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चातक

आओ खोजें हिंदुस्तान

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chaatak


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मेरा कातिल

Posted On: 19 Oct, 2011  
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जनरल डब्बा में

62 Comments

इस्लाम मेरी जेब में!

Posted On: 21 Sep, 2011  
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जनरल डब्बा में

130 Comments

आदाब अर्ज़ है!

Posted On: 7 Sep, 2011  
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जनरल डब्बा में

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हिन्दुस्तान की विडम्बना

Posted On: 11 Aug, 2011  
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जनरल डब्बा में

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अब क्या खरीदूं !

Posted On: 2 Aug, 2011  
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जनरल डब्बा में

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मुम्बई को फिर लहूलुहान किया आतंकियों ने

Posted On: 13 Jul, 2011  
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जनरल डब्बा में

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बेशर्मी मोर्चा- उमंग सबरवाल की जुबानी

Posted On: 12 Jul, 2011  
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जनरल डब्बा में

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कौन रोकेगा बलात्कार

Posted On: 10 Jul, 2011  
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जनरल डब्बा में

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बीप-बीप !

Posted On: 3 Jul, 2011  
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जनरल डब्बा में

14 Comments

जागरण जवाब दे! – Jagran Junction Forum

Posted On: 27 Apr, 2011  
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जनरल डब्बा में

70 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: nikhil

सही कहा है हम्ज़ा जी आपने २५ करोड से ज्यादा मुस्लिम… लगभग हर बड़े शहर में मस्जिद…. आमिर खान, शाहरुख खान… सलमान खान से लेकर तकरीबन फील्ड में मुस्लिमों का वजूद…...... मगर एक बात आप भूल गयी की उनको इस सम्मानित जगह पर लाने वाला राष्ट्र हिंदुस्तान ही है. यह हमेशा याद रखिये की हीरे की परख जोहरी को ही होती है स्वयं हीरे को इसका ज्ञान नहीं होता है. आपनें जिन महानुभावों के बारे में जिक्र किया है उनको उनकी पहचान हिन्दुस्तान ने दी है और हिन्दुस्तान का वजूद धरम सम्प्रदाय को ताक पर रखने वाले हिन्दुस्तानियों से ही है. मीडिया की टी आर पी दर्शकों से बढती है न की "चंद मुट्ठी भर लोगों" लोगों से. अगर दर्शक वर्ग यह बात ध्यान में रखे की वो हिन्दू या मुसलमान है तो उसी की फिल्मे देखेंगे तो यकीन मानिए इन कलाकारों का कोई वजूद ही नहीं होता और न ही नसीरुद्दीन शाह जैसा एक मंच का अभिनेता बॉलीवुड के दिग्गज अमिताभ बच्चन को टक्कर दे पाता मैं स्वयं फिल्मे बिना किसी भेद भाव के देखता हूँ सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन के लिए. साथ ही इस बात का ध्यान रखता हूँ की hamare samaj को इनसे क्या शिक्षा मिलती है. मगर शायद लोग धर्म जात के चक्कर में शिक्षा को ताक पर रख देते हैं. आपसे अनुरोध है के आपको भी जिसका गुनगान करना चाहिए उसकी तौहीन न करें.

के द्वारा: KRISHNA

के द्वारा: Kineedurparia

के द्वारा: Kineedurparia

के द्वारा: Kineedurparia

के द्वारा: Kineedurparia

चातक जी, आपने मेरे कमेंट को सही अर्थो मे समझा ! हिन्दू समाज का ना तो कोई बैर है और ना ही हिन्दू समाज का अभी इनता पतन हुआ है ! मेरे एक मित्र ने शिशु मंदिर मे बारे मे जो लिखे है तो आप को बता दूँ की मैं मे शिशु मंदिर और आरएसएस के स्कूल मे पढ़ा हु और स्वामी विवेकानंद मेरे आदर्श है मेरे स्कूल मे कई मुस्लिम छात्र थे और हम सब साथ रहते थे कई खेलो और वाद विवाद प्रतियोगताओ मे यह मुस्लिम छात्र स्कूल का प्रतिनिधित्व करते थे और स्कूल के प्रबंधन से इनको हमेशा प्रोत्साहन और पुरुस्कार मिलता था, इशी तरह बिहार मे कुछ मदरसे है जहां हिन्दू छात्र भी पढ़ते है ! इशी तरह एक ने लिखे है की एक मोलवी का नाम बताए जिसने आतनवाद के वीरुध फतवा दिया हो तो आप को तो मालूम होगा की एक बार नहीं कई बार बड़ी बड़ी कॉन्फ्रेंस हुयी है मुस्लिम धर्म गुरुओ की और आतंकवाद को ग़ैर इस्लामिक करार दिया गया है और ऐसे लोगों के इस्लाम से खारिज कर दिया गया है यहाँ तक की दफन तक न करने को कहा गया है ! अब तो इंटरनेट का ज़माना है चाहे तो सर्च करले ! मैंने कई ब्लॉग और कमेंट देखे है जहां यह लिखा गया है की बाबा रामदेव पर बार्बर अत्याचार सिर्फ मुसलमानो को खुश करने के लिए किया गया है जो मेरे खयाल से एकदम गलत है ! अब मयंक जी की बात तो उनकी रचनाए अत्यंत उच्च कोटी की होती है परंतु मुस्लिम समाज के प्रति उनका कठोर नज़रिया मेरे गले नहीं उतरता है, यदि आप की उनसे मित्रता है तो मेरा यह शेर उनको पाहुचा दे ! यह मसाएले तजस्सुस यह तेरा बयान ग़ालिब (मयंक) तुझे हम वली समझते जो न बादखार (मुस्लिम विरोधी) होता अब इस बहस को समाप्त करता हूँ और आपके अगले लेख का इंतज़ार

के द्वारा: RK Sinha

स्नेही श्री सिन्हा जी, सादर अभिवादन, आपकी किसी भी बात से हमें कष्ट नहीं हुआ है और आपको यदि हमारी भाषा थोड़ी भी कठोर लगी हो तो ऐसा इसलिए होगा कि हमारे पास कुछ बातों को कहने के लिए कभी कभी सीमित शब्द ही होते है और वे अक्सर कठोर होने का भ्रम कराते हैं बुरी सिर्फ एक बात लगी और वह मैंने स्पष्ट बता भी दिया कि आपने मनोज जी का दर्द नहीं समझा कि उन्हें अपनी बहन की राखी नहीं मिली| लेकिन अब आपकी ये दो पंक्तियाँ बहुत अच्छी तरह से बता रही हैं कि हकीकत क्या है अंततः आपने भी लिखा यही ''हमारी प्रतिभाए तो आरक्षण, सिफारिश और रिश्वत की भेट हो जाती है तो अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए सब कुछ सहना पड़ता है,'' मैं स्वयं यू.पी से हूँ और कई अन्य मित्र बिहार से हैं और आपकी बताई समस्याएं भी सही है लेकिन कोई एक देश ऐसा बताएं जहां ये समस्याएं नही है? समस्याएं अपनी जगह है और अन्य सामाजिक व् धार्मिक कर्त्तव्य अपनी जगह हम एक की आड़ में दूसरे को नजरअंदाज करते रहे है और परिणाम सामने है (न माया मिली न राम) मेरे कहने का मतलब ये नहीं कि सभी लोग अपनी रोजी रोटी और परिवार छोड़ दें ऐसा तो तब भी नहीं था जब आजादी की लड़ाई चल रही थी लेकिन हम कम से कम सत्याग्रह करने वाले लोगों को अच्छी नज़र से देखते तो थे और आजादी पाने में उस नज़र का योगदान ही सबसे ज्यादा था आज भी कुछ ऐसा ही है जो सत्य का आग्रह करे कम से कम एक बार उसे समझने की कोशिश तो करनी ही चाहिए| आपको एक और गलत जानकारी दी गई है बाबा रामदेव एक आन्दोलन का बर्बर दमन मुसलमानों से कभी जोड़ा ही नहीं गया और न ही किसी ने ऐसी कोई अनर्गल बात कही है आप किसी एक साक्षात्कार या खबर का प्रमाण नहीं पायेंगे मुझे समाज नहीं आता ये अफवाह आपको मिली कहाँ से कृपया सूत्र का हवाला जरूर दें मुझे जानकारी नहीं है लेकिन पूरी विनम्रता के साथ जानना चाहूंगा और यदि हिन्दू समाज ने ये किया है तो ''हिन्दू कायर अपराधी है'' इस बार मयंक जी नहीं मैं लिखूंगा| लेकिन यह सिर्फ अफवाह है और आपके पास कोई प्रमाण नहीं तो सिर्फ एक पंक्ति में सही लेकिन ''कोई प्रमाण नहीं मिल सका'' जरूर लिखियेगा| आपकी टिप्पड़ियों का हमेशा स्वागत है|

के द्वारा: chaatak

राजेश जी, आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर ऐसा लगा जैसे आपने बिना सोचे समझे राहुल बाबा (भगवान जाने ये बड़ा होगा भी या सिर्फ बाबा ही बना रहेगा!) की तरह वाली बचकानी बात कह दी| हो सकता है रघुवंशी जी इस ब्लॉग को दोबारा पढ़ें ही न और आपको आपके प्रश्न का उत्तर न मिले इसलिए मैं बता दूं कि आप किसी भ्रम का शिकार हैं सरस्वती शिशु मंदिर में ऐसा कुछ चाह कर भी नहीं पढ़ाया जा सकता है क्योंकि वह सिर्फ दर्जा पांच तक के बच्चों के लिए होता है और अब आते हैं आपके संदेह पर सरस्वती विद्या मंदिर (जो कि दर्जा छः से लेकर दर्जा बारह तक होता है) में सिर्फ शासन द्वारा निर्धारित पुस्तकें ही पढ़ाई जाती हैं और इन दोनों विद्यालयों में कभी जाकर देखिये यहाँ हिन्दुओं के साथ मुसलमान एवं अन्य धर्म के छात्र भी पढ़ते हैं| अच्छा होता कि आप आर.एस.एस. द्वारा संचालित विद्यालयों और मदरसों में दी जाने वाली शिक्षा का तुलनात्मक विश्लेषण देते आपको अपने सभी सवालों का जवाब मिल जाता| आशा है आप आगे से किसी भी उत्कृष्ट शिक्षा के मंदिर पर राहुल बाबा की तरह लांक्षन लगाने की भूल नहीं करेंगे| मान्यता है कि वाग्देवी पर झूठ बोलने से वो मति हर लेती हैं राहुल बाबा साक्षात उदाहरण है गलत बयानी करने के बाद मट्टी पलीद हो चुकी है सिर्फ उन्ही की नहीं पूरी कांग्रेस और खुद सोनिया की| सुना है ''लागा चुनरी मा दाग'' छुड़ाने के लिए सर्ज़री करवानी पड़ी वो भी ऐसी की बताते नहीं बन रहा कि काटा कहाँ गया और क्यों| यदि संस्था के बारे में कोई संशय है तो आप मेरे शहर में आ जाइए और जिस विद्यालय में कहिये आपके रहने और यदि कर सकते हों तो अध्यापन करें तक की पूरी व्यवस्था करवा दूं और बिलकुल निकट से देख भी लीजिये और सुन भी लीजिये कि क्या पढ़ते हैं और क्या पढ़ाते हैं|

के द्वारा: chaatak

स्नेही चातक जी और मनोज जी, यदि मेरी बातों से आपको ठेस पहुची तो मुझे दुख है मेरे कहने का मतलब यह था की मुस्लिम समाज इतना बुरा नहीं है जितना उसको पेश किया जाता है, इस समाज मे भी वही बुराइया है जो विश्व के अन्य धर्म के मानने वालों मे, यदि आप आतंकवाद को ही ले ले तो इसकी जड़ जो पाक और अफगान मे है उसका कारण कोई और नहीं खुद पश्चिमी देश है जिन्हों ने रूस को तोड़ने के लिए आतंक के अड्डे बनाए और इनको मुजाहिदीन का नाम दिया, अब इंका लगाया हुआ यह पौधा इस कदर बढ़ गया की इनके लिए ही मुसीबत बन गया तो इनको बुरा लगने लगा और कल के मुजाहिद आज के आतंकवादी हो गए ! अब भारत पर आते है, मुझे याद है 9/11 से पहले जब भी भारत ने यह मुद्दा उठाया अमेरिका ने भारत को दर किनार करके पाकिस्तान का साथ दिया अब जब अपने बनाए दलदल मे खुद फंसे तो पूरी दुनिया को अपना साथ देने पर मजबूर किया ! इन सारी बातो और घटनाओ मे मुस्लिम धर्म कही नहीं शामिल था ! जहां तक भारत की बात है और आपके कमेंट "हर मुसलमान हत्यारा है" या ऐसे अन्य लेखो की बात है जिसमे भारत की हर समस्या के लिए मुस्लिम समाज को कोसते है यहाँ तक की बाबा रामदेव के आंदोलन पर लाठी चार्ज को भी तो साहब इस तरह की बातो और लेखो से हिन्दू समाज का भला होने वाला नहीं है, भारत सरकार मे और सरकारी कर्मचारियो मे 90% हिन्दू समाज के ही लोग है तो वह हिन्दू विरोधी कैसे हो सकते है ? सरकार पर आप आरोप लगा सकते है लेकिन सरकारी अधिकारी और कर्मचारी पर तो नहीं ! अब जो 90% लोग देश की नीतिया बनाते है और भ्रष्टाचार मे बुरी तरह शामिल है और देश को लूट रहे है क्या इनके ऊपर कोई कविता "हर हिन्दू भ्रष्टाचारी है" लिखने को उचित कहा जा सकता है, नहीं, जबकि भ्रष्टाचार आतंकवाद से ज़्यादा नुकसान देश को पाहुचा रहा है ! आप देखे के छोटे छोटे देश आज बिजली पानी पे आत्मनिर्भर हो गए है लेकिन हम कहाँ जा रहे है यदि आप का संबंध यूपी या बिहार से है तो आप इससे भली भाति परिचित होंगे, नेता और सरकारी लोग सिर्फ और सिर्फ लूटने पर लगे है, फिर इससे निकले तो जाती वाद की जड़े अभी भी हमारे समाज मे मौजूद है ! मेरा मानना यह है की हिन्दू समाज और देश का भला तब हो ग जब हम पहले खुद सही हों अपने अंदर व्याप्त बुराइयो को दूर करे, फिर इधर उधर देखे ! खाड़ी देशो मे बहुत कामिया है परंतु यदि हमे अपने देश रोजगार मिलता तो यहाँ क्यो आते, हमारी प्रतिभाए तो आरक्षण, सिफारिश और रिश्वत की भेट हो जाती है तो अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए सब कुछ सहना पड़ता है, आप तो कवि और विद्वान है दो पंक्तीय आप को समर्पित करता हूँ ! तर्के वतन युही करता नहीं कोई परदेश मे न पूछिये किस दिल से आए है

के द्वारा: RK Sinha

स्नेही सिन्हा जी, सादर अभिवादन, सही कहा है आपने खाड़ी देशों में आप कुछ तो पा रहे हैं तभी वहां है मनोज जी ने अभी तक जवाब नहीं दिया है लेकिन मैं कुछ कहना चाहूंगा- ''मनोज जी खाड़ी देश में रोजी रोटी की तलाश में गए हैं और उन्हें वह उन्हें वहां मिला है इसलिए वे वहां पर रह रहे होंगे| लेकिन जब धार्मिक आस्था की बात आती होगी तो भावनाएं जरूर आहत होती होंगी हर व्यक्ति अपनी आत्मा को मार कर नहीं रह सकता इसलिए उन्होंने यहाँ पर अपनी आस्था पर लगने वाली चोट का जिक्र किया और आप एक तरफ तो हिन्दू भाई कहते हैं और दूसरी तरफ एक हिन्दू की आस्था पर लगी चोट आपको दिखाई नहीं देती क्यों? यदि इस्लामिक राष्ट्र इतने ही उदारवादी हैं जितना आप कहते हैं तो क्या वो राखी उन तक नहीं पहुंचनी चाहिए? या फिर आप ये कहना चाहते हैं वे झूठ बोल रहे हैं| आपसे एक उचित प्रतिक्रिया की आशा थी आपने निराश किया रह गई बात खाड़ी देशों की तो हममे से कोई भी वहां की दशा से और वहां पर दुसरे धर्मों के साथ हो रहे व्यवहार से अनजान नहीं| आपकी प्रतिक्रिया ने थोडा विचलित जरूर किया परन्तु आपसे कुछ और सीखने को मिला इसके लिए आपका धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

सिन्हा जी, कौन से कड़ी देश में हैं? पूजा करने पर वापस भेज दिया जाता है. सामान में अगर मूर्ति हो तो कूड़ेदान में फेंक दिया जाता है. मैं भी एक कड़ी देश में हूँ, परन्तु पूजा करने की स्वतंत्रता नहीं है. मुझे इस बार राखी नहीं मिल सकी. क्योंकि उस पर गणेश जी बने थे. मैं मुसलामानों का विरोधी तो नहीं हूँ पर जो आपने लिखा है असलियत से परे है. UAE बहरीन, ओमान में ही आप पूजा कर सकते हैं वो भी सीमित मात्रा में. क्या सउदी अरब, कुवैत, इरान, क़तर, मिस्र आदि देशों में आप पूजा कर सकते है? जवाब का इन्तजार है. भ्रामक बातें न फैलाएं. इस्लाम तलवार के जोर पर स्थापित हुआ है. तैमुर और चंगेज खान का नाम आप जानते ही होंगे.

के द्वारा: Manoj Kumar Sharma

वे एक गैर-इस्लाठठमिक परन्तु धर्मपरायण हिन्दू को टोपी पहनाने की तिकड़म लगा रहे थे? मुझे तो लगता है टोपी ना स्वीकार करके जहाँ मोदी ने अपनी, अपने धर्म की और विभिन्नता में एकता वाले हिन्दुस्तान का मान रखा वहीँ मुल्ला जी ने इस्लाम को सिर्फ और सिर्फ एक सियासी हनक के लिए बेज्जत करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी|...............अफ़सोस लोग अपने मूल से भटक कर कहाँ कहाँ दुःख पा रहे हैं, सामने ही गंगा बह रही हैं और सदियां हो गयीं नहाये. अपने पुरखों का भी इतिहास जानते हैं और उन के ऊपर क्या जुल्म किये विदेशियों ने वह भी जानते हैं लेकिन कितना बड़ा आश्चर्य है की जिन्होंने जुल्म किया उन्ही को पूजते हैं. अशिक्षा, अज्ञानता का इससे बढ़ कर क्या उदाहरण होगा. मुझे मेरे भईयों की इस दारूण स्थिति को देख कर कष्ट होता है. नफरत की आग पहले अपना ही घर जलाती है, पाक पडोसी की हालत देखिये. पता नहीं कब भाई की वापसी होगी, पता नहीं कब ह्रदय मिलेंगे. रामराज्य में ही संभव है.

के द्वारा: mukundchand

हिन्दु समाज एक असंगठित समाज है। एक ऐसा समाज जो घोर सद्गुण विकृतियों का शिकार है  (जैसे क्षमाशील होना सद्गुण है, किन्तु एक दुष्ट स्वभाव वाले मनुष्य को क्षमा दान की बात करना  सद्गुण विकृति, सच बोलना सद्गुण है पर जो सच बोलने से अनर्थ हो जाए ऐसा सच बोलने पर  दृढ़ रहना विकृति है, शुचिता सद्गुण है, किन्तु शुचिता के नाम पर अस्पृश्यता को बढ़ावा देना सद्गुण विकृति )।  हिन्दुओं की दयनीय दशा का कारण हिन्दु स्वयं हैं। फ्रांस का राष्ट्रपति भारत के इसाईयों के संरक्षण  के लिए दबाव बना सकता है। पर हिन्दु समाज अपने नेताओं तक को गलत चुनता है (गांधी-नेहरू जैसे)।  ऐसा समाज किसी चमत्कार से ही आने वाली दो शताब्दियों तक बचा रह सकता है। इस समस्त  समाज को बहुत शीघ्र मोक्ष मिलने वाला है जिसके पीछे यह पड़ा रहता है।

के द्वारा: चन्द्र पाल

असल में मेरा बचपन सरस्वती शिशु मंदिर कि छत्रछाया में बीता तो कोई "कॉनवेंट नुमा" व्यक्ति मेरी जड़ो पर हमला करे मुझसे बर्दाश्त नहीं होता. क्या आप धर्मनिरपेक्ष हैं ? जरा फ़िर सोचिये और स्वयं के लिये इन प्रश्नों के उत्तर खोजिये..... १. विश्व में लगभग ५२ मुस्लिम देश हैं, एक मुस्लिम देश का नाम बताईये जो हज के लिये "सब्सिडी" देता हो ? २. एक मुस्लिम देश बताईये जहाँ हिन्दुओं के लिये विशेष कानून हैं, जैसे कि भारत में मुसलमानों के लिये हैं ? ३. किसी एक देश का नाम बताईये, जहाँ ८५% बहुसंख्यकों को "याचना" करनी पडती है, १५% अल्पसंख्यकों को संतुष्ट करने के लिये ? ४. एक मुस्लिम देश का नाम बताईये, जहाँ का राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री गैर-मुस्लिम हो ? ५. किसी "मुल्ला" या "मौलवी" का नाम बताईये, जिसने आतंकवादियों के खिलाफ़ फ़तवा जारी किया हो ? ६. महाराष्ट्र, बिहार, केरल जैसे हिन्दू बहुल राज्यों में मुस्लिम मुख्यमन्त्री हो चुके हैं, क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि मुस्लिम बहुल राज्य "कश्मीर" में कोई हिन्दू मुख्यमन्त्री हो सकता है ? ७. १९४७ में आजादी के दौरान पाकिस्तान में हिन्दू जनसंख्या 24% थी, अब वह घटकर 1% रह गई है, उसी समय तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब आज का अहसानफ़रामोश बांग्लादेश) में हिन्दू जनसंख्या 30% थी जो अब 7% से भी कम हो गई है । क्या हुआ गुमशुदा हिन्दुओं का ? क्या वहाँ (और यहाँ भी) हिन्दुओं के कोई मानवाधिकार हैं ? ८. जबकि इस दौरान भारत में मुस्लिम जनसंख्या 10.4% से बढकर 14.2% हो गई है, क्या वाकई हिन्दू कट्टरवादी हैं ? ९. यदि हिन्दू असहिष्णु हैं तो कैसे हमारे यहाँ मुस्लिम सडकों पर नमाज पढते रहते हैं, लाऊडस्पीकर पर दिन भर चिल्लाते रहते हैं कि "अल्लाह के सिवाय और कोई शक्ति नहीं है" ? १०. सोमनाथ मन्दिर के जीर्णोद्धार के लिये देश के पैसे का दुरुपयोग नहीं होना चाहिये ऐसा गाँधीजी ने कहा था, लेकिन 1948 में ही दिल्ली की मस्जिदों को सरकारी मदद से बनवाने के लिये उन्होंने नेहरू और पटेल पर दबाव बनाया, क्यों ? ११. कश्मीर, नागालैण्ड, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय आदि में हिन्दू अल्पसंख्यक हैं, क्या उन्हें कोई विशेष सुविधा मिलती है ? १२. हज करने के लिये सबसिडी मिलती है, जबकि मानसरोवर और अमरनाथ जाने पर टैक्स देना पड़ता है, क्यों ? १३. मदरसे और क्रिश्चियन स्कूल अपने-अपने स्कूलों में बाईबल और कुरान पढा सकते हैं, तो फ़िर सरस्वती शिशु मन्दिरों में और बाकी स्कूलों में गीता और रामायण क्यों नहीं पढाई जा सकती ? १४. गोधरा के बाद मीडिया में जो हंगामा बरपा, वैसा हंगामा कश्मीर के चार लाख हिन्दुओं की मौत और पलायन पर क्यों नहीं होता ? १५. क्या आप मानते हैं - संस्कृत सांप्रदायिक और उर्दू धर्मनिरपेक्ष, मन्दिर साम्प्रदायिक और मस्जिद धर्मनिरपेक्ष, तोगडिया राष्ट्रविरोधी और ईमाम देशभक्त, भाजपा सांप्रदायिक और मुस्लिम लीग धर्मनिरपेक्ष, हिन्दुस्तान कहना सांप्रदायिकता और इटली कहना धर्मनिरपेक्ष ? १६. अब्दुल रहमान अन्तुले को सिद्धिविनायक मन्दिर का ट्रस्टी बनाया गया था, क्या मुलायम सिंह को हजरत बल दरगाह का ट्रस्टी बनाया जा सकता है ? १७. एक मुस्लिम राष्ट्रपति, एक सिख प्रधानमन्त्री और एक ईसाई रक्षामन्त्री, क्या किसी और देश में यह सम्भव है, यह सिर्फ़ सम्भव है हिन्दुस्तान में क्योंकि हम हिन्दू हैं और हमें इस बात पर गर्व है, दिक्कत सिर्फ़ तभी होती है जब हिन्दू और हिन्दुत्व को साम्प्रदायिक कहा जाता है । १8.विश्व में कितने देश है जिनका हिन्दी, उर्दू और अँग्रेज़ी मे नाम हो?जैसे हमारे देश का हिन्दी नाम भारत, उर्दू नाम हिन्दुस्तान और अँग्रेज़ी नाम इंडिया है. 19.क्या विश्व के किसी भी मुस्लिम देश का कोई हिन्दी नाम है? 20. हिंदूओ को धर्म परिवर्तन करके मुस्लिम या ईसाई बनाया जाताहै,क्या कभी हिंदूओ ने ऐसा किया है? 21.हिंदू धन का लालच देकर या जबरन किसी विधर्मी को हिंदू नहीं बनाते क्योकि या तो वो इतने धनवान नहीं या उन्हें अपने धर्म की चिंता नहीं (मिटता है तो मिट जाए) या तो वो कट्टर है जो किसी नीच को अपने धर्म मे शामिल नहीं करते. 22.भारत मे ८४% हिंदू हैं,फिर भी राजनैतिक पार्टियाँ "मुस्लिम वोट बैंक" के लिए क्यो मरी जाती हैं (यहाँ तक कि भा.ज.पा भी). 23.कॉंग्रेस सत्ता मे आकर देश के अहित में अपनी मनमानी,मुस्लिमो का लालन पालन करती है,तो भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता मे आने के बाद ८४% हिंदूओ के लिए क्या कर लिया,क्यो राम मंदिर का निर्माण नहीं करा पाई? 24.चाहे कॉंग्रेस जैसी भी हो देश पर पनौती (राहुल गाँधी) थोपने पर सभी एकमत हैं,पर क्या नीतीश कुमार,आडवाणी आदि के चलते नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो पाएँगे? 25.क्या हिंदूओमें इतनी बुद्धि और हिम्मत हैं की मुसलमानों की नफ़रत के बावजूद मोदी को प्रधानमंत्री बना पाए. ये प्रश्न मेरे लिए सिरदर्द हैं कृपया उत्तर देकर समाधान करें,व मुझे इतना सक्षम बनाए की पूरे विश्वास के साथ,बिना किसी संशय के मैं अपने लोगो की सोच देशहित व जनहित में बदल पाऊँ.

के द्वारा: Ramika Raghuvanshi

he estimated figures for the Hindu population in several Arab countries is as follows. Saudi Arabia 500,000 United Arab Emirates 450,000 Oman 300,000 Kuwait 200,000 Bahrain 100,000 Qatar 90,000 Yemen 6,000  Total: 2.7 million The number of Hindus in other Arab countries, including the countries of the Levant and North Africa, is thought to be negligible, though Libya has an Indian community of about 10,000 [2] individuals, many of whom are likely to be Hindu. It is not known whether any Hindu temples exist in these countries. Historically, links between Arabia and the western coast of India have been strong and persistent. Arab sailors were using the southwest monsoon winds to trade with western Indian ports before the first century CE. An Arab army conquered Sindh in 711. Arab traders settled in Kerala in the 8th century, becoming the ancestors of the Mappilas. In the opposite direction, medieval Gujaratis and other Indians traded extensively with Arab and Somali ports, including Ormuz, Socotra, Mogadishu, Merca, Barawa, Hobyo and Aden. Arab merchants were the dominant carriers of Indian Ocean trade until the Portuguese forcibly supplanted them at the end of the 15th century. Indo-Arabian links were renewed under the British Empire, when many Indians serving in the army or civil service were stationed in Arab lands such as Sudan. The current wave of Indian immigration to the Arab states of the Persian Gulf dates roughly to the 1960s. Hinduism in Oman Oman has a immigrant Hindu minority. The number of Hindus has declined in the 20th century although it is now stable. Hinduism first came to Muscat in 1507 from Sindh. The original Hindus spokeKutchi language. By early 19th century there were at least 4,000 Hindus in Oman, all of the intermediate merchant caste. By 1900, there numbers had plummeted to 300. In 1895 the Hindu colony in Muscat came under attack by the Ibadhis. By the time of independence, only a few dozen Hindus remained in Oman. The historical Hindu Quarters of al-Waljat and al-Banyan are no longer occupied by Hindus. Hindu temples once located in Ma'bad al Banyan and Bayt al Pir, no longer exist; the only active Hindu temples today are the Muthi Shwar temple located in Al-Hawshin Muscat, the Shivatemple located in Muttrah, and the Krishna temple located in Darsait. The only Hindu crematorium is located in Sohar, northwest of Muscat. The most prominent immigrant Hindus (Kutchi), are Khimji Ramdas, Dhanji Morarji, Ratansi Purushottam and Purushottam Toprani. source...wikipedia भैया सिन्हा जी खाड़ी की इससे अधिक जानकारी मैं नहीं जुटा पाया अखेद है|प्रार्थना और इबादत में थोडा सा अंतर है, खैर भैंस और गाय दूर से एक ही जैसे लगते हैं|शेखों की बकरी चराना निहायत ही बड़ा काम होता है, इससे मुझे कोई भी ऐतराज नहीं|मंदिर होगा तब न पूजा करेंगे जनाब?वैसे आँख और नाक बंद करके भी कुछेक साधनाएं की जाती है|आमतौर पर खतरा सामने देख कर आँखों का बंद हो जाना लाजिमी भी है, जब की आप उसका मुकाबला ही नहीं कर सकते|वहां झटका तो मिलता नहीं होगा, कभी कभी डिब्बा बंद बीफ भी मिल जाती होगी..मैंने तो कभी चखा नहीं, शायद लाजवाब हो?वैसे जीतनी सुख शान्ति अपना मुल्क छोड़कर रुपया कमाने में है वैसी शांति हिमालय की ख़ाक छानने में थोड़े ही होगी?अब भैया आग्रह होगा तो दुराग्रह होगा ही, वैसे सत्याग्रह की मार्केटिंग में भी काफी पैसा है|छद्म हिन्दू नामों से अंग्रेजी वाले भी खुबई लिखा करते हैं...अब तो हिंदी में भी मक्काती खूब चलता है|धर्म से तो जोड़ा ही नहीं गया, इसी बात का तो दुःख है जनाब|शायद आप मजहब की बात कर रहे हैं?तार काहे पाइप लाइन जोड़ेंगे, पाकिस्तान जोड़ने दे तब न...सुना है इरान तक पहुँच गया है|एलटीटीइ अबहूँ जिन्दा है का हो?और बब्बर तो यार पाकिस्तान से मदद पाता था न|मुझे लगता है फिर से हिस्ट्री पढनी पड़ेगी| “हर मुसलमान हत्यारा है” इ लोकप्रिय हो गया क्या गुरु?अमा मुझे तो पहली बार पता चलीस है|अब कितना घुलूँगा यार चमड़ी उधर गयी...कमरी उतर गयी|खैर, और घुल के देखता हूँ|एक गो मथानी लेते आइयेगा|

के द्वारा: atharvavedamanoj

स्नेही श्री सिन्हा जी, आपके और कृष्ण जी के कम्नेट में लगभग विपरीत भाव लिखे हैं (कुछेक सार्वभौम जुमलों को छोड़कर)| इस बात को इंसानियत के आधार पर भी सही कहा जायेगा कि सभी को अपनी मान्यताओं के अनुसार प्रार्थना करने का हक़ है| रही आपकी खाड़ी में काम करने की बात तो आप वहां के नागरिक नहीं हैं लिहाजा आपका वहां के वासियों के साथ कोई दुराव होने का मतलब आ बैल मुझे मार वाली बात होगी| आपकी एक बात पर मुझे ऐतराज है ''हिंदी मीडिया मुस्लिम समाज से दुराग्रह रखता है|'' ये पूर्वाग्रह से ग्रसित बात है और हमारी उस भाषा पर कलंक लगाने जैसी बात है जो आप जैसे जहीन व्यक्ति को शोभा नहीं देती मीडिया की बात समग्र में भी करते तो बात समझ में आती आपने तो हिंदी मीडिया को ही कमुनल घोषित करने की बात कही है जो वैसा ही हास्यास्पद है जैसे राहुल और उनके चमचों को भगवा आतंकवाद दिखाई देता है क्या रंगीन आतंकवाद पैदा किया है माइनो के वंशजों ने! मुसलमानों के गलत कामों को इस्लाम के साथ न हिंदी जोडती है, न हिन्दू और न हिन्दुस्तान बल्कि इस्लाम का नाम लेकर सारे गलत काम ये स्वयं करते हैं| सबसे नई जानकारी के लिए अजमल कसाब और अफजल गुरु के बयानों का अध्ययन करें| आपने जिस पोस्ट का जिक्र किया है उसकी एक पंक्ति को प्रस्तुत क्यों कर रहे हैं? मैं तुलसीदास जी की लिखी एक पंक्ति लिखता हूँ यदि अर्थ एक पंक्ति से निकाल दीजिये तो अभी इस्लाम क़ुबूल कर लूं- "मीन मरै गहिरे जल मा," क्या हुआ? है न असंभव! आपने भी यही किया है| शायद जल्दबाजी में आपने पूरी बात न पढ़ी हो मैं लिख देता हूँ और आप ही अर्थ बताइयेगा- ''जब तक आदर्श लुटेरे हैं,जब तक जेहादी प्यारा है| इसमें कोई शक नहीं यहाँ हर मुसलमान हत्यारा है|'' मीडिया कभी भी किसी धर्म को बुरा नहीं बता सकता और यदि बताया है तो कृपया वह उदाहरण साक्ष्य समेत पेश करें क्योकि आपके इस तरह मीडिया के मुस्लिम विरोधी होने का दावा करना भ्रम उत्पन्न कर रहा है| मेरे ख्याल से मंच पर जितने भी प्रबुद्ध ब्लोगर हैं वे आपके इस दावे की हकीकत जरूर जानना चाहेंगे| खाड़ी देशों के बारे में जो आपने बताया है वह जानकारी भी अधूरी है और मुझे पूरा विश्वास है कि मैं अगर जानकारी को पूरा करूँगा तो आपको बुरा लग सकता है जो कि मैं बिलकुल नहीं चाहता| आपकी टिप्पड़ी के लिए अपनी राय को प्रकट करने के लिए हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

मैं कृष्ण जी के कमेंट से सहमत हूँ ! हर किसी को अपनी मान्यताओ के अनुसार प्रार्थना करने का हक़ होना चाहिए, मैं भी उनकी ही तरह खाड़ी के एक देश मे करीब 20 साल से काम कर रहा हूँ और मैंने कभी भी मुस्लिम समाज को अपनी पुजा मे बाधक नहीं पाया, मैं ही नहीं बल्कि लाखो हिन्दू जो खाड़ी देशो मे है , सुख और शांति पूर्वक अपना जीवन बिता रहे है, मेरा मानना है की हमारा हिन्दी मीडिया का एक वर्ग मुस्लिम समाज से दुराग्रह रखता है , आप देखे उनके गलत कामो को हमेशा उनके धर्म से जोड़ दिया जाता है ! भारत मे कोई घटना हो अब उसके तार खाड़ी देशो से जोड़ने का नया फंडा निकाला जा रहा है ! परंतु एलटीटीई के लोग जो ब्रिटेन मे या सिख अलगाव वादी जो कनाडा मे है इन देशो को कभी निशाने पर नहीं लिया जाता है , इस ही तरह स्वयं इस मंच पर "हर मुसलमान हत्यारा है" जैसे लेख लिखे गए और लोकप्रिए हुए ! मेरा कहना है की इस समाज मे घुल कर तो देखिये यह इतने बुरे नहीं है जितना मीडिया इनको या इनके धर्म को बताता है !

के द्वारा: RK Sinha

परम कुचलनीय, श्रीमान एवानजाप्रणयी महोदय| सादर वन्देमातरम| बड़े ही हर्ष का विषय है की आपकी परम अपावन मोहम्मदी पादुका लेखन के क्षेत्र में भी शोहरत के दीदार करना चाहती है|आगे यूहन्ना का सुसमाचार यह है की जब अहराम के दिन बीत जाएँ अथवा इद्दत की मुहलत बीत जाय तो मुशरिकों के दीदार कर लिया करें, कलेजे को ठंडक प्राप्त होगी ...आप तो टोपी ही पहनाने लगे|लाहौल विला कुव्वत....शिर्क है मियां...आपसे दारुले हरब को दारुले अरब करने की ताकीद की गयी थी...आपने एहतराम तोडा है...’’सुनों दिलजानी मेरे दिल की कहानी तुम ..दस्त ही बिकानी बदनामी भी सहूंगी मैं, नन्द के कुमार बदनाम तेरी सूरत पे हौं तो मुगलानी हिन्दुवानी ह्वै रहूंगी मैं’’ यार अपने पुरखों से तो पूछ लिया होता? यहाँ तो वन्देमातरम क्या? बेख़ौफ़ बुतपरस्ती की गयी है मियां ....समझा आप ‘’हमें वाइजों ने यह तालीम दी है की काम दीनी है या दुनियावी है, मुखालिफ की रीस उसमेँ करनी बुरी है, न ठीक उनकी कोई बात समझो, वे दिन को कहें दिन तो तुम रात समझो’’ वाली बिरादरी के हैं|कोई बात नहीं, यही सही तो भाई झंडू बाम, करो थोडा आराम, नहीं तो जब जागेंगे राम, तो समझो हुए विधाता वाम| चातक जी ने लिखा तो समझ लीजिए मैंने ही लिखा...हरफ द हरफ शुरू हो जावुंगा तो फिर खैर ही मनाइयेगा| मकतूल फाय्लान, मकाइल फाईलून, शीशे से नाप नाप गजल लिख रहा हूँ मैं|

के द्वारा: atharvavedamanoj

आप कितने बड़े कायर हैं वह आपके हर शब्द से झलक रहा है और बन्दर जैसी हरकत भी दिखाई दे रही है क्यों नाहक उछलकूद मचा रहे हैं? शालीन बहस की मंशा या फिर कूबत आपके पास होती तो आपकी इस तरह की उछलकूद के बजाय आपका एक ब्लॉग होता जिस पर बाकायदा आपकी पहचान और कुछ नहीं तो आपकी माहान कलम के कुछ छींटे जरूर होते, डरिये मत सामने आने की हिम्मत करिए फिर आपको ये भी पता चल जाएगा की मातृभूमि की इबादत न करने से ईमान की रक्षा नहीं होती बल्कि मातृभूमि के गद्दार पैदा होते हैं| और हाँ एक और जरूरी बात आप बन्दर भी हैं तो मेरे ब्लॉग पर तमीज से दायरे से बाहर निकलने की कोशिश दोबारा मत करना क्योंकि मैं एक ही बार माफ़ करता हूँ दूसरी बार बोलने लायक नहीं छोड़ता| क्षद्म राष्ट्रीयता यतो नेताओं का आवरण होता है या फिर आप जैसे लोगों के लिए जिनके लिए मातृवंदना ईमान के आड़े आती है जिनका नाम और काम दोनों क्षद्म हैं हम जैसे लोगों के लिए नहीं जिनका नाम भी असली फोटो भी और राष्ट्रीयता भी| पहले कथनी और करनी का फर्क हटाओ फिर गाल बजाने आना कलम की मर्यादा समझना आपके वश की बात नहीं| कम कहे को ज्यादा समझना और चिट्ठी को तार| वन्देमातरम!

के द्वारा: chaatak

मुझे ऐसा लगता है की आपको खुद के महान लेखक होने की ग़लतफहमी हो गयी है.... पर सच्चाई यह है की आप जैसे कई कलम घसियारे हैं मुल्क में जो बुनियादी समझ के बावजूद लिखते हैं रहते हैं... गोया की बन्दर के हाथ उस्तरा लग गया है, जहा तक मेरे भयभीत होने की बात है तो मैंने सिर्फ अपना विचार व्यक्त किया था, एक शालीन बहस हर विषय पर हो सकती है.. बहरहाल पर आपके तेवर भी मोदी की तरह मध्ययुगीन बर्बरता लिए हुए मालूम होते हैं... जिस तरह मोदी को अपनी धार्मिक भावनाओं की रक्षा करने की स्वतन्त्रता है जो उन्होंने टोपी नहीं पहन कर की है उसी तरह वंदे मातरम नहीं कहकर (मतलब मात्र भूमि की वंदना/इबादत करना) किसी वर्ग द्वारा अपने ईमान की रक्षा करना भी गलत नहीं... और वंदे मातरम कहकर कई लोग इस देश को घुन की तरह खाने में लगे हैं सिर्फ किसी कोरी शपथ या छद्म राष्ट्रीयता के प्रदर्शन से कुछ हासिल नहीं हो सकता

के द्वारा: avanzalove

रौशनी जी, सादर अभिवादन, मैं भी आपसे सहमत हूँ राजनीतिक फायदे के लिए अपने धर्म को छोड़ना या किसी दुसरे धर्म को अपमानित करना नेताओं के प्रमुख शौक रहे हैं आज जब मोदी किसी धर्म को अपमानित न करके एक स्वच्छ उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं तो उनके इस व्यवहारिक उदाहरण को भी राजनीती और सम्प्रदाय के चश्मे से देखा जा रहा है. मोदी जैसा व्यक्ति यदि प्रधानमंत्री बने तो कमसेकम इतना तो हो ही जायेगा कि राजनीतिक गंदगी को धर्म में स्वीकार्य बनाने वाले मंशाओं को हतोत्साहित होना पड़ेगा. आपकी बात से सहमत होते हुए मैं स्वीकार करता हूँ 'बन्दे में हैं दम !' मुद्दे पर अपने विचार स्पष्ट रूप में प्रस्तुत करने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

वन्देमातरम नाद पर प्रश्न यहाँ उठा है तो आवश्यक है कि भ्रम को दूर करने वाली मित्र मयंक के उद्गारों का एक अंश यहाँ प्रस्तुत कर दिया जाय (उन्ही की अनुमति से)- यह वंदेमातरम शब्द नहीँ यह भारत माँ की पूजा है। माँ के माथे की बिँदिया हैश्रृंगार न कोई दूजा है॥ इसमेँ तलवार चमकती है मर्दानी रानी झाँसी की। इसमेँ बलिदान मचलता है,दिखती हैँ गाँठे फाँसी की॥ मंगल पाण्डे की यादेँ हैँ।शिवराज नृपति की साँसेँ हैँ॥ यह बिस्मिल के भगवान वेद।यह लौह पुरुष का रक्त स्वेद॥ यह भगत सिँह की धड़कन है।आजाद भुजा की फड़कन है॥ यह गंगाधर की गीता है, चित्तू पाण्डे सा चीता है। जलियावाला की साखी है।हुमायूँ बाहु की राखी है॥ यह मदनलाल की गोली है।मस्तानी ब्रज की होली है॥ यह चार दिनोँ के जीवन मेँ चिर सत्य,सनातन यौवन है। यह बलिदानोँ की परम्परा अठ्ठारह सौ सत्तावन है॥ हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसा के बन्दे सब इसको गाते हैँ। सब इसे सलामी देते हैँ,इसको सुन सब हर्षाते हैँ॥ लेकिन कुछ राष्ट्रद्रोहियोँ ने है इसका भी अपमान किया। इस राष्ट्रमंत्र को इन लोगोँ ने सम्प्रदाय का नाम दिया॥ जाओ,जाकर पैगम्बर से पूछो तो क्या बतलाते हैँ? वे भी माता के पगतल मेँ जन्नत की छटा दिखाते हैँ। यह देखो सूली पर चढ़कर क्या कहता मरियम का बेटा। हे ईश्वर इनको क्षमा करो जो आज बने हैँ जननेता।। ये नहीँ जानते इनकी यह गल्ती क्या रंग दिखलायेगी। इस शक्तिमंत्र से वञ्चित हो माँ की ममता घुट जायेगी॥ गोविन्द सिँह भी चण्डी का पूजन करते मिर जायेँगे। शिव पत्नी से वर लेकर ही संघर्ष कमल खिल पायेँगे। फिर बोलो माँ की पूजा का यह मंत्र कम्यूनल कैसे है? माँ को महान कहने वाला शुभ तंत्र कम्यूनल कैसे है? तुम केवल झूठी बातोँ पर जनमानस को भड़काते हो। गुण्डोँ के बल पर नायक बन केवल विद्वेष लुटाते हो॥ लेकिन,जब यह घट फूटेगा।जब कोप बवंडर छूटेगा॥ जब प्रलय नटी उठ नाचेगी।भारत की जनता जागेगी॥ तब देश मेँ यदि रहना होगा।तो वंदेमातरम कहना होगा॥ मनोज कुमार सिँह ‘मयंक’

के द्वारा: chaatak

आपकी टिप्पड़ी पढ़कर लगा आप या तो स्वयं भयभीत हैं या भी दूसरों को भयभीत करने की कोशिश करने के लिए काल्पनिक कहानियाँ गढ़ने वाले व्यक्ति हिन्दुस्तान में सरकार चाहे कितनी भी निकम्मी क्यों न हो यहाँ के न्यायालयों में भले ही न्याय देर से मिले लेकिन इस व्यवस्था में इतना दम हमेशा रहा है की कोई भी आदमखोर और घिनौना व्यक्ति जिसने मध्ययुगीन बर्बरता (लिखा तो आपने है लेकिन क्या आपको पता भी है कि वो मद्यायुगीन बर्बर लोग कौन थे? मुझे पूरा विश्वास है कि आपने बिना जाने लिख दिया है वर्ना आप ये शब्द किसी कीमत पर न लिखते! हड़बड़ी में अक्सर गड़बड़ी हो ही जाती है|) का परिचय दिया हो वो एक सम्मानित नागरिक बनकर भी जी सके किसी प्रदेश का मुख्यमंत्री होना तो दूर की बात है| रही बात वन्देमातरम की तो वन्देमातरम मादरे-वतन की पूजा है ,उसका सजदा है, शब्द नहीं नाद है जिसे सुनकर देशद्रोहियों का कलेजा काँपता है और साम्प्रदायिक शक्तिओं के सीने पर सांप लोट जाता है| आप यदि विदेशी हैं तो इस बात को समझ नहीं पायेंगे और यदि देशी हैं तो किसी न किसी दिन आपको ये बात जरूर समझ में आएगी कि राष्ट्रधर्म किसी भी दूसरी भावना से ऊंचा है और वन्देमातरम उसी राष्ट्रधर्म का ॐ है, अलिफ़ है| इसमें इन्कलाब का घोष भी है और भारतमाता की जयकार भी है|

के द्वारा: chaatak

स्नेही कृष्ण जी, सादर अभिवादन, आपकी टिप्पड़ी और आपकी राय उन कूप-मंडूकों के लिए वरदान हो सकती हैं जो हर एक चीज़ को साम्प्रदायिक नज़र से देखते हैं| इंसानियत को छोड़ हैवानियत पर उतर आये लोगों को सत्य दिखाई नहीं देता और राष्ट्र की आवाज सुनाई न दे इसलिए वे कान खुद बंद कर लेते हैं| कुछ अच्छे आसार नजर जरूर आ रहे हैं क्योंकि जैसे जैसे शिक्षा के प्रति लोगों का रुझान बढ़ रहा है वैसे वैसे अब लोगों की धर्मभीरुता कम और राष्ट्रवादिता ज्यादा प्रेरित हो रही है| पंडितों, पुजारियों का प्रभाव कब का समाप्त हो चुका है और अब मुल्ला, मौलवियों को भी अपनी साख ख़त्म होते दिख रही है| कुछ दिन ये ऐसे ही उपद्रव करेंगे लेकिन अब ज्यादा दिनों तक लोगों को गुमराह नहीं कर पायेंगे| अब वह समय आ रहा है जब हर मुसलमान नौजवान अपने धर्मग्रंथों को स्वयं पढ़कर समझ रहा है और अपने विवेक से उसकी सही व्याख्या कर रहा है गति धीमी है लेकिन यही मंथर गति बहुत जल्द अर्थ का अनर्थ कर आतंकी तैयार करने वाली मानसिकता का वध करेगी| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद! वन्देमातरम !

के द्वारा: chaatak

चातक जी सादर नमस्कार कुछ दिनों पहले मैंने "मोदी जी ने ठुकराई टोपी" पर अपने कमेंट्स के जरिये यह कहना चाहा था की हर देश में स्वदेशी अपने सम्मान के लिए हर संभव प्रयास करता है अगर हिन्दू देश की बात करें तो हिंदुस्तान में अगर मोदी जी ने ऐसा किया तो शायद हिंदुत्व को ध्यान में रखते हुए किया था. मैं अभी ओमान जैसे देश में कार्यरत हूँ. पेशे से मैं एक मरीन इंजिनियर हूँ और अक्सर इरान, इराक, ओमान और पाकिस्तान के लोगो से मिलता हूँ अपने यहाँ के मुसलमानों और यहाँ के मुसलमानों में एक भिन्नता देखी और वो यही है के प्रवासियों के साथ उनका बर्ताव कुछ खास इज्ज़त देने वाला नहीं होता है जबकि अपने यहाँ के मुसलमानों में कम से कम तहजीब तो है. एक मुसलमान अगर अपने धर्म पर कायम रह सकता है तो फिर अगर एक हिन्दू अपने धर्म पर टिका रहे तो इसमें बुराई क्या है? शायद मुझमे राजनीती की उतनी समझ नहीं हो जैसा की कोई दूसरा राजनीतिज्ञ रखता है पर शायद उस टोपी के जवाब में अगर मोदी जी ने उनको अगर किसी हिन्दू देवता का प्रसाद या किसी मंदिर पर मत्था टेकने के लिए कहा होता तो क्या वो ऐसा कर पाते, शायद नहीं क्यूंकि अगर वो ऐसा करेंगे तो शायद इस्लाम उनसे नाराज़ हो जाएगा, मुसलमान उनसे खफा हो जायंगे, अगर लोक प्रभाव के कारन अगर कोई मुस्लमान ये नहीं कर सकता है तो हिन्दू करे ऐसा संभव तो नहीं है............ अच्छा तो यह होता की मुल्ला जी मोदी जी को भारत का झंडा ये कोई गुलाब भेट करते......कोई भी सच्चा हिन्दुस्तानी उसको नहीं ठुकराता....... वास्तव में कोई हिन्दू या मुस्लमान होने से हिन्दुस्तानी नहीं होता है. मेरा यही मत है के जो सच्चे दिल से देश प्रेम को सर्वोपरी रखे वही सच्चा देशभक्त है, ये धर्म जात तो हमने ही बनाये हैं पर परमात्मा ने जो धर्म बनाया उसको हम भूलते जा रहे हैं जो की " इंसानियत" है....... जय हिंद जय भारत.......

के द्वारा: krishna

प्रिय अनुज सुप्रभात ,,कुछ लिखुंगा तो बहुतो के लिए अधिक हो जाएगा ,,,,,,,अभी इसे ही सुन रहा था तो लिख देता हूँ ,,,,,,हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो पी ली है,, डांका तो नही डाला चोरी तो नही की है......और भारतीयों की तो हमेशा से यही सोच रही कि सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः तभी तो सभ्यताओं का विनाश करने वाले आज इस देश में आजादी से विचरण कर रहे हैं और अगर यही आलम रहा तो (सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयः) सुनने को नही मिलेगा ,,, बात करते हैं जो मोदी की गुजारिश है उनसे अपने हाथ की रंगीनियों को भी देखें ,,,,कभी शमशीरों के नीचे सर था आज अगर तलवारें हैं कभी चीत्कार जहां पर थी आज वहां हुंकारे हैं...................जय भारत

के द्वारा: ashvinikumar

प्रिय राजकमल जी, अभिवादन, इतनी छोटी सी शंका व्यक्त करने में इतना सोच रहे थे आप ये जानकर आश्चर्य हुआ. खैर अभी तो आपकी शंका पर बात करते हैं- हम साधारण जन हैं और किसी भी धर्म से ताल्लुक रखने वाले से हम सबसे पहले अभिवादन करते हैं ये भी सही है लेकिन मोदी साधारणजन में नहीं आते वे भारत के एक प्रदेश के मुखिया हैं जो किसी भी धार्मिक व्यक्ति को सम्मान तो दे सकते हैं परन्तु उनके सामने नतमस्तक नहीं हो सकते. सदियों पहले हमारे शासकों के दरबार में राजपुरोहित हुआ करते थे और राजा उनके सामने नतमस्तक होता था लेकिन आप यदि गौर से उन ग्रंथों को पढेंगे तो आपको पता चलेगा कि प्रथम अभिवादन हमेशा राजपुरोहित ही करता था. कोई भी नवागंतुक सन्यासी या धर्मगुरु तो शासक के समक्ष दंडवत करता था, अपना परिचय देता था तत्पश्चात शासक अपने विवेक तथा मर्यदानुरूप उसका स्वागत या अभिवादन करता था. उदाहरण के लिए आप राजा शुद्दोदन को उस सन्यासी द्वारा किये गए अभिवादन का अध्ययन कर सकते हैं जो बड़ी आसानी से आपको दी लाईट ऑफ़ एशिया बुक-३ में पढ़ सकते हैं. अब आते हैं मेरे द्वारा लिखी गई बात पर तो मैंने ये नहीं कहा है कि मुल्ला जी को मोदी के चरण स्पर्श कने चाहिए बल्कि मैंने कहा है 'यदि मुल्ला ये कहते हैं कि उनका प्रयोजन धार्मिक नहीं..........यदि मौलाना ने प्रदेश के मुख्यमंत्री का चरण-स्पर्श करके उसकी पद-गरिमा व उसकी संस्कृति को वही सम्मान दिया होता जो वे अपने जेब में रखी टोपी के लिए चाहते थे|' यानी यहाँ मैंने मुल्ला जी को धार्मिक प्रतिनिधि नहीं बल्कि एक आम हिन्दुस्तानी कहा है. आशा है आपकी शंका का समाधान हो गया होगा. आपके द्वारा उठाया गया प्रश्न निःसंदेह पोस्ट में लिखी गई बात पर किसी के भी मन में उत्पन्न हुई जिज्ञासा को शांत करने में सहायता करेगा. आपका हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

प्रिय चातक जी ......सादर अभिवादन ! हम लोग अगर किसी धार्मिक औरत/पुरुष से मिलते है तो सबसे पहले उसका भेष (भेख ) देखते है और उसी के कारण उसको सबसे पहले नमन करते है ..... उसका आचरण हम बाद में देखते है या फिर हमारे सामने ही बाद में आता है ..... आपके लेख की अंतिम पंक्तिया की मुल्ला जी को मोदी जी को नमन (चरण स्पर्श ) करना चाहिए थे मुझको किसी भी नजरिये से उचित और तर्कसंगत नहीं लगा ..... असल बात तो यह है की मुल्ला जी को वहां पर जाना ही नहीं चाहिए था ...... धार्मिक व्यक्ति का स्तर इतना ऊँचा होना चाहिए की वोह किसी के पास न चल कर जाए बल्कि दूसरे उसके पास चल कर आये ..... मुझको जो आपति थी मैंने बता दी है आप कुछ न कहने के लिए भी स्वंतत्र है ..... जय हिंद

के द्वारा: rajkamal

स्नेही राजकमल जी, अभिवादन, मेरी कभी भी इच्छा ये नहीं होती कि मेरी बात से सभी सहमत हों या सिर्फ मेरा समर्थन ही करें, आप आजतक प्रेषित मेरी किसी भी पोस्ट को देखेंगे तो आपको यह अंदाजा हो जाएगा कि मैं सिर्फ उन लोगों से विचार न रखने की अपील करता हूँ जिनके पास कोई विचार ही नहीं होते. मैंने हमेशा हर तरह की टिप्पड़ी का स्वागत किया है सिर्फ बेहूदी और बेतुकी (या कहूं गाली गलौज वाली) टिप्पड़ियों का मैं विरोधी हूँ बदतमीजी मैं किसी के साथ करता नहीं और कोई अमर्यादित होकर बात करे वह मैं सहन भी नहीं करता. और मेरे विचार से आपके कमेन्ट में ऐसा कुछ नहीं होना चाहिए जिसे मैं ये सोचूँ कि आप न बोलते तो अच्छा होता. यदि आपके पास सचमुच कुछ विचारणीय बात कहने को है तो जरूर कहिये स्वागत है. मेरे विचार यदि कहीं पर गलत हैं तो मैं जरूर स्वीकार करूंगा और मुझे लगा कि आपको सिर्फ शंकाएं है और मेरे वश में है तो उनका समादान करने की कोशिश भी करूंगा.

के द्वारा: chaatak

स्नेही जमाल जी, आपकी सभी बाते निहायत उम्दा और काबिले तारीफ़ हैं और कोई भी व्यक्ति आपसे असहमत हो ही नहीं सकता. निश्चय ही आप एक बेहद ज़हीन और सुलझे हुए इंसान है और मुझे ये कहने में भी कोई ऐतराज़ नहीं कि प्रकरण पर आपकी दृष्टि बिलकुल जायज है, लेकिन भाई एक बात समझ में नहीं आती है कि गुड़ जैसे इस लेख में (कमेन्ट नहीं कहूँगा क्योंकि आपने यहाँ पर अपनी पोस्ट को ही पेस्ट किया है) एक कील क्यों छुपा रखी है? 'वैसे भी नाराज तो उससे हुआ जाता है जिससे प्यार का कोई रिश्ता हो।' मेरे ख्याल से प्यार का रिश्ता तो हर हिन्दुस्तानी से होना चाहिए भले ही हम उससे कितने भी नाराज क्यों न हों. हम तो नफरत सिर्फ उससे करते हैं जो हमारे राष्ट्र का गद्दार हो और मोदी ने ऐसा कुछ नहीं किया जिसे आप मुल्क से गद्दारी कह सकें. जो भी हो आपकी विद्वता और शैली ने ख़ासा प्रभावित किया. प्रतिक्रिया को प्रकट करने का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

हमारे हिंदू भाई शकुन-अपशकुन को बहुत मानते हैं। यह उनकी चिंता का विषय हो सकता है। कुछ लोगों ने मोदी जी के इस अमल के बारे में तरह तरह की बातें लिख डालीं। लोग जानते तो यह बात न लिखते कि गेरूआ वस्त्र पहनने पर फ़तवा जारी हो जाता। सबको पता होना चाहिए कि मुसलमान मौलाना सफ़ेद लिबास पहनते हैं और चिश्ती साबरी दरवेश गेरूआ रंग भी इस्तेमाल करते हैं। हिंदू आचार्य और सन्यासी भी इन दोनों रंगों को इस्तेमाल करते हैं और दोनों ने ही आज तक इन दोनों रंगों को लेकर कोई फतवा जारी नहीं किया है। मोदी भाई साहब ने मुस्लिम टोपी नहीं ली तो उनकी इच्छा। इसमें मुसलमानों को नाराज नहीं होना चाहिए। वैसे भी नाराज तो उससे हुआ जाता है जिससे प्यार का कोई रिश्ता हो। हम तो उनसे नाराज हैं जो टोपियां पहन पहन कर वहां गए, मोदी जी को 'टोपी पहनाने'। http://readerblogs.navbharattimes.indiatimes.com/BUNIYAD/entry/%E0%A4%9F-%E0%A4%AA-%E0%A4%A8-%E0%A4%B2-%E0%A4%A8-%E0%A4%95-%E0%A4%AF-%E0%A4%A4-%E0%A4%9C-%E0%A4%97-%E0%A4%B5-%E0%A4%A6-%E0%A4%A8-%E0%A4%B9

के द्वारा: Dr. Anwer Jamal

स्नेही श्री सिन्हा जी, आपका उत्तर पढ़कर बहुत अच्छा लगा कि आपने मंच पर स्वस्थ बहस कैसे हो इसका बिलकुल सटीक उदाहरण प्रस्तुत किया, कभी कभी हमरे बीच में मतभेद होते हैं लेकिन ये हमारे बीच कडवाहट का सबब नहीं हो सकते (यदि हम ऐसा करने को तत्पर हों) यहाँ पर एक चीज़ खुल कर सामने आई और वह ये है कि कम से कम आडवाणी के बारे में हमारी राय एक जैसी है और राजनीतिक पार्टियों के बारे में भी हम एक जैसे ही खयालात रखते हैं. एक थोडा सा अंतर दिखा मोदी के बारे में हमारी और आपकी राय के बीच और उसका कारण भी एक सामान है यानी हम विचार के केंद्र को देखें तो आप और हम दोनों फिर एक ही चीज़ के लिए चिंतिति हैं और वह है राष्ट्रहित, आर्थात हमारे व्यक्तिगत या धर्मगत पक्ष फिर गौड़ है. मेरी यही मंशा है कि जब बात राष्ट्र की हो तो धर्म गौड़ हो जाना चाहिए यानी मुल्ला अपनी टोपी और नमाज़ न छोड़े और पंडित अपना तिलक और शंखनाद और ये तभी हो सकता है जब आप मुल्ला से किसी मूर्ति के चरणस्पर्श की और पंडित से टोपी पहनने की आशा न रखें. हमारे सामने उदाहरण स्वरुप अशफाक उल्ला खान और रामप्रसाद बिस्मिल की बेमिसाल दोस्ती का उदाहरण है. एक बार फिर दोहराना चाहूँगा- 'आओ सभी दीवारों को तोड़ दें!' का नारा कागज़ पर लिखने से अच्छा परिणाम देता है लेकिन इंसान अभी देवदूतों से बहुत नीचे का प्राणी है इसलिए दीवारें तोड़ने पर व्यव्गारिक जीवन में सिर्फ नंगापन और वैमनस्य मिलेगा. व्यवहारिक जीवन को जो चीज़ संतुलित और सौहार्दपूर्ण बना सकती है वह है 'Good fences make Good neighbours!' यानी हमारे बीच सम्बन्ध उतने ही मजबूत हो सकते हैं जितनी कि हमारे बीच की दीवार. प्रतिक्रिया द्वारा एक स्वस्थ बहस को दिशा देने का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

स्नेही चातक जी, आपका उत्तर पा कर हर्ष हुआ, स्वस्थ बहस ही नए निष्कर्ष और नयी सोच देती है ! जहाँ तक बीजेपी और मुस्लिम समाज का सम्बन्ध है तो पिछले ७-८ सालो से यही दोनों नाम शाहनवाज हुसैन और अब्बास नकवी के अलावा कोई नहीं सुनने को मिला, और इन दोनों व्यक्तियों का इनके समाज में क्या प्रभाव है जग ज़ाहिर है ! नेताओ का सिर्फ एक धर्म होता है वह है सत्ता हथियाना , आप देखे मुलायम सिंह भी हिन्दू है लेकिन उन्होंने कारसेवको पर गोली चलवाई, मायावती दलित है लेकिन दलितों के लिए क्या किया ? तो शाहनवाज हुसैन और अब्बास नकवी का होना बीजेपी के मुस्लिम प्रेम का सुबूत नहीं है ! पगड़ी वाली बात इशी मंच पर जागरण ब्लॉग में एक दो दिन पहले थी आप देखे तो मिल जायेगी अभी कल की ही एक न्यूज़ है की अडवाणी ने मोदी के बढ़ते क़द को कम करने के लिए अपनी रथ यात्रा बिहार से निकालने का फैसला किया और २० सालो में पहली बार २५/०९ को सोमनाथ यात्रा पर नहीं गए ! ८४ साल की आयु में सत्ता का यह मोह ? कहने का मतलब यह है की सभी को बस सत्ता चाहिए ! जहाँ तक धर्म परायणता की बात है तो एक अच्छा और सच्चा धार्मिक व्यक्ति हमेशा अच्छा शासक हो गा शर्त यह है की वह धर्म को चोला सिर्फ दिखावे के लिए ना पहने हो, कोई भी धर्म हिंसा का पाठ नहीं देता है और ना ही अपने गुण गान के लिए झूट का सहारा लेता है ! जस्टिस सच्चर ने साफ़ कह दिया की मोदी अपने भाषण में झूट बोले ! बहरहाल यह बहस ऐसे ही चलती रहेगी और सब को अपने विचार रखने का अधिकार है बस उद्देश्य स्वस्थ होना चाहिए और किसी की भावनाओं को ठेस न पहुचे यह ध्यान रखना चाहिए !

के द्वारा: RK Sinha

प्रिय अबोध जी, ये आपकी जर्रानवाजी है जो आपने मुझे इतने सारे अलंकरण से विभूषित कर दिया वास्तविकता तो ये है कि मैं अपने आपको इस मंच पर चमकने वाले बहुत से सितारों (जिनमे से आप भी एक हैं) से मिलने वाली रौशनी में प्रकाशित एक रेत का कण मात्र समझता हूँ जिसे आप सितारों का अगाध स्नेह प्राप्त होता है| आपने जब मेरी टिप्पड़ी के बारे में लिखा तो मैं स्वयं भी बहुत हैरान हो गया और थोडा शर्मिंदगी का भी अहसास हुआ कि मैं समझता हूँ कि मैं आपसे बहुत स्नेह करता हूँ लेकिन आपको जिस तरह मेरी आखिरी टिप्पड़ी की तारीख तक याद है वह दर्शाता है कि आप का स्नेह मुझ पर कहीं ज्यादा है ऐसे में मैं सिर्फ इतना कह सकता हूँ कि आपकी शिकायत और आपका ये स्नेह सर आँखों पर कोशिश करूंगा कि आगे से आपको शिकायत का मौका न दूं!

के द्वारा: chaatak

स्नेही श्री आर के सिन्हा जी, आपने बिक्लुल सही कहा कि सच कहना मुश्किल होता है परन्तु इसको छिपाना और भी मुश्किल लेकिन आगे लिखते समय आप थोडा सा पूर्वाग्रही हो गए आपको भी कहीं न कहीं ग़लतफ़हमी है कि मोदी और उनकी पार्टी मुस्लिम समाज से नफरत करती है आप जरा गौर करेंगे तो आपको भी सच्चाई पता चल जाएगी भा.ज.पा. में शाहनवाज हुसैन और अब्बास नकवी भी हैं और मुझे नहीं लगता कि पार्टी मुसलमानों से नफरत करती है इसलिए ये प्रबुद्ध राजनेता मोदी के साथ कंधे से कन्धा मिला कर हमेशा चलते हैं क्या आपको लगता है कि ये ऐसे मुसलमान हैं जो अपने धर्म से नफरत करने वालों के साथ रहते हैं सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने के लिए? दूसरी बात- मोदी किसी भी दुसरे धर्म की पगड़ी धारण करते हैं ऐसा आपको किसने बता दिया भाई? हिन्दू और सिक्खों को छोड़कर कोई दूसरा पगड़ी धारक नहीं होता और इन दोनों में भी पगड़ी सिक्खों की धार्मिक आस्था का प्रतीक है हिन्दुओं की नहीं! आपने शायद ध्यान नहीं दिया ओसामा बिन लादेन भी पगड़ी पहनता था! तो क्या वो हिन्दू या सिक्ख बन गया था? लेकिन टोपी (सारी नहीं सिर्फ नमाजी टोपी) इस्लाम की धार्मिक निष्ठा का प्रतीक है| तीसरी बात सद्भावना कार्यक्रम में मुस्लिम धर्मगुरुओं को सद्भावना के साथ बुलाया गया था और उन्हें भरपूर स्वागत और महत्व भी दिया गया (क्योंकि मोदी सिर्फ हिन्दुओं के नहीं पूरे गुजरात के मुख्यमंत्री हैं) परन्तु ये कार्यक्रम मोदी ने इस्लाम स्वीकार करने के लिए नहीं बुलाया था और न ही उन्होंने कोई धार्मिक मुद्दा मंच पर उठाया फिर धार्मिक टोपी कहाँ से निकल आई? चौथी बात जिसका जवाब शायद मुझे नहीं देना चाहिए क्योंकि मैंने पोस्ट में भा.ज.पा. का जिक्र नहीं किया है फिर भी आपकी जिज्ञासा शांत करना चाहूँगा- भा.ज.पा. के मुखिया वही लालकृष्ण जी हैं जिन्होंने पाकिस्तान में जाकर जिन्ना को सेकुलर बताया था और उन्हें आज भी अपनी राजनीती की दूकान चलानी है सो वे कभी खुद इफ्तार की दूकान खोल देते हैं तो कभी राजनीती के लोभी लोगों के द्वारा आयोजित इफ्तार में शामिल हो जाते है और कौन नहीं जानता कि वो सिर्फ खाने के लिए जाते हैं क्योंकि रोजा तो इनमे से कोई रहता नहीं| :) पांचवी बात- आपको फिर गलतफहमी हुई है मैंने मोदी का गुणगान नहीं किया है एक कठपुतली की तुलना में एक पुरुषार्थी को देश की बागडोर दिए जाने की बात पर अपनी सहमति व्यक्त की है और वह भी खासकर इसलिए कि वह 'पाकिस्तान जैसे नासूर का जड़ से इलाज करने की बात डंके की चोट पर करता है प्रेम पत्र लिखने की नहीं' छठी बात- किसी भी व्यक्ति द्वारा यदि अपने धर्म में अडिग रहते हुए राष्ट्रसेवा की जिजीविषा होना संकीर्ण मानसिकता है तो इस सिद्धांत के पोशको को एक बार समाज और इतिहास की प्रयोगशाला में फिर से इसका परीक्षण करना चाहिए| 'एक ज़माना था जब धर्मग्रंथों में लिखा था सूरज धरती का चक्कर काटता है' ये तथ्य उतना ही गलत है जितना ये मानना कि वह व्यक्ति देश की टोपी की इज्जत बचा पायेगा जो अपने धर्म को बेच आया हो| राष्ट्रधर्म वह धर्म है जिसका निर्वाह वही कर सकेगा जो अपने धर्म का निर्वाह करना जानता होगा| आशा है आप किसी बात का बुरा नहीं मानेगे और मेरे द्वारा प्रस्तुत विनम्र आग्रह को समझने की और यदि मैं गलती कर रहा हूँ तो उसे व्याख्यित करने की कोशिश करेंगे| प्रतिक्रिया द्वारा विषय पर चर्चा आगे बढाने का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

सच कहना मुश्किल होता है, परन्तु इसको छुपाना और मुश्किल, मुस्लिम समाज से मोदी और उनकी पार्टी की नफरत बीजेपी के छुपे हुए एजेंडे का एक हिस्सा है जो कभी कभी खुल कर सामने आ ही जाता है ! जब वह मंच पर अन्य धर्मो की पगड़ी धारण कर सकते है तो फिर मुस्लिम टोपी से परहेज़ क्यों ? फिर मुस्लिम धर्मगुरूओ को बुलाना और मुस्लिम समाज को इस सध्भावना (?) मिशन से जोड़ने के लिए विशेष तय्यारी क्यों ? यदि मुस्लिम टोपी से इतनी नफरत तो फिर बीजेपी मुस्लिम बहुल शहरो में रोज़े अफ्तार का आयोजन क्यों करती है उसके नेता इसमें क्यों शामिल होते है ? आप के द्वारा मोदी के जो गुण गान किये गए है तो एक बात समझ ले इतनी संकीर्ण मानसिकता वाला व्यक्ति भारत की मिली जुली संस्कृति को साथ लेकर चल पायेगा यह एक बड़ा सवाल है !

के द्वारा: RK Sinha

चातक जी, मेरे लिए बड़े गर्व की बात है की आप मुझे अपना मित्र कहते हैं, ( मेरा मानना है की इस मंच का वास्तविक सुपर स्टार कोई है तो वो आप ही हैं, जिसकी लेखनी में इनती शक्ति है की अगर वो केवल दो शब्द भी लिखे तो वो अनगिनत कमेंट्स का ...., और फीचर तो हर हाल में होता है, ये मै आपसे इश्यवश नहीं कह रहा हूं बल्कि आपके विद्वानता, ज्ञान, और लेखन की उस ओज को नमन कर रहा हूँ जो की जगविदित है ) और आपने कहा की समय की अति व्यस्त के कारण ... ...., पर जब मै मंच पर लिखे और ब्लॉग पर देखता हूँ तो आपके कमेंट्स की बारिश अक्सर जगहों पर नज़र आ जाती है, सूखा केवल इस अबोध के ........, मैंने अपने को आउट कास्ट कहने के पहले कई ब्लोग्स पर आपके कमेंट्स देखते तब ही ये कहा ... वैसे आपका लास्ट कमेंट्स मेरे ब्लॉग पर ४ जुलाई को आया था ...., और उसके बाद मेरी कई पोस्ट आ चुकी है, मेरे ख्याल से, आंकड़े आपको ........... फिर भी आपका आभारी हूँ की आपने कम से कम मुझे मित्र कहा, (माना हो ये पता नहीं). मेरे विचार से प्रारंभ से ही मै आपके हर पोस्ट पर, भले ही मै आपसे मतभेद रखता हूँ, पर अपने विचार अवश्य रखता आया हूँ, एक बार से आपका आभारी हूँ की आपने मुझे मित्र की संज्ञा दी और और मेरे विचार पर अपने उत्तर से ....

के द्वारा: abodhbaalak

चातक जी एक बार आपके ब्लॉग पर उपस्थित हूँ, ये जानते हुए की आप आप इन विषयों पर मेरे विचार से अवगत हैं, ये जानते हुए की आप कभी भी मुझ आउट कास्ट के ब्लॉग पर अपने विचार ..... खैर जाने दें.. पहली बात, मोदी जी को लेकर देश में तो बड़े एक्सट्रीम ग्रुप हैं, एक उन्हें मसीहा और युगपुरुष मानता है और दूसरा...... रही बात टोपी और मुल्ला जी, तो भाई मेरे, दोनों ही खेल रहे हैं, मुल्ला जी को उन्हें टोपी पहनना ही गलत था, और मोदी जी को ढेरो मुसलमां धर्मगुरुओं को मंच पर बुलाना, वो भी, अब वो अपनी इमेज कुछ और बनान छह रहे हैं. सबसे राजनीति के हथकंडे हैं भय्या मेरे, हम तो बस चुपचाप देखते रहगें, कहेंगे तो लोग कहेगे की अबोध .......... http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

के द्वारा: abodhbaalak

स्नेही श्री हरीश भट्ट जी, सादर अभिवादन, निःसंदेह मोदी एक सक्षम राजनेता है और हम उनके हाथों में हिन्दुस्तान का सुरक्षित भविष्य देखते हैं| संभव है कि कुछ लोगों को ये विचार पसंद न हों या उन्हें मोदी पर संदेह हो लेकिन जबकि हमारे सामने गुजरात का विकास और सौहार्द का उदाहरण है तो जो लोग उन्हें भारत का प्रधानमंत्री देखना चाहते हैं उनके तर्कों को भी जरूर देखना चाहिए| भय की कोई बात नहीं हम तख़्तनशीं करने की ताकत रखते हैं तो हमारे अन्दर तख्तापलट करने की कूबत भी तो है, जरूरत है कि हर हिन्दुस्तानी भय का परित्याग कर राष्ट्र-निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाए| प्रतिक्रिया द्वारा वार्ता को आगे बढ़ने का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

भरोदिया जी, यहाँ आपकी बात में मैं एक और तथ्य जोड़ना चाहूँगा- मोदी विरोधी (राष्ट्र विरोधी) ताकतों ने मीडिया का भी जबरदस्त गलत इस्तेमाल किया था. मोदी के ऊपर आरोप लगाया गया कि उन्होंने गोधरा में जलाये गए ४९ हिन्दुओं की लाशें अहमदाबाद में मंगवा कर जनता के आक्रोश को भड़काया और नतीजा ये हुआ कि सांप्रदायिक हिंसा को रोकना मुश्किल हो गया. लेकिन मीडिया ने ये नहीं लिखा कि वे ४९ लाशें इसलिए अहमदाबाद लाई गयीं थी क्योंकि वे सभी अहमदाबाद के ही निवासी थे. क्या हम ये मान लें कि यदि कोई हिन्दू इस तरह के धार्मिक उन्माद का शिकार हो तो उसकी लाश भी उसके घर न भेजना सेकुलरिज्म कहलायेगा? लानत है ऐसे सेकुलर लोगों पर और ऐसी सोच वाले राजनीतिक दलों पर!

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: rakeshsrivastav

कृष्ण जी विचारों में विरोध होना जरुरी है ,समाज के विकास का यह स्वस्थ संकेत है | जरूर कभी ये बात सच होगी , आज नही है । जब विचार करने वाले सिध्ध पुरुष , ज्ञानी या विज्ञाने होते है तब ये बात जरूर सत्य है । वो एक दुसरे के विरोधी विचारों का अध्ययन कर के सही निचोड निकाल लेते है । अपने गलत विचार को सुधार लेते है, समाज के लिये अच्छा है । लेकिन आज किस के विचार टकराते है ? न कोई सिध्ध, न ज्ञानी न विज्ञानी, सब अलेल टप्पु । कोई अपनी बात छोडता नही । टकराव चालु, लडाई चालु । लडाई से किस समाज का विकास होगा । आतन्कि को सजा देना नही देना विचारों का विरोध है । ये समाज का विकास तो क्या समाज का नाश करेगा । अब ज्यादा जरूरत है एकता की ।

के द्वारा: bharodiya

तमन्ना जी दंगे सिर्फ वडोदरा नही पूरे गुजरात भडके थे । और बडे पैमाने पे थे । कोई भी प्रशासन उसे रोक नही पाता । गुजरात का प्रिंट मिडिया पूरा कोन्ग्रेसी है, टी.वी. भी कम नही है । मोदी के प्रशासन की विफलता को बडी चालाकी से दूसरी दिशा दी गई । दंगे की चिनगारी, गोधरा की ट्रेन मे हिन्दुओं का सामुहिक कत्लेआम भुला दिया गया और मुस्लिमों की मौतों को बार बार दिखाया गया । ऐसी अफवाहें फैला दी की दंगे मोदीने करवाये । जनून का समय था , मुस्लिमों को तो मानना ही था, कुछ मुर्ख हिन्दुओं ने भी मान लिया । ऐसे ही १४-१५ मुर्ख मोदी के ही गांव के, मेरे यहा काम करते थे । वो सब भी टी.वी देख के जोश मे आ गये थे । सबने सुना की दंगा मोदी ने करवाया है, तो सीधा ठप्पा ही मर दिया, हा, ऐसा करना ही चाहिये, जरूर करवाया होगा । लोगोंने देखा नही ये बात कौन, किस मकसद से केह रहा है, बस किया-करवाया के चक्करमे मोदी को बदनाम कर दिया । लोग भूल, पश्चाताप और माफी की बात करते है । किस बात की माफी ? बात उनकी विफलता की होती तो मांग लेते पर हत्यारे का आरोप लगा दिया था । कौन स्वाभिमानी नेता मुर्खों के सवाल के जवाब देता और अपना बचाव भी करता । कोर्ट को ही जवाब देना था जो दे दिया । मोदीने भी अनशन से ईशारा कर ही दिया । समजदार तो साथ हो लिए मुर्ख अभी आशा लगाए बैठे है के मोदी अभी माफी मांगेंगे, उनकी टोपी देंगे हमारी लेंगे । ये टोपा-टोपी का खेल नही था बस चेक कर लिया कौन कहां है।

के द्वारा: bharodiya

स्नेही वासुदेव जी, सादर अभिवादन, आपके विचार जितने सटीक हैं उतने ही स्पष्ट भी. राजनीति के दूषित पक्ष की आलोचना और उसका बहिष्कार करना जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक है कि इसके राष्ट्रवादी रूप का सम्मान करना और उसे समर्थन देकर राजनीतिक प्रदूषण को हटाने में मदद करना. मोदी के प्रयासों की मैं भी सराहना करता हूँ और छद्म धर्म-निरपेक्षों के उलट उनकी स्पष्टवादी सोच और कर्म का भी मैं प्रशंसक हूँ. आज ज्यादातर लोगों को जब उनके प्रधानमंत्री बनने की मंशा पर संदेह होता है तो मुझे या शायद हर राष्ट्रवादी हिन्दुस्तानी को हर्ष की अनुभूति होती है कि एक ऐसा पुरुषार्थी हमारे देश का प्रधानमन्त्री बने जो गरजते हुए कहता है कि पाकिस्तान को उसी की भाषा में जवाब देना होगा बजाय इसके कि उन आतंक-पोशाकों को प्रेम-पत्र लिखे जाएँ. मोदी के ऐसे विचार यदि किसी को सांप्रदायिक प्रतीत होते हैं तो मैं इस सम्प्रदायवाद का समर्थन करता हूँ यदि ये विचार नौटंकी हैं तो मुझे लगता है ऐसे नौटंकी-बाजों को ही हिन्दुस्तान की सरकार चलाने का अवसर हमें प्रदान करना चाहिए. आपकी बेबाक टिप्पड़ी का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

चातक जी, सादर अभिवादन| जहाँ तक मेरा विस्तार है तो मैं उन लोगों के विचार से सहमत नहीं हूँ जो किसी भी राजनैतिक घटना कार्य प्रतिक्रिया को राजनैतिक ढोंग कहकर खंडन करने मे बुद्धिमत्ता समझते हैं| क्या आज का पढ़ा लिखा वर्ग बिना राजनीति का भारत चाहता है.....? जहां राजनीति है वहाँ कुटिलता स्वाभाविक है, हमारे राष्ट्रनायक चाणक्य की भारत दिग्विजय उनकी कौटिल्य संज्ञा और इसकी यथार्थ पर ही सिद्ध हुई| प्रश्न यह मौलिक और प्रासंगिक है कि कुटिलता का उद्देश्य स्वार्थ है स्वार्थियों का प्रतिरोध......!! मैं मोदी जी के ऐसे किसी भी प्रयास को इसलिए उचित मानता हूँ क्योंकि काँग्रेस और अन्य छद्म-निरपेक्षों के इतने दिनों के कुटिल राष्ट्रघाती प्रयासों के विरुद्ध वे एक सबल प्रतिरोध हैं| राजनैतिक ढकोसले के प्रतिफल मे विकास और राष्ट्र-सम्मान देना राष्ट्र लूटने वाले ढकोसलों से श्रेष्ठ है|

के द्वारा: vasudev tripathi

के द्वारा: ashutosh

तमन्ना जी, यही तो मैं भी कह रहा हूँ की जिस मंच पर मोदी को टोपी पहनाने की कोशिश की गई वह कोई धार्मिक मंच नहीं था वहां या तो राजनीति हो रही थी या भी राष्ट्रनीति (जैसा की मोदी ने कहा) ऐसे में धार्मिक भावनाओं को उत्तेजित करके या किसी धर्म विशेष को लज्जित करवा कर मुल्ला जी अपना कौन सा उल्लू सीधा कर रहे थे? रह गई बात मोदी की तो गुजरात एक बहुत ही पढ़े लिखे और जागरूक लोगों का प्रदेश है और वहां के लोग उन्हें स्पष्ट बहुमत दे रहे हैं इसका मतलब सीधा है- गुजराती गुमराह नहीं बल्कि उन्हें अपनी राह पता है और उन्हें ये भी मालूम है 'दंगा करने के लिए दंगाई यानि कातिल गुनाहगार थे मोदी नहीं' वर्ना इतनी आसानी से वे बहुमत में न आ पाते| आपकी विस्तारित एवं संतुलित प्रतिक्रिया का तहे-दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

स्नेही श्री पाण्डेय जी, इस ब्लॉग पर आपकी इतनी सकारात्मक प्रतिक्रिया पढ़कर उस विश्वास को बल मिलता है की पत्रकारिता में अभी भी सत्य और तथ्य सामने रखने का जज्बा भी है और साहस भी| 'कठमुल्लापन और रुढ़िग्रस्तता से पीड़ित मुस्लिम धार्मिक गुरुओं ने जहालत की महान परंपरा स्थापित की है' इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता| ये प्रश्न क्यों नहीं उठाया जाता की गुजरात दंगों के बीज जिस गोधरा नरसंहार ने बोये वो क्या समाजसेवा थी? न्याय निष्पक्ष और आलोचना निर्भीक होनी चाहिए लेकिन राजनीती और राष्ट्रनीति में विभेद कर पाने वालों की खासी कमी है प्रबुद्ध वर्ग में भी, शासन में भी और प्रशासन में भी| आपकी इस विस्तारित प्रतिक्रिया ने लेख को जो पूर्णता प्रदान की उसका हार्दिक धन्यवाद! आपके लेख का इन्तजार रहेगा|

के द्वारा: chaatak

प्रिय चातक जी, बहुत दिनों बाद मंच पर उपस्थित हुआ हूं और आप की मौजूदगी देखकर हर्ष का अनुभव हो रहा है. इसी विषय पर मैं भी लिखने जा रहा था इसलिए आपके ब्लॉग पर अपनी प्रतिक्रिया जरूर देना चाहता हूं. कठमुल्लापन और रुढ़िग्रस्तता से पीड़ित मुस्लिम धार्मिक गुरुओं ने जहालत की महान परंपरा स्थापित की है. अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों को साधने की कोशिश के कारण राष्ट्र के प्रति उनकी निष्ठा हमेशा संदेह के घेरे में रही है. दुखद ये है कि आम मुसलमान भी इनके जाल में फंसा हुआ है. उसे विकास और राष्ट्र दोनों नहीं दिखते. मीडिया हो या राजनीतिज्ञ दोनों गुजरात दंगों की बात करते हैं किंतु उन्हें गोधरा नरसंहार  नहीं दिखता. हर क्रिया की प्रतिक्रिया स्वाभाविक रूप से होती है. लोगों को निष्पक्ष होना चाहिए तभी न्यायसंगत बात की जा सकती है. आपका आलेख राष्ट्रवाद से ओतप्रोत होने के कारण अति प्रशंसनीय है. धन्यवाद

के द्वारा: rkpandey

कमजोर इन्सान भी तब चिन्हुंक उठता है जब उसके अपने या अपनों के ऊपर जान पर बन आती है एक ये सत्ता में बैठे लोग है जिनको न तो गलती महसूस होती है न ही शर्म महसूस होती है संसद में बम विस्फोट हुआ अफजल गुरु को सिर्फ इस लिए सजा नहीं दी जारही क्यूंकि एक तबके के वोट बैंक नाराज हो जायेंगे, (अफजल गुरु को संसद हमला मामले में दोषी ठहराते हुए 18 दिसंबर 2002 को एक स्थानीय अदालत ने फांसी की सजा दी थी। दिल्ली हाई कोर्ट ने 29 अक्तूबर 2003 को दिए फैसले में इस सजा को बरकरार रखा। इसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट में अपील की जो 4 अगस्त 2005 को नामंजूर हो गई। सेशन जज ने तिहाड़ जेल में उसकी फांसी की तारीख (20 अक्तूबर 2006)भी तय कर दी थी। मगर, उसके बाद उसने राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर कर दी जहां से इसे गृह मंत्रालय के पास भेजा गया। मंत्रालय ने अभी तक याचिका अपने पास ही रखी है।) उसी अफजल को बचाए रखने का नतीजा कल दिल्ली में निकल गया "हूजी की धमकी, अफजल गुरु की फांसी रोको वरना सुप्रीम कोर्ट उड़ा देंगे"

के द्वारा: div81

बड़ी देर कर दी मेहरबां आते आते ,,कल दो चीजें एक साथ हुईं दोनों मतलब समझो भाई ,,,एक तो वो बड़ा वाला तरबूज जैसा जैसा बम ,,और दूसरा भारत ने दिया एक तोहफा अपने माँ जाए भाई बंगलादेश को भारतीय भूमि बंगलादेश के 1,70,000 मुसलमानों को भारत में शरण दी जाएगी जिनकी कुल भूमि है 5400 एकड़ ,,,,,और भारत के 30000 हिन्दुओं की 17500 एकड़ भूमि बंगलादेश को दी जा रही है ,,,, और साथ में भारत के हिन्दुओं के ऊपर एक शर्त भी थोपी गयी है की यदि आप भारत सरकार से अपनी भूमि पर कोई दावा नहीं करते हैं तो आप भारत में कहीं भी रह सकते हैं ,,,,,ये देश हमारा है ? है न दोहरी खुशी,,, धर्मनिर्पेक्क्ष्ता की जय हो ,,नही राम नाम सत्य हो .................................................जय भारत .........यार गुस्सा तेरे पर ही निकाल दिया अब सतत मशाल जलाए रखना :)

के द्वारा: ashvinikumar

के द्वारा: Ramesh Bajpai

के द्वारा: manoranjan thakur

स्नेही बंधु पीयूष जी, जिस तीव्रता से हमारे देश के कर्णधार हमारी संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों का बंटाधार कर रहे हैं उससे तो यही लग रहा है कि आने वाले समय में जब पुत्र कहीं अपने पिता का नाम लिखेगा तो उस फ़ार्म में कई कालम हो जायेंगे (जैसे- जन्म से पहले संभावित पिता का नाम, जन्म के समय माता का पति, बच्चे के पालक पिता का नाम, व् अन्य (यदि लिव-इन-कभी लागू हुआ हो तो), और अंत में होगा डी.एन.ए. रिपोर्ट की सत्यापित प्रति| इस तरह के परिवार में हम अपनों के लिए किसी तरह के त्याग की कल्पना भी करें तो हमारी नादानी होगी| ईश्वर का धन्यवाद कि हमें शायद उसके पहले इस दुनिया से कूच कर जाना है, ये भी एक तरह कि आनर किलिंग ही है| एक विचारपरक टिप्पड़ी द्वारा उत्साहवर्धन का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

भ्राता चातक जी..... छोटी किन्तु बहुत ही भावप्रधान कथा है ये... कई दिनों से प्रतिक्रिया देने की सोच रहा था पर समयाभाव के कारण नहीं दे सका ....... इस कहानी को पढ़ कर लगा की शायद ये अब नई पीढ़ी पर लागू न हो...... अपने बहुत करीब लगी ये कहानी..... हमने इस भाव को महसूस किया है की जब माता पिता ने अपने सपने हम बच्चों के लिए छोड़ दिये....... पर हम बच्चों ने भी उन सपनों का सम्मान किया॥ पर अब बच्चे खुद अपने माता पिता के सपने बेचने को तैयार हैं....... कई लड़के देखे 16-17 साल के मुह पर सिगरेट, बाइक लहराते हुए भरी सड़कों पर खतरनाक स्टंट करने का प्रयास करते हुए..... उनको समझाने पर उनको इस बात से कोई नहीं पड़ता की अगर उनको कुछ हो जाए तो उनके माता पिता के सपनों का क्या जो उन्होने उसके लिए देखे हैं...... वो बस ऐसे ही जीना चाहते हैं.........

के द्वारा: पीयूष पंत

स्नेही बन्धु मनोज जी सादर वन्देमातरम, आपकी टिप्पड़ी में राष्ट्र की पीड़ा और आम आदमी का दर्द दोनों बयां हो रहा है परन्तु हताश होने जैसी कोई बात नहीं जब तक दिल में कहीं आग जल रही हो| अदम जी भी सिर्फ एक ही स्थिति से डरते हैं- "जो बदल सकती है इस दुनिया के मौसम का मिजाज, उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये.." मजबूत राष्ट्र की इकाई होता है मजबूत परिवार और इस बात को ये काले अंग्रेज भली भांति जानते हैं इसीलिए कभी अधिकार के नाम पर कभी जुल्म और सितम का झूठा बहाना करके तो कभी रिश्तों के बीच क़ानून को जबरदस्ती घुसा कर ये कुत्सित लोग परिवार नाम की संस्था को कमजोर करते रहते हैं व्यक्तिगत स्वार्थ जिसका हमारी जीवन पद्धति में कोई स्थान ही नहीं है उसे ये बदतमीज मानवाधिकार कहकर पेश करते हैं यही कारण है की ना तो हम अपने परिवार के लिए कोई त्याग कर पाते हैं और न राष्ट्र के लिए| कैसी अजीब विडम्बना है कि आज हमारे लिए हमारी लड़ाई हम स्वयं नहीं बल्कि एक नेपाली संत लड़ रहा है और हंस कर तमाम कष्ट उठा रहा है| मेरे ख्याल से बालकृष्ण का विश्वबंधुत्व किसी भी भारतीय से ज्यादा सराहनीय है और उनकी भारत निष्ठा किसी भी भारतीय कहलाने वाले धरती के बोझ से ज्यादा बलवती है| वन्देमातरम!

के द्वारा: chaatak

प्रिय मित्र और बंधू चातक जी... पता नहीं कितनों ने सपने देखे और पता नहीं कितनों के सपने चकनाचूर हुए|सत्ता हस्तानान्तरण से पूर्व देखे गए सपनों को निर्मम सत्ता ने अपने कुटिल पैरों तले कुचल दिया...आज से कुछ ही दिन बाद इन सपनों की वर्षगाँठ मनाई जायेगी...कुछेक घरियाली आंसू बहाए जायेंगे|शहीदों की चिताओं पर मर्सिया पढ़ा जाएगा|जीते जी जिन्होंने पुरे राष्ट्र को सपना दिखाया, मरने के बाद उनकी पीढियाँ उन्हें विकास का सपना दिखाएंगी|एक ही दिन के लिए सही पुरे राष्ट्र की आँखों में सपना होगा|एक ही दिन में सदियों से भूखी आँखों को अफीम का इतना ओवरडोज दिया जाएगा की कम से कम छह महीने तक लोग एक ही तरह का सपना देखते रहें|कहना न होगा की सपनों का यह व्यापारी हद से ज्यादा शातिर और चालाक है..हमें गर्व है की यह व्यापारी हमारा माबूद है|वन्देमातरम|बहुत ही भावपूर्ण किन्तु आज की परिस्थितियों में इसका कोई मोल नहीं है मेरे भाई|

के द्वारा: atharvavedamanoj

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: arun

प्रकाश जी, आप काफी क्रोध में प्रतीत होते हैं और जब बहस एक ऐसे मुद्दे पर हो तो क्रोध लाज़मी भी है परन्तु इस तरह का प्रदर्शन कुछ अच्छा नहीं लगा इसीलिए आपके कुछ शब्दों की बीप-बीप तो करनी ही होगी| आप अपने विचार रखें, तर्क रखे, सहमति, या असहमति प्रकट करें ये तो अच्छा है लेकिन इस तरह से करें, कम से कम मेरे ब्लॉग पर तो नहीं! रह गई कृष्ण की बात तो वे अपने समय के सर्वश्रेष्ठ थे 'समरथ को नहीं दोष गोसाईं!' पढ़ा तो होगा| फिर भी एक बार कृष्ण के व्यक्तित्व से अपनी तुलना करके देखिये, आपको तो आपके गाँव या मोहल्ले में भी सारे लोग नहीं जानते (कितने मशहूर हैं आप!), कृष्ण से पूरे जीवन कोई जीत न सका ऐसा महायोद्धा था वह (आप सिर्फ चार घर ट्राई कर लो शायद पड़ोस में ही कोई इतना ताकतवर मिल जायेगा कि आपको महीनों होश न आये) कृष्ण ने गीता के उपदेश दिए जिनकी व्याख्या कर पाना इस समय के सर्वोत्तम विद्वान के लिए भी टेढ़ी खीर साबित हो जायेगी (आपकी उपलब्धि क्या है भाई?) छोडो सारी बड़ी-बड़ी बातें आपकी छोटी बात लेते है- सिर्फ एक प्रेमिका के नखरे झेल के दिखा दो तो जाने, कृष्ण तो सभी की ख्वाहिशें पूरी करते थे :) ! अभी मैंने कृष्ण के मानवीय पक्ष की ही बात की है देवत्व की नहीं| हैं आप किसी कोने भर के भी? तो बाबू पहले किसी की तुलना अपने आप से करने से पहले देखो तो कि कर क्या रहे हो आपकी अपनी लम्बाई तो नाप लो सुमेर परवत को बौना बताने की कोशिश बाद में करना| एक बार प्रेम से कहो राधे-राधे ! ॐ शांतिः शान्तिः शान्तिः !

के द्वारा: chaatak

टूटे ख्वाब रूठे नसीब! रात भर बैठ कर अब रोता है वो, याद कर कर अपने बीते अतीत को, कैसे सजते थे वहां उसके रौनक मेले, लोग जलते थे देख कर,उसके नसीब को, जब खुशियाँ मुड़ वापिस आती हर-पल, ढूंढ़ने उसे या शायद चूमने उसकी दहलीज़ को, वक्त का पहिया घूम घूम कर तेज़ भागता, लौट कर आने को हो, खोजता किस तरतीब को, वो हर शह को समझता था अपना गुलाम, लुभाता था वो एक सा, अपनों को या रकीब को, रातों के काले साए भी नो छू पाए , उसे कभी, रौशनी के दौर चलते सदा, होकर उसके करीब को, पर जैसे बदलते है यारों मौसम के भी हर दौर, पड़ गए उसके नसीब के धागे भी कुछ कमज़ोर, रातें भी आने लगी अब होकर स्याह उसके करीब, टूट गए थे सब ख्वाब, रूठ गए सब उसके नसीब ./....

के द्वारा: vivekgoel

के द्वारा: pallavi

हे पार्थ , आओ जुल्म का करो तुम अंत, चला दो चक्र श्रीकिशन जी के तेज़ का, मिटा दो धरती से पापियों बलात्कारियों को मिले न सुख उन्हें किसी सेज का, जो मासूमों की अस्मिता से खेल करें और संग विच्छेद करे,नन्हे पावन संबंधो को, आओ उस पापी की वध करें , छीन भिन्न अंग विहंग करे, सबक दे ऐसे दुर्बंधों को, उनका जो साथ दे , पापी का हाथ बने, ऐसे दुराचारियों को भी नाश करे आज हम, रुक न जाए कभी, रोध्ररूप धर के बस , ऐसे समाज का भी विनाश करे आज हम, जो प्रतिहारी और प्रतिकार भी करे हमारा प्रतिरोध, दे उनको भी आज हम रोंद के रख, न्याय की प्रत्रिक्षा नहीं, कोई अनुरोध, विनती नहीं , न्याय स्वयं बन जाये कोंध के हम, ऐसे दुराचारी को केवल मृत्यु का भास् हो उससे कोई परिहास या हास न कर सके यहाँ, ऐसे समाज का निर्माण हो, देविस्वरूप कन्या का मान सम्मान हो, प्रेम मिले हर जगह ////

के द्वारा: vivekgoel

अनीता पॉल जी, मुझे लगता है की नारी मुक्ति शब्द ही गलत है,नारी कोई बंधुआ नहीं है ,इसकी जगह लछ्य ये होना चाहिए की महिलाओ को समाज निर्माण में भागीदारी किस तरह से बढाया जाए . जितने भी नारी हिमायती है वो इस पुरे मुहीम को को गलत दिशा में ले जा रहे है,और इसका एक मात्र कारन नारी समाज को ठीक तरह से न समझाना है, प्रो. कुसुमलता केडिया (लेखिका गांधी विद्या संस्थान वाराणसी की निदेशिका हैं) के सुझाव इस विषय में प्रासंगिक मनाता हूँ. भारत में ‘नारी मुक्ति’ के मायने हैं (1)भारतीय इतिहास के विषय में तथ्यों का संकलन (2) क्रिश्चिएनिटी की भयावह मान्यताओं के रेलिजियस और दार्शनिक आधारों की सही समझ (3) उन मान्यताओं के कारण उन्मत्त ‘क्रिश्चियन’ साम्राज्यवाद द्वारा विश्वभर में किए गए बर्बर अत्याचारों और लूट की जानकारी (4) इस लूट और अपमान से हुई क्षति की पूर्ति की मांग ब्रिटेन तथा सम्पूर्ण क्रिश्चियन समाज से करना, (5) भारत से ‘एंग्लो-सेक्सन ला’ की विदाई की मांग करना। जब तक यह ‘एंग्लो-सेक्सन ला’ भारत में राज्य की विधिव्यवस्था का आधार है, तब तक भारत में हिन्दू धर्म को वैसा ही राजकीय संरक्षण दिए जाने का दबाव बनाना जैसा ‘क्रिश्चिएनिटी’ को ‘एंग्लो-सेक्सन ला’ के अंतर्गत सेक्युलर ब्रिटेन में प्राप्त है (6) भारतीय स्त्री की गौरवशाली परम्पराओं की पुनर्प्रतिष्ठा एवं (7) शासन, सेना, प्रशासन सहित विज्ञान प्रौद्योगिकी, कला, व्यवसाय आदि सभी क्षेत्रें में हिन्दू स्त्री की बुध्दि को फलवती होने देने की व्यवस्थाएं बनाने और प्रावधान किए जाने का दबाव बनाना तथा श्रेयस्कर राष्ट्र तथा श्रेयस्कर विश्व के निर्माण में हिन्दू स्त्रियों की भूमिका के लिए पथ प्रशस्त करना। यहां ‘हिन्दू स्त्री’ शब्द का प्रयोग बहुत सोच-विचार कर विवेकपूर्वक किया जा रहा है क्योंकि हिन्दू स्त्रियों का गौरवशाली इतिहास एक तथ्य है और इस सत्य के बल पर ही हिन्दू स्त्री अपनी प्रज्ञा और शील के प्रकाश तथा उत्कर्ष से स्वयं को और शिक्षित भारतीय समाज को भ्रांत धारणाओं से मुक्त रख सकती है। वह भारत की मुस्लिम और क्रिश्चियन स्त्रियों के दुख भी बांट सकती है। करुणा भाव तथा मैत्री भाव से उनकी सहायक भी बन सकती है। कम्युनिस्ट तथा अन्य यूरोख्रीस्त मत के प्रभावों वाली हिन्दू स्त्रियों की भ्रांति और विचलन को भी दूर करने में आत्मगौरव सम्पन्न हिन्दू स्त्री ही समर्थ हो सकती है। ऐसी हिन्दू स्त्री वीरता, कंटकशोधन, भारत के वैभव-विस्तार, सुसंस्कार, समृध्दि, विपुलता के प्रवाह की पोषक और संरक्षक के नाते वैविधयपूर्ण रूपों में पुन: प्रतिष्ठा पाएगी, यही भारत में नारी मुक्ति के सच्चे मायने हैं।

के द्वारा: y.dubey

आदरणीय चातक जी, आपने जिस पछ को इंगित किया है उसकी जानकारी मुझे नहीं थी इसके लिए आप सराहना के पात्र है, अगर इस नजरिये से ये आन्दोलन होता है तो मै इसका समर्थन करता हूँ,सिवाय एक चीज के की महिलाओ को सेक्सुअल पार्टनर की संख्या तय करने का हक है।महिला हो या पुरुष संख्या तय करने का मतलब होता है गणिका , वेश्याओ को पहले गणिका कहा जाता था क्योकि अंत में वे गणना करती थी की उन्होंने कितने पुरुषो से सम्बन्ध बनाए ,महिला हो या पुरुष सेक्सुअल पार्टनर की संख्या तय करना कानूनन तो कानून का जानकर ही बता सकता है लेकिन सामाजिक अपराध की ही श्रेणी में आएगा और जब तक ये सोच रहेगी यौन कुंठित लोगो की समाज में बढ़ोतरी होती रहेगी और महिलाओ के ऊपर मानसिक और शारीरिक अपराध होते ही रहेंगे.आशा करता हूँ की उमंग के साथ ही साथ समस्त महिला और पुरुष समाज अपनी इस तरह की सोच और तथाकथित आजादी से बाहर आएगा ,इस सोच के बिना उमंग के आन्दोलन की सफलता की कामना करता हूँ.

के द्वारा: y.dubey

तमन्ना जी, देश दयावान है लेकिन कायर नहीं सच बाताइये जब आपने मासूम हिंदुस्तानियों के क़त्ल की बात सुनी तो क्या आपके दिल ने नहीं कहा कि काश मेरे हाथ में थोड़ी सी भी प्रशासनिक शक्ति होती तो आज कातिलों की भी रूह कांपती? क्या उन क्षत-विक्षत मानव अंगों को देखकर आपके दिल में नहीं आया कि काश एक बार अजमल कसाब मेरे सामने आ जाता? कुछ नहीं तो कम से कम इतना तो दिल जरूर भर आया होगा कि आँखें नम हुई होंगी, एक हूंक तो जरूर उठी होगी, नहीं चीख तो एक सिसकी जरूर घुटी होगी? क्या नहीं हुआ ऐसा? क्या दया जैसी कोई भावना या माफ कर देने जैसा कोई विचार आया दिल में? सरकार यदि नाकारा है तो कहिये नाकारा है और हमें इसकी कोई जरूरत नहीं, जिस विधान में आतंकियों के लिए दया है कहिये कि वो विधान नपुंसक है जिन्हें मासूमों की मौत पर फर्क नहीं पड़ता कहिये कि वे राक्षस हैं| कहने से ही बात निकलेगी और बात निकलेगी तो दूर तलाक जायेगी| वन्देमातरम!

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: surendra shukla bhramar5

अनीता जी, मुझे लगता है आपको उम्मीद नहीं छोडनी चाहिए फिर भी आप बार-बार नाउम्मीद हो जाती हैं| शायद पुरुषों के साथ आपके अनुभव ने शायद आपके ऊपर ये प्रभाव डाला होगा| आपसे एक शिकायत है कि आप मुद्दे को हमेशा गलत ढंग से पकडती हैं| आपका पुरुष विरोध भी ठीक है लेकिन आप किसी अन्य स्त्री की गलत छवि प्रस्तुत करके अपना उल्लू सीधा क्यों कर रही हैं? आपके साथ शायद कोई छल कर गया और आपने एक कुंठा अपने मन में पाल ली बस वही आपका पीछा नहीं छोडती है| और आप उसे दर्शा कर बार बार इस बात को सिद्ध कर देती हैं कि कुछ महिलायें शारीरिक ही नहीं मानसिक स्तर पर भी बहुत कमजोर होती हैं (पुरुषों से भी ज्यादा)| एक बात है आपका गालियों का इनसाइक्लोपीडिया काफी अच्छा है झट से जान लिया कि 'कुलटा-छिनाल स्त्री, वेश्या स्त्री' सब पुरुषों ने बनाया है| किसी स्त्रीवादी की किताब में पढ़ा है या स्वयं के अंतर्ज्ञान से जान लिया? बुरा मत मानियेगा परन्तु जिस तरह का स्त्री दमन आपने लिखा है वह हिंदुस्तान में कम पाश्चात्य देशों में ज्यादा है इसके प्रमाण है मेरे पास लेकिन वे इतने घिनौने हैं कि सार्वजनिक मंच पर नहीं रखे जा सकते| हालाकिं इन बातों से आप भी अच्छे से परिचित हैं लेकिन आप स्वीकार कर लेंगी तो फिर आपकी कुंठा का क्या होगा? पहले अपने अंदर से वैमनस्य की ग्रंथि को हटाइये और फिर खुद से पूछिए कि स्त्री पर अमानवीय अत्याचार हिन्दुस्तान में ही सबसे कम क्यों? जवाब नहीं मिलगा तो फिर मुझसे पूछियेगा प्रमाण सहित बताऊंगा| आशा है आप अपनी बात ऊपर रखने की सोच से जल्द बाहर आकर अपने लेखन कौशल का सही प्रयोग करने की कोशिश करेंगी| आपका चातक

के द्वारा: chaatak

चातक जी, उम्मीद के विपरीत आपने मुद्दे को ठीक ढंग से पकड़ने की कोशिश की जिसके लिए आप बधाई के पात्र हैं. आपने भारत में स्लट वॉक के आशय को सही समझा लेकिन बात यहीं समाप्त नहीं होती. महिलाओं पर पुरुष वर्ग का वर्चस्व, मर्दवादी अहंकार का प्रदर्शन, उन्हें भोग्या समझा जाना हजारों वर्षों के संस्कारों में शामिल कर लिया गया है. ये संस्कार जब तक पीछा नहीं छोड़ेंगे, जब तक इंसान को इंसान नहीं समझा जाएगा, स्त्री को मुक्ति नहीं मिलेगी. स्त्री-पुरुष का ये संघर्ष पुरुषवादी नजरिए की देन है. पुरुषों ने महिलाओं पर जुल्म ढाने के लिए तमाम कुतर्क गढ़े हैं. कुलटा-छिनाल स्त्री, वेश्या स्त्री, सती-सावित्री की पदवी ये सब ढकोसले पुरुषवादी वर्चस्व की देन हैं जिन्हें स्त्रियों को अपने चंगुल में बांधे रखने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. जिन स्त्रियों ने अपनी नैसर्गिक स्वतंत्रता को तिलांजलि देकर दासता ओढ़ ली, उन्हें भी आपका समाज शोषित करता है, जिन स्त्रियों ने विरोध की चेष्टा की, उन्हें भी प्रताड़ना द्वारा सजा मिली. अंततः सारा मामला स्त्री के अस्तित्व को खत्म करके उसे हमेशा के लिए मूक-बधिर परिचारिका बनाए रखने से संबंधित है. आशा है आप बात को समझने की कोशिश करेंगे.

के द्वारा: Anita Paul

स्नेही राज जी, इस बात से मैं भी इत्तेफाक रखता हूँ की भारत को किसी सॉलिड मोर्चे की जरूरत है और युवतियां जहाँ तक हो सके आत्मरक्षा के लिए भी आत्मनिर्भर हों| सेक्स की स्वछंदता बिलकुल अलग मुद्दा है जिसपर एक स्वस्थ निर्णय लेने की जरूरत है वैसे लिव-इन-रिलेशन के प्रकाश में आने से सरकारी और अभिजात्य वर्ग की सोच स्पष्ट हो चुकी है| जहां तक दुराचार का सवाल है हमें इस बात को स्वीकार करना होगा कि ये जितना पीड़ादायक एक सीधी-सादी स्त्री के लिए है उतना ही एक वेश्या के लिए भी ऐसे में स्त्री के चरित्र को आधार बना कर पीड़ा को आंकना मेरी नजर में अन्याय भी है और क्रूरता भी| दुराचार के विरुद्ध यदि सिर्फ वेश्याएं भी मोर्चा निकालेंगी तो मैं उसे भी पूरा समर्थन दूंगा| लेकिन वह यदि वेश्यावृत्ति को जायज ठहराने की कोशिश करे तो मैं उसका विरोध करूँगा| आपकी इस प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

आदरणीय चातक जी ...सादर अभिवादन ! आपका यह लेख पढ़ने के बाद मन में यह विचार उठे की *क्यों कुछेक लोग सिर्फ सनसनी पैदा करने के लिए सही बातो को अपना हित तथा स्वार्थ साधने के लिए तोड़ मरोड़ कर पेश करते है ..... *जब इनको इस मंच से कुछ प्राप्त होने वाला नहीं है तो फिर हम किस मुंह से ऐसी हरकते करने वाले नेताओं को दोष देने का अधिकार रखते है .... *यह देख कर ताज्जुब तथा अचरज होता है की इतनी छोटी सी उम्र में एक बालिका में कितनी परिपक्वता है ..... सच में ही उसका कहा गया एक एक शब्द सोचने पर मजबूर तो करता ही है शर्मिन्दा होने की बजाय सर को गर्व से ऊँचा करने का एक अवसर भी प्रदान करता है ..... इस सच्चाई को सभी ब्लागरों के सामने लाकर आपने एक नेक तथा सराहनीय कार्य किया है इसके लिए आप मुबारकबाद के पात्र है धन्यवाद :) :( ;) :o 8-) :|

के द्वारा: Rajkamal Sharma

स्नेही भ्रमर जी, आपकी प्रतिक्रिया में आपने लेख की एक लाइन पर ऐतराज जताया है जबकि मुझे स्वयं पूरे लेख पर ही ऐतराज है हिन्दुस्तान जैसे संस्कारी राष्ट्र में अपसंस्कृति की पैदायाशों ने इस लेख को लिखने पर विवश किया है| इसी एक पंक्ति पर आपसे जवाब चाहूंगा मैंने स्त्री के बात-बात पर कपडे उतारने को अमादा होने की बात कही तो आपको बुरा लगा लेकिन जब पूजा भट्ट, मधु सप्रे, ममता कुलकर्णी, और अब पूनम पाण्डेय हर खुशी और विरोध कपडे उतार कर ही जाहिर कर पाती हैं तो आपका क्या दृष्टिकोण है| क्या ये जायज है? इस तरह की ओछी हरकतें नारी सशक्तिकरण के ढोंग के पीछे कुंठित महिलाओं की कामपिपासा का परिणाम नहीं है? नारीसशक्तिकरण जिस्म की नुमाइश करने से होगा ऐसा मानने वाले किस कदर कुंठित है इसका अंदाजा लगाना क्या कठिन है| नारी गुलाम नहीं ये दर्शाने के लिए एवरेस्ट फतह करने की बात क्यों नहीं आई क्या महिलाओं ने पहले भी ऐसे उदाहरण पेश नहीं किये हैं? जिन लोगों को आज स्त्री का देह प्रदर्शन उसकी अंतर्निहित शक्ति का प्रदर्शन लगता है, आश्चर्य नहीं कि कल मानसिक रूप से बीमार इन लोगों को पुरुष द्वारा किया जाने वाला बलात्कार उसकी मासूमियत का प्रदर्शन प्रतीत होने लगे| आपकी टिप्पड़ी ने लेख के इस बिंदु को विस्तार देने में सहायता की इसके लिए आपका धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

प्रिय चातक भाई बहुत ही सार्थक और गंभीर विषय आप का -इस के एक नहीं अनेक कारण होते है जिसमे शुरुआत तो हमारे घर परिवार से नैतिक आचरण सिखाने से होती है अगर कोई हमारी भारतीय संस्कृति को गले लगाये प्यार से रह माँ बहनों के बीच में पला है सिखा है पढ़ा है नैतिक आचरण तो सभ्य होगा शिष्ट होगा चन्दन सा होगा विष नहीं भरेगा -न वह अपनी बहन बेटियों माताओं को इस तथाकथितआधुनिक सभ्यता के चरम पर जाने देगा पुरुष हो या स्त्री दोनों अपने घर से ही बनते बिगड़ते हैं कुछ ही मित्रों और बाहरी परिवेश में कुछ मानसिक विकृतियों के कारण -सब का इलाज है -जहाँ गलत दिखे विरोध शुरू हो -शुरू से ही -उन्हें प्यार से सिखाएं -समझाएं -गलत राह न पकड़ें- जड़ मजबूत होगी तो तना बचेगा - हमारा नैतिक आचरण-संयम -कठोर दंड -विकृत मानसिक वालो का इलाज सहायक होगा - केवल निम्न समाधान जो आप ने सुझाया काफी नहीं है -(वहीँ स्त्री स्वयं भी बात-बात पर कपडे उतारकर) ये लिखना जायज नहीं है - समाधान है सिर्फ संयम! पुरुष के लिए भी और स्त्री के लिए भी जहां पुरुष स्त्री का सम्मान कर अपने बालकों को स्त्री का सम्मान करना सिखाएं वहीँ स्त्री स्वयं भी बात-बात पर कपडे उतारकर और लघु-वस्त्रों की नुमाइश कर अपने बच्चों को कुंठित और बलात्कारी को प्रेरित न करें पुरुष भी बराबर का भागीदार है इसमें पुरुष ही पिता पुरुष ही साथी पुरुष ही बेटा है जो ये karta करवाता है .... स्त्रियाँ भी खुलेपन से बचें और सीता सी मर्यादा सीखें -

के द्वारा: surendr shukl bhramar5

प्रिय श्री चातक जी ' समाधान है सिर्फ संयम! पुरुष के लिए भी और स्त्री के लिए भी ' दुःख का विषय तो यह है की यहाँ समाधान पर ध्यान देने के बजाय स्त्री व पुरुष के नजरिये से दोषारोपण हो रहा है जो शायद इस विचार वान मंच व विद्वान् जनों की गरिमा के अनुकूल नहीं लग रहा | नारी हमारे संस्कारो में बेटी ,बहन या माँ के साथ सामाजिक परिपेक्ष्य में परिवार की रीढ़ यानि पत्नी होती है | ' किसी भी नारी के साथ हुआ अन्याय या बलात्कार सभ्य समाज के ऊपर करार प्रहार होता है जिसका दंस कहा न कही किसी न किसी रूप में पुरुष को झेलना ही पड़ता है ,चाहे भाई ,पिता या पति के रूप में ही सही | सभ्य समाज के इस घिनौने व घ्रणित कलंक से बेटियों .बहनों को को बचाने के उपाय पर सार्थक चिंतन होना ही चाहिए |

के द्वारा: Ramesh Bajpai

अनीता जी न तो नारी अल्पसंख्यक है और न ही समाज कांग्रेसी सरकार की तुस्टीकरण होता रहे......आप जो भी कहे वो ठीक और दूसरा कुछ कहे तो गलत. घूँघट की आंड में होने वाले कुकृत्यों ने कितनो की जान ली और कितने बदनामी के डर से आत्महत्या के रस्ते चले गए कुछ भान है आपको? बलात्कार से ज्यादा खबरे इस बात पर आती है की दो या तीन बच्चों की माएं किसी के साथ भाग गयीं, बिनब्याही बालाओं की गिनती नहीं.यदि आप किसी पर एक ऊँगली उठाते है तो भी चार आपकी तरफ होती हैं और यहाँ तो आप सभ्य गालियों का उपयोग कर रहीं है......यदि आपके साथ पूर्व में किसी ने कुछ गलत किया है तो उसके लिए पूरी पुरुष जाती को दोष देना कहा तक उचित है? ऐसा मैंने इसलिए कहा की आपके अन्दर जितनी कुंठा है पुरुषो को ले कर उसका कोई और कारण समझ नहीं आता.

के द्वारा: anoop pandey

खुरानाभाई मफ करना ये कोइ कविता या वार्ता नही है , ये नन्गा सत्य दिखानेवाला लेख है । ईसमे दिखाया हर सत्य काला ही है । कही कोइ चीज अभूत सुंदर नही है । ताला तो शरिफो के लिये होता है, चोरो के लिये नही । वो तो कोइ भी ताला तोड देगा । बिलकुल ऐसे ही बलात्कार के कानून का है । पशु जैसा आदमी कानून से नही डरता । लेकिन हम और आप जैसे डरते है । ईस मे कानून सफल रहा है । हम और आप जैसे लोगो का आबादी मे बहुत बडा हिस्सा है । ये हिस्सा ईस पापसे बच गया वो कानून की बडी सफलता है । पशु जैसा आदमी कानून तोडता है उसे अपवाद मानना चाहीये ।  आदमी मे पशुता रहेगी तब तक ये चलता ही रहेगा । मानव अधिकारवालो को तो ईन पशुओ मे भी आदमी नजर आता है । वो फान्सी की बात, खसीकरण की बात ( जातिय अन्ग काटना ) या कोई बडी सजा हजम नही कर सकता । दुनिया की सरकारे मानव अधिकारवालो के ईशारे चलती है । है कोई गुन्जाईश ।

के द्वारा: bharodiya

अनीता जी, आपने काफी आवेश में (या कहूँ क्रोध में) एक फुंकार मारती टिप्पड़ी की और अपने नारीवादी होने का फ़र्ज़ निभा दिया| आपके विचार से यदि मैं पुरुषवादी मानसिकता से पीड़ित हूँ तो आपको भी तो नारीवादी मानसिकता की कुंठा चैन से नहीं बैठने देती| दूसरी बात ये की आपने लेख को पढ़ा भी नहीं और समझा भी नहीं और अपनी असहमति जाहिर करने में जल्दबाजी कर गईं| आप जैसी नारीवादी विचारक से ये आशा नहीं थी| आपने कामपिपासा वाली बात बिलकुल सही कही है परन्तु आप यदि सही अर्थों में नारीहित सोचती हैं तो बताइये क्या महिलायें कामपिपासु नहीं हैं? ( मैं ये मजबूरी में लिख रहा हूँ क्योंकि वैसे बात आपको समझ में नहीं आयगी) सम्मान का हकदार तो पुरुष भी है लेकिन जब उसका चरित्र सम्मान के काबिल हो (क्या आप अपने पिता या अपने भाई का सम्मान नहीं करती? या फिर वे पुरुष नहीं?) ठीक इसी तरह स्त्री को भी सम्मान तभी मिलेगा जब उसका चरित्र इस लायक होगा| सिर्फ एक देह प्राप्त कर लेने से यदि आप सोचती हैं कि आप सम्मान की पात्र हो गयीं तो आप हमेशा इसी तरह सम्मान पाने के लिए भटकती रहेंगी| मैं किसी भी सकारात्मक बदलाव के लिए तत्पर हूँ यदि ये आपके मार्गदर्शन से ही संभव हो तो मुझे बड़ी ख़ुशी होगी अतः एक बार और लेख को पढ़ें और बिना किसी पूर्वाग्रह के अपनी राय दें| आपकी राय उचित होगी तो परिवर्तन अपने आप हो जाएगा| जरूरी नहीं कि आप ब्लॉग पर ही राय दें आपकी मेल का भी स्वागत है|

के द्वारा: chaatak

स्नेही मित्र मनोज जी, सादर अभिवादन! उन्मुक्त यौनाचार एक ऐसा मुद्दा है जहां सिर्फ पुरुष दोषी नहीं है वहां स्त्री भी बिलकुल बराबर मात्र में दोषी है इसीलिए मैंने इस प्रकार के यौनाचार को लिखते समय इस लेख में स्त्री और पुरुष शब्द का प्रयोग न करके 'नर' और 'मादा' शब्द का प्रयोग किया है यानी मैं उन्हें सभ्य समाज का हिस्सा नहीं मानता और बलात्कार एक असामाजिक कृत्य है जो एक स्त्री पर जबरन एक वहशी द्वारा किया जाता है और आप भी इस कृत्य को सजाये-मौत से कम के लायक नहीं मानते| चूंकि इस लेख में मैंने सिर्फ बलात्कार की समस्या को ही उठाया है इसलिए उन्मुक्त आचरण पर ज्यादा लिखना मुनासिब नहीं था| मीडिया के लिए ऐसी ख़बरें सिर्फ मसाला आइटम हैं क्योंकि कई बार ऐसा लगता है मानो कोई संवेदनहीन नुमाइश को कैश करने की कोशिश कर रहा हो| विचारों के इस क्रम को आगे बढ़ाने के लिए हार्दिक धन्यवाद! वन्देमातरम!

के द्वारा: chaatak

अनिता आप सभ्य समाज की बात कर रही है । आदमी अभी सभ्य नही हुआ है । सभ्य आदमी कानून से डरता नही मान रखता है । समाज का मान रखता है । अपने धर्म, भगवान का मान रखता है । ईस केस मे आप को कुछ भी नजर आता है ? अभी तो आदमी को प्राणी समज समज कर ही कानून बनाये जाते है उसे कन्ट्रोल करने । धर्म भी उसे प्राणी समज कर उसे सुधार के की कोशीश कर रहे है ताकी उसके आचरन मे कुछ नैतिकता आए और पाप कर्म ना करे । ये कानून और धर्म की बुदरत के साथ लडाई है । ये चाहते है कुदरत का बनाया मानव प्राणी अच्छा ईन्सान बने लेकिन बार बार हार जाते है । वही मानव प्राणी पशुता पर आ ही जाता है । पशु तो पशु है वो हमारी या आपकी सलाह क्यो मानेगा की वो कन्ट्रोल मे रहे । ऐसे पशु को भडकानेवाली कोई चीज पशु से दूर रखा जाये ईसमे ही सलामती है । ईस की मूल जड है समाज खूद । अजगर जैसा हो गया है । हर सुख डकारना चाहता है, अपना या पराया ।

के द्वारा: bharodiya

प्रिय मित्र चातक जी.... सादर वन्देमातरम...मुझे लगता है थोडा अतिरेक हो गया है|उन्मुक्त यौनाचार और बलात्कार में जमीं आसमान का अंतर है|हां, यह देखने वाले के लिए एक उद्दीपक का काम जरुर करता है किन्तु सामाजिकता का भी स्पष्ट प्रभाव पडता है|मनुष्यों में यौन अभिव्यक्ति सामाजिकता से ही प्रभावित होती है, अन्यथा एक श्वान और एक मनुष्य में कोई अंतर नहीं|अधिकाँश मामलों में बलात्कार की पीडिता ही स्वतः बलात्कार को प्रोत्सहित करती हैं किन्तु कुछ मामलों में एक बेबस का मजबूर आत्मसमर्पण ही होता है|जहाँ तक मैं मानता हूँ की बलात्कार एक स्त्री का सम्पूर्ण आत्मिक हनन है और उसके आरोपी को सजाये मौत से कम किसी भी हालत में नहीं देना चाहिए किन्तु झूठे आरोप लगाने वाले को भी एक सामान ही सजा का प्रावधान होना चाहिए, क्योंकि इस तरह का मिथ्या आरोप भी एक पुरुष के आत्मा का सम्पूर्ण हनन ही है|मीडिया का क्या कहूँ कुपही में इहाँ भांग पड़ी है|जय भारत, जय भारती|

के द्वारा: atharvavedamanoj

चातक जी, आपके पूरे आलेख को पढ़ने के बाद ये बात साफ साफ कही जा सकती है कि आप पुरुषवादी मानसिकता से गंभीर रूप से पीड़ित हैं. आपने बलात्कार से बचने के लिए महिलाओं की आजादी बाधित करने वाले जो सुझाव दिए हैं उनसे मैं कतई सहमत नहीं. आखिर मर्द अपनी कामपिपाशा पर, अपनी यौन कुंठा पर स्वयं लगाम क्यूं नहीं लगा सकता? इसके लिए उसे नारी को मर्यादा की शिक्षा देने की जरूरत क्यों पड़ती है? होना तो ये चाहिए कि नारी कभी भी एक सेक्स ऑब्जेक्ट के रूप में ना देखी जाकर एक श्रद्धा और सम्मान की पात्र के रूप में देखी जाए तभी जाकर नारी को उसका सही स्थान मिल सकेगा. यहॉ भी उसे उपकृत करने की भावना ना होकर सहज वृत्ति के रूप में घटित होने वाली भावना का उदय जरूरी है. मुझे उम्मीद है कि आप अपने विचारों में यथासंभव बदलाव लाकर आलेख में तदानुरूप परिवर्तन अवश्य करेंगे.

के द्वारा: Anita Paul

भाई राशिद आपके रोष को पढ़कर बहुत अच्छा लगा, यही रोष तो जगाना है हर युवा हर किशोर के मन में इसके लिए चाहे ढोल पीटना पड़े चाहे अपराधी को| दूसरी बात कि स्त्री खुद मुह तोड़ जवाब दे यहाँ आप गलती कर गए किसी भी स्त्री के अन्दर जबतक दम रहता है वह बलात्कारी को सफल नहीं होने देती| बलात्कार स्त्री के शारीरिक सामर्थ्य और उसके प्रतिरोध की ताकत टूट जाने के बाद ही होता है और स्त्री छोडिये किसी हाथी के भी असीम ताकत नहीं होती वह भी प्रतिकार करते करते अंततः थक कर हार जाता है| आपने लोगों की अपाहिज मानसिकता की बात भी काफी हद तक ठीक कही है परन्तु जहाँ ये अपाहिज है वहां हमारे आप जैसे युवा भी तो हैं जो न शरीर से लाचार हैं न मन से| हम इन अपाहिजों को जगाने और इन्हें अपनी शक्ति पहचानने के लिए प्रेरित तो कर सकते हैं| आप भी शुरुआत करें छुब्ध न हों परिवर्तन रातों रात नहीं होगा लेकिन होगा जरूर| आपकी इस प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

मीनाक्षी जी, आपके विचार जानकर अपार हर्ष हुआ एक छोटी सी शुरुआत एक बहुत बड़ी क्रांति का कारण बन सकती है हम सभी उस दिन बेहद प्रसन्नता का अहसास करेंगे जिस दिन हमारे समाज को बलात्कार जैसे घिनौने शब्द से निजात मिल जायेगी| हाँ इसके लिए आत्म-संयम को सर्वाधिक बढ़ावा देना होगा और ये कार्य परिवार नाम की सामजिक इकाई ही कर सकती है अर्थात हमें कमजोर पड़ते हुए परिवारों को फिर से मजबूती से जोड़ना और उन्हें संस्कार का अमृत पिलाना होगा| ये कडवी घुट्टी है बच्चे सहज ही इसे नहीं पियेंगे हमें स्वयं इसे बार बार उनके सामने स्वयं पी कर ही उन्हें प्रेरित करना होगा| मेरा विश्वास है कि जब आप जैसी महिलायें जब हमारे समाज में मौजूद है तो हम बड़ी तेजी से इस समस्या पर काबू पाने की राह में बढ़ सकेंगे| आपके द्वारा दिए गए इस नैतिक समर्थन का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

चातक जी , आपने " कौन रोकेगा बलात्कार " में बहुत ही महत्वपूर्ण विवेचना किया ; जैसे :- विचारों का १- " पीडिता को दर्द से राहत देने के लिए मोटी रकम के तोहफे दिए जा रहे है, संभवतः इसके पीछे अभिजन सामाज की वह ओछी सोच जिम्मेदार है कि ‘पैसा ही सम्मान है’| " 2-- " फैसला समाज द्वारा होना चाहिए ‘ऑन दि स्पॉट’ बजाय इसके कि अदालत का चक्कर लगा के पीडिता अपने गवांए हुए सम्मान की कीमत ले| ३- " कोई भी बच्चा बलात्कारी पैदा नहीं होता " निःसंदेह , आप जैसे लोग ही क्रन्तिकारी ( प्रगतिशील ) परिवर्तन ला सकेंगें . मेरे विचार से - तीन बातें अथवा तीन कारण और भी बड़े प्रभावशाली है अ- फिल्मो में जरूरत से ज्यादा बढती अश्लीलत्ता-फूहड़ता . ब- टीवी में - सीरियल्स के द्वारा -तरह-तरह के षड्यंत्र - नाजायज़ सम्बन्ध और विज्ञापन के माध्यम से सेक्स का प्रदर्शन ( बढ़ावा ) तथा स- इन्टरनेट व मोबाइल की ऐसी unlimited sites आज एक खुली - किताब की तरह है - जो बालिग -नाबालिग सभी को अपनी गिरफ्त में करती ही जा रही है . और दिन-रात लोगों के भीतर अपराधिक प्रवृत्ति जाग्रत कर रहीं हैं . शायद व्यापार एवं धन की लोलुपता के कारण इस पर न कोई कानून लागू है न कोई जुर्माना और न ही कोई दंड . सोचने की बात है -कि जब चारों -ओर अपराध को बढ़ावा देने वाले कारक हों तो ......कैसे रुक पायेगा अपराध ? वैसे आपने बहुत अच्छा लेख लिखा है - आपने लेख के माध्यम से जो सुझाव दियें हैं वो जल्द ही वास्तविकता में आयें और इस " असह्य " अपराध का समाज से शीघ्रातिशीघ्र अंत कराने में मददगार साबित हो सकें -यही मेरी बधाई है . मीनाक्षी श्रीवास्तव

के द्वारा: Meenakshi Srivastava

स्नेही अग्रज सचिन जी, सादर अभिवादन! आपको जिस स्थान पर भ्रम हुआ है वह मैं समझता हूँ | वास्तव में ये लकीर इतनी बारीक है कि सहज दिखाई नहीं देती| मैं एक छोटे से उदाहरण से इस बात को स्पष्ट करने की कोशिश करता हूँ - एक कुत्ता जिसे हम बहुत प्यार करते है वह किसी दूसरे पागल कुत्ते के संक्रमण से पागल हो जाये तो हम उसे क़त्ल ही करेंगे (यानी रोगी होने पर सजाये मौत) लेकिन साथ ही साथ हम सहानुभूतिपूर्वक उसके पागल होने के कारणों पर विचार करेंगे तभी हम अपने अन्य कुत्तों को बचा पायेंगे कि वे उन कारणों से पागल न हो| आपने ये भी बिलकुल सही कहा है कि इंटरनेट और मोबाइल फोन पर तमाम ऐसी गन्दगी मौजूद है जो बच्छों और नवयुवकों को बलात्कारी बनने की दिशा में प्रेरित करती हैं| एक और बात शायद आपने ध्यान न दिया हो इन सामग्रियों को उपलब्ध कराने वाली ७० से ८० प्रतिशत तथाकथित आधुनिक महिलायें ही हैं| आपकी इस विस्तारित प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

प्रिय भाई चातक जी, आपका लेख पढ़ा आपने बेहद ज्वलंत विषय पर लेख लिखा है बलात्कार आज जिस गति से हो रहे हैं लगता है कोई एक्सप्रेस ट्रेन अपनी गति से चल रही है, किन्तु भाई आपका लेख पढ़कर मैं कुछ दिग्भ्रमित सा हो गया हूँ, एक ओर आप बलात्कारी को मृत्यु करक दंड के पक्षधर है दूसरी ओर इस घिनौने कृत्य को करने वाले के पीछे कारक बताकर मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया है क्योंकि मेरी नजर मैं बलात्कारी व्यक्ति मानसिक रूप से विकृत है और उसके साथ किसी भी प्रकार की सहानुभूति उसके घिनौने कृत्य पर पर्दा डाल सकती है ! आपने जो कारण दिए हैं जिनके कारण मनुष्य मै बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को अंजाम देने की स्तिथि पैदा होती है, उनसे मै कुछ हद तक सहमत हूँ ! यहाँ मेरे विचार से आज जो सबसे बड़ा कारण बलात्कार के पीछे मुझे समझ मै आ रहा है वेह है आज का तकनीकी युग ! आज आप इन्टरनेट पर एक सर्च मारे हजारों गंदगी से भरी sites मिलेंगी जिनसे किशोर नारी को मात्र भोग्या के रूप मै देख रहे हैं और उम्र के जोश मै वे भी ऐसा ही करने की चेष्टा करते हैं और जब कोई लड़की सहमति नहीं देती तब शायद वे ऐसा घिनौना काम अंजाम देने से भी नहीं चूकते, इसके अलावा मोबाइल फ़ोन इस प्रकार के आ गए हैं जिनमे तमाम गंदगी भरी पड़ी है जिससे मानसिक रूप से विकृत लोग नारी का सम्मान करने के बजाय बलात्कार कर रहे हैं ! हाँ बंधू और यहाँ आपने अपने एक कारण मैं लिखा है निराश प्रेमी शराबी कवि या बलात्कारी बन जाता है ? भाई कवि कौम को इस बलात्कारी कौम से मत जोड़ो कवि हृदय बड़ा ही कोमल होता है भाई ! एक विकराल समस्या पर आलेख लिखने के लिए आपका हार्दिक अभिनन्दन !

के द्वारा: allrounder

प्रिय राजकमल जी, सादर अभिवादन ! आपकी ये शैली वास्तव में मुझे हमेशा प्रभावित करती रही है आप हलकी सी चुटकी लेते हुए गंभीर बातें कह जाते हैं और इसे ना समझने वाले इस बात पर नाराज भी हो सकते हैं| अनीता जी ने क्या सोचकर ऐसा लिखा ये मैं नहीं जानता लेकिन यदि उन्होंने महिलाओं को कम कपडे पहनने पर पुरुषों द्वारा उन्हें डाटने फटकारने से रोका है तो गलत नहीं किया क्योंकि ये अधिकार किसी भी पुरुष को नहीं बल्कि उस महिला की माता-पिता या फिर भाई-बहिन का है| यहाँ भी मेरी राय अपने घर को सुधारने की है न कि पडोसी के घर को| दोनों ही बातों के बीच बहुत पतली लकीर है और इसे हमें पहचानना ही होगा क्योंकि बात समस्या को हल करने की है न कि ये सिद्ध करने की कि किसकी बात ऊपर रहेगी| आशा है आपकी बेबाक टिप्पड़ियां इसी तरह राह दिखाती रहेंगी| जय हो!

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: priyankabajpai

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: devendra vvishwakarma

सुधा जी, इस विषय पर इससे बेहतर राय नहीं हो सकती है. तर्कों के पीछे हम सरल सत्य को नकारने के इतने अभ्यस्त हो चुके हैं कि सीधी बात हमें समझ में आती ही नहीं. हम सुसंकृत और शांतिपूर्ण वातावरण तैयार करने की बात तो करते हैं लेकिन दूसरों की मान्यताओं को ठेस पहुंचाकर और ये संभव नहीं. दूसरों रचनात्मक धर्म, पंथ, मान्यता और क्रियाकलाप को सम्मान देकर तो शांति और सौहाद्र स्थापित किया जा सकता है लेकिन किसी पर मेरा अच्छा है और तुम्हारा बुरा है वाली सोच के साथ सिर्फ बेहूदा संघर्ष जन्म लेता है और विनाश की और ले जाता है. आप मूर्ती पूजते हैं, मुझे ऐतराज नहीं; लेकिन मैं गुरु पूजता हूँ इस पर आपको ऐतराज नहीं होना चाहिए; आप संत महात्मा में ईश्वर देखते हैं मुझे ऐतराज नहीं, और मेरे मात-पिता मेरे ईश्वर हैं इस पर आपका ऐतराज भी नाजायज है. इतनी अच्छी और सहज प्रतिक्रिया के लिए आपका कोटिशः धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

फर्जी नाम से फर्जी टिप्पणी करने वाले महापुरूष, जिस तरह भारत में अरब से मुसलमान समुद्र के रास्ते दक्षिण भारत में धंधा करने आये थे और अंग्रेज भी धंधा करने आये थे और बाद में भारत पर काबिज हो गये वैसे ही तुम भी बुर्का पहन कर टिप्पणी करने आते हो और तुम्हारी मंशा भी कुछ ऐसी ही होती है । प्यारे, छिपे हुये इंसान की शख्सियत और बातों पर कौन यकीन करेगा । आपके लिये एक छोटी सी जानकारी । आप लोग कहते हैं कि इस्लाम दुनिया में तलवार के जोर पर नहीं फैला और यही आज कल भारत में पढ़ाया भी जा रहा है । कृपया करके पढें - The History of India, as Told by Its Own Historians. The Muhammadan Period is a book with eight volumes written by H. M. Elliot and edited by John Dowson (8 volume). इसमें तमाम इस्लामिक इतिहाकारो ने बड़ी शान से बताया है कि कैसे कैसे नृशंस, जघन्य नरसंहार करके उन्होंने भारत में हिंदुओं को मुसलमान बनाया है । पुरे इस्लामिक काल को इस्लामिक इतिहासकारों के लिखे अनुसार ही बताया गया है. और यह किताब भी किसी ने हिंदू ने लिखी है आज से १५० साल पहले एक ब्रिटिश इतिहासकार ने लिखी है.

के द्वारा: K M Mishra

बड़े बड़े बुधिजिवियो की जमात यहाँ जमा होकर अपना ज्ञान बखार रहे है कोई ये बताएगा की साईं ने क्या कहा था साईं उधर बोला था की अपन भगवान् है और तुम भी भगवान् है बस अंतर सिर्फ इतना है की मै ये जानता हूँ और तू नहीं जानता … …बस.. इसमें इतना मच-मच क्यों हो रहा है सालो, सचिन को भगवान् तुम खुद बोलो तो …वाह… क्या खेलता है और अगर कोई गरीबों की सेवा करता है बिना उसकी जात और धर्म देखे उसको अच्छा पढ़ाई कराता है तो बिना उसके भले काम देखे उसकी एकीच बुराई तुम लोगों के गले नहीं उतर रही है कोई मेरो को एक मुसलमान गुरु या मौलवी का नाम बताओ जो किसी हिन्दू का सेवा कर रहा हो या उसको पढाई करा रहा हो, कोई नहीं मिलेगा और मिलेगा तो इस ताक में होगा की कैसे इसको मुसलमान बनाऊ | अभी भी समय है, जाग जाओ हिन्दुओ……..जाग जाओ

के द्वारा: sahil

के द्वारा: RITESH KUAMR KORI

स्नेही श्री मिश्र जी, सादर अभिवादन, आपकी इस एपिकल कमेन्ट में जो चिंता झलक रही है उससे आज हर हिन्दुस्तानी दो-चार है, आपके साथ हुई अभद्रता ने आपको किस कदर पीड़ित किया वह भी यहाँ दिखाई देता है| विवेकानंद जी की लिखी पंक्तियाँ स्मरण हो आईं- "When the soul is stirred to its in most depth Great ones unfold their best." 'जब आत्मा को मर्म की गहराइयों तक झकझोर दिया जाता है, महान व्यक्ति तभी अपने सर्वोत्तम को उदघाटित करते हैं' जिस तरह आपने अपने ऊपर संयम रखते हुए मंच को अपना सर्वोत्तम दिया है उसी प्रकार ब्लोगरों को भी हमेशा आप उदाहरण और तर्क सहित बताते रहे हैं कि क्या उचित है और क्या अनुचित| एक बार फिर आपके इस महती योगदान और नैतिक समर्थन का बहुत बहुत शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

चातक जी , आजकल हर कोई बस टी आर पी बढ़ाना चाहता है और यही सब यहाँ बी हो रहा है .... लिखने वाले अपने मार्ग से भटक रहे है . कभी धर्म को लेकर तो कही व्यक्तिगत बातों को लेकर हमेशा कुछ न कुछ गलत लिखा जाता है ........... किसी बी subject पर बिना सोचे समझे हम लिखना शुरू कर देते है गहराई में जाये बिना ... यहाँ पर जो लेख लिखते है उन्हें याद रखना चहिये की वोह सिर्फ अपने लिए अपनी अतमा के लिए लिखते है और इस तरह की बहस में पड़कर अपना ही दिमांग और विचार ख़राब कर रहे है ....... यु भी जो व्यक्ति मर चूका है उसके बारे में इस तरह की बहस नीचपन ही दिखाती है ........ धर्म और व्यक्ति विशेष के बारे में इस तरह की बहस करवाने से और करने से हम सब को बचना चहिये ......... और हम सब को इसकी खिलाफत करनी चहिये .........

के द्वारा: roshni

देर से आने के लिये माफी चाहता हूं, मगर जो प्रश्न चातक जी ने उठाया है वह मैं जागरण जंक्शन से पहले ही करना चाहता था । जे जे का उत्तर बहुत नपा तुला है और वह सत्य की खोज पर आकर खत्म होता है । सत्य जिसे हम धर्म, ईश्वर, प्रकाश और बहुत से नामों से पुकारते हैं । सत्य सार्वभौमिक होता है और सृष्टि के सभी आयामों में सदैव एक सा रहता है । निसंदेह एक ईश्वर के अलावा कुछ भी सत्य नहीं है । . बहस का मुद्दा है ऐसी बहस जो सार्थक हो, शांतिपूर्ण हो, गरिमामयी हो, जिससे किसी को दुख न पहुंचे, राष्ट्रहित में हो, संवैधानिक दायरों में हो, मंच की गरिमा के अनुरूप हो, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का बेजा इस्तेमाल न हो और जिससे जेजे के छोटे से ब्लागर समूह में कोयी अशांति न उपजे, कहीं ऐसा न हो कि सत्य को खोजने के चक्कर में हम दियासलाई से ढिबरी जलायें और बारूद के ढेर में आग लग जाये । . स्वभावानुसार मेरे लेख या तो व्यंग होते हैं या फिर किसी ऐसे मुद्दे पर होते हैं जो कि राष्ट्र को बड़े पैमाने पर प्रभावित करते हैं । हम लागों ने आदरणीय एस डी बाजपेई जी के लेखों पर धर्म आधारित खूब बहस की और उससे इस निर्णय पर पहुंचे कि इस प्रकार की बहसों से सदैव कटुता बढ़ती है । धर्म या ईश्वरीय ज्ञान पर एकाधिकार होना बहुत मुश्किल बात है । जिसे ईश्वरीय ज्ञान हो जायेगा वह फिर किसी बहस में ही नहीं पड़ेगा । जो परमशांति के अमृत-सागर में तैर रहा है वह क्यों अशांत और दुख देने वाले प्रपंच में पड़ेगा । . जागरण एक छोटा सा मंच है, छोटा सा प्रबुद्ध ब्लागर्स का परिवार है । हम दीपावली, होली, ईद, बैसाखी, स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस आदि त्यौहार मिल कर मनाते हैं । सभी बु़िद्धजीवी हैं, सबके अपने अपने विचार हैं लेकिन राष्ट्रीय मसलों पर हमसब मिलजुल कर खड़े हो जाते हैं । सभी एक दूसरे का आदर-सम्मान करते हैं, प्रेम करते हैं, दुख-सुख बांटने में पीछे नहीं रहते । कभी कभी किसी मसले पर मतभेद भी होता है । किसी किसी मुद्दे पर लंबी बहसें होती हैं । सबकी अपनी खास शैली है, लिखावट है, पसंद और नापंसद भी है । लेकिन कुल मिलाकर यही हमारा छोटा सा परिवार है । कभी कोयी बाहर चला जाता है तो चार नये लोग भी आ जाते हैं । . राष्ट्रहित के मामलों पर हमारी हमेशा एकसी राय रहती है और अपने देश से मुहब्बत करने के कारण हम खुल कर उन मामलों पर अपनी राय जाहिर करते हैं । लेकिन धर्म एक ऐसा संवेदनशील मामला है जिस पर सभी अपने विचार रखना पसंद नहीं करते । इसका कारण हमारे हजारों बरसों के संस्कार हैं, हम जियो और जीने दो के सिद्धांत और दूसरे के धर्मों का आदर करने की मूल भावना पर चलते हैं । जबकि भारत देश का इतिहास हजारों वर्षों से विदेशी हमलों से भरा है और आज भी भारत पर भेष बदल कर लगातार धार्मिक, राजनैतिक हमले हो रहे हैं । . सरकारों का देश की शिक्षा पद्वति और मीडिया पर बहुत हद दबदबा रहता है । लेकिन जब से सूचना क्रांति के द्वार खुले हैं सरकारों का उन सूचनाओं पर अब बस नहीं रह गया है जिसे वे दशकों से या आधी शताब्दी जनता से छिपाती आ रही थीं । जिस तरफ लोकपाल बिल पिछले 42 साल से दबाया गया, विदेशी बैंकों में किसका पैसा जमा है, सरकार सब कुछ जानते हुये नहीं बताना चाह रही है, उसी तरह से भारत के असली इतिहास के बारे में भी सरकारें छिपाती आयी हैं और उसके पीछे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री की विदेशी सोच थी । उन्होंने तो भारत के उस इतिहास को भी सामने नहीं आने दिया जो कि खुद विदेशी इतिहासकारों ने ही लिखा था । विदेशी या मुस्लिम इतिहासकारों ने जो देखा वह लिखा और कुछ उन्होंने बढ़ा चढ़ा कर लिखा लेकिन सन 1947 के बाद भारत का इतिहास फर्जी तरीके से दुबारा गढ़ा गया । . सलीम खान जी के ऊपर बहस का मूल कारण था उनका भारत की संस्कृति, सभ्यता के खिलाफ लिखना और बोलना । वे एक पुराने ब्लागर हैं और उनकी तमाम पोस्ट्स का उद्देश्य हिंदुओं को बहला फुसला कर उनके मन में सनातन धर्म के प्रति नकारात्मक विचार भरना और धर्मपरिर्वतन के लिये प्रेरित करना रहा है । अब आप कहोगे कि जे जे पर ऐसा कौन मूर्ख है जो उनके चक्कर में फंसता । शायद उन्हें कोयी खरीदार न मिलता पर उनके वाहियात तर्कों के जाल में फंस कर एक दिन बहुत से नेट इस्तेमाल करने वाले और गूगल के जरिये उनके ब्लाग पर पहुंचने वाले भोले भाले दूसरे हिंदू यह मानने लगते कि सनातन धर्मं की कोयी नींव नहीं है, एन डी तिवारी के पौत्र ने इस्लाम कबूल लिया, गांधी के पुत्र ने भी इस्लाम कुबूल लिया था, भगवान राम कभी पैदा ही नहीं हुये थे, इस्लाम तलवार के बल पर कभी फैला नहीं था, हजरत मुहम्मद साहब कल्की अवतार थे वगैरह वगैरह । (यह सब उनके ब्लागस्पॉट पर बनाये ब्लाग की कुछ पोस्टें हैं) . बहुत से लोग इस तरह के ब्लाग पर कोयी टिप्पणी नहीं करते । जब दो लोग सड़क पर लड़ते हैं तब भीड़ खड़ी होकर तमाशा देखती है और उन पर हंसती हैं कि देखो कैसे पागल हैं ये । श्री डैनियल हमेशा कहा करते थे कि वे कोयी धर्मान्तरण का जाल नहीं फैला रहे हैं लेकिन जब हमने उनसे वार्ता प्रारंभ की तो एक जगह उन्होंने तैश में आकर कहा था कि आप के रोकने से भारत में ईसाईकरण नहीं रूकेगा क्योंकि अब ये काम बहुत बड़े पैमाने पर हो रहा है और इसमें बड़े बड़े ताकतें लगी हैं । उदाहरण के लिये आप ”21 मई को दुनिया खत्म होनेवाली है“ इस प्रलयप्रलापी सूचना पर ध्यान दीजिये । इसमें प्रलय की धमकी देकर ईसा मसीह की गुलामी स्वीकार करने की नसीहत दी गयी है । जैसे इस दुनिया में ईसा मसीह के अलावा कोयी महापुरूष पैदा नहीं हुआ है और ईसाइयत ही पृथ्वी पर एक मात्र धर्म है । यह दूसरे धर्म के प्रति एक तानाशाही सोच है और यही साम्प्रदायिकता है । हम अच्छे, हमारा धर्म महान, बाकी जो भी दूसरी विचारधारा या धर्माें के मानने वाले हैं वह सब मूर्ख, पतित, पापी और हमारा प्रवित्र कर्तव्य है उन सब पापियों को अपने धर्म में शामिल कर लेना, किसी भी तरह से, चाहे तलवार से जैसे इस्लाम ने किया और चाहे कॉलोनी बना कर जैसे ब्रिटेन ने किया और आज वेटिकन के इशारे पर यूरोप और अमेरिका पैसा की ताकत से यह काम पूरी ताकत से कर रहा है । अभी विकीलीक्स के एक केबल ने भी इसका खुलासा किया है । केबल का नंबर है 3387 और 65975 । इसके लिये वेटिकन कुछ भी करने को तैयार है और कर भी रहे हैं । एक तरफ वे इराक, अगानिस्तान, लीबिया में इस्लाम के खिलाफ लड़ रहे हैं दूसरी तरफ भारत में आदिवासी इलाकों में पैसे के बल पर धर्मांतरण कर रहे हैं और पूर्वोत्तर के आतंकियों को ईसाई बनाकर और नक्स्लवादियों को पैसे देकर भारत में आतंक का खेल खेल रहे हैं । चर्च आज ईसाईकरण के लिये किस तरह के ओछे हथकण्डे अपनाने पर उतर आया है वह 21 मई के प्रलयप्रलाप को देखकर, सुनकर कोयी बच्चा भी समझ सकता है । . जहॉं एक तरफ चर्च अपने पैसे के बल पर धर्मांतरण का बाजार चला रहा है वहीं दूसरी और सलीम खान जैसे मुल्ला उल्टे सीधे तर्क के आधार पर धर्मांतरण की सीख देते हैं । उनके पुराने ब्लाग पर आपको एन डी तिवारी के तथाकथित प्रौत्र के इस्लाम कुबूलने की पोस्ट मिलेगी । श्री राम को इतिहास से मिटाने की सिलसिलेवार पोस्ट मिलेगी । मॉं, बाप, गुरू को हमारे यहॉं भगवान से बड़ा दर्जा दिया गया है वे वहॉं इस बात का पुरजोर विरोध करते हैं कि अल्लाह की तुलना किसी न करें और जो ऐसा करता है वह मूर्ख है । वहॉं आप जापान पर आयी सुनामी को जापान पर अल्लाह का कहर साबित होते देख सकते हैं क्योंकि जापान एकमात्र दुनिया का ऐसा देश है जहॉं इस्लाम प्रतिबंधित है । उन्होंने तो मुझे भी इस्लाम कुबुलने की दावत दी थी और कुरान की एक आयत चिपका कर बताया था कि यह अल्लाह का हुकुम है आप सभी अज्ञानियों के लिये । . पैगम्बर पर बहस बहुत खतरनाक है क्योंकि इस्लाम और पैगम्बर के खिलाफ पूरे विश्व में इतना कुछ लिखा गया है कि उसे किसी भी तर्क से झुठलाया नहीं जा सकता । भारत में कम, ईसाई प्रधान देशों ने इस्लाम के इतने गड़े मुर्दे उखाड़े हैं कि कोयी भी बुद्धिमान व्यक्ति उन तर्कों को सिर्फ आस्था के बलबूते ही नकार सकता है वर्ना उन तर्कों और ऐतिहासिक साक्ष्यों का कोयी उत्तर पैगंबर के मानने वालों के पास नहीं है । इंटरनेट पर 200 से ज्यादा (विदेशी) साईट्स ऐसी है जिसपर आपको भरपूर जानकारी मिल जायेगी । कई वेबसाइट्स तो ऐसी हैं जिन्होंने पैगंबर के खिलाफ ऐसे सबूत डाले हुये है, इस संदेश के साथ कि अगर कोयी इन्हें गलत साबित कर दे तो इतने लाख पौण्ड वे देने को तैयार हैं । और बहुत समय से उन सबूतों को कोयी मुसलमान नकार नहीं पाया है, वे सिर्फ वहां जाकर निवेदन ही करते हैं कि आप ये जानकारी हटा दें । यूट्यब पर मुल्लाओं की सैंकड़ों तकरीरें हैं जिनमें वे काफिरों के खिलाफ जिहाद का नारा देते मिलते हैं । कहने का मतलब यह है कि पैंगम्बर पर बहस बारूद को चिंगारी दिखाने वाला मुद्दा है और इसमें हमारा छोटा सा आशियाना जेजे स्वाहा हो जायेगा । पैंगम्बर करोड़ों लोगों की आस्था के प्रतीक हैं । वे उनके खिलाफ एक शब्द सुनना पसंद नहीं करेंगे । इस देश में रामजन्मभूमि पर लोग सुलभशौचालय बनाने तक का बयान दे देते हैं और हिंदू खामोश हो कर सुन लेता है वैसा कट्टर सोच रखने वाली मुस्लिम कौम कभी बरर्दाश्त नहीं करती है । सलमान रश्दी, तस्लीमा नसरीन आदि सैंकड़ों उदाहरण हैं । एम. एफ हुसैन हिंदू देवी देवताओं के नग्न चित्र बनाकर उनका खुले आम अपमान करते हैं और बिना रीढ़ की हिंदू कौम उसे देखकर कहती है कि यह तो अभिव्यक्ति की आजादी है । क्या एम एफ हुसैन कभी पैगंबर का भी चित्र बनाने की हिम्मत कर सकते हैं ? . आपको आपकी विचारधारा मुबारक, हमको हमारी । सिर्फ एक छोटा सा उदाहरण दूंगा । आज पूरे विश्व में मुसलमान दो अरब हैं लेेकिन उनकी साक्षरता दर मुश्किल से 40 प्रतिशत है और महिलाओं की तो 25 प्रतिशत भी नहीं है । गरीबी के मामले में वे अव्वल हैं और उनकी कट्टरता ने उनको आज वैश्विक आतंकवाद का केन्द्र बना दिया है । समझने के लिये इतना ही बहुत है । यही बात उन 200 से ज्यादा वेबसाइट्स में खुल कर कही गयी है, हजारों उदाहरणों, ऐतिहासिक साक्ष्यों के साथ । धर्म और आस्था की स्वतंत्रता सबको है और सबको अपना बुरा भुला समझने की स्वतंत्रता है । आस्था पर किसी का कोयी जोर नहीं चलता है । हम अपनी विचारधारा के साथ खुश है, आप अपनी । ध्यान देने वाली बात यह है कि आस्था के चक्कर में हम अपने घर में कहीं आग न लगा लें । एक बंटवारा पहले देखा है । कश्मीर हाथ से जाता दिख रहा है, पूर्वोत्तर सुलग रहा है, नक्सली आज भारत के 400 जिलों में प्रभावी हैं, इस सबके पीछे इस्लामिक राष्ट्र पाकिस्तान और चर्च है । यह साबित हो चुका है, अब कोयी देखना ही न चाहे तो उसके लिये कुछ नहीं किया जा सकता है । . कहने के लिये बहुत कुछ है लेकिन जागरण जंक्शन टीम को धन्यवाद है जो उन्होंने समय रहते श्री सलीम खान जी की मंशा समझी और उनको प्रतिबंधित किया क्योंकि बड़ी जल्दी ही वह इस मंच की शांति, गरिमा और प्रेम से भरपूर वातावरण को दूषित कर देते और जे जे विवाद का अखाड़ा बन जाता ।

के द्वारा: K M Mishra

स्नेही संदीप जी, आपकी राय जानकर प्रसन्नता हुई. मैं स्वयं किसी भी जीवित या मृत या निर्जीव शै को ईश्वर नहीं मानता आप मुझे एक एस्केप्टिक कह सकते हैं परन्तु एक जगह जाकर मैं स्वयं अपने इस विचार को कमजोर महसूस करता हूँ क्योंकि मैंने हमेशा अपने माता-पिता के अन्दर ईश्वर को साक्षात देखा है बस यही कारण है की यदि कोई भी व्यक्ति किसी इंसान के अन्दर ईश्वर को देखता है तो मैं उसकी मान्यता को गलत भी नहीं कह सकता. साईं बाबा के बारे में अभी विवेक जी की पोस्ट पर भी मैंने लिखा है 'मैं उन्हें ईश्वर तो नहीं मानता लेकिन उनमे देवत्व से मैं इनकार नहीं करता' वे मेरे लिए आराध्य नहीं हैं लेकिन यदि वे किसी के आराध्य हैं तो इसमें मुझे कोई आपत्ति भी नहीं. आपकी बेबाक राय के लिए आपका तहे-दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

आदरणीय चातक जी, सदर वन्दे मातरम्. आपका कथन सही है और बहस भी होनी चाहिए और जब मैंने जागरण जंक्शन की टिप्पड़ी पढ़ी तो लगा वो भी आपसे सहमत हैं जरा उनकी टिप्पड़ी की इन पंक्तियों पर गौर कीजिये "जागरण जंक्शन फोरम का उद्देश्य ऐसे किसी भी मामले पर जनता की राय आमंत्रित करना है जिस पर मत भिन्नताएं होती हैं. सच्चा लोकतंत्र अभिव्यक्ति की आजादी को बाधित नहीं करता बल्कि उसमें परस्पर विरोधी विचारों को समानांतर रूप से पोषण मिलता है और श्रेष्ठ विचारों को आगे आने और राष्ट्र को सही दिशा दिखाने का अवसर प्राप्त होता है." इसका मतलब यही निकलता जहाँ पर भी मतभिन्नता हो वहां बहस होनी चाहिए तभी राष्ट्र को सही दिशा मिलेगी ......... आइये शुरुआत करते हैं मतभिन्नता वाले विषयों से.......... हिन्दू - मुस्लिम, अयोध्या में मंदिर - मस्जिद, सेकुलरिज्म या राष्ट्रवाद, भारत-पकिस्तान, और भी बहुत से विषय हैं और एक तो आपने भी दिया ही.........अब जागरण अपने कथनानुसार एक एक करके सभी मुद्दों पर स्वस्थ बहस कराएगा........ और राष्ट्र सही दिशा में जाएगा

के द्वारा: Munish

सलीम जी, आपकी इस टिप्पड़ी से आपकी घबराहट का भी अंदाजा हो रहा है और आपकी भाषा की शालीनता से आपके आचरण का भी. आपके अंदाज में आये इस परिवर्तन पर लगाम लगाना आपके लिए हितकर होगा. आपको धर्म और सम्प्रदाय की कितनी जानकारी है पूरे मंच को पता है लेकिन मैं इस्लाम को कितना जानता हूँ ये सिर्फ मैं जानता हूँ, आपकी टिप्पड़ियों का सदैव स्वागत है लेकिन जब आप आत्म मर्यादीन न रह पायें तो मेरे ब्लॉग पे टिप्पड़ी की हिमाकत मत करियेगा, आपको याद दिला दूं कि जागरण ने हमें एक और सुविधा दे रखी है 'अनर्गल टिप्पड़ियों को किक करना, यानी लात मार के बाहर का रास्ता दिखाना', कम लिखे को ज्यादा समझिएगा और चिट्ठी को तार. वैसे मैं ये नहीं समझता कि आपकी टिप्पड़ियों की इस ब्लॉग पे कोई जरूरत है इसलिए आपको धन्यवाद कहकर मैं स्नेही मित्रों के लिए इस्तेमाल होने वाले शब्द का अपमान नहीं करूंगा! ईश्वर आपको सद्बुद्धि दे!

के द्वारा: chaatak

प्रिय राजकमल जी, सादर अभिवादन, मेरे द्वारा उठाये गए मुद्दों का समर्थन करने का हार्दिक धन्यवाद, मुझे पता था की आपकी स्पष्ट टिप्पड़ी जरूर आएगी साईं बाबा के ऊपर चर्चा से किसी को ऐतराज नहीं लेकिन मोहम्मद साहब का नाम आते ही किस कदर घबराहट उत्पन्न हो रही है इसी कोई भी ब्लोगर यहाँ देख सकता है. स्वयं को इस्लाम का प्रवर्तक बताने वाले सलीम जी की भाषा और चुनौती देखिये (या बात अलग है यदि चर्चा हुई इनके पास अपनी बाते सिद्ध करने और और आरोपों को ख़ारिज करने के लिए कोई तर्क नहीं होगा) यदि इस्लाम के प्रचारक इतने बदतमीज हैं तो इस धर्म में कितनी मलिनता छिपी होगी सहज अंदाजा हो जाता है. आपकी प्रतिक्रिया का एक बार फिर कोटिशः धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

स्नेही राज जी, निखिल जी की बात का समर्थन आप ही नहीं बल्कि कोई भी व्यक्ति जी थोडा सा भी सहज बुद्धि से काम लेता है जरूर करेगा. इस बात से इनकार करना कि मानवता हर चौराहे पर कराह रही है सिर्फ अपने आपको धोखा देना है बंटवारा और मत-विभिन्नता जब एक ही परिवार के दो सगे भाइयों में नहीं रोका जा सकता तो फिर देश और दुनिया में इसे रोकने की सोच सबसे बड़ा दिवास्वप्न है. हम अलग अलग मान्यताओं और धर्न्मो के अनुयायी होने के बावजूद एक दुसरे के हितैषी हो सकते हैं जरूरत है सिर्फ एक दुसरे के मान्यताओं को सम्मान देना न कि अपनी मान्यता किसी के ऊपर थोपना. आपकी इस संतुलित और सटीक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

स्नेही सचिन जी, ब्लॉग लिखने के मेरे ध्येय को स्पष्ट करने का बहुत बहुत शुक्रिया! जिस तरह से मिश्र जी के लिए अभद्र शब्दों का इस्तेमाल किया गया है वह किसी भी तरह ठीक नहीं है और ये सिर्फ इसलिए कि कहीं न कहीं धार्मिक विचारधारा का टकराव है. दूध और सिरका दोनों के अलग अलग गुण और अलग अलग फायदे अहिं है लेकिन समरसता की बात कहकर न तो दोनों को मिलाना अच्छा है और न ही दोनों की तुलना करना. कुछ ऐसा ही धर्मो और निष्ठाओं की हालत है न एक दुसरे का स्थान ले सकता है और न ही दोनों का समागम करने से कुछ मिलेगा जो मिलेगा वो बेहद बदबूदार होगा जिसे कोई भी पसंद नहीं कर सकता. आपकी साफगोई के लिए एक बार फिर आपका कोटिशः धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

प्रिय निखिल जी, वर्तमान बहस में ज्यादातर लोग स्वस्थ मानसिकता को लेकर बहस नहीं कर रहे बल्कि द्वेष या ईष्या की भावना से प्रेरित होकर अमर्यादित बातें कर रहे हैं. बहस से साईं बाबा तो गुम हो गए और इस बहस की आड़ लेकर कुछ कुत्सित मानसिकता वाले लोग हिन्दू धर्म पर बचकानी फिकरेबाजी पर जोर लगाने लगे जिन्हें ये तक नहीं पता है कि एक हिन्दू का सबसे बड़ा भगवान् उसके माता-पिता और उनसे भी महान गुरु होता है वे वेदों और शास्त्रों के जानकार बनने कि कोशिश कर रहे हैं और वो भी मुद्दे को लक्ष्य बनाकर नहीं बल्कि इस बात को लक्ष्य बना कर कि साईं बाबा के अधिकतम अनुयाई या चाहने वाले हिन्दू थे. धर्म की अफीम खाए इन लोगों को हिन्दुस्तान के विभिन्न रूप भला कहाँ दिखाई देंगे ! आपकी इस विस्तारित प्रतिक्रिया को पढ़कर आज बेहद प्रसन्नता का अनुभव कर रहा हूँ कि आज जबकि कुछ प्रबुद्ध और वरिष्ठ ब्लोगर भी अपनी दिशा भटक चुके हैं वहां एक युवक न सिर्फ मर्म को समझता है बल्कि तटस्थ भी है. एक बार फिर आपका कोटिशः धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

प्रिय अनुज इस संसार में कौन ऐसा ऐसा संत अथवा महात्मा था या है जिस पर कीचड न उछाला गया हो,तुमने मुहम्मद साहब के बात यह सत्य है की उस पर बहस करवाने का किसी में माद्दा नही है क्योंकि एक नया धर्म सेकुलरिज्म जो पनप गया है सबसे अधिक इस जमात को मुहम्मद साहब से ही सेकुलरिज्म की झलक मिलती है फिर उन पर स्वस्थ बहस कैसे हो पायेगी यह सच है की हिनुस्तान सदैव से हर धर्म के प्रति समदर्शी भाव लेकर चलता रहा है और शायद यही उसकी कमजोरी रही है ,,दुनिया में अगर आपराधिक ग्राफ का आंकडा देखें की किस धर्म विशेष के द्वारा यह ग्राफ अधिक बढ़ा है तो स्वयं ही पता चल जाएगा की कौन अधिक सेकुलर है भारतीय मीडिया या छद्म सेकुलर लोग या फिर दोनों ही ,,समन्दर में जहाजों को आज भी लुटा जाता है बम धमाके आज भी लोगों की जान ले रहे हैं देश विशेष में लोगों के मुख में मूत्र विसर्जन किया जा रहा इन सब में ही तो सेकुलरिज्म की झलक मिलती है ,,लिखते समय अधिक तल्ख हो जाउंगा जो मंच की गरिमा के अनुकूल नही रहेगा .......जय भारत

के द्वारा: ashvinikumar

प्रिय चातक जी, आपका पाठक और प्रशंशक होने के नाते आपके हर ब्लॉग को पढ़ना एक कार्य की तरह बन गया है. मैंने श्री ओ पी पारीक जी प्रतिक्रिया के साथ-साथ, जागरण की भी प्रतिक्रिया पढ़ी साथ ही आपका ब्लॉग भी पढ़ा. वैसे प्रतिक्रियाओं में ज्यादा शब्दों से मुझे परहेज है लेकिन अभी बिना शब्दों के आपकी बात को गलत तरीके से समझाने वालों को समझाना थोडा मुश्किल हो जाएगा. यहाँ बहस इस बात की नहीं है की सत्य साईं बाबा के ऊपर बहस होनी चाहिए या नहीं. बहस इस बात की है की बहस कौन करेगा? उत्तर है सत्य साईं बाबा को चाहने वाले और उनको न चाहने वाले और इनकी संख्या हिंदुस्तान की आबादी का ५ प्रतिशत भी नहीं होगा. बाकी की ९५ प्रतिशत भारतीय इस बहस में भाग नहीं लेंगे. फलतः जो परिणाम सामने आएगा वो एक दुसरे के ऊपर लान्क्षणों और प्रहारों पे आकर रुक जाएगा. अतः धार्मिक मतान्तरों पर बहस को नव-साहित्यिक पृष्ठ-भूमि से अलग रखा जाए तो ज्यादा सकारात्मक परिवर्तन आने की सम्भावना हो सकती है. धर्म-गुरुओं पर सदियों से बहस होती आ रही है और आगे भी होती रहेगी. और जहाँ तक जागरण का सवाल है तो हमारे पास और भी मुद्दे है बहस के लिए. एक देश में दो तरह का हिंदुस्तान बस रहा है, एक भूखा नंगा हिंदुस्तान और दूसरा चमचमाता आकर्षक हिंदुस्तान जो सफलता के सोपान चढ़ रहा है. मुझे लगता है इससे बड़ा बहस का मुद्दा और कुछ नहीं और इससे आम आदमी का वास्ता है. भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जागरण की पहल की मैं तहे दिल से सराहना करता हूँ लेकिन इस पहल को शायद मैं समर्थन न दे पाऊं.

के द्वारा: Nikhil Jha

सुधी जागरण, आपके द्वारा त्वरित प्रतिक्रिया पाकर बेहद ख़ुशी हुई और उतना ही क्षोभ हुआ उस ब्लॉग पर आपकी शिथिलता को देखकर. श्रद्धालुओं और विरोधियों की राय से मैं स्वयं इनकार नहीं करता न ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर मुझे कोई ऐतराज है लेकिन इस सुविधा का जो मनमाना प्रयोग यहाँ पर विद्वान ब्लोगरों ने किया है उसे अभिव्यक्ति कहने में भी संकोच होता है और शायद ये आवाज उनके कहीं मर्माहत होने का ही परिणाम है. थोडा सा उदाहरण आप इस ब्लॉग पे श्रीमान ओ.पी. पारीक जी की टिप्पड़ी में भी देख सकते हैं :) (काफी शालीनता दिखाते हुए भी महोदय थोडा भटक गए). मेरी आपसे शिकायत इसीलिए है कि आप पहले भी अपने विद्वान ब्लोगरों का ये रूप देख चुके हैं ऐसे में आपको कमसे कम टिप्पड़ियों को मोडरेट जरूर करना चाहिए था. जरा ध्यान दें उक्त पोस्ट पर दी गई कुछ मूर्धन्य टिप्पड़ियाँ इस प्रकार हैं- 'Nancy John ( Goa) के द्वारा April 26, 2011 डॉक्टर सत्येन्द्र आप पागलो के डॉक्टर हो या फर्जी डिग्री लेकर पास हुए हो' 'raj के द्वारा April 26, 2011 डॉक्टर सत्येन्द्र आप पागलो के डॉक्टर हो या फर्जी डिग्री लेकर पास हुए हो यह टिप्पड़ी अशोभनीय है व ऐसे मंच की गरिमा को गिरती है |' 'Mr. X in Bombay के द्वारा April 27, 2011 रंडी के औलादों साईं के संतानों सच लगता है तीता बुरी लगती है गीता तुम पागलों के लिए इस डॉक्टर ने सही कहा है …….भारत से यदि ऐसे भड़वों का सफाया हो गया तो देश स्वतः हीं सुधर जायेगा' क्या यही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है ? क्या इस तरह की बहस किसी तरह का निष्कर्ष/आत्मोन्नति या राष्ट्र कल्याण करती दिखाई दे रही है? मैंने सिर्फ एक संवाद का उदाहरण दिया है. टिप्पड़िया भी कुछ कम नहीं हैं. चूंकि इस मंच व् ब्लोगरों से अत्यंत लगाव या कहें अपनापन महसूस करता हूँ इसलिए मंच की गरिमा गिरते देख मैंने प्रतिक्रिया दी और और ये ब्लॉग लिखा है जिसका सबसे सुखद पहलू है आपकी दी गयी ये प्रतिक्रिया जी जागरण जंक्शन की मंशा जाहिर कर रही है (ये बात अलग है कि पारीक जी इसका भी गलत अर्थ ही निकाल रहे हैं :) . जागरण जंक्शन टीम का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

आदरणीय श्री एस.पी. सिंह जी, आपकी बात सोलह आने सच है. श्री बाजपेयी जी के ब्लॉग का बिलकुल सही उदाहरण दिया है आपने. परिणाम बिलकुल सामने देखने के बाद भी यदि हम आँख मूँद लें तो इसे आप क्या कहेंगे? किसी भी ऐसे चरित्र पर जिससे जनमानस की भावनाएं जुडी हों अनर्गल बहस करना विवेक से किया गया काम तो नहीं हो सकता हाँ इसे फितूर जरूर कह सकते हैं इल्जाम लगाने भर से कोई अपराधी नहीं हो जाता और स्वयं को सांई घोषित करने से बाद से लेकर मृत्यु तक कोई भी अभियोग सत्य साईं पर सिद्द नहीं हुआ हाँ उनके द्वारा किये गए कार्य को एक बेहतरीन समाजसेवा के रूप में जरूर देखा जा रहा है ऐसे में यदि विवेकी लोग उनके जीवन और कर्म की समालोचना करे और उस पर अपनी राय दें तो बात समझ में आती है लेकिन एक मृत व्यक्ति जिसकी अच्छे कार्यों की फेहरिश्त भी काफी लम्बी है उस पर बेतुकी और बेढंगी बाते करना शुचिता के दायरे से बाहर लगता है. ब्लॉग पर अपनी स्पष्ट राय देने का बहुत बहुत धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

सम्मानीय जागरण जंक्सन, चातक जी के इस लेख पर त्वरित जवाब देकर सराहनीय कार्य किया, और चातक जी के उठाये प्रश्नों के जो जवाब दिए है काफी तार्किक हैं ,किन्तु इस विषय पर मैं जागरण जंक्सन का ध्यान चातक जी की इस पंक्ति " यदि जागरण के विद्वानों को ये सही लगता है की बहस होनी चाहिए तो मेरी भी गुजारिश है की एक बहस मुहम्मद साहब के चरित्र पर भी होनी चाहिए " की ओर दिलाना चाहता हूँ, जो इस ओर इशारा करती है की ये बहस सत्य साईं बाबा के समर्थक और उनके न मानने वालों से निकल कर दो धर्मों की बहस न बन जाये, और अभी मैंने एक लेख पढ़ा सलीम खान साहब का जो की लगातार सिर्फ और सिर्फ धर्म पर ही लिखना पसंद करते हैं जिस पर हमारे इसी मंच के सबसे सम्मानित ब्लोगर्स मैं से एक श्रीमान K M मिश्राजी ने शालीनता से उन्हें धर्म पर लिखने से बचने का अनुरोध किया तो उन्होंने जवाव मैं लिखा की जागरण जंक्सन खुद ही हमसे इस विषय पर विचार मांग रहा है !" इस घटना को पढ़कर मेरी आशंका ये है की पूर्व की भांति इस मंच पर स्वस्थ बहस के स्थान पर धार्मिक युद्ध न शुरू हो जाए ! क्योंकि बेशक हमारे देश मैं विचारों की अभिव्यक्ति की छुट है किन्तु मेरी अपनी व्यक्तिगत राय ये है की धर्म आज भी हमारे देश मैं बहुत ही संवेदनशील विषय है जिसके बारे मैं विपरीत धर्म की बहस को कभी भी मान्यता नहीं देते इसलिए हमें ऐसी स्तिथि पैदा होने से बचना चाहिए ! और जागरण ने जो मुद्दा दिया है इसकी आड़ लेकर कुछ लोग किसी दूसरे की भावनाओं को आहत न करें, और इस प्रतिष्ठित मंच का माहौल दूषित होने से बचे और सदा खुशनुमा बना रहे ! धन्यबाद !

के द्वारा: allrounder

chatakji, majburi hai 'hindi' anuwad wala batan kaam nahin kar raha so Roman hindi men likhna pad raha hai.. waise to jagran team ne sahi-sahi jawab de diya hai aapki tippaniyon ko parantu kuchh baaten mere jahan men aayi hai so likh raha hoon. darasal aapka soch ka daayra bahut sankuchit hain aur aap vaicharik abhivyakti men viswas nahin rakhte, aisa mujhe laga. Shayad main galat bhi ho sakta hoon. Mahatma Gandhi ke baare men bahut kuchh vivadit baaten logon ne likhi par us se kisi ko aitraj kyon ho. Satya aap jaise logon ki bapauti nahin hai. har vyakti ko apne dhang se sochne aur satya ka sandhaan karne ka adhikaar hai. Jinki baat aap utha rahe hain we apne naam ke pahle satya shabd ka istemal karte the. aap kisi bhi insaan ko khuda ka darja de kar use vaicharik vishleshan se oopar nahin rakh sakte. Jagran ne jo kiya, meri ray me sahi kiya. Aapne jo Muhammad sahab kee baat kahi us se aap ki us mansikta ka pata chalta hai jise aaj har hindustani samajhta hai. aap is baare men jo chunauti jagran walon ko de rahe hain wo un kattar hindutwa walon ki bakwas jaisi lagti hai. Muhammad sahab par aap kya bahas chahte hain. we ek paigambar the aur unke manane walon ko yah manzoor nahin ki koi unke baare me bahas kare ya vyarth ki chheentakashi kare. Aise halaat me jagran bhala kyonkar kar kisi ki bhawnaon ko aahat karega. maanta hoon aapke blog ko sarwadhik pratikriyaen milti hain par iske dambh men aap khamkhah seekh dene par utar aaye hain jo ek ghatiya harkat hai. meri teekshn pratikriyaon ko nazar andaaj kar ke sochiyega. Be cool. oppareek43

के द्वारा: O P PAREEK

आदरणीय चातक जी, जागरण जंक्शन फोरम का उद्देश्य ऐसे किसी भी मामले पर जनता की राय आमंत्रित करना है जिस पर मत भिन्नताएं होती हैं. सच्चा लोकतंत्र अभिव्यक्ति की आजादी को बाधित नहीं करता बल्कि उसमें परस्पर विरोधी विचारों को समानांतर रूप से पोषण मिलता है और श्रेष्ठ विचारों को आगे आने और राष्ट्र को सही दिशा दिखाने का अवसर प्राप्त होता है. आस्था या अंधविश्वास, विकास या भ्रष्टाचार व अवनति, राष्ट्र हित या स्व हित जैसे तमाम मसले होते हैं जिन पर कोई राय एकाकी या व्यक्तिगत रूप से नहीं कायम की जा सकती है. ऐसे सभी मामले जनसंवाद और बहस के दायरे में आकर सही रूप में प्रतिष्ठित होते हैं. ध्यान दें जागरण जंक्शन फोरम में उठाए जाने वाले मुद्दों पर मंच की अपनी कोई राय नहीं होती बल्कि ये पूरी तरह जनता की राय आमंत्रित करने का जरिया है ताकि लोग स्वस्थ बहस और वाद-विवाद का हिस्सा बनें और किसी भी भटकाव से बचकर एक तार्किक निष्कर्ष द्वारा आत्मोन्नति सहित राष्ट्र कल्याण में भाग ले सकें. यही कारण है कि इस बार का मुद्दा श्री सत्य साईं पर उठ रहे सवालों से चुना गया है ताकि उनके श्रद्धालुओं को विरोधियों की बातों का जवाब देने का अवसर मिले और विरोधी भी अपनी बात के समर्थन में तर्क प्रस्तुत कर सकें. और ये एक सर्वविदित ज्ञातव्य तथ्य है कि अंतिम रूप से सत्य की हमेशा जीत होती है. धन्यवाद जागरण जंक्शन टीम

के द्वारा: JJ Blog

आदरणीय चातक जी, जागरण जंक्शन फोरम का उद्देश्य ऐसे किसी भी मामले पर जनता की राय आमंत्रित करना है जिस पर मत भिन्नताएं होती हैं. सच्चा लोकतंत्र अभिव्यक्ति की आजादी को बाधित नहीं करता बल्कि उसमें परस्पर विरोधी विचारों को समानांतर रूप से पोषण मिलता है और श्रेष्ठ विचारों को आगे आने और राष्ट्र को सही दिशा दिखाने का अवसर प्राप्त होता है. आस्था या अंधविश्वास, विकास या भ्रष्टाचार व अवनति, राष्ट्र हित या स्व हित जैसे तमाम मसले होते हैं जिन पर कोई राय एकाकी या व्यक्तिगत रूप से नहीं कायम की जा सकती है. ऐसे सभी मामले जनसंवाद और बहस के दायरे में आकर सही रूप में प्रतिष्ठित होते हैं. ध्यान दें जागरण जंक्शन फोरम में उठाए जाने वाले मुद्दों पर मंच की अपनी कोई राय नहीं होती बल्कि ये पूरी तरह जनता की राय आमंत्रित करने का जरिया है ताकि लोग स्वस्थ बहस और वाद-विवाद का हिस्सा बनें और किसी भी भटकाव से बचकर एक तार्किक निष्कर्ष द्वारा आत्मोन्नति सहित राष्ट्र कल्याण में भाग ले सकें. यही कारण है कि इस बार का मुद्दा श्री सत्य साईं पर उठ रहे सवालों से चुना गया है ताकि उनके श्रद्धालुओं को विरोधियों की बातों का जवाब देने का अवसर मिले और विरोधी भी अपनी बात के समर्थन में तर्क प्रस्तुत कर सकें. और ये एक सर्वविदित ज्ञातव्य तथ्य है कि अंतिम रूप से सत्य की हमेशा जीत होती है.

के द्वारा: JJ Blog

अग्रज बहुत सुन्दर रचना .... इस रचना का हर शब्द विवशता और छलना की टीस की अलग अलग कहानी कहता है, जिनमे से प्रत्येक का विराम "भोली सी एक सांझ न समझी मंशा झंझावातों की" के मूल पर जाकर हो जा रहा है .. बधाई .. ----------------------------------------------------------------------------------------------- आपकी इस ललित रचना के भावों में डूबे प्रस्तुत है ये दो शब्द .... ----------------------------------------------------------------------------------------------- मैं जिन्हें कभी ना समझ सका, मेरी अबोध मंशाएं थीं | जो दीपशिखा में दिखती हैं, मेरी ज्वलंत पीडाएं थीं || ------ मैं जिन्हें सींचता था अविरत, मैं कल्पवृक्ष समझा जिनको | वो नागफनी कुल की निकलीं, वो मूल हीन शाखाएं थीं || ------ निस्तब्ध अंधेरी रातों में, कब सोम सुधा बरसाता है | मैंने अनुभव करके देखा, अनुशंसा थी : उपमाएं थीं || ------- जो आहुति देकर जीवन की, अपयश कलंक प्रतिफल पाया | उस भोले भ्रमित पतंगे की, संभवतः कुछ सीमाएं थीं || ------ जिस दुर्गम पथ के काँटों को, पावों के छालों से चूमा | उन पर भी लक्ष्य पराया था, फिर पाने में बाधाएं थीं ||

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

स्नेही सलीम भाई, आपको कविता की पंक्तिया अच्छी लगी ये जानकर अतीव प्रसन्नता हुई, आपने धर्म और संविधान के बारे में जो प्रश्न किये हैं उसका जवाब पाण्डेय जी ने दे दिया है मेरे विचार से इस पर और ज्यादा कुछ बोलने की आवश्यकता नहीं. हाँ आपने स्वयं को मेरा छोटा भाई भी कहा है इस नाते मेरी हार्दिक इच्छा है कि आप इस मंच पर हमारा साथ दें और सिर्फ एक धर्म की बात करें 'मानवता' और आप भी हमारी जाति के सदस्य बने 'हिन्दुस्तानी' फिर आप सकारात्मक तरीके से अपनी ऊर्जा का प्रयोग बिना किसी बैर भाव के कर सकेंगे और मंच को आपसे कुछ और बेहतर मिल सकेगा. मेरा ई-मेल आपके पास है आप कोई भी बात मुझसे मेल के माध्यम से कर सकते हैं. खुल कर अपनी बात कहने और सकारात्मक प्रतिक्रया देने के लिए आपका धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

पल भर में सूनी सांझ हुई, एक चिता जली सौगातों की; भोली सी एक सांझ न समझी मंशा झंझावातों की; बहुत ही उम्दा अभिव्यक्ति है आपकी. आपका छोटा भाई सलीम ! . === आप भारतीय संविधान के बारे में कितना जानते हैं? मेरी कुछ पोस्ट पर कुछ लोगों को आपत्ति है कि मैं इस्लाम का प्रचार कर रहा हूँ और मुझे यह सब बन्द करने की सलाह (धमकी) मिल रही है. मैं उन सभी लोगों से पूछना चाहता हूँ कि भारतीय संविधान ने हमें जब किसी भी धर्म को अपना कर उसके प्रचार प्रसार की छूट दे रखी है तो फिर हो-हल्ला क्यूँ ??? कृपया पूर्वाग्रह से बाहर निकलें और स्वस्थ मन से मेरे लेखों का अध्ययन करें अगर आपको कहीं कुछ सही नहीं लगे तो आलोचनाएँ भी करें... आखिरकार हम सब भारतीय ही हैं. चातक भाई से विनम्र अनुरोध है कि मुझसे कोई शिकायत हो तो मुझे कॉल करें 9838659380

के द्वारा: Saleem Khan

आदरणीय श्री बाजपेयी जी, सादर नमस्कार, नियति सदैव हमारे साथ खेलती रहती है ये इंसान ही है जिसकी जिजीविषा उसे हंसाती और खुश रखती है जबकि वह एक कठपुतली की तरह इस मदारी के हाथो में एक बेढंगा नाच नाचता रहता है. जिन्दगी के कतरे बिखरते हुए एक ऐसा मकडजाल बनाते जाते है जिसमे मृत्यु भी किस्तों में आती है इंसान हर रोज थोडा थोडा मरते हुए भी थोडा जीने का अहसास मात्र करता है. बस यही कारण है की जब जिन्दा होने का अहसास हो तो कागज़ पर सिर्फ बोझल पंक्तिया ही उतरती हैं. राजकमल जी के लिए कविता के भावों की जो आपने व्याख्या की उससे बेहद ख़ुशी हुई और शायद उनकी शिकायत भी समाप्त हो गई होगी कि मंच पर साहित्य समझने वालों की कमी है क्योंकि शायद हिंदी ब्लोगिंग का ये अकेला मंच है जिस पर साहित्य लिखने और साहित्य को समझने वालों की एक बड़ी फौज है. प्रतिक्रिया द्वारा एक बार फिर साथ देने का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

प्रिय राजकमल जी, अभिवादन, समय के झंकोरे अक्सर हमें अपनी चाहतों से दूर उड़ा ले जाते हैं कुछ ऐसे ही कारणों से मैं काफी दिनों से मंच पर नियमित नहीं रह पा रहा हूँ वर्ना आप बंधुओं से दूर होना मैं सोच भी नहीं सकता. जिन शब्दों का अर्थ आपको समझ नहीं आया था उसका निदान आदरणीय बाजपेयी जी कर ही चुके हैं, सिर्फ एक और बात स्पष्ट कर रहा हूँ- ये रचना पूर्णतयः कुछ सामान्य और कुछ अद्भुत 'प्रभाव स्थानान्तरण अलंकार' का प्रयोग करके लिखी गई है. रचना के असल भाव के बारे में भी श्री बाजपेयी जी ने अपनी टिप्पड़ी में स्पष्ट कर दिया है, पंक्तियों में खीचा गया चित्र आपको मूल भाव (कोमल भावनाओं से साथ नियति की क्रूरता) तक पहुंचाने में सहायक होगा. आप हमेशा से मेरे लिए एक अच्छे और स्पष्टवादी ब्लोगर मित्र रहे हैं और मेरी राय आपके लिए हमेशा अच्छी रही है. रचना पर आपकी प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

प्रिय चातक जी ....नमस्कार ! आप को बहुत दिनों के बाद इस मंच पर इस रचना के साथ देख कर बहुत ही खुशी हुई .... मैंने सारी रचना को पढ़ा लेकिन मुझ अज्ञानी को राका की रश्मि स्याह हुई, का अर्थ समझ में नही आया ..... मुझको पता है कि लोग तारीफ करते चले जायेंगे , अगर नहीं कुछ समझ में आया तो भी नहीं बताएंगे आखिर वोह खुद को अज्ञानी कैसे बतलायेंगे ..... लेकिन मैं एक मंद बुद्दी अल्प ज्ञानी ही सही यह पूछने कि गुस्ताखी करना चाहता हूँ कि इसका असल भावार्थ क्या है ? किस और गुढ़ शब्दों में इशारा किया गया है ..... अभी कुछेक दिन पहले मैं अपनी पुरानी यादों कि परते खोलते हुए अपना ब्लॉग शुरू से देख रहा था तो उसमे आपका नाम और निखिल भाई तथा अदिति जि का नाम सबसे ज्यादा उभर कर आया जिन्होंने कि मुझको शुरूआती दिनों में सहारा दिया....+बाकि बाद में तो कई और साथी जुड़ते गए हार्दिक धन्यवाद के साथ

के द्वारा: Rajkamal Sharma

प्रिय चातक जी , एक गंभीर सामाजिक मुद्दे पर एक बहुत ही सार्थक लेख के लिए आपको हार्दिक बधाई | सचमुच बहुत ही अच्छा लिखा है आपने | आरक्षण आज हमारे देश में सचमुच एक प्रतिभा दमन करने वाले किसी भयानक राक्षस के समान रूप अख़्तियार करता जा रहा है | हर राजनीतिक व्यवस्था इसे अपने निजी हितों के लिए इस्तेमाल करती हुई सी प्रतीत हो रही है | एक सामान्य अनारक्षित श्रेणी का व्यक्ति अपना आप को ठगा सा महसूस कर रहा है | उसकी लाख कोशिशों के बावजूद उसको वह सब नहीं मिल पाता जिसका वह सचमुच का हकदार है | मैं खुद भी इस त्रासदी को काफी करीब से देख और भुगत चुका हूँ | आखिरकार आज के समाज में जातिगत आधार पर आरक्षण का मतलब ही क्या रह गया है ? अगर इसे लागू किया ही जाना है तो क्यों न आर्थिक आधार पर लागू किया जाए | युवा शक्ति को इसके लिए कुछ न कुछ करना ही  होगा वरना इसके परिणाम निकट भविष्य में बहुत निराशाजनक होंगे | इसी मुद्दे पर मैंने भी इस मंच पर अपने विचार रखे हैं, जिन पर आपसे समीक्षा की अपेक्षा करता हूँ | सधन्यवाद !! संदीप कौशिक http://sandeepkaushik.jagranjunction.com/2011/04/23/%E0%A4%86%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%B7%E0%A4%A3-%E0%A4%95%E0%A4%BE-%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%AA%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%A6%E0%A5%83%E0%A4%B6/

के द्वारा: संदीप कौशिक

चातक जी नमस्कार | आपने समाज में फैली राजनैतिक अव्यवस्था को व्यक्त करने का अच्छा प्रयास किया है | ये हमारे \"कथित\" लोकतान्त्रिक देश भारत की एक बहुत ही कड़वी हक़ीक़त है | ऐसा सिर्फ गोंडा या किसी एक जिले या प्रांत विशेष में नहीं होता है बल्कि हर जगह इसी तरह से सत्ता हथियाई जा रही है चाहे वह पंचायत या ब्लॉक स्तर का छोटा चुनाव हो या विधानसभा अथवा लोकसभा स्तर का कोई बड़ा चुनाव | पिछले दिनों शायद आपने तमिलनाडु के बारे मे सुना होगा जहां एक पार्टी विशेष के जीतने पर मतदाताओं को रंगीन टीवी, छात्रों को लैपटाप, महिलाओं को मंगलसूत्र आदि देने के वादे किए गए थे | तो हर जगह कमोबेश यही हाल है | लेकिन निराश करने वाली बात ये है कि ऐसी घटनाओं का पता चलने के बाद भी कोई कुछ कर नहीं रहा है |

के द्वारा: संदीप कौशिक

स्नेही श्री पाण्डेय जी, आपकी ये टिप्पड़ी मुझे संकेत करती है कि मैं दिशा भटक नहीं रहा हूँ| जब लेख को लिखा था उसी समय अहसास था कि मैं पाश्चात्य धारा के विरुद्ध चल रहा हूँ लेकिन साथ ही साथ इस बात का विश्वास भी था कि हमारी संस्कृति कभी भी गलत नहीं हो सकती| सबसे बड़ा पुरस्कार तो आप वरिष्ठजनों का स्नेह है जो मुझे अगाध मात्रा में मिला, वेलेंटाइन डे पर प्यार से बड़ी और कौन सी चीज़ हो सकती है| राष्ट्र तो वह पहला प्रेम है जो पूर्वजों के खून से पीढी दर पीढ़ी रगों में बहता आया है इसका नशा उतरने वाला नहीं| मेरे विचार से यही भावना सभी राष्ट्रवादियों को एक दूसरे से मजबूती से जोडती जा रही है| आपकी इस उत्साहवर्धक और स्नेह से भरी प्रतिक्रिया का कोटिशः धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

प्रिय चातक जी, सबसे पहले तो आपको हार्दिक बधाई जो आपने धारा के विरुद्ध चल कर धारा की दिशा बदल दी और प्रेमस्पर्धा में सर्वोच्च मुकाम हासिल किया. आपसे यही उम्मीद थी. आपका विजयी आलेख इस तथ्य की पुष्टि करता है कि प्रेम के संदर्भ में अंतिम रूप से भारतीय संस्कृति और विचारधारा पूर्ण रूपेण सही हैं जहॉ प्रेम को प्रेमी-प्रेमिका की बजाय व्यापक मानवीय संदर्भों के रूप में देखा जाता है. सही मायने में "प्रेम" का व्यापक स्वरूप उद्घाटित करने के लिए आप बधाई के पात्र है. और सबसे बड़ी बात प्रेम को राष्ट्र प्रेम से जोड़ कर आपने भटकते लोगों के लिए दिशा प्रस्तुत करने का कार्य किया है. अंत में एक बार फिर से राष्ट्रोन्मुखी उद्गारों के लिए आपका आभार.

के द्वारा: rkpandey

आदरणीय चातक जी सादर अभिवादन ! अद्भुत भावों को शब्दों छंदों में पिरोती इस रचना के लिए आभार ..... इस भाव को अज्ञेय जी लिखते हैं ...... --------------------------------------------------------------------------------------------- पथ मेरा रहे प्रशस्त सदा क्यों विकल करे यह चाह मुझे ? नेतृत्व न मेरा छिन जावे क्यों इसकी हो परवाह मुझे ? मैं प्रस्तुत हूँ चाहे मेरी मिट्टी जनपद की धूल बने- फिर उस धूली का कण-कण भी मेरा गति-रोधक शूल बने ! . अपने जीवन का रस देकर जिसको यत्नों से पाला है- क्या वह केवल अवसाद-मलिन झरते आँसू की माला है ? वे रोगी होंगे प्रेम जिन्हें अनुभव-रस का कटु प्याला है- वे मुर्दे होंगे प्रेम जिन्हें सम्मोहन कारी हाला है . मैंने विदग्ध हो जान लिया, अन्तिम रहस्य पहचान लिया- मैंने आहुति बन कर देखा यह प्रेम यज्ञ की ज्वाला है ! मैं कहता हूँ, मैं बढ़ता हूँ, मैं नभ की चोटी चढ़ता हूँ कुचला जाकर भी धूली-सा आंधी सा और उमड़ता हूँ --------------------------------------------------------------------------------------------- http://www.kavitakosh.org/kk/index.php?title=%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82%E0%A4%A8%E0%A5%87_%E0%A4%86%E0%A4%B9%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A4%BF_%E0%A4%AC%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A4%B0_%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%96%E0%A4%BE_/_%E0%A4%85%E0%A4%9C%E0%A5%8D%E0%A4%9E%E0%A5%87%E0%A4%AF ---------------------------------------------------------------------------------------------

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

स्नेही सुषमा जी, मैंने सिर्फ अपनी बात कही है अपने आपको विजेता घोषित करने जैसी कोई बात मैंने स्वयं कही हो ऐसा याद भी नहीं आता (मेरे ख्याल से ये घोषणा जे.जे. निर्णायक मंडल की तरफ से हुई होगी) हां इसका श्रेय (पूरा का पूरा) मैंने माँ वाग्देवी और उन सभी ब्लॉगर बंधुओं को दिया है (जिन्होंने अपनी शुभकामनाओं और बधाइयों से साथ 'कंडीशन अप्लाइड' जोड़कर न भेजा हो)| आपकी पारखी नज़रों ने बिलकुल ठीक पहचाना इस लेख में प्रेम के अन्तर्निहित तत्व मौजूद नहीं हैं क्योंकि प्रेम जैसी गहरी और आत्मिक भावना तक पहुँच का उसकी पूरी व्याख्या करने की सामर्थ्य मुझमे नहीं मैं इसके सिर्फ उसी नैतिक पक्ष की थोड़ी समझ रखता हूँ जिसे आप "एक सोची समझी दुनिया दारी और इसके विचारनीय और बहुत अच्छे नेतिक प्यार के विषय में आपके द्वारा कही गयी बहुत बढ़िया बाते" कहती हैं| आपकी एक बात मैं समझ नहीं पाया कि जब आपने भी प्यार नही देखा तो फिर आप कैसे जान पाई कि मैंने दूर से भी प्यार महसूस नहीं किया? लगता है आप मेरे लेख से बहुत आहत हुई हैं| लेकिन आपकी टिप्पड़ी पाकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ कि आपने अपना रोष खुलकर जाहिर तो किया| आपकी आलोचनाओं का हमेशा स्वागत है| (बिना किसी शर्त के) आपका कोटिशः धन्यवाद !

के द्वारा: chaatak

सिर्फ अपनी बात कहना और कहकर विजेता बन जाना ही अगर जीत है तो आप बधाई के पात्र है. एक सोची समझी दुनिया दारी और इसके विचारनीय और बहुत अच्छे नेतिक प्यार के विषय में आपके द्वारा कही गयी बहुत बढ़िया बाते .बहुत बढ़िया लेख. पर मेरे विचार से इसमें प्रेम के अन्तर्निहित तत्त्व मोजूद नहीं है.\" गुलाब देना चाहूँगा जो मेरी माँ ने खरीदा हो, जिसकी कीमत मेरे पिता ने चुकाई हो \"शायद ऐसे कई प्यार घुट रहे है उस चार दिवारी में.कई तलक हो रहे है ,और कई दम तोड़ दे रहे है.\'\'\'\' क्योकि कीमत तो तय है उसके द्वारा जिसने ख़रीदा है................................वेलेंटाइन के नाम पर हवस और व्यभिचार को आमंत्रण \"\"\"\"\"\"\"शायद समझ नहीं पाएंगे उस युवा की भावना को जो हर बार बुरी नहीं होती ,जो हर बार विरोध नहीं करती ,सिर्फ बलिदान करती है.\"\"\"\"फितूरियों के हाथो में ये प्रेम का प्रतीक क्यों?\"\"\"\"\" जो फितूर करते है उनके लिए प्यार का कोई मतलब नहीं शायद आपने अपने जीवन में प्यार को देखना तो दूर महसूस भी नहीं किया. मैंने भी नहीं देखा लेकिन मैं सम्मान देती हु उस प्यार को जो यदा कदा ही नजर आ पता है. फितूर क्या जाने की प्यार के होता है.

के द्वारा: sushma

के द्वारा: shab

के द्वारा: डा.. एस शंकर सिंह

के द्वारा: amita

“देखा, एक भी पैसा अपना नहीं लगाया और तू भी जरा बचत करना सीख ले| हमेशा पैसा-पैसा करती रहती है!” . कम से कम शब्दों का प्रयोग कर के गहरे मार करने की कला अगर किसी को सीखनी है तो वह आपका लेख पढ़े । गज़ल या कविता को पद्य में बहुतों ने लिखा और बहुतों ने पढ़ा है लेकिन अगर गज़ल या कविता को किसी ने गद्य में लिखा है तो वह आप है । जीवन का ढेर सारा अनुभव कुछ ही पंक्तियों में कहने की अद्भुत क्षमता है आपकी लेखनी में । कोयी तालाब में एक पत्थर फेंकता है तो छोटी छोटी लहरें पैदा होती है लेकिन जब आप जेजे के तालाब में चार लाईन की भी कविता छोड़ते हैं तब ज्वार आ जाता है और कभी कभी सूनामी भी । जब जब आप सम्मानित होते हैं तब तब मैं और मेरे साथ बहुत से दूसरे लोग भी सम्मानित होते हैं क्योंकि आपकी लेखनी हमारी आकांक्षाओं को आवाज देती है । एक बार से ढेरों बधाईयां ।

के द्वारा: kmmishra

के द्वारा: komal

आदरनीय चातक जी.... सादर अभिवादन ... आपने इन चाँद पक्तियों में प्रेम का अथाह दर्शन उड़ेल दिया है | ---------------------------------------------------------------------------------------------------------------- वेलेंटाइन हमारे आदर्श नहीं तो हमारे दुश्मन भी नहीं| लेकिन वेलेंटाइन के नाम पर हवस और व्यभिचार को आमंत्रण समाज के लिए नहीं, प्रेम के लिए ही घातक है| मैं भी अपनी प्रेयसी को एक खूबसूरत गुलाब देना चाहूंगा, लेकिन ऐसे नहीं कि वेलेंटाइन की आत्मा को दुःख हो कि मैं अपनी कुत्सित वासना से प्रेरित हूँ लेकिन आड़ उसके नाम की ले रहा हूँ, बल्कि इस तरह कि वेलेंटाइन भी सोचे कि प्रेम करना सिखाया मैंने लेकिन आया तो सिर्फ इस हिन्दुस्तानी को| मैं अपनी प्रेयसी को वो गुलाब देना चाहूँगा जो मेरी माँ ने खरीदा हो, जिसकी कीमत मेरे पिता ने चुकाई हो और जिसका स्वागत करने के लिए मेरी प्रेयसी के माता-पिता पलकें बिछाए इंतज़ार कर रहे हों और जिसे मैं जब अपनी प्रेयसी के हाथ में दूं तो कह सकूं- “देखा, एक भी पैसा अपना नहीं लगाया और तू भी जरा बचत करना सीख ले| हमेशा पैसा-पैसा करती रहती है!” ---------------------------------------------------------------------------------------------------- इतनी सुलझी सोच आप जैसे विचारशील और सुलझे जन ही रख सकते हैं ..... ----------------------------------------------------------------------------------------------------- पांच श्रेष्ठ ब्लोगों में आपके इस लेख के चुने जाने के लिए हार्दिक बधाई और आगे के लिए शुभकामना आपका अनुज .

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

प्रिय राजकमल जी, हो सकता है मेरी सोच दूसरों से थोड़ी अलग प्रतीत हो लेकिन मैं हूँ तो आपमें से ही एक और आप लोगों का स्नेह मेरे लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहा है आपकी प्रतिक्रिया पाकर अत्यंत हर्ष हुआ साथ ही साथ ये भी आभास हो गया कि महान विचारक श्री आमिर खान जी की थ्योरी कि 'दोस्त फेल हो जाय तो दुःख होता है लेकिन दोस्त अगर फर्स्ट आ जाए तो ज्यादा दुःख होता है' हम दोस्तों पर लागू नहीं होता क्योंकि लिस्ट के प्रकाशित होते ही दोस्तों की शुभकामनाओं और बधाइयों में कुले दिल की खुशी है किसी के दिल में मलाल नहीं| आशा है कि हम इस प्यार हो यूँ ही बनाए रखेगे| एक बात और मैं अधर्मी नहीं विधर्मी हूँ| प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: आर.एन. शाही

प्रिय श्री चातक जी, आप जब कविता करते हैं तो झंडे गाड़ देते हैं और अब सोचनें को मजबूर करता लेख। आपकी प्रत्‍येक बात सोलह आने सच है। प्रत्‍येक पैरा में आपके कथ्‍य को बहुत ही बेहतरीन तरीके से प्रस्‍तुत किया हैं। फिर भी मुझे अंतिम पैरा व पंक्तियां बरबस ही अपनी और खींच रही हैं। वास्‍तव में आज प्रेम प्रदर्शन की वस्‍तु बन गया है। यदि किसी के पास प्रेमी -प्रेमिका नहीं हैं तो लगता है वह अधूरा है। पश्चिम की संस्‍कृति कहती है कि जब बेटी 13 की और बेटा 15 का हो जाता है तो मॉं-बाप ही उसे डेट पर जाने की लिए उकसानें लगते हैं। पता नहीं इससे उन्‍हें क्‍या लाभ होता है पर यह पता है कि हमारे देश में मॉं-बाप की स्‍वीकृति के बिना इस पर अमल करनें की संस्‍कृति पनप रही हैं। काश इस तरह अंधानुकरण करने वाले इस लेख को पढ़ें व समझें। अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: Arvind Pareek

के द्वारा: मनोज

काश हम भारतीय केवल ज्ञान के लिए वैदेशिक जीवन शैली का अनुकरण करते लेकिन अफशोश भारतीय युवा अंधी दौड़ (जिसे आधुनिकता कहा जाता है,,)में इतने तल्लीन हैं कि संस्कारों को रीति रिवाजों को सम्मान को भारतीयता को यहाँ तक कि मातृभूमि को भी भूल चुके हैं ,,यह वही भारत है जहां न जाने कितने लोग अपनी ज्ञान पिपासा शांत करने आये और तृप्त होकर गये ज्ञान के अनेकों आयाम इसी माँ भारती की कोख से उपजे ,,प्रेम जो आजकल इस मंच का लक्छ्य बना हुआ है ,,क्या प्रेम शब्दों के माध्यम से प्रकट किया जा सकता है मेरे विचार से तो नही ,,यह अनुभूति होती है हम मह्शूश कर सकते हैं लेकिन बता नही सकते यह ऐसी वस्तु है जिसे शब्दों में बाँधा नही जा सकता ठीक परम पिता परमात्मा की तरह वस्तुतः दोनों चरम पर एक ही हैं जिस तरह उसके सम्बन्ध में व्यक्ति मूक बन जाता है उसके गुण व्यक्त कर सकता है लेकिन उसे नही यही स्थिति प्रेम के विषय में भी है हम उसके गुणों को शब्दों में व्यक्त कर सकते हैं लेकिन प्रेम को नही ,,दोनों ही स्थितिया एक जैसी होने के बावजूद भी पूर्णतया एक दूसरे के विपरीत हैं हम प्रेम के कुछ एक गुणों को व्यक्त कर पाते हैं लेकिन प्रेम को नही ,,प्रेम हृदयगत विषय है जहां मष्तिष्क चलना बंद होता है वहीं से प्रेम का पथ शुरू होता है (एक उक्ति है प्रेम अँधा होता है ,,पूरी तरह सत्य है ,इसके एक पहलू को चुनते हैं,, आप किसी को प्रेम करते हैं (क्या इसमे वासना है ,,जी हाँ है एक आलम्बन की तरह है ,, लेकिन वह प्रेम नही है अनेक रास्तों में से एक रास्ता) क्योंकि जिसे आप चाहते हैं वह आपकी इस चाहत को कैसे मह्शूश कर पायेगा ,कुछ तो भौतिक क्रिया करनी होगी प्रेम को शुरू करने के लिए फिर स्वयमेव ही प्रेम का अंतर्बोध आप दोनों को होने लगता है फिर किसी आलम्बन की आवश्यकता शेष नही बचती दोनों एक दूसरे को मह्शूश करने लगते हैं (यह मानव एवं ईश्वर दोनों के ऊपर लागू होता है दोनों को प्रारम्भिक स्फुरण के लिए भौतिक माध्यम की आवश्यकता होती है एक बार स्फुरण हो गया फिर प्रेम अविरल बहने लगता है माध्यम वहीं रह जाते हैं और आप ऊपर उठ चुके होते हैं वहां जहां से आप उसे दूसरों के लिए व्यक्त नही कर सकते (या तो मै जानू या फिर मेरा खुदा )…………जय भारत भाई समय नही है इसलिए कमेन्ट कापी पेस्ट कर रहा हूँ (जो की इस Valentine कांटेस्ट) के लिए माकूल भी है …………जय भारत

के द्वारा: ashvinikumar

प्रिय श्री मिश्र जी, चुनाव आयोग की नींद कुम्भकरण की नींद की १० गुना ज्यादा बड़ी है वह कम से कम छः माह में एक बार तो जागता था लेकिन हमारा चुनाव आयोग ५ साल में एक बार जागता है वो भी सिर्फ चुनाव परिणाम आने तक उसके बाद ये फिर अपनी चिर निद्रा में बैठ कर मीठी नींद लेता है| वैसे भी आप सबसे टी.एन. शेषन होने की उम्मींद नहीं कर सकते| प्रिय राजकमल जी, हिन्दुस्तानियों के साथ सदैव यही विडम्बना रही है कि इसकी चाबियां हमेशा धन-पशुओं और विदेशियों के हाथों में रही हैं| इनका सिर्फ एक लक्ष्य है पैसा और ताकत ताकि ये खुले आम उन सभी कुकृत्यों को अंजाम दे सके जिन्हें हम कल तक सोच भी नहीं सकते थे| लाल चौक की बानगी हम देख चुके हैं| आप लोगों की प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया! वन्दे मातरम !

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: chaatak

आदरणीय चातक जी ! आपने बहुत ही प्रशंसा का कार्य किया है ..... चुनावों में धन आजकल मत प्राप्त करने का अच्छा और आस्सान उपाय हो गया है | ये भ्रष्टाचार छोटे बड़े हर स्तर के चुनावों में व्याप्त है, आपने ये भी ध्यान दिया होगा की पंचायत चुनाओं में भी इसकी गहरी जड़ें हैं, भले ही वहां वोते कम राशि पर बिकते हैं ...... और अगर सतही स्तर से इसे मिटाने के उपाय नहीं किये गए तो एक दिन ऐसा आ जाएगा की शासन पूंजीपतियों और बाहुबलियों के हाथ में पूर्णरूपें चला जाएगा ......... अभी पैसे से वोट बेचने वालों की समझ में नहीं आ रहा है, जब इसके दुष्प्रभाव से उनको व्यक्तिगत हानि होने लगेअगी तब समझ में आएगा ... और ऐसे ही चलता रहा तो ये जल्दी ही हो जाएगा .... आपके अप्रतिम साहस के लिए आपको प्रणाम ! और आँख खोलने वाले लेख के लिए बधाई

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

स्नेही श्री drsinwer जी, किसी के धर्म में क्या है उससे हमें तब तक कोई लेना देना नहीं जब तक वह दुसरे धर्मों के मामले में दखल न दे या दुसरे समाज को अपनी जमात बनाने की कोशिश न करे| लेकिन यदि कोई ऐसा करता है तो मुझे ऐतराज़ है और इसे मैं स्पष्ट रूप में और कठोर सब्दों में व्यक्त करने को प्रतिबद्ध हूँ क्योंकि भीरुता न हमारे पूर्वजों के रक्त में है न हमारे धर्म में न संस्कृति में| हमारा धर्म यदि शास्त्र हैं तो शास्त्रों की पूजा भी हमारा धर्म है और हमें दोनों को उठाने में सामान गर्व की अनुभूति होती है| आपको जो भी बुरा लगा उसे आपने कहा गलत हो गलत कहना साहस का कार्य है इसके लिए मैं आपकी सराहना करता हूँ| प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

प्रिय श्री चातक जी, नमस्‍कार, आज बहुत दिनों के बाद आपकी इस पोस्‍ट पर पहूँचा हूँ। लगा कि यह पोस्‍ट अभी अभी लिखी गई है। वास्‍तव में इस मंच पर धर्म की अफीम खाई और खिलाई जा रही है। आपने सही लिखा है - 'ईश्वर ने आपको अप्रतिम प्रतिभा और नियति ने एक ऐसा पद दिया है कि आप समाज और राष्ट्र के लिए कुछ सार्थक कर सकते है तो फिर क्यों जी चुराते हैं इससे! किसी ऐसी बहस को बढ़ावा दीजिये जो रचनात्मक हो जिससे हम अनुयायियों को भी कुछ सीखने और कुछ करने का जज्बा मिले न कि इस तरह की फर्जी पोस्ट लिखने की जो मैंने यहाँ लिख मारी है|' लेकिन आपकी पोस्‍ट फर्जी नहीं हैं, यह मैं दावे के साथ कह सकता हूँ। आपके दिल की बात मेरे दिल से मिल रही है। इसलिए मुझे इसमें कोई फर्जीवाड़ा नजर नहीं आ रहा है। अपितु यह पोस्‍ट भी कुछ ज्ञान प्रदान ही कर रही है। आपने काफी समय से कुछ नहीं लिखा आशा है सब मंगल ही होगा। अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: Arvind Pareek

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

स्नेही अग्रज अश्विनी जी, सादर अभिवादन, आपके मन की व्यथा मैं समझ सकता हूँ| नियति की जिस कठिन परीक्षा से आप गुजर रहे हैं उसका सिर्फ अंदाजा लगाया जा सकता है| ईश्वर से प्रार्थना है की वह सतत आपका मनोबल बढाए| सही कहा आपने इस देश की ये विडम्बना है कि इस धरती में हर काल हर अवसर पर महपुरुषों के साथ साथ कापुरुष भी उत्पन्न हुए है| इनका काम ही है थाली में छेद करना ये अपने कर्म से बाज़ आयें भी तो कैसे| अभी अभी दिव्या जी की पोस्ट पर भी मैंने ऐसे ही एक दृश्य को देखा| वहां राष्ट्र के दलाल राष्ट्र ध्वज पर छुरी चलती देख कर दल्लों की तरह तालियाँ पीट रहे थे| लानत है ऐसे नेता और बुद्धिजीवियों पर| जय भारत जय भारती ! आपका अनुज

के द्वारा: chaatak

आशुतोष दा, सही आइना दिखाया आपने इन आलोचकों को| ये पहले तो प्रश्न उठाते हैं और फिर जब कोई जिज्ञासा या तर्क देता है तो 'मैं इतना ज्ञानी नहीं हूँ कहकर साफ़ मुकर भी जाते हैं' क्षमता नहीं है प्रश्नों का सामना कर पाने की ना अध्ययन है उस कोटि का कि व्याख्या ही प्रस्तुत कर पायें| मैंने कहा न 'भाई सुलेमानी है !' लग गई तो लग गई| अब चाहे बिच्छू का मंतर न जानते हों लेकिन सांप के मुंह में ऊँगली करेंगे| मुझे याद है कि मेरे दादा कहा करते थे कि ये कलम नहीं है सांप है संभाल कर चलाना| देखो इसके दो जीभ है और मुंह पकड़ते ही नीला ज़हर अँगुलियों में उतार देती है इसलिए ठीक से पकड़ो और संभाल कर लिखो| आपके मार्ग-दर्शन की सदैव आवश्यकता रहेगी| स्पष्ट विचारों का एक बार फिर बहुत बहुत शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

स्नेही श्री शिवेंद्र जी, सही कहा आपने इन तथाकथित विद्वानों की मानसिकता कुछ ऐसी ही है कि जब तक निर्विवाद सत्य में भी विवाद पैदा न करें तब तक इन्हें मजा नहीं आता| हम अपने आपको भारतीय कहें, इन्डियन या फिर हिन्दुस्तानी मतलब तो सिर्फ इस बात से है कि आप कितना फ़ख्र महसूस करते हैं इन शब्दों के उच्चारण में| हमारी माटी चन्दन से भी ज्यादा पवित्र है इसे मुझे माथे पर लगाते गर्व का अहसास होता है अब कोई कहे कि इस मिटटी को आक्रान्ताओं के दूषित कदमो में दूषित कर दिया है तो मुझे आश्चर्य भी होता है और रंज भी| इस पर फैला सारा प्रदूषण हमारे पूर्वजों ने अपने रक्त और स्वेद से कब का समाप्त कर दिया और इस मिटटी में अब कुछ बचा है तो उनके बलिदानों की महक जो इसे चन्दन से भी ज्यादा सुवासित बना रही है| आपकी उत्साहवर्धक टिप्पड़ी का बहुत बहुत शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

भाई सचिन जी अभिवादन, धर्म पर आपकी भावनाएं जानकर अत्यंत हर्ष हुआ और आपके मन की व्यथा हमारी व्यथा से जुदा भी नहीं| आपकी बात सही है मैं भी किसी अन्य के धर्म और मान्यताओं पर तब तक ऐतराज नहीं करता आप किसी भी धर्म को मानो न मानो कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन जब कोई नाहक बेमेल खिचड़ी बना कर धर्म और मान्यताओं से खिलवाड़ की कोशिश करता है तो बुरा लगता है| यहाँ तो हद ही हो गई एक ही धर्म के दो नामो के बीच विभाजन की कडवी रेखा खींचने की कोशिश हो रही है| एक तरफ विभिन्न धर्मो में समानता की कोरी झूठी बातों का प्रपंच करते हैं और दूसरी तरफ शब्दों का जाल बुनकर हेरा-फेरी भी शुरू कर देते हैं| किसी रचनात्मक विषय पर लिखते हुए तो कलम कुंद हो जाती है लेकिन विवादित विषय उठाना हो तो न विचारों की कमी है न दलीलों की| हिन्दू शब्द यदि सिन्धु का पर्याय है तो क्या ये और अधिक पवित्र नहीं हो जाता? क्या हमारी परम्परा हमारा धर्म नदियों को माता तुल्य नहीं बताता? ऐसे में तो हिन्दू शब्द सनातन से भी महान हो जाता है क्योंकि उसमे माँ की अभिव्यक्ति है! फिर इस शब्द को गाली या मुखौटा कह कर कौन सी विद्वता साबित करने की कोशिश है| वैचारिक समर्थन का कोटिशः धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

आदरणीय निशा जी, मेरे मन में जब तक झंझावात कष्टकारी हद तक न बढ़ जाएँ मैं स्वयं धर्म के नाम और उसके क्रियाकलापों पर किसी तरह की बहंस या वाद-विवाद से बच कर रहना चाहता हूँ| मुझे स्वयं ये प्रतीत होता है कि मैं अपनी शक्ति या अपने किसी भी कार्य को उस दिशा में प्रेरित करूँ जहां समाज और राष्ट्र को इसकी जरूरत हो या जहां से किसी छद्म बौद्धिकता का प्रपंच न शुरू हो जाए| आपसे ब्लॉग संवाद अच्छा लगता है क्योंकि आप हर बार कुछ ऐसा देती हैं जिससे हमारे चिंतन को एक सकारात्मक दिशा मिलती है| आपकी टिप्पड़ियाँ भी उत्साह प्रदान करती हैं और कुछ सार्थक करने की प्रेरणा देती हैं| आपने वैचारिक साम्य की बात कही तो काफी अच्छा लगा| आपके विचारों को इस पोस्ट पर व्यक्त करने का कोटिशः धन्यवाद !

के द्वारा: chaatak

प्रिय श्री मिश्र जी, आपकी इतनी सुव्याख्यित टिप्पड़ी पढ़ कर अत्यंत प्रसन्नता हुई| कितनी कुत्सित किस्म की मानसिकता है कि आप के सहिष्णु धर्म के नाम और उसे संबोधित करने के तरीके तक का विवेकहीन होकर अनर्गल विश्लेषण कर रहे हैं| जब सनातन धर्म स्वयं इस बात की इजाजत देता है कि आप प्रकृति के किसी भी अंश को आत्मसात कर लो आपको शक्ति और मोक्ष दोनों स्वमेव प्राप्त होंगे तो फिर इस धर्म के किसी भी नाम पर भाषा या उच्चारण सम्बन्धी आरोप क्या स्वयं इसकी सहिष्णुता से बेईमानी नहीं है? जहाँ दुनिया के अन्य सम्प्रदाय किसी न किसी रूप में अपनी शिक्षाओं का प्रचार (एडवरटीजमेंट) करके जर और जोरू का लालच देकर, रोटी और बेटी का लालच देकर अपने प्रसार की मंशा से न जाने कितने लोगों को इंसानियत से भी गिरा रही हैं वहां हिन्दू धर्म सिर्फ आपको इंसान बनाने की प्रेरणा दे रहा है तो उसकी वर्तनी और नाम तक में नाहक मीन-मेख निकाल कर अपने आपको ज्ञानी साबित करने की परिपाटी चलाने निकल पड़े लोगों की भी तादात बढ़ने लगी| लेख को कई और मंथन बिंदु प्रदान करने का कोटिशः धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: शिवेंद्र मोहन सिंह

प्रिय चातक जी सादर वंदेमातरम ! आज कल यह फर्जीवाड़ा, जिससे अब तक जागरण जंक्शन अछूता था यहां भी बढ़ गया है । धर्म के फर्जीवाड़े पर पूरी दुनिया पिछले 2000 साल से लड़ रही है । मैं बड़ा की तू बड़ा । मजे की बात की धर्म जैसे बौद्धिक विषय पर पिछले 2000 साल में हजारों युद्ध लड़ लिये गये । पूरी दुनिया में करोड़ों लोगों की जानबूझ कर बलि ली गयी । कितने देशों की सीमाएं बदल दी गयीं । . धर्म के नाम पर आज भी प्रति दिन सैंकड़ों लोगों की बर्बर हत्या की जाती है । परसों पाकिस्तान में भी बम फटा और वाराणसी में भी । दोनों जगह मकसद एक था धर्म । पता नहीं कैसे धर्म के योद्धा हैं जो अपने धर्म का प्रचार, प्रसार ज्ञान और खुले शास्त्रार्थ से नहीं, जैसा कि कुमारिल भट्ट, आदिगुरू शंकराचार्य, विवेकानंद (शिकागो धर्मसभा) ने किया था बल्कि तलवार और धन की ताकत से करते हैं । . हिंदू धर्म पर हजारों साल से हमले होते रहे हैं । हजारों साल के इतिहास में हमने कभी धर्म के नाम पर न कोयी युद्ध लड़ा और न एक बूंद खून बहाया । एक ऐसा धर्म जो सबसे पुराना है । सभी धर्मों का पिता है । जिससे सभी धर्म निकले । जिसके ज्ञान के प्रकाश में सभी ने ककहरा सीखा आज उसी को मिटाने के निरर्थक में सभी लगे हैं । . हिंदू धर्म सनातन है । सबसे पहले भी यही था और अंत में भी यही रहेगा । इस पर कुछ मुट्ठी पर लोगों के दिमाग लड़ाने से इसका बुरा भला कुछ न होगा । हिंदू धर्म शाश्वत है । जब हजारों साल के हमलों से इसका कुछ नहीं बिगड़ा तो मुखौटे लगा कर इस पर हमला करने से इसका रोआं भी न टेढ़ा होगा । . धर्म को अफीम कहा गया है उन धर्मों के अनुयायिओं के लिये जो धर्म के नशे में चूर हो कर नित्य खून बहाते हैं । उस धर्म के लिये नहीं जहां धर्म का अर्थ सत्य, ज्ञान, प्रकाश, परोपकार, दया,नैतिकता और सामाजिक और राष्ट्रीय कर्तव्य माना जाता है । धर्म की खेती बहुतों ने की है । कुछ और लोग उसकी दुकान चला लें । धंधा तो मुनाफे का है ही । हजारों साल का इतिहास भी यही कहता है ।

के द्वारा: K M Mishra

के द्वारा: rajkamal

प्रिय श्री मिश्र जी, अब ये सांप क्रीम पी पी के इतने चिकने घड़े बन चुके हैं कि इन्हें किसी बात का फर्क नहीं पड़ता| जनता लात मार के इन्हें बाहर का रास्ता दिखाती है और ये ही-ही करते फिर चले आते हैं| कांग्रेस तो नेहरु के जमाने से ही निर्लज्ज थी| पहले सरदार पटेल के स्थान पर नंगई करके खुद प्रधानमन्त्री बने फिर इस देश पर थोप गए अपना निर्लज्ज परिवार जो न नंगई करने से बाज आता है न गुंडई| सोनिया कलाम साहब से बेज्जत होकर निकलती हैं तो मनमोहन सिंह को बकरा (मुर्गा भी कह सकते हैं) बनाकर त्याग की देवी का चोला ओढ़ लेती हैं| ऐसे ही राहुल हर दूसरे तीसरे किसी गरीब के घर का राशन उठाने से बाज़ नहीं आते| शर्म नहीं आती कि मुंह-टेढ़े ने जिन गरीबों को अनाज बांटने से इनकार कर दिया उन्ही के घर हराम की तोड़ने पहुँच जाते हैं| हद भाई भाई बेशर्मी की! भोली जनता बेवक़ूफ़ कब तक बने? व्यंगात्मक अंदाज में लेख को एक नया आयाम देने का तहे दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

रौशनी जी, युवा धीरे-धीरे इन मक्कार राजनेताओं की वात्विकता तक पहुँच रहा है और ये बात इन्हें भी पता चल रही है यही कारण है कि ये नित नए छद्म रूप धारण करने लगे हैं| पहले कांग्रेस ने जनता को बांटने के लिए जाति-आधारित जनगणना की योजना बनाई और फिर जब किसी ने खुद सोनिया, राहुल और प्रियंका का धर्म पूछ लिया तो इनका जवाब है कि ये तथ्य सार्वजनिक नहीं किया जा सकता| यदि इनका धर्म जनता नहीं पूछ सकती तो क्या अधिकार है इन्हें जनता का धर्म और उसकी जाति पूछने का? वह भी तब जबकि सारा हिन्दुस्तान जानता है कि एक सर्वहारा भी धर्म और जाति के मामले में इन तथाकथित राजवंशियों से ज्यादा पाक साफ़ और सम्माननीय है| मुखर टिप्पड़ी द्वारा वैचारिक समर्थन का बहुत बहुत धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

प्रिय राशिद जी, आपने बिलकुल ठीक कहा हमारे देश को आतंकवादियों से ज्यादा खतरा इन नीति-निर्माताओं से है जो हम हिन्दुस्तानियों के आस्तीन में छिपे रहकर हमें हर रोज डस रहे हैं इनका जहर संस्कृति के विनाश के रूप में अब नंगा नाच खेलते विभिन्न टी.वी. चैनलों पर रोज दिख रहा है| युवाओं के लिए इनके पास रोज़गार नहीं है लेकिन उनमे वैमनस्य पैदा करने के लिए आरक्षण है| जनता भूखों मर रही है तो ये अनुदान बाँटते हुए अपनी फोटो खिंचा के वोट पक्का कर रहे हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर तुरंत मुंह-टेढ़े अनाज मुफ्त न बाँट पाने की बात कह देते हैं| न जाने कितने दुर्दांत पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे देश को खोखला करते चले जा रहे हैं| अब युवाओं को इनसे हिसाब माँगना ही होगा| आपकी उत्साह से भरी टिप्पड़ी पढ़कर बेहद ख़ुशी हुई| बस इस रौशनी को ऐसे ही बांटे हुए आमूल-चूल परिवर्तन का शंखनाद करते चलें| सफलता जरूर मिलेगी, आमीन!

के द्वारा: chaatak

स्नेही श्री पारीक जी, हमारी शिक्षा के बारे में शिक्षक, राष्ट्रपति श्री राधाकृष्णन जी ने कुछ सिफारिशें की थी जिनसे मैकाले की शिक्षा पद्धति की विसंगतियां हटा कर हमारी शिक्षा का कायाकल्प हो सकता था लेकिन अंग्रेजों के पिट्ठुओं में उनकी सिफारिशों को ठीक वैसे ही खारिज कर दिया जैसे आज हमारी सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों की एक चपरासी से लेकर हाई कोर्ट के जज तक खिल्ली उड़ाते नज़र आते हैं| हमारी युवा पीढ़ी की सोच बदल रही है और एक लम्बे समयांतराल के बाद युवा फिर अपनी शक्ति का अहसास करवाना चाहता है और उसे अपनी जिम्मेदारियों का भान भी है बस एक शुरूआती झटका चाहिए और कुछ नहीं| आपकी इतनी अच्छी प्रतिक्रिया का तहेदिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

सच है चातक जी ,, हमारा स्वाभिमान जो हमारा गहना था, जिस पे हमे गर्व था धीरे धीरे ख़त्म होता जा रहा है,, कल मेरे पास एक मेल आया जिसमे लिखा था की देश के आगे बढ़ने के लिए ज़रूरी होता है वहां के लोगो का attitude , और हमारे देश में जहाँ प्रकृति ने अपने खज़ाना दिन खोल के लुटाया है , संसाधनों की कोई कमी नहीं है इसका तोड़ हमारे दुश्मनों ने निकाला यहाँ का नैतिक और सामाजिक पतन करके जो आज़ादी के बाद से आज तक जारी है !! हम धर्म , जाति, भाषा, क्षेत्र में ऐसा बटे कि देश को भूल गए,, नोट के चक्कर में सारी नैतिकता को ताक पर रख दिया,, ग़रीबो और कमजोरो से वसूली / बुढो और लाचारो पर रोब , बस यही कुछ रह गया है, युवा पीड़ी दिशा हीन हो कर अपनी संस्कृति का नाश करने पर तुली है ,, राहुल महाजन, राखी सावंत और बिग बॉस जैसे कार्यक्रम देखे और पसंद किये जाने लगे है जिसमे खुले आम औरतो और मर्दों को गले मिलते और न जाने क्या क्या करते दिखाया जाता है ,, यह सब सिर्फ और सिर्फ नोट के खातिर देश को बर्बाद कर रहे है !! समाज को भ्रष्ट करने वाले यह लोग आतंकवादियो से बढ़ कर है क्योंकि यह पुरे समाज को ख़राब कर रहे है और हमे समझ में भी नहीं आ रहा है कि हम कहाँ जा रहे है !! आप सत्य कि ज्योति जलाये रहिये शायद किसी को रौशनी नसीब हो जाए !! राशिद http://rashid.jagranjunction.com

के द्वारा: Rashid

के द्वारा: chaatak

चातक जी बधाई । यह ध्रुव सत्य है कि स्वाभिमान और आत्मसम्मान के बिना व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र किसी का भी समुचित-सर्वांगीण विकास कदापि नहीं हो सकता । जो खुद अपना सम्मान नहीं कर सकता, वह न तो किसी और का दिल से सम्मान करना जान पाएगा, और न ही किसी के सम्मान अथवा अस्मत की रक्षा ही कर सकता है । स्वाभिमान और स्वयं के प्रति सम्मान भाव के लिये व्यक्ति या राष्ट्र के चरित्र में ईमानदारी का तत्व मौज़ूद होना भी परम आवश्यक होता है, जबकि भ्रष्ट आचरण अथवा भ्रष्टाचार और स्वाभिमान-आत्मसम्मान दोनों कभी एक साथ नहीं रह सकते, यह भी सत्य है । भ्रष्टाचार व्यक्ति की आत्मा को कुचलकर उसे दयनीय स्थिति में पहुंचाते हुए एक तरह से उसकी आत्मा को मार देता है, जिसके कारण सारी प्रचुरताओं (भ्रष्ट तरीके से प्राप्त) के बीच भी वह कभी भी संतुष्ट और निर्भय जीवन नहीं जी पाता । हमेशा एक अज्ञात भय से पीड़ित रहते हुए ऐसा समाज पूरी तरह ढोंगी बन जाता है । आपने लेख में जिन व्यक्तियों को भारत को ऐसी स्थिति में पहुंचाने के लिये ज़िम्मेदार बताया है, वह बिल्कुल सत्य है । इनकी दूरदृष्टि में एक स्वाभिमानी भारत के निर्माण की बजाय हमेशा ग़ुलामी की मानसिकताओं के साथ ही जीने वाला भारत अधिक मुफ़ीद था, जिसपर अंग्रेज़ों के स्टाइल में ही स्थाई रूप से राज करने की बुनियाद डाली जा सके । इन्होंने अंग्रेज़ों को भारत छोड़ने पर मजबूर करने वाले आंदोलनों का नेतृत्व अवश्य किया, परन्तु खुद अपने अंदर से अंग्रेज़ियत को आज तक निकाल पाने में असमर्थ रहे हैं, जिसका खामियाज़ा आज भी देश भुगत रहा है । साधुवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

वाणी जी, मेरी अपनी राय है कि इस दिशा में यदि सकारात्मक पहल करनी हो तो अंतर्जातीय विवाह से पहले आवश्यक है कि जातियों और जाति-प्रथा को ही मिटाया जाय| यानी पहले जातीय आरक्षण, सरकारी भेदभाव, राजनैतिक वंशवाद को हटाइये फिर पूरे समाज में अंतरजातीय जैसा न तो शब्द रहेगा न समस्या| लेकिन पैसे के लिए नंगे नाचने वाले लोगों का उदाहरण सभ्य समाज के लिए अनुकरणीय है ये सोचकर ही अच्छा नहीं लगता| विवाह की उनकी न कोई प्रथा है न कोई सलीका ये भी उनके लिए एक व्यवसाय है जिससे उनकी टी.आर.पी. बढती है| यहाँ प्रश्न ये भी है कि इन नाचने वालों को आदर्श बनाने से पहले क्या हम इसके लिए तैयार हैं कि हमारे घर की कोई लड़की उन्हें मिलने वाले पैसे के दोगुने पैसे मिलने पर भी उनकी तरह नग्न-नृत्य करने को तैयार है| या फिर हम में से कितने हैं तो अपनी लड़की को ऐसा दयनीय नृत्य करते देखने को तैयार हैं? वाणी जी, आपकी विचारणीय प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

प्रिय श्री चातक जी, सादर नमस्कार, सर्वप्रथम तो आपके ही शब्दई दोहरा रहा हूँ जो मेरी मनस्थिति को भी व्य क्त करते हैं - हाल आफ फेम में चुने जाने की बधाई| मुझे बेहद खेद है की पहले मैं इस पोस्ट पर प्रतिक्रिया नहीं कर पाया था लेकिन जागरण ने इस ब्लॉग को मंच पर रखकर इसे पढने का अवसर सहज ही प्रदान कर दिया| कुछ और लिखता लेकिन इनसे अधिक सटीक शब्द नहीं मिल रहे थे । खैर प्रश्नह नैतिकता पर उठाया गया है तो मैं तो केवल यह जानता हूँ कि परिस्थिति के अनुरूप ही नैतिकता होती है । जेबकतरा जेब काटता है बटूए में देखता है कि कोई इलाज संबंधी कागजात भी है । उसकी नैतिकता जाग जाती है रूपये पैसे अपनी जेब के हवाले कर वह उन कागजों को लौटा देता है । इसके उलट आप बनिए को सामान के पैसे देते हैं दिया तो आपने पचास का नोट था जिसमें से उसे चालीस काटने थे लेकिन उसने लौटा दिए आपको पूरे चार सौ साठ क्यों कि उसने समझा कि आपनें पॉंच सौ का नोट दिया है । आप जानते बुझते उसे जेब के हवाले कर देते हैं । क्योंस, क्योंाकि एक बार बनिए ने पॉंच सौ के नोट को पचास का बता कर आपसे अनैतिकता दर्शाई थी । अब इनमें कौन कब अनैतिक था क्याे कहा जा सकता है । एक दृष्टि से कोई नैतिक है और दूसरी दृष्टि से अनैतिक । अरविन्द पारीक

के द्वारा: Arvind Pareek

प्रिय श्री चातक जी, सादर नमस्‍कार, सर्वप्रथम तो आपको हाल आफ फेम में चुने जाने की बधाई| आप इस मंच पर सदैव जगमगाते रहें यही कामना है । अब इस पोस्‍ट के बारे में - मेरी राय में दूसरों पर दोष डालनें की मनोवृति ही हमें किसी को दोषी ठहरानें के लिए प्रेरित करती है । क्‍योंकि हम अपनी गलतियों से दोष से कुछ सीखना ही नहीं चाहतें। यदि किसी को नाम से कोसा जाए तो न्‍यूटन का सिद्धांत लागू होने का भय लगा रहता है अर्थात प्रतिक्रिया तो होनी ही है । एक समाज ही ऐसा है जिससे किसी प्रतिक्रिया की उम्‍मीद नहीं होती । लेकिन आपनें तो इस मंच पर समाज को प्रतिक्रिया देने के लिए बाध्‍य कर ही दिया है । खैर अपनें आप को दोषी मानना व अपने दोषों को पहचानना ही समस्‍या का समाधान हो सकता है । अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: Arvind Pareek

चातक जी , देर से प्रतिक्रिया व्यक्त कर रही हूँ l आपने एक बात तो सुनी होगी? "आप भला तो जगत भला" जो लोग दूसरों पर अंगुली उठाते हैं वह भी हमारे समाज का ही हिस्सा हैं l उस समाज में महिला पुरुष दोनों रहते हैं l दोनों अच्छे काम भी करते है और खराब काम भी l यदि कोई गलत कर रहा हैं तो उसकी प्रतिवाद अवश्य ही होना चाहिए l हाँ ,मैं मानती हूँ की समाज में सुधार लाने का प्रयास हर व्यक्ति को करना चाहिए l इसी समाज में राखी सावंत सम्भावना जैसी आईटम गर्ल हैं जो अपने फायदे को पहला अहमियत देती हैं तो राजा चौधुरी जैसा गुस्सेल मिजाज वाले जो हमेशा शराब पीकर मारपीट करता विवादों में घिरा रहता हैं l हम कैसे भूल सकते हैं इसी समाज में मेधा पाटेकर जैसी समाज सेवी भी रहती हैं l निसंदेह समाज का स्तर निचे गिर रहा हैं l बेहतर यही होगा की हम एक दुसरे के ऊपर उंगली उठाने के बजाय खुद को पहले सुधार कर पहला कदम बढ़ाये l होल ऑफ फेम चुने जाने पर बधाई l

के द्वारा: rita singh 'sarjana'

बहुत अच्छी रचना है चातक जी, तारीफ़ करनी ही पड़ेगी । मेरे यहां आने से पहले की है, इसलिये पहली बार देख रहा हूं । मुझे नहीं लगता कि इसके बाद की रचनाएं आपने इतने मन से लिखी हैं । मेरे विचार इस मामले में आप से बस इतने ही भिन्न हैं, कि यदि सामाजिक समरसता न बिगड़े, तो आज के संदर्भों और परिवेश में कम से कम अंतर्जातीय विवाह को मान्यता दे देनी चाहिये । लेकिन यह सब कुछ स्थान, काल और पात्र पर निर्भर करेगा । हमारा समाज भी हमारे देश की ही तरह विभिन्नताओं में एकता का है । फ़िल्मी दुनिया भी इसी भारत का समाज है, जहां अंतर्जातीय या अंतर-संप्रदाय की कोई फ़ीलिंग ही नहीं है, और लोग खुशी-खुशी सहयोग और उल्लासपूर्वक ऐसी शादियां शुरू से ही करते कराते आए हैं । आज तो जोड़े लिव इन रिलेशनशिप की आंधी में भी बह चले हैं, ऐसे समाजों में । हम किसको-किसको लाठी लेकर दौड़ाते फ़िरेंगे? एक को दौड़ाएंगे, तो दूसरा उस कोने में मुंह चिढ़ाता खड़ा मिलेगा । मैंने उदाहरण सिर्फ़ फ़िल्मी दुनिया का दिया, क्योंकि सभी उनकी जानकारियां रखते हैं । बड़े औद्योगिक घराने अथवा अभिजात्य वर्ग में भी यही कल्चर है । उधर बिल्कुल निम्न तबका, जो फ़ुटपाथों और झुग्गियों में है, उसके वहां भी कमोबेश वही कल्चर है, जो फ़िल्मी दुनिया और अभिजात्य संस्कृति वालों के यहां है । मुस्लिम सम्प्रदाय का अपना इस्लामिक मान्यताओं वाला आधार है । ईसाइयों की अपनी परम्पराएं हैं । भारत की कई आदिम जातियों में, कबीलों में भी यही मिक्स कल्चर है । तो आप अपनी बात उसी तक न पहुंचाना चाहते हैं, जो भारत का निम्न-मध्य और उच्च-मध्यवर्गीय हिन्दू समाज है ? यह तो पूरे भारत की बात हुई नहीं । चूंकि यही एकमात्र ऐसा तबका है, जो अपनी परम्पराओं को ढोए जा रहा है, यहां तक कि दहेज को भी । नारी उत्पीड़न वैसे तो हर समाज में है, परन्तु बहुओं को ज़िन्दा जलाने की घटनाएं अधिकांश इसी मध्यवर्गीय हिन्दू समाज में ही घटित होती हैं । यही तबका आज भी धर्मभीरु, परम्परावादी, रूढ़िवादी बना हुआ अपनी परम्पराओं का झंडा ढोए जा रहा है । कहानी इतनी लम्बी हो जाएगी कि बेढंगी लगने लगेगी, इसलिये यह कह कर समाप्त करता हूं कि, स्थान-काल-पात्र के आधार पर यदि समाज को कोई क्षति न पहुंचती हो, माहौल पर नकारात्मक असर जैसी स्थिति न आती हो, तो ऐसे केसेज में जोड़ों का भविष्य और विद्रोह के बाद अप्रिय स्थितियों को रोकने के लिये समाज को आंखें मूंद लेना चाहिये । हां, यह सबकुछ परिस्थितियों को देख समझ कर ही, संतुलन के साथ ही सम्पन्न होना चाहिये, यह भी ध्यान में रखना होगा । साधुवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

प्रिय अग्रज, गंदगी और कूड़ा-करकट यदि सार्वभौम है तो झाडू भी तो सार्वभौम है बस जरूरत इस बात की है कि इंसान के मस्तिष्क में एक बात ये बात घुस जाए कि गंदगी से उसका व्यक्तिगत अहित है| आस पास आपने देखा होगा हर व्यक्ति अपने पडोसी के दरवाजे पर अपने घर का करकट डाल जाता है| हमें नए मानसिकता को जन्म देना होगा कि कूड़ा कूड़ेदान में डालने पर न सिर्फ सफाई बनी रहेगी बल्कि थोडा दूर तक वजन ले के चलने से अच्छा व्यायाम भी मिल जायेगा| आम के आम गुठली के दाम| बस सोच का अंतर है| ई झाड को का कहें दादा अरहर ओ उखड़ी के खेतों भी ऐसन जानवर कब्बो नाहीं देखा| धन्ये हवे ई शहरवा के झाड फनूस! अब आगे अउर का कहें जुगुल मवेशियां के ! सादर वन्देमातरम!

के द्वारा: chaatak

प्रिय मिश्र जी, सादर वन्देमातरम ! मन के पाप की बात पढ़कर मुझे कुछ पंक्तियाँ याद आ गईं| अब रहा नहीं जाता लिख ही देता हूँ- " S’io credesse che mia risposta fosse A persona che mai tornasse al mondo, Questa fiamma staria senza piu scosse. Ma perciocche giammai di questo fondo Non torno vivo alcun, s’i’odo il vero, Senza tema d’infamia ti rispondo." उपरोक्त पंक्तिया क़यामत के दिन शायद हम सभी को दोहरानी होंगी और अपने दोष स्वीकार करने होगे| समाज में यदि हम वास्तविक परिवर्तन लाना चाहते हैं और हमें लगता है कि समाज में कहीं बुराई पनप रही है तो हमें समाज को एक पवित्र मंदिर की तरह मानकर इसमें आ गई गंदगी हटाने के लिए झाडू जरूर उठानी चाहिए, और इसकी खातिर गंदगी में उतरकर ही गंदगी साफ़ करनी होगी बजाय इसके कि समाज रुपी मंदिर को ही आरोपों से शुशोभित कर दिया जाए|

के द्वारा: chaatak

चातक जी मेरा भी यही मानना है की समाज को दोष देने से पहले एक नज़र हमे खुद पर डालनी चहिये ... हम सब को मिलकर ही एक समाज बना है ... ये कोई एक व्यक्ति या अकेली संस्था नहीं ...... जो की इसे हर बात पर दोष देकर अपनी जिमेवारी से मुक्त हो लिया जाये ? कोई गलत रिवाज बनता है तो हमारे आस-पास से ही फिर बढते बढते बात बढ़ जाती है ...... कोई एक किसी गलत fashion ये गलत आदत का अनुसरण करता है तो वह सब के लिए भी न्यू fashion बन जाती है ...... जब पहली बार कुछ गलत होता है तो उसी वक़्त अगर रोक दिया जाये तो ये समाज यानि की हम लोगों का समाज एक आदर्श समाज बन जायेगा ...... फिर किसी को ये नहीं कहना पड़ेगा की ये समाज जीने नहीं देता ......हर व्यक्ति अगर सुधर जाये तो समाज भी सुधर जायेगा ........ i believe in Charity begins at home बेहतरीन लेख पर बधाई

के द्वारा: roshni

प्रिय पीयूष जी, मुझे ऐसा कुछ याद नहीं आता कि आपको किसी बात के लिए शर्मिदगी होनी चाहिए| आपका साथ हमेशा सुखदाई रहा और आपको मैं अपने अच्छे दोस्तों में से एक मानता हूँ (आप नहीं मानते क्या?) सार्थक परिणाम की ही खोज कर रहा हूँ और आशा है कि आप बंधुओं का सहयोग मेरी सहायता करेगा क्योंकि समाज की बात कर तो मैं रहा हूँ लेकिन मैं अकेला समाज नहीं हूँ हम सभी मिलकर या तो समाज बनाते हैं या फिर हमें एक समाज बनाने की पहल करनी होगी जहाँ घर से निकलने वाला हर इंसान, हर स्त्री, हर पुरुष अपने को समाज का हिस्सा समझे और उस पर विश्वास करे| और हर अपराधी और असामाजिक तत्व भय का अहसास करे और किसी भी व्यक्ति को नुक्सान पहुंचाने की हिम्मत न कर सके| और हाँ हमारे बीच 'क्षमा' और 'ग्लानी' जैसे शब्दों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए| :) प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

Hello Abhishek, I am very glad to know your opinion about lots of things related to society. Actually your questions represent almost every mind. I try to assure you of them one by one- 1. If there is some mis-happening with an individual, society at once takes action. Generally it does not let anybody suffer at its best. But in big cities people do not form society. They don\'t know even the names of their immediate neighbours. In such a condition the crowd acts as the bunch of individuals not as society. If the same thing happens in a small town you will see the society doing its job tooth and nail. 2. The same happens in the matters of gundas. There is no small town where gundas can get gunda-tax, because society is strong there and it plays its role in the fullest. Again in the modern cities you may see gunda-tax being paid in almost every street. They beat some gentleman and no body lifts even a little finger. 3. We are not habitual but at the same time we are selfish and do not want the society interfere in our good and bad deeds so like tortoise we conceal ourselves in the cover of a false liberal thought. A real society man means you follow good norms and oppose bad ones serving the society. 4. Again law and order is always observed and kept by the society not by the crowds. Dear friend, here you have made a mistake in recognizing society and crowd. Crimes and fray are the acts of individuals and crowd not of society. You have mistaken one for the other. 5. Actually what the teachers say is of the society but what we see in the real world is the wrong practices of different wicked groups like- the groups of dishonest businessmen, the groups or corrupt leaders and journalists and officials. Society is the common name of those who try to survive among all these and try to make their children grow moral, patriot, helping to continue their heritage, their culture and their names. Hope your being with me further more. Thanks for the comments and questions.

के द्वारा: chaatak

स्नेही S.P.Singh जी, आपके विचार जानकर अतीव प्रसन्नता हुई| आपकी पोस्ट \'खामोश, भ्रष्टाचार चालू है!\' मुझे भी काफी अच्छी लगी| ऐसा नहीं कि आपके लेखन का प्रभाव नहीं होता| कुछ हठधर्मियों को छोडकर ज्यादातर लोग अच्छी बातों पर सहमत होते हैं भले ही वे इस बात को मंच पर व्यक्त न करें या विरोध भी करें तो भी| कुछ दिन पहले मैंने \'हिंदी-चीनी भाई-भाई\' लिखा था और उसका प्रभाव इतना अच्छा रहा कि मेरे आस-पास ऐसे लोगों की तादात बढ़नी शुरू हो गई है जो लोगों को \'चाइनीज़ वस्तुओं से परहेज़ क्यों किया जाय?\' समझा रहे हैं और कितनो ने तो अपने मोबाइल और बदल दिए और कई लोग तो और आगे बढ़ कर चाइनीज़ सी.ऍफ़.एल. और दूसरी चीजों पर पहले \'मेड इन चाइना\' तो नहीं लिखा है चेक करने लगे| परिवर्तन जरूर आएगा बस प्रयास मत छोडिये| आपने अपने मित्र का जिक्र किया वह भी एक अच्छा उदाहरण है समाज के अच्छे होने का और साथ ही साथ लोगों के समाज से गलत वैमनस्य का| एक सत्य ये भी है कि बात जिस घर की हो सिर्फ उसे छोड़कर अन्य सभी को हकीकत का पता होता है| प्रतिक्रिया का तहे-दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

प्रिय भाई चातक, एक अच्छी सार्थक श्रंखला आरम्भ करने के लिए बधाई, जिस प्रकार से देश की सारी की सारी जनता किसी भी घटना, दुर्घटना, या महंगाई, या कोई घोटाला होने पर सीधे -सीधे सरकार को जिम्मेदार ठहराती उसी प्रकार से आसपास कोई भी घटना होने पर लोग समाज को दोष देते हैं जबकि वह भी स्वयं ही उसी समाज का एक अभिन्न अंग होते है पर अपने को उस समाज से अलग समझने की सनक के कारण स्वयं को अलग देखते हैं \ जैसे की हमने अपने मित्र से कहा की आजकल के बच्चे गुटखा बहुत खाते है ( यह हमने इस लिए कहा की उनके बच्चे को गुटखा खाते हुए हमने देखा था ) इस पर उनकी प्रतिक्रिया इतनी तीखी थी की हम दंग रह गए उनका कहना ऐसा था की दुनिया भर के बच्चो में ही सारे एब हैं केवल उनका बच्चा ही बिलकुल पाक-साफ़ है वह दुनिया दारी कुछ नहीं जनता बहुत माशूम है---इसी प्रकार से जैसा की मैंने अपनी पोस्ट "खामोश, भ्रष्टाचार चालू है " में कुछ तथ्य दर्शाने की कोशिश की है ? मेरे विचार से न तो समाज बदला है और उससे जुड़े प्राणी केवल मान्यताए बदल गई है | कुछ खुला पन अधिक दीखता है जो मजबूरी वश अपनाया जा रहा है ----आपने उन समाज सुधारकों का एक डाटाबेस बनाया जो समाज सुधार के नाम पर समाज को असामाजिक गतिविधियों की भेंट चढ़ा रहे हैं---आपका यह कथन एक दम सही है ---- आप देखिये की ऐसे स्वयंभू समाजसुधारकों पर जब कोई शिकंजा कशा जाता है तो वह अपने अनुयायीओं को कैसे मारने मरने के लिए भड़काते हैं | अभी पिछले दिनों एक योग गुरु जी ने तो यहाँ तक कहा की अगर मुझे कुछ होता है तो सरकार की जिम्मेदारी होगी अब उल्टा सीधा तो आप करो जिम्मेदारी सरकार की ऐसा कैसे चलेगा ? धन्यवाद

के द्वारा: s.p.singh

प्रिय राजकमल जी, अभिवादन ! पडोसने अपना पड़ोसन वाला धर्म निभाने के लिए बिना कहे तत्पर रहती हैं लेकिन समस्या इस बात की है कि कोई स्वयं इस बात के लिए तैयार नहीं कि वह अपने घर, अपने परिवार या अपने बच्चों की आलोचना को सुनने-समझने की कोशिश करे| मिसेज़ ए ने मिसेज़ मिसेज़ बी से उनके लड़के की शिकायत की कि वह आवारा लड़कों की संगत में रहता है तो मिसेज़ बी ने जवाब दिया देखिये मैंने तो कभी आपके घर की बात नहीं उड़ाई कि आपकी लड़की मिसेज़ सी के लड़के के साथ चिड़ियाघर घूम रही थी| बात दो घरों की बदनाम समाज हुआ दोनों ने 'ज़माना बहुत ख़राब है' लोग अपने गिरेहबान में नहीं झांकते दूसरों को बदनाम करने चल पड़ते हैं| जिस बात से दोनों का हित (बच्चों समेत) हो सकता था वो समाज को कोसने का और आपसी संबंधों के बिगड़ने का कारण बन गई| मुन्नी बदनाम भी हुई और मुन्ना बदमाश भी बन गया| अगला भाग भी जल्द प्रस्तुत करूंगा| बस साथ बनाए रखें| अच्छी प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

प्रिय राशिद जी, आप सच कहते हैं समाज हमसे ही बनता है लेकिन समाज में रहते हुए हम कभी भी भ्रष्ट नहीं होते| दुनिया का सबसे भ्रष्ट आदमी भी समाज के बीच सभ्य होता है| सबसे भ्रष्ट लोगों में आप अफसरों और नेताओं को ले सकते हैं लेकिन क्या इनकी हिम्मत है कि ये किसी गलत कार्य को समाज के बीच अंजाम दे सकें? अफसर रिश्वत लेता है| समाज में नहीं अकेले में| नेता जनविरोधी कार्यक्रम बनाते हैं| समाज में नहीं| अपने वर्ग की भीड़ में| यानी समाज हमेशा सही और न्यायी है लेकिन जब समाज की ईकाई की बात हो तो फिर कार्य एक व्यक्ति का और बदनाम समाज होता है| हमें शायद इसी बात को समझने की जरूरत है| अगले लेख में बात को थोडा और स्पष्ट करने की कोशिश करूंगा| बस साथ बनाए रखें इस बार एक निष्कर्ष तक पहुँचने का पूरा मन बना चुका हूँ| प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

प्रिय मनोज जी, वन्देमातरम ! हमें बचपन से ही सिखाया जाता है कि नैतिकता सर्वोत्तम धर्म है, अपने पडोसी से अच्छा व्यवहार करो, राष्ट्र सर्वोपरि है, दूसरों की स्वतंत्रता में अनधिकृत दखल मत दो इत्यादि लेकिन जैसे ही हम कक्षा से बाहर निकलते हैं हम देखते हैं कि सब कुछ उल्टा हो रहा है और मजे कि बात ये कि माता-पिता जो कि हमारे आदर्श होते हैं वे ही यदि उपरोक्त नियमो का पालन कर रहे हैं तो असफल हैं और नहीं कर रहे तो सफल हैं| ऐसे में हमें व्यवहारिक ज्ञानी, पुस्तकीय ज्ञान से बेहतर प्रतीत हूट है और हम भी गलत राह चल पड़ते हैं| यहाँ पर प्रबुद्ध वर्ग भी कोढ़ में खाज की तरह 'ये तो सिर्फ किताबी बातें हैं' कहकर सही और अच्छी बातों का यहाँ तक कि सर्वसिद्ध तथ्यों तक का मजाक उड़ाते नज़र आते हैं| ऐसे में आशा कहीं दिखती है तो सिर्फ बच्चों में, इसीलिए मेरा प्रयास रहता है कि बच्चों का विश्वास अच्छाई और सत्य से उठने न पाए वर्ना आने वाले समय के सपने जब इतने भयानक हैं तो फिर उनकी हकीकत क्या होगी! प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया! जय भारत-जय भारती!

के द्वारा: chaatak

चातक जी नमस्कार, उन बच्चो को हमारी और से भी बधाई दीजियेगा साथ ही कहियेगा कोशिश करने वालो की कभी हार नहीं होती | आप के इस लेख से अपने बचपन के कारनामे याद आ गए | हमारे यहाँ पीपल का एक बहुत पुराना पेड़ है हमारे खेलने, माँ की पूजा करने, दोस्तों के साथ गप्पे मरने का पुराना साथी जहाँ हमने काफी वक़्त गुजरा बचपन में एक दिन पता चला किसी को उस पेड़ से परेशानी हो रही है उस पेड़ के पत्ते उस की छत आँगन को गन्दा कर रहे थे तो उसने उस को कटवाने के लिए कुछ लोगो को बोला लिया था | हम को पता था हरे पेड़ो को कटवाना गैरकानूनी है एस.टी.डी जा कर थाने फ़ोन कर दिया शायद माँ की पूजा का ही असर था पोलिस १० मिनट के अन्दर आ गयी और वो पेड़ कटे जाने से बच गया मगर अंत तक इस बात का पता किसी को नहीं चला वो फ़ोन किसने किया क्यूँ की हमने गुमनाम फ़ोन किया था | मुझे ख़ुशी इस बात की थी की कम से कम वो पेड़ काटने से तो बचा | १० के और १२ के बोर्ड के पेपर के टाइम किसी ने जागरण रखवाया था मगर मैंने कोशिश नहीं की पोलिस को शिकायत करने की पता था धर्म के आगे मेरी कुछ चलेगी नहीं और थोडा डर भगवान का भी था कहीं कम नम्बर आ जाते तो खैर ये तो मजाक था मगर ये सच है की धर्म के नाम पे सच में गैरकानूनी काम हो जाता है और हम कुछ कर नहीं पाते

के द्वारा: div81

प्रिय अबोध जी, जागरण मंच से मेरी गैरमौजूदगी के कई कारण थे जिनमें स्वास्थ्य और मानसिक अंतर्द्वंद दो प्रमुख कारण माने जा सकते हैं| बच्चों की समस्या ने फिर से मंच पर उपस्थिति दर्ज करवा दी| मेरा सदैव यही प्रयास रहता है की जब भी मंच पर कोई बात आये तो सार्थक बात ही की जाए| इस दौरान आपलोगों की पोस्ट न पढ़ पाने के कारण मैं स्वयं भी विचलित था, खैर अब शुरुआत हो गई है तो प्रयास रहेगा कि मैंने जो भी इन दिनों नहीं पढ़ा उसे पढ़कर जल्द से जल्द अपनी राय दूं| आपसे नाराजगी का तो कोई कारण ही नहीं हो सकता| इस मंच पर जितने भी ब्लोगर हैं मेरा उनसे न तो कोई द्वेष है और न ही मुझे उनके द्वारा कही किसी भी बात से चोट पंहुचती है बल्कि जितना स्नेह आप लोगों से मिलता है मैं तो उसका लेश मात्र भी व्यक्त नहीं कर पाता| आपकी पोस्ट इस दौरान मैं नहीं पढ़ पाया इसका मुझे स्वयं मलाल है| बच्चों को वैचारिक समर्थन और उनका उत्साहवर्धन करने का तहे दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

प्रिय चातक जी ...नमस्कार ! यह कथा - कहानी करने वाले महात्मा लोग आखिर किस का भला करते है इस प्रकार .... क्योंकि उनके आने से काफ़ी दिन पहले ही प्रचार शुरू हो जाता है .... तो जो भी भक्त जन आते है कथा श्रवण करने वोह प्रचार से या पहले से ही बनी हुई छवि के कारण जब आ ही जाते है ती फिर एन कथा के वक्त उनको प्रचार की क्या आवश्यकता ..... और वैसे भी उन्होंने लाखो रूपये अपनी इस निस्वार्थ सेवा के तो वसूल कर ही लिए होते है एडवांस मैं.... तो अगर लाउड स्पीकर के अभाव में आप और मेरे जैसे दो चार पापी नहीं भी गए तो उनको क्या फर्क पड़ने वाला है .... क्योंकि जो असली संत है वोह तो भगवान श्री कृष्ण की तरह सिर्फ एक ही श्रोता ( अर्जुन ) को अपना सन्देश दे कर आत्म संतुष्टि का अनुभव कर लेता है .... धन्यवाद

के द्वारा: rajkamal

प्रिय श्री अरविन्द जी, लगता है वायरस जी आपके पास से निकले और सीधे मेरे ऊपर हमला कर दिया| भला हो देशी नुस्खों का कि जल्द स्वस्थ हो गए कहीं चीन से आयातित रंगीन गोलियों के चक्कर में पड़ता तो न जाने कितने स्वास्थ्यवर्धक यंत्रों और तंत्रों की आवश्यकता पड़ जाती| भारतीयों के चीनी(कम) प्रेम के बारे में आपकी राय जानकर अत्यंत हर्ष हुआ| जोशी जी की कविता दायरा पर उत्तर जल्द दूंगा| चातक का काम स्वाति के इंतजार के साथ ही साथ कुछ और उपयोगी कार्यों को भी अंजाम देना है प्यास अपनी जगह है और कर्त्तव्य अपनी जगह| जब बात राष्ट्र की सफाई की हो तो सफाईकर्मी से बढ़कर और कौन सा उत्तरदायित्व श्रेयस्कर हो सकता है| आप बंधुओ के सहयोग और समर्थन का परिणाम है की घुमंतू जीव भी काफी सहज होकर मंच पर अपना योगदान बनाए हुए है और वे भी अब किसी प्रकार की गंदगी फ़ैलाने की फिराक में नहीं दीखते| आपकी प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

नंदा दीप जलाना होगा| अंध तमस फिर से मंडराया, मेधा पर संकट है छाया| फटी जेब और हाँथ है खाली, बोलो कैसे मने दिवाली ? कोई देव नहीं आएगा, अब खुद ही तुल जाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा|| केहरी के गह्वर में गर्जन, अरि-ललकार सुनी कितने जन? भेंड, भेड़िया बनकर आया, जिसका खाया,उसका गाया| मात्स्य-न्याय फिर से प्रचलन में, यह दुश्चक्र मिटाना होगा| नंदा-दीप जलाना होगा| नयनों से भी नहीं दीखता, जो हँसता था आज चीखता| घरियालों के नेत्र ताकते, कई शतक हम रहे झांकते| रक्त हुआ ठंडा या बंजर भूमि, नहीं, गरमाना होगा| नंदा दीप जलाना होगा ||..................................मनोज कुमार सिंह ''मयंक'' प्रिय मित्र चातक जी, आपको और आपके सारे परिवार को ज्योति पर्व दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं || वन्देमातरम

के द्वारा: atharvavedamanoj

प्रिय श्री चातक जी, मैं तो सोचता था कि चातक का काम सिर्फ चांद को ताकना भर है । लेकिन चातक मंच पर फैलाई गई गंदगी की सफाई के लिए सुलभ की तरह उपयुक्‍त व्‍यवस्‍था भी कर सकते हैं यह आज जान लिया । लेकिन आश्‍चर्य तो इस बात का है कि 25 अक्‍टूबर से अब तक किसी ने भी उदार-विकार से पीड़ित या घुमंतू विष्ठा उत्सर्जक जीव द्वारा फैलाई गई गंदगी को कमेंट्स में नहीं डाल है और अपने-अपने ब्लॉग से उसे डिलीट किया है अथवा नहीं पता नहीं | क्‍योंकि मैं व मेरा परिवार तो लगभग 20-22 दिन से वायरल महाराज की कृपा से डाक्‍टरों की सेवा का लाभ उठा रहा था । इसी कारण दीपक जोशी जी की कविता दायरा पर आपकी टिप्‍पणी की प्रतीक्षा ही करता रह गया । खैर बात आपनें बहुत सही लिखी हैं । मेरी अनुपस्थित में आई आपकी सभी ब्‍लॉग पोस्‍ट बिटिया के प्रश्‍न, मंथन, हिन्‍दी चीनी भाई-भाई सभी एक से बढ़ कर एक हैं । आप तो जानते ही हैं कि भारतीयों को चीनी से कुछ अधिक ही प्रेम है और इस मिठास के चक्‍कर में वे कुछ ज्‍यादा ही इसके दीवानें हो गए हैं । लेकिन जब इसके बुरे प्रभावों को पता चलेगा तो स्‍वयं ही इसकी कटौती प्रारंभ कर देंगें । बस इसका जल्‍दी ज्ञान हो यही भगवान से दुआ है व देश हित में भी है । अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: bhaijikahin by ARVIND PAREEK

आदरणीय दीपक जी, ब्लॉग-मंच एक विचार-मंच है जिसपर आपको अभिव्यक्ति की आज़ादी है लेकिन कुछ लोग इस आज़ादी का दुरुपयोग कर रहे है और उसका कारण हैं हमारे स्थापित (भाई जी के शब्दों में) 'लिक्खाड़' (जैसे अरूंधती राय)| इन पर नज़र रखने का काम स्वयं जागरण मंच को करना चाहिए और शायद वो कर भी रहे हैं लेकिन अशोभनीय टिप्पड़ी और गाली-गलौज का तो इतना बुरा प्रभाव है कि संवेदनशील इंसान का तो रक्त-चाप बढ़ जावे| बस इसी अभद्रता के दृष्टिगत मैंने पहल की है लेकिन आप बंधुओं की राय ने दिखा दिया कि मेरी सोच कहीं न कही आप लोगों की सोच से बिलकुल मिलती है| कल से सफाई का काम शुरू हो जायेगा और विश्वास कीजिये मेरे कार्य के तरीके से कहीं वैमनस्य या फूहड़ता नज़र नहीं आएगी| वैचारिक समर्थन का बहुत बहुत शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

आदरणीय शाही जी मै क्षमा प्रार्थी हूँ ,,आशा है आप क्षमा कर देंगे,,साथ ही एक निवेदन भी है (कुत्ता शब्द /प्रसंग यत्र तत्र विष्ठा उत्सर्जन करने वाले के लिए था ,, को आप ने भी पढ़ा होगा Amazing ! Kashmeer is not your matter……..It is matter of those who stay in kashmeer.I read here your comments and alike you buddies,But It appears to be double standard in your mind,what have been done by Indira gandhi is right? then you have to accept Mahmood Ghaznavi as a Great Reformer because he united India at time the various kings here fighting for their own throne….अब आप ही बताएं आप खुद को असंयमित होने से रोक पाएंगे ,,कुछ ऐसे विषय होते हैं जो आपको अत्यधिक आक्रोशित कर देते हैं (माँ/मातृभूमि /धर्म भी ऐसा विषय है ) कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन्हें आप प्रारम्भ तो कर देते हैं लेकिन समाप्त नही कर सकते,, प्रत्युत्तर में आप यह भी कह सकते हैं कि हम उसके सकारात्मक पहलू को ही देखें लेकिन जब नकारात्मक पहलू ही अधिक हों तब हम क्या करें ,,यथा देश आतंकवाद का दंश झेल रहा है ,,(क्या आतंकवादी किसी के पिता, पुत्र, भाई, बहन ,पति नही हैं ) यह उनका सकारात्मक पहलू है लेकिन अगर हम उनके इन्ही गुणों के कारण उनकी तुलना अपने सीमा प्रहरियों से करने लगें तो उन सैनिकों के दिल पर क्या गुजरेगी जो जान की परवाह किये बिना सीमा पर डटा रहता है | आशा है ह्रदय से क्षमा कर देंगे ***आपका

के द्वारा: ashvinikumar

स्नेही दूबे जी, मैंने आपकी टिप्पड़ी पढ़ी है और यदि आपने टिप्पड़ी में जिन प्रमाणों का उल्लेख किया है वे वास्तव में सत्य हैं तो आपकी टिप्पड़ी को अनर्गल कहने का कोई औचित्य नहीं है लेकिन आपकी टिप्पड़ी यदि बिना प्रमाणों के सिर्फ वर्ग विशेष की भावनाओं को आहत करने के लिए लिखी गई हैं तो निःसंदेह आपकी टिप्पड़ी भी विष्ठा उत्सर्जन के दायरे में ही आएगी| मेरा अभिप्राय सत्य को दबाना नहीं है वह चाहे जितना भी कड़वा क्यों न हो, मेरी मंशा सिर्फ अनर्गल और असभ्य आचरण को रोकना है और ये आप सभी के सहयोग से संभव हो सकता है| आपकी साफगोई किसी को भी आपका मुरीद बना सकती है| गंदे लेखों पर जागरण स्वयं नज़र रख रहा है और उसने स्वयं कहा है कि अपने लेखों से यहाँ सिर्फ प्रेम फैलाएं हमें जागरण से इस सम्बन्ध में एक अच्छी पहल की आशा करनी चाहिए| आपके सहयोग और स्पष्टवादिता का तहे-दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

रौशनी जी, ब्लोगर्स के सम्बन्ध आपस में काफी सौहाद्रपूर्ण और अच्छे हैं वाद-विवाद और तर्क से मंच पर एक अच्छा वातावरण भी बन सकता है| आपकी इस राय से मैं भी सहमत हूँ की धर्म और सम्प्रदाय को किसी भी प्रकार का निमित्त न बनाया जाय जबकि हम कई उदाहरण ऐसे देख चुके हैं की धर्म के नाम पर कभी भी स्वस्थ चर्चा नहीं हो सकती| क्यों न सभी ब्लॉगर मिल कर एक निर्णय लें की \'धर्म की अच्छी या बुरी किसी भी तरह का लेख आने पर हम उस पर कोई भी प्रतिक्रिया या वोट नहीं करेंगे\'| यदि सभी लोग एक मत से सहमत हों तो पहल करने के लिए मैं सबसे पहले तैयार हूँ क्योंकि मैंने कई बार प्रयास करके देखा है की धर्म पर स्वस्थ बहस संभव ही नहीं| धर्म इतना गूढ़ विषय है कि आप एक बात कहोगे तो सौ जिज्ञासा और जागेगी| फिर आप उसमे एक सूत्र अपनी और से और जोड़ दोगे तो उस धर्म के अनुयायियों में रोष जागेगा और शुरू हो जायेगा विष-वमन और विष्ठा उत्सर्जन| प्रतिक्रिया द्वारा एक और बेहतर उपाय की ओर ले जाने का तहे दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

स्नेही सिंह साहब, आपकी बात बिलकुल सही है सोते को जगाया जाता है लेकिन जागते को कोई नहीं जगा सकता| इस केंद्र की क्रिया प्रणाली बहुत ही आसान है यदि कोई भी टिप्पड़ी करते समय असभ्य शब्दों का प्रयोग कर रहा हो या आपको लगे कि टिप्पड़ी में ऊँट-पटाँग भाषा लिखी जा रही है तो आप उस टिप्पड़ी को नाम और तारीख सहित कॉपी करके इस ब्लॉग की टिप्पड़ी में डाल दें जिस प्रकार आप कमेन्ट करते हैं और जैसे ही वह टिप्पड़ी से निकल कर ब्लॉग में अपनी अधोगति पाए आप उस टिप्पड़ी के मूल को अपने ब्लॉग से डिलीट कर दें| यहाँ श्री के.एम्. मिश्र जी ने एक ऐसे ही घुमंतू जीव की टिप्पड़ी भेजी है इसके दफ़न होते ही आप को पूरे प्रोसीज़र का पता चल जायेगा| मंच की सफाई में दिलचस्पी लेने का बहुत बहुत धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

प्रिय अबोध जी, आपकी बात बिलकुल सही है| वैचारिक मंच पर हम अपने आप पर तो लगाम लगा सकते हैं लेकिन घुमंतू जीव जिनका कोई अता पता ही नहीं है वे आकर अक्सर गंदगी फैलाते हैं| यदि आप या मैं किसी ब्लोगर बन्धु को गाली दूं तो देखो आप को या मुझे किस तरह से अन्य सभी मिलकर सबक सिखाते हैं ऐसा मंच पर कई बार पहले भी हो चुका है लेकिन जब ब्लागर्स नहीं बल्कि कोई ऐसा व्यक्ति जिसकी मंच पर ब्लोगर के रूप में उपस्थिति नहीं वह टिप्पड़ी करता है तो उसके ऊपर मंच की प्रतिष्ठा बनाये रखने का कोई दबाव नहीं होता| गंदगी यहाँ से पैदा होती है और मेरा प्रयास इस प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने का है| इस मामले में आम सहमति से ही हम एक अच्छा वातावरण बना सकेंगे जिसमे स्वस्थ वार्ता हो सके| आपकी प्रतिक्रिया का तहेदिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

प्रिय चातक जी, बात गन्दी टिप्पणियो की है तो माननीय वाजपेयी जी के आलेख पर की गयी मेरी टिप्पणी भी इसी दायरे में आती आती है, ऐसी टिप्पणी लिखने वाला भी उतना ही सर्मिन्दा होता है जितना की पढ़ने वाला सवाल ये है की जिसके जीवन की ये घटनाए हुई है वो शर्मिंदा है की नहीं ,गन्दी टिप्पणी तभी आती है जब की लेख उत्तेजक हो ,लेख की सामग्री इसमें उत्प्रेरक का कार्य करती है , अभी हाल में संपन्न हुए एक समारोह में जो की वर्धा में संपन्न हुई ब्लोगरो के लिए आचारसंहिता की मांग जोर शोर से उठी है फ़िलहाल कोई सार्थक परिणाम सामने नहीं आया हमारे कुछ ब्लोग्गर इस तरीके के लेख लिखते है की सयंम रखना ही बेमानी लगता है न भा ता के नागर साहब का हालिया ब्लॉग इसी श्रेणी का है. आपने विष्ठा उत्सर्जन केंद्र बनाया है तो इसके लिए कुछ नियम भी बनाये होगे कृपया स्पष्ट करे क्या सच जो की कडुआ हो आपके इस केंद्र की शोभा बढ़ाएगा या सच अपराजेय रहेगा ,गंदे लेख भी इसी श्रेणी में आयेंगे या उसके लिए आप कोई अलग केंद्र बनाने की सोच रहे है??

के द्वारा: y.dubey

भाई चातक जी व् अन्य सभी भाई व् बहन बात सही है | अपना विचार रखने का अधिकार तो सबका है , मगर मर्यादा के अन्दर| लेकिन समस्या ये है की अब कौन सी मर्यादा बाकी रह गयी है जिसका की उन्लंघन नहीं हुआ है| पूरे देश मे पिछले ६३ वर्ष मे मर्यादाओ को नष्ट करने का षड़यंत्र चल रहा है , और हम सिर्फ मूक दर्शक की तरह देख रहे है क्योकि सबको समझ आ गया है | कुछ भी करो , ये आजाद देश है | वाह क्या आज़ादी है हमारी | न अपनी भाषा , न अपनी भूषा , न अपनी शिक्षा ,न अपनी कानून व्यवस्था न अपनी संस्कृति न अपने संस्कार , न अपने नेता , न ही अपनी सरकार तो भाया बात सिर्फ इतनी सी है की हम गोरे अंग्रेजों से तो आजाद हो गए , पर देश अभी भी काले अंग्रेजों का गुलाम है | ---------------------------------------------------------- आपका अरुण अग्रवाल

के द्वारा: bharatswabhiman

देखिये चातक जी मैं भी सीधी बात पर ही आ जाता हूं । मेरे कुछ लेखों के माध्यम से मेरे विचार मंच पर प्रकाशित हुए हैं, जिनपर आपकी भी सकारात्मक टिप्पणियां रिकार्ड में दर्ज़ हैं । उनमें मैंने अपने हिन्दू समुदाय की असहिष्णुता और आक्रामक भंगिमा पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए इन मानसिकताओं को राष्ट्रीय अखंडता के विरुद्ध बताया है । अब मेरे इस विचार पर आप लोगों द्वारा जहां कहीं भी किसी संदर्भ में आलोचनात्मक टिप्पणियां करते हुए जयचंदों के साथ जोड़ा जाता है, तो मुझे चुभना स्वाभाविक है । मैं इतना क्षमतावान नहीं हूं कि हिन्दू या मुसलमान कौम की झंडाबरदारी कर नेतागिरी करूं, लेकिन कोई मुसलमान हर हिन्दू को हत्यारा घोषित करे, या कोई हिन्दू हर मुसलमान को हत्यारा बताए, तो दोनों ही बातों पर मुझे समान रूप से आपत्ति होगी, और मैं ऐसी बातों का समर्थन तो कत्तई नहीं कर सकता । क्योंकि इस किस्म की बातें देश और समाज को तोड़ने का काम करती हैं, जोड़ने का नहीं । रही बात अरुंधती जैसी लेखिकाओं के विचारों की, तो राजकमल शर्मा जी ने जो इसी लेख की टिप्पणी में मुझे आड़े हाथों लिया है, उनकी मेरे से नाराजगी का कारण यही अरुंधती और खुशवंत सिंह हैं । चूंकि एक टिप्पणी में मैंने अरुंधती के साथ खुशवंत सिंह को भी लपेट दिया था, इसलिये शर्मा जी का खुशवंत सिंह की शख्सियत के पक्ष, और मुझ शख्स के विपक्ष में एक ज़ोरदार ब्लाग ही मंच पर आ गया था । मैंने अत्यंत शालीन भाषा में अपनी स्थिति इनके ब्लाग में स्पष्ट करते हुए क्षमा मांगी, लेकिन आप देख सकते हैं कि स्काँचवादी श्री शर्मा जी की तल्खी आजतक समाप्त नहीं हो पाई है । अब थोड़ी श्रद्धेय एस डी वाजपेयी साहब के लेख की बात कर लें, जो वर्तमान विवाद का मूल है । वे एक निहायत सीधे-सादे, विद्वान और धर्मपरायण व्यक्तित्व के स्वामी हैं, और स्वभाव से ही सबका कल्याण चाहने वाले । एक लेख में मैंने उनकी विद्वता को भांपते हुए कुछ अधिक ही ज़ोरदार शब्दों में आगे बढ़ने की अपील कर डाली, और आज लग रहा है कि मेरे बहकावे में आकर उन्होंने अपने सम्मान के साथ कुछ अच्छा नहीं किया । इस अवस्था में अल्जीमर का रोगी होने का आरोप, और आज प्रकारांतर से मेरे साथ उनका भी कुत्ता बन जाना, इस दर्द को पता नहीं आप समझ पाएंगे अथवा नहीं, क्योंकि आपने अपने जवाब में उन सज्जन को कुछ और नस्लों की जानकारी दे डाली है । वाजपेयी साहब ने वर्तमान लेख भी श्री के एम मिश्रा जी के पुरज़ोर अनुरोध पर लिखने का साहस कर डाला, जिन्होंने खुद भी व्यापक जिरह की है । यद्यपि उनकी जिरह तार्किक कही जा सकती है । मैंने उस लेख में जो टिप्पणी की है, मैं मानता हूं कि कुछ अधिक ही चुभने वाली है । लेकिन करता क्या, मुझे लग रहा था कि एक सज्जन व्यक्ति को मेरे कारण ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा है । आप जिस तरह मनोज जी को घिरा देख अच्छा बुरा सोचे बगैर समर्थन में कूदे थे, कुछ वैसा ही रास्ता मुझे भी अपनाना पड़ा । अब किसका समर्थन अच्छाई के पक्ष में था और किसका बुराई के पक्ष में, इस पर आप और मेरे अलग-अलग विचार हो सकते हैं । धन्यवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

किसी को भी टिप्पणी करते वक़्त अपनी सीमा नहीं लगनी चहिये किसी बात का अगर विरोध है तो सलीके से पेश किया जाना ही बेहतर रहता है .... यु भी पता नहीं आजकल क्यों सब लड़ाई झ्गङा करने में लगे हुए है ... हर दुसरे ब्लॉग पर कोई जंग छिड जाती है हर कोई अपने आप को सही साबित करने में लगा है ...... धर्म की बात हुई नहीं की सब तीर तलवार लेकर हाजिर हो जाते है.......... मान सामान सब भूल जाते है ... जो खुद किसी के बारे में गलत और गलियों से भरी प्रतिक्रिया देते है तो उनके खुद के व्यक्तितिव पर ही प्रश्न चीन लगता है क्युकी एक संस्कारी इंसान कभी भी अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं करता चाहे सामने कितना भी बड़ा दुश्मन हो ... आशा है की आपके इस लेख से शायद लोग सुधर जाये धन्यवाद सहित

के द्वारा: roshni

आदरणीय शाही जी, आपका कहना सही है कि तर्क उसी व्यक्ति से मुखातिब हो कर किया जाय और उसी से जवाब माँगा जाय लेकिन जब व्यक्ति तर्क का जवाब न देकर अनर्गल प्रलाप शुरू कर दे तो क्या करेंगे आप? झूठ को स्वीकार कर लेंगे? लगता है किसी ने आपको भी मर्माहत किया है और यदि आपके ब्लॉग पर भी ऐसा हुआ है तो उसका सुझाव मैंने दे रखा है (सिर्फ सुझाव है) आप चाहें तो पहल कर सकते हैं जिसकी भी टिप्पड़ी ऐसी हो उसे इस आभासी अधोगति का रास्ता दिखाएँ| हाँ आपको मेरी किसी टिप्पड़ी से यहाँ तक कि तर्क से भी किसी बुजुर्ग के असम्मान की गंध भी आई हो तो आप उसका बेझिझक जिक्र करें| रह गई बात विभीषण और जयचंदों की बात तो क्या आप इस सत्य से इनकार कर सकते हैं- ताज़ा तरीन उदाहरण 'गिलानी और अरुंधती राय आपके सामने है'| और यदि कोई व्यक्ति जयचंद या विभीषण नहीं है तो उसे बुरा लगने की कोई बात ही नहीं है| बुरा उसे लग्न चाहिए जिसके अन्दर ये गुण मौजूद हों| बुजुर्ग हमें रास्ता दिखाने के लिए होते हैं सत्य का अनुसरण करके उस राह पर कष्ट उठाकर भी बेहतर उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए होते हैं और यदि बुजुर्ग ऐसा कर रहे हैं तो उन्हें बीमार मानसिकता का कहना स्वयं का ही मजाक बनाना होगा| और जहाँ तक मुझे याद है कहीं न कहीं आप भी गलत शब्दों का चुनाव कर जाते हैं ऐसे में हमारी पीड़ा और बढ़ जाती है, जब आप जैसे वरिष्ठ गलत शब्दों का चुनाव करने लगेंगे तब तो बंटाधार ही हो जायेगा| अच्छा लगता यदि अनर्गल प्रलाप को विराम लगाने की पहल मेरी जगह आपने या किसी बुजुर्ग ने की होती| जयचंदों को जवाब का एक-एक शब्द शूल है जो विरोधी नहीं देशद्रोहियों को चुभेगा विरोधी उस पर तर्क करें मैं प्रस्तुत हूँ जहां गलत होगा पूरी तन्मयता से स्वीकार करूंगा, इतना साहस है मुझमे| आप कमी निकालें मुझे हर्ष होगा| आप वरिष्ठों का ही आशीर्वाद है कि मैं इतना छोटा होकर भी आपके बीच हूँ लेकिन छोटों पर वरिष्ठ जब कटाक्ष करते हैं तो एक छंद याद आ जाता है- 'नान्हे-नान्हे हम लड़िकन पर राजा तानेव लाल कमान !' परमाल रासो के पृथ्वीराज और ऊदल-मलखान के संवाद की याद दिला दी आपने| देखिये वरिष्ठों का सानिध्य हम छोटों के मस्तिष्क में कितनी शाश्त्रीय बातें उत्त्पन्न कर देते हैं| साथ और आशीर्वाद बनाये रखियेगा| आपका साथ एक अच्छे वरिष्ठ के साथ होने का अहसास कराता है| सहयोग का शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

आपकी बातें काफ़ी हद तक सत्य हैं । बात एक-दूसरे के सम्मान की ही तो है । किसी के अपने कुछ विचार हैं, तो उसे सही गलत ठहराने के लिये तर्क़ का ही सहारा लेना उत्तम मार्ग है, सीधे उस व्यक्ति से मुखातिब होकर, न कि दूसरी तीसरी जगहों पर उसके विचारों पर रोषपूर्ण आलोचनाएं करके, प्रकारान्तर से उसे जयचन्द और विभीषण घोषित करके । कोई अपनी आलोचना में किसी का नाम नहीं लिखता, उसका संदेश ही तिलमिलाहट पैदा करने के लिये काफ़ी होता है । आपका यह उम्दा आलेख खुद प्रमाण है । हर किसी को हर जगह यह विचार तो करना ही चाहिये कि उसकी अभिव्यक्तियों से कहीं किसी का आत्मसम्मान तो आहत नहीं हो रहा? विचार मीमांसा के नाम पर सीधे-सीधे किसी को गाली दे देना, और कुछ लोगों का उनके समर्थन में खड़ा हो जाना यदि सभ्य सामाजिक स्थिति की श्रेणी में आता है, तो शायद इस विचार को भी मीमांसा की आवश्यकता है । कोई किसी को अपना समझता है, इसलिये उसके गलत विचारों के समर्थन में भी खुलकर खड़ा हो जाता है । दूसरों के भी तो कोई अपने हो सकते हैं? वह खड़ा हुआ तो क्या गलत हो गया? यहां खुद को विद्वान और सुलझे विचार वाला समझने वालों की कोई कमी नहीं है । यदि संस्कारवानों को पुरस्कृत किया जाय, तो अगली पंक्ति का दावा पेश करेंगे । लेकिन संस्कार ये है कि बुजुर्गों को खुलेआम बीमारी का नाम बताते हुए बीमार मानसिकता का घोषित कर रहे हैं, उन्हें कुत्तों की संज्ञा दे रहे हैं । क्या ये भारत देश की टोली है? साधुवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

के द्वारा: chaatak

आदरणीय शाही जी, किसी भी वस्तु, व्यक्ति एवं विचार या कहें कि संसार की सभी मूर्त और अमूर्त चीज़ों को देखने और समझने के सदैव एकाधिक दृष्टिकोण होते हैं कुछ बिलकुल सही तो कुछ बिलकुल गलत परन्तु कुछ में सिर्फ आंशिक सत्यता और आंशिक मिथ्या पाई जाती है| मेरा अपना मानना है कि एक प्रतिष्टित ब्लॉग मंच पर यदि बात वाद विवाद के योग्य हो तो उपरोक्त सभी प्रकार के विचारों को सम्मान देने पर ही शायद उचित निष्कर्ष निकल कर सामने आये लेकिन यदि किसी विचार के सामने आने पर उस पर कोई वितृष्णा और अपमानजनक शब्दों का वमन करने लगे तो वास्तविक उद्देश्य गुम हो जाता है फिर ब्लॉग मंच महज़ हंसी ठट्ठा करने का एक सैलून बार बन कर रह जाएगा और ये हममे से कोई भी नहीं चाहेगा| तोडा बहुत और काफी स्वस्थ मनोरंजन तो हम एक दूसरे के साथ टिप्पड़ियों में हमेशा करते रहते है| आपके विचार जानकर अच्छा लगा आशा है आपका मार्गदर्शन इसी तरह से मिलता रहेगा| वैचारिक समर्थन का दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

हमको गंदगी के बीच में ही रहने की शायद आदत हो गयी है ….कब कोई ओछा विचार अंगद की तरह पाँव हमारे मन में जमा लेता है …हमको पता भी नहीं चल पाता …..सिर्फ मैं ही सही ….मैं ही सबसे बुद्दिमान ….मेरी सोच और विचार ही सर्वोप्रिय होने चाहिए ….कोई दूसरा मेरा विरोध करे तो क्यों करे ….और कर के बच्चू कहाँ जाएगा …. आपने बहुत अच्छा किया की यह सुविधा मुहैया करवाई …. अब सोचता हू तो बहुत ही सुखद लगता है की अगर जागरण पर कोई ऐसी सुविधा होती तो शायद हरेक ब्लोगर दिन में कम से कम एक बार तो उस सुविधा केन्द्र पर जरूर यह देखने जाता , की वहाँ पर कितनी गंदगी इकट्ठी हो गई है ….. सबसे ज्यादा हिट उस सुविधा केन्द्र को ही मिलते … और तब वोह बन जाता MOST VIEWED BLOGS FOR THE FOREVER … इस समाज सेवा के लिए आपका जितना भी आभार प्रकट किया जाए कम है ….

के द्वारा: rajkamal

विचार ही सर्वोप्रिय होने चाहिए ....कोई दूसरा मेरा विरोध करे तो क्यों करे ....और कर के बच्चू कहाँ जाएगा .... आपने बहुत अच्छा किया की यह सुविधा मुहैया करवाई .... अब सोचता हू तो बहुत ही सुखद लगता है की अगर जागरण पर कोई ऐसी सुविधा होती तो शायद हरेक ब्लोगर दिन में कम से कम एक बार तो उस सुविधा केन्द्र पर जरूर यह देखने जाता , की वहाँ पर कितनी गंदगी इकट्ठी हो गई है ..... सबसे ज्यादा हिट उस सुविधा केन्द्र को ही मिलते ... और तब वोह बन जाता MOST VIEWED BLOGS FOR THE FOREVER ... इस समाज सेवा के लिए आपका जितना भी आभार प्रकट किया जाएप्रिय चातक जी .... हमको गंदगी के बीच में ही रहने की शायद आदत हो गयी है ....कब कोई ओछा विचार अंगद की तरह पाँव हमारे मन में जमा लेता है ...हमको पता भी नहीं चल पाता .....सिर्फ मैं ही सही ....मैं ही सबसे बुद्दिमान ....मेरी सोच और कम है .... बधाई नहीं ...मुबारकबाद !

के द्वारा: rajkamal

परम आदरणीय भाई चातक जी, वक़्त को पहचान कर बिल्कुल सही वक़्त पर सही चीज़ मुहैया कराने की आपकी बेहद ज़िम्मेदार प्रकृति के प्रमाण स्वरूप आज हमारे ब्लाँगर भाइयों को यह बिन-पृष्ठ प्राप्त हुआ है । इस महती कार्य को अंजाम देने के लिये आपका आभार प्रकट करने हेतु शायद ही कोई सही शब्द किसी को मिल सके । काफ़ी दिनों से ऐसे किसी स्थान की आवश्यकता कम से कम मुझे बड़ी शिद्दत से महसूस हो रही थी । देखिये, जब दिल मिलते हैं तो कैसे सोच-विचार का भी मिलाप होने लगता है । जहां-तहां किसी भी निर्दोष व्यक्ति या मुहल्ले में अपना फ़ितूर और कचरा फ़ेंकना किसी को भी अच्छा नहीं लग रहा होगा । हमें लगी है तो हमने किसी के आंगन में उछाल दिया, हम समझते हैं कि वह तो है ही इसी योग्य कि उसके यहां सभी फ़ेंकें । लेकिन पलट कर कहीं वह भी फ़ेंक दे तो हमारे लिये थोड़ी मुश्क़िल हो जाती है । ऐसी स्थितियों से राहत दिलाने में आपका यह केंद्र बिल्कुल सही भूमिका निभाएगा, ऐसी आशा ही नहीं, बल्कि पूरा विश्वास किया जाना चाहिये । एक और खासियत इस केंद्र के खाते में यह दर्ज़ होने जा रही है, जैसा कि आपका हृदय फ़िलहाल विभीषणों और जयचन्दों की बढ़ती आबादी से बुरी तरह विदीर्ण है, विगत कुछ दिनों से आपकी इस पीड़ा का एहसास आपके सभी चाहने वाले कर रहे थे । क्या किया जाय, आज के दौर में कुछ दूसरे प्रकार के फ़ितूरी लोगों का शौक़ चर्रा रहा है कि जाति मजहब और फ़िरकापरस्ती से ऊपर उठकर कुछ दूसरे प्रकार की नई बातें होनी चाहिये । ऐसे फ़ितूर वालों की गतिविधियों से रोज नए जयचन्द और विभीषण पैदा हो रहे हैं, जो आप जैसे पवित्र और निष्कलुष राष्ट्रवादियों के लिये एक प्रकार का वाहियात किस्म का सिरदर्द है । ये जहां-तहां घूम-घूम कर अपना कचरा फ़ैलाते हुए माहौल को खराब कर रहे हैं । अब आप जैसे सन्त व्यक्तित्व भला मित्र-शत्रु में फ़र्क़ कहां समझते है । आपका यह केंद्र जयचन्दों और विभीषणों के भी काम आकर एक नया इतिहास गढ़ेगा । ऐसी ढेरों आशाओं-उम्मीदों के साथ एक बार पुन: आपका हार्दिक आभार प्रकट करना चाहूंगा ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

के द्वारा: Manish Singh "गमेदिल"

मित्र चातक जी आपका \'\'जयचंदों का जवाब\'\' हमारे मातृभूमि पर आक्रांता बाबर के नाजायज औलादों व उनके सरपरस्तो के मुह पर जोरदार तमाचा है और उस कलंक को मिटाने में हुए शहीदों का नमन वंदन और शौर्य से विभूषित पुष्पांजलि है उक्त्त पंक्तिया आपके \'\'जयचंदों का जवाब\'\' को समर्पित- \'\'छीनता हो सत्व कोई और तू त्याग तप से काम ले यह पाप है पुण्य है विच्छिन्न कर देना बढ़ रहा तेरी तरफ जो हाथ है साहस सम्बल होता जिनका धैर्य सारथी होता है लोक हितैषी बनकर अपने प्राणों को भी खोता है इतिहास सदा लिखता पृष्ठो पर उनका सुनेहरा नाम है                                                                                  वन्दे मातरम् ।

के द्वारा: ravi prakash pandey\'\'AAKROSH\'\'

चातक जी बात बिलकुल सही है | भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे कि ओर चलता है ना कि नीचे से ऊपर कि ओर| अगर सबसे ऊपर वाला रिश्वत न लेने की ठान ले , तो नीचे वाले की क्या मजाल जो रिश्वत ले| भारत मे आम व्यक्ति ईमानदार है अथवा ईमानदारी से जीना चाहते है। इस तरह के झूठ को की सब लोग बेईमान हैं, इस तरह फैलाया गया है कि एक देशभक्त, ईमानदार एवं चरित्रवान भारतीय व्यक्ति के मन मे यह भ्रम गहरा हो गया है कि सब बेईमान हैं ।इन 99% भ्रष्ट एवं बेईमान नेताओ ने अपनी बेईमानी छुपाने के लिए देश की ईमानदार प्रजा को बेईमान प्रजा कहकर बहुत बडे झूठ के तहत देश के लोगो को झूठा एवं बेईमान बनाने का षड्यंत्र रचा है। जिस दिन देश के यह संवेदनशील, जागरुक, राष्ट्र्भक्त, ईमानदार लोग संगठित हो जायेंगे, उस दिन ये बेईमान लोग बेनकाब हो जायेंगे । और भारत बेईमानो का देश नही अपितु ईमानदारो का देश कहलायेगा।

के द्वारा: bharatswabhiman

प्रिय शैलेश जी, आपकी इस टिप्पड़ी को पढ़कर एक आशा की किरण जागती है कि मैं अकेला नहीं हूँ बल्कि कुछ लोग हैं जो हामारे साथ हैं| अच्छा लगता यदि हम अपने व्यक्तिगत मतभेदों को भुला कर इस तरह के आधुनिक और अप्रत्यक्ष युद्ध को साथ साथ मिल कर पूरे मनोयोग से लड़ें| यदि इस जागरण मंच पर मौजूद सारे ब्लोगर बंधू ही चीनी वस्तुओं के विरुद्ध जागरूकता अभियान के जुट जाएँ तो यकीन मानिए ये संख्या एक सप्ताह में इतनी बड़ी हो जायेगी कि चीन को भारत के लिए अपनी नीतियां बदलनी पड़ेंगी| इस कार्य में सभी हिंसक और अहिंसक बंधू सामान रूप से भागीदारी कर सकते है और सबसे बड़ी बात ये कि इससे सीमा पर बैठे हमारे सैनिकों का मनोबल ऊंचा होगा और चीनियों का गिरेगा| शायद ही कोई इस बात से इनकार करेगा कि लड़ाई सनिकों की संख्या से नहीं वरन सैनिको के मनोबल से जीती जाती हैं| राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया! जय-भारत जय भारती!

के द्वारा: chaatak

आदरनीय चातक जी ! एक ज्वलंत विषय पर व्यंगात्मक शैली में लिखा गया जागरूकता का आह्वाहन करता लेख पढ़कर बहुत अच्छा लगा जैसा की आपने लिखा की लोग आपको देखकर अपना चायनीज सामान छुपाने लगे हैं, आप जैसे लोगों की राष्ट्र को बहुत जरूरत है ..... क्योंकि चीनी हमेशा से ही नैतिक और व्यवहारिक रूप से दिवालिया रहे हैं ...... मैं भी चीन की गले लगाकर चुरा घोंपने की नीति के कारण उसका धुर विरोधी हूँ और मैं भी चीनी सामानों के प्रयोग को हतोत्साहित करता हूँ क्योंकि चीनी सामानों के इतने सस्ते होने का एकमात्र कारण ये है की चीन अधिकाधिक मात्र में वेदेशी मुद्रा कोष को भरना चाहता है, जिसका उपयोग करके अपना सीमा विस्तार कर सके, और वैश्विक बाजार पर नियंत्रण रख सके ............. और इस दशा में ये जन साधारण की ये जिम्मेदारी बनती है की चीन की इन कुटिल नीतियों को असफल करने के लिए उसके बिछाए जाल को समझे और काट दे.......... जिसके लिए चीनी उत्पादों को हतोत्साहित कर बाजार से बाहर कर दे.............. वही हमारी सरकार को भी इस तरफ ध्यान देने चाहिए ............ क्योंकि ये जन साधारण की प्रवित्ति होती है की सस्ती चीजों का उपभोग करे ...... ऐसी दशा में सस्ते चीनी उत्पादों को हतोत्साहित करने के लिए उन पर पर्याप्त कर लगाया जाय ............... एक राष्ट्रवादी बेहतरीन लेख के लिए बधाई एवं..... जनसामान्य का ध्यान एक विकत समस्या की और खींचने के लिए आभार .....

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

div81 जी सादर नमस्कार, भूटान की राजनैतिक सोच हमारी राजनैतिक सोच से कितनी बेहतर है इसका बहुत सही अंदाजा लगाया आपने| हम भी ऐसा कदम उठा सकते हैं कमी है तो बस युवाओं के सामने आने की परिवर्तन तो हो के रहेगा| हमारी कमी ये है कि हमने बुजुर्ग कन्धों पर जिम्मेदारियों के बोझ लाद रखे हैं परिणाम सामने है 'दिन भर चले अढाई कोस'| मुझे पूरा विश्वास है कि आप मेरा इशारा समझ गई होंगी| जो कहते है देश में सब ठीक है, अमन चैन है वो आपको बरगलाने के लिए, और खुद आराम फरमाने के लिए है| उदाहरण है ताज, ओबेराय, नारेमन हाउस, घाटी और नक्सली प्रभावित एक चौथाई हिन्दुस्तान| क्या इसमें से कोई भी आवाज आहत हिन्दुस्तान की नहीं प्रतीत होती ? मुझे तो लगता है देश में कोयल के गाने का वक्त नहीं शेरों के दहाड़ने का वक्त है| शेष फिर कभी... वन्दे-मातरम!

के द्वारा: chaatak

स्नेही राजीव जी, बिलकुल सही कहा आपने चीन ने हर क्षेत्र में अपने आपको एक महाशक्ति के रूप में विकसित किया है और इसके पीछे उनकी Killer Instinct (कातिलाना प्रवृत्ति) है ना कि ढुलमुल सोच, उनकी राजनैतिक प्रतिबद्धता उनकी लगातार कूटनीतिक सफलता का कारण है वे अपनी राजनीति में भी आक्रामक रवैया अपनाते हैं और व्यवसाय में भी और हम उनके शिकार बनकर सिर्फ उनके स्वाभाविक पतन की बात सोच कर अपने मन को दिलासा देते हैं हमारी आदत है अकर्मण्यता की या फिर हम इंतजार करते हैं उस पल का कि जब आवश्यकता होगी तो ये भी हो जायेगा| हमें इस सोच को त्यागकर योजनाबद्ध तरीके से काम करना होगा, नीतियां लागू करनी होंगी और कर्मण्य होना होगा| आपकी प्रतिक्रिया से अत्यंत प्रसन्नता हुई आशा है सकारात्मक वाद विवाद चलते रहेंगे क्योंकि हम और आप तो महज निमित्त हैं मूल आधार तो राष्ट्र है| सहर्ष वन्दे-मातरम!

के द्वारा: chaatak

वाह भाई चातक जी, पहले सोचा,क्यूँ न मैं भी विदा के पहले अल जैसा कुछ जोड़ दूं पर आपके चीनी प्रेम को देखते हुए रुकना पड़ा...फिर आप तो कृष्ण हैं न और मैं अर्जुन मेरी भी प्रतिज्ञा है ''न दैन्यम न पलायनम' वाली..मरता क्या न करता रुकना ही पड़ा| अब मैं भी सोच रहा हूँ चीनी खरीद लूं ..पर क्या करूं, महगाई डायन खाए जात है और आजकल दर्जियों ने जेबें अधिक सिलनी शुरू कर दी है...चीनियों से तो एकबारगी हम लड़ भी सकते हैं पर क्या करिए ऐसे लोगों से जिनकी सूरत छुपी रहे नकली चेहरा सामने आये...असली सीरत छुपी रहे...और हाँ बड़ा मजा आया...पूरब पश्चिम,उत्तर दक्षिण जहाँ गए भारतीय सिपाही,भारत माँ के विमलानन पर आये पोत अनन्त सियाही...कहीं यह लाइन भी विवादित न हो जाय इसलिए सन्दर्भ द्वितीय विश्व युद्ध का है....वन्देमातरम बड़ा मजा आया

के द्वारा: atharvavedamanoj

प्रिय मिश्र जी, आपकी बात बिलकुल सही है भोली भाली जनता को तो सिर्फ इस्तेमाल किया जा रहा है लेकिन अपने आपको राष्ट्र के कर्णधार कहने वाले लोगों और छद्म विचारक जो प्रेम का पाठ कंडोम बाँट के फैला रहे हैं क्या इन्हें चीनियों की बदनीयती जनता तक नहीं पहुंचानी चाहिए| मेरी नज़र में जैसे ही कोई चीनी आइटम आता है मैं उसे इस्तेमाल करने वाले को तुरंत धन्यवाद जरूर ज्ञापित करता हूँ कि आज आपके द्वारा पहुंचाई गई मदद से चीन को हमारे सैनिकों को मारने के लिए एक और गोली मिल गई है| मेरे आस पास के लोग अब अपने चीनी मोबाइल मुझसे छिपाने लगे हैं लेकिन यही काम अगर हमारे देश के कर्णधार करें तो देखिये कैसे एक मिनट में तस्वीर बदलती है| आपकी सटीक टिप्पड़ी का बहुत बहुत शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

प्रिय चातक जी सादर वंदेमातरम ! आपके द्वारा दी हुयी नैतिक शिक्षा तो जबरदस्त है लेकिन मासूम पब्लिक क्या करे । भारत में एक तो अशिक्षा फिर शिक्षितों में भी कम्युनिस्ट विचारधारा और देशहित को कूड़ा समझने की सोच । फिर सरकार की घुटनाटेकू आर्थिकनीतियां । अगर सरकार चीनी सामानों पर हैवी ड्यूटी लगा दे तो ये यूज एण्ड थ्रो वाले ये चीनी खिलौने इतने सस्ते भी न रहेंगे । . चीन युआन का जबरन अवमूल्यन करके अपने उत्पाद को दुनिया भर में सस्ता करके डंप कर रहा है । अमेरिका, यूरोप और ऐशिया के बाजारों पर चीन ने गलत तरीके से कब्जा किया है । पूरा विश्व चीन से त्रस्त है । लेकिन साथ ही अर्थशास्त्रियों का यह भी कहना है कि काठ की हांण्डी बार बार नहीं चढती । जल्द ही चीन को अपनी गलत आर्थिक नीतियों का खामियाजा भुगतना पड़ेगा ।

के द्वारा: kmmishra

प्रिय भाई तुमने चीनियों की चीनी अच्छी व्याख्या कर डाली ,लेकिन हमारे भारतीय भाई जब यह समझे तब न (कुछ लोग तो उन्ही के फेके टुकड़ों पर अपनी राजनीती की दुकान चला रहे हैं ,क्या करें न अंटी में पैसा है ,न राजनीती करने को कोई सार्थक मुद्दा , अब उनको इससे क्या मतलब कि चीनी कहाँ कहाँ {झंडा} यह तो बीती बात हो गई डंडा गाड रहे हैं ,भईया पैसा तो अंटी में आ रहा है आने दो ,जब दिक्कत होगी तो निकल लेंगे कहीं और कहीं जगह नही मिली तो चीनी भाई हैं ही उनके अब्बा ) भाई आम जनता कि छोड़ो भारतीय कम्पनियां भी अब उन्ही के कुछ सामानों को अपने उत्पादों में कीमत कम करने के चक्कर में समाहित करके बेंच रही हैं ,,(शायद उन्हें भी पिछली चीनी भूल गई जो चीनी भाईयों ने खिलाई थी )......................तुम्हारा

के द्वारा: ashvini kumar

स्नेही मित्र अश्विनी, मनोज जी की शैली और उनका लेखन है ही उग्र और वे इस बात को स्वीकार भी चुके हैं लेकिन इसके बावजूद वे किसी भी बात को तर्कपूर्ण ढंग से ही रखते हैं और जिसकी भी इच्छा हो वह उनसे साक्ष्यों समेत तर्क और सार्थक बहँस कर सकता है लेकिन जिस तरह के लेख अहमद खालिद जी का है मैंने भी देखा की उनके पास न तो अपनी बात प्रमाणित करने को कोई साक्ष्य है न ही कोई स्पस्ट तर्क फिर भी उनके विचारों का स्वागत है| मनोज जी से मेरी अक्सर चैट इत्यादि में विभिन्न मुद्दों पर बहस होती रहती है और अक्सर हम एक दुसरे से सहमत नहीं होते लेकिन अंत में हम किसी न किसी निर्णय पर जरूर पहुँच जाते हैं इसमें न उनकी हार होती है न मेरी हाँ एक सही बात जरूर सामने आ जाती है| चार सौ चालीस वोल्ट के झटके वालो बात सही है मुझे भी लगता है अभी ये मंच सत्य के झटको को सहने के लिए पूर्ण परिपक्व नहीं है और ये हमारी ही जिम्मेदारी है कि हम इसे पूर्ण परिपक्व बनाएं ताकि सत्य को जूठ की चासनी लगा के परोसने की जरूरत न पड़े| प्रतिक्रिया का बहुत बहुत धन्यवाद !

के द्वारा: chaatak

प्रिय मित्र तुम्हे और मनोज दोनों को देखा मुझे आप दोनों की कविता में कहीं भी धार्मिक उन्माद फैलाने वाली कोई बात नजर नही आई ,मनोज जी पर मेने भी कुछ नकारात्मक टिप्पणियाँ की हैं ,लेकिन वह टिप्पणियाँ तर्क विहीन नही थीं , फिर अगर मनोज को नकारात्मक निगाह से देखा जा रहा है तो एक बिहार के अहमद खालिद या ऐसा ही कुछ नाम है ने हाई कोर्ट के फैसले पर नाराजगी प्रकट करते हुए सन्दर्भ 8 दिसम्बर (आंसू पोछने की बात की है) ,जिस पर (के एम मिश्रा) जी ने तड़ातड़ प्रमाण मागे लेकिन भाई जी ने जबाब नही दिया (मैने भी पूछा था )लेकिन भाई जी ने बिना जबाब दिए ही अगली पोस्ट दूसरे विषय पर ठोंक दी (उनको क्या कहा जायेगा) मनोज जी से कहें की इस कविता का शीर्षक थोडा बदल दें (हर मुसलमान हत्यारा है ,कुछ मुसलमान हत्यारे हैं ) तब चार सौ चालीस वोल्ट का झटका नही लगेगा ...........तुम्हारा

के द्वारा: ashvini kumar

के द्वारा: chaatak

चातक जी आपकी आपकी कविता को क्यों बैन किया गया कुछ समझ नहीं आया .. जिन विवादित दुसरे विषयों को जिनसे समाज को कोई लाभ नहीं था जो अर्थहीन थे उने प्रतिबंदित करने की बजाये एक कवी मन से उठने वाले भावों को बेड़ियाँ पहनानी ठीक नहीं ... ये गलत है .. और इस रचना में कुछ भी ऐसा नहीं है जिस के कारन इसे छुप्पा दिया गया....... चातक जी यहाँ में इतना कहना चाहती हूँ की जब आजादी की लड़ाई लड़ी गयी तो कितने वीरों पे कितनी कवितों पे प्रतिबंद लगे होगे .. मगर उन सब ने लड़ना और लिखना नहीं छोड़ा ... अगर ये जंग है तो जंग के मैदान से पीछे नहीं हटा जा सकता ...... आप और लिखे आखिर कब तक प्रतिबंद लग सकते है .......यु भी खुसबू और धुआ छुप नहीं सकता ....... देखियाँ न आपका सन्देश फिर भी सब जागरण पाठकों तक पहूच ही गया....... और सब आपके साथ है .....और आपकी ही शुरू की पंक्तियाँ कटते आये हैं सदियों से एक बार और कट जायेंगे, इस गौरवशाली माटी को अपने खूँ से नहलायेंगे, ऐसा होने पर जरुर सच होगी .. धन्यवाद सहित

के द्वारा: roshni

के द्वारा: chaatak

प्रिय मित्र चातक जी, सादर वन्देमातरम, आपकी कविता और मेरे प्रति विचारों ने आपको भी अप्रिय बना दिया है...पता नहीं इन लोगों को कविता की समझ कब आएगी,पहले तो कम्युनिस्टों ने केचुवां और रबड़ छंदों का प्रयोग कर साहित्य का कबाड़ा कर दिया और अब भावनाएं भी नहीं समझते|इश्वर इन्हें सद्बुद्धि दे...आपने तो अपने कविता में कहीं भी उनका स्पष्ट उल्लेख नहीं किया जिनको लेकर ये सर्वधर्म समभाव का(अतार्किक) नारा लगातें है..और फिर भी आपको सेंसर कर दिया गया..चलिए कोई बात हमलोग ही आपस में अपनी-अपनी कविताओं का मर्शिया पढ़ लेते हैं... गर गैरत थोड़ी है बाकी तो अपनों पर मरके देखो, हिम्मत है तो अरि के समक्ष एक सिंहनाद करके देखो|.. इनका तो हिम्मत मर चूका....अब इनसे भेंडनाद के अलावां कुछ भी नहीं निकलता.."न खंजर उठेगा न शमसीर इनसे,ये बाजू मेरे आजमाए हुए हैं"...आपकी कविता एक सिंहनाद है...शायद इनका ह्रदय कम्पित हो गया है..जय भारत,जय भारती

के द्वारा: atharvavedamanoj

चातक जी इस पोस्ट पर मैं मुख्य पृष्ठ पर प्रतिक्रियाओं पर आपका जवाब देखकर पहुंचा हूं । आपकी कविता पढ़ी, जिसमें स्वाभाविक रूप से आपका लालित्य भरा पड़ा है । अपनी-अपनी नज़र की बात है । आप और मनोज जी के भावनात्मक सम्बंधों की झलक मिलते रहने से सभी आप दोनों के रिश्तों से वाक़िफ़ भी हैं । मुझे तो कविता में सिर्फ़ आपका एक भाई के प्रति भावनात्मक संबन्ध ही दिख रहा है, कोई साम्प्रदायिकता दिख ही नहीं रही कि समयपूर्व ही भावुकता में पब्लिश या फ़ीचर होने पर शंका करने की कोई बात हो । रही बात निर्णय की तो मंच अपने अधिकारों का किस विश्लेषण के आधार पर प्रतिपादन करता है, यह उसके स्वत्वाधिकार की बात है । अभी मनोज जी के ब्लाग पर किसी दिन मैंने देखा था, आपकी टिप्पणी में आपने उन्हें खुद सभी मुसलमानों के साथ एक समान बैर भाव रखने पर आपत्ति प्रकट की थी । आपकी भावनाएं समझ में आने वाली हैं । यह व्यक्तिगत वाक्युद्धों से इतर कुछ भी नहीं है । भाव चाहे जो भी हों, कविता की ओजस्विता और सुन्दरता देखने वालों के लिये कुछ भी गलत नहीं दिख रहा । धन्यवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

आदरणीय शाही जी, विधर्मी होने के नाते उस परमपिता से लड़ना मेरा कर्त्तव्य भी है और दिली तमन्ना भी लेकिन उससे मेरी शिकायतों का मतलब ये नहीं हैं कि मैं नास्तिक हूँ और इस कविता में मैंने बेटी के मन की व्यथा जरूर कही है लेकिन मैं हर जगह उससे सहमत भी नहीं हूँ | ईस्वरीय विधान पर और माता पिता से शिकायत पर बेटियों के सवाल को मैं कुछ उसी भाव में देखना पसंद करूंगा जिस भाव में मैं स्वयं अपने माता पिता और ईश्वर (जिससे मेरी कभी नहीं बनती) को देखता हूँ- या रब हुजूम-ए-गम को दे कुछ और बुसअतें, दामन तो क्या अभी मेरी आँखें भी नाम नहीं; शिकवा तो बस इक छेड़ है लेकिन हकीकतन, तेरा सितम भी तेरी इनायत से कम नहीं | प्रतिक्रिया द्वारा कविता को एक नया आयाम देने का तहे दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

प्रिय राजकमल जी , मैंने चातक जी को उद्येश्य से न भटकने को इसलिए कहा था क्यूंकि ये उन चुनिन्दा लोगो में से है जिन्हें की मै साहित्यकार की श्रेणी में रखता हूँ , और ये मैंने इसलिए कहा क्यूंकिचातक जी से एक उम्दा रचना की अपेछा करता हूँ और मै निराश हुआ था मैंने कही भी ये नहीं कहा की विरोध मत करो परन्तु विरोध कमेंट्स के रूप में भी हो सकता था, बात नाम बदलकर अनर्गल टिपण्णी की है तो मुझे लगता है की आपको व्यंग छोड़कर जासूसी उपन्यास लिखने चाहिए , (क्योंकि इनकी टिपण्णी से यह आभास होता है की इन्होने सभी की टिप्पणियो के हो लेने का इंतज़ार किया …उसके बाद सोच समझ कर अपने मन का मैल और गंदगी का आपके ब्लाग पर वमन कर दिया) यह क्या है महोदय संजीव जी का विरोध इन्ही आधारों पर कर रहे है की वो अशभ्य तरीके से पेश आते है. चातक जी की कुछ शब्द इसी लेख से आपके लिए उपयुक्त लगी... "जवाब देते समय महोदय के तर्क हवा खाने चले गए और संयम की शिक्षा देने वाले मूर्धन्य विद्वान महोदय बौखला कर तर्क करने वाले सभी ब्लागरों के साथ अशोभनीय तू-तड़ाक करने पर अमादा हो गए-"

के द्वारा: y.dubey

चातक जी बधाई । सचमुच भारतीय परम्पराएं ये मानने को तो बाध्य करती ही हैं कि विधाता ने कहीं न कहीं बेटी के साथ पक्षपातपूर्ण विधान तो किया ही है । एक तरफ़ नारी का पुरुष की अपेक्षा अधिक कोमल हृदय, ऊपर से एकाएक कुनबा बदलने का विछोह सहने की बाध्यता , बिल्कुल विधाता का अन्याय ही तो है ये । जब बेटा उच्च शिक्षा अथवा नौकरी-चाकरी के लिये पहली बार माँ-बाप को छोड़कर दूर जाता है, तो सिर्फ़ एक दूरी बनती है, कोई स्थाई विछोह नहीं होता, फ़िर भी कितना कारुणिक दृश्य बन जाता है । बेटी तो हमेशा-हमेशा के लिये अलग होती है । इस दर्द का एहसास सिर्फ़ बेटी ही कर सकती है, या विदा करने वाले माता-पिता । मैंने अपनी दो बेटियों को अलग किया, और इस दर्द को समझ सकता हूं । रही उसकी सामाजिक स्थिति की बात, तो उस मामले में भी समाज और समाजपिता, दोनों के विधान क्रूर ही रहे हैं । साधुवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

प्रिय जय जी, जिस प्रकृति की गोद में पला बाधा हूँ जिस गाँव की हरियाली तालाबों और बागों को मैंने दिल से महसूस किया है उसी को पल पल ईंटे पत्थरों के जंगल निगलते जा रहे हैं | बड़ा असहाय महसूस करता हूँ कभी कभी अपने आपको| किसी तरह खुद को प्रकृति से जोड़ रखा है क्योंकि मुझे इन पेड़ पौधों और पशु पक्षियों से बेहद प्यार है | लोग कहते हैं क्यों जंगल लगा रखा है ? क्या जवाब दूं कि इसमें मेरी आत्मा बसती है ये मेरे ह्रदय के बिलकुल निकट हैं तो भी लोग मुझे पागल समझेंगे क्योंकि उन्हें बस इन पेड़ पौधों और भूमि की कीमत दिखती है उनसे जुड़े अहसासों को देखने के लिए शायद आँखें नहीं हृदय चाहिए| अच्छी प्रतिक्रिया का बहुत बहुत शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

आदरणीय जोशी जी, आपके विचार जानकर प्रसन्नता हुई | आपकी सूझ बूझ और सकारात्मक सोच पर किसी भी तरह का न तो भ्रम है और न ही संदेह जहाँ तक मांस मछली और मदिरा का सेवन करने की बात है वह बहुत हद तक धर्म से बिलकुल परे बिलकुल व्यक्तिगत बात होती है | मांस खाना कोई अपराध नहीं न ही अधर्म है लेकिन मांस खाने के लिए नैतिकता को त्याग देना अधर्म होगा | इसी प्रकार मदिरा पीना भी अधर्म नहीं लेकिन मदिरा के वशीभूत होकर संयम त्याग देना अधर्म है | मेरी राय में जहाँ तक सनातन धर्म का ताल्लुक है यह न तो किसी देवी देवता की पूजा है न ही किसी तरह का सम्प्रदाय यह सिर्फ मानव बनकर जीने का एक अलौकिक दर्शन है और हर वह व्यक्ति जो मन, वाणी और कर्म तीनो में भयमुक्त है वह सनातन है | स्वयं विवेकानंद जी ने लिखा है- Awake! strife! Be not afraid! यहाँ भी संघर्ष की बात कही गई बय्मुक्त होने की बात कही गई, भगवा पहनकर कही गई तो क्या विवेकानंद जी के शांतिप्रिय होने पर कोई संदेह है? विवेकानंद जी ने राष्ट्र को शक्तिशाली बनाए रखने के लिए नागरिकों को शक्तिशाली बनने का आह्वान करते हुए कहा है कि आवश्यकता हो तो मांसाहार भी करो क्योंकि कमजोर स्नायुओं वाला नागरिक मजबूत राष्ट्र की नीव नहीं रख सकता इससे तो यहे स्पष्ट होता है कि मांसाहारी होना और हिन्दू होने पर कोई प्रभाव नहीं डालता| कृपया मेरी किसी बात को अन्यथा न लें मेरा अभिप्राय सिर्फ उन चंद बातों को आपसे शेयर करना था जो हमारे कुछ महापुरुषों द्वारा कही गई हैं | आपकी प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

प्रिय चातक जी, देर से प्रतिक्रिया देने के लिए क्षमा चाहूंगा। कुछ व्‍यस्‍तता के कारण कुछ इस गुढ विषय के कारण प्रतिक्रिया देने में असमर्थ था। आप के इस विषय को पढ कर एवं श्री शाही जी के लेख भ्रटाचार में दिए उन के विचार - नए रामनामी फ़ैशन - से यह विदित होता है क्‍या हम जो स्‍वंय को हिन्‍दू कहते है क्‍या हम सही कर रहे है या सही राह चल रहे है, पहले हम अपने में तो झांके की क्‍या वाकई में हम हिंदू भी है या एक मानस मात्र, रात को मांस, मछली एवं मदिरा का सेवन सुबह राम नाम का भजन, क्‍या यही हिन्‍दू धर्म की पहचान है। जो मुगलों ने साम्राज्‍य विस्‍तार के लिए किया (श्री बाजपेयी जी का ‘अयोध्या इतिहास के आईने में भाग-१ व भाग-२‘) क्‍या हम भी हिन्‍दूत्‍व छोड कर मुगलो की सेना में भर्ती हो जाए। क्‍या फर्क रह जाएगा हम मै और मुगलों में। तलवारे छोड सयंम से रहें। यह एक जलता कोयला है इसे हवा न लगने दें। धन्‍यवाद

के द्वारा: दीपक जोशी DEEPAK JOSHI

प्रिय अबोध जी, मैं पहले भी कह चुका हूँ कि यदि आप अबोध है तो फिर ज्ञानी किसे कहूँगा ये समझना मुश्किल है| आपकी राय पाकर सदैव ख़ुशी होती है क्योंकि आपकी टिप्पड़ियाँ स्पष्ट कर देती हैं कि आप कितनी गंभीरता से लेख को पढ़ते हैं और कितनी गहराई से लेख के सभी पहलुओं पर अपने विचार देते हैं | यह जानकर कि आप बहुत धार्मिक व्यक्ति नहीं है, बड़ी ख़ुशी हुई क्योंकि मैं निःसंकोच कहता हूँ कि मैं विधर्मी हूँ| आपका और मेरा विचार एक जैसा है कि हमारा समाज और देश जो के गुलाब के फूल जैसा नाजुक और खूबसूरत है उसकी मुस्कान उसकी महक और उसकी हर पंखुड़ी पूर्ण विकास करे बस अंतर यहाँ हो जाता है कि आप इसके लिए राष्ट्र रुपी पादप को खाद और पानी देते हैं उसके लिए धूप लौर छाँव की व्यवस्था करते है लेकिन मैं वह काँटा हूँ जो उसे नोचने के लिए उठे किसी भी हाथ को घायल कर दूंगा | दोनों व्यक्तियों की मंशा भली है और दोनों से ही लाभ राष्ट्र को होगा मेरा यही मानना है | आशा है कि आप मेरी आक्रामकता के कारण को समझने का प्रयास करेंगे और अपनी राय से इसी तरह से अवगत करते रहेंगे| आपके स्नेह के लिए एक बार फिर तहे दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

स्नेही दूबे जी, मैं स्वयं भी इस बात से कभी भी प्रसन्न नहीं होता कि मुझे किसी बात के लिए क्षोभ प्रकट करना पड़े लेकिन गलत बात को गलत न कहने पर भी तो आत्मग्लानि का बोध होता है| यह भी सही है कि किसी को भी अपने विचार प्रकट करने की आज़ादी है लेकिन जब विचार आपके व्यक्तिगत दायरे से बाहर निकल कर किसी समाज, सम्प्रदाय, या धर्म पर हों तो फिर मसला आपका व्यक्तिगत नहीं रह जाता बल्कि आप उस विचार से प्रभावित होने वाले एवं उस समाज, धर्म या सम्प्रदाय की जानकारी रखने वाले लोगों के प्रति जवाबदेह भी हो जाते हैं | यदि आपको लगता है कि मैं अपने उद्देश्य से भटक रहा हूँ तो मैं आत्म-मंथन जरूर करूंगा और प्रयास करूंगा कि आगे से आपको ऐसी कोई त्रुटी न मिले| आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रिया का बहुत बहुत शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

चातक जी, सबसे पहले एक बात स्पष्ट कर दूं, की मै आपकी लेखनी का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ, जो भी आप लिखते हैं, उसे ध्यान से पढने की चेष्टा करता हूँ, और सत्य तो ये है, की आप जैसे लेखकों के कारण ही मै जागरण जंक्शन पर आता हूँ, आपके इस लेख में कहीं से मुझे आक्रामकता का बोध कुछ ज्यादा ही हुआ, शायद ये मेरी सोच हो, मै कोई बहुत धार्मिक व्यक्ति नहीं हूँ, और धर्म को केवल लोगों के जोड़ने का, और इश्वर तक पहोचने का मार्ग मानता हूँ, अगर कोई भी, कोई भी, चाहे वो किसी धर्म का हो, धर्म के नाम पर समाज में लोगों को बांटता है, उन्हें दुःख पहोचाता है, उनकी हत्या करता है, तो मैं उसे धार्मिक मानता ही नहीं, बल्कि मै उसको मनुष्य ही नहीं मानता, आप ये कह लें की मेरी समझ ये है की अगर आप इंसान नहीं हैं तो आप धार्मिक नहीं है. भारतीय समाज पर आपके नए ब्लॉग का बेसब्री से इंतज़ार रहेगा.

के द्वारा: abodhbaalak

प्रिय सुनील जी, कार्ल मार्क्स जी की इस पंक्ति को स्वयं उसके शिष्य लेनिन ने रूस में सर्वहारा वर्ग की क्रांति करवा कर सिद्ध कर दिया था कि बदलने का माद्दा आम आदमी में नहीं बल्कि आम आदमी को राह दिखने वाले एक रियल टाइम फिलासफर में होता है और गुरु कार्ल मार्क्स सिर्फ आर्म चेयर फिलासफर की बात कर रहे थे | यही कारण है कि साम्यवाद की विचारधारा कार्ल मार्क्स में सिर्फ सिद्धांत तक ही सीमित रही जबकि वे इस सिद्धांत के जन्मदाता थे लेकिन लेनिन ने मार्क्स के सिद्धांतों को व्यवहार में लाकर सर्वहारा वर्ग की क्रांति से पूंजीवाद को जड़ से उखाड़ फेंका| आपकी बहुमूल्य टिप्पड़ी का एक बार फिर तहे-दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

प्रिय अबोध जी, यदि आपको लगता है कि मैं अपने लेखन कौशल का इस्तेमाल समाज को तोड़ने के लिए कर रहा हूँ तो यह मेरे लिए सचमुच खेद का विषय है क्योंकि अगर ऐसा हो रहा है तो इसका मतलब है कि मैं सफल नहीं बल्कि असफल हो रहा हूँ | यदि यह प्रश्न पूछना कि "हिंदू सदैव सहिष्णु था और आज भी है लेकिन सहिष्णुता को कायरता की हद तक निरीह बना देना क्या घृणित नहीं है?" समाज को तोड़ रहा है या फिर सनातन धर्मावलम्बियों की बात करना विद्वेष को जन्म दे रहा है तो फिर हमारे राष्ट्र और समाज दोनों के लिए ही चिंता का विषय है| मैं चाहता हूँ कि मैं भारतीय समाज पर भी एक ब्लॉग लिखूँ जिसका न तो किसी धर्म से कोई मतलब है और न ही किसी सम्प्रदाय से फिर भी कहीं न कहीं तो ये सम्प्रदाय और धर्म से जुड़ेगा ही क्योंकि ये दोनों ही समाज के अभिन्न घटक है | यदि आप लोग सहमत हो तो क्यों न मैं इस दिशा में एक प्रयास करके भी देखूं | आप बंधुओं की प्रतिक्रिया सदैव दिशा देती है| समाज की और ध्यान आकृष्ट करने का तहे दिल से शुक्रिया !

के द्वारा: chaatak

प्रिय सुनील जी, मैं सिपाही को निशाना नहीं बना रहा बल्कि सिपाही एक उदहारण मात्र है मैंने स्वयं लिखा है "मैं यहाँ सिर्फ पुलिस विभाग पर ही बात को केन्द्रित करना चाहूंगा (सांसदों की वेतन-वृद्धि पर भी ये सामान रूप से लागू होता है)|" यदि आपको लगा हो कि मैं किसी द्वेषवश ऐसा कर रहा हूँ तो मैं इतना ही कहूँगा कि शायद मैं अपनी बात ठीक से लिख नहीं पाया और प्रयास करूंगा कि आगे से आपको यह शिकायत न हो | दूसरी बात कि मैं पात्तिया तोड़ कर विषवृक्ष को नष्ट करने की कोशिश कर रहा हूँ यहाँ आप मेरे साथ ज्यादती कर रहे है मित्र (सिर्फ मजाक बुरा मत मानियेगा) क्योंकि मैंने इसी ब्लॉग में लिखा है श्री ओमप्रकाश पारीक जी की कमेन्ट पर जिक्र किया है कि "इस ब्लॉग को लिखने का मेरा उद्श्ये यही था कि मैं ये व्वाक्त कर सकू कि भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे कि ओर चलता है ना कि नीचे से ऊपर कि ओर | " एक तरह से मैंने नीचे पदों पर बैठे यानी सिपाही और बाबू कर्मचारियों का भ्रष्टाचार ऊपर से बही गंदगी का अंश ही माना है (लेकिन उनका गुनाह ऊपर बैठे गुनाहगारों के कारण कम नहीं हो जाता)| आपकी टिप्पड़ी न काफी साड़ी भ्रांतियों पर प्रकाश डालने में मदद की जो शायद ब्लॉग में लिख कर व्याख्यित नहीं की जा सकती थी | आपकी प्रतिक्रिया का कोटिशः धन्यवाद !

के द्वारा: chaatak

प्रिय मित्र जय जी, आपने तर्क रखा तो लेकिन ऐसा जिसका जवाब कोई भी बच्चा दे देगा क्योंकि रिश्वत और ट्रेन के टिकट में कोई समानता ही नहीं है वो भी तब जब आप लाइन में खड़े होकर टिकट लेना चाहते है | दूसरी तरफ आपने रिश्वत का कारण भी बड़ा हास्यास्पद सा बताया है | तनिक विचार करें- बढती रिश्वत खोरी का कारण गिरती हुई नैतिकता है न कि बढती हुई जनसँख्या | धन-लोलुपता और मजबूरी के अंतर को शायद आपने गौर से समझने की कोशिश नहीं की | ऊपर ब्लॉग में लिखा है एक बार और ध्यान दें मैं आप सुधी एवं प्रबुद्धजन का ध्यान इसी ओर आकर्षित करना चाहता हूँ कि कारण की पहले ठीक से विवेचना तो कर लें | आपके प्रश्न का उत्तर मैं दे दूं मैं आपके द्वारा सुझाये गए किसी भी विकल्प को नहीं चुनूंगा मै ही क्यों कोई भी व्यक्ति नहीं चुनेगा क्योंकि समाधान इतना आसन है कि न तो किसी को धक्का देने की जरूरत है और न ही घूस देने की| आप सीधे ट्रेन के उस डिब्बे में चढ़ जांयें जिसमे टी.टी. हो और उसी से टिकेट बनवा लें कोई समस्या नहीं आयेगी | आप जैसा जानकार व्यक्ति के इस तरह के सवाल पूछने पर मुझे आश्चर्य हुआ यदि कोई नासमझ पूछता तो हैरानी न होती कितनी ही बार आप और हम ऐसा ही करते है| हाँ अगर कोई रिश्वतखोर टी.टी. मिल गया तो वो जरूर आपको गणना करके बताएगा की टिकट का १०० और पेनाल्टी १५० हो गया २५० इससे अच्छा मुझे १५० दो और तुम्हे स्टेशन के बाहर तक पहुँचाने का जिम्मा मेरा| यहाँ पर भी आपको एक कमजोर चरित्र वाला रिश्वतखोर नमूना मिल गया न| मित्र मैंने भी कुछ सवाल पूछे थे आपने एक का भी जवाब नहीं दिया ? आशा करता हूँ कोई तर्कपूर्ण जवाब आपके पास जरूर होगा| मित्र जनसँख्या वृद्धि के दुष्प्रभावों के बारे में जल्द ही लिखूंगा | आपकी टिप्पड़ी का बहुत बहुत शुक्रिया !

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: abodhbaalak

priya chatak g, main computer world men naya hoon, isliye vicharon ko murt rup dene mein aur pehle se moujud maharathiyon ke prahar khane men aur unhe samjhne men waqt lagta hai.khair hamare dehat mein ek purani kahavat hai -sikhat sikhat sikhenege bhar bhar ghonka peesenege.mujhe dukh is baat hai ki aapne apne lekh men ek adne chote se sipahi ko apne nishane par liya hai ,aisa malom pada ki desh ka sara corruption bechara wahi faila raha hai tatha india ka saara rishwat system wahi chala raha hai shayad apne apna pratidwandi bahoot kamjor ko chuna hai kyoki aapme powerfull se ladne ki takat nahi.aapne liokha ki janta majboori men sahan karti hai to bataiye aisi koun si majboori hao jo shivu soren,lalu yadav,madhukoda ,jaise logo kovote dene ko protsahit karti hai.shsyad aapne desh ke kisi sudur gramin anchal ko dekha nahi hai .aaj kya imandari se dhoti kurta pahan kar cycle par ghoom kar election jeeta ja sakata hai ,aur kya aise candidiate ko janta pasand karti hai jise aap innocent kehate hain kabhi aap nagar palika member ka chunav ladkar dekhe ,is desh ki public ki soch se rubru ho jayenge. aap ko nishana sadhna hai ti kisi unchi jagah lagayie . chatak g aisa nahi hai ki men rishwat khori aur corruption ka samarthak hoon .nahi bilkul nahi .lekin tehniyo patto ko todne swe kuch nahi hoga .aaiye jad ko hi khatam kare ........................................lekin iske liye himmat aur sahas cahiye.........khada kabira rah men liye lukati haath jo ghar baare apna so chale hamare saath...................dhanyavad

के द्वारा: sunilrathore

प्रिय जय पंडित जी, देर से जवाब देने के लिए माफ़ी चाहता हूँ| घूस देने के इतने कारण हैं की गिनने लगूंगा तो जागरण जंक्शन का वेब स्पेस कम पद जायेगा| मैं एक आम आदमी हूँ और उसी की जुबान में बस थोड़े में इतना समझ लीजिये- १- क्योंकि बिना घूस लिए कोई झूठ तो क्या सच भी नहीं सुनता | यानी अधिकारी सत्य को सुनने को तैयार हो तो घूस नहीं दूंगा २- क्योंकि बिना घूस लिए किसी अधिकारी के घर की सब्जी नहीं आती| यानी अधिकारी अपनी तनख्वाह से सब्जी मग कर खाने लगे तो घूस नहीं दूंगा| ३- क्योंकि सिपाही मुझे सड़क के किनारे ठेला नहीं लगाने देगा | यानी सरकार मुझे सिर्फ ३ फिट की जगह दे दे उसी किराए पर जो मै हफ्ते की शक्ल में सिपाही को देता हूँ तो घूस नहीं दूंगा| ४- क्योंकि चपरासी दिन भर बीडी और शाम को दारू कैसे पिएगा| यानि चपरासी अगर अपने तनख्वाह से बीडी और दारु पिए तो घूस नहीं दूंगा| जान बूझ कर बहुत से कारणों को छोड़ रहा हूँ क्योंकि दिशा मैंने दे दी है आगे के सारे छोटे बड़े स्टॉप किसी भी व्यक्ति को आसानी से नज़र आ जायंगे| आपकी प्रतिक्रिया ने ब्लॉग के अधूरेपन को पूरा करने में जो सहायता की उसके लिए आपका शुक्रिया मित्र| आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!

के द्वारा: चातक

प्रिय विजेंद्र जी, इतने समय से चल रही इस बहस में आपके इस दृष्टांत का योगदान विशिष्ट है क्योंकि अभी भी ज्यादातर अच्छी सूझ-बूझ और ज्ञान वाल हिन्दुस्तानी इतने भोले हैं कि वे धुल आईने पर हो तब भी अपने ही चेहरे को साफ़ करने का प्रयत्न करते है सबसे पहले आईने (श्वेत-वसन अफसरशाही, न्याय पालिका और राजनीती) की सफाई जरूरी है | जब आईना साफ़ होगा तो हम झख मार कर अपने चेहरे को धोने को मजबूर होंगे| सर्व-विदित है कि दुनिया राजाओं क़ी नक़ल करती आई है भिखारियों की नहीं| आपका दृष्टान्त पुलिस विभाग की ऊपर से नीचे की और बहने वाली रिश्वत की मजबूरी का जीवंत उदाहरण है | एक बार फिर आँखें खोलने वाले उदाहरण को मंच पर डालने का तहे दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: चातक

के द्वारा: vijendrasingh

के द्वारा: chaatak

आदरणीय शाही जी, मेरी प्रतिक्रिया सिर्फ उदाहरण सहित वैचारिक विभिन्नता या कहिये गलत तरीके से एक अप्रमाणिक कथा के आधार पर धर्म और कर्म की व्याख्या से असहमति दर्शाना था लेकिन जैसे ही प्रतिक्रिया का जवाब मिला मुझे भी तुरंत इसी बात का अहसास हुआ कि मुझे पहले नए ब्लागर के तौर तरीकों और भाषा शैली को प्रकट होने देना चाहिए था लेकिन बाद में लगा कि मैं नहीं तो कोई दुसरा वैमस्य का शिकार बनता और बात वाही होती क्योंकि व्यक्ति एक सोची समझी भावना के तहत दो अलग अलग प्रकार की भाषा और शैली बोल रहा है| छोडिये कडवी बातें, आपकी प्रतिक्रिया और लेखन की सराहना एक बार फिर किसी पारितोषिक के रूप में मिली जिन्हें मैं संभाल कर संजो रखूंगा| वैचारिक समर्थन का और एक अच्छी राय देने का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

प्रिय श्री चातक जी, आपके इस ब्‍लॉग ने प्रेरित किया कि आपके द्वारा उल्लिखित विद्वान की ब्‍लॉग पोस्‍ट की खोज करूँ आखिर ऐसा क्‍या है जिसके कारण चातक जी को अपना यह मत प्रकट करना पड़ा । लेकिन पोस्‍ट उनकी मेरी भी कुछ तारीफ पा जाती यदि वास्‍तव में उनका प्रत्‍युतर देने का तरीका बेहतर होता । ऐसा प्रतीत हो रहा है वहां कोई छदम नाम से किसी ओर की भाषा ही बोल रहा है । आपने अच्‍छा किया की संयम रखनें की बात कह दी । अन्‍यथा आपके लेख को पढ़कर ना जानें कितने पाठक उस ब्‍लॉग पोस्‍ट पर तु-तड़ाक कर डालते । यह मंच ऐसा है । जहां सबके अपने विचार सहजता से सभी के सामनें आते हैं । और यहां कोई किसी का घोर विरोधी नहीं हैं । तथापि मन को विचलित कर देने वाली बातें कष्‍ट तो पहूँचाती ही है । तर्क-कुतर्क के बीच की महीन रेखा को लांघने से ही यह स्थिति पैदा हो जाती है । आपकी इस पोस्‍ट के लिए बधाई । लेकिन देरी से प्रतिक्रिया के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ । अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: Arvind Pareek

गफ़लत न हो इसलिये स्पष्ट कर दूँ, मेरी प्रतिक्रिया में किसी लेख या उसपर हुए शास्त्रार्थ की तरफ़ कोई इशारा नहीं है । आपको बता दूं कि उस विवादास्पद सामग्री को मैंने अभी आपको ऊपरवाली प्रतिक्रिया लिखने के बाद खोजकर पढ़ा और प्रतिक्रियाओं पर जवाब की भाषा मुझे भी पसन्द नहीं आई । कुछ लिखना चाह रहा था वहां, फ़िर बुद्धि ने समझाया कि बिल्कुल उचित नहीं है ऐसी छेड़छाड़ । वहां से एक शिक्षा भी लेकर आ रहा हूँ, जिसने आँखें खोल दी हैं । वह यह कि बगैर सोचे समझे जहां तहां अपनी टिप्पणियां जड़ देना कभी भी अपने आत्मसम्मान की ऐसी-तैसी करा सकता है । कम से कम अपने बारे में तो मैंने फ़ैसला कर लिया है कि आज और अभी से जहां-तहां टिप्पणी जड़ते चलने वाली आदत छोड़नी ही होगी । यह कोई वृत्तिका नहीं है कि कोई बहुत बड़ा नुकसान हो जाएगा । ऐसी आत्मसंतुष्टि भी किस काम की जहां आत्मसम्मान ही दांव पर हो । सचमुच चातक जी, बहुत दुख हुआ ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

किसने क्या कहा था इसको छोड़िये चातक जी । अभी जो मुद्दा सामने है, उसमें एक लम्बे समय तक कुछ ऐसा ही महौल चलेगा, जैसे हम किसी गंवई मेले में खड़े हैं, और चारों तरफ़ से लाउड्स्पीकर पर कानफ़ाड़ू संगीत की अलग-अलग आवाज़ें कान से टकराकर एक दूसरे में गड्डमड्ड हो जा रही हैं । सर्कस वाले की अलग, मौत के कुवें वाले की अलग, मिनी चिड़ियाघर वाले की अलग, नौटंकी वालों की अलग और टोरा-टोरा वालों की अलग । इसका भी अपना एक अलग मज़ा है, जिसका आप भी रंग ले रहे हैं । मुझे तो आपके आलेख की शान में ये कहना है कि भूमिका के बाद मैं जिस चीज़ की प्रतीक्षा कर रहा था, उससे 100 नहीं, गिल साहब के शब्दों में 120 परसेंट अधिक प्रभावशाली और उत्प्रेरक पाया । अब जिसको जो कहना है कहता रहे । बहुत-बहुत बधाई ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

प्रिय चातक जी, आपने हिंदू धर्म के संयम, सहिष्णुता और बहुत कुछ को अपने में समो लेने की विशिष्टता को बिलकुल सही ढंग से व्याख्यायित किया जिसके लिए आप निःसंदेह बधाई के पात्र हैं. यकीनन हिंदू धर्म एकात्म मानववाद में भरोसा रखता है और सभी के प्रति सहिष्णु है. किंतु भ्रमवश कुछ लोग इसे कायरता समझने की भूल कर बैठते हैं. कुछ ऐसे तथाकथित उदारवादी हैं जो मनमर्जी की व्याख्या करते हैं और हमारी सहिष्णुता को कायरता के सन्निकट ले जाने में ही अपना गौरव मानते हैं. जैसे एम. एफ. हुसैन द्वारा किया गया कुकृत्य भी कुछ लोगों की दृष्टि में कला और अभिव्यक्ति की आजादी है. और ऐसे ही तथाकथित उदारवादी हमारे विनाश का कारण भी बनते रहे हैं.

के द्वारा: rkpandey

वैसे सच बताऊं मुझे इस लेख की कुछ पंक्तियां बहुत पसंद आयीं हैं । (थोडा असभ्य होने के लिए फिर माफ़ी चाहूंगा) सामने जब किसी की अस्मत लुट रही हो तो तुरंत बलात्कारी की गर्दन काटोगे तभी धरम बचेगा ऐसे में अगर विनम्र होकर प्रार्थना करोगे तो स्वयं गांधी जी उतर कर पचास लाठी मारेंगे और गन्दी वाली गालियाँ भी देंगे कि अपनी कायरता को अहिंसा कहते शर्म नहीं आती! चतक जी की ऐसी असभ्यता देख कर तो जी चाहता है कि वो ऐसी असभ्यताएं रोज भी करें तो किसी को कोई कष्ट नहीं होगा । मुझे तो आनंद ही मिलेगा । रोज़ा रखने वाले, ताजिये रखने वाले और पायक बनने वाले हिन्दुओं की गिनती करोड़ों में होगीए इसलि, नहीं कि इस्लाम सनातन धर्म से अच्छा है बल्कि इसलिए कि सनातन सिर्फ कहते नहीं बल्कि अल्लाह में भी राम को देखते हैं. जहां तक रोजे रखने की बात है तो दिल से मैं रोजा रखना चाहता हूं पर पेटू इतना हूं कि नवरात्र में एक दिन भी व्रत नहीं रख पाता । रामनवमी, जनमाष्टमी और शिवरात्रि पर भी यही हाल रहता है । सच में विधर्मी हूं । पर राह चलते जब किसी मस्जिद से अजान सुनता हूं तो लगे हाथ मैं भी अपने राम और कृष्ण को याद कर लिया करता हूं । लिखना बहुत कुछ चाहता हूं पर अपनी सारी पोलपट्टी खोल दूंगा तो भाई लोग कहने लगेंगे कि बताओ कैसे आदमी को ब्लागस्टार चुन लिया । हा, हा । आजकल व्यंग लिखने में कम टिप्पणी देने में ज्यादा आनंद आ रहा है । आलस के भी अपने मजे हैं । इतनी उबाऊ टिप्पणी पढ़ने के लिये आप सबका आभारी हूं । पता नहीं कितना भार बढ़ गया है अब तक ।

के द्वारा: K M Mishra

के द्वारा: K M Mishra

चातक जी नमस्कार । आप जिन महोदय के ब्लाग की चर्चा कर रहे हैं मैं अभी तक उनको पहचान नहीं पाया हूं । सारी सूचना मुझे आप के ही द्वारा मिली है । आपका ब्लागर बुधुओ से यह मात्र निवेदन ही नहीं है, मैं इसे एक प्रस्ताव की संज्ञा देना चाहूंगा कि हम जागरण जंक्शन परस्वस्थ बहस को ही स्थान दें । बेकार के प्रलापों से न इस मंच का ही भला होगा और और न ही अपना । चार लोग बैठ कर देश और समाज की किसी समस्या पर दिमाग तो जरूर भिड़ायें मगर सिर फुटौवल की नौबत न आने दें । मुझे लगता है कि कभी कभी मैं भी भावनाओं में बह जाता हूं । हम सब को अपने ऊपर थोड़ा संयम रखने की जरूरत है । तर्कों को स्थान देना चाहिये और कुतर्कों से दूरी बनाये रखनी चाहिये .

के द्वारा: K M Mishra

प्रिय मित्र चातक जी सादर वन्देमातरम.. मुझे कभी कभी बहुत ही हंसी आती हैं...क्या करूं? मानव जो ठहरा...माफ़ कीजियेगा भूल हो गयी शायद मैं अपने आपको आदमी कहने वाला था..मानव भी तो सांप्रदायिक है न...क्योंकि उसमे भी मनु जुड़ा हुआ है...बड़ा अचरज होता है यह देखकर की पंथ धर्म की गर्दन कतरने चल चूका हैं ...और इससे जुडी कहानियां भी गढ़ी जा रही हैं...जिसने गीता का चेहरा देखा.. उसने गीता पढ़ लिया और अब वह गीता के आधार पर वेदों और पुराणों की भी व्याख्या करेगा....तुम ताडाम वाली भाषा भी तो ..अध्ययनहीनता की ही परिचायक है ...आप पढ़े लिखों को तो संतुष्ट कर सकते हैं किन्तु बेवकूफों का क्या करेंगे? उन्हें जो ठीक लग रहा है वे कर रहे हैं....शायद उन्होंने ब्रम्ह का दिग्दर्शन कर लिया हैं....अब तो बड़ी भूल हो गयी है ...शायद वे हमें शिष्यत्व भी न दे ...चलिए अगर चार लाख चौरासी योनियों में भटकना ही लिखा है तो भटकते ही रहेंगे ...लेकिन ठीक हो अथवा गलत अपना मार्ग नहीं छोड़ेगें ...अर्जुनस्य प्रतिज्ञे द्वै दैन्यं न पलायनम. वन्देमातरम

के द्वारा: atharvavedamanoj

विजेंद्र जी ! आप शायद मेरे कमेन्ट को समझ नहीं पाए मैंने यहाँ किसी एक को दोषी नहीं बताया है बल्कि दोषी दोनों है क्यूंकि जब हम रिश्वत देते है तभी वो लेते है अगर हम खुद इसके खिलाफ है तो हमे देना ही नहीं चाहिए अतः सरकार द्वारा बनाये गए नियमो का पालन करना चाहिए | और किसी भी कार्य को उसके नियम के अनुसार ही करते हुए ख़त्म करना चाहिए | चातक जी ! अपने बिल्कुल सही बताया कि अगर उस समय उस जगह आम आदमी कि जगह आतंकवादी होते तो सिर्फ नुकसान ही होता | और हाँ विजेंद्र जी अगर आप कहते है कि सिर्फ पुलिसकर्मी दोषी क्यूँ ? तो बताना चाहूँगा कि यदि वो रिश्वतखोर नहीं होता तो कुछ भी हो जाता पर गाड़ी को नहीं छोड़ता तथा उसको सीज जरुर करता | वैसे मैंने एक आम उद्धरण दिया था जो मैंने अपनी आँखों से देखे है | वैसे भ्रष्टाचार लगभग हर जगह है और इसको अगर सुधारना है तो हम किसी और को न सुधार कर अपने आप को सुधार ले तो कुछ भ्रष्टाचार तो कम हो ही जायेगा |

के द्वारा: swatantra nitin

के द्वारा: chaatak

प्रिय श्री चातक जी, इस बार में आपकी इस बात से सहमत नहीं हूँ कि -  - भ्रष्टाचार को सामाजिक स्वीकृति नहीं बल्कि कानूनी स्वीकृति मिली है क्योंकि समाज तो मजबूरी में इसे ढो रहा है क्योंकि वह भ्रष्टचारी को दंड नहीं दे सकता जबकि क़ानून के पास संसाधन और शक्ति दोनों होते हुए भी वह भ्रष्टाचार का पोषक बनकर उसकी रक्षा कर रहा है|  - - क्‍यों, क्‍योंकि कानुन अंधा होता है उसे वहीं दिखता है जो हम दिखाते हैं । मिश्रा जी इस विषय पर ज्‍यादा बेहतर बता सकते है तथापि जो मैं समझ पा रहा हूँ कि शार्टकट अपनानें की चाहत, गलती को छुपानें का मर्ज और साथ में अधिकार की ललक में गलत कर दिखानें का अहम हमें रिश्‍वत की ओर धकेलता है । कानुन तो तब कार्यवाही करेगा जब कोई शिकायत कर उस पर डटा रह सके ।   वैसे लेख अच्‍छा हैं व विचारणीय भी है । हजार टिप्‍पणियों के लिए मेरी भी बधाई स्‍वीकार करें । अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: Arvind Pareek

प्रिय नितिन जी, आपने जो वाक्य बताया वह भी जिम्मेदार लोगों की ही कर्मनिष्ठा पर प्रशनचिन्ह लगता है| यदि सिपाही रिश्वत खोर न होता तो वह कम से कम आपका चालान जरूर काटता और पेपर की अनुपस्थिति में वह गाडी को सीज करता| यहाँ भी आपने रिश्वत खोरी को बढ़ावा नहीं दिया| आपके वाकये को थोडा सा बदल कर देखते है और आप जान जायेंगे कि वास्तव में पैसे देने वाला भी रिश्वतखोरी बढ़ने के लिए जिम्मेदार नहीं है| अब उसी मोटर साइकिल पर आप तीन लोगों की जगह तीन आतंकवादियों को बैठा देते हैं और देखिये वे आतंकी सिर्फ २०० रुपये खर्च करके ताज होटल तक वे कारतूस और बम पहुंचा आये जिनसे न जाने कितने मासूम लोग, पुलिस वाले और सैनिक मारे गए| प्रतिक्रिया द्वारा लेख को एक और आयाम देने के लिए आपका तहे-दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

चातक जी! बिलकुल सही मुद्दे पर लिखा है आपने 'रिश्वत' | लेकिन मेरे ख्याल से सिर्फ रुपया लेना ही रिश्वत नहीं बल्कि किसी को रिश्वत देना भी एक प्रकार की रिश्वत है | अगर हम एक छोटा सा उद्धरण ले की हम तीन दोस्त एक ही मोटर साइकिल से कही जा रहे थे की अचानक पुलिस ने हम लोगो को पकड़ लिया | और पूछा गाड़ी के कागज और डी एल है की नहीं | हमरे पास ये दोनों ही चीजे नहीं होती है | हाला की हम लोगो से ये पूछने की भी जरुरत नहीं है क्यूंकि हम पहले से ही तीन थे जोकि गैर क़ानूनी है | अब हम उनसे प्रार्थना करते है कृपया सर जाने दीजिये थोडा जल्दी में थे तो गाड़ी के कागज घर पर ही भूल गए, जाने दीजिये न सर सर नहीं मानते है वो कहते है गाड़ी बंद होगी क्यूंकि न कागज है न डी एल और तुम लोग तीन भी हो हम लोग फिर प्रार्थना करते है और कहते है सर कुछ ले लीजिये छोड़ दीजिये हमे | बहुत देर बहस चलने के बाद सर जी २०० में मान जाते है और हम लोग २०० देके वहां से निकल लेते है | जब हमने रिश्वत दी तभी उन्होंने ली | दोषी दोनों है हम रिश्वत देकर फायेदा लेते है और वो लेकर | ऐसे बहुत से उद्धरण है भारत में | लेकिन मैं स्वम रिश्वत के खिलाफ हूँ | धन्यवाद |

के द्वारा: swatantranitin

प्रिय मित्र चातक जी जब भी मैं मंच पर आपको कमेन्ट लिखने के लिए आपका नाम टाइप करता हूँ, वह चातक से चटक हो जाता है. वास्तव में आप चटक हो गए हो. इस ब्लॉग के सन्दर्भ में एक पौराणिक घटना याद हो आई...एक बार वेद व्यास जी धर्म की शिक्षा देते देते परेशान हो गए तो उन्होंने दोनों हाँथ उठा कर कहा उर्ध्वबाहुम विरोम्येष न ही कश्चित् श्रुणोति माम धर्मादअर्थश्च कामश्च स धर्मं किम न सेव्यते अर्थात दोनों हाँथ उठा कर कहता हूँ लेकिन कोई मेरी सुनता नहीं है की धर्म से ही अर्थ और कामनाओं की प्राप्ति होती है फिर लोग धर्म का सेवन क्यों नहीं करते... उस समय जब व्यास की बात नहीं सुनी गयी तो हमारी और आपकी बात क्या सुनी जाएगी...यथा राजा तथा प्रजा...राजनैतिक drinhta हो तो शायद काम बन जाये..वन्देमातरम

के द्वारा: atharvavedamanoj

स्नेही पाण्डेय जी, आपका लेखन और लेखन शैली मुझे व्यक्तिगत रूप से बेहद पसंद है| आपकी संतुलित और बेबाक सोच मुझे हमेशा आकर्षित करती है| ये नेता तो सुरसा का मुंह हैं| जब इनका मुंह नहीं भरा जा सकता तो पेट भरने की कोशिश क्यों की जाये? हाँ आपकी राय यहाँ मैं गलत नहीं कह सकता क्योंकि बच्चे को बचाने के लिए कभी कभी पागल कुत्ते को भी हड्डी फेंकनी पड़ती है लेकिन ये सिर्फ आपद्धर्म है इसे सहज नैतिकता का दर्जा नहीं दिया जा सकता| बोटियाँ फेंकते रहिये और मौका आते ही (चुनाव का समय) इन पागल कुत्तों को गोली(सोचा समझा मतदान) मार दीजिये ताकि फिर अगले साल बच्चे (आम आदमी) को बचाने के लिए बोटी न खिलानी पड़े| वैचारिक समर्थन और प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

चातक जी, आपने मुद्दे को संतुलित रीति से व्याख्यायित किया है. सच यही है कि किसी भी प्रकार की अनैतिकता को किसी भी विधि से जायज नहीं कहा जा सकता. परिस्थितियों या समय का हवाला दे के अमूमन अनैतिक कृत्यों को वैधता प्रदान करने की चेष्टा की जाती है और आत्मसंतुष्टि का वातावरण तैयार कर लिया जाता है. अभी एक लेख में मैंने सांसद वेतन वृद्धि को कुछ तथ्यों के आधार पे जायज ठहराया था. उसका मूल कारण ये है कि इन नेताओं की क्षुधा और उनके पेट की आकृति विशाल हो चली है. अगर इन्हें भूखा रखा जाएगा तो अन्य प्रकारों से देश को लूटेंगे. इसलिए एक उम्मीद ये जरूर लगती है कि कम से कम शायद लाखों या करोड़ों में वेतन निर्धारण इन्हें दायित्व बोध करा सके. उचित रीति से मामले को सामने लाने का आपका प्रयास प्रशंसनीय है.

के द्वारा: rkpandey

के द्वारा: rita singh 'sarjana'

के द्वारा: n n tripathi

चातक जी बधाई । आपने एक ऐसी ज्वलंत समस्या पर बहस छेड़ी है, जो समीचीन और प्रासंगिक है । भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के दावानल जिस तरह पूरी आबादी को अपने अन्दर समेट चुके हैं, उसके हिसाब से ये बता पाना कठिन है कि पहले सिपाही अपने को नैतिक बनाते हुए रिश्वतखोरी छोड़ेगा, या वह मंत्री महोदय, जिनकी जेब तक उस सिपाही द्वारा वसूला गया पैसा पहुंचता है । यह समस्या इतनी आसान नहीं है, बल्कि मुर्गी और अंडे वाला झगड़ा है । सिपाही कहेगा कि मैं गरीब इतना पैसा खर्चकर यहां तक पहुंचा, मैं क्यों छोड़ूं? मंत्री जी छोड़ें जो इतने बड़े आदमी हैं । जबकि मंत्री महोदय अपनी राजनीतिक मज़बूरियों और खर्चों की बात करते हुए रोएंगे कि चुनाव में जितना खर्चकर और पीएम सीएम को भारी भरकम चढ़ावा चढ़ाकर मंत्रिपद प्राप्त किया है, उस पैसे का क्या होगा? ग़रज़ ये कि इस मुर्गी अंडे का बस एक ही इलाज़ है, कि बेटे रिश्वत ली, तो फ़ांसी पर लटका दिये जाओगे । फ़िर देखिये क्या होता है । जिन देशों में भी भ्रष्टाचार के लिये मृत्युदंड का प्राविधान किया गया, वहां से भ्रष्टाचार का नामोनिशान मिट चुका है । हम सभी को सारा काम छोड़कर सुबह पांच से साढ़े सात बजे तक आस्था पर बाबा रामदेव के साथ योग करना चाहिये । स्वास्थ्य के साथ-साथ गाहे-बगाहे राजीव शुक्ला जी जैसे देशभक्त विद्वानों से ऐसी-ऐसी दुर्लभ जानकारियां प्राप्त होती हैं, कि मुंह खुला का खुला रह जाता है ।

के द्वारा: R N Shahi

मित्र चातक जी आपने एक सत्य को शब्दों के माध्यम से मंच पर उतारा है ........सच है की पुलिस कर्मचारी रिश्वत लेते है .....?लेकिन मेरी नजर में उनकी मजबूरी घर के अलावा भी है जैसे मेरी जानकारी अनुसार एक सिपाही को बहाली के समय लगभग तीन लाख रूपए रिश्वत के रूप में देना होता है जब वो नौकरी कर रहा होता है तो उसे थाने पर उसकी ड्यूटी के हिसाब से(कहा ड्यूटी लगेगी व्यस्ततम चौराहे पर जहा अच्छी कमाई हो) थाना प्रभारी को रिश्वत देना होती है कोई छोटी मोती गलती हो जाये तो विभागीय जांच में निलंबन के खतरे से बचने के लिए रिश्वत देना होती है अगर अच्छे थाने पर बहाली चाहिए तो रिश्वत देना होती है तबादला हो जाये तो रुकवाने के लिए रिश्वत देना पड़ती है ........यहाँ में एक सिपाही की कहानी लिखी है प्रत्येक थाने(थाना प्रभारी) को एक मोटी रकम ऊपर तक देनी होती है जो की विभिन्न माध्यमो से गृह मंत्रालय तक जाती है अधिकारीयों के खर्चे भी थाना प्रभारियों को वहन करना होते है उपरोक्त बात से सिद्ध होता है की पुलिस कर्मी रिश्वत नहीं लेता बल्कि मजबूर कर दिया जाता है हमारे नेताओं द्वारा ........एक मुख्यमंत्री और गृहमंत्री चाहे तो रिश्वत बंद हो सकती है .....................?

के द्वारा: vijendrasingh

आदरणीय चाचा जी, आपने शायद ध्यान नहीं दिया मैंने एक अदना से पुलिस वाले से लेकर सांसदों तक पर भ्रष्टाचार की समानता सबसे पहले लिख दी है| ध्यान दें [वैसे मैं यहाँ सिर्फ पुलिस विभाग पर ही बात को केन्द्रित करना चाहूंगा '(सांसदों की वेतन-वृद्धि पर भी ये सामान रूप से लागू होता है)]' आपकी इस बात से मैं भी इत्तेफाक रखता हूँ कि इसे जड़ से समाप्त करना है क्योंकि भ्रष्ट पुलिस वाला या सांसद नहीं बल्कि सरकारी पद और रुतबा पाने वाले लोग हैं| पुलिस और सांसद तो सिर्फ पहचान के लिए दो नाम भर हैं बात तो इंसान के ज़मीर की हो रही है और जिम्मेदारी उन पर ज्यादा है जो सार्वजनिक सेवा में हैं| लेख पर विचार देने का शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

बहुत खूब चातक जी............ आपकी इस बात से मैं पूरी तरह से सहमत हूँ की किसी भी पुलिस वाले की तनख्वाह इतनी कम नहीं कि वह अपने परिवार का अच्छी तरह से भरण पोषण करते हुए भी एक अच्छी खासी बचत न कर पाए........... और मैं ये भी कहता हूँ की पुलिस वालों के हालातों पर मैंने भी एक लेख में पुलिस की तुलना (भ्रष्टाचार के क्षेत्र में )एक सरकारी बाबु से की थी .......... पर मैं इस बात से पूरी तरह इत्तफाक रखता हूँ की भ्रष्टाचार को किसी भी तरह से तर्क सम्मत नहीं ठहराया जा सकता है........ और जहा तक आपका ये कथन है की .......... एक ऐसी नौकरी जो धन कमाने की आपकी लालसा को पूरी नहीं कर सकती उसकी भरती में आप जाते ही क्यों हैं? क्या इसलिए नहीं कि आप पहले से ही हराम की कमाई की और आकर्षित होते हैं? तो मेरा ये मानना है की अधिकतर सरकारी जोब्स के लिए आवेदन करने से पूर्व लोग ऊपर की कमाई का आकलन कर लेते हैं............ और या फिर रुतबा............. इन दो के कारण ही इन जोब्स की मारा मारी है.......... अच्छा और सार्थक लेख .............. हार्दिक बधाई.....................

के द्वारा: Piyush Pant

प्रिय अनाम जी, आप को अगर लगा कि न्याय की फ़रियाद है तो भी किसी एक तरफ से जरूर खेलें न खेलें तो तटस्थ होकर तेल देखें और तेल की धार देखें | विचार सत्य हो या असत्य या सिर्फ अर्धसत्य विचारों की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता| आप का जीवन को देखने का नजरिया सही हो सकता है वैसे ही दूसरों का भी सही होने की गुंजायश है| एक विधर्मी होने के नाते ईश्वर, अल्लाह या यीशु कुछ करेंगे मुझे इसकी कोई गुंजायश नहीं दिखती लेकिन मेरी फरियाद एक इंसान के कानो तक पहुँच जाए तो वह जरूर कुछ न कुछ करेगा इसका विश्वास है मुझे| आप जिस तरह भी मानवता को आगे बढ़ाने, न्याय स्थापित करने का प्रयास करना चाहते हो करें और जो दुसरे जिनका तरीका आपसे अलग है उन्हें भी करने दें जिस भी विधि से मानवता स्थापित हो सके लाभ तो सभी को होगा| आपके विचार जानकार ख़ुशी हुई | मानवता स्थापित हो यही कामना मेरी भी है| आमीन!

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: manoj5485

के द्वारा: shishusharma

इस चर्चा में शामिल सब भाइयो और बहनों को आदाब, प्रणाम, सत श्री अकाल....................सबसे पहले बता दू की मैंने अपना नाम यहा पे क्यों नही लिखा ........ये नाम जो है न सारी समस्याओ की जड़ है.......जब आज इस चर्चा को पढ़ रहा था तो साफ लग रहा था की जो भी भाई-बहन यहा चर्चा में भाग ले रहे थे सब का मकसद तो एक था इस खेल को खेलना ( न्याय की बात करना )...........पर जीत सब अपने-अपने गोल-पोस्ट में दिख  रही थी ...........किसी को ७४ याद है, कोई बाबरी को नही भूल रहा.......गोधरा के घाव तो अब तक भरे भी नही है......संसद पे हमला कल ही तो हुआ था.........और ताज से तो अब अब भी गोलियों की आवाज़ आ रही है.................तो मुझे समझ में नही आया की मै किस की तरफ से खेलू , फिर ये समझते-समझते की मै किस तरफ से खेलू ये समझ में आया की ..............हमारे देवी-देवता, अल्लाह , वाहे गुरु जी और यीशु मिल क एसा कुछ क्यों नही करते की मेरी वाली समस्या इस दुनिया के हर इंशान को हो जाय..........ताकि दुनिया की बहुत सारी समस्या अपने आप खत्म हो जाय............आमीन

के द्वारा: ANAM

के द्वारा: deepika

चातक जी बधाई । चन्द लाइनों में समसामयिक स्थितियों की विद्रूपताओं को प्रदर्शित कर एक बार फ़िर आपने अपने काव्य लेखन का झंडा गाड़ दिया । जिन अभिव्यक्तियों के लिये कई-कई पृष्ठ रंग कर भी पूरे नहीं पड़ते, उन्हें गिनी-चुनी पंक्तियों में समेटकर विस्तार दे पाना कोई ठट्ठेबाज़ी नहीं है । आपके द्वारा निरंतर इस प्रकार का सृजन होते रहना शायद समय की मांग भी है । आपकी रचना को पढ़कर पता नहीं कैसे आज़ादी के पूर्व के उन कवियों-लेखकों की कहानियों का स्मरण हो आया, जिन्होंने इसी प्रकार की लाइनें गढ़कर उस ज़माने में जब कि संचार और सूचना का इतना साधन भी नहीं हुआ करता था, समाज को झकझोरकर अनगिनत आज़ादी के दीवानों और क्रांतियों का सृजन किया था । आपकी लेखनी चलती रहे, बढ़ती रहे … साधुवाद ।

के द्वारा: R N Shahi

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: Prabhakar

के द्वारा: sushil

स्नेही शाही जी, मैं यूँ ही आपका फैन नहीं बन गया हूँ आपके लेखन को पढ़ते समय मैं पूरी तरह से आपके विचारों और सोचने के तरीके में पहुँचने की कोशिश करते हुए कई बार एक अंतर्दृष्टि देखता हूँ| शायद पढने का मेरा और आपका तरीका एक ही है| मुझे सिर्फ तीन क्रांतिकारियों को साथ लाना था लेकिन मैंने चार सीट की व्यवस्था की उसका कारण यही था कि कोई भी व्यक्ति जो मेरी तरह पढता हो उसे स्थान की कमी न हो और वह कहानी में हर एक घटना का खुद गवाह बन सके | आपकी टिप्पड़ी ने मुझे आश्वस्त किया कि फैक्ट्स एंड फिक्शन ब्लेंडिंग में, पाठक को अपने साथ जोड़ने का मेरा ये नया प्रयोग सफल रहा | आपने मेरी इतनी प्रशंसा की आप समझ सकते हैं कि आप खुद जिसके फैन हो वो ही आपको इतना सम्मान दे तो ख़ुशी किस हद तक होती है| आज आपसे एक और अविस्मरणीय ईनाम प्राप्त हुआ | सब वाग्देवी शारदा की कृपा है| प्रतिक्रिया का तहे दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

चातक जी बधाई । लेकिन बधाई के ये तीन शब्द लिखना कंजूसी ही नहीं मक्खीचूसी होगी । मैंने क्लिक करते हुए उम्मीद लगाई थी कि फ़िर कोई नई फ़ड़कती हुई सी गज़ल या ऐसा ही कुछ ज़ेहन को तरोताज़ा करने के लिये सामने होगा । पंक्तियों की बजाय गद्य सा कुछ देखकर प्रथमदृष्टया सोचा कि शायरों का क्या ठिकाना, यूँ ही कुछ फ़ितूर चर्रा गया होगा । मुझे क्या पता था कि आपकी बहुमुखी प्रतिभा के एक नए आयाम से साक्षात्कार होने जा रहा है । हो सकता है पुराने साथियों ने आपका यह रूप भी देखा हो, मेरे लिये एक नए चातक से परिचय था । एक सुलझा हुआ, संवेदनशील और विचारक चातक, जिसकी कल्पनाशीलता की कोई सीमा नहीं है । मुग्ध सा पढ़ते-पढ़ते मुझे रश्क़ भी हुआ, जब आप कोठरी से तीनों को लेकर बाहर मशीन की ओर चले । बर्दाश्त नहीं हुआ कि शहीदों के लिये तो सीटें क्रियेट कीं, और यहीं बगल में खड़ा मैं नहीं दिखा आपको! अब उन महात्माओं को छूने की हिम्मत तो पड़ी नहीं, सो आपको ही थोड़ा धकिया कर बगल में बैठना पड़ा था । आपको इस लिये पता नहीं चल पाया क्योंकि टाइम से परे की बात थी । ऐसा है आपकी लेखनी का जादू । अब समझ में आया कि बाजपेयी साहब आखिर आपकी इतनी तारीफ़ क्यों किया करते हैं । आपने मेरी किसी प्रतिक्रिया के जवाब में रोहिणी के हवाले से लिखा था कि आप मेरे फ़ैन हैं । तो फ़िर मैं आपका क्या हो सकता हूँ? मैं कलम ज़रूर घसीट लेता हूँ, कोई गज़ल कविता तो नहीं लिखी जाती । आप तो हर महफ़िल के उस्ताद निकले । मैं आपका फ़ैन नहीं चातक जी, कूलर… नहीं-नहीं, एसी हूँ आपका, एसी!

के द्वारा: आर.एन. शाही

ए चातक, क्या यही दिखाने ले कर आया था हमें इस आज़ाद हिन्दुस्तान में ?.. क्यों चातक जी क्यों लेकर आये आप उन महान लोगों को आज के भारत में... कम से कम अब तक तो वोह यही सोचते होगे की उनका भारत देश आजाद होकर बहुत सुखी है... अपना जीवन तो उन्होंने देश को समर्पित कर दिया मगर अब उनकी आतमा देश के भविष्य को लेकर चैन सा न बैठ पायेगी ... आज ऊपर वह सब महान लोग रो रहे होगे देश का ये रूप देख कर..... हम सब को इस पर गंबीर रूप से सोचना ही नहीं होगा बल्कि मिलजुलकर कुछ करना भी पड़ेगा ताकि उन महान लोगों की आत्मा को शांति मिले ... शहीदों के भावों को समझने और समझाने का एक सार्थक प्रयास....... धन्यवाद चातक जी ... बढ़िया प्रयास के लिए ...

के द्वारा: roshni

के द्वारा: ydubey

के द्वारा: Dinesh Prakash Singh

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: madhvam pandey

सुधी वी० एस० जी, आपकी कमेंट्स के लिए और कविता पसंद करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया! अगर आपको किसी बिंदु विशेष पर किसी तरह के जवाब या तर्क की आवश्यकता है तो कृपया उसके लिए एक ब्लॉग लिख कर जागरण मंच पर डाल दे सभी दिलचस्पी लेने वाले लोगों की राय आपतक पहुँच जायेगी| अगर आप मेरी व्यक्तिगत राय चाहते हैं तो कृपया मेरी मेल id पर अपनी शंकाएं भेज दें आप को जवाब जरूर मिल जाएगा क्योंकि मैं किसी भी प्रश्न को अपनी सामर्थ्य भर अनुत्तरित नहीं छोड़ता| अगर आप एक बुजुर्ग व्यक्ति हैं तो आपसे एक पूर्वाग्रह रहित चिंतन की अपेक्षा है अगर आपने विभाजन अपनी आँखों से देखा है तो मेरे पास भी आपके लिए बहुत से प्रश्न हैं क्योंकि मैं विभाजन के समय आपकी सोच और प्रतिक्रियों के बारे में जानना चाहूंगा- मेरी id है- krishnotcrisp@gmail.com

के द्वारा: chaatak

चातक जी ,, एक अच्छी कविता लिखी आप ने, मैं आप की लेखनी का कायल हु , परन्तु manoj mayak जी के ज़हरीले लेखो पर आप की टिप्पणियो ने विचलित कर दिया था,, मैंने एक sawal छोड़ा था परन्तु जवाब ना मिला ,, ummed है आप अब जवाब देंगे..... तिप्पिनी थी ------- चातक जी ,, बस एक बात बताइए ,, क्या वजेह है की इसाई और मुस्लमान दोनों धर्म नए होने के बावजूद (२०१० साल और १४०० साल उम्र है इनकी) पूरी दुनिया में फैल गए और आज भी पूरी दुनिया में फैल रहे है (आप यह आरोप नहीं लगा सकते की यह काम तलवार या लालच के बल पर हो रहा है) जबकि हिन्दू धर्म सब से प्राचीन होने के बावजूद दिन बा दिन सिकुड़ता जा रहा है ,, खुद इस धर्म के मानने वाले ही नास्तिक होते जा रहे है ,, इस का कारन है इस में व्याप्त कुरीतिय जैसे भेद भाव , जाती पाती आदि ,, आज भी हरिजन को अपमानित होना पड़ता है ,, लोग उसके हाथ का खाना तक नहीं खाते शायद कुछ दिन पहले आप ने समाचार देखा ही होगा !! दलित महिलाओ का आये दिन समाचार आता है ,, तो क्या यह ज्यादा ज़रूरी नहीं था की हम हिन्दू समाज में सुधार करे ताकि लोग इस तरफ आकर्षित हो ना की किसी धर्म को लेकर बिना सन्दर्भ या आगे पीछे देखते हुए अपमान करे ,, मैंने पूरा मंच छाना परन्तु किसी भी मुस्लिम या इसाई द्वारा हिन्दू धर्म को अपमानित करने वाला लेख नहीं पाया,, क्या हमारे इतिहास या धर्म ग्रन्थ में कोई ऐसे घटनाएं नहीं है परन्तु एक सभ्य समाज को यह शोभा नहीं देता है की ऐसे लेख लिखे जिससे नफरत पैदा हो ,, यदि आप के मित्र कोई मुस्लिम बंधू हो तो मुझे बताये की नाम और पूजा पद्दति के अलावा आप उनमे क्या अंतर पाते है स्वयं से ,, वह भी जीवन यापन के लिए संघर्ष कर रहे है ,, बेरोज़गारी से . भ्रष्टाचार से त्रस्त है ,, साधारण व्यक्ति सब सामान ही है ,, दंगे आदि में तो मुस्लिम के साथ साथ हिन्दू में हैवान बन जाते है फिर एक तरफ़ा बात क्यों, आप ने शायद मेरठ का हाशिमपुरा काण्ड सुना होगा जब ४० मुस्लिम नवजवानों को पुलिस ने गोली मार कर नदी में फेक दिया था ( आप इन्टरनेट पर सर्च कर सकते है ), या अभी हाल में एक हिन्दू लड़के को उत्तराखंड में पुलिस ने फर्जी मुत्भेद में मार दिया था, सोब्रबुद्दीन से साथ साथ तुलसी प्रजापति भी फर्जी मुत्भेद में मारा गया क्या कभी उसके परिवार के बारे में सोचा गया ,, कहने का मतलब यह है की मुस्लमान भी आम भारतीयों की तरह है और व्यवस्था के शिकार है !! तहेल्का के टेप आप ने देखे होंगे ,, बंगलोरे के विडियो देखे होंगे क्या यही हिंदुत्व है क्या यह ही हिंदुत्व के असली पैरोकार है,, क्या इस से हिन्दू धर्म की छवि खराब नहीं होती है ,, एक सच्चा हिन्दू होने के नाते हमारा फ़र्ज़ है की हम देखे की हमारी छवि दुनिया में क्या बन रही है ,, मैंने तो विभाजन को देखा है और उम्र के आखरी पड़ाव पर हु परन्तु मेरा अनुभव यही है नफरत से नफरत बढती है ,, आप किसी को एक गाली दीजिये गा वह पलट के दो देगा फिर आप चार वह छे यह सिलसिला कभी ख़त्म नहीं होगा ,, इस से अच्छा है की खामोशी से खुद को अपने धर्म को और समाज को मज़बूत किया जाए !! यदि आप लोगो को कोई बात बुरी लगी हो तो बूढ़ा समझ कर माफ़ कर देना ,, परन्तु मेरी बात पर एक बार गौर ज़रूर करना विजय शंकर श्रीवास्तव के द्वारा: VS

के द्वारा: VS

सोनी जी, इस मुद्दे पर कोई अशोभनीय वाद विवाद यहाँ न हो मेरी सिर्फ इतने कोशिश है क्योंकि इस मंच पर अनर्गल बातों से सिर्फ कुंठित मानसिकता ही झलकेगी और कुछ नहीं होगा| वाताविकता ये है कि आने वाले फैसले से दोनों ही कौमों के लोग किसी तरह के न्याय की आस नहीं लगा पा रहे हैं प्रत्येक को यही लग रहा है कि वह ठगा जाने वाला है, जबकि मेरी सहज बुद्धि कह रही है कि ऐसा कुछ नहीं होने वाला मुद्दे का समाधान जितना मुश्किल आज तक दिखाया जा रहा था वास्तव में है नहीं न्याय किया गया तो किसी को कोई कष्ट होने वाला नहीं न ही कोई असंतुष्ट बस कुछ गंदे लोगों की राजनीति ख़तम हो जायेगी | एक दूसरा पहलू ये हो सकता है कि न्याय के स्थान पर फैसला हो ऐसे में भी डरने की या बहंस की जरूरत नहीं जान पड़ती क्योंकि न्याय स्वयं को स्थापित करना जानता है | ये जानकार अच्छा लगा कि आपने तटस्थता का परिचय दिया उम्मीद है कि लोग आपसे सीख लेंगे| जय हो!

के द्वारा: chaatak

राजिंदर कौर जी, आप नाहक ही अपने दिल में मलाल लिए बैठी हैं आप तथ्यों को छिपा के बात करती हैं और उस पर अड़ जाती हैं तो अच्चा नहीं लगता| ८४ के दंगों में सिक्खों के ऊपर अन्याय करने वालों को हिन्दुओं ने कभी जायज नहीं ठहराया | इतिहास साक्षी है कि आम जनता चाहे वो किसी भी धर्म की अनुयायी हो अतातई नहीं रही है जब कभी भी कौम के विरुद्ध या धर्म के नाम पर दंगे हुए हैं तो वो महज इसलिए कि जनता गंदे राजनेताओं की गन्दी राजनीति के हाथों कठपुतली बनी | अगर दंगों में सिक्ख मारी गए तो उकसावा और संरक्षण किसने दिया ? कांग्रेस ने अगर आप सिखों की सही पक्षधर हैं तो क्यों मनमोहन सिंह के विरुद्ध लामबंद होकर आन्दोलन करती हैं (ब्लॉग ही लिखो) | क्यों खुले आम इस मंच पर नहीं कहती कि मनमोहन ने सिखों का खुलेआम क़त्ल करवाने वाली कोंग्रेस के हाथों सिखों का मातम तक बेच डाला सिर्फ प्रधानमन्त्री बन्ने की खातिर | बहन पहले अपने घर में बैठे विभीषनो की और देखो जो इतिहास में नहीं वर्तमान में हैं और अपने निहित स्वार्थ के लिए फिर आपको गुमराह कर रहे हैं| ८४ की शर्मनाक कत्लोगारत के लिए हिन्दू नहीं बल्कि कांग्रेस जिम्मेवार हैं जिसकी पूँछ पकडे आज भी मनमोहन पता नहीं क्या-क्या हिला रहे हैं | अच्छा लगेगा अगर आप सार्थक बहस को आगे बढाएँ और पूर्वाग्रहों को छोड़ कर इंसान की बात करें ख़ास कर उस ब्लॉग पे तो जरूर जिसपर धर्म की नहीं एक नारी के सम्मान और उसके लिए न्याय की बात कही गई हो | प्रज्ञा को रिहा करने या उसपर से अभियोग हटाने की नहीं मैंने उसे न्याय देने की बात कही है इतनी बात तो समझ में आती होगी आपको | कृपया पूर्वाग्रह त्यागें |

के द्वारा: chaatak

Syeds जी, हमारे देश में एक बी एस एन एल नाम की टेलीकाम कंपनी है जो पूरे इंडिया को कोन्नेक्ट करती है सिर्फ इसके लैंडलाइन पर डायल टोन और मोबाइल में नेटवर्क हो तो | हमारे शहर में पिछले पंद्रह दिन से अधिकतर लैंडलाइन पर डायल टोन नहीं था जिसमे से एक नंबर मेरा भी था जिससे मैं नेट कनेक्ट करता हूँ , काफी दिनों बाद ईश्वरीय कृपा से, जिसमे बी एस एन एल का कोई दोष नही, डायल टोन आ गई है इसलिए मौके का फायदा उठा के एक ब्लॉग लिख मारा कि कहीं मेरे ब्लोगर दोस्त मुझे भूल न जाएँ| आप दोस्तों से दूर इतनी जल्दी जाने वाला नहीं मैं क्योंकि आप लोगों को छोड़कर मेरा तो कोई दोस्त भी नहीं, और अकेले रहना शायद सबसे बड़ा अभिशाप है| कहानी पर प्रतिक्रिया का शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

माफ़ी चाहता हूँ, पर आपलोगों के बहस से तो यही साबित होता है की आप सभी के पीछे अपना स्वार्थ छिपा है, आपलोग किस देशभक्ति की बात कर रहे है, उस देशभक्ति की बात कर रहे है जहा अपना उल्लू सीधा करने के लिए लाखो बेक़सूर को मौत की बलि चढ़ा दी जाती है, जहा जाती के नाम पे लाखो बेगुनाह को मर कर उसका सब कुछ बर्बाद कर दिया जाता है, जहा जाती के नाम पे जानवर की तरह आपस में लड़ते है, यहाँ तक की ये भी भूल जाते है की कल तक जो मेरा पडोसी या दोस्त था वो मेरे भाई या परिवार की तरह था. आज आपलोग बड़ी बड़ी बाते कर रहे है उस वक्त आपलोग कहा थे जब १९८४ में किसी दो कसूरवार की वजह से कितने बेगुनाह को मौत के घाट उतर दिया गया, उस वक्त आपलोग कहा थे जब बाबरी माजिद को तोडा गया, उस वक़्त आपलोग कहा थे जब कश्मीर में पंडितो को मारा जा रहा था, और आज भी धर्म और मजहब के नाम पर ये सब हो रहा है, सच को पर्दा डालना बहुत आसान है पर सामना करना बहुत मुस्किल है, आज कोई इन्सान अपनी मौत से भी मर रहा है तो लोग उसे आतंकवादी का ही नाम दे रहे है, अरे मेरे भाई यदि आतंकवाद को ख़त्म करना है तो पहले अपने घर के अन्दर झांक कर देखो फिर पता चलेगा की आतंकवाद कहा से पैदा हो रहा है, बापू जी ने सही कहा था की जातीयता भारत की सबसे बुरी चीज है और यही इसे एकदिन निगल जाएगी, जिस तरीके से आपलोगों की बहस चल रही है उसमे ये सारी बाते छिपी हुयी है, एक दुसरे से लड़ने के वजाए एक दुसरे को समझाने की जरुरत है, मेरे निचे लिखे बातो पर जरा गौर करे,, १ - प्रज्ञासिह ( किसी मुस्लमान, किसी सिख या किसी ईसाईं के कहने पे पोलिसे उन्हें परेसान नहीं कर रही है) २ - अफजल और कसाब ( किसी मुस्लमान, किसी सिख, किसी हिन्दू या किसी ईसाईं के कहने पे पोलिसे उन्हें बिरयानी नहीं खिला रही है) कृपया ध्यान दे की मेरा कहने का मतलब क्या है, यदि आपलोगों को दुख पहुँचाने जैसी कोई गलत शब्द लिख दिया हो तो माफी चाहता हूँ, जय हिंद, जय भारत मुझे गर्व है की मै हिन्दुस्तानी हूँ.

के द्वारा: binaym

राजिंदर कौर जी मैं आपकी भावनाओं की क़द्र करता हूँ और जो १९८४ में हमारे देश की प्रधान मंत्री की किसी सिक्ख द्वारा हत्या के बाद हुए नरसंहार की जितनी निंदा की जाये उतनी कम होगी हिंसा किसी व्यक्ति विशेष के साथ हो या वर्ग विशेष के साथ न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता लेकिन आपने लिखा है की कोई सरदार अगर पकड़ा गया तो वो आतंकवादी ही कहलायेगा ये बात बिकुल असत्य है मैं कहना चाहूँगा की यदि कोई व्यक्ति खालीस्थान समर्थक है जो की देश विरोधी गतिविधियों में शामिल है तो वो चाहे हिन्दू हो मुसलमान हो सिक्ख हो या ईसाई हो वो सिर्फ आतंकवादी है क्यूंकि यहाँ पर ऐसे व्यक्ति की बात चल रही है जो देश विरोधी गतिविधियों में शामिल था इस लिए वो मुसलमान नहीं था वो सिर्फ आतंकवादी था सिक्खों के विरुद्ध १९८४ के बाद कोई हिसा नहीं हुई है उस समय की हिंसा के लिए जो जवाबदार है जैसे सज्जन कुमार जो की कानून का सामना कर रहे हैं आपको बताते हुए मुझे खुशी है की आप जिन्हें अल्पसंख्यक कहती हो तो हमारे सम्माननीय प्रधानमंत्री एक सिक्ख हैं और हमारे उप राष्ट्रपति एक मुसलमान हैं

के द्वारा: vijendrasingh

चातक जी , जब तक देश में तुस्टीकरण की राजनीती होती रहेगी हम और आप जैसे लोग इस तरह चर्चा करते रहेगे.देश मे लगातर आतंकवादी घटनाये हुए और उसमे जयेदातर आतंकवादी मुस्लिम समाज के पकरे गए और कई को सजा भी हुई पर कभी भी मुस्लिम आतंकवाद का नाम नहीं आया मिडिया में पर जैसे ही साध्वी प्रज्ञा और पुरोहित पकडे गए तुरंत ही हिन्दू आतंकवाद का नारा सामने आ गया और एक नयी बहश चिद गए .बिना जाने समझे यहाँ तक की कयियो के सम्बन्ध पाकिस्तान से भी जोड़ दिए गए .यह तो चमत्कार है कांग्रेस सरकार का यदि हम समय रहते नहीं चेते तो ऐसे ही प्रज्ञा ठाकुर जैसे साध्वियो को करावश में ठेल दिया जायेगा और गिलानी ,अफजल जैसे लोग चंडी कटेगे

के द्वारा: jagojagobharat

यह बहस कभ ख़तम न होगी, हमारे देश में आतंकवादी , देश द्रोही सब सिर्फ अल्पसंख्यक ही हो सकते है ,, और कोई नहीं १९८४ में २ लोगो की गलती के सजा पुरे भारत में सरदारों को दी गयी उनकी बहु बेतिओ की इज्ज़त लूटी गयी ,, जिंदा जलाया गया फिर भी kisi को आतंवादी नहीं ठराया गया ,, न उसको धर्म से जोड़ा गया ,, अभी भी कोई सरदार पकड़ा गया तो आतंकवादी के नाम से ही अखबारों में खबर आये गी लेकिन यदि वह प्रज्ञा हो, दयानंद पाण्डेय हो ya capt पुरोहित, या इन्द्रेश इनको कोई आतंकवादी नहीं कह सकता ,, यह तो देश भगत है jo देश के उत्थान के लिए, और देश को बचने के लिए सब कर रहे है,, यह देश द्रोही कैसे हो सकते है यह कोई सिख, मुस्लमान थोड़े है... इन पर तो फूल बरसाए जाते है

के द्वारा: Rajindir Kaur

माफ़ करियेगा में दुबारा आप लोगों की बहस में शामिल हो रहा हूँ मैने मेरे जवाब में ऐ.के४७ का जिक्र किया है तो सोहराबुद्दीन के कुए से एक बन्दूक बरामद नहीं हुई थी ८ रायफलें बरामद हुई थी तब उसके रिश्ते "डी" कंपनी के साथ भी उजागर हुए थे ,गत वर्ष सोहराबुद्दीन के बहियों ने नीलगाय का शिकार किया था नामजद रिपोर्ट होने के बावजूद पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं कर सकी क्यूंकि सोहराब का एक भाई रुआबुद्दीन एक वकील है जो आये दिन झूठी शिकायत करता रहता है की मुझे और मेरे परिवार को एम्.पी और गुजरात की पुलिस मिलकर मारना चाहती है गुजरात हाइकोर्ट के निर्देश पर परिवार के सभी सदस्यों को गार्ड मिले हुए हैं पिछले माह ही सुप्रीम कोर्ट ने सोहराबुद्दीन के परिवार को दस लाख रुपये अंतरिम मुआवजा मंजूर किया है में ये कहता हूँ गलत हुआ तभी तो आई.पी.एस स्तर के छह अधीकारी आज सलाखों के पीछे हैं भले ही उन्होंने एक अपराधी को क्यूँ ना मारा हो ऐसा तो सिर्फ भारत में ही संभव है !और ऐसा हो ही नहीं सकता कि सोहराब कि पत्नी उसके गुनाहों में शामिल न हो,मेरा इरादा किसी कि भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है क्यूंकि मै एक आम जागरूक भारतीय हूँ इसलिए यहाँ जवाब देने से अपने आपको रोक नहीं पाया !

के द्वारा: vijendrasingh

चातक जी, आपने बिल्‍कुल सही मुददा उठाया है। अक्‍सर कुछ महिला संगठन या खुद को नारी अधिकारों का झंडाबरदार बताने वाले लोग इस मुद़दे पर बिल्‍कुल चुप हैं। साध्‍वी प्रज्ञा के प्रकरण पर सब की आंखों पर पट़टी चढ गई है। इस मुद़दे पर किसी की मुंह खोलने की हिम्‍मत नहीं हो रही। ऐसे लोग सिर्फ अपनी प्रसिदिध से ही वास्‍ता रखते हैं । उनकी सोच व्‍यापक नहीं होती। इस मामले में सोहराबुद़दीन की पत्‍नी कौसर बी की भी बात उठी तो आपकों बता दूं कि सोहराबुद़दीन के बारे में जितना मैने पढा सुना है तो उससे पता चला कि जिस दिन सोहराबुद़दीन को मारा गया था, उस दिन गुजरात में हिंदू ही नहीं बल्कि मुस्लिम व्‍यापारियों व दुकानदारों ने खुशी में लडडू बांटे थे। खैर इतना जरुर है कि हमें अदालत के फैसले का इंतजार करना होगा लेकिन फिर भी खुद को नारी हितों की रक्षा करने वाले के रुप में महिमामंडित करने वालों की चुप्‍पी वाकई निराशाजनक है। अगर कल को साध्‍वी प्रज्ञा बेकसूर साबित होकर बाहर निकल आई तो तब ऐसे झंडाबरदार निश्‍चय ही किसी न्‍यूज चैनल की परिचर्चा में भाग लेकर ना‍री अधिकारों, मानवाधिकारों जैसे तमाम लफ्‍जों की व्‍याखा करते नजर आएंगे।

के द्वारा: Manish Sharma

चातक जी भारतीय न्याय ब्यवस्था में अगर एक के अपराध के सजा रिश्तेदारों को देने की ब्यवस्था होती तो शायद वोह पुलिसवाले और अमित शाह जैसे लोग कभी गिरफ्तार नहीं होते. आप फिर से धयान देकर देख लें. हाँ उसकी गैरकानूनी/कानूनी तरीके से कमाई हुई सारी चीज़ ज़रूर कुर्क कर लेते हैं जो सही है. रिश्तेदारों को ज़रूर हिरासत में लेते हैं ताकि अपराधी को पकड़ सकें, लेकिन उसके बदले में किसी दुसरे को सूली पर नहीं चढ़ाते. और एक बात वोह गुंडा था, पैसे वसूल करता था, कातिल हो सकता है (क्यूंकि मुझे उसके क़त्ल की जानकारी नहीं है) लेकिन आतंकवादी और देशद्रोही की बात तो पोलिस वाले भी नहीं कर रहे हैं. और आप ने सही कहा मैं भी न्याय का साथ दूंगा पूरी तरह से. हम एक हैं.

के द्वारा: jalal

जलाल जी, कौसर बी यदि क़ानून की गिरफ्त में होती तो मैं जरूर ये चाहता कि उन्हें न्याय मिले बल्कि अगर वो एक देशद्रोही की पत्नी थीं तो उन्हें नहीं बल्कि राष्ट्र को न्याय एवं उन्हें सजा मिले| प्रज्ञा के ऊपर आरोप लगाए गए और उन्हें हिरासत में लिया गया इस पर भी कोई ऐतराज़ मैंने नहीं जताया है लेकिन जिस साहस के साथ वो अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों का सामना कर रही हैं मुझे वो काबिले तारीफ़ लगा| प्रज्ञा को हिरासत में लेने वाली फूटेज तो आपने देखी होगी क्या किसी आतंकवादी को भी इस तरह हिरासत में लिया गया है? और अगर आप ये समझते हैं कि पति के कर्मों की सजा बीवी बच्चों को नहीं मिलती तो आपकी जानकारी गलत है न ही भारत की न्यायव्यवस्थ आपसे इत्तेफाक रखती है न ही ऊपर वाले की| भारतीय दंड संहिता किसी भी कातिल को या देशद्रोही को संपत्ति के अधिकार तक से बेदखल करती है यानी दोष सिद्ध होने पर उत्तराधिकारियों को एक धेला भी नहीं मिलता और संपत्ति कुर्क कर ली जाती है| कातिल यदि फरार हो तो सगे सम्भंधियों खासकर पत्नी और बच्चों को ही गिरफ्तार करके अपराधी की खोजबीन की जाती है और उसके बाद भी अपराधी न मिले तो पूरे घर की संपत्ति को (जिसमे घर की झाडू तक शामिल हैं) जब्त कर लिया जाता है और ये सारी पीड़ा पत्नी और बच्चों को इसीलिए उठानी पड़ती है क्योंकि वे कहीं न कही अपराधी के अपराध के दोषी हैं| अब बात करते हैं ऊपर वाले के क़ानून की तो अपराधी के बच्चे और पत्नी जिस अपराध की रोटी खाते हैं और ऐतराज़ नहीं करते उसकी सजा उन्हें काटनी होती है अगर कौसर बी न अपने पति के काले धंधों और देशद्रोह पर ऐतराज़ नहीं किया होगा तो निश्चय ही वे सांसारिक और दैवीय दोनों दंड की भागी होंगी| यदि आपको लगता है कि मैंने किसी जाती विशेष के कारण प्रज्ञा के लिए न्याय की गुहार लगाईं है तो आप मुझे समझ नहीं सके| मैंने एक स्त्री को यातना न देकर उसे न्याय देने की बात कही है न कि उनके अपराधी होने पर उनको रिहा करने की| न्याय से मेरा अभिप्राय सिर्फ न्याय है फैसला और दंड-मुक्ति नहीं| आशा है आप भी न्याय से इनकार नहीं करेंगे|

के द्वारा: chaatak

चातक जी आप अच्छा लिखते हैं. बहुत से पढ़े हैं. तारीफ भी की हैं. लेकिन जहाँ गलत हो वहां ज़रूर कुछ बोला है चाहे कोई भी हो. बात प्रज्ञा की हे ले लें उसे गैरकानूनी कामों में लिप्त पाया गया है तो इस का फैसला तो होना ही चाहिए, चाहे वोह महिला ही क्यूँ न हो और साध्वी ही क्यूँ न हो. इससे न्याय में अंतर नहीं आना चाहिए. हाँ रही कौसर बी और तुलसी प्रजापति इनकी कोई गलती नहीं थी. आप उनके लिए भी आवाज़ उठायें. बीवी बीवी होती है. उसे अपने कारगुजारियों में शामिल करे यह कोई ज़रूरी नहीं. ज्यादातर लोग शामिल तो दूर जानने भी नहीं देते. और किसी के अपराध की सजा उसके बीवी बच्चों को मिले ये कौन सा न्याय है जिस पर आप हामी भर रहे हैं. रही ए के 47 के बात तो उसके लिए मुकदमा चलाया ही गया है. उसमें आप किसी की बीवी और बच्चे को कैसे जोड़ सकते हैं. एके 47 तो संजय दत के पास से भी बरामद हुआ था. क्या हुआ उसका. मैं नहीं कहता की सोहराबुद्दीन को नहीं मारना चाहिए, बल्कि ऐसे सारे लोगों का सफाया होना चाहिए. लेकिन किसी अपराधी के माँ बहन भाई बच्चे और बीवी को उस के अपराध की सजा नहीं दिया जा सकता. और अपराधी चाहे कोई भी हो उसका हमलोगों को समर्थन नहीं करना चाहिए. सच के लिए आवाज़ उठायें. तभी जागरण सफल होगा. उम्मीद है समस्या पर रौशनी डाली है. आगे आपके सहयोग के उम्मीद करता हूँ.

के द्वारा: jalal

माफ़ करियेगा चातक जी आपके लिए पूछे गए प्रश्न का जवाब देने का जुर्म कर रहा हूँ - अख्तर जी कौसर बी की बात है तो में आपको बताना चाहूँगा की कौसर बी सोहराबुद्दीन की पत्नी थी और सोहराब कोई देशभक्त नहीं था कई सारी देश विरोधी गतिविधियों के साथ सोहराब हथियारों और ड्रग्स की तस्करी के साथ फिरोती वसूली में लिप्त था और कौसर बी उसकी पत्नी उसके गुनाहों में बराबर की साझेदार थी ग्राम झिर्नियां जहाँ सोहराब निवास करता था सन १९९६ में सोहराब के घर के कुए में से ऐ.के ४७ बरामद की गई थी ,इसलिए एक साध्वी और एक आतंवादी की पत्नी के बीच कोई तुलना नहीं की जा सकती है ,ये बात सत्य है की सोहराब और उसकी पत्नी को गैरकानूनी तरीके से जिन लोगों ने मारा वो लोग क़ानून की गिरफ्त में हैं !

के द्वारा: vijendrasingh

आकाश जी, आप, हम और लगभग सारे लोग (कवि) दर्द की असली तासीर लिखते कहाँ हैं| वो तो छिपा के ही रखी जाती है| क्या आप कह सकते है कि आपने सारा दर्द या एक अंश मात्र भी बयान किया है अपनी कविताओं में ? नहीं न, क्योंकि वो असली तासीर तो सिर्फ आपके लिए है और जिस दिन आपने उसे लिख दिया आपके अन्दर कुछ नहीं बचेगा| कलम हिलेगी नहीं लिखना तो बड़ी बात है| क्या मैंने गलत कहा? ये दर्द ही तो शायद शक्ति बन जाता है वर्ना हिन्दुस्तान की कौन सी जगह है जहाँ रेलगाड़ी नहीं चलती, कौन सा केमिस्ट सभी रोगों की एक दवा नहीं देता, कौन सी राह में नदियाँ नहीं बहती, किस शहर में ऊंची इमारतें नहीं, किस गली में ब्लेड नहीं मिलता, किस दुकान पर रस्सी नहीं मिलती और कौन से घर में खंज़र नहीं होता| आप तो कवि हैं बातों को खूब समझते हैं आगे क्या लिखूं? प्रतिक्रिया का तहे-दिल से शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

माफ़ी चाहूंगा रचना जी, कटघरे में हिंदुत्व नहीं बल्कि वे लोग हैं जो हिंदुत्व की मनमानी परिभाषा गढ़ रहे हैं| भाजपा हिंदुत्व की पक्षधर तो हो सकती है लेकिन हिंदुत्व की मानक नहीं| मुझसे ज्यादा तो आपको गुस्से में होना चाहिए क्योंकि मेरी शिकायत एक नारी पर हो रही ज्यादतियों के खिलाफ है जबकि आप राजनीति के छद्म खेल से भी असंतुष्ट हैं| नाराज़ होना सीखिए वर्ना जी तो हम अंग्रेजो के गुलाम बनकर भी रहे थे| और हाँ, प्रश्न पहले और बाद का नहीं समय की मांग का है| मैं नहीं कहता आप जिस प्रश्न का उत्तर खोज रही हैं उसे छोड़ कर दुसरे पर लग जाइए आप के विचार का तरीका अलग है जो देश हित में होगा (शायद गांधीजी की तरह जिनका मैं सबसे ज्यादा सम्मान करता हूँ) मेरे विचार का तरीका अलग है जो थोडा उग्र है (भगत सिंह या राजगुरु की तरह) न गलत राह आपकी न मेरी न प्रश्न मेरा न आपका दोनों अपना सर्वोत्तम करें देखते हैं आपके तरीके से सफलता मिली तो भी भला राष्ट्र का और मेरे तरीके से मिली तो भी राष्ट्र का ही हित होगा| जय हिंद!

के द्वारा: chaatak

बिलकुल सही कहा आप ने हिन्दू वोट बैंक नहीं है इसलिए उसे जब चाहो आतंकवादी घोषित कर दो| ये वो कौम है जिसका कोई देश नहीं इसलिए जब चाहो इसे विश्व मंच पर नंगा कर दो| हिन्दुओं को सांप्रदायिक कहने वालों के न तो शर्म है न अक्ल| अगर हिन्दू सांप्रदायिक होता तो एशिया के सारे देश हिन्दू राष्ट्र होते लेकिन यहाँ हिन्दू संस्कृति ने हमेशा त्याग करके लगता है अपना ही गला घोंट लिया| ईसाइयों के अपने देश हैं हमें ऐतराज़ नहीं, मुसलमानों के अपने मुल्क हैं हमें ऐतराज़ नहीं, यहूदियों के अपने राष्ट्र हैं हमें इसकी ख़ुशी है हमने अपनी मात्र-भूमि को हिन्दू राष्ट्र बनाने की कोई कवायद नहीं की फिर भी हम सांप्रदायिक कैसे हो गए? इस बात पर कम से कम मुझे तो सख्त ऐतराज़ है|

के द्वारा: chaatak

प्रज्ञा ठाकुर आतंकवादी है और अफजल गुरु ,अजमल कसाब एक सभ्य पाकिस्तानी राजदूत है बेचारे -कुछ भारतीय नागरिको को मौत के घाट उतारकर या दुनियां के सबसे बड़े लोकतंत्र के मंदिर भारतीय संसद पर हमला करके इन पर दोष सिद्ध ही तो हुआ है तो क्या हुआ इन्हें पता है जेल में इन्हें प्रधानमंत्री के स्तर की सुरक्षा मिली हुई है एक छीक भी आती है तो डॉक्टर की पूरी टीम इनकी देखभाल करती है भारतीय न्याय व्यवस्था से इन्हें भले ही फांसी की सजा मिली हो पर इन्हें पता है भारत में वर्ग विशेष के तुस्टीकरण की निति सभी राजनितिक दलों की है ना तो बी जे पी सत्ता में आएगी तो इन्हें फांसी पर चादाएगी और कांग्रेस तो फांसी दे ही नहीं सकती इसलिए ये बेचारे आतंकवादी लोग भारत में अन्य देशो की अपेक्षा ज्यादा सुरक्षित है मानवाधिकार भी आखिरकार इन्ही लोगो का है पर प्रज्ञा ठाकुर क्या है सिर्फ हिन्दू ही तो है करोड़ो हिन्दुओ की प्रार्थनाये तो उसके साथ है भले ही कोई उसके लिए कुछ ना कर सके ?अगर एक आतंकवादी ये सोच सकता है की पूरी दुनिया में इस्लाम धर्म हो तो प्रज्ञा ठाकुर ने ये सोचकर क्या बुरा किया की पूरे भारत को हिन्दू देश होना चाहिए?

के द्वारा: vijendrasingh

के द्वारा: Ganesh Joshi, Haldwani

सर इमानदारी से कहूँ तो जब मैंने अपनी प्रतिक्रिया पोस्ट की थी तो पेज बंद करने के बाद यही ख्याल आया था की शायद यहाँ "कौन" का अर्थ कौन से भगवान् से है लेकिन तब तक तो अपनी प्रतिक्रिया पोस्ट कर चुकी थी और यहाँ अपने कमेन्ट को डिलीट करने का ऑप्शन भी नहीं है इसलिए कुछ कर नहीं सकी ! जबकि ऐसी प्र्तिक्रियऔ को डिलीट करने का ऑप्शन bloggar पर है और यहाँ अपना अकाउंट बनाने के लिए आप या तो गूगल पर Blogger लिख कर सर्च करे तो आपको अकाउंट क्रियेट करने का ऑप्शन वहाँ मिल जायेगा और आप चाहे तो अपनी G mail आई डी पर ऊपर tab में more पर क्लिक करे उसके बाद even more पर क्लिक करे फिर जो पेज खुलेगा उसमे दाहिनी तरफ Blogger पर क्लीक करे उसके बाद जो पेज खुलेगा उसमे creat a blog पर क्लिक करे और आगे बताये हुए स्टेप फोलो करते जाये आपका ब्लॉग तैयार हो जायेगा ! और ब्लॉग तैयार होने के बाद कृपया मुझे इन्फोर्म ज़रूर करे ताकि में आपकी हर पोस्ट को वहाँ आसानी से पढ़ सकू !

के द्वारा: soni garg

सोनी जी, आपने कविता पसंद की तहे-दिल से शुक्रिया| आपका सुझाव 'क्या' अमूर्त मानवीय विचार की और इशारा करेगा साथ ही ये दूसरी और छठी पंक्ति के साथ छंदबद्धता को भी खो देगा| मैंने यहाँ 'कौन' शब्द लिख कर ईश्वर के विभिन्न अवतारों और नामों की ओर (कौन सा भगवन) लक्ष्य करके किया है| और इससे इस पंक्ति को दूसरी और छठी पंक्ति के साथ लयबद्धता में भी मदद मिली जिससे कविता में संगीत भी निरंतर मिलता रहा| मुझे बड़ी ख़ुशी हुई कि आपने इतने गौर से कविता को पड़ा और इंतनी अच्छी प्रतिक्रिया दी| अब मैं उन्मुक्त होकर रचनाएं पोस्ट कर सकता हूँ मुझे आशा है अगर मुझसे कही त्रुटी रह गई तो आप बिना संकोच उसमे सुधार का सुझाव जरूर देंगी| प्रतिक्रिया का एक बार फिर शुक्रिया!

के द्वारा: chaatak

आपकी बातें सुन कर कुछ कुछ हंसी आती है लेकिन सच्चाई भी है. ऐसे लोग भी हैं. यह बहाने वोह तरीके क्या खूब है. सबसे पहले किसी से दोस्ती करें तो अच्छा है लेकिन अपना दायरा ना भूलें. नहीं तो यह चूक गद्दारी ही कही जाएगी जिसने दोस्त के घर में ही सेंध मर दी. लेकिन लड़के लड़की के दोस्ती तो चिंगारी और पेट्रोल की तरह ही होती है क्यूंकि आपने उसे बहन नहीं समझा,इसलिए किसी को ना मौका दें और न किसी के घर में हाथ आजमायें. दोस्त कभी माफ़ नहीं करेगा. हाँ बात रही अपने रिवाजों की तो वोह अलग जगह है. लेकिन भेद भाव की बात बिलकुल गलत है. एक बात कादिर के अब्बा उनके साथी राजेश के साथ अपने साहब के घर गए क्यूंकि उन्होंने कुछ काम के लिए बुलाया था और घर भी राजेश चचा ने ही सिर्फ देखा था . बहुत ही अच्छे अफसर थे वोह. उनकी बेटी चाय नाश्ता ले आयी क्यूंकि उसके अब्बा उस समय नहा रहे थे. चाय नाश्ता होने के बाद राजेश अंकल ने उस्मान अंकल से कहा के थोडा गिलास को पानी से धोकर रख दें. ऐसा क्यूँ ? (उस्मान अंकल ने कहा ) बस ऐसे ही ( राजेश अंकल ) इस पैर दोनों में थोड़ी हलकी बहस भी हुई. मन को ठेस पहुंची. उस्मान अंकल ने कहा अगर मेहमान की इज्ज़त करना नहीं जानते हैं तो घर में नहीं बुलाना चाहिए. अफसर की लड़की ने इन बातों को दूर से सुन लिया. समझदार थी. उसे आता देख दोनों चुप हो गए. वोह मुस्कुराते हुए एक सेकंड में सारा माजरा समझते हुए लेकर चली गयी. यह करीब 15 साल पुरानी बात है. इससे लगा की नयी पीढ़ी में बदलाव आ रहा है. लेकिन आज आप भी उसी बात पर हामी भरते हुए नज़र आये. अच्छा नहीं लगा. बात धर्म की है तो आप उस बर्तन को पचास बार धोये जिसमें किसी दुसरे धर्म के लोगों ने खाया है taaki आप अपने धर्म के hisaab से भी chal saken और फिर उसमें से खाएं लेकिन अलग अलग करना कहीं से सही नहीं. kya log bahar hotlon mein khaate hai to iska paalan karte hain. phir dharm kahan raha. gud khaayen aur gulgule se perhez. wah bhai wah. main kisi ki maan par tippani nahi kar raha hoon. maan to maan hoti hai. main to aam vichaar ko dikha raha hoon. ladke ladkiyan agar dusre dharm mein pad jaayen, to samjhayen bandishen lagaayen, taki mushibaten na pada ho jaayen. lekin agar bhaag gaye to phir sar mat phode kyunki jis ladki ya ladke ne apne dharm ke khilaaf kiya woh ab us dharm ke hai hi nahi. us dharm mein unka imaan hi nahi. to woh us dharm se bahar ho gaye. phir jhagda kaisa, malal kaisa. jane dijiye . ab is par jindagi thode hi kharab ki jaa sakti hai. lekin kam se kam ham to is peedhee mein badlaaw la sakte hain. sakaratmak soch ke liye ummeed karta hoon. dhanywaad.

के द्वारा: jalal

चातक जी आज अपने ऊपर पछतावा हो रहा है की आपको लगातार नहीं पढ़ सकी आज आपकी ये कहानी पढ़ी जो बहुत अच्छी लगी सच है किताबी ज्ञान से ज्यादा व्यवहारिक ज्ञान ज्यादा ज़रूरी है जिसकी मुझे अपने परिवार में सीख मिलती रहती है ! मैं एक व्यापारिक परिवार से हूँ और अक्सर घर के सभी बच्चो का हिसाब किताब में टेस्ट होता रहता है तब घर के सभी बड़े जो हिसाब उंगलियों में निबटाते है उस हिसाब को निबटाने केलिए जब हम बच्चे केलकुलेटर इस्तेमाल करते है तो हमें भी यही सुनने को मिलता है बेटा किताबे सब कुछ नहीं है कुछ अपना दिमाग भी लगा लो ! बिलकुल शैलेश जी कहानी की तरह हम अपने किताबी ज्ञान के चलते अक्सर सब कुछ पता होते हुए भी उत्तर गलत दे देते है ! सर आपसे एक request हैआप प्लीज़ ब्लोगर पर भी आ जाये ताकि आपको आसानी से फोलो किया जा सके यहाँ ढूंढने में परेशानी होती है ! और आजकल जागरण की टेक्निकल प्रोब्लम भी बढ़ गयी है सब्सक्रिप्शन लेने के बाद भी मेरी इ मेल कोई इन्फोर्मेशन नहीं मिलती ! मेरा bloggar अकाउंट ये है www.soni-teekhabol.blogspot.com

के द्वारा: soni garg

के द्वारा: Soni garg

सत्यम जी, ये जानकार बड़ी ख़ुशी हुई कि आप एक ऐसी राजनैतिक पार्टी से ताल्लुक रखते हैं जो जातिगत आरक्षण के विरुद्ध आवाज उठा रही है| मैं किसी भी तरह से जंक्शन मंच को राजनीतिक लाभ या प्रचार के लिए इस्तेमाल करना उचित नहीं समझता इसलिए कि ये एक साफ़-सुथरा वैचारिक मंच ही बना रहे राजनीति का अखाड़ा न बने| आप ही नहीं बहुत से लोग ऐसी मुहिम चला रहे हैं या उससे जुड़े हैं| जिसका असर जल्द ही दिखाई देने लगेगा| लेकिन किसी भी पार्टी विशेष से सम्बंधित चर्चाएँ यदि हम इस मंच से अलग व्यक्तिगत ई-मेल द्वारा करें तो बेहतर होगा| तब शायद मैं भी आपको ये बताने में ख़ुशी महसूस करूंगा कि हम कहाँ तक व्यवहारिक जनजागरण और आन्दोलन में भाग लेते हैं या ले सकते हैं| इस मंच पर अपनी उपलब्धियों या प्रयासों का प्रचार करना करना जरा अटपटा और वैचारिक अभिव्यक्ति के विरुद्ध प्रतीत होता है| आशा है आप मेरी बात समझेंगे और मेरे ई-मेल पर अपने राजनीतिक क्रियाकलापों के बार में विस्तार से जानकारी देंगे| वैचारिक समर्थन का धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak

प्रिय चातक जी आपने बहुत सही बात उठाई है..... आरक्षण जैसे बात तब नहीं होनी चाहिए जब हम समदर्शिता, और समानता के पोषक बनते हैं | हाँ मेरे मत से आरक्षण गुणवत्ता के मामले में नहीं होना चाहिए, लेकिन जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं उन्हें वित्तीय और साधन सम्बन्धी सहायता प्रदान करनी चाहिए | जहाँ तक मैं मानता हूँ किसी लो लाठी पकड़कर उसका भला नहीं किया जा सकता, अगर आप वास्तव में किसी का भला करना चाहते हैं तो उसे समर्थ बनाइये, अपंग नहीं, और यदि किसी को समर्थ बनाने में कोई असुविधा है तो उसे वो साधन दिए जाएँ जिसकी जरूरत है, समर्थ और योग्य बनाने के लिए | और वित्तीय रूप से असमर्थता जाती धर्म, लिंग के नाम से नहीं सम्बंधित नहीं होती है, कोई भी गरीब हो सकता है, और गरीब को समर्थ बनाइये उसे संसाधन उपलब्ध कराइये | उसे आरक्षण देकर गुणवत्ता से समझौता करना वैश्विक स्तरपर राष्ट्र की साख और छबि धूमिल करता है और ये नहीं होना चाहिए.............

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

hi shiv मिर्ज़ापुर से पहले तो मै हाकना चाहुगा की को इ भी कानून या नियम बुरा नहीं होता है पर लोग बुरे हो तो उसको बुरा बना दिया जाता है . जैसा की हम लोग अरषण के रूप में देख रहे है .हम आप लोगो बता देना चाहता हु की मै ज्ञानपुर से सरकारी से इंटर करता था तब एक तहसील दर साहब थे तिवारी j वे कहा करते थे की देखो बेटा जनतंत्र में जिसकी सखाया जयादा होगी वही राज्य चलाएगा अभी तक यही मुर्ख लोग ज्यादा है इसलिए अभी तक मूर्खो के द्वारा ही देश चल रहा है जब विद्बान ज्यादा हो जायेगे तब आप देखेगे की वहा पर देश आगे जायेगा यही अब हो रहा है विभिन छेत्रो में उनती हुए है लेकिन जहा पर ये मुख लोग है वहा पर नहीं हुए तो आप को बतला दू की आरक्षण भी मूर्खो के बिच रहा है जिससे ये दुसित हो गया है नहीं तो आप को बता दू की अमेरिका में इसी आरक्षण के बल पर अपने देश को आगे बना दिया वहा पर आरक्षण वाले बन्दे को अलग स्कुल खुल कर उसको आचे लोगो के बराबर लाया जाता है जिससे की उन्हें मुख्या धरा से जोना जा सके .उन्हें उत्तम कार्यकुशल बनाया जाता है अपने देश में तो अज आचे लोग आचे पद पर नहीं है जो है वो कुछ नहीं कर प् रहे है या भटक जारहे है जसे के डिस्ट्रिक मजिस्त्रथ्त .

के द्वारा: shivalord

चातक जी ! नमस्कार आपने सही मुद्दा लिया है आरक्षण | मैं थोडा लेट हो गया अपना कमेन्ट देने में वैसे सारी बातें तो आपने अन्य नीचे कमेन्ट में देख ही ली होंगी मेरे विचार भी कुछ ऐसे ही है लेकिन आपके प्रश्नों के उत्तर ज़रूर देना चाहूँगा ऊची जातियों में भी गरीबो की संख्या कम नहीं है लेकिन उन लोगो के लिए किसी भी प्रकार का कोई आरक्षण नहीं है अगर आरक्षण आर्थिक स्थिति के हिसाब से होता तो शायद उनको कुछ लाभ मिल पाता | और अगर यही रहा तो सामान में ही गरीबो की सबसे जादा संख्या हो जाएगी | हानि तो है लेकिन नेतानों को | युवाओ के अकर्मण्य होने का कारण यही है की अब युबाओ में ही एकता नहीं रहे गई है क्यूंकि जिसको आरक्षण की बैसाखी मिल गयी है वो उसे छोड़ना ही नहीं चाहता है | इसमें राजनीती कुछ के लिए गन्दी तो कुछ के लिए अच्छी भी है "वैसे घुटने तो वो लोग टेक सकते है जो अपने पैरो पर खड़े हो | लेकिन टेकने से अच्छा है घुटने को आगे बड़ाकर इसको रोकने का प्रयास किया जाये | मै उन logon की baat नहीं कर रहा hun जो पहले से ही घुटनों पर हो | चातक जी आपके lekh के लिए dhanybad

के द्वारा: Nitin Sinha

चातक जी, मै आपसे पूरी तरह से सहमत हूँ। आरक्षण का आधार केवल और केवल आथिक होना चाहिए जैसे मुफ्त में कापी,  किताब देना चाहिए पर जहाँ बात प्रतिसप्रधा की हो, और जो देश के भविष्य की बात हो,वहाँ आरक्षण नहीं होना  चाहिए । मैं अपना  ही उदाहरण दूँ कि इस वर्ष मेरे भाई का IIT की परीक्षा में चयन नहीं हुआ ,जबकि उससे बहुत कम नंबर पाने वाले आरक्षणित छात्रों का हो गया । ये iit से पास होकर देश को किस तरफ ले जायेगे ? इनके बनाये हुए पुल, इमारते कहाँ तक भरोसेमंद होंगे ? क्या इस तरह से ये iit का स्तर नहीं गिरा रहे ? देश का वह संसथान जहाँ का नाम देश की प्रतिष्ठा से जुड़ा है, क्या ये इसके साथ एक मजाक नहीं है ? यदि ऐसा ही चलता रहा तो वो दीन दूर नहीं जब सवर्णों को भी आरक्षण देना पड़ेगा । इस मंच के माध्यम से चातक जी हमारे नेताओ को समझिए की की वोट और कुर्सी के लालच में देश के भविष्य से खेलना बंद करें ।  जय हिंद...

के द्वारा: vipul

अनुराधा जी, माफ़ी चाहूंगा मुझे भी इस बात का अहसास था कि मैंने कुछ गलत लिख दिया है क्योंकि उस समय मैं जागरण ब्लॉग के एक समूह 'SKCC' पर लिखा ब्लॉग 'तन ढकने तक का पैसा नहीं, फिर भी कालेज में पढ़ती हूं' पढ़ रहा था और मैंने देखा कि इस पर ज्यादातर ब्लॉग बिलकुल अटपटे हैं| आपकी प्रतिक्रिया आई तो मैं समझा आप उसी ग्रुप की ब्लोगर हैं और मैंने एक तल्ख़ प्रतिक्रिया कर दी| चूंकि प्रतिक्रिया के बिना आपके संज्ञान में आये संशोधित करना उचित नहीं था इसलिए मैंने वो पंक्ति नहीं हटाई| हलाकि अभी तक मैं आपके ब्लॉग नहीं पढ़ पाया हूँ लेकिन जल्द ही उन्हें भी पढूंगा क्योंकि मुझे लगता है कि आपके पास कुछ तो ऐसा है इसकी जरूरत युवा वैचारिक आन्दोलन को है| आशा है आप बात को अन्यथा नहीं लेंगी| स्पष्ट बात रखने का शुक्रिया आप का सदैव स्वागत है| Regards Chaatak

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: Anuradha Chaudhary

आपकी ये पंक्तियां सोचने पर विवश कर देती है - दीगर बात ये है कि जिस देश का संविधान अपने आपको धर्म-निरपेक्ष, पंथ-निरपेक्ष और जाति-निरपेक्ष होने का दावा करता है उस देश में जातिगत और धर्म पर आधारित आरक्षण क्या संविधान की आत्मा पर ही कुठाराघात नहीं है| एक धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र में आरक्षण का सिर्फ एक आधार हो सकता है वो है आर्थिक आधार लेकिन दुर्भाग्य वश ऐसा नहीं है| यहाँ तो एक भेंड-चाल है कि जो बहुसंख्यक (हिन्दू) के विरुद्ध सांप्रदायिक आग उगले उसे धर्म-निरपेक्ष कहा जाता है, जो जाति और वर्ग के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था देता है उसे जाति-निरपेक्ष कहा जाता है| आपने बहुत सटीक बात लि‍खी है । कितनी अजीब बात है कि इस देश में संविधान का शासन हैं और संविधान पहले के कुछ अनुच्‍छेदों में समानता की बात करता है और बाद में कुछ अनुच्‍छेदों में उसी समानता को उखाड़नें व भेदभाव बढ़ानें की व्‍यवस्‍था कर देता हैं । पता नहीं इस विषय पर कोई सोचता क्‍यों नहीं है । मैं के.एम. मिश्रा जी की टिप्‍पणी से भी सहमत हूँ । लोग दोष उसका नहीं देखते जो दोषी होता है बल्कि उसे दोषी मानते हैं जिसे शोर मचा कर दोषी बता दिया जाता है । इसलिये सही दोषी कौन है सभी भ्रम में है व जानकर भी अनजान है । अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: bhaijikahin by ARVIND PAREEK

स्नेही अनुराधा जी, अगर मुद्दा मानवीय है तो हमारा पैदा किया ही होगा और हमारा पीड़ा किया है तो उसका समाधान भी हम निकाल लेंगे| जब तक कोई चीज़ अतिमानवीय साबित न हो जाए मैं उसे वश के बाहर नहीं मानता और मुझे हमेशा मुश्किल से मुश्किल प्रयासों में अंततः सफलता जरूर मिली है| देखिये आप स्वयं भी दूसरी ही लाइन में लिखती हैं कि हम एकजुट होकर बेहतर समाज के निर्माण के लिए चर्चा कर सकते है| निश्चित ही चर्चा से आपका उद्देश्य एक सही हल तलाश करने से होगा न कि कारवाही को विलंबित कर के मामला अटकाए रखने का इसका मतलब यही है कि सफलता कहीं न कहीं जरूर हमारा इंतज़ार कर रही है| विषय आपने अच्छे चुने हैं लेकिन एक त्रुटी है ये सारे ही गौड़ हैं और किसी का व्यक्ति के अस्तित्व से दूर-दूर तक नाता नहीं है जबकि आरक्षण अस्तिव पर मंडरा रहा संकट है जो अभी तो अनारक्षित युवाओं पर घुमड़ रहा है लेकिन कल इसकी दिशा युवा असंतोष की ओर होगी| वैसे भी जब युवा बेरोजगार होगा तो बेचारे के पेट में अन्न जाएगा नहीं जब दम ही नहीं होगा तो जनसँख्या कैसे बढ़ाएगा, मुकदमा लड़ने के लिए फीस चुकानी पड़ती है हमारे के.एम्. मिश्र जी तो फीस की उधारी भी कर दें लेकिन अदालत की कोर्ट फीस ये बेरोजगार चूका पाएंगे तब तो मुकदमा लड़ेंगे, रह गई बात वैज्ञानिक सोच की तो उसमे आरक्षण लागू है आरक्षण के बल बूते आया मास्टर विज्ञानं की परिभाषा तक नहीं जानता और जहाँ अच्छे अध्यापक हैं वहां आरक्षण इन युवाओं को पहुँचने नहीं देता| अनुराधा जी, आप चूंकि behtari का विचार रखती हैं इसलिए आपसे निवेदन है कि समस्याओं पर विचार करने में हमारे साथ कदम मिलाइए आपसे वादा है कि आपको 'समस्या पर वश नहीं' जैसी निराशा से मुक्ति मिलेगी| प्रतिक्रिया का शुक्रिया! आशा है आप हमारा साथ देंगीआखिर मैं और आप मिलकर ही तो हम बनाते हैं|

के द्वारा: chaatak

प्रिय चातक जी आपने एक ऐसा मुददा उठाया जिस पर हमारा आपका कोई वश नही है। जागरण जंकशन ऐसा मंच है जिसका प्रयोग हम आप जन जागरूकता पैदा करने के लिये कर सकते है। हमे नेताओं पर आरोप लगाने के बजाय ऐसा प्रयास करना चाहिए जिससे एक वेहतर समाज का निर्माण किया जा सके। आरक्षण राजनैतिक लोगों की राजनीति का पसंदीदा विषय बन गया है और हम लोग इस पर चर्चा करके उसे और महत्वगपूर्ण बना देते हैं। समाज मे तीन मुददे ऐसे है जिन पर चर्चा किया जाना आवश्य क है यदि आप लोग सहमत तो इन विषयों पर चर्चा शुरू की जाय। ये विषय है बढती जनसंख्या ; मुकदमेवाजी और समाज मे वैज्ञानिक द़ष्टिकोण का अभाव। यदि इन विषयों पर चर्चा को आगे बढाना है तो आइये साथ साथ बढें। अनुराधा चौधरी यू0पी0 उदय मिशन से।

के द्वारा: Anuradha Chaudhary

राशिद जी, आपकी बात में १६ आने सच्चाई है जिस तरह का दमन मंडल आयोग का विरोध करने वाले युवाओं का हुआ क्या वो बरतानिया हुकूमत की ही तरह का शासन नहीं दिखाती है? फिर क्या अच्छा हुआ राष्ट्र के स्वतंत्र होने से? आम आदमी की आवाज पहले गोरे अंग्रेजों ने दबाई और फिर ये काले अँगरेज़ हावी हो गए| रथ यात्रा ने निःसंदेह दोनों कौमों को लड़ाकर अपना उल्लू सीधा किया, जबकि ये मामला सीधे कानूनी लड़ाई का था अदालत को निष्पक्ष रहते हुए फैसला देना था जिसमे किसी प्रकार का कोई राजनीतिक ध्येय न हो| लेकिन वाही हिन्दुस्तान भेडिया-धसान| मूढ़ (अ)न्यायाधीश किसी निष्कर्ष तक न पहुंचे थे न पहुंचे हैं क्योंकि ये इन्ही गिरगिट राजनेताओं के हाथों का खिलौना है| खैर बात आरक्षण की हो रही है और निश्चय ही हर युवा इस दर्द का साझीदार है तो क्यों न एक साझा प्रयास करके लोकतंत्र की मर्यदानुरूप एक फैसला करने पर इन्हें विवश कर दिया जाए?

के द्वारा: chaatak

चातक जी , आरक्षण, भ्रष्टाचार, सांप्रदायिक उन्माद, धार्मिक भेदभाव,,, यह समस्याए आतंकवाद से कही बढ कर है,, परन्तु जिनकी ज़िम्मेदारी इनको ख़त्म करने की है दुर्भाग्य से वह लोग ही इन सब के ज़िम्मेदार है !! मुझे भी याद है मंडल आयोग वाले दिन हम कानपूर के christ church इंटर कॉलेज में पढते थे, यहाँ का बड़ा चौराहा जहाँ कई कॉलेज है बस एक युद्ध का मैदान बना रहता था छात्रों और पुलिस के बीच, पुलिस निर्दयिता दे मासूम छात्रों को पीटती थी !! फिर इसके फ़ौरन बाद रथ यात्रा निकाली गयी और आरक्षण की आग को साम्प्रदायिकता में बदल दिया गया और भगवान् राम के नाम पर पुरे देश को जला दिया गया !! न मंडल वालो को dalito से कोई प्यार था न रथ यात्रा वालो को भगवान् राम से, बस दोनों ने देश को जला कर अपना सत्ता पाने का प्रयास किया !! मेरी दुआ है की वह भयानक दौर (1990 -1991 -1992 -1993 ) फिर किसी को न देखना पड़े जब अपने साये से भी डर लगता था !! http://rashid.jagranjunction.com

के द्वारा: RASHID

आरक्षण को जिस उद्देश्य के लिये संविधाननिर्मात्री सभा ने संविधान में डाला था वह न तो पूरा हुआ और न ही पूरा होता दिखाई पड़ रहा है । आज सिर्फ यह एक वोट काटने की मशीन भर बन कर रह गया है । अफसोस कि जिन लोगों को वाकई में आरक्षण की जरूरत है उनमें से 10 प्रतिशत को भी इसका लाभ नहीं मिला । 50-60 प्रतिशत ऐसे जरूरतमंद बच्चे तो कक्षा पांच से दस तक में ही स्कूल छोड़ देते हैं । अनुसूचित जाति, अनुसुचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिये किये आरक्षण को उनकी ही जाति के आर्थिकरूप से सम्पन्न लोग दबोच लेते हैं । माननीय सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर को पिछले साल परिभाषित किया जिसमें ढाई लाख से ऊपर की आमदनी वालों को इस वर्ग में डाला गया । तमाम आई ए एस, पी सी एस, अधिकारी, प्रोफेशनल्स, नेता, मंत्री वगैरह को क्रमीलेयर मे शामिल किया गया तो यूपीए सरकार ने कानून बनाकर वेतन की सीमा 5 लाख तक बढ़ा दी । जब सरकार और विधायिका में बैठे लोग ही इस मुद्दे को लेकर इमानदार नहीं हैं तब बचता ही क्या है । एक सोची समझी साजिश है करोड़ों लोगों को अनपढ़ रख कर उनका वोट लूटने की और उनको सड़ने के लिये छोड़ देने की । तकरीबन पचास साल एक पार्टी की सरकपार ने भारत पर राज किया और कर रही है । देश और देशवासियों की इस हालत के लिये और कौन जिम्मेदार हो सकता है ?

के द्वारा: kmmishra

संत कबीर जी ने कहा है, \\"जाती न पूछो साधू की , पूछ लीजिये ज्ञान\\" Franklin D said The test of our progress is not in whether we add to the abundance of those who have much, it is then when we do for them who have little. ऊपर लिखी दोनों पंक्तियों से मेरा आशय यह है की या तो आरक्षण ही न हो सभी को सामान अधिकार मिले उनके ज्ञान के आधार पर युवाओं को रोजगार और छात्रों को उच्च शिक्षा का अवसर मिले न उन्हें जातिगत और धार्मिक आधार पर | और यदि आरक्षण की नीति को क्रियान्वित करना है तो उसका आधार जाति न होकर आथिक स्थिति होना चाहिए | हम कैसे कह सकते है जातिगत आरक्षण देकर ये नेता जनहित कर रहे है बल्कि ये तो सिर्फ अपने वोटों की संख्या बढाने के लिए देश को जातिगत आधार पर बाँट रहे है यदि हम हमारी मुख्यमंत्री शाहिबाकी बात करें तो वो खुद को दलित बताती है तो क्या उन्हें या उनके परिवार को आरक्षण की जरूरत है क्या गरीबी जाति देख कर आती है क्या सभी अल्पसंख्यक दबे कुचले और गरीब है जिससे कि वे उच्च शिक्षा प्राप्त करने में वे असमर्थ्य है तो फिर जाति के आधार पर आरक्षण देकर क्यूँ सवर्ण समाज को ही दबा और कुचला बनाने कि साजिश है | चातक जी आपका लेख बहुत ही विचारणीय है और हम उनमे से है जो किसी गलत शाजिश के आगे घुटने टेकने में नहीं बल्कि शमशीर उठने में है

के द्वारा: deepika

के द्वारा: kmmishra

बहुत सुन्दर रचना चातक जी, आपकी रचना में जो भाव छिपे हैं, वो वाकई काबिले गौर हैं | रहा खामोश उसने दर्द अपना खुद पिया हर पल, जिया के आज है कुहरा घना पर ये न होगा कल, जिया के आज है कुहरा घना पर ये न होगा कल, नहीं होता यकीं पर सच है- मैं उससे कल मिला था, ये उसकी ही गुनहगारी का कुछ शायद सिला था, कलेजा अपना रखकर गोद में खुद सी रहा था, भरे थे आँख में आँसू वो सिसकी पी रहा था, ये पक्तियां जिस तरफ इशारा कर रही हैं, सो सोचनीय है, आज की भागम-भाग में उस तरफ किसी का धाय्न ही नहीं जाता .................. परन्तु हालात तो तब बेकाबू हो जायेंगे; जब ये हो जाएगा ..... दुआ की ए खुदा उसको उठा ले इस जहाँ से, सितम जो तूने ढाए और जहाँ ने जो दिए हैं, तेरे मासूम बंदे ने वो सारे जी लिए हैं | अंत मैं मैं यही कहूँगा उत्कृष्ट रचना है आपकी ........

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

सोनी जी, मैं सिर्फ इतना जानता हूँ कि आप एक अच्छी विचारक हो सकती हैं और जिस दौर से आप गुजर रही हैं उसे आप 'निर्माण का दौर' कह सकती हैं| कभी भी कमेन्ट करते समय गुरेज़ न करें| अगर आप को ऐतराज़ न हो तो आप मेरे मेल आई.डी. (krishnotcrisp@gmail.com) पर मुझे संपर्क करें| इस मंच पर एक तो विचारों को पूरी तरह स्पष्ट करने में समस्या होती है और दुसरे प्रतिक्रिया का दायरा सीमित होने के कारण आप पूरी बात नहीं कर सकते| एक और समस्या होती है कि लोग उसे पब्लिसिटी पाने की कोशिश या हतोत्साहित करने की मंशा समझ लेते हैं| आपकी प्रतिक्रिया की एक लाइन आपकी शख्शियत का विकास पक्ष उजागर करता है| "क्योकि मेरे लिए तो माता पिता कि ख़ुशी से बढ़ कर और कुछ नहीं है !" रह गई प्यार को जान्ने की बात तो मैं आपके द्वारा दी गई लिंक को जरूर देखूँगा| शायद कोई ऐसा पक्ष भी मिले जिसे मैंने महसूस न किया हो| इतनी विस्तृत और बेहतर प्रतिक्रिया का तहे-दिल से शुक्रिया !

के द्वारा: chaatak

आप मेरी सोच को जानते है इसलिए इस बारे मैं ज्यादा कुछ नहीं कहूँगी ! लेकिन इसमें कोई दो राये नहीं है कि आपका लेख बेहद उम्दा दर्जे का है ! समझदार और सलमा के प्यार के बारे मैं कुछ भी नहीं कहना चाहती लेकिन "प्यार" के बारे में बस इतना ही कहूँगी कि अगर दोनों को लगता है कि वो सही है (वैसे इन मामलों में हर किसी को यहीं लगता है कि वो सही ही है जो कि कभी-कभी नहीं भी होता) और अपने-अपने माता पिता को वो दुःख नहीं दे रहे तो इसमें कुछ गलत नहीं है क्योकि अगर जन्म देने वाले और उन्हें इस दुनिया में रहने लायक बनाने वालो को कोई परेशानी नहीं है तो फिर परेशानी किसी को भी नहीं होनी चाहिए ! क्योकि मेरे लिए तो माता पिता कि ख़ुशी से बढ़ कर और कुछ नहीं है ! वैसे सलमा और समझदार के प्यार से भी अलग एक प्यार होता है और वो बहुत ही गहरा और समझदार होता है और यहीं वो प्यार है जो दो मुल्को में आपसी प्यार बढ़ता है ! उस प्यार को जानने के लिए इस लिंक पर जाये और वहीँ मेरी उस प्यार के बारे में दी गई प्रतिक्रिया bhi पढ़ ले ! धन्यवाद ! http://chalaabihari.blogspot.com/2010/07/blog-post.html

के द्वारा: Soni garg

के द्वारा: prem alok

प्रेम आलोक जी, सबसे पहले तो आपकी प्रतिक्रिया का शुक्रिया| आपने ना सिर्फ लेख बल्कि उस पर आई टिप्पड़ियों पर भी गौर किया इसी से आपके परखने की कुशलता का अंदाजा हों जाता है| विपुल को दिए गए जवाब में दकियानूसी क्या था थोड़ा खुलासा कहें तो मैं शायद कुछ प्रकाश डाल सकूं| कृपया इस शब्द 'दकियानूसी' की परिभाषा अगर आप दें तो शायद मुझे आपकी शिकायत समझने में ज्यादा आसानी होगी| फिर लौटते हैं माधव की बात पर तो मुझे लगता है कि आप बात को समझे नहीं हलाकि ये आपकी गलती नहीं है मैं स्पष्ट कर देता हूँ- माधव जी मेरे बड़े करीबी हैं और उन्हें अच्छी तरह से मालूम है कि मेरी ननिहाल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में है और मैंने अपने बचपन का एक बड़ा हिस्सा वहीँ गुजारा है| सही कहूं तो साहित्य में इतनी रूचि मेरे नाना जी की देन है जिन्होंने इतनी पुस्तकें इकट्ठी कर रखी थीं कि एक बार उनमे रम गया तो फिर बाहर निकलने की इच्छा ही नहीं रही| आशा है आपकी कुछ शंकाएं दूर हो गई होंगी और जो बची हैं वो भी जल्द दूर हो जाएँगी| आलोचनाओं से विचलित होने का तो न औचित्य है न ही ये जायज है| आपको मेरे कुछ शब्दों से शायद ऐसा लगा हो लेकिन वास्तविकता यही है कि मैं कभी क्रोध नहीं करता खासकर जबतक कोई मामला व्यक्तिगत रूप से मुझसे जुड़ा हो| आपकी प्रतिक्रियाओं का स्वागत एवं इन्जार रहेगा|

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: Chaatak

लेख अच्छा लगा , और मुझे हिंदी से लगाव था . लेकिन पिछले कुछ दिनों से मै हिंदी के सब्दों को कम प्रयोग में लाने लगा था , इस लेख को पढ़ कर फिर से हिंदी के प्रति कुछ लगाव जन्म लेने लगा है . \"पडोसी से सम्बन्ध उतने ही मजबूत होंगे जितनी मजबूत दोनों के बीच की दीवार |\" यह पंक्ति बहुत ही जोरदार लगी . एक गुताखी करने जा रहा हू. छमा कीजियेगा. इस लेख में आपके सब्द चयन को को देख कर आश्चर्य तो नहीं हुआ परन्तु , कुछ सब्दों को पढ़कर ऐसा प्रतीत हो रहा है की जैसे यह लेख आपने नहीं लिखा है , इनमे कुछ सब्द पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दिहाती भाषा के है , जिनका आपके द्वारा प्रयोग विस्मयकारी है . और ऐसा मुझे सिर्फ लगा है , सिर्फ प्रतीत हुआ है छमा प्रार्थनीय है .

के द्वारा: Madhvam

प्रिय चातक जी आपको सत्यता से भरा एक लेख लिखने के लिए बहुत बहुत बधाई ................ आपका लेख............ वास्तव में विचारणीय और प्रशंसनीय ................... मेरे मत से भी वो लोग जो देश की गरिमा को चोट पहुंचाने का विचार रखते हैं, वे लोग निदनीय हैं और उनका कृत्य दंडनीय ...... और उन लोगों को भी किसी दशा में नहीं बक्शा जाना चाहिए हो अपने कुत्सित स्वार्थ और निकृष्ट आचरण की अनुचित पूर्ती के लिए, उसे धार्मिक सद्भावना और समदर्शिता का चोला पहनाकर प्रस्तुत करते हैं जो बाद में सद्भावना और शांति के सबसे बड़े शत्रु के रूप में उभरते हैं .......... जैसा की आपने एक पात्र समझदार के उल्लेख किया है? ऐसे लोगों को अपने ही मित्र के साथ विश्वाशघात और आचरणहीनता सामजिक शांति भंग का प्रबल कारण होने के कारण कठोर दंड दिया जाना चाहिए ...................

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

एक अर्थपूर्ण कहानी, मैं इस पर २ बाते कहना चाहुगा ! १. यह सही है की पुराने लोग ज्यादा तर पाकिस्तान की टीम की तरफ रहते थे, मैंने भी बचपन में इंडिया के टीम का support करने की वजह से बड़े बूढों की बहुत बाते सुनी, लेकिन अब समय काफी बदल चूका है, आज का युवा १००% शुद्ध भारतीय है, अब मुस्लिम इलाकों में पाकिस्तान की जीत का कोई जश्न नहीं मनाया जाता है ! मुसलमान भी अन्य भारतीयों की तरह आगे बढना चाहते है और एक मुकाम हासिल करना चाहते है, वह भी चाहते है की उन्हें भारतीय समझा जाये और उनपर भरोसा किया जाये मेरा मानना है की ९९% मुसलमानों की यही सोच है, १% हो सकता है की यह सोच न रखते हो लेकिन इन १% की ग़लतियों की सजा पूरा समाज भुगतता है ! २. दूसरी बात यह वर्ग बेहद पीछे है शिक्षा में, रोज़गार में और जीवन के हर हिस्से में, फिर भी हमेशा तुष्टिकरण का आरोप झेलता है, ऐसा खाका खीचा जाता है की बस यही सारी समस्याओ का ज़िम्मेदार है ! इस तरह के उपेछित, पिछड़े और लगभग अशिक्षित वर्ग को बहकाना और इस्तेमाल करना बहुत आसान है! चाहे आतंवादी हो या राजनेतिक दल !! आखरी बात यह की अपनी समस्याओ का हल इस वर्ग को खुद निकालना होगा इन के लिए कोई मसीहा नहीं आयेगा !! यह साबित करना होगा की यह भी भारतीय है और देश भक्त है, वह भी देश के लिए वही जज्बा रखते है जितना दुसरे,, अपनी बात रखनी होगी, यह बताना होगा की जैसे औरो के ग़लत कामो को पुरे समाज से नहीं जोड़ा जाता है, वैसे ही इस समाज के कुछ लोगो की ग़लतियों को पुरे समाज या धर्म पर ना थोपा जाये !!

के द्वारा: RASHID

के द्वारा: chaatak

चातक जी ! आप ने कहानी तो बहुत ही अच्छी लिखी है तथा इस में आप ने जो अजान के अब्बा का जो चरित बताया है उनकी एक बात सुन कर मुझे बेहद दुःख व गुस्सा भी आया --- "इण्डिया का विकेट गिरने पर अजान के अब्बा की बांछे खिल उठती थीं जबकि बाउंड्री पड़ते ही लगता था मानो किसी सगे वाले का जनाज़ा उठ गया हो"; उस समय में भी वहां होता तो शायद मेरी भी प्रितिक्रिया भी यही होती जो चातक जी की थी क्योंकि जो ब्यक्ति हिंदुस्तान में रहते हुए इंडिया की बुराई करे या उसकी तरक्की से दुखी हो तो उस आदमी के दिल में क्या है इसको समझने ने में जादा देर नहीं लगेगी| और अजान के अब्बा ने कहा "बेटा ये तो खेल है कोई भी टीम आपकी पसंदीदा टीम हो सकती है | मेरी टीम पकिस्तान है|" माना उनकी पसंदीदा टीम पाकिस्तान है लेकिन वो खुद तो एक हिन्दुस्तानी है की उसमे भी कोई शक है| अब बात करते है इस कहानी के दुसरे चरित \'समझदार\' जी की उनका कहना क्या था कि" देख चातक तू नाहक ही भडकता है जोश में तू होश खो बैठता है ऐसे तो ‘गाड़ी उद्देश्य हीन होकर ठुक जाती है जर सी बात हुई नहीं की कूदने लगता है |’ आ बैठ चचा को ठन्डे दिमाग से समझाते हैं |\" जो आदमी ५०-६० साल कि उम्र में ये बात नहीं समझ पाया वो थोड़ी ही देर में समझ लेगा क्या? समझदार जी ने एक बात कही कि ";‘यार कुछ कर मैं सलमा से बहुत प्यार करता हूँ | पता नहीं किसने जा कर सेंक दिया अजान अब घास ही नहीं डालता घर पर जाओ तो दरवाजे से ही रुखसत कर देता है | तू तो मेरा यार है, कुछ कर भाई !"; बहुत ही अच्छा किया अजान ने जो घर से ही रुक्सत कर दिया अगर इस चरित में मै होता तो शायद समझदार को वही समझा देता और कुछ भी कर गुजरता| जो दोस्त अपने ही दोस्त कि बहन पर गन्दी नजर रखे वो तो दोस्ती के काबिल भी नहीं | एक प्यार के लिए वो हिदुस्तान और पाकिस्तान के बीच मधुर सम्बन्ध कि बात करता है तो समझदार कि समझदारी उस समय कहा गयी थी जब पाकिस्तान इंडिया पर आतंकबादी प्रक्रिया कर रहा था एक कुछ सालों के प्यार के लिए इतने सालों कि नफरत को नहीं भुलाया जा सकता समझे समझदार जी | और अंत मै मैं जून जी को बताना चाहूँगा कि प्रेम बिल्कुल पूछ कर ही आता और वो आप खुद है जिससे वो इजाजत लेता है कि इस ब्यक्ति से प्रेम करू या नहीं | चातक जी! इस कहानी के लिए आपको बहुत- बहुत धन्यबाद |

के द्वारा: nitin sinha

मान्यवर चातक जी ! सर्वप्रथम तो मैं आपको कहानी सुनाने के लिए कोटि सधन्यवाद देता हूँ, और आदरणीय शैलेश जी की प्रतिक्रिया से प्रेरणा लेकर उन्ही की तरह एक कहानी पेश-ए-नज़र कर रहा हूँ:- एक गाँव में एक धनवान सेठ रहता था, उसके २ पुत्र थे. दोनों पुत्र विद्याध्धायन के लिए विदेश गए, कुछ समय पश्चात वे दोनों विद्या प्राप्त कर अपने गाँव वापस आये. उन दोनों की किताबी शिक्षा तो हुई परन्तु व्यवहारिक शिक्षा न हो सकी. एक दिन उनके गाँव में किसी किसान का जवान बेटा मर गया, जब सेठ जी को पता चला तो उन्होंने अपने छोटे बेटे को उस किसान के घर जाने को कहा, तो सेठ जी का छोटा लड़का किसान के घर गया.किसान का जो लड़का मरा था वो बड़ा दुष्ट था,तो किसान के द्वार पर बैठे कुछ लोग आपस में बात कर रहे थे कि बड़ा दुष्ट लड़का था भले मर गया. इस बात को जब सेठ जी के बेटे ने सुना तो वह किसान के पास गया और देखा कि किसान बहुत रो रहा है तो वह किसान सान्तवना को देते हुए बोला- मैं सेठ जी का छोटा लड़का हूँ, आप चिंता न करें वैसे भी आपका लड़का बड़ा दुष्ट था भले मर गया.(अब आप लोग समझ ही रहे होंगे कि यह बात सुनकर किसान के दिल पर क्या बीती होगी) वहां से जब लड़का वापस अपने घर आया तो अपने द्वारा किसान को दिए हुए सन्तावना को अपने पिता जी से कह सुनाया. अपने लड़के कि बात सुनकर सेठ जी को बड़ा दुःख हुआ कि इसने तो समाज में मेरी बनाई हुई इज्जत को धो दिया, कुछ सोंच कर सेठ जी ने अपने बड़े लड़के को उस किसान के घर क्षमा मांगने के लिए भेजा. अपने पिता जी कि आज्ञा शिरोधार्य कर वह किसान के घर पहुंचा और किसान से हाथ जोड़कर बोला कि मैं सेठ जी का बड़ा लड़का हूँ, और कल मेरा भाई आपके घर आया था जिसने आपसे दिल को ठेस पहुंचाने वाली बात कही उसके लिए मैं अपने भाई कि तरफ से क्षमा मांगता हूँ, और जब आपका दूसरा लड़का मरेगा तो मैं आपसे इस तरह व्यवहार नहीं करूँगा. पाठको ! यह होता है किताबी शिक्षा और वय्व्हारिकी शिक्षा में अंतर. चातक जी ! एक बार आपको फिर तहे दिल से शुक्रिया.

के द्वारा: Shivashish

चातक जी नई कहानी सुनाने के लिये धन्यवाद । फिर कहानी भी ऐसी जो बुद्धि के कपाट हिला दे (कुछ किवाड़ें बहुत समय से जाम होती है इसलिये एक बार में नहीं खुलतीं जैसे मेरी ) सच कहा हममे से बहुत लोग किताबी ज्ञान पर ही उम्र बिता देते हैं । जो चीजें नंगी आंखों से दिखाई पड़ती हैं उन्हें देखने के लिये दूरबीन लगाते हैं । कुछ ऐसा ही हाल हमारी शिक्षा पद्धति का भी है । क्लर्क से लेकर आईएएस बनने तक के लिये किताबी ज्ञान की आवश्यकता पड़ती है । पिछले सावा सौ साल से अंग्रेजों के दिये हुये सिस्टम पर ही काम हो रहा है और नतीजा बढ़ती हुयी बेरोजगारी, अपराध, भ्रष्टाचार, और हर स्तर पर नैतिकता में गिरावट । इस पुस्तकीय ज्ञान ने हमारी सोच सिर्फ अपने तक ही सीमित करके रख दी । चाहे व्यापारी हो या अधिकारी या नेता । इस अनमोल कहानी के लिये धन्यवाद शब्द छोटा है । आभार ।

के द्वारा: kmmishra

चातक जी आपकी कहानी अत्यंत रोचक और शिक्षाप्रद है ................. पुस्तकीय ज्ञान को फलित करने के लिए मनुष्य को व्यवहारिक ज्ञान भी होना चाहिए ................ इसी क्रम में मैं भी अपने चाचा जी से सुनी एक कहानी सुनाता हूँ ............ एक गुरु जी थे बहुत जो बहुत विद्वान् एवं अनुशासन प्रिय भी थे, दूर दूर से उनसे यहाँ छात्र पढ़ने आते थे | उनके छात्र भी होनहार होते थे | एक दिन गुरु जी को एक ऐसे छात्र को पढ़ने की जिम्मेदारी मिली जो अपनी बूढी से कुछ नहीं सोचना चाहता था | गुरु जी ने उसे ज्योतिष सिखाने का भरोषा दिलाया | फिर गुरु जी ने दिन रत एक कर के कुछ दिनों में ज्योतिष के सारे सूत्र और गणना नियम सिखा दिया | फिर गुरु जी ने छात्र कहा कल आपकी परीक्षा होगी | छात्र ख़ुशी ख़ुशी अगले दिन स्नान ध्यान करके गुरूजी के पास पहुंचा | गुरु जी ने अपनी मुठ्ठी में एक अंगूठी छुपा ली और कहा बताओ मेरी मुठ्ठी में क्या है ? छात्र ने गडाना प्रारंभ की और प्रथम सूत्र के फलादेश से बताया वो बस्तु गोल है , फिर गणना आगे बधाई और दूसरे सूत्र के फलादेश से बताया वस्तु के मध्य के भाग खाली है, और छात्र ने अगली बार बताया वस्तु बहुमूल्य, चमकदार है, और धातु की बनी है | गुरु जी ने प्रसन्नता दिखाई, परन्तु उसी समय छात्र ने कह दिया गुरु जी मुठ्ठी खोल दीजिये ये अवस्य की आटे की चक्की है........................ अंतत छात्र ने अपने मस्तिष्क का प्रयोग नहीं किया और साड़ी जानकारी होने के बाद भी उत्तर गलत बता दिया .................

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

के द्वारा: sanjeev kumar

आप सभी के हम बहुत ही शुक्रगुजार हैं, जिन्होंने हमारी परेशानी को अपनी परेशानी समझ कर साथ दिया और तब तक लड़ते रहे, जब तक कि बुराई हार ना जाये… तो देखिये हम सब की एकता की ताकत के आगे बुराई आखिर हार ही गई, अरे भाई उस चोर ने अपने ब्लॉग से इस मंच की रचनाएँ हटा ली है…तो अब हम खुश हैं और आप सभी भी हो जाइये….. इस मंच पर यहीं तो बात अच्छी लगती है कि एक प्रतियोगिता में भाग लेते समय लोग वैसे तो एक दुसरे के प्रतिद्वंदी बन जाते हैं, पर जरुरत में हर कोई साथ होता है….और किसी एक का दुःख सबका होता है….ये मंच एक परिवार ही है….और भगवान से प्रार्थना है कि सभी के बीच ये स्नेह हमेशा बनाये रखे… पर हम सभी को अभी कुछ काम और करने होंगे….हमें इस समस्या का ठोस उपाय सोचना पड़ेगा ताकि भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति ना हो और ये जड़ से ख़त्म हो जाये….तो चलिए मिलजुल कर कुछ सोचे…

के द्वारा: aditi kailash

के द्वारा: Chaatak

के द्वारा: जलाल

के द्वारा: शिवेंद्र मोहन सिंह

अरविन्द जी, सबसे पहले तो इस लेख पर इतनी अच्छी प्रतिक्रिया देने का शुक्रिया. आपकी बात बहुत हद तक मुझसे इत्तेफाक रखती है. मेरी अपनी राय है कि अदालत ने साडी वाले मामले की सुनवाई करके सिर्फ वक्त जाया किया है. अदालत का बहुमूल्य वक्त जाया करने के लिए अदालत को उन लेडी डाक्टर पर जबरदस्त जुर्माना और सजा देनी चाहिए थी. जहाँ तक महिला के ह्रदय परिवर्तन की बात है ये न तो अदालत का कार्य क्षेत्र है न ही उसकी जिम्मेदारी. किसी का परिवार संभालना या परिवार में समरसता उत्पन्न करना न्यायालय का काम नहीं हो सकता है. न जाने कितने गंभीर मामले हैं जिनपर तारीख पर तारीख मिलती रहती है और पीढ़ियों तलक लोगों को न्याय नहीं मिलता ऐसे में अदालतें अगर साडी और टीवी देखने का मामला निपटाएंगी तो फिर हो चुका इन्साफ. भाई जी, मुझे तो उपरोक्त मुकदमा एक किसान द्वारा चूहों पर किये मुक़दमे जैसा लगा जिस पर अदालत ने तीन साल सर खपाया, फैसला चूहों के खिलाफ दिया और अगले ही दिन चूहों ने फिर फसल कुतर डाली. किसान तो मजाक बना ही, अदालत की भी छीछालेदर खूब हुई. प्रतिक्रिया का एक बार फिर धन्यवाद.

के द्वारा: Chaatak

29 मई की पोस्‍ट पर अब टिप्‍पणी । कारण आज ही अचानक सात कहानियां पढ़ने चला आया था । समय साथ था इसलिए 'प्रसंगवश' को भी पढ़ लिया । बड़ी गहरी सोच के साथ बात को रखने का आपका अंदाज मन को भा गया । मैं आपकी बातों का समर्थन करता हूँ । उस हिन्‍दूस्‍तान को तो अब खोजना ही होगा । आपनें साड़ी पर बवाल का सन्दर्भ संभवत: अदिति जी के ब्‍लॉग के बारे में दिया है । आपने शायद मेरा इसी शीर्षक का ब्‍लॉग नहीं पढ़ा है, जिसके प्रत्‍युतर में अदिति जी ने ब्‍लॉग लिखा लेकिन दूसरे संदर्भ में । मैंनें साड़ी पर कानुन के बवाल पर लिखा था व निगम जी को जबाव देते हुए मैंनें स्‍पष्‍ट भी किया था कि 'जहां प्रश्न तलाक का था क्या अदालत के निर्णय से उसका उत्तर मिला ? क्योंकि साड़ी पहनना कहना क्रुरता है यह भी गलत है तो परिवार के रिवाजों व परंपराओं को न मानना भी तो परिवार के प्रति क्रुरता ही कहलाएगा। अदालत ने तलाक नही मंजूर किया लेकिन क्या इससे उस लेडी डाक्टर का ह्रदय परिवर्तन हुआ या ससुराल का ह्रदय परिवर्तित हुआ ? क्योंकि इस निर्णय के बाद भी स्थिति जस की तस बनी रही ।' इतना सब लिखने का कारण है कि भाईजी के माध्‍यम से मैं भी हिन्‍दूस्‍तान में अपना हिन्‍दूस्‍तान खोज रहा हूँ ।

के द्वारा: Arvind Pareek

चातक जी कोई कोई धन्यवाद आपको ..आपकी ये पोस्ट पढ़कर जो आनंद आया उसे मै बयां नहीं कर सकता बस ऐसे अंदाजा लगा लीजिये... की बचपन से जबसे होश संभला तबसे यही कहानी हमने नानी से सुनी और हजारो बार सुनी .... इतनी पसंद थी ... समय के साथ सब बदल गया नानी भी बूढी हो गई है उन्हें अब याद नहीं है और दुनिया की इस भागदौड़ में हम भी भूल चुके थे... बस ये याद था की चिड़िया की एक कहानी थी जो नानी सुनती थी... और उसे सुनने का मन अब भी करता है अक्सर.... बहुत बहुत धन्यवाद.... अब वैसे भी नई पीढ़ी में नानी दादी और उनकी कहानियो के लिए वक्त नहीं रहा ... कम्पूटर पर गेम खेलता और भरी भरकम होमेवोर्क करते करते बचपन कब खो जाता है पता ही नहीं चलता..... एक बार फिर से धन्यवाद.......

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

के द्वारा: Ajay Vikram

अदिति जी, आपकी इस तरंगी प्रतिक्रिया के लिए आपका शुक्रिया. ये कहानी मैंने बचपन याद दिलाने के लिए ही लिखी है. हमारे आपके विचारों और आचरण पर इनका अमित प्रभाव होता है. मुझे ये कहानियां ग़ुम होती प्रतीत होती हैं. काश के आज के बच्चे भी इन्हें अपने बुजुर्गों से सुन पाते! हाँ मामा बचाओ अभियान के तहत इक उपाय है - आप शेष छः कहानियों को पूरा पढ़ें अगर बीच में सोये तो समझो मामा रास्ता जरूर भूल जायेंगे | आपकी बचपन की यादों के लिए मेरी कविता की चन्द पंक्तियाँ पेश-ए-नज़र हैं- दिन का स्वागत करती कोयल, रात सुहानी बुलबुल की | आठ पहर का रैन बसेरा, गिनती क्या पल दो पल की | आओ उठें एक गीत लिखें फिर, खुशी समेटें पल-पल की | लौट चले फिर से बचपन में, फिक्र रहे न जीवन की |

के द्वारा: Chaatak

के द्वारा: Chaatak

सुबोध जी, आप की बात कुछ हद तक और कुछ मामलों में सही है, परन्तु जब नजरिया एक सभ्य समाज से ताल्लुक रखता हो तो अनर्गल प्रलाप पर तुरंत लगाम जरूरी है और यह तभी संभव है जब पाठक फौरी प्रतिक्रिया देने से गुरेज़ न करें. आपके शब्द चुनाव में एक गलती है. आपने लिखा 'अति उत्साह में' नहीं मैंने लिखा है 'अत्यधिक रोष में' क्योंकि हर के स्त्री में कहीं मुझे माँ दिखती है तो कहीं बहन, अब इन्हें कोई गलत राह को सही बताये तो रगों में खून ऐसे उबलता है मानो लावा, और जिस बेटे या भाई का खून इस पर भी न खौले तो कब खौलेगा, आपने जवाब में सुझाव माँगा तो मैं एक बार फिर इसकी व्याख्या जरूर करूँगा वैसे जवाब मैंने ब्लॉग में दे रखा है, तनिक ध्यान से पढेंगे तो स्पष्ट हो जायेगा | आपकी प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद, आपके सुझाव और प्रतिक्रियाओं का सदैव स्वागत है.

के द्वारा: chaatak

दीपिका जी, प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद, आपकी और अदिति जी कि प्रतिक्रिया मेरे लिए बहुमूल्य है क्योंकि आप स्त्री वर्ग का प्रतिनिधित्व करती हैं और यह ब्लॉग तथाकथित स्त्रीवादी ब्लॉग की प्रतिक्रिया स्वरुप लिखा गया है | मेरा इशारा कुछ छद्म स्त्री-वादी बीमार मानसिकता वाले पुरुषों की ओर है जो खुले आम व्यभिचार को प्रेम और वासना तुष्टि को मानवीय जरूरत बताते हैं और कहते हैं कि prostitutes को प्रोत्साहन देना चाहिए और उन्हें समाजसेविका कहना चाहिए, जहाँ बात स्त्री को गलत राह से निकालकर एक सम्मानित पुनर्वास कि होनी चाहिए वहाँ नारी का इस्तेमाल गन्दी मानसिकता वाले पुरुषों की कामतुष्टि के लिए करने का विचार भी कितना घृणित है हर व्यक्ति को समझना चाहिए, ऐसे में भी यदि मेरे या किसी भी हिन्दुस्तानी के खून में उबाल न आये तो कब खौलेगा, क्या पिता का खून रगों में बहते-बहते पानी हो गया है या माँ का दूध और बहन का प्यार सूख गया है. आपके नैतिक समर्थन के लिए आपका एक बार फिर धन्यवाद.

के द्वारा: chaatak

के द्वारा: vinay mishra

सोनी जी, आपकी प्रतिक्रिया पढ़ कर अच्छा लगा, आपके मन में समाज के प्रति कहीं न कहीं गहरी असहमति घर कर गई है, जरूर आपने कुछ ऐसा देखा या महसूस किया है जहाँ आप सामाजिक रवईये से आपको ठेस पहुंची है, समाज हमारे परिवार से अलग थोड़े ही है, बहुत सारे परिवार मिलकर ही समाज बनाते हैं, हमें समाज का ही भरोसा है तभी तो हम अपने छोटे से बच्चे को सायकिल देकर बाज़ार भेजते हैं और हमें पता होता है कि अगर उसे चोट आई तो कोई न कोई उसे उठा कर अस्पताल या घर जरूर पहुंचेगा, हमारे दिल में विश्वास होता है कि अगर कोई हमारे बच्चे को अगवा करने कि कोशिश करेगा तो लोग उसे बचायेंगे, अगर हमारी बच्ची का दुपट्टा कोई खींचेगा तो चार लोग उस लफंगे को जरूर पीट देंगे, आप खुद को भी समाज कि भीड़ में सुरक्षित समझ्रते हैं और सुनसान में आपको भी तो डर लगता है, कोई भी समझदार प्रेमिका अपने प्रेमी से भीड़ वाले स्थान पर ही मिलना पसंद करती है जब उसे अपने प्रेमी पर पूरा विश्वास हो जाता है वो तभी उससे अकेले में मिलती है, जो भी गलत होता है वो नजरें बचा के किया जाता है और जो लोग गलत करते हैं वे सामाजिक नही असामाजिक लोग होते हैं, खैर बात काफी बड़ी है, सारांश में मैं यही कहता हूँ कि आप काफी अच्छी चिन्तक हैं और उत्तरोतर बेहतर कर रही हैं, आपका लेखन और आपकी सोच बेहतर विकसित हो रही है मैं काफी संभावनाएं आप में देख रहा हूँ, आपके विचारों कि धार काफी तेज है कहना गलत न होगा कि मैंने आपकी शैली में ओज देखा और आपने मुझे लिखने को प्रेरित किया, आपको गलत साबित करने के लिए नहीं आपको पूर्वाग्रह से बाहर लाने के लिए, आपकी प्रथम पंक्ति- जब एक बार कालिख पुत ही गई, मार्मिक है शायद यही चोट है जो युवक-युवतियों को समाज का विरोधी बना रहा है , आपने ये कह समाज के उन पहलुओं कि ओर जाने कि दिशा दी है जहाँ समाज अपने ही भविष्य को अपनी नज़रों में गुनाहगार समझने कि गलती करने को प्रेरित करता है,

के द्वारा: chaatak

जब एक बार कालिख पुत ही गई तो कालिख उतारकर काजल मलने का क्या लाभ ! अब यहाँ मैं किसी की कारगुजारियो को बढावा नहीं दे रही ! मैंने तो यही सिखा है की घर के झगडे घर में ही सुलझते है चोक पर नहीं, चोक पर सिर्फ तमाशे होते है ! और लोग जिस ओनर को बचाने के लिए किलिंग कर रहे है क्या वो ओनर किलिंग के बाद बचता है ???? नहीं तो क्यों करो ऐसा ! जब बात एक बार बिगड़ ही गई तो उसे और क्यों बिगाड़ा जाये ! यहाँ रहीम का एक दोहा याद आ गया \"बिगरी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय ! रहिमन बिगरे दूध को, मथे ना माखन होय ! \" समाज , क्या कहे इस समाज के बारे में अगर दो परिवार अपने बच्चो के अंतरजातीय विवाह में अपनी मंजूरी दे भी दे तो ये समाज यही कहेगा \"कही की इट कही का रोड़ा भानुमती ने कुनबा जोड़ा\" और अगर परिवार इस समाज के ही लिए अपनी संतानों की बलि भी दे दे तो भी ये समाज इन परिवारों का विरोध ही करेगा, समर्थन नहीं ! आखिर में कबीर का एक दोहा याद आ गया \"माला फेरत जुग भया, फिर ना मन का फेर! कर का मन का दार दे, मन का मनका फेर !\" और सर इशारे की क्या ज़रूरत थी आप सीधा नाम भी ले सकते थे ! खेर जो आपने कहा वो आपकी सोच जो मैंने कहा वो मेरी सोच ! \"कबीरा खड़े बाज़ार में मांगे सबकी खेर, ना कहू से दोस्ती ना कहू से बैर !\"

के द्वारा: soni garg

मैं मनोज और बबली की हत्या को जायज नहीं कह रहा मुझे पंचायत को नाजायज कहे जाने पर एतराज है | मुझे ऐतराज है मुद्दे को नारी मुक्ति आंदोलन से जोड़ने पर जो श्रीमती सुहासिनी अली सहगल जी कर रही हैं | दोस्त इस पर कोई संदेह नहीं की पंचायत तो दहेज प्रथा, बाल विवाह, दहेज हत्या इत्यादि विषयों पर भी गंभीरता से फैसले लेने चाहिए. लेकिन इस बात से आप इंकार कहाँ कर पाएंगे की वंश एवं धर्म पर लगी चोट ज्यादा आहत करती है | अगर हम संयम को ऐसे ही त्याग देंगे तो हमारा समाज भी पाश्चात्य समाज की तरह भ्रष्ट हो जायेगा | अदालत भी फैसले कब लेती है - जब हम एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ते हैं. अगर आप कभी अदालत में न्याय के लिए गए होंगे तो आप को इस बात का अहसास आपको भी होगा की आज भारत की न्याय प्रक्रया कितनी धीमी है ऐसे में मैं पंचायतों तो अदालतों से कहीं बेहतर पाटा हूँ. मैं आपको अपना अनुभव बताता हूँ | मैं एक गरीब किसान परिवार से हूँ | मेरे गांव में बहुत सी आबादी और शामिलात भूमि मौजूद है जिस पर आये दिन फसाद होते रहते हैं| मेरे दादाजी ने १९७६ में यानी मेरे जन्म से पहले इन भूमियों का न्यायपूर्ण बटवारा करने के लिए एक मुकदमा किया ये मुकदमा तब से ले कर आज तक लगातार चल रहा है | मेरे पिताजी का अकस्मात देहांत होने के बाद भी ११ वर्ष बीत चुके हैं| हम अपने खून को जला कर मजदूरी करते और पैत्रिक भूमि से मोह से क्योंकि धरती हमारी माँ है हर माह उस खून पसीने की कमी से १० रूपया प्रति पेशी पेशकार को और ५० रूपया प्रति पेशी अधिवक्ता महोदय को देते आ रहे हैं | ये सिर्फ मेरी कहानी नहीं हर तीसरे भारतीय किसान की कहानी है जिसके पास थोड़ी बहुत भूमि हो | आज जब मैं आराम कुर्सी में बैठ कर चिंतन करने वाले लोगों को अपनी राय इतनी गैरजिम्मेदारी से देते देखता हूँ तो कष्ट होता है | लेकिन मैं निराश नहीं हूँ मुझे पूरा विश्वास है की तस्वीर बदलेगी अगर हम इसी तरह सच्ची बात तो आगे लाते और सत्य को स्वीकार करने की हिम्मत जुटाते रहे | अब मैं आपके प्रश्न पर आता हूँ अगर अदालत की जगह कोई पंचायत निर्णय करती तो थोड़ी बहुत विसंगतियों के साथ फैसला मेरे दादा के समय ही हो जाता | भूमि अगर हमें न भी मिलती तो कम से कम हमे अपनी किताबों, स्कूल की फीस, कपडे, यहाँ तक की खाने में भी कटौती न करनी पड़ती | और दोस्त तब शायद मैं आपसे आज से कम से कम ५ वर्ष पहले इन्टरनेट पर मेल से ही सही जुड जाता | जब आपके पास कुछ भी नहीं होता तब आपके पास आपके धर्म आपके चरित्र और पारिवारिक रिश्तों की बड़ी ताकत होती है | अति उदारवाद चरित्र हनन तो कर रोटी और जिंदगी की भीख तो देता है लेकिन बदले में पारिवारिक विश्वास, चारित्रिक बल, और संघर्ष की क्षमता को निगल जाता है | यूनान, मिस्र, रोमां, सब मिट गए जहाँ से, लेकिन अभी है बाकी नामों-निशान हमारा, कुछ खास है के हस्ती मिटती नहीं हमारी, गो कि रहा है दुश्मन दौर-ए-जहाँ हमारा | ये खास है हमारा चरित्र, हमारे क़ुरबानी देने का माद्दा और हमारा आपसी विश्वास जिसे कमजोर चरित्र वाले लोग छद्म उदारवाद कि आड़ ले कर नष्ट कर देना चाहते हैं | फैसला आपका है, क्योंकि हिंदुस्तान आप का है | शहीद तो क़ुरबानी दे के वतन आप के हवाले कर गए हैं | उनकी पास चरित्र की ताकत छोड़ के और क्या था ? क्या आज हम वही गवां देंगे ?

के द्वारा: chaatak

 उचित कहा आप ने , |आज जहा देखो वही नारी स्वतन्त्रता की बात कही जा रही है मेरे समझ में ये नहीं आता की ये सुहासिनी अली जैसे लोग किस स्वतन्त्रता की बात करते है .क्या घर के लोगो की बात मानना गलत है या जो नारिया अपने जाति या गोत्र में विवाह करती है वो गलत है .मैं खाप पंचायतो के तरीको को तो गलत मानती हू .पर उन के विचरो से सहमत हू हम क्यों अपनी परम्पराओ को भूलकर ही सारे का करे.क्या स्वत्नता के आगे अपने माँ बाप के अरमानो को भूल जाये .जो लोग अपने माँ बाप के प्रेम को भूल सकते है तो क्यों वे लोग एक दूसरे के प्रेम को जीवन भर निभा पायेगे .................ये सोचने का विषय है ????????///क्या अब हमारे समाज को एक अकुश की जरूरत नहीं है ????????????????????????/

के द्वारा: dr.divya




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