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आरक्षण कितना उचित, कितना अनुचित

Posted On: 24 Jul, 2010 Others में

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भारतीय संविधान ने जो आरक्षण की व्यव्यस्था उत्पत्ति काल में दी थी उसका एक मात्र उद्देश्य कमजोर और दबे कुचले लोगों के जीवन स्तर की ऊपर उठाना था और स्पष्ट रूप से इसकी सीमा रेखा २५ वर्षों के लिए थी| लेकिन धर्म के आधार पर एक विभाजन करवा चुके इन राजनेताओं की सोच अंग्रेजों की सोच से भी ज्यादा गन्दी निकली| आरक्षण का समय समाप्त होने के बाद अपनी व्यक्तिगत कुंठा को तृप्त करने के लिए वी.पी. सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें न सिर्फ अपनी मर्जी से करवाई बल्कि उन्हें लागू भी किया| उस समय मैं जूनियर कक्षा में पढ़ता था लेकिन अच्छी तरह से याद है कि तमाम सारे सवर्ण छात्रों ने विधान-सभा और संसद के सामने आत्मदाह किये थे| नैनी जेल में न जाने कितने ही छात्रों को कैद करके यातनाएं दी गई थी इसका कोई अता-पता ही नहीं चला| याद नहीं आता कि किसी भी परिवेश में उन्नति के नाम पर भी अंग्रेजों ने इस प्रकार भारतीयों का दमन किया हो| तब से लेकर आज तक एक ऐसी व्यवस्था कायम कर दी गई कि ऊंची जातियों के कमजोर हों या मेधावी सभी विद्यार्थी और नवयुवक इसे ढोने के लिए विवश हैं| अगर आरक्षण की वास्तविक स्थिति को देखा जाय तो जो पात्र हैं उन्हें भी इसका फायदा नहीं मिल रहा है| दीगर बात ये है कि जिस देश का संविधान अपने आपको धर्म-निरपेक्ष, पंथ-निरपेक्ष और जाति-निरपेक्ष होने का दावा करता है उस देश में जातिगत और धर्म पर आधारित आरक्षण क्या संविधान की आत्मा पर ही कुठाराघात नहीं है| एक धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र में आरक्षण का सिर्फ एक आधार हो सकता है वो है आर्थिक आधार लेकिन दुर्भाग्य वश ऐसा नहीं है| यहाँ तो एक भेंड-चाल है कि जो बहुसंख्यक (हिन्दू) के विरुद्ध सांप्रदायिक आग उगले उसे धर्म-निरपेक्ष कहा जाता है, जो जाति और वर्ग के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था देता है उसे जाती-निरपेक्ष कहा जाता है|
अब सवाल ये उठता है कि
१. क्या तथाकथित ऊंची जातियों में गरीब और शोषित लोग नहीं है?
२. आरक्षण का आधार आर्थिक स्थिति हो तो क्या हानि होगी?
३. शिक्षा में आरक्षण पाकर जब सामान शिक्षा हासिल कर ली फिर नौकरियों और प्रोन्नति में आरक्षण क्या औचित्य क्या है?
४. वर्ण-व्यवस्था से तथाकथित नीची जातियां भी विरत नहीं फिर भी कुछ को सवर्ण कहकर समाज को टुकड़ों में बांटने के पीछे कौन सी मंशा काम कर रही है?
५. अंग्रेजो के दमन को मुट्ठी भर युवाओं ने नाकों चने चबवा दिए फिर आज का युवा इतना अकर्मण्य क्यों है?
६. क्या हम गन्दी राजनीति के आगे घुटने टेक चुके हैं?
७. क्या आज सत्य को सत्य और झूठ को झूठ कहने वाले लोगों का चरित्र दोगला हो चला है कि आप से एक हुंकार भी नहीं भरी ज़ाती?
जागो ! विचार करो ! सत्य को जिस संसाधन से व्यक्त कर सकते हो करो वर्ना आने वाली नस्लें तुमसे भी ज्यादा कायर पैदा हुईं तो इन काले अंग्रेजों के रहमो-करम पर जियेंगी !

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68 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

mohan choudhary के द्वारा
June 4, 2016

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arvindnigam के द्वारा
August 24, 2015

दलित और वाणिज्य में आरक्षण- (From a friend’s timeline) जे एस कॉटन ने 1893 में एक रिपोर्ट पेश की थी जिसका नाम था ‘ प्रोग्रेस ऑफ़ एजुकेशन ‘ उस रिपोर्ट में उन्होंने भारतीय शिक्षा पर सर्वे किया था और एक घटना का वर्णन किया था जो की गुजरात की थी । गुजरात के कैरी जनपद् में स्थानीय अंग्रेज अफसरों की मदद से अछूत बच्चों का भी दाखिला स्कूल्स में होने लगा था । पर गैर दलितों ने इसके खिलाफ आंदोलन छेड दिया । कई स्कूल्स बंद करवा दिए गए और दलित बस्तियों में आग लगा दी गई । इसी प्रकार अंग्रेज प्रशासक आर नाथन ने भी अपनी रिपोर्ट ‘ प्रोग्रेस ऑफ़ एजुकेशन -2′ में बताया की गैर दलितों ने अछूतो की शिक्षा का विरोध करने के लिए महाराष्ट्र में एक अलग तरीका अपनाया , उन्होंने उन स्कूल्स में नौकरी करनी ही बंद कर दी जिसमे दलित बच्चे पढ़ते थे । बाद में ऐसा ही विरोध पुरे देश में हुआ और हार के अंग्रेजी सरकार ने दलितों के लिए अगल स्कूल्स बनवाना शुरू किया। बाद में अंग्रेजो की उदारता तथा शुद्र अछूत महापुरुषो के अथक प्रयासो और त्याग से आज़ादी के बाद आरक्षण से अछूतो में शिक्षा का प्रसार हुआ । जंहा मनु द्वारा निर्धारित सामजिक आरक्षण के कारण शिक्षा पर केवल ब्राह्मण का आरक्षण था और अछूत शिक्षा प्राप्त करने से वंचित था वंही बाबा साहब के प्रयासो से आज़ादी के बाद अछूत सुप्रीम कोर्ट के जज तक बनने लगे । हजारो अछूत शिक्षक बनने लग गए , प्रोफ़ेसर, कुलपति बनने लग गए। जंहा अछूतो को केवल झाड़ू और गंदगी साफ़ करने का भर अधिकार था वंही अछूत आई पी यस बनने लग गए , आई ए एस बनने लग गए। जंहा पहले सेना और प्रशासन में केवल क्षत्रिय का आरक्षण था ,पर बाबा साहब के प्रयासो से क्षत्रियो का यह आरक्षण टूटा और अछूत सेना में भर्ती होने लगे , अफसर बनने लगे । अछूत प्रसाशनिक कार्यो में भाग लेने लगे , नेता बनने लग गए । जंहा अछूतो को केवल बस्ती से बाहर टूटी झोपड़ियो ही बसने और मिटटी के बर्तन में रखने का ही अधिकार था वंही आज लाखो अछूतो के पास आधुनिक सुख सुविधा का सामान है , खेत – खलियान, ट्रेक्टर , ट्यूबेल, कार , फ्लेट्स हैं । लाखो दलित कृषि कार्य में हैं ,डॉक्टर , इंजीनयर हैं । पर दलित वैश्यों के आरक्षण को अभी नहीं तोड़ पाया है , अभी दलित उद्योग , वाणिज्य, सिनेमा में बहुत पीछे हैं । देश के 100 शीर्ष उद्योगपतियों में एक भी दलित नहीं है । इसका एक कारण यह भी रहा है की अधिकतर कंपनियां पुरानी हैं ,वे आज के माहौल से अलग बिना खुली होड़ में उतरे ही बड़े उद्योगपति बन गए हैं । यानि उन्हें बिजनेस विरासत में मिला है । पर केवल यह सोच के दलितों को चुप बैठना मूर्खता है , यदि दलित उद्योग – वाणिज्य के तरफ से मुंह फेरे हुए है तो कंही न कंही दलित नेतृत्व भी इसका दोषी रहा है । दलितों को यह समझना चाहिए की यह उद्योगपाति ही होते हैं जो देश की अर्थव्यवस्था तय करते हैं । किसी भी देश की रीड की हड्डी होते हैं उद्योग और वाणिज्य , यदि किसी देश की अर्थव्यवस्था फेल तो समझो की देश फेल । अत: दलितों और दलित नेतृत्व को अधिक से अधिक दलितों को उद्योग में भागीदारी लेने के लिए प्रेरित होना चाहिए ।

NBF के द्वारा
November 18, 2012

please give more information

vipul के द्वारा
August 16, 2010

Mr. Nikhil, first of all sorry for my late reply. As u know that there is 27%reservation for OBC and 22.5% for SC & ST in our country.By this logic 49.5% of seats will be cornered by these categories. 1. As per ur comment Sawarn boys r only ill-treater. I think it’s the mental state of young boys whether they sick or not. If sick then it will be a backward chap also. So don’t think all bad name of collage is due to Sawarn only. 2. In the next part of ur comment u r telling that non-sawarn chaps can’t afford coaching fee. Sir, many people from the higher castes r also economically weak & can’t afford even their collage fee. So they should also get the reservation. Reservstion should be based on their economic condition not on their cast. If u really want to help them in this matter inspite of giving them reservation,provide free books,coaching,uniform to these students but simply giving them extra mark is not good. Othervise merit will suffer & deserving students will be deprived of their chance of admission. JAI HIND

NAVEEN KUMAR SHARMA के द्वारा
August 4, 2010

चातक जी आपने सही समय पर सही बात उठाई है आरक्षण आज हमारे देश में एक महामारी की तरह फ़ैल रहा है हमारे देश के नेता वोट लेने के लिए जातिगत आरक्षण पे आरक्षण दिए जा रहे हैं अगर आप वास्तविक रूप से किसीकी सहायता करना चाहते हैं तो उसे सभी साधन देकर समर्थ बनाइये न कि अपंग

    chaatak के द्वारा
    August 4, 2010

    नवीन जी, बिलकुल सही बात कही है आपने| मजे की बात तो ये है की स्वयं उस जाति के नवयुवक भी वैचारिक स्तर पर जातिगत आरक्षण का समर्थन नहीं करते हैं जिन्हें ये जबरदस्ती दिया जा रहा है| इस चर्चा में अपनी बहुमूल्य राय देने का शुक्रिया!

vijendra singh bhadoria के द्वारा
July 31, 2010

मै आरक्षण पर कहना चाहता हूँ “कई गम है जिन्हें कोई जुबान ना मिली ,भटकता रहा अंधेरो मै शमा ना मिली, आरक्षण कि आंधी इस देश मै ऐसी चली , काबिल लोगो को उनकी सही जगह ना मिली . चातक जी जब तक कोई क्रांति इस देश मै नहीं होगी तब तक आरक्षण नाम कि ये डायन खाती रहेगी

    chaatak के द्वारा
    July 31, 2010

    विजेंद्र जी, मैं आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ| जिस तरह से आप लोगों की वैचारिक समिधाएँ इस यज्ञ को मिल रही हैं इसके समक्ष ये डायन अब ज्यादा समय नहीं टिक भी नहीं पाएगी| प्रतिक्रिया करने और मार्ग पर प्रकाश डालने के लिए धन्यवाद!

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
July 30, 2010

प्रिय चातक जी आपने बहुत सही बात उठाई है….. आरक्षण जैसे बात तब नहीं होनी चाहिए जब हम समदर्शिता, और समानता के पोषक बनते हैं | हाँ मेरे मत से आरक्षण गुणवत्ता के मामले में नहीं होना चाहिए, लेकिन जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं उन्हें वित्तीय और साधन सम्बन्धी सहायता प्रदान करनी चाहिए | जहाँ तक मैं मानता हूँ किसी लो लाठी पकड़कर उसका भला नहीं किया जा सकता, अगर आप वास्तव में किसी का भला करना चाहते हैं तो उसे समर्थ बनाइये, अपंग नहीं, और यदि किसी को समर्थ बनाने में कोई असुविधा है तो उसे वो साधन दिए जाएँ जिसकी जरूरत है, समर्थ और योग्य बनाने के लिए | और वित्तीय रूप से असमर्थता जाती धर्म, लिंग के नाम से नहीं सम्बंधित नहीं होती है, कोई भी गरीब हो सकता है, और गरीब को समर्थ बनाइये उसे संसाधन उपलब्ध कराइये | उसे आरक्षण देकर गुणवत्ता से समझौता करना वैश्विक स्तरपर राष्ट्र की साख और छबि धूमिल करता है और ये नहीं होना चाहिए………….

    chaatak के द्वारा
    July 30, 2010

    शैलेश जी, आपने बिलकुल सही बात कही है| यहाँ पर मैं फिर जोड़ना चाहूँगा ‘जब हमारे देश के एक किशोर से लेकर वयोवृद्ध अनुभवी लोगों तक की राय आरक्षण के मामले में एक जैसी है तो फिर नीतियां जनमानस के विरुद्ध क्यों? मुझे तो लगता है ‘कूप में ही यहाँ भाँग परी है’| शैलेश जी वैचारिक समर्थन का शुक्रिया!

satyamkumar के द्वारा
July 30, 2010

चातक जी तुमने जो आरक्षण ki baat ki है बहुत ही achchhi लिखी है .मगर hamare देश की हालत के jammedar ये ही नहीं है .वह इंसान भी जो सिर्फ स्सलाह तो देता है की इसमे तुम को यह करना चाहिए, मगर स्वंय नहीं करेंगे ,.तुमने जो बिदा उठा है ,उसे बहुत लोगो ने भी उत रखा है ,मै जागो पार्टी का सदस्य हूँ जागो पार्टी भी इसी नीति पर काम कर रही है ,तुम्हारे विचार अच्छे है इसलिए तुम अकेले होकर काम करते हो .हम sab मिलकर काम करेंगे तो शायद हमको jaldi सफलता मिल जाये .मैंने भी कुछ बिन्दुओ पर लेख लिखा मगर लिखने से काम तो नहीं हो सकता है जब तक यह सभी के सामने नहीं हो

    chaatak के द्वारा
    July 30, 2010

    सत्यम जी, ये जानकार बड़ी ख़ुशी हुई कि आप एक ऐसी राजनैतिक पार्टी से ताल्लुक रखते हैं जो जातिगत आरक्षण के विरुद्ध आवाज उठा रही है| मैं किसी भी तरह से जंक्शन मंच को राजनीतिक लाभ या प्रचार के लिए इस्तेमाल करना उचित नहीं समझता इसलिए कि ये एक साफ़-सुथरा वैचारिक मंच ही बना रहे राजनीति का अखाड़ा न बने| आप ही नहीं बहुत से लोग ऐसी मुहिम चला रहे हैं या उससे जुड़े हैं| जिसका असर जल्द ही दिखाई देने लगेगा| लेकिन किसी भी पार्टी विशेष से सम्बंधित चर्चाएँ यदि हम इस मंच से अलग व्यक्तिगत ई-मेल द्वारा करें तो बेहतर होगा| तब शायद मैं भी आपको ये बताने में ख़ुशी महसूस करूंगा कि हम कहाँ तक व्यवहारिक जनजागरण और आन्दोलन में भाग लेते हैं या ले सकते हैं| इस मंच पर अपनी उपलब्धियों या प्रयासों का प्रचार करना करना जरा अटपटा और वैचारिक अभिव्यक्ति के विरुद्ध प्रतीत होता है| आशा है आप मेरी बात समझेंगे और मेरे ई-मेल पर अपने राजनीतिक क्रियाकलापों के बार में विस्तार से जानकारी देंगे| वैचारिक समर्थन का धन्यवाद!

monika varshney के द्वारा
July 30, 2010

bahut sahi vichaar hain aapke bus matra ek rajniti hai ye ,arakshad jati ke aadhar pe na hokar garibi ke adhar pe hoto syad hamaare desh ki isthi main kuch sudhar aa jaye kyuki garibi jaati dekhkar nahi aati…..aur de bhi rahe hai to ek hi chij main de dijiye yaa to education main ya job main har jgah is aarkshad ki aag se mar to isi desh ka yuva varg raha hai na par in rajnetao ki gandi rajneeti ke aage kon samjhaye…………………………..inhe to matlab hai bus rajneeti karne se desh se nahi

    chaatak के द्वारा
    July 30, 2010

    मोनिका जी, जातिगत आरक्षण के विरुद्ध इस विचार यज्ञ की ज्वाला में जो अमूल्य वैचारिक समिधा की आहुति आपने दी है निश्चय ही इससे उठा धुंआ कल की निराशा से मुक्ति दिलाएगा| अगर आपकी ही तरह सारे युवा पूर्ण मनोयोग से सत्य का बिगुल फूंकेंगे तो इन राजनेताओं की कुत्सित नीयत जरूर थर्राएगी| वैचारिक समर्थन का शुक्रिया!

rajesh के द्वारा
July 29, 2010

arkashan vyakty vishesh ko to fayada pahuncha sakata hai parantu desh ko nahi , kyonki desh ko puree tarah se yogya vyakti chahiye jo desh ki seva kar sake, aaj ke dour me arashan rajneeti ki cheej ban gaya hai . ab sabhi ko ek sath mil kar arkashan ka virodh karna chaiye aur BHARTIYA PRAJA SHAKTI PARTI KO VOTE dena chahiye.

    chaatak के द्वारा
    July 29, 2010

    राजेश जी, आपकी बात बिलकुल सही है| हमारे देश के आरक्षण की स्थिति तो बड़ी दयनीय है| इससे अगर व्यक्ति विशेष को भी फायदा मिलता तो गलत नहीं था दिक्कत तो इस बात की है कि एक धर्म एवं पंथ निरपेक्ष राष्ट्र में जाति विशेष के उन लोगों को आरक्षण का लाभ दिया जा रहा है जो किसी भी तरह आरक्षण के पात्र नहीं हैं| वैचारिक समर्थन का शुक्रिया!

shivalord के द्वारा
July 29, 2010

hi shiv मिर्ज़ापुर से पहले तो मै हाकना चाहुगा की को इ भी कानून या नियम बुरा नहीं होता है पर लोग बुरे हो तो उसको बुरा बना दिया जाता है . जैसा की हम लोग अरषण के रूप में देख रहे है .हम आप लोगो बता देना चाहता हु की मै ज्ञानपुर से सरकारी से इंटर करता था तब एक तहसील दर साहब थे तिवारी j वे कहा करते थे की देखो बेटा जनतंत्र में जिसकी सखाया जयादा होगी वही राज्य चलाएगा अभी तक यही मुर्ख लोग ज्यादा है इसलिए अभी तक मूर्खो के द्वारा ही देश चल रहा है जब विद्बान ज्यादा हो जायेगे तब आप देखेगे की वहा पर देश आगे जायेगा यही अब हो रहा है विभिन छेत्रो में उनती हुए है लेकिन जहा पर ये मुख लोग है वहा पर नहीं हुए तो आप को बतला दू की आरक्षण भी मूर्खो के बिच रहा है जिससे ये दुसित हो गया है नहीं तो आप को बता दू की अमेरिका में इसी आरक्षण के बल पर अपने देश को आगे बना दिया वहा पर आरक्षण वाले बन्दे को अलग स्कुल खुल कर उसको आचे लोगो के बराबर लाया जाता है जिससे की उन्हें मुख्या धरा से जोना जा सके .उन्हें उत्तम कार्यकुशल बनाया जाता है अपने देश में तो अज आचे लोग आचे पद पर नहीं है जो है वो कुछ नहीं कर प् रहे है या भटक जारहे है जसे के डिस्ट्रिक मजिस्त्रथ्त .

    chaatak के द्वारा
    July 29, 2010

    शिवा जी, आपकी बात सोलह आने सत्य है| जिस अक्षमता की बात आपने कही है मैं जल्द ही इसकी भी पोल खोलने वाला हूँ| आशा है कि इस वैचारिक यज्ञ में आप इसी तरह अपने वैचारिक समिधाओं की आहुतियाँ निः संकोच डालते रहेंगे\ प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

Nitin Sinha के द्वारा
July 29, 2010

चातक जी ! नमस्कार आपने सही मुद्दा लिया है आरक्षण | मैं थोडा लेट हो गया अपना कमेन्ट देने में वैसे सारी बातें तो आपने अन्य नीचे कमेन्ट में देख ही ली होंगी मेरे विचार भी कुछ ऐसे ही है लेकिन आपके प्रश्नों के उत्तर ज़रूर देना चाहूँगा ऊची जातियों में भी गरीबो की संख्या कम नहीं है लेकिन उन लोगो के लिए किसी भी प्रकार का कोई आरक्षण नहीं है अगर आरक्षण आर्थिक स्थिति के हिसाब से होता तो शायद उनको कुछ लाभ मिल पाता | और अगर यही रहा तो सामान में ही गरीबो की सबसे जादा संख्या हो जाएगी | हानि तो है लेकिन नेतानों को | युवाओ के अकर्मण्य होने का कारण यही है की अब युबाओ में ही एकता नहीं रहे गई है क्यूंकि जिसको आरक्षण की बैसाखी मिल गयी है वो उसे छोड़ना ही नहीं चाहता है | इसमें राजनीती कुछ के लिए गन्दी तो कुछ के लिए अच्छी भी है “वैसे घुटने तो वो लोग टेक सकते है जो अपने पैरो पर खड़े हो | लेकिन टेकने से अच्छा है घुटने को आगे बड़ाकर इसको रोकने का प्रयास किया जाये | मै उन logon की baat नहीं कर रहा hun जो पहले से ही घुटनों पर हो | चातक जी आपके lekh के लिए dhanybad

    chaatak के द्वारा
    July 29, 2010

    नितिन जी, आपके ओजस्वी विचारों के लिए दुष्यंत कुमार जी की कुछ पंक्तियाँ- पीर पर्वत सी हुई अब ये पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकालनी चाहिए, मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए कोई हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, शर्त लेकिन है के ये सूरत बदलनी चाहिए|

vipul के द्वारा
July 29, 2010

चातक जी, मै आपसे पूरी तरह से सहमत हूँ। आरक्षण का आधार केवल और केवल आथिक होना चाहिए जैसे मुफ्त में कापी,  किताब देना चाहिए पर जहाँ बात प्रतिसप्रधा की हो, और जो देश के भविष्य की बात हो,वहाँ आरक्षण नहीं होना  चाहिए । मैं अपना  ही उदाहरण दूँ कि इस वर्ष मेरे भाई का IIT की परीक्षा में चयन नहीं हुआ ,जबकि उससे बहुत कम नंबर पाने वाले आरक्षणित छात्रों का हो गया । ये iit से पास होकर देश को किस तरफ ले जायेगे ? इनके बनाये हुए पुल, इमारते कहाँ तक भरोसेमंद होंगे ? क्या इस तरह से ये iit का स्तर नहीं गिरा रहे ? देश का वह संसथान जहाँ का नाम देश की प्रतिष्ठा से जुड़ा है, क्या ये इसके साथ एक मजाक नहीं है ? यदि ऐसा ही चलता रहा तो वो दीन दूर नहीं जब सवर्णों को भी आरक्षण देना पड़ेगा । इस मंच के माध्यम से चातक जी हमारे नेताओ को समझिए की की वोट और कुर्सी के लालच में देश के भविष्य से खेलना बंद करें ।  जय हिंद…

    chaatak के द्वारा
    July 29, 2010

    विपुल जी, जातिगत आरक्षण के प्रति ये असहमति ही है जिसकी ओर मैंने इस ब्लॉग में लोगों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की है| अगर जल्द ही इस पर ध्यान न दिया गया तो ये असहमति ही सामाजिक द्वेष और युवा असंतोष के कारण उत्पन्न होने वाली विभीषिका का कारन बन जायेगी| प्रतिक्रिया देने और उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए आपका धन्यवाद!

    http://jarjspjava.jagranjunction.com के द्वारा
    July 31, 2010

    jai hind vipul ji, can you give me name of anyone student who have got admission by reservation system and who demolish the name of country by doing something wrong there as student. If you see mostly student who do disgusting act at college campus be it with girls or with their peers or with their teachers are related from general or “sawarn” society. according to me it is absolutely wrong to point someone who have got admission on the basis of castism, coz anyone who got admission there would have some dreams and ability as well.. and it is like a blessing too for him to accomplish their dreams … suppose if your brother got good coaching that a poor or non-swarn people could not afford… and also he did some more hard work as well..that such person(non-swarn) did to get top place among own fellow competitor students. by the way whether s/he do something good or not depend on the performance displayed in various activities conducted at college, be it IIT or any locale col. I hope you would understand my point, and try to solve out the actual problem wtih co-operation of chatak jee, with regards and thanks of both of you! Nikhil Singh http://jarjspjava.jagranjunction.com

    chaatak के द्वारा
    July 31, 2010

    विपुल जी, निखिल जी ने आपसे कुछ सवाल पूछे हैं और मैं चाहता हूँ कि आप इनके जवाब दें ताकि चर्चा सही दिशा दी जा सके| हलाकि निखिल जी भी जातिगत आरक्षण के पक्ष में नहीं दीखते लेकिन तथाकथित सवर्ण छात्रों की नागवार हरकत की तरफ इन्होने ऊँगली जरूर उठाई है किसी वजह से अगर आपको उत्तर देने में असुविधा हो और आप chaahen तो मैं अपनी जानकारी के अनुसार निखिल जी कि जिज्ञासाओं और संदेहों का समाधान करने की कोशिश कर सकता हूँ|

    chaatak के द्वारा
    July 28, 2010

    Dear Anuradha ji, I will read this blog as soon as time permits me. Be always sure of me I have no intention to make any harm to a nice person like you.

Manoj Kumar Singh Mayank के द्वारा
July 27, 2010

chatak ji. i have throughly read out your blog centered about bloody reservation policy of indian government. i am totally agree with you.keep it up.good writings.

    chaatak के द्वारा
    July 27, 2010

    Manoj ji, It overwhelms me that you are totally agree with me. I assure you of my continuous efforts against the filthy politics of reservation. Thanks for the comment.

Amitkrgugpta के द्वारा
July 26, 2010

नमस्कार चातक जी ,मैंने आपका लेख पढ़ा .अपने सही कहा की आरक्षण ने हमारी व्यवस्था को चौपट कर दिया हैं.बेशक सही लिखा आपने.मैंने भी कुछ ब्लॉग लिखे हैं यदि समय मिले तो पढ़कर अपने सुझाव और शिकायतों से मुझे अवगत करावे. आप ब्लॉग पढ़ने के लिए इस add पर जा सकते हैं .www.amitkrgupta.jagranjunction.com

    chaatak के द्वारा
    July 26, 2010

    स्नेही अमित जी, वैचारिक समर्थन के लिए धन्यवाद मैं आपके लेखों को जरूर पढूंगा और शीघ्र ही पर्तिक्रियायें भी दूंगा| आइये इस परिवर्तन-यज्ञ में आप भी अपने विचारों की समिधा अर्पण कीजिये|

bhaijikahin by ARVIND PAREEK के द्वारा
July 26, 2010

आपकी ये पंक्तियां सोचने पर विवश कर देती है – दीगर बात ये है कि जिस देश का संविधान अपने आपको धर्म-निरपेक्ष, पंथ-निरपेक्ष और जाति-निरपेक्ष होने का दावा करता है उस देश में जातिगत और धर्म पर आधारित आरक्षण क्या संविधान की आत्मा पर ही कुठाराघात नहीं है| एक धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र में आरक्षण का सिर्फ एक आधार हो सकता है वो है आर्थिक आधार लेकिन दुर्भाग्य वश ऐसा नहीं है| यहाँ तो एक भेंड-चाल है कि जो बहुसंख्यक (हिन्दू) के विरुद्ध सांप्रदायिक आग उगले उसे धर्म-निरपेक्ष कहा जाता है, जो जाति और वर्ग के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था देता है उसे जाति-निरपेक्ष कहा जाता है| आपने बहुत सटीक बात लि‍खी है । कितनी अजीब बात है कि इस देश में संविधान का शासन हैं और संविधान पहले के कुछ अनुच्‍छेदों में समानता की बात करता है और बाद में कुछ अनुच्‍छेदों में उसी समानता को उखाड़नें व भेदभाव बढ़ानें की व्‍यवस्‍था कर देता हैं । पता नहीं इस विषय पर कोई सोचता क्‍यों नहीं है । मैं के.एम. मिश्रा जी की टिप्‍पणी से भी सहमत हूँ । लोग दोष उसका नहीं देखते जो दोषी होता है बल्कि उसे दोषी मानते हैं जिसे शोर मचा कर दोषी बता दिया जाता है । इसलिये सही दोषी कौन है सभी भ्रम में है व जानकर भी अनजान है । अरविन्‍द पारीक

    chaatak के द्वारा
    July 26, 2010

    प्रिय अरविन्द जी, आपके वैचारिक समर्थन के लिए शुक्रिया| मुझे आपसे ऐसी ही प्रतिक्रिया की उम्मीद थी क्योंकि भाइजी से बेहतर जनमानस की समझ कम ही लोगों के पास है ये कहते हुए मुझे बड़ी ख़ुशी होती है कि आप किसी भी लोकसमस्या की पलक झपकते पड़ताल करने की जबरदस्त काबिलियत रखते हैं| इन जानबूझ कर अनजान बनने वालों का भ्रम तोड़ने के लिए हमें आगे बढ़ना ही होगा|

Anuradha Chaudhary के द्वारा
July 25, 2010

प्रिय चातक जी आपने एक ऐसा मुददा उठाया जिस पर हमारा आपका कोई वश नही है। जागरण जंकशन ऐसा मंच है जिसका प्रयोग हम आप जन जागरूकता पैदा करने के लिये कर सकते है। हमे नेताओं पर आरोप लगाने के बजाय ऐसा प्रयास करना चाहिए जिससे एक वेहतर समाज का निर्माण किया जा सके। आरक्षण राजनैतिक लोगों की राजनीति का पसंदीदा विषय बन गया है और हम लोग इस पर चर्चा करके उसे और महत्वगपूर्ण बना देते हैं। समाज मे तीन मुददे ऐसे है जिन पर चर्चा किया जाना आवश्य क है यदि आप लोग सहमत तो इन विषयों पर चर्चा शुरू की जाय। ये विषय है बढती जनसंख्या ; मुकदमेवाजी और समाज मे वैज्ञानिक द़ष्टिकोण का अभाव। यदि इन विषयों पर चर्चा को आगे बढाना है तो आइये साथ साथ बढें। अनुराधा चौधरी यू0पी0 उदय मिशन से।

    chaatak के द्वारा
    July 26, 2010

    स्नेही अनुराधा जी, अगर मुद्दा मानवीय है तो हमारा पैदा किया ही होगा और हमारा पीड़ा किया है तो उसका समाधान भी हम निकाल लेंगे| जब तक कोई चीज़ अतिमानवीय साबित न हो जाए मैं उसे वश के बाहर नहीं मानता और मुझे हमेशा मुश्किल से मुश्किल प्रयासों में अंततः सफलता जरूर मिली है| देखिये आप स्वयं भी दूसरी ही लाइन में लिखती हैं कि हम एकजुट होकर बेहतर समाज के निर्माण के लिए चर्चा कर सकते है| निश्चित ही चर्चा से आपका उद्देश्य एक सही हल तलाश करने से होगा न कि कारवाही को विलंबित कर के मामला अटकाए रखने का इसका मतलब यही है कि सफलता कहीं न कहीं जरूर हमारा इंतज़ार कर रही है| विषय आपने अच्छे चुने हैं लेकिन एक त्रुटी है ये सारे ही गौड़ हैं और किसी का व्यक्ति के अस्तित्व से दूर-दूर तक नाता नहीं है जबकि आरक्षण अस्तिव पर मंडरा रहा संकट है जो अभी तो अनारक्षित युवाओं पर घुमड़ रहा है लेकिन कल इसकी दिशा युवा असंतोष की ओर होगी| वैसे भी जब युवा बेरोजगार होगा तो बेचारे के पेट में अन्न जाएगा नहीं जब दम ही नहीं होगा तो जनसँख्या कैसे बढ़ाएगा, मुकदमा लड़ने के लिए फीस चुकानी पड़ती है हमारे के.एम्. मिश्र जी तो फीस की उधारी भी कर दें लेकिन अदालत की कोर्ट फीस ये बेरोजगार चूका पाएंगे तब तो मुकदमा लड़ेंगे, रह गई बात वैज्ञानिक सोच की तो उसमे आरक्षण लागू है आरक्षण के बल बूते आया मास्टर विज्ञानं की परिभाषा तक नहीं जानता और जहाँ अच्छे अध्यापक हैं वहां आरक्षण इन युवाओं को पहुँचने नहीं देता| अनुराधा जी, आप चूंकि behtari का विचार रखती हैं इसलिए आपसे निवेदन है कि समस्याओं पर विचार करने में हमारे साथ कदम मिलाइए आपसे वादा है कि आपको ‘समस्या पर वश नहीं’ जैसी निराशा से मुक्ति मिलेगी| प्रतिक्रिया का शुक्रिया! आशा है आप हमारा साथ देंगीआखिर मैं और आप मिलकर ही तो हम बनाते हैं|

    Deepak Jain के द्वारा
    July 26, 2010

    अनुराधा जी माफ़ी चाहूँगा परन्तु आज समाज में मात्र ये तीन मुद्दे ही नहीं जिनपे चर्चा की जरुरत है बल्कि आज कई ऐसे मुद्दे हैं जैसे महिलाओं का शोषण, नशाखोरी का बढ़ता प्रचलन और भी ऐसे बहुत से मुद्दे हैं जिनपर चर्चा की जरुरत है और एक बात और हर मुद्दों पर हमारा वश है और चातक जी ने जो ये मुद्दा उठाया है ये बिलकुल सही है

    Anuradha Chaudhary के द्वारा
    July 27, 2010

    Dear Chatak ji government job are for those persons who are incompetent. inteligentia has no limitations.Inteligentia is now prefering private sector.they are getting better salaries than government officials.

    chaatak के द्वारा
    July 27, 2010

    Anuradha ji, You are absolutely right. I don’t object to what you say. I am not saying about the intelligentsia but about the average people. Intelligentsia is not the suffering class. The suffering class does not belong to it. But I find you have some thoughts about this very problem which has been discussed in the blog. Why don’t you come along us and make the whole group of ours benefited by your thoughts. Actually we need you because you can stand strong with us to attain a good solve of this problem. At least I believe so. Thanks for the consideration once again!

    chaatak के द्वारा
    July 27, 2010

    प्रिय दीपक जी, आपके वैचारिक समर्थन से बड़ा बल मिला| देर से धन्यवाद कहने के लिए माफ़ी चाहता हूँ| असल में कमेन्ट बीच में था अभी अनुराधा जी के कमेन्ट को देखा तो बड़ी ग्लानि हुई कि आपका शुक्रिया अदा नहीं कर पाया| आशा है आपका सहयोग इसी तरह मिलता रहेगा|

    Anuradha Chaudhary के द्वारा
    July 28, 2010

    चातक जी आपने लिखा कि मेरे सारे ब्लाग पूर्वाग्रहों का पुलिन्दा हैं। हर व्यपक्ति को अपने विचार सबसे अच्छे लगते है केवल अच्छे समालोचक ही उसको उसकी सही स्थिति का एहसास कराते है। मै समझती हू कि मेरे विचार प्रचलित सामसामयिक मूल्यों के अनुरूप नही है लेकिन देश का भविष्य इन्हीह रास्तो पर चलकर सुधारा जा सकता है। क़पया मेरा पहला ब्लाग पडे और उस पर अपनी प्रतिक्रिया दें। जब मैने अपने विचार व्यक्त किये थे उस समय कोई मेरे साथ नही था लेकिन आज वही बात सौ फीसदी सही सावित हो रही है।

    chaatak के द्वारा
    July 28, 2010

    अनुराधा जी, माफ़ी चाहूंगा मुझे भी इस बात का अहसास था कि मैंने कुछ गलत लिख दिया है क्योंकि उस समय मैं जागरण ब्लॉग के एक समूह ‘SKCC’ पर लिखा ब्लॉग ‘तन ढकने तक का पैसा नहीं, फिर भी कालेज में पढ़ती हूं’ पढ़ रहा था और मैंने देखा कि इस पर ज्यादातर ब्लॉग बिलकुल अटपटे हैं| आपकी प्रतिक्रिया आई तो मैं समझा आप उसी ग्रुप की ब्लोगर हैं और मैंने एक तल्ख़ प्रतिक्रिया कर दी| चूंकि प्रतिक्रिया के बिना आपके संज्ञान में आये संशोधित करना उचित नहीं था इसलिए मैंने वो पंक्ति नहीं हटाई| हलाकि अभी तक मैं आपके ब्लॉग नहीं पढ़ पाया हूँ लेकिन जल्द ही उन्हें भी पढूंगा क्योंकि मुझे लगता है कि आपके पास कुछ तो ऐसा है इसकी जरूरत युवा वैचारिक आन्दोलन को है| आशा है आप बात को अन्यथा नहीं लेंगी| स्पष्ट बात रखने का शुक्रिया आप का सदैव स्वागत है| Regards Chaatak

RASHID के द्वारा
July 25, 2010

चातक जी , आरक्षण, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिक उन्माद, धार्मिक भेदभाव,,, यह समस्याए आतंकवाद से कही बढ कर है,, परन्तु जिनकी ज़िम्मेदारी इनको ख़त्म करने की है दुर्भाग्य से वह लोग ही इन सब के ज़िम्मेदार है !! मुझे भी याद है मंडल आयोग वाले दिन हम कानपूर के christ church इंटर कॉलेज में पढते थे, यहाँ का बड़ा चौराहा जहाँ कई कॉलेज है बस एक युद्ध का मैदान बना रहता था छात्रों और पुलिस के बीच, पुलिस निर्दयिता दे मासूम छात्रों को पीटती थी !! फिर इसके फ़ौरन बाद रथ यात्रा निकाली गयी और आरक्षण की आग को साम्प्रदायिकता में बदल दिया गया और भगवान् राम के नाम पर पुरे देश को जला दिया गया !! न मंडल वालो को dalito से कोई प्यार था न रथ यात्रा वालो को भगवान् राम से, बस दोनों ने देश को जला कर अपना सत्ता पाने का प्रयास किया !! मेरी दुआ है की वह भयानक दौर (1990 -1991 -1992 -1993 ) फिर किसी को न देखना पड़े जब अपने साये से भी डर लगता था !! http://rashid.jagranjunction.com

    chaatak के द्वारा
    July 25, 2010

    राशिद जी, आपकी बात में १६ आने सच्चाई है जिस तरह का दमन मंडल आयोग का विरोध करने वाले युवाओं का हुआ क्या वो बरतानिया हुकूमत की ही तरह का शासन नहीं दिखाती है? फिर क्या अच्छा हुआ राष्ट्र के स्वतंत्र होने से? आम आदमी की आवाज पहले गोरे अंग्रेजों ने दबाई और फिर ये काले अँगरेज़ हावी हो गए| रथ यात्रा ने निःसंदेह दोनों कौमों को लड़ाकर अपना उल्लू सीधा किया, जबकि ये मामला सीधे कानूनी लड़ाई का था अदालत को निष्पक्ष रहते हुए फैसला देना था जिसमे किसी प्रकार का कोई राजनीतिक ध्येय न हो| लेकिन वाही हिन्दुस्तान भेडिया-धसान| मूढ़ (अ)न्यायाधीश किसी निष्कर्ष तक न पहुंचे थे न पहुंचे हैं क्योंकि ये इन्ही गिरगिट राजनेताओं के हाथों का खिलौना है| खैर बात आरक्षण की हो रही है और निश्चय ही हर युवा इस दर्द का साझीदार है तो क्यों न एक साझा प्रयास करके लोकतंत्र की मर्यदानुरूप एक फैसला करने पर इन्हें विवश कर दिया जाए?

kmmishra के द्वारा
July 25, 2010

आरक्षण को जिस उद्देश्य के लिये संविधाननिर्मात्री सभा ने संविधान में डाला था वह न तो पूरा हुआ और न ही पूरा होता दिखाई पड़ रहा है । आज सिर्फ यह एक वोट काटने की मशीन भर बन कर रह गया है । अफसोस कि जिन लोगों को वाकई में आरक्षण की जरूरत है उनमें से 10 प्रतिशत को भी इसका लाभ नहीं मिला । 50-60 प्रतिशत ऐसे जरूरतमंद बच्चे तो कक्षा पांच से दस तक में ही स्कूल छोड़ देते हैं । अनुसूचित जाति, अनुसुचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिये किये आरक्षण को उनकी ही जाति के आर्थिकरूप से सम्पन्न लोग दबोच लेते हैं । माननीय सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर को पिछले साल परिभाषित किया जिसमें ढाई लाख से ऊपर की आमदनी वालों को इस वर्ग में डाला गया । तमाम आई ए एस, पी सी एस, अधिकारी, प्रोफेशनल्स, नेता, मंत्री वगैरह को क्रमीलेयर मे शामिल किया गया तो यूपीए सरकार ने कानून बनाकर वेतन की सीमा 5 लाख तक बढ़ा दी । जब सरकार और विधायिका में बैठे लोग ही इस मुद्दे को लेकर इमानदार नहीं हैं तब बचता ही क्या है । एक सोची समझी साजिश है करोड़ों लोगों को अनपढ़ रख कर उनका वोट लूटने की और उनको सड़ने के लिये छोड़ देने की । तकरीबन पचास साल एक पार्टी की सरकपार ने भारत पर राज किया और कर रही है । देश और देशवासियों की इस हालत के लिये और कौन जिम्मेदार हो सकता है ?

    chaatak के द्वारा
    July 25, 2010

    मिश्र जी, मुझे पता था कि आप आरक्षण की राजनीतिक साजिश का कोर्ट-मार्शल सबसे अच्छे तरीके से करेंगे| अब पानी सर से ऊपर हो रहा है इस खेल का अंत होना ही चाहिए कब तक तुगलकी निर्णयों के नाम पर संविधान की आत्मा पर चोट को बर्दाश्त किया जायेगा| अब इस साजिश का पर्दाफाश होना ही चाहिए|

    kmmishra के द्वारा
    July 25, 2010

    1947 में देश की आबादी थी 33 करोड़ और गरीब थे 2 करोड़ । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आर्थिक सलाहकार है प्रो0 अर्जुनसेन गुप्ता उनकी 2006 की रिपोर्ट है ‘भारत में 80 करोड़ लोग आज 20 रूपये प्रतिदिन भी नहीं कमा पा रहे है ।’ 1947 से 2010 तक में आबादी बढ़ी तीन गुना और गरीबी बढ़ी  40 गुना । यानी गरीबी का आबादी से कोई सम्बन्ध नहीं है । इसका सम्बन्ध है सत्ता के दलालों से जिन्हें सिर्फ अपनी स्व्सि बैंक की तिजोरी की चिंता है और उन्हीं को हम साल दर साल चुनते आते हैं । सरकारी सड़े हुये आंकड़ों का सच जानने के लिये पढ़े मेरा व्यंग ”रिक्शेवाले की जुबानी, देश की कहानी । “

    chaatak के द्वारा
    July 26, 2010

    प्रिय मिश्र जी, मैंने आपका ब्लॉग ”रिक्शेवाले की जुबानी” पढ़ा बिलकुल सही और सटीक आंकड़ों के साथ प्रहार किया है आपने| ये व्यंग गिरती हुई नैतिकता से लेकर सामाजिक आतंकवाद (आरक्षण) तक की बड़ी ही स्पष्ट तस्वीर प्रस्तुत करता है| मुझे बड़ी ग्लानी हुई कि अभी तक मैंने आपकी साड़ी पोस्ट पढ़ी क्यों नहीं| जल्द ही सारी पोस्ट पढ़कर अपनी राय दूंगा|

deepika के द्वारा
July 25, 2010

संत कबीर जी ने कहा है, \\"जाती न पूछो साधू की , पूछ लीजिये ज्ञान\\" Franklin D said The test of our progress is not in whether we add to the abundance of those who have much, it is then when we do for them who have little. ऊपर लिखी दोनों पंक्तियों से मेरा आशय यह है की या तो आरक्षण ही न हो सभी को सामान अधिकार मिले उनके ज्ञान के आधार पर युवाओं को रोजगार और छात्रों को उच्च शिक्षा का अवसर मिले न उन्हें जातिगत और धार्मिक आधार पर | और यदि आरक्षण की नीति को क्रियान्वित करना है तो उसका आधार जाति न होकर आथिक स्थिति होना चाहिए | हम कैसे कह सकते है जातिगत आरक्षण देकर ये नेता जनहित कर रहे है बल्कि ये तो सिर्फ अपने वोटों की संख्या बढाने के लिए देश को जातिगत आधार पर बाँट रहे है यदि हम हमारी मुख्यमंत्री शाहिबाकी बात करें तो वो खुद को दलित बताती है तो क्या उन्हें या उनके परिवार को आरक्षण की जरूरत है क्या गरीबी जाति देख कर आती है क्या सभी अल्पसंख्यक दबे कुचले और गरीब है जिससे कि वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने में वे असमर्थ्य है तो फिर जाति के आधार पर आरक्षण देकर क्यूँ सवर्ण समाज को ही दबा और कुचला बनाने कि साजिश है | चातक जी आपका लेख बहुत ही विचारणीय है और हम उनमे से है जो किसी गलत शाजिश के आगे घुटने टेकने में नहीं बल्कि शमशीर उठने में है

    chaatak के द्वारा
    July 25, 2010

    दीपिका जी, हिंदी हैं हम वतन हैं हिन्दोस्तां हमारा, जब तक हम हैं जब तक आप हैं और जब तक हमारे अन्दर हिन्दुस्तानी खून की एक भी बूँद हमारे जिस्म में मौजूद है हम अपने राष्ट्र की अस्मिता की रक्षा के लिए और इसे बांटने वाले हर विचार का विरोध करने के लिए संघर्ष करते रहेंगे|

Arunesh Mishra के द्वारा
July 25, 2010

स्याह रात नही लेती नाम थमने का….. ऐ सूरज यही तो वक्त है तेरे निकलने का….

    chaatak के द्वारा
    July 25, 2010

    अरुणेश जी, बिलकुल ठीक कहा आपने यही वक्त है सूरज निकलने का| हाथ बढ़ाएँ कदम मिलाएं फिर एक बार सवेरा लायें, जात-पात की बात न पूछें हिंदी बस हिंदी बन जाएँ | प्रतिक्रिया एवं वैचारिक प्रतिबद्धता का शुक्रिया!

anju के द्वारा
July 24, 2010

चातक जी …आज वास्तव मैं ही हमारे युवा वर्ग को मिल कर इस आरक्षण रूपी दीमक को जो की हमारे यूवा समाज को भीतर से खोखला कर रहा है को मिटने के लिए एक जुट होने की जरूरत है ….. एक बहुत बढ़िया लेख ….

    chaatak के द्वारा
    July 25, 2010

    अंजू जी, आपकी प्रतिक्रिया इस बात का प्रमाण है कि आरक्षण के प्रति असंतोष कितने गहरे बैठा हुआ है और इसका शिकार सिर्फ युवा ही है| सरकार शायद एक बात भूल रही है कि युवा असंतोष उनके लिए किस कदर घातक हो सकता है| हमें सिर्फ इस बात का अहसास कराना होगा आशा है कि सभी युवा हर कदम साथ होंगे| प्रतिक्रिया का शुक्रिया !

R K KHURANA के द्वारा
July 24, 2010

प्रिय चातक जी, अज की परिस्थितियां बदल गईं है परन्तु राजनीति के चलते नेता लोग पुराने ढर्रे पर ही चल रहे है ! आज इस निति को बदलने की जरूरत है ! राम कृष्ण खुराना

    chaatak के द्वारा
    July 24, 2010

    चाचाजी, आप वरिष्ठ लोग बस समर्थन और आशीर्वाद बनाए रखिये, व्यवश्ता पूरी तरह बदलेगी इसका वादा आपसे हम करते हैं| हम गन्दी नीतियों के बीच पाले-बढे जवान हुए हैं लेकिन अगली पीढी को इस दलदल में छोड़ कर नहीं जायेंगे| ये राजनीती चंद पढ़े-लिखे लोगों की अगुआई में शुरू हुए नक्सली आन्दोलन को नहीं झेल पा रही है| जब सारी लियाकतो से लैस युवा आन्दोलन करेगा तो ये कौन सी खोह में छिप के खुद को बचायेंगे| प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

Nikhil के द्वारा
July 24, 2010

आपकी हर बात से अक्षरशः सहमत हूँ चातक जी. अच्छा विचार.

    chaatak के द्वारा
    July 24, 2010

    निखिल जी, इसी तरह हम एक-एक करके यदि साथ आवाज उठाएंगे तो परिवर्तन जरूर होगा| इतिहास गवाह है कि जब-जब दमन हुआ है हमारी एकता को पहले से ज्यादा बल मिला है| हमारे और आपके दिलों की साझी वेदना ही नई शुरुआत का शपथपत्र है|

allrounder के द्वारा
July 24, 2010

चातक जी ये आरक्षण भी हमारी वर्ण व्यवस्था द्वारा हम भारतियों को दिया हुआ ऐसा दीमक है जो सदियों तक हमारी पीढ़ियों को खोखला करता रहेगा ! और कहीं न कहीं समाज के लोगों को बांटा रहेगा !

    chaatak के द्वारा
    July 24, 2010

    आलराउंडर जी, निराशा की बात क्यों करते हैं? हम आरक्षण की बेड़ियाँ पहन कर जवान जरूर हुए हैं लेकिन इसे अगली पीढ़ी को विरासत में देकर नहीं जायेंगे| या तो व्यवस्था सही रास्ते पर आएगी या फिर हम पूरी व्यवस्था को आमूल-चूल उखाड़कर नई व्यवस्था स्थापित कर के जायेंगे| क्या विश्वास नहीं खुद पे?

roshni के द्वारा
July 24, 2010

आप ने सच कहा मेरे भी यही विचार है की आरक्षण का आधार जाति धर्म नहीं बल्कि आर्थिक आधार होना चाहिए .. आज हम general category के लोग एक अच्छी नौकरी भी नहीं पा सकते और वो भी आरक्षण के कारन , कोई जॉब के लिए aaply करते वक़्त भी हम लोगों को ही ज्यादा फीस चुकानी पडती है.. अब एक तो बेरोजगार ऊपर से इतनी फीस कहा से चुकाए…. और आरक्षण होने के कारन १०० मे से ९० सीटे reserve होती है … अब तो लगता है हम लोग खुद मिनोरिटी मै आ गए है … तो क्यों न इसी आधार पर हमे भी आरक्षण मिल जाये…

    chaatak के द्वारा
    July 24, 2010

    रौशनी जी, आपके कमेन्ट से ही आज के सवर्ण युवा वर्ग की मानसिक हालत का अंदाजा लगाया जा सकता है| हमें आरक्षण नहीं बराबर की प्रतिद्वंदिता चाहिए लेकिन हालात ये हैं कि प्रतिस्पर्धा में हमें हाथ पैर बेड़ियों में जकड कर लड़ाया जाता है जबकि प्रतिद्वंदी को जाति की ढाल और आरक्षण की तलवार पकड़ा दी जाती है| इतना होने के बावजूद हम हर जगह अपनी उपयोगिता सिद्ध कर रहे हैं| मेरा विरोध इसी असमानता पर है|

Deepak Jain के द्वारा
July 24, 2010

चातक जी जैसा की सभी जानते हैं कि भारतीय संविधान के अनुसार समस्त भारतियों को समानता का अधिकार प्राप्त है परन्तु आज राजनितिक पार्टियाँ अपने लाभ के लिए लगातार आरक्षण को कम करने कि बजाये लगातार इसको बढ़ावा दे रही हैं और इसका आधार जाति और धर्म को बनाया जा रहा है आज भी हमारे देश में ऊँचे वर्ग में कई ऐसे लोग हैं जिनके आर्थिक हालत बहुत कमजोर हैं इसी लिए आरक्षण आर्थिक स्थिति के आधार पे होना चाहिए परन्तु पता नहीं कब सूरज निकलेगा और कब ये अँधेरा छंटेगा

    chaatak के द्वारा
    July 24, 2010

    दीपक जी, इसी तरह यदि मुखर होकर सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस सरे युवा इकठ्ठा कर लें तो एक हुंकार भरने से ही भ्रष्ट व्यवस्था सूखे पत्तों की तरह थर्रा उठेगी| दिल में विश्वास रखिये आपकी आवाज़ भी हर मजबूर के हालात बदलने वाली आवाज़ हो सकती है|

rajkamal के द्वारा
July 24, 2010

जब जब जो होना था  तब तब वो ही तो मेरे यार हुआ… जब किस्मत हमारी में यही लिखा था तो किसी से क्या गिला…

    chaatak के द्वारा
    July 24, 2010

    राजकमल जी व्यवस्था तो बदलेगी और इसे बदलना ही होगा| आप किस्मत को दोष मत दे याद रखें- “कमी सितारों में नहीं हमारे कर्मो में होती है जो हम गुलामों का जीवन जीने के लिए विवश होते हैं” आपके लिए दो पंक्तिया- “खुदी को कर बुलंद इतना, के हर तकदीर से पहले, खुदा बन्दे से खुद पूछे- बता, तेरी रजा क्या है?”

    gauravbimtech के द्वारा
    July 25, 2010

    चातक जी बड़ा ही अच्छा विषय चुना है | ज्यादा कुछ तो नही कहूँगा क्यों कि सदैव कि भांति आज भी आपने गागर में सागर भर दिया है | परन्तु एक प्रश्न है बस वही पूछना चाहूँगा समाज के उन सुधारको से जो समर्थन करते है इस आरक्षण का कि हम उनका कल्याण कर रहे है या जाति के नाम पर आज भी उन्हें ये बता रहे है कि आजादी के ६० वर्षो बाद भी वो सवर्णों से नीचे ही है आरक्षण कि भीख से बेहतर होगा कि वो उन्हें हर जगह बराबर अवसर प्रदान कर ये सिद्ध करने का मौका दें कि वो भी ईश्वर कि एक रचना है और वो किसी भी रूप में सवर्णों से पृथक नही| इस प्रकार शायद हम एक हो सकें और वास्तविकता में समाज कल्याण हो सके |

    chaatak के द्वारा
    July 26, 2010

    गौरव जी, वैचारिक समर्थन का शुक्रिया! आपके किसी सवाल का कोई जवाब राजनेताओं के पास नहीं है| बिलकुल सही संज्ञा दी है आपने आरक्षण को लेकिन मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर कोई आपको ये जवाब दे कि “आरक्षण भीख नहीं अधिकार है” क्योंकि तिकड़म-बाजों की कोई कमी नहीं है इस समय| हमारा उद्देश्य समता और समानता है जिसके लिए हम संघर्ष को तत्पर हैं|


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