चातक

आओ खोजें हिंदुस्तान

123 Posts

4032 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 1755 postid : 66

सात कहानियाँ (किताबी कीड़े ना बने)

Posted On: 6 Jul, 2010 Others में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

प्रिय के.एम. मिश्र जी की फरमाइश पर :
आज बहुत दिनों के बाद फिर कुछ लिखने बैठा हूँ | विचारों का प्रवाह किसी भंवर की तरह फिर मंथन कर रहा है शायद सारी बातें लिखना इतना आसान ना होगा फिर भी कोशिश है कि सम्पूर्ण विचारों का एक अंश मात्र ही लिख सकूँ तो बेहतर होगा | आज सिर्फ कहानी सुना कर इतिश्री नहीं होगी बल्कि प्रयास होगा कि इस कहानी का नैतिक ज्ञान प्रत्येक पाठक तक समुचित रूप में पहुँच सके |

सर्वप्रथम तो मैं एक भ्रम पर विराम लगा देना मुनासिब समझूंगा जो आपको लेख (कहानी) का शीर्षक पढकर हो सकता है | किताबी कीड़ा ना बनने से मेरा तात्पर्य पुस्तकों का त्याग करना नहीं अपितु पुस्तकों को ही समग्र सत्य मानकर सहज-बुद्धि का परित्याग करने से बचना है |

एक छोटा सा गाँव था गाँव का नाम क्या था इससे हमारी कहानी का कोई लेना देना नहीं है | ये एक न्यायी राजा के राज्य का हिस्सा था | राज्य व राजा का नाम भी हमारी कहानी का हिस्सा नहीं है | अब चलते हैं मतलब की बात पर | इस गाँव में एक किसान के घर एक होनहार बालक का जन्म हुआ | किसान ने उसकी प्रतिभा को देखकर उसे काशी पढ़ने भेज दिया | समय बीतता गया और एक दिन वो बालक एक युवा आचार्य बनकर पुनः गाँव वापस आया |
एक दिन प्रातः काल आचार्य जी स्नानादि करने के पश्चात सूर्य-अर्घ्य दे रहे थे | अर्घ्य देते समय उन्होंने बुदबुदाते हुए प्रार्थना की-
“प्रीती बड़ी माता की, और भाई का बल ;
ज्योति बड़ी किरणों की, और गंगा का जल ||”
आचार्य जी का इतना कहना क्या के पास से गुजरती धोबन ने अपने गधे को एक जोरदार डंडा मारा और कहा -
“चल गधे ! एक गधे की बात को क्या सुनता है !” आस पास खड़े लोग हंस पड़े |

आचार्य जी ठहरे पढ़े-लिखे विद्वान और एक अदना सी धोबन ने खुले आम गधा कह कर अपमान कर दिया | अत्यंत मर्माहत से आचार्य ने ना कुछ खाया ना पिया दिन भर गुमसुम से एकान्तवास लिए सोचते रहे | जाने कब रात हुई, जाने कब फिर सुबह हुई पता ना चला | पौ फटने को थी तब तक कुछ निर्णय लेते हुए जल्दी से नित्य क्रियाओं से निवृत्त हुए और चल पड़े राजप्रासाद की ओर | दोपहर चढ़े आचार्य जी राजा के सम्मुख प्रस्तुत थे | राजा ने जब विद्वान का परिचय जाना तो ससम्मान आसान दिया और पधारने का कारण जानना चाहा | आचार्य जी ने अपनी पीड़ा कह सुनाई | राजा ने कहा “यदि उस गँवार नारी ने आपका असम्मान किया है तो उसे दंड जरूर मिलेगा |”
धोबन को राजदरबार में बुला-भेजा गया | दूसरे दिन फिर सभा लगी |
राजा ने धोबन से पूछा “क्या तुमने आचार्य जी को गधा कहा ? ”
धोबन ने जवाब दिया “नहीं सरकार मैं इतने बड़े विद्वान को भला गधा कैसे कह सकती हूँ |”
आचार्य जी बोले “क्या तुमने अपने गधे को मारते हुए ‘चल गधे ! एक गधे की बात को क्या सुनता है !’ नहीं कहा था |
धोबन : जी वो तो आपकी बात सुन के कहा था |
राजा : कौन सी बात ?
धोबन : आप आचार्य जी से ही पूछ लीजिए |
राजा : आचार्य जी क्या आप अपनी बात दोहराएँगे ?
आचार्य जी : “प्रीती बड़ी माता की, और भाई का बल ; ज्योति बड़ी किरणों की, और गंगा का जल ||
राजा : बात तो बिलकुल सही है | माँ से ज्यादा स्नेह किसी का नहीं हो सकता | भाई के समान कोई दूसरा बल नहीं होता | सूर्य की किरणों से ज्यादा कोई रौशनी नहीं दे सकता | और गंगा सा कोई जल संसार में नहीं | इसमें गधे जैसी कौन सी बात है | तुमने तो इस बात पर आचार्य जी को गधे के समान कह कर बड़ी मानहानि की |
धोबन : महाराज आचार्य जी की बात सिर्फ सत्य प्रतीत होती है परन्तु है नहीं |
राजा : अच्छा ! तो सही क्या है ?
धोबन : महाराज !
“प्रीति बड़ी त्रिया (स्त्री) की ; (क्योंकि बात अगर पिता और पुत्र में फंसे तो माँ पुत्र का कभी साथ नहीं देगी परन्तु पत्नी किसी भी हाल में साथ होगी)
और बाहों का बल | (जब बैरी अकेले में घेर लेगा तो भाई जब जानेगा तब जानेगा लेकिन वहाँ अपनी बाहों का बल ही काम आएगा )
ज्योति बड़ी नैनो की, (जब आँख ही ना हों तो क्या सूरज की किरणों की रौशनी और क्या अमावस का अँधेरा सब बराबर है )
और मेघा का जल | (गंगा जी पवित्र भले ही हैं लेकिन वे ना तो जन-जन की प्यास बुझा सकती हैं ना ही सभी खेतों में फसलों की सिंचाई कर सकती हैं)
बस यही सोच कर मैंने कहा ‘चल गधे ! एक गधे की बात को क्या सुनता है !’ क्योंकि इनका यह पुस्तकीय ज्ञान हमारे लिए सही बिलकुल भी मिथ्या है जिसकी जरूरत मेरे गधे को भी नहीं है |
राजा : आचार्य जी, अब आप क्या कहते हैं ?
आचार्य : महाराज मुझे इस बात की समझ आज हुई है कि सिर्फ पुस्तकीय ज्ञान संपूर्ण ज्ञान नहीं होता | अभी बहुत कुछ शेष है जो मुझे अपने बुजुर्गों और व्यवहारिक जीवन का ज्ञान रखने वाले अनपढ़ परन्तु बुद्धिमान लोगों से सीखना शेष है |
पाठकों कहानी तो यहाँ समाप्त होती है लेकिन इसमें छिपी दसियों सीख समझने के बावजूद कहीं अधिक और गहराई में दबा देखता हूँ | आशा है आप उन चीजों को भी खोज पायेंगे |

| NEXT

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (32 votes, average: 4.56 out of 5)
Loading ... Loading ...

35 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

KHATANA के द्वारा
June 12, 2013

जितनी तारीफ करू उतना कम है    धऩयवाद…

    chaatak के द्वारा
    June 14, 2013

    कहानी को पसंद करने का हार्दिक धन्यवाद!

Rakesh KUmar के द्वारा
May 2, 2012

This is story is full of knowledge. we should always learn from the experienced person, it no matter whether he has degrees or not. Thanks & regards Rakesh Kumar

Rajkamal Sharma के द्वारा
March 28, 2011

प्रिय चातक जी ….नमस्कार ! आप की यह कहानी असल में ही किताबी ज्ञान के साथ -२ व्यावहारिक ज्ञान की जरूरत की तरफ इशारा करती है ……और यह ज्ञान हमेशा से ही अपनी उपयोगिता सिद्द करते हुए हम लोगों को कभी ना भूलने वाले पाठ पढ़ा जाता है ….. आदि शंकराचार्य जी को भी तो इस ज्ञान की जरूरत पड़ गई थी शाश्त्रार्थ करते हुए .. is naitik gyaan dene wali कहानी के लिए बधाई

    chaatak के द्वारा
    March 29, 2011

    प्रिय राजकमल जी, आपकी इतनी अच्छी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद| इस कहानी का मर्म और इसके पीछे छिपी नैतिक शिक्षा हमेशा से उपयोगी रही है और आशा है हम इसे इसी तरह समझते और अंगीकार करते रहेंगे|

sikandar khan के द्वारा
March 24, 2011

अतिसुन्दर प्रस्तुति चातक जी एक बेहतरीन सीख देने वाली कहानी से रूबरू करवाया एक इस मंच आकर अपने विचार व्यक्त करें http://www.forums.abhisays.com

    chaatak के द्वारा
    March 28, 2011

    स्नेही सिकंदर जी, आपने इस कहानी को पढ़ा और अपनी राय दी इसका बहुत बहुत धन्यवाद! अभी व्यस्तता के कारण नियमित रूप से मंच पर उपस्थित नहीं हो पा रहा हूँ शीघ्र ही जे. जे. पर नियमित होने की कोशिश करूंगा और साथ ही आपकी बताई लिंक पर भी प्रयास करूंगा |

amitkrgupta के द्वारा
August 4, 2010

नमस्कार चातक जी, आपका यह लेख मैंने पढ़ा .सही मायने में किताबी ज्ञान और व्यवाहरिक ज्ञान में काफी अंतर हैं. जो बाते हम किताबो में पढ़ते हैं लगभग वैसी बाते प्रक्टिकल लाइफ में काफी मुस्किल होती हैं .आप मेरे ब्लॉग पढ़ने के लिए मुझे इस add पर follow कर सकते हैं . http://www.amitkrgupta.jagranjunction.com .

    chaatak के द्वारा
    August 4, 2010

    अमित जी, कहानी आपको पसंद आई ये जानकार बड़ी ख़ुशी हुई| आपकी पोस्ट पढ़कर शीघ्र अपनी राय से अवगत कराऊंगा| प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद!

soni garg के द्वारा
August 1, 2010

चातक जी आज अपने ऊपर पछतावा हो रहा है की आपको लगातार नहीं पढ़ सकी आज आपकी ये कहानी पढ़ी जो बहुत अच्छी लगी सच है किताबी ज्ञान से ज्यादा व्यवहारिक ज्ञान ज्यादा ज़रूरी है जिसकी मुझे अपने परिवार में सीख मिलती रहती है ! मैं एक व्यापारिक परिवार से हूँ और अक्सर घर के सभी बच्चो का हिसाब किताब में टेस्ट होता रहता है तब घर के सभी बड़े जो हिसाब उंगलियों में निबटाते है उस हिसाब को निबटाने केलिए जब हम बच्चे केलकुलेटर इस्तेमाल करते है तो हमें भी यही सुनने को मिलता है बेटा किताबे सब कुछ नहीं है कुछ अपना दिमाग भी लगा लो ! बिलकुल शैलेश जी कहानी की तरह हम अपने किताबी ज्ञान के चलते अक्सर सब कुछ पता होते हुए भी उत्तर गलत दे देते है ! सर आपसे एक request हैआप प्लीज़ ब्लोगर पर भी आ जाये ताकि आपको आसानी से फोलो किया जा सके यहाँ ढूंढने में परेशानी होती है ! और आजकल जागरण की टेक्निकल प्रोब्लम भी बढ़ गयी है सब्सक्रिप्शन लेने के बाद भी मेरी इ मेल कोई इन्फोर्मेशन नहीं मिलती ! मेरा bloggar अकाउंट ये है http://www.soni-teekhabol.blogspot.com

    chaatak के द्वारा
    August 1, 2010

    सोनी जी, अगर आपको लगता है की मुझे ब्लोगर पर आना चाहिए तो मुझे भी ख़ुशी मिलेगी| स्पष्ट कहूं तो कैसे ज्वाइन करेंगे या किस तरह ब्लॉग लिखेंगे या लिंक करेंगे| कृपया जानकारी दें तो मैं कोशिश कर सकता हूँ| आपकी प्रतिक्रियाएं हमेशा अच्छा करने को उत्साहवर्धन करती हैं| इस कहानी को बेहतर आंकने का शुक्रिया!

tanaya के द्वारा
July 9, 2010

अरे वाह चातक जी ! आप तो, नहले पे देहला और दहले पे जाने क्या ? मारते ही रहते है लो पोस्ट कर दी एक और कहानी ‘सीख की सीख ,मजेदार है सो अलग ‘ अब क्या कहें आपको ? फिलहाल धन्यवाद तो कहना ही है इतनी अच्छी कहानी का |

    chaatak के द्वारा
    July 9, 2010

    तनया जी, आपकी प्रतिक्रिया पाकर सदैव मुझे अच्छा लगता है या कहें कि बहुत इंतज़ार रहता है आपकी प्रतिक्रया का | आपको कहानी और सीख दोनों ही पसंद आये इससे दिली-ख़ुशी हुई | बहुत-बहुत धन्यवाद, तारीफ़ का शुक्रिया !

allrounder के द्वारा
July 8, 2010

यार चातक जी, कहाँ से सीखीं तुमने ये मजेदार कहानियां ?

    chaatak के द्वारा
    July 8, 2010

    प्रिय आलराउंडर जी, “आजा-दादा से सुन राखी, कुछ निज मन से ली बनाय, झूठ सांच परमेश्वर जानय, चातक पंचन दई सुनाय ||” प्रतिक्रिया के लिए कोटि-कोटि धन्यवाद !

Nikhil के द्वारा
July 7, 2010

चातक जी, आपकी बात हमने मानी. अब कौनसी बात ये सिर्फ आप जानते हैं और मैं. मेरी कहानी के दो भागों पर अपने कोई सुझाव नहीं दिया है. चूँकि आप बड़े भैया हैं , आपके सुझाव की प्रतीक्षा रहती है. जो भी त्रुटी है उसे रेखांकित कर मार्गदर्शन करते रहे. आभार, निखिल झा

    chaatak के द्वारा
    July 7, 2010

    निखिल जी, आपके इतने स्नेह का ही तो मैं कायल हूँ | आपकी कहानी के दो अंशों पर मैं कोई टिप्पड़ी नहीं दे सका इसका मुझे बेहद खेद है आज आपके उपन्यास के छूते हुए अंशों पर मैं अपनी राय जरूर दूंगा | छोटे भाई आपसे इतना कहना है \’इशारों को अगर समझो राज़ को राज़ रहने दो\’ आपने बात मान ली मानो मेरा मान हज़ार गुना बाधा दिया आपने | आपकी विनम्रता ने ही तो मुझे आपका प्रशंसक बना दिया है |

parveensharma के द्वारा
July 7, 2010

अच्छी रचना, व्यवहारिक ज्ञान का महत्व समझाने वाली ज्ञानप्रद कथा. सही है कि सिर्फ पुस्तकीय ज्ञान सम्पूर्ण नहीं होता. जीवन में व्यवहारिक जानकारी और ज्ञान बहुत जरूरी है.

    chaatak के द्वारा
    July 7, 2010

    प्रवीण जी, आपने बिलकुल सही कहा पुस्तकीय ज्ञान सम्पूर्ण ज्ञान नहीं होता है | पहले लोग ज्यादा व्यवहारिक ज्ञान रखते थे क्योंकि वे अपने बुजुर्गों और गुरुजनों के ज्यादा करीब होते थे और उन्हें बहुत सारा ज्ञान कथा, संस्मरण और गीतों के रूप में सुलभ हो जाया करता था | प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद!

raziamirza के द्वारा
July 7, 2010

सार्थक पोस्ट\ ये कहानी वास्तविकता का ही एक रुप है। गही कहा है आपने कि पुस्तकीय ज्ञान ही समग्र ज्ञान नहीं होता है। जीवन का अनुभव ही सब कुछ सिखाता है। मनुष्य को अपने व्यवहारिक ज्ञान का भी उपयोग करना चाहिए ।

    chaatak के द्वारा
    July 7, 2010

    रज़िया जी, आपकी बात से मैं अक्षरशः सहमत हूँ | यही पुस्तकीय ज्ञान आजकल तमाम सी समस्याओं का सबब बन गया है क्योंकि इसे व्यावहारिकता से जोड़ कर चलना ही नहीं सिखाया जाता |

Nikhil के द्वारा
July 7, 2010

चातक जी हमारे एक मामाजी हुआ करते थे, सर्दी के महीनों मैं जब हम अपने पुस्तकों का पाठ करते (मेरा कहने का मतलब है सिर्फ पाठ ही किया करते थे, लिखा क्या है पुस्तक मैं अबतक नहीं समझे), तो एक दोहा कहते थे. निचे लिख रहा हूँ, जो भी पढतन सो भी मरतन, जो नै पढतन सो भी मरतन, ता दांत कटकट कहे करतन. आपने सही कहा, कित्बाई ज्ञान न सिर्फ हानिकारक है अपितु मनुष्य को अहंकारi भी बनता है.

    chaatak के द्वारा
    July 7, 2010

    वाह निखिल जी, आपने तो एक दोहे में पूरा सार ही बाँध दिया इसे कहते हैं – “सतसैया के दोहरे ज्यों नावक के तीर, देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर |” प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद !

seema के द्वारा
July 7, 2010

बहुत अच्छी कहानी , शिक्षाप्रद होने के साथ रोचक भी | केवल किताबी ज्ञान से कोइ महान नहीं बन सकता अगर ऐसा होता तो कबीर रहीम जैसे महान विद्वान कभी पैदा ही नहीं होते |

    chaatak के द्वारा
    July 7, 2010

    सीमा जी, आपने बिलकुल ठीक कहा कबीर और रहीम जी ही हमारे आदर्श हो सकते हैं तभी हम अपने पुस्तकीय ज्ञान को व्यवहारिक ज्ञान से जोड़ कर अध्ययन का पूरा लाभ स्वयं भी उठाएंगे और दुसरे भी इससे लाभान्वित होंगे | प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद!

Shivashish के द्वारा
July 7, 2010

मान्यवर चातक जी ! सर्वप्रथम तो मैं आपको कहानी सुनाने के लिए कोटि सधन्यवाद देता हूँ, और आदरणीय शैलेश जी की प्रतिक्रिया से प्रेरणा लेकर उन्ही की तरह एक कहानी पेश-ए-नज़र कर रहा हूँ:- एक गाँव में एक धनवान सेठ रहता था, उसके २ पुत्र थे. दोनों पुत्र विद्याध्धायन के लिए विदेश गए, कुछ समय पश्चात वे दोनों विद्या प्राप्त कर अपने गाँव वापस आये. उन दोनों की किताबी शिक्षा तो हुई परन्तु व्यवहारिक शिक्षा न हो सकी. एक दिन उनके गाँव में किसी किसान का जवान बेटा मर गया, जब सेठ जी को पता चला तो उन्होंने अपने छोटे बेटे को उस किसान के घर जाने को कहा, तो सेठ जी का छोटा लड़का किसान के घर गया.किसान का जो लड़का मरा था वो बड़ा दुष्ट था,तो किसान के द्वार पर बैठे कुछ लोग आपस में बात कर रहे थे कि बड़ा दुष्ट लड़का था भले मर गया. इस बात को जब सेठ जी के बेटे ने सुना तो वह किसान के पास गया और देखा कि किसान बहुत रो रहा है तो वह किसान सान्तवना को देते हुए बोला- मैं सेठ जी का छोटा लड़का हूँ, आप चिंता न करें वैसे भी आपका लड़का बड़ा दुष्ट था भले मर गया.(अब आप लोग समझ ही रहे होंगे कि यह बात सुनकर किसान के दिल पर क्या बीती होगी) वहां से जब लड़का वापस अपने घर आया तो अपने द्वारा किसान को दिए हुए सन्तावना को अपने पिता जी से कह सुनाया. अपने लड़के कि बात सुनकर सेठ जी को बड़ा दुःख हुआ कि इसने तो समाज में मेरी बनाई हुई इज्जत को धो दिया, कुछ सोंच कर सेठ जी ने अपने बड़े लड़के को उस किसान के घर क्षमा मांगने के लिए भेजा. अपने पिता जी कि आज्ञा शिरोधार्य कर वह किसान के घर पहुंचा और किसान से हाथ जोड़कर बोला कि मैं सेठ जी का बड़ा लड़का हूँ, और कल मेरा भाई आपके घर आया था जिसने आपसे दिल को ठेस पहुंचाने वाली बात कही उसके लिए मैं अपने भाई कि तरफ से क्षमा मांगता हूँ, और जब आपका दूसरा लड़का मरेगा तो मैं आपसे इस तरह व्यवहार नहीं करूँगा. पाठको ! यह होता है किताबी शिक्षा और वय्व्हारिकी शिक्षा में अंतर. चातक जी ! एक बार आपको फिर तहे दिल से शुक्रिया.

    chaatak के द्वारा
    July 7, 2010

    शिवांश जी, आपकी प्रतिक्रया और कहानी दोनों ही लाजवाब हैं | आप के अन्दर मैं एक अच्छे और होनहार चिन्तक का विकास देख रहा हूँ | प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद ! आपसे कुछ अच्छे लेखों की अपेक्षा भी है | All the best!

kmmishra के द्वारा
July 6, 2010

चातक जी नई कहानी सुनाने के लिये धन्यवाद । फिर कहानी भी ऐसी जो बुद्धि के कपाट हिला दे (कुछ किवाड़ें बहुत समय से जाम होती है इसलिये एक बार में नहीं खुलतीं जैसे मेरी ) सच कहा हममे से बहुत लोग किताबी ज्ञान पर ही उम्र बिता देते हैं । जो चीजें नंगी आंखों से दिखाई पड़ती हैं उन्हें देखने के लिये दूरबीन लगाते हैं । कुछ ऐसा ही हाल हमारी शिक्षा पद्धति का भी है । क्लर्क से लेकर आईएएस बनने तक के लिये किताबी ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है । पिछले सावा सौ साल से अंग्रेजों के दिये हुये सिस्टम पर ही काम हो रहा है और नतीजा बढ़ती हुयी बेरोजगारी, अपराध, भ्रष्टाचार, और हर स्तर पर नैतिकता में गिरावट । इस पुस्तकीय ज्ञान ने हमारी सोच सिर्फ अपने तक ही सीमित करके रख दी । चाहे व्यापारी हो या अधिकारी या नेता । इस अनमोल कहानी के लिये धन्यवाद शब्द छोटा है । आभार ।

    Chaatak के द्वारा
    July 7, 2010

    मिश्र जी, कहानी आपको पसंद आई और आपने इसकी सराहना की आपका कोटिशः धन्यवाद | बिलकुल सही कहा आपने “कुछ ऐसा ही हाल हमारी शिक्षा पद्धति का भी है । क्लर्क से लेकर आईएएस बनने तक के लिये किताबी ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है ।” यही कारण है की बढती हुई समस्याओं के मुकाबले निदान या तो शून्य हैं या फिर हास्यास्पद | प्रतिक्रिया के लिए एक बार और धन्यवाद|

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
July 6, 2010

चातक जी आपकी कहानी अत्यंत रोचक और शिक्षाप्रद है …………….. पुस्तकीय ज्ञान को फलित करने के लिए मनुष्य को व्यवहारिक ज्ञान भी होना चाहिए ……………. इसी क्रम में मैं भी अपने चाचा जी से सुनी एक कहानी सुनाता हूँ ………… एक गुरु जी थे बहुत जो बहुत विद्वान् एवं अनुशासन प्रिय भी थे, दूर दूर से उनसे यहाँ छात्र पढ़ने आते थे | उनके छात्र भी होनहार होते थे | एक दिन गुरु जी को एक ऐसे छात्र को पढ़ने की जिम्मेदारी मिली जो अपनी बूढी से कुछ नहीं सोचना चाहता था | गुरु जी ने उसे ज्योतिष सिखाने का भरोषा दिलाया | फिर गुरु जी ने दिन रत एक कर के कुछ दिनों में ज्योतिष के सारे सूत्र और गणना नियम सिखा दिया | फिर गुरु जी ने छात्र कहा कल आपकी परीक्षा होगी | छात्र ख़ुशी ख़ुशी अगले दिन स्नान ध्यान करके गुरूजी के पास पहुंचा | गुरु जी ने अपनी मुठ्ठी में एक अंगूठी छुपा ली और कहा बताओ मेरी मुठ्ठी में क्या है ? छात्र ने गडाना प्रारंभ की और प्रथम सूत्र के फलादेश से बताया वो बस्तु गोल है , फिर गणना आगे बधाई और दूसरे सूत्र के फलादेश से बताया वस्तु के मध्य के भाग खाली है, और छात्र ने अगली बार बताया वस्तु बहुमूल्य, चमकदार है, और धातु की बनी है | गुरु जी ने प्रसन्नता दिखाई, परन्तु उसी समय छात्र ने कह दिया गुरु जी मुठ्ठी खोल दीजिये ये अवस्य की आटे की चक्की है…………………… अंतत छात्र ने अपने मस्तिष्क का प्रयोग नहीं किया और साड़ी जानकारी होने के बाद भी उत्तर गलत बता दिया ……………..

    chaatak के द्वारा
    July 6, 2010

    प्रिय शैलेश जी, सर्वप्रथम आपकी टिप्पड़ी का धन्यवाद ! आपने जी कहानी सुनाई सचमुच मेरी वर्णित कथा का ही सन्दर्भ प्रस्तुत करती है | कथा को एक और आयाम प्रदान करने का बहुत बहुत धन्यवाद !

aditi kailash के द्वारा
July 6, 2010

बहुत ही अच्छी कहानी….. रोचक होने के साथ ही साथ शिक्षाप्रद भी… सही कहा आपने पुस्तकीय ज्ञान ही समग्र ज्ञान नहीं होता है, बल्कि व्यक्ति को अपने व्यवहारिक ज्ञान का भी उपयोग करना चाहिए….

    chaatak के द्वारा
    July 6, 2010

    अदिति जी, कहानी पर आपकी प्रतिक्रिया पाकर हर्ष हुआ और प्रसन्नता हुई ये जान कर कि आप कहानी में दर्शाई गईं नैतिकता और कथा की उपयोगिता से इत्तेफाक रखती हैं | प्रतिक्रिया देने के लिए आपका बहुत-बहुत धन्यवाद !

    Gaurav के द्वारा
    July 7, 2010

    चातक जी रचना बहुत ही बढ़िया थी, आप की रचना हमेशा पढता हूँ पर आज पहले बार प्रतिक्रिया की इच्छा हुए आप ने विषय ही ऐसा लिया है आशा है लोगो शायद आप की इस पोस्ट के बाद बुक वार्म (किताबी कीड़ा) और जीनीयस का भेद समझ आये. अगले रोचक पोस्ट की प्रतीछा में

    Chaatak के द्वारा
    July 7, 2010

    गौरव जी, आपकी प्रतिक्रिया पाकर मन अत्यंत हर्षित हुआ | आगे से मैं कोशिश करूंगा की ऐसी रचनाये और लेख आपके समक्ष रखूँ कि आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया मिलती रहे| हौसला-अफजाई का तहे-दिल से शुक्रिया |


topic of the week



latest from jagran