो |
मर्यादाहीन जगत में वो, मर्यादा भेंट बनी देखो |

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51 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

KRISHNA के द्वारा
November 21, 2011

चातक जी सादर नमस्कार…. kaafi दिनों के बाद इस मंच पर आया इसके लिए खेद है. बिटिया के प्रश्न जैसे शीर्षक से आपने अपने मन की संवेदना को व्यक्त की है. घर पर मेरे भाई की बच्ची हुई है जिसे मैंने अभी तक नहीं देखा है आपकी लाइनों ने मेरे मन में अचानक ही उस बच्ची के लिए मोह को बढ़ा दिया है जिसकी तस्वीर ही मैंने देखी है. अपनों से मिलने के लिए मजबूर कर दी है आपकी लाइनों ने……….. उम्मीद है जल्द ही मैं वापिस जाकर उस नन्ही सी परी को देख सकूंगा. अपनों से मिलने की आग को हवा देने के लिए……….आपका धन्यवाद…… जय हिंद जय भारत…

manishgumedil के द्वारा
October 23, 2010

मेरा दिल कहता है – निसंदेह आपने एक बिटिया के जीवन में घटित होने वाले घटनाक्रम को बड़े ही सरल और सटीक ढंग से प्रस्तुत किया है……… आपकी प्रत्येक प्रस्तुति के विषय से लेकर पंक्तियों तक एक अर्थ और एक सन्देश समावेशित होता है…………. एक और मार्मिक मुद्दे से सुसज्जित लेख के लिए धन्यवाद्….

    chaatak के द्वारा
    October 23, 2010

    प्रिय मनीष जी, ‘दिल की बात सुने दिल वाला’ सच तो ये है कि पंक्तिया सिर्फ अध्ययन और निरीक्षण का परिणाम नहीं व्यक्तिगत अनुभव की जमीं पर खिंची रेखाएं हैं| सन्देश तक पहुँच कर इतनी हौसला-अफजाई का तहे दिल से शुक्रिया!

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
October 12, 2010

प्रिय चातक जी, बिटिया के प्रश्‍नों का सही चित्रण किया है - लोरी में भी माँ उसको, बस मर्यादा सिखलाती थी | यह पंक्तियां भी एक सत्‍य है कि मां अपनी बेटियों को हर समय कुछ न कुछ सीखाती ही रहती है। दिल को छुने वाली अच्‍छ कविता पर एक बार पुन: बधाई। http://deepakjoshi63.jagranjunction.com

    chaatak के द्वारा
    October 12, 2010

    स्नेही जोशी जी, आपकी उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया पाकर बड़ी ख़ुशी हुई | आपको चित्रण पसंद आया मेरा लेखन सफल हुआ| प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया!

tanaya के द्वारा
October 10, 2010

चातकजी ! आपकी रचना तो स्वभावतः निसंदेह बेहतरीन है ही | किन्तु मै यह नहीं समझ पा रही हूँ की क्या इसमें पूछे गए प्रश्न वास्तव में किसी बिटिया के है ? विशेषतौर पर मैं इन पंक्तियों की बात कर रही हूँ , “बेटी की खुशियाँ देख भला फिर, बाबा का क्यूँ मन दुखता ? जब काँटों पर वो चलती है, तो माता हर्षित होती है ; उसकी मुस्कान पे वो ही माँ, क्यों खून के आंसू रोती है ?” और भी कई पंक्तियाँ है जो मुझे ऐसा प्रश्न करने को मजबूर कर रहीं है | इन्तजार ………………

    chaatak के द्वारा
    October 10, 2010

    तनया जी, आपकी प्रतिक्रिया पाकर अत्यंत हर्ष हुआ | जिन पंक्तियों पर आपने प्रश्न उठाये हैं वे पंक्तियाँ मेरे भी मन में जिज्ञासा जगाती हैं ऐसी ही पंक्तियों के लिए मैंने इस कविता की प्रस्तावना में लिखा है ‘आज बेटियों के पास माता-पिता के लिए किसी भी दूसरी भावना से ज्यादा सवाल हैं’| जल्द ही मैं माता-पिता के जवाब भी प्रस्तुत करूंगा और आपके प्रश्नों का उत्तर भी शायद वहीँ मिलेंगे| विचारों पर मंथन करती आपकी इस बेहतरीन प्रतिक्रिया के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया!

swatantranitin के द्वारा
October 8, 2010

इतने ज़ख्म दिए हैं दिल पर, उसने जीना छोड़ दिया ; जज्बातों को कुचल दिया, उसने रोना भी छोड़ दिया | तू एक रोज़ पराई होगी, बचपन से दिखलाती थी ; लोरी में भी माँ उसको, बस मर्यादा सिखलाती थी | उसकी दोहरी नीति पर अब, शंका ‘चातक’ को होती है ; राधा ही हर युग में आखिर, क्यूँ अंगारों पर सोती है ? चातक जी, किस -किस लइनों अच्छा कंहू हर लाइन में कुछ है जो कुछ कहना चाहती हैं बहुत ही सुन्दर कविता |

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2010

    प्रिय नितिन जी, पंक्तियों की प्रशंसा कर उत्साहवर्धन करने का बहुत बहुत शुक्रिया ! आशा है आपका साथ इसी तरह मिलता रहेगा|

ANIL VERMA के द्वारा
October 6, 2010

आदरणीय चातक जी प्रणाम , आप ने भारतीय समाज में जो संक्रमण है उसको आप ने अपनी कविता के माध्यम से सबके सामने रखा है जब जीवन का अधिकार उसे ,वो भाग्य विधाता देता है ; तो क्योकर दुनिया वालो को ,वह इसे छीनने देता है ; बहुत अच्छी पंक्ति है गजब की रचना है अच्छी रचना के लिए बधाई

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2010

    प्रिय अनिल जी, उत्साहवर्धक टिप्पड़ी के लिए आपका कोटिशः धन्यवाद| भारतीय समाज संक्रमण मुक्त हो सके इसके लिए युवाओं को ही आगे आना होगा |

atharvavedamanoj के द्वारा
October 4, 2010

आदरणीय चातक जी सादर वन्देमातरम, आपकी इस मार्मिक कविता,और एक एक पंक्ति में छुपी हुई वेदना ने स्त्री विमर्श के लगभग समस्त पहलुओं को उजागर किया है और वर्तमान सन्दर्भ में असहाय बनी शक्तिस्वरूपा का सजीव चित्रण किया है…वहीँ दूसरी ओर परम्पराओं को भी लक्षित करने में कोई संकोच नहीं किया है …बहुत ही बेहतरीन कविता जय भारत,जय भारती

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2010

    प्रिय बन्धु मनोज जी, शक्तिस्वरूप को उसकी वास्तविक स्थिति का अहसास और कलुषित अपसंस्कृति के प्रलोभनों से निजात मिलने की देर है न दूषित परम्पराएं उसे जकड पाएंगी और न ही अधम पथ उसे भ्रष्ट कर पायेंगे और ये अगर कहीं होगा तो इसी हिन्दुस्तान में होगा | आपकी ओजमयी टिप्पड़ी के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!

rita singh 'sarjana' के द्वारा
October 3, 2010

चातक जी , ‘बेटी का प्रश्न ‘ के हर लाइन उम्दा वर्णन , बढ़िया भाव …..इससे आगे प्रतिक्रिया व्यक्त करने का मेरे पास कोई शब्द नहीं ………बहुत -बहुत बधाई l

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2010

    रीता जी, आपकी सराहना और कविता पर आपकी उत्साहवर्धक टिप्पड़ी से अत्यंत प्रसन्नता हुई| तहे दिल से शुक्रिया!

rajkamal के द्वारा
October 2, 2010

वाह ! चातक जी ..वाह … जवाब नहीं है आपका … क्या खूब लिखते है आप … जब जीवन का अधिकार उसे, वो भाग्य-विधाता देता है ; तो क्योंकर दुनिया वालों को, वह इसे छीनने देता है ? ऐसा लगता है की आपने स्वामी विवेकानंद जी को काफी गहराई से पड़ा है … बहुत अच्छी कविता … बधाई

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2010

    प्रिय राजकमल जी, आपकी इस उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया का बहुत बहुत शुक्रिया! सही अंदाजा है आपका मैंने महान विभूतियों का थोडा-बहुत अध्ययन किया है और कोशिश करता हूँ कि उन्हें अधिकाधिक समझ सकूं|

rajkamal के द्वारा
October 2, 2010

प्रिय चातक जी ..नमस्कार ! अगर आपको भगवान का ना सही उसके किसी ओहदेदार का ही ओहदा दे दिया जाए …. जिसके हाथ में की सारी की सारी पावर हो ..कुछ भी कर गुजरने की … तो आप क्या करते …. चलिए इसको थोड़ा आसान ही कर देता हूँ … आप अगर ससुर या बाप की जगह पे हो तो ..तब आप क्या करते ? गुस्ताखी माफ ….

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2010

    प्रिय राजकमल जी, आपका प्रश्न दिलचस्प है और उत्तर बहुत ही सीधा मैं अपने नाम ‘चातक’ के अनुकूल ही निर्णय करूंगा | चलिए उत्तर समझने के लिए इसे थोडा आसान कर देता हूँ- लंघन (उपवास) करै तो सौ करै, भोजन करै तो मॉस ; कहै सिंह- “सुन सिंहनी! कहूँ नाहर खावै घास?” इतनी अच्छी और मन मस्तिष्क का मंथन करा देने वाली प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया!

Soni garg के द्वारा
October 2, 2010

ओस की एक बूंद सी होती है बेटियां स्पर्श खुरदरा हो तो रोटी है बेटियाँ रोशन करेगा बेटा एक कुल को तो दो दो कुलो की लाज होती है बेटियाँ संसार ने ये कैसी रीत बनायीं अपनी होते हुए भी परायी होती है बेटियाँ कही पढ़ी थी ये लाइने आज फिर से याद आ गयी ! बहुत ही खूबसूरती से आपने एक बेटी के पूरे जीवन का वर्णन कर दिया ! वास्तव में यही है आज बेटी की व्यथा !

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2010

    सोनी जी, काव्यात्मक प्रतिक्रिया के साथ रचना की सराहना करने का बहुत बहुत शुक्रिया! आपकी प्रतिक्रिया कुछ और बेहतर करने का मार्ग प्रशस्त करती हैं |

y.dubey के द्वारा
October 2, 2010

प्रिय चातक जी, मर्यादाहीन जगत में वो, मर्यादा भेंट बनी देखो | मर्यादाहीन जगत में वो, मर्यादा भेंट बनी देखो सचमुच मर्यादाहीन जगत की मर्यादा है स्त्री, जब तक जगत में मर्यादा थी तब तक हमने स्त्री को पूज्य माना,निःसंदेह रावण तब भी थे लेकिन स्त्री की मर्यादा से खेलने का उन्हें दंड भी मिला ,आज जबकि सभी रावण है तो स्त्री को खुद अपने लिए लड़ना होगा,और वे खाफी हद तक सफल भी हुई है. चातक जी आपसे शलाका कभी पछपात न करे वाग्देवी से मेरी भी यही प्रार्थना है,आपने अपनी रचना से न्याय किया है जिसके लिए मेरी तरफ से हार्दिक बधाई.

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2010

    स्नेही दूबे जी, आपकी प्रतिक्रिया सदैव ही आत्मबल एवं मार्गदर्शन देती है मेरे लिए माँ शारदा से प्रार्थना करने का तहे दिल से शुक्रिया!

bharatbhushan के द्वारा
October 2, 2010

ब्लॉग पर सार्थक लेखन के आप मसीहा हैं, पढक़र अच्छा लगता है। बधाई

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2010

    प्रिय भारत जी, आपकी टिप्पड़ी सादर माँ वाग्देवी को समर्पित करता हूँ की उन्होंने मुझे एक ऐसी रचना का निमित्त बनाया जिसके लिए आपका इतना स्नेह मुझे मिला| प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया!

Tufail A. Siddequi के द्वारा
October 2, 2010

चातक जी अभिवादन, “मौन रही कुछ भी ना बोली, कितनी हसरत टूट गई ; अपने ही कुनबे की खातिर, वो अपनों से छूट गई |” वैसे तो मुझे कविता की अधिक समझ नहीं है, लेकिन इस कविता में जो दर्द आपने दिखाया है, कुछ-२ समझ रहा हूँ. बधाई.

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2010

    प्रिय सिद्दीकी जी अभिवादन, कविता का मूल भाव तो बिटिया का दर्द ही है जो आप बखूबी समझते हैं शब्द और व्यंजन बहुत ज्यादा मायने नहीं रखती| प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया!

kmmishra के द्वारा
October 2, 2010

प्रिय चातक जी आपकी यह कविता पढ़ कर किसी के भी मन में यह संशय न होगा कि आपकी कलम में मां सरस्वती का वास है । स्त्री के त्याग और पीड़ा को इससे बेहतर स्वर किसी और ने न दिया होगा । मां सरस्वती से प्रार्थना है कि आपकी कलम पर उनका अशीर्वाद यूं ही सदा बना रहे । बहुत बहुत आभार ।

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2010

    प्रिय मिश्र जी, आपकी उत्साहवर्धक टिप्पड़ी और माँ शारदा से मेरे लिए प्रार्थना करने का तहे दिल से शुक्रिया!

div81 के द्वारा
October 2, 2010

उसने कभी ना प्रश्न किया कि- वस्तु बन गई मैं कैसे ? मुझको क्यूँकर दान किया, मूरत बेजान सी हो जैसे ? बहुत खुबसूरत रचना आप का तहे दिल से शुक्रिया

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2010

    div81 जी, रचना आपको पसंद आई और आपने इसे प्रतिक्रिया के काबिल समझा इसके लिए आपका बहुत बहुत शुक्रिया!

abodhbaalak के द्वारा
October 2, 2010

चातक जी, आपका एक और नाम होना चाहिए ” कलम का जादूगर” आपने जो लिखा है वो ऐसा ही है जिसे बार बार पढ़ा जाये और उसके मर्म को समझा जाए, कहने को समय बदल रहा है, और हम विकसित हो रहे हैं, पर ये विकास मूलतः केवल कागज़ के पन्ने पर या महानगरों तक ही सिमटा हुआ है. ऐसी कृति के लिए, कोटि कोटि बधाई http://abodhbaalak.jagranjunction.com

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2010

    प्रिय अबोध जी, आपने जो इतना बड़ा सम्मान मुझे दिया है उसे सधन्यवाद मैं वाग्देवी के चरणों में अर्पित करता हूँ (तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा), वही मेरे मन में विचारों को प्रवाहित करती है, वही कलम पकडाती है, और वही इसे कागज़ पर चालने की प्रेरणा देती है मै निमित्त मात्र हूँ | कविता को सराहने के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया!

आर.एन. शाही के द्वारा
October 2, 2010

चातक जी बधाई । सचमुच भारतीय परम्पराएं ये मानने को तो बाध्य करती ही हैं कि विधाता ने कहीं न कहीं बेटी के साथ पक्षपातपूर्ण विधान तो किया ही है । एक तरफ़ नारी का पुरुष की अपेक्षा अधिक कोमल हृदय, ऊपर से एकाएक कुनबा बदलने का विछोह सहने की बाध्यता , बिल्कुल विधाता का अन्याय ही तो है ये । जब बेटा उच्च शिक्षा अथवा नौकरी-चाकरी के लिये पहली बार माँ-बाप को छोड़कर दूर जाता है, तो सिर्फ़ एक दूरी बनती है, कोई स्थाई विछोह नहीं होता, फ़िर भी कितना कारुणिक दृश्य बन जाता है । बेटी तो हमेशा-हमेशा के लिये अलग होती है । इस दर्द का एहसास सिर्फ़ बेटी ही कर सकती है, या विदा करने वाले माता-पिता । मैंने अपनी दो बेटियों को अलग किया, और इस दर्द को समझ सकता हूं । रही उसकी सामाजिक स्थिति की बात, तो उस मामले में भी समाज और समाजपिता, दोनों के विधान क्रूर ही रहे हैं । साधुवाद ।

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2010

    आदरणीय शाही जी, विधर्मी होने के नाते उस परमपिता से लड़ना मेरा कर्त्तव्य भी है और दिली तमन्ना भी लेकिन उससे मेरी शिकायतों का मतलब ये नहीं हैं कि मैं नास्तिक हूँ और इस कविता में मैंने बेटी के मन की व्यथा जरूर कही है लेकिन मैं हर जगह उससे सहमत भी नहीं हूँ | ईस्वरीय विधान पर और माता पिता से शिकायत पर बेटियों के सवाल को मैं कुछ उसी भाव में देखना पसंद करूंगा जिस भाव में मैं स्वयं अपने माता पिता और ईश्वर (जिससे मेरी कभी नहीं बनती) को देखता हूँ- या रब हुजूम-ए-गम को दे कुछ और बुसअतें, दामन तो क्या अभी मेरी आँखें भी नाम नहीं; शिकवा तो बस इक छेड़ है लेकिन हकीकतन, तेरा सितम भी तेरी इनायत से कम नहीं | प्रतिक्रिया द्वारा कविता को एक नया आयाम देने का तहे दिल से शुक्रिया!

nishamittal के द्वारा
October 2, 2010

चातक जी,आपकी लेखनी कमाल है, इतना सुन्दर चित्रण!बचपन से ही क्या बल्कि,यूँ कहूँ घुट्टी में संस्कार पिला देते हैं हम उसको और वो…………….

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2010

    निशा जी, बात आपने अधूरी जरूर छोड़ दी लेकिन किसी अलंकार की भांति ये अपने पूरे भाव को स्पष्ट जरूर कर रही है | रचना आपको पसंद आई और इसे आपने अपनी प्रतिक्रिया से नवाज़ा इसके लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद!

Aakash Tiwaari के द्वारा
October 2, 2010

चातक जी शायद आज मै आपकी लिखी लाइनों की प्रशंशा नहीं कर पाऊंगा क्योंकि आज मुझे शब्द नहीं मिल रहे…..अंग्रेजी में शायद कहें तो ग्रेट………… चातक जी बहुत साल पहले हमारे शहर में एक दसवीं के विद्यार्थी ने एक लड़की के लिए आत्महत्या कर लिया था तब मैंने एक बहुत मार्मिक रचना लिखी थी मगर अफ़सोस वो मिल नहीं पा रही….मुझे आज मेरी उस कविता की याद आ गयी…… आकाश तिवारी

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2010

    प्रिय आकाश जी, आपने कविता को इतनी इज्ज़त बख्शी मेरा लिखना मानो सफल हो गया | अच्छी प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया!

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
October 2, 2010

आदरणीय चातक जी ! अति उत्तम उदगार, आपकी रचना पढ़कर मन खुश हो गया बधाई …. इसी सन्दर्भ में मेरी कुछ पक्तियां ……. माता बाबा के घर से जब, लाडली विदाई लेती है | ममता के नीरव गृह में, बस आह सुनाई देती है || थे नैन स्नेह से छलक उठे, बापू बच्चे से सिसक पड़े | रोते रोते आशीष दिया, कमला विद्या से भुवन भरे || वो डरते हैं की कठिन निशा, बावले पतंगे का सुख हो | जिस रस्ते पर आकर्षण है, वो रास्ता कहीं अधूरा हो || ऐसा नहीं मातु बाबा, बेटी की सुख से आहात हैं | निर्वासन जग की रीति जहाँ, वो स्नेह छावं की राहत हैं || आपकी रचना अद्भुत है बधाई स्वीकार करें …

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2010

    प्रिय शैलेश जी, माता पिता द्वारा दिए गए जवाब की इतनी अच्छी अभिव्यक्ति देख कर बड़ी ख़ुशी हुई| आपकी काव्यात्मक प्रतिक्रिया का बहुत बहुत शुक्रिया |

Ramesh bajpai के द्वारा
October 2, 2010

उसकी दोहरी नीति पर अब, शंका ‘चातक’ को होती है ; राधा ही हर युग में आखिर, क्यूँ अंगारों पर सोती है ? प्रिय चातक जी इस बिडम्बना का भी अंत होगा जबाब भी मिलेगा . हा कुछ देर हो सकती है

    chaatak के द्वारा
    October 8, 2010

    आदरणीय बाजपेयी जी, हमारी तो यही दुआ है की इस विडम्बना का अंत अवश्य हो परन्तु ऐसा सोचना सिर्फ अपने आपको भ्रमित करने से ज्यादा कुछ भी नहीं क्योंकि ये संसार देवदूतों से नहीं बल्कि ऐसे लोगों से भरा है जो मुश्किल से ही इंसान कहे जा सकते हैं| टिप्पड़ी का तहे दिल से शुक्रिया!

roshni के द्वारा
October 1, 2010

चातक जी बेटी के इन सब प्रश्नों का उत्तर तो शयद विधाता भी न दे सकता … क्युकी वोह भी बेटी से आंखे चुराता होगा की क्यों ऐसा भाग्य लिखा मैंने इसका और आज खुद ही बेबस हो गया हूँ … अपनों के होते हुए भी बस परायी है वोह …जहाँ बचपन में खेलती है उनके लिए भी और जहाँ बिहा कर जाती है उनके लिए भी दुसरे घर के बेटी…… कुछ नहीं है इसका……. देना ही नियति है….. चाहे कितना भी ऊँचा उड़ ले चाहे कितनी ही आधुनिक हो जाये…… मगर बेटी की नियति अभी तक नहीं बदली .. अच्छी रचना पर बधाई

    chaatak के द्वारा
    October 1, 2010

    रौशनी जी, आपकी स्पष्ट और व्याख्यित प्रतिक्रिया मेरी रचना को निश्चित ही नए आयाम प्रदान करेगी यहाँ बिटिया का प्रश्न माता-पिता और परमपिता दोनों से है, चातक और पाठक दोनों से है | जवाब तो देना ही होगा | आपने प्रश्न पक्ष का पक्ष लिया और प्रश्न इतनी खूबसूरती से रखा इसके लिए आपको बधाई और कविता पर टिप्पड़ी का तहे दिल से शुक्रिया!

Dharmesh Tiwari के द्वारा
October 1, 2010

नमस्कार चातक जी………मौन रही कुछ भी ना बोली, कितनी हसरत टूट गई ; अपने ही कुनबे की खातिर, वो अपनों से छूट गई……..जीवन की सच्चाई का मार्मिक चित्रण कराती ये कविता,एक सुन्दर कविता सबके बिच रखने के लिए धन्यवाद

    chaatak के द्वारा
    October 1, 2010

    नमस्कार धर्मेश जी, कविता पर आपकी राय जानकार बड़ा हर्ष हुआ आशा है आगे भी आपकी प्रतिक्रियाएं और मार्गदर्शन मिलते रहेंगे| उत्साहवर्धक टिप्पड़ी का बहुत बहुत शुक्रिया!

NIKHIL PANDEY के द्वारा
October 1, 2010

मर्यादाहीन जगत में वो, मर्यादा भेंट बनी देखो | प्रिय चातक जी नमश्कार …………. क्या पंक्तिया है आपकी इस कविता की .. हर पंक्ति सत्य को प्रकट करती है ..भावना प्रधान कविता … कितनी है मासूम वो देखो, कितनी भोली – भाली है ; किसी का दिल ना दुखने पाए, सबकी बला उतारी है | यह वास्तविकता है … नारी जीवन की .. आपकी कविता ने उसकी स्थिति और भावो को सुन्दरता से पिरोया है..

    chaatak के द्वारा
    October 1, 2010

    स्नेही निखिल जी, पंक्तियों की सराहना करने का तहे दिल से शुक्रिया!

Piyush Pant, Haldwani के द्वारा
October 1, 2010

उसकी दोहरी नीति पर अब, शंका ‘चातक’ को होती है ; राधा ही हर युग में आखिर, क्यूँ अंगारों पर सोती है ? एक बेहद मार्मिक सम्बन्ध पर बेहतरीन रचना के लिए हार्दिक बधाई चातक जी…………..

    chaatak के द्वारा
    October 1, 2010

    प्रिय पीयुष जी, कविता को पसंद करने और अच्छी प्रतिक्रिया देने का बहुत बहुत शुक्रिया!


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