चातक

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आईना

Posted On: 28 Jul, 2010 Others में

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आईना  बोला – गुनाहगार! देख अंदर अपने !
मैं ये बोला के, तू न झांक तू जल जायेगा .
मेरे अंदर हैं शरारे मगर मैं जिंदा हूँ
तेरे ऊपर ये गिरे तो, तू पिघल जायेगा
मैं गुनाहगार हूँ हर शख्स का इस दुनिया में
खुदा भी देखेगा मुझको तो सहम जायेगा
फराख आईने इतना भी तू न हो हैरां
एक दिन तू ही मेरी दास्ताँ दोहराएगा
मेरे गुनाहों की संजीदगी तू समझेगा
जब कोई मेहरबान पत्थर तुझे दिखायेगा
कैसे होती है फ़ना जिंदगी पल भर में ए दोस्त
कैसी होती है तड़प सूखते अहसासों की
कैसी होती है सजा वफ़ा के गुनाहों की
चढेगा वफ़ा की सूली तो समझ जायेगा. 

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47 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

kahkasha के द्वारा
March 16, 2014

बोहोत हछा हे ये लेख दिल को छु गया ह

    चातक के द्वारा
    March 21, 2014

    हार्दिक धन्यवाद !

kahkasha के द्वारा
March 16, 2014

very good chatk ji your poem

    चातक के द्वारा
    March 21, 2014

    thanks a lot kahkasha ji :)

seema के द्वारा
August 10, 2010

कैसी होती है सजा वफ़ा के गुनाहों की चढेगा वफ़ा की सूली तो समझ जायेगा.  चातक जी आपकी कवितायेँ/ गज़लें पढ़कर कभी कभी सोचती हूँ की इतनी छोटी उम्र ( जैसी आपकी तस्वीर है ) में आपको ऐसे अनुभव कहाँ से हुए , अब तो हम आपसे कहेंगे की अपनी आत्म-कथा लिख डालिए | शुभ-कामनाएं |

    chaatak के द्वारा
    August 10, 2010

    सीमा जी, मेरी तस्वीर भी असली है और उसमे दिख रही उम्र भी| अनुभव के बारे में इतना कहना चाहूंगा कि जागरण ब्लॉग के मंच पर मैंने कोई एक शब्द भी ऐसा नहीं लिखा है जिसका पूरा व्यावहारिक अनुभव मुझे ना हुआ हो| मेरी आत्मकथा प्रकाशित होने का वक्त अभी नहीं आया है अभी कुछ क़र्ज़ चुकाने बाकी हैं वे अदा हो जाएँ तो सोचूंगा, हाँ मेरे ब्लोग्स में कुछ झलकियाँ जरूर मिलती रहेंगी| प्रतिक्रिया का तहे-दिल से शुक्रिया!

Ramesh bajpai के द्वारा
August 4, 2010

मैं गुनाहगार हूँ हर शख्स का इस दुनिया में खुदा भी देखेगा मुझको तो सहम जायेगा फराख आईने इतना भी तू न हो हैरां एक दिन तू ही मेरी दास्ताँ दोहराएगा बहुत अच्छी बात चातक जी बधाई

    chaatak के द्वारा
    August 4, 2010

    आदरणीय बाजपेयी जी, इस सॉनेट पर आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया पाकर बहुत हर्ष हुआ| दरअसल ये सॉनेट मेरे दिल के बहुत करीब है| आप इसे ‘Subjective Poetry’ की श्रेणी में रख सकते हैं| भावों की प्रशंसा करने का शुक्रिया!

Raj के द्वारा
August 3, 2010

आइना देख कर इन्सान सुधर सकता है, अगर समझदार है फिर तो समझ जायेगा। ज़िन्दगी भर जलेगा दुनिया के उलझन में वो, बाद में हाथ मलेगा और बैठ के पछताएगा । बहुत अच्छा आइना दिखाया है आपने चातक जी, आभार, राज

    chaatak के द्वारा
    August 3, 2010

    राज जी, कविता पर आपने अपनी बहुमूल्य राय दी आपका बहुत-बहुत शुक्रिया!

rajkamal के द्वारा
July 31, 2010

चातक जी ….आपकी बहिन हमारी भी बहिन हुई …… यक़ीनन यह वोही दीपिका जी है … क्योंकि इन्होने आपके शुरुआत वाली पोस्ट्स में किसी पोस्ट्स पे टिपण्णी की थी….. मे यहाँ पर जागरण वालो से बहुत ही दुखी हू जो की ऐसे लोगो को बढावा देते है … चातक जी …जो क़ाबलियत इनमे है …वोह यहाँ पर और किसी में भी नहीं है … इतनी अच्छी कविता ..वोह भी इंग्लिश में ….और वोह भी इतनी साधारण और सिम्पल तरीके से …. उनको कुदरत का कोई वरदान है …. उनको इस मंच पर होना ही चाहिए …..

    chaatak के द्वारा
    July 31, 2010

    May be, she is a good writer. Whosoever she may be I too wish her all the best.

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
July 30, 2010

चातक जी आप बहुत अच्छा लिखते हैं | बहुत सुन्दर ……. आईने पर ही दो लाइन मेरी ओर से ……. आइना रुसवा करने को, वो कीचड उछाल बैठे | आइना गन्दा कर डाला, अपनी तस्वीर गवां बैठे ||

    chaatak के द्वारा
    July 30, 2010

    शैलेश जी, आपकी कविताओं के तो हम भी फैन हैं| जब आप पूरी ले में होते हैं तो आपकी कविताओं की परवाज़ किसी से कम नहीं होती| तारीफ का शुक्रिया!

roshni के द्वारा
July 30, 2010

आइना हूँ मैं मेरे सामने आकर देखो खुद नज़र आओगे जो आँख मिला कर देखो यु तो आसान नज़र आता है मंजिल का सफ़र कितना मुश्किल है मेरी राह से जाकर देखो बहुत बढ़िया पोस्ट चातक जी ……… शुभकामनाओ सहित

    chaatak के द्वारा
    July 30, 2010

    रौशनी जी, कई बार आपके विचार दिल में एक सिरहन सी पैदा कर देते हैं आज फिर आपकी आखिरी पंक्ति ‘कितना मुश्किल है मेरी राह से जाकर देखो’ झंझावातों को न्योता दे गई| इतनी अच्छी प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

rachna varma के द्वारा
July 30, 2010

चातक, आप सिर्फ लिखते ही नहीं है आप पढ़ते भी खूब है हिंदी ,इंग्लिश और उर्दू तीनो भाषा पर अच्छी पकड़ है वरना जिस तरह से सिर्फ डाक्टर ,इंजीनियर या कोई भी प्रफेशनल डिग्रियों का जो दौर चला है उसमें बच्चो से ले कर युवा तक में अपनी साहित्यिक अभिरुचियो को जगह देने का न शौक न समय कुछ भी नहीं बचा है वो क्या लिखते है ,क्या पढ़ते है समझ में ही नहीं आता है मेरे लिए एक अर्थ पूर्ण लेख और कविता बहुत मायने रखते है आप अपने शब्दों को अर्थ देते रहिये हम सब बैठे है पढने के लिए ढेर सारी शुभकामनाओ के साथ !

    prashant jaiswal के द्वारा
    July 30, 2010

    सच कहा रचना जी, आपकी बातो से मै पूर्ण रूप से सहमत हूँ | आज ज़िन्दगी की दौर में लोग साहित्य को भूलते जा रहे है| आज हमारे देश को ऐसे लोग की बहुत जरुरत है जो साहित्य की पूजा करे हो| चातक जी बस आप ऐसे ही लिखते रहे हमारी शुभ कामनाए आपके साथ है|

    chaatak के द्वारा
    July 30, 2010

    रचना जी, बड़ी ख़ुशी हुई ये जानकार की आप कुछेक उन ब्लोगरों में से हैं जो अर्थपूर्ण लेख और कविताओं की लिखने वालों की हौसला-अफजाई में कंजूसी नहीं करतीं| मेरा मानना है कि शिक्षा स्वयं अपना अवार्ड होती है| पढ़ाई के मामले में मेरा सूक्त वाक्य है- “Studies serve for delight, for ornament and for ability.” प्रतिक्रिया का तहे-दिल से शुक्रिया!

    chaatak के द्वारा
    July 30, 2010

    प्रशांत जी, जब तक लोगों के दिल में साहित्य का प्रेम रहेगा हम इसी तरह लिखते रहेंगे कलम इसी तरह दिल से चिपकी रहेगी हाँ नाम बदलते रहेंगे, आज चातक है, कल प्रशांत, तो परसों रचना, ……. प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

Shivashish के द्वारा
July 30, 2010

वाह वाह चातक जी क्या लिखते हैं दिल खुश कर दिया आपने, इतनी अच्छी पोस्ट के लिए धन्यवाद.

    chaatak के द्वारा
    July 30, 2010

    शिवाशीष जी, आपकी प्रतिक्रिया पाकर बड़ी ख़ुशी हुई| हौसला-अफजाई का शुक्रिया|

rajkamal के द्वारा
July 29, 2010

चातक जी …गुस्ताखी माफ… आपकी पिछली पोस्ट ..मत जायो …पर जिस दीपिका जी ने टिपण्णी की है वोह अगर वोही है …dreamz ब्लॉग वाली तो आप उनसे क्यों नहीं कहते की वोह फिर से क्यों नहीं लिखती है …. आप भी सर्च बॉक्स में ड्रीम्ज़ टाइप कर के उसको पड़ना ज़रूर ..

    chaatak के द्वारा
    July 29, 2010

    राजकमल जी, dreamz ब्लॉग लिखा तो दीपिका ने ही है लेकिन मेरे ब्लॉग पर किस दीपिका ने कमेन्ट किया है समझ नहीं पा रहा हूँ| एक दीपिका तो वो हैं जिनकी आप बात कर रहे हैं और एक दीपिका मेरी बहन है जो मेरी पहली आलोचक और फैन हैं अब मुझे सुबह उनसे पूछना पड़ेगा कि ये कमेन्ट उन्होंने की है या dreamz की ब्लोगर ने|

    rajkamal के द्वारा
    July 30, 2010

    चातक जी ….आपकी बहिन हमारी भी बहिन हुई …… यक़ीनन यह वोही दीपिका जी है … क्योंकि इन्होने आपके शुरुआत वाली पोस्ट्स में किसी पोस्ट्स पे टिपण्णी की थी….. मे यहाँ पर जागरण वालो से बहुत ही दुखी हू जो की ऐसे लोगो को बढावा देते है … चातक जी …जो क़ाबलियत इनमे है …वोह यहाँ पर और किसी में भी नहीं है … इतनी अच्छी कविता ..वोह भी इंग्लिश में ….और वोह भी इतनी साधारण और सिम्पल तरीके से …. उनको कुदरत का कोई वरदान है …. उनको इस मंच पर होना ही चाहिए …..

anju के द्वारा
July 29, 2010

चातक जी बहुत अछे से दिल के तड़पते हुए जजबातों को बयां किया है

    chaatak के द्वारा
    July 29, 2010

    अंजू जी, जज़्बात ही तो हैं जो अभी तक शायद इंसान हूँ वर्ना हालत और मेहरबानों ने कब का जानवर बना दिया होता| ये कलम भी लगता है दिल से चिपक सी गई है, अब इसकी जुदाई बर्दाश्त नहीं होती और ये मनमाने ढंग से मुझसे लिखवाती रही है| तारीफ़ का शुक्रिया!

sumityadav के द्वारा
July 29, 2010

वाह चातकजी क्या खूब लिखा है- कैसी होती है तड़प सूखते अहसासों की कैसी होती है सजा वफ़ा के गुनाहों की चढेगा वफ़ा की सूली तो समझ जायेगा.

    chaatak के द्वारा
    July 29, 2010

    सुमित जी, पंक्तियाँ आपको पसंद आईं| हमें दिली ख़ुशी मिली| तारीफ़ का शुक्रिया!

allrounder के द्वारा
July 29, 2010

बहुत खूब चातक जी, यार ऐसे कौन से जख्म तुमने इस बाली उम्र मैं खा लिए, जिससे एहसासों की ऐसी गहरी झील मैं उतर गए, जिस झील मैं उतरने मैं उम्रदराज लोग भी डरते हैं !

    chaatak के द्वारा
    July 29, 2010

    आलराउंडर जी, आपके सवालों का जवाब क्या दूँ | बस शेली की पंक्तियाँ दोहरा देता हूँ- \’We look before and after, and pine for what is not, Our sincerest laughter with some pain is fraught, Our sweetest songs are those, that tell of saddest thought.\’ प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

soni garg के द्वारा
July 29, 2010

वह क्या खूब कहा है …… आइना बोला गुनहगार देख अन्दर अपने मैं ये बोला के, तू न झांक तू जल जायेगा ……. आपकी कविताये वास्तव में हर किसी की तारीफ के काबिल है ……….

    chaatak के द्वारा
    July 29, 2010

    सोनी जी, तारीफ़ का तहे-दिल से शुक्रिया! बड़ी ख़ुशी मिलती है ये जानकर कि आपको मेरी कवितायें पसंद आती हैं| जिन दो कविताओं पर आपकी कमेन्ट मिली ‘पाप’ और ‘आईना’ संयोगवश दोनों ही सॉनेट हैं जिन्हें लिखना स्वयं एक चुनौती था क्योंकि हिंदी साहित्य में सॉनेट नहीं पाए जाते| हाँ श्रधेय निराला जी ने ही शायद एक सॉनेट लिखा है| विषयवस्तु के साथ सॉनेट की जुगलबंदी करने की मशक्कत सार्थक सिद्ध हुई जब आप सभी साथियों ने दोनों पर ही अच्छी राय दी|

Anita Paul के द्वारा
July 29, 2010

चातक जी, वाकई आपकी रचना लाजवाब होती है. शायद ये रचना मैं बेहतर समझ पा रही हूं.

    chaatak के द्वारा
    July 29, 2010

    अनीता जी, आपकी प्रतिक्रिया ने हमें खुश कर दिया| मुझे पता था कि आपको ये सॉनेट बेहतर समझ में आएगी| आपके ब्लॉग बता रहे थे कि आपने भी दर्द जिए हैं और तभी मुझे इसको जंक्शन पर पोस्ट करने का विचार आया| प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

prashant jaiswal के द्वारा
July 29, 2010

फराख आईने इतना भी तू न हो हैरां एक दिन तू ही मेरी दास्ताँ दोहराएगा मेरे गुनाहों की संजीदगी तू समझेगा जब कोई मेहरबान पत्थर तुझे दिखायेगा वाह! क्या खूब कहा है| यह पूर्तः सत्य है की एक आइना एक इन्सान का चरित्र होता है|

    chaatak के द्वारा
    July 29, 2010

    प्रशांत जी, आपकी प्रतिक्रिया को देख कर दिल खुश हो गया| साहित्य की गहराई का मज़ा और अहसास होता ही निराला है| याद कीजिये मैंने आप लोगों से कभी कहा था ‘अन्य विषय पढ़े जाते हैं लेकिन साहित्य जिया जाता है’ ये सॉनेट उसी साहित्यिक जीवन की एक हल्की सी सांस है| प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

Nitin Sinha के द्वारा
July 29, 2010

चातक जी ! एक बार फिर दिल को जीता अपने एक बार फिर आहा भरी मैने, क्या खूब लिखते है आप ? ये अदा अपने सीखी कहाँ से हमने भी लिखने की कोशिश की है उम्मीद है पसंद आया होगा सुन्दर पंक्तियों के लिए धन्यवाद |

    chaatak के द्वारा
    July 29, 2010

    नितिन जी, आपको सॉनेट पसंद आई जान कर बहुत ख़ुशी हुई| आपकी कोशिश अच्छी है| मैं कैसे लिखता हूँ ये बात श्रधेय अदम जी ने लिखा है- ‘याद रखिये यूँ नहीं ढलते हैं कविता में विचार, होता है परिपाक धीमी आंच पर अहसास की;’ प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

kmmishra के द्वारा
July 29, 2010

मेरे गुनाहों की संजीदगी तू समझेगा जब कोई मेहरबान पत्थर तुझे दिखायेगा एक एक शेर सवा शेर है । आपकी यह गजल पढ़ कर स्व0 धर्मवीर भारती जी की गुनाहों का देवता याद आ गयी । बहुत बहुत आभार ।

    chaatak के द्वारा
    July 29, 2010

    प्रिय मिश्र जी, आपकी विशेषग्य टिप्पड़ियाँ सचमुच उत्साह का संचार करती हैं| कहीं न कहीं इस बात का अहसास होता है कि मासूमियत और निष्कपट विश्वास ही सबसे बड़ा गुनाह है| प्रतिक्रिया का तहे-दिल से शुक्रिया!

rajkamal के द्वारा
July 29, 2010

आईना भी पूरा सच कहाँ दिखाता है आज कल …. जैसा देखना चाहो उसमे वेसा ही दिखता है आजकल … बहुत ही अच्छे ख्यालो को माला में अच्छे से पिरो कर पेश किया है … चातक जी ..बहुत -२ बधाई

    chaatak के द्वारा
    July 29, 2010

    राजकमल जी, बिलकुल ठीक कहा आप ने अब तो आईना भी दागदार हो चला है कहाँ तलाश करें वो शै जो निष्कपट और मासूम हो? प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

R K KHURANA के द्वारा
July 28, 2010

प्रिय चातक जी, बेहतरीन कविता ! मेरे गुनाहों की संजीदगी तू समझेगा जब कोई मेहरबान पत्थर तुझे दिखायेगा सच आजकल मेहरबान ही पत्थर दिखाते है ! बहुत खूब ! राम कृष्ण खुराना

    chaatak के द्वारा
    July 29, 2010

    चाचा जी, आपकी प्रतिक्रिया उत्साहवर्धन करती है| इस सॉनेट को लिखते समय दिल में ऐसे ही मेहरबानो के फिकरों का गुबार था| प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

Nikhil के द्वारा
July 28, 2010

आपकी इस ग़ज़ल के लिए बस मिथुन डा के स्टाइल में कहूँगा. क्या बात, क्या बात, क्या बात! बधाई.

    chaatak के द्वारा
    July 28, 2010

    निखिल जी, हौसला-अफजाई का तहे-दिल से शुक्रिया !


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