चातक

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प्रेयसी

Posted On: 6 Sep, 2010 Others में

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गिरिवर से निकल, वो चंचल मन,
नर्तन करती, मदमाती है;
छम-छम करती पायलिया जब,
घुँघरू के गीत सुनाती है;
वो जानी ना पहचानी है,
अनजानी है पर लगता है;
उसकी चंचलता सदियों से,
मेरे मन को उकसाती है |

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50 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

kirti के द्वारा
October 19, 2010

छम छम करती पायलिया जब ,घुगरू से गीत सुनती है ,..उसकी चंचलता सदिओं से , मेरे मन को उसकती है ………बहुत सुन्दर चातक जी ….बधाई

    chaatak के द्वारा
    October 19, 2010

    कीर्ति जी, प्रेयसी पर आपकी टिप्पड़ी पढ़कर बेहद ख़ुशी हुई| उत्साहवर्धन का तहे दिल से शुक्रिया!

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
September 19, 2010

सुन्दर रचना बधाई ……. दो शब्द मेरी ओर से …. जिसकी धारा निर्बाध गति से, तन पावन कराती थी | बंधन में आज वही धारा, निः शब्द सिसकियाँ लेती है || जिसके अंचल में जाकर के, तुष्टि से मन भर जाता है | बस वही आज क्यों पगली सी, अर्थी से अर्थी ढोती है ||

    chaatak के द्वारा
    September 19, 2010

    क्या बात है शैलेश जी, आपकी बात सचमुच दिल को तुरंत स्पर्श कर देती है| आप मुझे पूर्वाग्रह रहित व्यक्तित्व और विनम्र भावो के लिए अनुज सामान प्रिय है| आशा है आपका साथ ऐसे ही मिलता रहेगा| अच्छी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद!

    kirti के द्वारा
    October 19, 2010

    शैलेश जी ,बंधन में आज वही धारा, निः शब्द सिसकियाँ लेती है …….जिसके अंचल में जाकर के, तुष्टि से मन भर जाता है ….बस वही आज क्यों पगली सी, अर्थी से अर्थी ढोती है |अति सुन्दर…. बधाई ….

jai... के द्वारा
September 17, 2010

बहुत सुन्दर ………………….

    chaatak के द्वारा
    September 17, 2010

    Jai ji, Thanks a lot!

Pooja के द्वारा
September 16, 2010

बहोत बढिया… कम शब्दों मॆ इतनी सारी भावनाएं

    chaatak के द्वारा
    September 16, 2010

    पूजा जी, रचना को पसंद करने और उत्साहवर्धन करने का शुक्रिया!

manoj5485 के द्वारा
September 14, 2010

quite intresting

    chaatak के द्वारा
    September 14, 2010

    Dear Manoj ji, Thanks for encouragement and comments!

anil verma के द्वारा
September 12, 2010

आप ने बहुत सुन्दर रचना प्रस्तुत की है आप की रचना पढ़ कर मन प्रेम रस में खो जाता है |

    chaatak के द्वारा
    September 12, 2010

    प्रिय अनिल जी, यह प्रेम रस आप लोगों के स्नेह से ही उत्पन्न होता है| रचना की सराहना का तहे दिल से शुक्रिया!

deepika के द्वारा
September 11, 2010

अच्छी रचना !

    chaatak के द्वारा
    September 11, 2010

    दीपिका जी, आपको मेरी रचना पसंद आई और इसे आपने प्रतिक्रिया के काबिल समझा बहुत बहुत शुक्रिया!

bhagwanbabu के द्वारा
September 8, 2010
    chaatak के द्वारा
    September 9, 2010

    स्नेही भगवन बाबू हौसलाफजाई का शुक्रिया!

kmmishra के द्वारा
September 8, 2010

सदियों पुरानी उसकी पवित्रता को आज हमने गंदा कर दिया है । अब वह चंचल नहीं रही क्योंकि हमने उन्हें ऊंची ऊंची दीवारों में कैद कर लिया है ।

    chaatak के द्वारा
    September 9, 2010

    प्रिय मिश्र जी, बिलकुल सही बात कही आपने | हमने अपनी खूबसूरत प्रकृति को बहुत ही गन्दा कर दिया है | प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

swatantranitin के द्वारा
September 7, 2010

सुन्दर वर्णन चातक जी | बधाई हो |

    chaatak के द्वारा
    September 7, 2010

    नितिन जी, आपको वर्णन अच्छा लगा ये जानकार अत्यंत प्रसन्नता हुई| प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

sumityadav के द्वारा
September 7, 2010

बहुत ही खूबसूरत कविता। प्रेयसी का बहुत ही सुन्दर वर्णन। सुन्दर शब्दों ने उस अहसास को और मधुर कर दिया जो प्रेयसी की याद दिलाती हैं। बहुत खूब चातकजी।

    chaatak के द्वारा
    September 7, 2010

    सुमित जी, आपको मेरा प्रयास पसंद आया और आपने इतनी अच्छी प्रतिक्रिया दी इसके लिए बहुत बहुत शुक्रिया!

SHIV के द्वारा
September 7, 2010

क्या खूब लिखा है ! आपने तो अपनी कल्पना को भी सदियों पुरानी बना दिया | वाह! वाह ! कमाल कर दिया ! वो जानी ना पहचानी है, अनजानी है अनजानी भी कितनी पहचानी हो सकती है— सदियों से आपको गुदगुदाती है फिर भी अनजानी है| लाजवाब!

    chaatak के द्वारा
    September 7, 2010

    प्रिय शिव जी, पंक्तियों को इतनी गहराई से समझ कर प्रतिक्रिया दी है आपने कि कुछ और लिखने की इच्छा जाग्रत हो गई| लगता है ये अभी कल की ही बात है हलाकि ये बाद ज्यादा तो नहीं लेकिन कुछ ४६० करोड़ वर्ष पहले की बात है| उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

roshni के द्वारा
September 6, 2010

चातक जी बहुत ही सुन्दर भाव .. आपकी अनजानी प्रेयसी के लिए… दुआ है की जल्दी ही आपको वह सच मे भी मिल जाये… ताकि वह भी आपकी सुन्दर सुन्दर रचनाये पढकर खुद पर और आप पर गर्व करे… इसी तरह लिखते रहे … शुभकामना सहित

    chaatak के द्वारा
    September 6, 2010

    रौशनी जी, वैसे तो मैं एक काफिर (विधर्मी) हूँ लेकिन जब कोई मेरे लिए ये दुआ करता है तो बरबस ही हृदय से निकलता है – हे ईश्वर ये दुआ क़ुबूल कर ले | आज भी यही कहूँगा ‘मेरी नहीं तो रौशनी जी की दुआ क़ुबूल कर खुदा तेरा हठ भी रह जाएगा और चातक की प्यास भी बुझ जायेगी’ मेरे लिए दुआ करने का तहे दिल से शुक्रिया!

Piyush Pant के द्वारा
September 6, 2010

बहुत सुन्दर चातक जी…….. खुबसूरत पंक्तियाँ अदभुद सौन्दर्य की और संकेत करती हुई ………..

    chaatak के द्वारा
    September 6, 2010

    प्रिय पीयूष जी, मैं जब भी अपनी प्रेयसी के सौन्दर्य को देखता हूँ तो बस देखता ही रह जाता हूँ जो दैवीय अनुभूति मुझे होती है उसका एक अंश भी पंक्तियों में लिखना संभव नहीं| मेरी प्रेयसी के लिए मेरे इस सौन्दर्य बोध को समझने का शुक्रिया!

Soni garg के द्वारा
September 6, 2010

बहुत ही खुबसूरत वर्णन किया है आपने प्रेयसी का ………..

    chaatak के द्वारा
    September 6, 2010

    सोनी जी, मेरी प्रेयसी है ही इंतनी खूबसूरत कि कल्पनाएँ और बयान करने की पूरी क्षमता का प्रयोग करने के बाद भी लगता है अंश मात्र ही लिख पाया| मेरी प्रेयसी की प्रशंसा करने का बहुत बहुत शुक्रिया!

Arvind Pareek के द्वारा
September 6, 2010

प्रिय श्री चातक जी, कविता प्रेयसी का बखुबी वर्णन करती है । उसमें नदी की चंचलता व सौम्‍यता के दर्शन कराती है । लेकिन एक अतृप्ति का अहसास भी कराती है । अरविन्‍द पारीक

    chaatak के द्वारा
    September 6, 2010

    स्नेही श्री अरविन्द जी, कवि ह्रदय की अतृप्ति को समझने का तहे दिल से शुक्रिया! कविता के मर्म को समझने की आपकी क्षमता के तो कायल हैं हम|

Aakash Tiwaari के द्वारा
September 6, 2010

आपकी इस कविता को पढ़कर मेरा भी मन एक ऐसी कविता लिखने को कर रहा है जो प्रेम पर आधारित हो न की बेवफाई पर क्योंकि मैंने हमेशा दर्द भरी कविता लिखी है.. अच्छी रचना पर ढेर साड़ी बधाई चातक जी .. आकाश तिवारी

    chaatak के द्वारा
    September 6, 2010

    प्रिय आकाश जी, मेरी पंक्तिया आपको अगर रचनात्मक प्रेरणा दे सकीं तो मेरे लिए इससे ज्यादा ख़ुशी की और क्या बात होगी? अच्छी प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

आर.एन. शाही के द्वारा
September 6, 2010

यह प्रेयसी कोई सरिता तो नहीं चातक जी? क्योंकि गिरिवर से और कौन निकलता है भला! लेकिन खैर कवि हृदय की बातें कवि ही बेहतर समझ सकते हैं । हम तो सिर्फ़ इतना ही कहेंगे कि प्रेयसी आपकी, और गुदगुदाया हमें । छोटी लेकिन मनभावन रचना, बधाई ।

    chaatak के द्वारा
    September 6, 2010

    शाही जी, प्रकृति को छोड़कर और कौन सी चीज़ भला एक कवी ह्रदय को खूबसूरत लग सकती है? प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
September 6, 2010

वाह चातक जी वाह, वो जानी ना पहचानी है, अनजानी है पर लगता है; उसकी चंचलता सदियों से, मेरे मन को उकसाती है | कितनी सुंदर पंक्तियां हैं । बहुत अच्‍छा लगा । दीपक जोशी

    chaatak के द्वारा
    September 6, 2010

    स्नेही दीपक जी, पंक्तियों की प्रशंसा करने का तहे दिल से शुक्रिया!

manishgumedil के द्वारा
September 6, 2010

मेरा दिल कहता है- वो इन्सां है परी या कोई जादूगर, मन-मोहिनी है या कोई पेशेवर, कुछ भी हो, लिखने को जब बैठता हूँ हर घडी हर छन मन-मस्तिक पे छा जाती है… बहुत ही खूबसूरत प्रस्तुति पर दो पंक्तियाँ—- स्वीकार कीजियेगा……

    chaatak के द्वारा
    September 6, 2010

    प्रिय मनीष जी, एक बार फिर इतनी छंदबद्ध प्रशंसा पाकर दिल बाग़ बाग़ हो गया| प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

R K KHURANA के द्वारा
September 6, 2010

प्रिय चातक जी, सुंदर कविता ! लेकिन जब मज़ा आने लगा तो समाप्त हो गयी ! आपकी कवितायों की तरह ही सुंदर होगी आपकी प्रेयसी ! खुराना

    chaatak के द्वारा
    September 6, 2010

    आदरणीय खुराना जी, आपकी अनुभवी नज़रों ने सबकुछ देख लिया| प्रेयसी तो होती ही है अति सुन्दर ! किसी भी प्रेमी से पूछ लें मैंने तो बस थोड़े से भाव कागज़ पर उतारे हैं बस! प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

Ramesh bajpai के द्वारा
September 6, 2010

अनजानी है पर लगता है; उसकी चंचलता सदियों से, मेरे मन को उकसाती है | चातक जी बहुत खूबसूरत , सुन्दररचना , मन की अथाह गहरी संवेदनाओ से झर कर बहे भाव . और इन मदमाती तरंगो में अठिलाता स्वयं मै

    chaatak के द्वारा
    September 6, 2010

    स्नेही बाजपेयी जी, पंक्तियों को पसंद करने का और संवेदनाओं को समझने का बहुत बहुत शुक्रिया!

    kirti के द्वारा
    October 19, 2010

    बहुत सुन्दर बहुत बधाई

rita singh \'sarjan\' के द्वारा
September 6, 2010

चातक जी , सुन्दर अभिव्यक्ति …….., बधाई l

    chaatak के द्वारा
    September 6, 2010

    रीता जी, हौसलाअफजाई का तहे दिल से शुक्रिया!

vijendrasingh के द्वारा
September 6, 2010

बहुत सुन्दर पंक्तियाँ ………लगता है सीधे आपके दिल से निकली है?

    chaatak के द्वारा
    September 6, 2010

    स्नेही विजेंद्र जी, अगत पंक्तिया दिल को छू सकीं तो समझिये दिल से ही निकली हैं| प्रतिक्रिया का शुक्रिया!


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