चातक

आओ खोजें हिंदुस्तान

123 Posts

4032 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1755 postid : 170

सजदा

Posted On: 27 Aug, 2010 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

हम तो सजदे में सर को झुकाते रहे,
वो खुदा बस हमें आजमाता रहा;
हाथ रखा न सर पे कभी भूल कर,
अहमियत सिर्फ अपनी बताता रहा |
सब्र मेरा न टूटा ये बात और थी,
वो मेरे दिल के टुकड़े बनाता रहा;
दिल में तस्वीर जिसकी छिपाए फिरे,
दिल के छालों को वो ही दुखाता रहा |
जो खुदा है मेरा, नाखुदा है मेरा,
मेरी कश्ती को वो ही डुबाता रहा;
मेरा रहबर बना और चला दो कदम,
छोड़ कर साथ फिर वो भी जाता रहा |
ना किसी की खता, मैं ही नादान हूँ,
वो तो दस्तूर-ए-दुनिया निभाता रहा;
मैंने कितना कहा- ‘अब संभल, अब संभल’,
दिल है दीवाना उसको बुलाता रहा |

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (16 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

100 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sandeepkaushik के द्वारा
April 21, 2011

हाथ रखा न सर पे कभी भूल कर, अहमियत सिर्फ अपनी बताता रहा | बहुत ही अच्छी लगी आपकी ये रचना | हर लाइन दिल को छूने वाली है | इतनी शानदार रचना के लिए आपको बधाई और यहाँ पोस्ट करने के लिए तह-ए-दिल से आपका शुक्रिया || :)

    chaatak के द्वारा
    April 24, 2011

    स्नेही संदीप जी, सजदा पर आपकी टिप्पड़ी पढ़कर हार्दिक प्रसन्नता हुई| मेरे बेहद करीब इस रचना पर पारखियों की नज़र एक अद्भुत अहसास देती है मानो अनकहे भावो को किसी ने छू लिया हो| प्रतिक्रिया का तहे-दिल से शुक्रिया!

Pooja के द्वारा
September 16, 2010

सब्र मेरा न टूटा ये बात और थी, वो मेरे दिल के टुकड़े बनाता रहा; दिल में तस्वीर जिसकी छिपाए फिरे, दिल के छालों को वो ही दुखाता रहा | अति सुदँर रचना…

    chaatak के द्वारा
    September 16, 2010

    पूजा जी, कविता की पंक्तियों पर आपकी राय जानकर बेहद प्रसन्नता हुई| हौसला-अफजाई करने वाली प्रतिक्रिया का तहे-दिल से शुक्रिया!

shishusharma के द्वारा
September 14, 2010

chatakji,itni reaction,aap really badae kavi ho.

    chaatak के द्वारा
    September 14, 2010

    शिशु जी, मेरा मानना है कि इतनी कमेंट्स मेरे बड़े कवि होने को नहीं बल्कि मुझे मिलने वाले आप लोगों का प्यार और उत्साहवर्धन को दर्शाती है| लेखन वाग्देवी की कृपा है इसलिए गुरुता उसी के चरणों में समर्पित | प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

anil verma के द्वारा
September 12, 2010

आदरणीय चातक जी , अति सुन्दर रचना है | इस रचना के हर लाइन दिल को छू लेने वाली है रचना पढ़ कर अच्छा लगा .

    chaatak के द्वारा
    September 12, 2010

    प्रिय अनिल जी, ये जानकर बहुत अच्छा लगा कि इस कविता की पंक्तियों ने आपके ह्रदय को स्पर्श किया | प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया!

September 11, 2010

हाथ रखा ना सर पर कभी भूलकर, अहमियत सिर्फ अपनी बताता रहा. बहुत बढ़िया प्रयास चातक जी.

    chaatak के द्वारा
    September 12, 2010

    प्रिय दीपक जी, आपको मेरा प्रयास अच्छा लगा ये जानकर बड़ी प्रसन्नता हुई| प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

Dharmesh Tiwari के द्वारा
September 11, 2010

मैंने कितना कहा- ‘अब संभल, अब संभल’, दिल है दीवाना उसको बुलाता रहा | चातक जी जबरदस्त प्रस्तुती धन्यवाद

    chaatak के द्वारा
    September 11, 2010

    धर्मेश जी, हौसला-अफजाई का बहुत बहुत शुक्रिया!

दीपक जोशी DEEPAK JOSHI के द्वारा
September 10, 2010

प्रिय चातक जी, आप की रचना पढ़ी बहुत अच्‍छी लगी। और इस में वो जो चातक का शब्‍दीक अर्थ है का कुछ कुछ बोध होता है। मैने आप की पुरानी पोस्‍ट अभी नहीं पढ़ी है पर इस को पढ़ कर और भी पढ़ने को बाध्‍य हो गया हूं। मै भी अभी नया-नया ही इस परिवार से जुड़ा हूं। दीपक जोशी

    chaatak के द्वारा
    September 10, 2010

    स्नेही जोशी जी, परिवार में आपका स्वागत है| आशा है कि आपको अन्य रचनाओं और लेखों से भी निराशा नहीं होगी| आपकी आलोचनाएँ, समालोचनाएँ व् सुझाव सभी शिरोधार्य होंगे| उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

rameshbajpai के द्वारा
September 10, 2010

चातक जी ब्लागर ऑफ़ द वीक की बहुत बहुत मंगल कामनाये, मुबारक , आपकी कलम नित नया सृजन करे , आपके प्रहार प्रखर हो . लेखनी मुखर हो . बहुत बहुत बधाई

    chaatak के द्वारा
    September 10, 2010

    आदरणीय बाजपेयी जी, ये आपका स्नेह ही है जो इस मंच पर मुझे एक पहचान मिली| आपका प्यार और वाग्देवी की कृपा ऐसे ही बनी रहे मैं लिखता रहूँगा| मगल-कामना का आभार कैसे व्यक्त करूँ! बस भावों को समझ जाइए|

आर.एन. शाही के द्वारा
September 10, 2010

इस उपलब्धि पर बहुत-बहुत बधाइयाँ चातक जी । सही प्रतिभा, सही समय, सही सम्मान । जंकशन को भी इस चुनाव के लिये कोटिश: धन्यवाद ।

    chaatak के द्वारा
    September 10, 2010

    स्नेही शाही जी, आपका उत्साहवर्धन मेरे लिए एक प्रेरणा है आप लोगों का इतना प्यार मिलता है तभी शायद मैं भी कुछ अच्छा कर पाता हूँ| आपके स्नेह का सदा आभारी हूँ |

Prabhakar के द्वारा
September 10, 2010

Congratulations!

    chaatak के द्वारा
    September 10, 2010

    Thanks a lot

roshni के द्वारा
September 9, 2010

चातक जी, ब्लॉगर ऑफ़ दी वीक चुने जाने पर मेरी तरफ से बहुत सारी बधाई …..

    chaatak के द्वारा
    September 10, 2010

    रौशनी जी, वाग्देवी की कृपा और आप लोगों का स्नेह है जिसने मुझे इस प्रतिष्ठित मंच पर स्थान दिया है | आपका तहे दिल से शुक्रिया!

razia mirza के द्वारा
September 9, 2010

हम तो सजदे में सर को झुकाते रहे, वो खुदा बस हमें आजमाता रहा; मान गये वाह!!!!!आपकी इस गजल को ।एक शे’र आपके नाम। “और वो लिखता रहा हम भी पढते रहे। अपने जज़बात हम को सुनाता रहा”।

    chaatak के द्वारा
    September 9, 2010

    रज़िया जी, इतने दिनों बाद आपका कमेन्ट पा कर बड़ी ख़ुशी हुई | आपकी गैरमौजूदगी में एक रिक्त स्थान सा बन जाता है आशा है अब आप नियमित रूप से हमसे रूबरू होती रहेंगी | आपकी दो पंक्तियाँ मेरे लिए किसी अवार्ड सी कम नहीं हैं इतने अच्छे तोहफे के लिए आपको तहे दिल से शुक्रिया!

rkpandey के द्वारा
September 9, 2010

बधाई चातक जी, आप की काबिलियत वाकई प्रशंसनीय है. “सज़दा” मुझे भी बेहद पसन्द आई. धन्यवाद जो आप ऐसी रचना हम सभी को उपलब्ध कराते हैं.

    chaatak के द्वारा
    September 9, 2010

    स्नेही पाण्डेय जी, आपको ‘सजदा’ पसंद आई ये जानकार अत्यंत प्रसन्नता हुई| आशा है आप लोगों का स्नेह इसी तरह मेरे लिए प्रेरणा श्रोत बना रहेगा| प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया!

R K KHURANA के द्वारा
September 9, 2010

प्रिय चातक जी, सप्ताह का ब्लागर बनने पर आपको बहुत बधाई ! राम कृष्ण खुराना

    chaatak के द्वारा
    September 9, 2010

    आदरणीय खुराना जी, ये सब आप वरिष्ठों का आशीर्वाद और वाग्देवी की कृपा है | आशा है स्नेह इसी तरह मिलता रहेगा|

SHIV के द्वारा
September 9, 2010

आपके सजदे का अंदाज़ सच- मुच ही काबिल-ए-तारीफ़ है| आपकी पंक्तिया दिल को छु गयीं| बधाई |

    chaatak के द्वारा
    September 9, 2010

    प्रिय शिव जी, आपको रचना पसंद आई ये जानकार बड़ी ख़ुशी हुई और पंक्तियों ने दिल को छुआ तो समझिये मेरा प्रयास सार्थक हुआ| इतनी अच्छी प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

sushil के द्वारा
September 8, 2010

feeling is very good

    chaatak के द्वारा
    September 9, 2010

    Thanks for the encouragement! thanks a lot!

RASHID - Proud to be an INDIAN के द्वारा
September 7, 2010

चातक जी,, शायरी वह फन है जो बहुत कम लोगों को नसीब होता है ,, यह दिल से निकला हुआ जज्बा होता है जो शायद सिर्फ टूटे हुए दिलो से निकलता है,, अल्लाह आप के फन को और निखारे और आप और लिखे !! राशिद http://rashid.jagranjunction.com

    chaatak के द्वारा
    September 7, 2010

    प्रिय रशीद जी, आपने जो बात कही है वो सचमुच दिल को छू गई | आपकी दुआओं की मुझे बहुत जरूरत है इसके लिए आपको शुक्रिया तो नहीं कहूँगा हाँ ये जरूर कहूँगा कि मेरे लिए दुआ जरूर कीजियेगा शायद आपकी ही दुआएं मेरे लिए असर ला सकें| प्रतिक्रिया का धन्यवाद!

sanjukhan के द्वारा
September 7, 2010

chatak sahab adaab bohat achchi peshkash hai magar mere hisabse agar thodi si badalkar dekhe shayad our achchi hojaye ——me to sajde me sarko jhukataraha——-wo khuda bas mujhe aazmata raha ———————- oue aakhri line me ——mene khud se kaha nadan abto samhal——dil he deewana usko bulata raha ———————–dher sari duwaon ke saath ————————————————————————————sanju

    chaatak के द्वारा
    September 7, 2010

    प्रिय संजू जी, आपको पंक्तियाँ पसंद आयीं और आपने इतनी गहराई से रचना को पढ़कर अपने अमूल्य विचार दिया | आशा है आगे भी आपकी टिप्पड़ियां और सुझाव प्राप्त होते रहेंगे | बहुत बहुत शुक्रिया!

sangeet के द्वारा
September 6, 2010

बहूत अच्छा प्रय़ास है . संगीत

    chaatak के द्वारा
    September 6, 2010

    प्रिय संगीत जी, प्रयास की प्रशंसा करने का तहे दिल से शुक्रिया!

Manishgumedil के द्वारा
September 5, 2010

चातक जी, एक और नायाब पेशकस के लिए शुक्रिया……… मेरा दिल कहता है – आपकी प्रस्तुति पर टिपण्णी के लिए असमर्थ हूँ. ….

    chaatak के द्वारा
    September 5, 2010

    प्रिय मनीष जी, पंक्तियों की इतनी उत्साहवर्धक प्रशंसा करने के लिए हार्दिक धन्यवाद! आप बंधुओं का स्नेह ही तो मेरे लेखन को बल प्रदान करती है| आपके दिल की आवाज आपके जज़्बात बताने में सक्षम है | दिल ने कहा और दिल ने समझ लिया शब्दों की आवश्यकता ही न पड़ी|

jaipandit के द्वारा
September 3, 2010

मेरे साथ नहीं चलना था ,तो क्योँ साथ लिये थे , दुनिया-ए-दस्तूर को क्यों निभा रहे थे | इतना दर्द दिल में छुपा था यार , हँसते हुए अरमानो का गला दबा रहे थे चातक मेरे |इतना दर्द तेरे सीने में !बताते तो मे कुछ बाट लेता

    chaatak के द्वारा
    September 3, 2010

    प्रिय जय, दोस्तों का ही तो सहारा होता है जब सहन नहीं होता तब आपसे ही बात करके तो मन को समझाता हूँ | कभी-कभी दर्द ही दवा होता है बस यही मान लो कि मैंने इसे दवा बना रखा है | आपका साथ ख़ुशी देता है, और आपकी प्रतिक्रिया राहत | दर्द बांटने का शुक्रिया!

jai pandit के द्वारा
September 3, 2010

प्रिय मित्र चातक, बहुत बढिया लिखा है |

    chaatak के द्वारा
    September 3, 2010

    प्रिय जय जी, उत्साहवर्धन का तहे दिल से शुक्रिया!

ydubey के द्वारा
September 2, 2010

प्रिय चातक जी, मंच के बाहर उपस्थिति से मेरा अभिप्राय रचनाओ का संकलन कर उन्हें किताब का रूप देने से है,क्योंकि जरूरी नहीं है की सभी लोग इन्टरनेट के माध्यम से ही उम्दा रचनाओ से जुड़ते हो ,हिंदी प्रेमियों का एक बड़ा तबका अब भी इससे दूर है और उनका साहित्य से जुडाव किताबो से ही होता है ,और हरेक रचनाकार का यही एकमात्र लछ्य भी होना चाहिए, मुझे हिंदी को लेकर आप में असीम संभावनाए नज़र आती है ,आप नित नए आयाम छुए इसके लिए मेरी हार्दिक सुभकामनाए .

    chaatak के द्वारा
    September 2, 2010

    स्नेही दूबे जी, मैं भी प्रयासरत हूँ कि कोई प्रकाशक मिले तो इसे उन पाठकों तक भी पहुंचाया जा सके जो इन्टरनेट का इस्तेमाल नहीं करते | वैसे कविताओं का संग्रह मैंने ‘चातक (अश्रुओं की एक आहुति)’ नाम से बना रखा है जिसे शायद जल्द ही प्रकाशक मिल जाए| आपकी प्रतिक्रिया और सुझाव का तहे दिल से शुक्रिया!

ydubey के द्वारा
September 2, 2010

प्रिय चटक जी, मैंने आपकी सभी ३२ पोस्ट पढ़ी है ,मई आश्चर्यचकित हूँ की कोई व्यक्ति इतने कम समय में इतना परिपक्वा कैसे हो सकता है ,मै जहानी तौर पर आपको इस मंच के बहार भी उपस्थिति चाहता हूँ .सजदा एक अप्रतिम रचना है मीर ताकी मीर ने लिखा है- जभी सजदा करते ही करते गयी हक -इ-बन्दिगी हम अदा कर चले परस्तिश किया तक के ए बुत तुझे नज़र में सबोंकी खुदा कर गए

    chaatak के द्वारा
    September 2, 2010

    स्नेही दूबे जी, आपको मेरी रचनाएं पसंद आईं ये जानकार बहुत ख़ुशी हुई | आपकी टिप्पड़ी काफी दिनों के बाद मिली मुझे तो लगा आप मुझे भूल ही गए हैं | मंच के बाहर मेरी कैसी उपस्थिति आप चाहते हैं कृपया स्पष्ट करें | इतनी खूबसूरत पंक्तियों के साथ तारीफ़ करने का शुक्रिया!

Nikhil के द्वारा
September 2, 2010

चातक जी, आपकी तारीफ़ में क्या कहूँ, आपकी हर ग़ज़ल एक मोती की तरह है. आपके मोतियों की माला में एक और मोती जुड़ने पर आपको बधाई. आभार, निखिल झा

    chaatak के द्वारा
    September 2, 2010

    प्रिय निखिल जी, इतने दिनों बाद आपकी प्रतिक्रिया और मंच पर आपकी उपस्थिति दोनों ही मेरे लिए किसी अनुपम उपहार से कम नहीं | रचना की तारीफ़ और इतनी अच्छी प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

Ramesh bajpai के द्वारा
September 1, 2010

chatak ji vijend ji ko comment post karne par har likh kar aatahai “sorry you must be logged in to post a comment ” inki seting me galti hai kya ? 14 bar bheja

    chaatak के द्वारा
    September 1, 2010

    आदरणीय बाजपेयी जी, आप जंक्शन के होम पेज पर Login क्लिक करके पहले अपने अकाउंट में login कर लीजिये फिर कमेन्ट करिए | इससे आपको अपना नाम और ई-मेल भी नहीं लिखना पड़ेगा और कमेन्ट तुरंत एक्सेप्ट भी हो जाएगी|

swatantranitin के द्वारा
August 31, 2010

ना किसी की खता, मैं ही नादान हूँ, वो तो दस्तूर-ए-दुनिया निभाता रहा; मैंने कितना कहा- ‘अब संभल, अब संभल’, दिल है दीवाना उसको बुलाता रहा | चातक जी, जीत लिया लिया आपने दिल को | बधाई हो |

    chaatak के द्वारा
    August 31, 2010

    प्रिय नितिन जी, आपकी प्रतिक्रिया और तारीफ़ पाकर मन हर्षित हो उठा | काफी दिनों के बाद आपकी कमेन्ट के दर्शन हुए | इतने अच्छे कमेन्ट के लिए शुक्रिया!

Abuzar osmani के द्वारा
August 30, 2010

ज़बरदस्त चातक जी …..किसी शायर का शेर अर्ज़ है “वो जो एक उम्र से मसरूफ,इबादात में थे , आँख खोली तो अभी अर्साए ज़ुल्मात में थे, सिर्फ आफ़ात न थीं जाते इलाही का सुबूत, फूल भी दश्त में थे,हश्र भी जज़्बात में थे, न ये तकदीर का लिखा था न मंशाए खुदा, हादसे मुझ पे जो गुज़रे मेरे हालात में थे, मैं ने की हद्दे नज़र पार,तो ये राज़ खुला, आसमान थे तो फ़क़त मेरे ख्यालात में थे. इस सबब से भी तो मैं काबिले नफरत ठहरा, जितने जौहर थे मुहब्बत के,मेरी ज़ात में थे. शुक्रिया

    chaatak के द्वारा
    August 30, 2010

    रहमान जी, इत्ती अच्छी पंक्तियों के साथ टिप्पड़ी करने का शुक्रिया| आशा है मेरी रचनाएं आगे भी आपको पसंद आती रहेंगी|

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
August 29, 2010

आपकी हर रचना अप्रतिम होती है ….. आप के भावों को पिरोने की कोशिश में मेरे दो शब्द …. कैसा रहा सबब मेरे हमराह राहों का, की तूने राह पर चलते हुए मंजिल बदल डाली | बेहतरीन रचना के लिए बधाई …..

    chaatak के द्वारा
    August 29, 2010

    प्रिय शैलेश, आपकी इन दो पंक्तियों के लिए कोटि-कोटि धन्यवाद| आपको रचनाये पसंद आती हैं तो मुझे भी दिल से प्रसन्नता का अनुभव होता है| प्रतिक्रिया का सस्नेह धन्यवाद!

roshni के द्वारा
August 29, 2010

चातक जी एक बार फिर से बहुत ही सुन्दर ग़ज़ल.. दिल को छुने वाली.. एक शेर कहना चाहती हु यहाँ नाखुदा को खुदा माना है तो फिर डूब जाओ खुदा खुदा न करो मोहबात में वफ़ा मिल जाये तो नसीब है अपना.. अगर जफा मिल जाये तो भी गिला न करो …. आभार सहित

    chaatak के द्वारा
    August 29, 2010

    क्या बात है रौशनी जी, मानना पड़ेगा आपके शायराना अंदाज़ को और आपके अंदाज़-ए-बयाँ को| इतनी अच्छी प्रतिक्रिया का तहे-दिल से शुक्रिया क़ुबूल करें|

madhvam pandey के द्वारा
August 29, 2010

wow really nice one .

    chaatak के द्वारा
    August 29, 2010

    Thanks for the praise and comment.

Aakash Tiwaari के द्वारा
August 28, 2010

बहुत अच्छी कविता लिखा है दिल को छु लिया .. आकाश तिवारी

    chaatak के द्वारा
    August 28, 2010

    आकाश जी, प्रतिक्रिया का शुक्रिया! जानकार अच्छा लगा की आपको कविता पसंद आई.

VS के द्वारा
August 28, 2010

चातक जी ,, एक अच्छी कविता लिखी आप ने, मैं आप की लेखनी का कायल हु , परन्तु manoj mayak जी के ज़हरीले लेखो पर आप की टिप्पणियो ने विचलित कर दिया था,, मैंने एक sawal छोड़ा था परन्तु जवाब ना मिला ,, ummed है आप अब जवाब देंगे….. तिप्पिनी थी ——- चातक जी ,, बस एक बात बताइए ,, क्या वजेह है की इसाई और मुस्लमान दोनों धर्म नए होने के बावजूद (२०१० साल और १४०० साल उम्र है इनकी) पूरी दुनिया में फैल गए और आज भी पूरी दुनिया में फैल रहे है (आप यह आरोप नहीं लगा सकते की यह काम तलवार या लालच के बल पर हो रहा है) जबकि हिन्दू धर्म सब से प्राचीन होने के बावजूद दिन बा दिन सिकुड़ता जा रहा है ,, खुद इस धर्म के मानने वाले ही नास्तिक होते जा रहे है ,, इस का कारन है इस में व्याप्त कुरीतिय जैसे भेद भाव , जाती पाती आदि ,, आज भी हरिजन को अपमानित होना पड़ता है ,, लोग उसके हाथ का खाना तक नहीं खाते शायद कुछ दिन पहले आप ने समाचार देखा ही होगा !! दलित महिलाओ का आये दिन समाचार आता है ,, तो क्या यह ज्यादा ज़रूरी नहीं था की हम हिन्दू समाज में सुधार करे ताकि लोग इस तरफ आकर्षित हो ना की किसी धर्म को लेकर बिना सन्दर्भ या आगे पीछे देखते हुए अपमान करे ,, मैंने पूरा मंच छाना परन्तु किसी भी मुस्लिम या इसाई द्वारा हिन्दू धर्म को अपमानित करने वाला लेख नहीं पाया,, क्या हमारे इतिहास या धर्म ग्रन्थ में कोई ऐसे घटनाएं नहीं है परन्तु एक सभ्य समाज को यह शोभा नहीं देता है की ऐसे लेख लिखे जिससे नफरत पैदा हो ,, यदि आप के मित्र कोई मुस्लिम बंधू हो तो मुझे बताये की नाम और पूजा पद्दति के अलावा आप उनमे क्या अंतर पाते है स्वयं से ,, वह भी जीवन यापन के लिए संघर्ष कर रहे है ,, बेरोज़गारी से . भ्रष्टाचार से त्रस्त है ,, साधारण व्यक्ति सब सामान ही है ,, दंगे आदि में तो मुस्लिम के साथ साथ हिन्दू में हैवान बन जाते है फिर एक तरफ़ा बात क्यों, आप ने शायद मेरठ का हाशिमपुरा काण्ड सुना होगा जब ४० मुस्लिम नवजवानों को पुलिस ने गोली मार कर नदी में फेक दिया था ( आप इन्टरनेट पर सर्च कर सकते है ), या अभी हाल में एक हिन्दू लड़के को उत्तराखंड में पुलिस ने फर्जी मुत्भेद में मार दिया था, सोब्रबुद्दीन से साथ साथ तुलसी प्रजापति भी फर्जी मुत्भेद में मारा गया क्या कभी उसके परिवार के बारे में सोचा गया ,, कहने का मतलब यह है की मुस्लमान भी आम भारतीयों की तरह है और व्यवस्था के शिकार है !! तहेल्का के टेप आप ने देखे होंगे ,, बंगलोरे के विडियो देखे होंगे क्या यही हिंदुत्व है क्या यह ही हिंदुत्व के असली पैरोकार है,, क्या इस से हिन्दू धर्म की छवि खराब नहीं होती है ,, एक सच्चा हिन्दू होने के नाते हमारा फ़र्ज़ है की हम देखे की हमारी छवि दुनिया में क्या बन रही है ,, मैंने तो विभाजन को देखा है और उम्र के आखरी पड़ाव पर हु परन्तु मेरा अनुभव यही है नफरत से नफरत बढती है ,, आप किसी को एक गाली दीजिये गा वह पलट के दो देगा फिर आप चार वह छे यह सिलसिला कभी ख़त्म नहीं होगा ,, इस से अच्छा है की खामोशी से खुद को अपने धर्म को और समाज को मज़बूत किया जाए !! यदि आप लोगो को कोई बात बुरी लगी हो तो बूढ़ा समझ कर माफ़ कर देना ,, परन्तु मेरी बात पर एक बार गौर ज़रूर करना विजय शंकर श्रीवास्तव के द्वारा: VS

    chaatak के द्वारा
    August 28, 2010

    सुधी वी० एस० जी, आपकी कमेंट्स के लिए और कविता पसंद करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया! अगर आपको किसी बिंदु विशेष पर किसी तरह के जवाब या तर्क की आवश्यकता है तो कृपया उसके लिए एक ब्लॉग लिख कर जागरण मंच पर डाल दे सभी दिलचस्पी लेने वाले लोगों की राय आपतक पहुँच जायेगी| अगर आप मेरी व्यक्तिगत राय चाहते हैं तो कृपया मेरी मेल id पर अपनी शंकाएं भेज दें आप को जवाब जरूर मिल जाएगा क्योंकि मैं किसी भी प्रश्न को अपनी सामर्थ्य भर अनुत्तरित नहीं छोड़ता| अगर आप एक बुजुर्ग व्यक्ति हैं तो आपसे एक पूर्वाग्रह रहित चिंतन की अपेक्षा है अगर आपने विभाजन अपनी आँखों से देखा है तो मेरे पास भी आपके लिए बहुत से प्रश्न हैं क्योंकि मैं विभाजन के समय आपकी सोच और प्रतिक्रियों के बारे में जानना चाहूंगा- मेरी id है- krishnotcrisp@gmail.com

    Piyush Pant के द्वारा
    August 28, 2010

    चातक जी, उत्कृष्ट लेखन का नमूना है आपकी ये कविता ………. एक कवी ह्रदय व्यक्ति में उग्रता शोभा नहीं देती………… आपकी लेखनी जगाने का काम करते अच्छी चलती है………. उसे इसी काम में लगाये रखें ………. जैसा VS जी ने लिखा है….. शिकायत मेरे भी वही है…………. आखिर कैसे धर्म के विषय पर आप जब टिपण्णी करते है…….. आप उग्र हो जाते हैं………… फिलहाल इस उम्दा कविता के लिए आप निसंदेह प्रसंशा के पत्र हैं………….. बाकि अधिक लिखने के लिए क्षमा प्रार्थी हु…………..

    chaatak के द्वारा
    August 28, 2010

    पीयूष जी, आपकी टिप्पड़ी और राय दोनों का स्वागत है | कविता की प्रशंसा का धन्यवाद और कवि की व्याख्या पर मैं एक बार फिर आपको थोड़े और अध्ययन और चिंतन की सलाह दूंगा | कवि निरीह या अत्यंत शांत प्राणी होता है ऐसा लोगों को अक्सर भ्रम हो जाता है | चंदबरदाई, निराला, सुभद्राकुमारी चौहान और कैप्टन राम सिंह इत्यादि को पढना आपके भ्रम को दूर करने में सहायक होगा | शुभम-मंगलम|

    vijendrasingh के द्वारा
    August 30, 2010

    श्री वी एस जी मोहब्बत और नफरत किसी को तोहफे में नहीं दी जा सकती क्यूंकि सबका अपना अपना नजरिया होता है अब आपको ही लीजिये नकारात्मक नजरिये से आपने चातक जी के कमेन्ट पढ़े तो आपको सिर्फ नफरत फ़ैलाने वाले नजर आयेंगे , आपकी एक बात से जरूर सहमत हुआ जा सकता है की जात पात का अंतर मिटाए बिना हिन्दू एक नहीं हो सकता तो ठीक है एक ना एक दिन वो क्रांति भी हो कर रहेगी जब जात पात का अंतर समाप्त हो जायेगा ……..

tanaya के द्वारा
August 28, 2010

हम तो सजदे में सर को झुकाते रहे, वो खुदा बस हमें आजमाता रहा; हाथ रखा न सर पे कभी भूल कर, अहमियत सिर्फ अपनी बताता रहा | खूबसूरत पंक्तियाँ मैंने कितना कहा- ‘अब संभल, अब संभल’, दिल है दीवाना उसको बुलाता रहा | शायद ये ज्यादा और भी ज्यादा नहीं -नहीं पूरी कविता ही अच्छी लग रही है शायद !

    chaatak के द्वारा
    August 28, 2010

    तनया जी, आपकी बहुमूल्य टिप्पड़ी के लिए आपका तहे-दिल से शुक्रिया| आप जब भी तारीफ़ करती हैं तो लगता है मैं थोडा और बेहतर कर सकता हूँ | जब आपने कहा की यही कविता तो मुझे बहुत अच्छी लगी थी तभी मैं जान गया था की इस कविता पर जल्द ही आपकी प्रतिक्रिया प्राप्त होगी|

vijendrasingh के द्वारा
August 28, 2010

चातक जी चार लाइन यद् आई है ” गमी ऐ हसरतें नाकाम से जल जाते है ,,जलती है शमा जिस तरह -हम भी उसी तरह नाकाम से जल जाते हैं जब भी आता है उसका नाम मेरे नाम के साथ , जाने क्यूँ लोग मेरे नाम से जल जाते हैं ” बहुत सुन्दर रचना है आपकी.

    chaatak के द्वारा
    August 28, 2010

    विजेंद्र जी, मेरी पसंदीदा पंक्तियों के साथ आपकी प्रतिक्रिया ने मन मोह लिया| तारीफ़ करने का बहुत-बहुत शुक्रिया!

    Ramesh bajpai के द्वारा
    August 28, 2010

    चातक जी मै विजेंद्र जी को ११ बार कमेन्ट पोस्ट कर चुका हु लकिन हर बार एरर लिख कर आता है इनके राखी वाले पोस्ट पर भी यही हुवा बाद में भी हलाकि आप लोगो के कमेन्ट बाद में पोस्ट हो गए फ़ोन किया तो उठा नहीं

    chaatak के द्वारा
    August 28, 2010

    आदरणीय बाजपेयी जी, कभी कभी तकनीकी खराबी के कारण ऐसा संभव है जिसमे नेट की कम स्पीड और साईट की क्षमता दोनों ही या कोई एक कारण हो सकता है | आप थोड़ी देर बाद कोशिश करें | कमेन्ट जरूर एक्सेप्ट होगी|

sumityadav के द्वारा
August 28, 2010

वाह चातकजी वाह बहुत ही सुंदर रचना। 

    chaatak के द्वारा
    August 28, 2010

    प्रिय सुमित जी, बहुत दिनों बाद आपकी प्रतिक्रिया पाकर बड़ी ख़ुशी हुई| आप मंच से दूर मत जाया कीजिये हमें अपने परधान-मन्तरी की कमी बहुत अखरती है भाई| प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

    sumityadav के द्वारा
    August 29, 2010

    इस मंच से दूर कौन जाना चाहता है बस व्यस्तता इतनी हो गई थी कि नेट यूज ही नहीं कर पाया। वैसे आपने मुझे प्रधानमंत्री क्यूं कहा। मैं तो पीएम इन वेटिगं हूं प्रधानमंत्री तो आप हैं। बाकी के  मंत्रिमंडल का चयन आप ही कर लें। हो सकें तो हमको भी कोई पद दे दें लेकिन मैं रिश्वत नहीं देने वाला हां समर्थन देते आया हूं वही दे सकता हूं। हा…हा…हा….

    chaatak के द्वारा
    August 29, 2010

    भाई सुमित, आपकी ईमानदारी पर हमें पूरा भरोसा है और जो भी लोग आपकी लिखने से पहले से मुखातिब है सारे आपको आपकी साफगोई के लिए बहुत पसंद करते हैं| आप कुछ दिनों तक ही मंच से दूर रही (हलाकि मैं भी दूर था) लेकिन मंच पर आते ही आपकी गैर मौजूदगी खलने लगी थी| आप होते हैं तो अच्छा लगता है! ढेरों शुभ कामनाएं!

abodh के द्वारा
August 28, 2010

” मैंने कितना कहा- ‘अब संभल, अब संभल’, दिल है दीवाना उसको बुलाता रहा” क्या बात है चातक जी, बहुत ही सुंदर कविता, आप की लेखनी में तो जादू है, ऐसे हो पाठको को अपनी लेखनी से तृप्त करते रहें.

    chaatak के द्वारा
    August 28, 2010

    प्रिय अबोध जी, कविता आपको पसंद आई जानकार अच्छा लगा| अगर लेखनी में जादू है तो मैं इसे वाग्देवी शारदा की कृपा कहूँगा| आशा है देवी की कृपा और आप बंधुओं का प्यार मुझे इसी तरह मिलता रहेगा| प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

syeds के द्वारा
August 28, 2010

मेरी कश्ती को वो ही डुबाता रहा; मेरा रहबर बना और चला दो कदम, छोड़ कर साथ फिर वो भी जाता रहा | ना किसी की खता, मैं ही नादान हूँ, वो तो दस्तूर-ए-दुनिया निभाता रहा; अच्छी कविता,बधाई

    chaatak के द्वारा
    August 28, 2010

    पंक्तियाँ आपको पसंद आईं ये जानकार बड़ा हर्ष हुआ| प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

R K KHURANA के द्वारा
August 28, 2010

प्रिय चातक जी, आपकी रचनायों में दिल को छो लेने की ताकत होती है ! एक कशिश है जो खींचती चली जाती है ! बहत ही सुंदर ! आशीर्वाद ! राम कृष्ण खुराना

    chaatak के द्वारा
    August 28, 2010

    लेखन में ये कशिश और कलम में ये जान आप वरिष्ठों के आशीर्वाद और वाग्देवी की कृपा का परिणाम है| अपना आशीर्वाद और स्नेह ऐसे ही प्रदान करते रहिएगा| अच्छी प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

आर.एन. शाही के द्वारा
August 28, 2010

चातक जी बधाई । दिल से कह रहा हूँ, औपचारिक तारीफ़ मत समझियेगा, उमर खय्याम, गालिब से लेकर आज के खय्याम और मज़रूह तक, किसी से भी कमतर नहीं हैं आपकी नज़्में ।

    chaatak के द्वारा
    August 28, 2010

    आदरणीय साही जी, आपकी टिप्पड़ी मेरे लिए किसी खिताब से कम नहीं| शायद आपको पता नहीं की मैं आप फैन बन चुका हूँ | आपकी कहानी रोहिणी मैं लगातार पढ़ रहा हूँ बस वक्त की कमी के कारण अभी पूरी नहीं पढ़ पाया हूँ उम्मीद है जल्द ही आपके लेखन की गति के साथ कदम ताल करने लगूंगा| इतने बड़े शायरों के साथ आपने मेरा नाम जोड़ा है कि कुछ कहने को न जुबाँ हरकत कर पाती है न ही उँगलियाँ| आपकी टिप्पड़ी मैं उस वाग्देवी शारदा के चरणों में समर्पित करता हूँ जिसने मुझसे वो नज्में लिखवाने की इज्ज़त बख्शी| तारीफ़ का बहुत बहुत शुक्रिया!

kaushalvijai के द्वारा
August 28, 2010

chatak ji, dil to baccha hai ji. isilye dil ko pyar se thapki de aur jor se bolen. ALL ISSSSSSSSS WELLLLLLLL.

    chaatak के द्वारा
    August 28, 2010

    सही कहते हैं कौशल जी, आपके लिए मेरी कविता की कुछ पंक्तियाँ- तेरी सूरत, तेरी सीरत, मैं दिल में जज़्ब कर लाया; मैं मंदिर में नहीं ठहरा, मैं मस्जिद से चला आया| वफ़ा का था यकीन भगवान् एक बुत को बना दूंगा; मैं इस कोशिश में एक मासूम बच्चे को गँवा आया| शायद वो बच्चे जैसा दिल मैंने गवां दिया| टिप्पड़ी का शुक्रिया!

Arvind Pareek के द्वारा
August 28, 2010

प्रिय श्री चातक जी, मैंने कितना कहा- ‘अब संभल, अब संभल’, दिल है दीवाना उसको बुलाता रहा | यदि दिल बुला रहा था तो बुलानें देतें जब वो पास आते तो समझा देतें कि दिल तो नादां हैं कुछ जानता नहीं कौन अच्‍छा कौन बुरा पहचानता नहीं । अरविन्‍द पारीक

    chaatak के द्वारा
    August 28, 2010

    प्रिय अरविन्द जी, आपकी शायराना टिप्पड़ी ने तो हमें लाजवाब कर दिया, बहुत ख़ुशी हुई ये जानकर कि एक बार फिर मेरी कोशिश आपने टिप्पड़ी के लायक समझी| बहुत-बहुत शुक्रिया!

Raj के द्वारा
August 28, 2010

इतनी अच्छी कविता के लिए बधाई चटक जी, एक शायर की दो पंक्तियाँ पेश हैं: कश्तियाँ सबकी किनारे लग ही जाती हैं, नाखुदा जिनका नहीं उनका खुदा होता है. वैसे खुदा से शिकवा करने का ये अंदाज़ हमें बहुत पसंद आया. राज,

    chaatak के द्वारा
    August 28, 2010

    राज जी, आपकी प्रशंसा मिली तो दिल हर्षित हो उठा | खुदा से शिकायत का अपना ही मज़ा है|इस बात पर मुझे एक शायर की कुछ पंक्तियाँ स्मरण हो आईं- ‘या रब हुजूम-ए-गम को दे कुछ और बुसअतें, दामन तो क्या अभी मेरी आँखें भी नम नहीं; शिकवा तो बस इक छेड़ है लेकिन हकीकतन, तेरा सितम भी तेरी इनायत से कम नहीं|’ प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया!

Ramesh bajpai के द्वारा
August 28, 2010

ना किसी की खता, मैं ही नादान हूँ, वो तो दस्तूर-ए-दुनिया निभाता रहा; मैंने कितना कहा- ‘अब संभल, अब संभल’, दिल है दीवाना उसको बुलाता रहा | चातक जी क्या बात है .,,,,,,, कितनी सुन्दर बात ……..तीर चला और चल गया बहुत बहुत बधाई ५/५

    Ramesh bajpai के द्वारा
    August 28, 2010

    चातक जी उस सजदे को मेरा सजदा

    chaatak के द्वारा
    August 28, 2010

    आदरणीय बाजपेयी जी, रचना पर आपकी इंतनी अच्छी प्रतिक्रिया पाकर मन हर्षित हो उठा लगा आज प्रातः काल का आशीर्वाद आज का दिन शुभ करेगा | मेरे प्रयास को ५/५ देने का शुक्रिया!

gaurav2911 के द्वारा
August 27, 2010

सही कहा है आपने चातकजी दीवाना यानि प्रेमी चाहे फिर वोह देश प्रेमी हो या किसी और के लिए दीवाना होना भी आज के ज़माने में एक पाप है I लोग उसे अलग तरीके से देखते और समाज से बहार समजते है I वह दिल को छुलिया इस कविता ने I

    chaatak के द्वारा
    August 27, 2010

    गौरव जी, कभी कभी तो अपने अन्दर भी इंसान को खोजना पड़ जाता है कभी आसमान अपनी और खींचता है तो कभी नक्षत्र अपनी और बुलाते है कदम जमीन छोड़ने लगते हैं फिर जाने क्या होता है सब कुछ ठहर सा जाता है बस सन्नाटे में एक आवाज सुनाई देती है- गुनाह हो गया दुनिया में क्यूँ चला आया, न कोई साथी तेरा है, न कोई हमसाया, कल तो सोया था ‘कृष्ण’ मौत कि हसरत लेकर, ये क्या हुआ के आज फिर क्यूँ सवेरा आया? अच्छी प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

soni garg के द्वारा
August 27, 2010

जिसने हमको चाहा, उसे हम चाह ना सके जिसको चाहा उसे हम पा न सके ये समझ लो, दिल टूटने का खेल है यारो किसी का टूटा और अपना बचा ना सके !

    chaatak के द्वारा
    August 27, 2010

    सोनी जी, चार पंक्तिया आपके शायराना अंदाज़ के लिए- अपनों से बिछड के रोते तो भी दर्द नियामत बन जाते, हम गैरों को अपना समझे अब अपने ऊपर रोते हैं| अनजान नहीं थे फिर भी हम इंसान समझ कर साथ चले, बस ना समझे इस दुनिया में इंसान दरिंदे होते हैं| इतनी खूबसूरत कमेन्ट का तहे दिल से शुक्रिया!


topic of the week



latest from jagran