चातक

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chaatak


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मानवाधिकार की अमानवीय राजनीति

Posted On: 2 Jan, 2016  
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निर्भया के असली गुनाहगार

Posted On: 21 Dec, 2015  
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एक आशिक की डायरी से- 2

Posted On: 17 Apr, 2015  
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बिटिया के प्रश्न (पिता के उत्तर)

Posted On: 3 Mar, 2015  
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द पावर ऑफ़ किस

Posted On: 11 Feb, 2015  
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गांधी का पूरक गोडसे

Posted On: 8 Feb, 2015  
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ज़िंदा देश की घुटती आवाज़

Posted On: 23 Dec, 2014  
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मैं बाली, मैं राम

Posted On: 16 Sep, 2014  
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जुवेनाइल: किशोर या छिछोर

Posted On: 10 Aug, 2014  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा:

दुनिया का कोई कानून ऐसा नहीं है जिसकी व्याख्या न्याय को होने से रोके बशर्ते न्याय करने वाला व्यक्ति न्याय देते समय निर्विकार और दृढ-प्रतिज्ञ हो कि वह सिर्फ न्याय करेगा और कानून के अनुसार करेगा| तरस आता है मुझे उन अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों पर जिनके पास कानून के अपर्याप्त होने का रोना तो है लेकिन उपलब्ध कानून की व्याख्या करने की या तो मंशा नहीं या फिर अक्ल या फिर दोनों ही नहीं है बस कुर्सी मिल गई है तो नौकरी बजा रहे हैं| आदरणीय चातक जी, आपकी भावुक घोषणा मैंने फेसबुक पर भी पढ़ी थी. वस्तुत: हम सभी हतप्रभ हैं सुप्रीम कोर्ट की निष्क्रियता पर. इस देश में न्याय खरीदे जा सकते हैं तभी तो अपराध नहीं रुक रहे. काश की ऐसी घटना किसी VIP के साथ हुई होती तब भी क्या यही फैसला होता? या फिर कानून को हाथ में लेने पर मजबूर होते? बहरहाल आपको मिले सम्मान की बधाई! आप ऐसे ही अपनी कलम चलते रहें शायद कोई बदलाव आये! सादर

के द्वारा: jlsingh jlsingh

दलित और वाणिज्य में आरक्षण- (From a friend's timeline) जे एस कॉटन ने 1893 में एक रिपोर्ट पेश की थी जिसका नाम था ' प्रोग्रेस ऑफ़ एजुकेशन ' उस रिपोर्ट में उन्होंने भारतीय शिक्षा पर सर्वे किया था और एक घटना का वर्णन किया था जो की गुजरात की थी । गुजरात के कैरी जनपद् में स्थानीय अंग्रेज अफसरों की मदद से अछूत बच्चों का भी दाखिला स्कूल्स में होने लगा था । पर गैर दलितों ने इसके खिलाफ आंदोलन छेड दिया । कई स्कूल्स बंद करवा दिए गए और दलित बस्तियों में आग लगा दी गई । इसी प्रकार अंग्रेज प्रशासक आर नाथन ने भी अपनी रिपोर्ट ' प्रोग्रेस ऑफ़ एजुकेशन -2' में बताया की गैर दलितों ने अछूतो की शिक्षा का विरोध करने के लिए महाराष्ट्र में एक अलग तरीका अपनाया , उन्होंने उन स्कूल्स में नौकरी करनी ही बंद कर दी जिसमे दलित बच्चे पढ़ते थे । बाद में ऐसा ही विरोध पुरे देश में हुआ और हार के अंग्रेजी सरकार ने दलितों के लिए अगल स्कूल्स बनवाना शुरू किया। बाद में अंग्रेजो की उदारता तथा शुद्र अछूत महापुरुषो के अथक प्रयासो और त्याग से आज़ादी के बाद आरक्षण से अछूतो में शिक्षा का प्रसार हुआ । जंहा मनु द्वारा निर्धारित सामजिक आरक्षण के कारण शिक्षा पर केवल ब्राह्मण का आरक्षण था और अछूत शिक्षा प्राप्त करने से वंचित था वंही बाबा साहब के प्रयासो से आज़ादी के बाद अछूत सुप्रीम कोर्ट के जज तक बनने लगे । हजारो अछूत शिक्षक बनने लग गए , प्रोफ़ेसर, कुलपति बनने लग गए। जंहा अछूतो को केवल झाड़ू और गंदगी साफ़ करने का भर अधिकार था वंही अछूत आई पी यस बनने लग गए , आई ए एस बनने लग गए। जंहा पहले सेना और प्रशासन में केवल क्षत्रिय का आरक्षण था ,पर बाबा साहब के प्रयासो से क्षत्रियो का यह आरक्षण टूटा और अछूत सेना में भर्ती होने लगे , अफसर बनने लगे । अछूत प्रसाशनिक कार्यो में भाग लेने लगे , नेता बनने लग गए । जंहा अछूतो को केवल बस्ती से बाहर टूटी झोपड़ियो ही बसने और मिटटी के बर्तन में रखने का ही अधिकार था वंही आज लाखो अछूतो के पास आधुनिक सुख सुविधा का सामान है , खेत - खलियान, ट्रेक्टर , ट्यूबेल, कार , फ्लेट्स हैं । लाखो दलित कृषि कार्य में हैं ,डॉक्टर , इंजीनयर हैं । पर दलित वैश्यों के आरक्षण को अभी नहीं तोड़ पाया है , अभी दलित उद्योग , वाणिज्य, सिनेमा में बहुत पीछे हैं । देश के 100 शीर्ष उद्योगपतियों में एक भी दलित नहीं है । इसका एक कारण यह भी रहा है की अधिकतर कंपनियां पुरानी हैं ,वे आज के माहौल से अलग बिना खुली होड़ में उतरे ही बड़े उद्योगपति बन गए हैं । यानि उन्हें बिजनेस विरासत में मिला है । पर केवल यह सोच के दलितों को चुप बैठना मूर्खता है , यदि दलित उद्योग - वाणिज्य के तरफ से मुंह फेरे हुए है तो कंही न कंही दलित नेतृत्व भी इसका दोषी रहा है । दलितों को यह समझना चाहिए की यह उद्योगपाति ही होते हैं जो देश की अर्थव्यवस्था तय करते हैं । किसी भी देश की रीड की हड्डी होते हैं उद्योग और वाणिज्य , यदि किसी देश की अर्थव्यवस्था फेल तो समझो की देश फेल । अत: दलितों और दलित नेतृत्व को अधिक से अधिक दलितों को उद्योग में भागीदारी लेने के लिए प्रेरित होना चाहिए ।

के द्वारा: arvindnigam arvindnigam

मर्यादा में पिता बंधा है, मर्यादा में माता; मर्यादा में धरती, नभ, जीवन और स्वयं विधाता| पिता नहीं मर्यादित तो परिवार बिखर जाता है; माता मर्यादित न हो तो राष्ट्र बिखर जाता है| धरती छोड़े मर्यादा तो बंजर कहलाती है; अम्बर न हो मर्यादित तो सृष्टि कष्ट पाती है| स्वयं विधाता मर्यादित होकर ही पूज्य बना है; उसका त्याग मानवों से चौरासी लाख गुना है| तुझे पराई कहकर माँ खुद को धोखा देती है; हेतु तेरा, निज हृदय शिला विछोह का वो ढोती है| बिटिया होती विदा उसे परिवार नया मिल जाता है; जीवन साथी उसकी दुनिया में खुशियाँ ले आता है| गज़ब प्रतिभा के धनि हैं आप श्री चातक जी ! बहुत ही सुन्दर और प्रशंसनीय रचना ! बहुत बहुत बधाई

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: chaatak chaatak

स्नेही चातक जी जब पत्र ही गौण हो चुके तो पत्रकारिता रही कहाँ । पत्र पत्रिकाएँ जो कभी समाज की दिशा तय करती थीं उन्हें पढने का आज किसी के पास समय ही नहीं है । आज तो बस मीडिया है जिसका माध्यम टीवी और इंटरनेट है । यहाँ सभी वही लोग हैं जिनका आपने बखूबी चित्रण अपने सुन्दर लेख में किया हुआ है । ये जानते हैं कि भागदौड़ कर घर घुसे आदमी को तर्क नहीं तरावट की ज़रूरत है, इसलिए सनसनीयुक्त तरावट परोसते लाज कैसी । जब बीते कल की कोई चीज़, यहाँ तक कि मौसम भी असली नहीं रहा, तो ये भी धंधे और सिर्फ धंधे की सोच कर कौन सी गलती कर रहे हैं । मैं आपसे पूर्णतया सहमत हूँ ।

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

के द्वारा: chaatak chaatak

ब्लॉग बुलेटिन की गुरुवार २१ अगस्त २०१४ की बुलेटिन -- बच्चों के साथ बच्चा बनकर तो देखें – ब्लॉग बुलेटिन -- में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... एक निवेदन--- यदि आप फेसबुक पर हैं तो कृपया ब्लॉग बुलेटिन ग्रुप से जुड़कर अपनी पोस्ट की जानकारी सबके साथ साझा करें. सादर आभार!

के द्वारा:

चातक जी, सादर अभिवादन! सार्थक और विचारणीय आलेख के साथ साप्ताहिक सम्मान की बधाई! जुवेनाइल कानून एक अच्छी सोच की उत्पत्ति था लेकिन वो कानून तब बनाया गया था जब भारत जैसे देश पर न तो पाश्चात्य संस्कृति हावी थी और न ही मीडिया की नंगई| इसे लाने के पीछे एक मात्र कारण था उस समय सबसे बुरे किस्म के लोगों में भी अपने बच्चों को अच्छा बनाने की ललक जिससे लगभग १८ वर्ष की उम्र तक के लड़कों को शातिर अपराधी मस्तिष्क मिल पाना दुर्लभ संयोग या कुसंगति ही हो सकती थी| उस समय न तो समाचार के नाम पर स्त्री देह का व्यापार होता था और न ही मूवी इत्यादि में फूहड़ता की गुंजायश थी ! दूसरी ओर आज के युग में किशोर आयु को बच्चों को सबसे अधिक भृमित आधुनिक तथा कथित सोसल साइट के द्वारा भी किया जाता - एक जाति विशेष के तो १० वर्ष तक के बच्चे भी सेक्स का उतना ज्ञान रखते है जितना कोई युआ व्यक्ति रखता होगा ?

के द्वारा: s.p. singh s.p. singh

के द्वारा: nishamittal nishamittal

आदरणीय कृष्ण जी, सादर अभिवादन, राष्ट्रवाद पर जातिवाद हमेशा से हावी रहा है, प्राचीन समय में लोगों में कार्यों का बंटवारा किया गया था| हर कार्य सुचारू रूप से हो तथा प्रशासन को सुविधा हो इस उद्देश्य से मगर बाद में भेदभाव की भावना ने जातिवाद को जन्म दे दिया| आज जनता जातिवाद से ऊपर उठकर यदि राष्ट्रवाद की सोंचे भी तो भ्रष्ट नेता ऐसा होने नहीं देते वो सत्ता के लालच को सभी धर्मों से ऊपर रखते हुए जातिवाद को समय-समय पर भड़काते रहते हैं| आज जरुरत है एक सशक्त केन्द्रीय शक्ति की जो देश में राष्ट्रवाद की भावना को मजबूती दे और देश को जातिवाद से मुक्त करे, मुझे ये आसार नजर आ रहे हैं| आपने बहुत ही सधे हुए शब्दों में अपने विचार रखे हैं, उम्दा विचारों के लिए हार्दिक बधाई!

के द्वारा: sudhajaiswal sudhajaiswal

कहना गलत नहीं होगा कि रचनात्मक राजनीति की जो जगह एक संप्रभु राष्ट्र में होनी चाहिए वह हिन्दुस्तान में कभी नहीं दिखाई पड़ी| मुसलमान देशभक्त है ये बताने के लिए आज भी अब्दुल हमीद के नाम का सहारा लेना पड़ता है या फिर मुलायम के लेफ्टिनेंट आज़म खान की तरह ये बताना पड़ता है कि हिन्दुस्तान की सरहदों की रक्षा मुसलमानों के रहमो-करम पर है| मायावती को बार-बार ये बताना पड़ता है कि दलित सिर्फ दलित होता है और हमेशा दलित ही रहता है क्योंकि वह यदि राष्ट्र की मुख्यधारा में चला गया तो उनकी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का क्या होगा| बहुत दिनों के बाद आपको दोबारा एक सार्थक , तेजतर्रार पोस्ट के साथ पढ़ रहा हूँ ! yogi-saraswat.blogspot.in

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

आदरणीय खुराना जी- कुछ और भी बिन्दुओं पर प्रकाश डालते तो मामला साफ़ हो जाता- १. केजरीवाल हर बार अपने वादों और इरादों से मुकर जाते हैं| २. उनके नज़र में सभी भ्रष्ट हैं लेकिन वो अपने इल्जामो को लेकर कभी अदालत नहीं जाते यानी उनके खाते में अभी एक भी भ्रष्टाचारी का विकेट नहीं है| ३. सोनिया, मनमोहन और राहुल हर भ्रष्ट को बरी करवा ले जाते हैं यथा- कणीमोड़ी, ए राजा, मनमोहन सिंह, पवन बंसल, रावर्ट वाड्रा लिस्ट बहुत लब्म्बी है| ४. उपरोक्त सभी आरोपों के बावजूद गुजरात सबसे खुशाल और समृद्ध प्रदेश है और मोदी सबसे लोकप्रिय नेता [सभी खबरिया चैनल जो भाजपा और मोदी विरोधी भी हैं] ५. उत्तर प्रदेश में लोकपाल और आर० टी० आई० सब काम कर रही हैं फिर भी २ साल में ही सवा सौ से ज्यादा साम्प्रदायिक दंगे| ६. इन सभी बातो को दरकिनार कर देते हैं- आप ही बताइए किस पार्टी और नेता को चुने है कोई इस लायक जिसे प्रधानमंत्री के रूप में आप देखना चाहते हैं| ७. आपके द्वारा लिखा गया छठा बिंदु सीधे केजरीवाल की ही और इशारा कर रहा है ना मानिये तो आज के दैनिक जागरण में सम्पादकीय पृष्ठ पर राजीव सचान जी का लेख पढ़ लीजिये :) शीर्षक है 'एक उतावला राजकुमार' कृपया देश को गुमराह करने की कोशिश न करें!

के द्वारा: chaatak chaatak

प्रिय चातक जी, कृपया इन बिन्दुयों पर भी ध्यान दीजिये ! १. गुजरात में अमित जेठिया जैसे आर टी आई कार्यकर्त्ता कि हत्या कर दी गयी ! जिसमे भाजपा के नेतायो का नाम स्पष्ट रूप से है ! २. गुजरात में दस साल तक लोकायुक्त कि नियुक्ति नहीं कि गयी ! ३. उच्चतम न्यायालय ने अमित बेन पातें को जमीन आबटन मामले में दोषी पाया फिर भी आज वो गुजरात में मंत्री है ! ४. चार सौ करोड़ के मछली पालन घोटाले में कोर्ट द्वारा दोषी पाये गए पुरषोतम सोलंकी आज भी मंत्री है ! ५. भ्रष्टाचार के मामले में जेल यात्रा कर चुके यदुरप्पा को भाजपा पार्टी में फिर शामिल किया। ६.चुनाव के शोर में सच कई बार सुनाई नहीं देता खासकर जब शोर करने वाला झूठ बोलने में माहिर हो। राम कृष्ण खुराना

के द्वारा:

आदरणीय जे०एल० सिंह जी, सादर अभिवादन, मत-विभिन्नता स्वस्थ लोकतंत्र के शुद्धिकरण का एक अच्छा कारक है और मुझे हमेशा अच्छा लगता है बशर्ते यह किसे द्वेष या पूर्वगृह से ग्रसित न हो| आपके मत को मैं बिंदुवार लेता हूँ- पहला तो आपने स्वयं माना है कि "मोदी जी में नेतृतव और निर्णय लेने की क्षमता है"| दूसरा आप मोदी के दम्भ की बात करते हैं तो उसे आप कमी मान सकते हैं लेकिन मैं उसे एक कुशल शासक का अहम चरित्र मानता हूँ देश का प्रधानमंत्री वही होना चाहिए जिसमे आत्मसम्मान और राष्ट्र के गौरव का अभिमान हो व्यक्तिगत गर्व से ही उपरोक्त दोनों उपजते हैं शायद इस बात से भी आप इंकार नहीं करेंगे| तीसरी बात- सत्ता का लोभ कभी ख़त्म नही होता और इसके सबसे अच्छे प्रमाण केजरीवाल हैं जो अवसर पाते ही धरना देते हैं, अवसर पाते ही अनशन छोड़ कर भाग जाते हैं, बिना अवसर के ही अन्ना को छोड़कर राजनीति करने उतरते हैं और खुद भाजपा में जाने की बात कह कर पलट भी जाते हैं| दूध का धुला कोई नही परन्तु जब सर पर मोदी जैसा शासक हो तो कोई भी बेईमान ईमानदारी से काम करना शुरू कर देगा| आपने तो देखा ही होगा कि ईमानदार अफसर आते ही क्लर्क से ले कर चपरासी तक हरिश्चंद हो जाते हैं और बेईमान अफसर के बैठते ही सारे फिर कफ़न-चोर बन जाते हैं| चौथा- आपको नही लगता कि पिछले १० वर्षों में भ्रष्टाचार चरम पर पहुँच गया है और कांग्रेस यदि भ्रष्ट है तो उसे सींच कौन रहा है? क्या ये सपा और बसपा नहीं है? फिर इनके समूल विनाश की बात पर आपको ऐतराज़ क्यों? पांचवा वसुंधरा ने बयान नहीं जवाब दिया है जब आप प्रतिकार के लिए नाकारा विपक्ष तक से सहमति जताते हैं तो सरे-आम धमकी देने वाले को जवाब देने वाले को भड़काऊ कैसे कह सकते हैं? ये तो गलत है कि प्रतिकार न किया जाए इसे तो गांधी जी भी सबसे बड़ा पाप कहते थे| छठा- अमित शाह के किस बयान को आप भड़काऊ कह रहे हैं? जिसमे वो लोगों से वोट देकर बदला लेने की बात कह रहे हैं तो इसमें भड़काऊ क्या है? मार-काट छोड़कर वोट देकर अपनी ताकत दिखाना यदि भड़काऊ है तो आग लगा देनी चाहिए हिन्दुस्तान के संविधान को क्योंकि ये भड़काऊ ताकत उसी ने हमें दी है और बार बारवोट देने को प्रेरित भी करता है! आपकी प्रतिक्रिया पाकर बेहद ख़ुशी हुई आशा है मेरे विनम्र उत्तर से आप संतुष्ट होंगे| हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak chaatak

आदरणीय खुराना जी, सादर अभिवादन, आपकी राय से इत्तेफाक रखता हूँ मैंने केजरीवाल की आलोचना की है ऐसा लेख को पढ़ने के बाद भ्रम हो सकता है परन्तु ध्यान से देखने मैंने आलोचना नही की है सिर्फ दोनों के ट्रैक रेकार्ड (आप राजनीतिक रिपोर्टकार्ड भी कह सकते हैं) पर टिप्पड़ी की है इसे थोडा सरल करके बताता हूँ- ये दो परीक्षार्थी हैं जिनमे से एक बुरी तरह से फेल हुआ है और दूसरा मेरिट लिस्ट में टॉप पर है यानि दोनों आलोचनाओं से गुजर चुके हैं अब सिर्फ ये बताया जा रहा है कि सही कौन और गलत कौन उपरोक्त रिपोर्ट कार्ड के आधार पर हम तय करें अब ऐसे में किसी को फेल बताना उसकी आलोचना और किसी को पास बताना उसकी तारीफ़ प्रतीत हो सकती है परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं हैं कृपया एक बार इस दृष्टि से साथ भी इस लेख का पुनरावलोकन करें| ब्लॉग पर राय प्रकट करने का हार्दिक धन्यवाद !

के द्वारा: chaatak chaatak

क्या होगा ये भविष्य के गर्भ में है लेकिन हम ‘अच्छा होगा’ की आशा तो जरूर रख सकते हैं| आदरणीय चातक जी, सादर अभिवादन! थोडा सा मेरा मत आपसे अलग होगा यहाँ.... मोदी जी में नेतृतव और निर्णय लेने की क्षमता है, इससे इंकार नहीं कर रहा हूँ पर उनके भाषण में जो दम्भ दीखता है, वह भी बहुत अच्छा नहीं कहा जा सकता. केजरीवाल अभी अभी राजनीति में आए हैं और वे और उनकी पार्टी के लोग राजनीति सीख रहे हैं. उनकी नीयत और सिंद्धांत को मैं गलत नहीं मानता..जब केजरीवाल कोई बड़ा फैक्टर नहीं हैं तो, आजकल सभी लोग उसके पीछे हाथ धोकर क्यों पड़े हुए हैं. मोदी जी पहले तो कांग्रेस मुक्त भारत चाहते हैं. फिर 'सबका' यानी सपा, बसपा और कांग्रेस मुक्त, केजरी मुक्त. केजरीवाल को अमेरिका और पाकिस्तान का दलाल कहने में भी कोई हिचक नहीं हो रही है. अब उसपर हिंसक प्रहार किया जा रहा है.क्या मोदी जी या भाजपा जो सत्ताके करीब पहुँचती दीख रही है, उसे कोई विपक्ष नहीं चाहिए. मोदी जी के साथ जो दल और नेता आकर मिल रहे हैं, सभी क्या दूध के धुले हैं?..कल वही विपक्ष में रहकर मोदीजी और भाजपा की आलोचना किया करते थे, आज सत्ता की लालच में मोदी जी का गुणगान करने लग जाते हैं. साबिर अली का केस तो अभी हाल में ही देखा है न आपने भी... अब अमित शाह और वसुंधरा राजे सिंधिया का भड़काऊ बयान क्यों? .एक विकास पुरुष की छवि वाले व्यक्तित्व को अलगाववादी छवि को इस समय उजागर करने का क्या तात्पर्य है... ये कुछ मेरे विचार हैं देश का हित हो, यह कौन नहीं चाहता ? सादर!

के द्वारा: jlsingh jlsingh

के द्वारा: sudhajaiswal sudhajaiswal

के द्वारा:

के द्वारा:

चातक जी शायद पहली बार आपके ब्लॉग पर आने का अवसर मिला है ! आपके बिचारों से मैं पूरी तरह सहमत हूँ ! १६ दिसम्बर को जब यह हादसा हुआ था, जनता की भीड़ सडकों पर उतर आई थी, पार्लियामेंट से होकर जनता की आवाज संयुक्त राष्ट्र तक पहुँच गयी थी और लगता था की चन्द रोज लगेंगे कोर्ट का फैसला आएगा और सारे क्रिमिनल फांसी के फंदे पर लटके होंगे, लेकिन अफसोस आज पूरे आठ महीने होने को आए अभी तक कोर्ट 'बाल अफ़राध' के दायरे में कितनी उम्र आंकी जाय, सुई अभी तक यहीं पर रुकी हुई है ! निर्भया की आत्मा फैसले के इन्तजार में अभी तक तड़प रही है और न्याय पालिका ..... ऊपर वाला देख रहा है भारतीय न्याय व्यवस्था को और हंस रहा है ! सार्थक और जनता को जगाने वाला लेख बहुत सारी बधाई ! हरेन्द जागते रहो !

के द्वारा: harirawat harirawat

कृष्ण जी, आपने बिलकुल सही समझा कि मुझे और भी बहुत कुछ कहना था अगर सारी बातें मैं लिखती तो आपके इस पोस्ट से भी दुगुनी बड़ी मेरी प्रतिक्रिया होती पर मुझे वाकई ऐसा लगता है कि कुछ भी लिखना या पढ़ना सब अब बेमानी बातें हैं वो ज़माने लद गए जब कलम की ताक़त तलवार की ताक़त से बड़ी होती थी अब तो कलम भी भ्रष्ट नेताओं ( जिन्हें अपनी मातृभाषा तक का ज्ञान नहीं ) के भाषणों को लिखने के काम आ रही है कुछ विद्द्वान अपनी मातृभाषा और कलम तक को बेच रहें हैं | आपने इतने उम्दा आलेखों को लिखा है पर क्या फायदा सब बस कहने और सुनने की बातें रह गई हैं | सच कहूँ तो एक पंक्ति में यही कह देना काफी था कि आपके विचारों से पूर्ण सहमत हूँ |

के द्वारा: sudhajaiswal sudhajaiswal

स्नेही सुधा जी, सच कहें तो आपकी प्रतिक्रिया बड़ी नहीं है अगर मैं गलत नहीं हूँ तो जो आक्रोश इन स्वघोषित लाइसेंसी विद्वानों के प्रति पूरे देश की स्त्रियों के मन में उपजा है वह यदि व्यक्त करे तो तथाकथित विद्वानों की सम्पूर्ण बुद्धिमत्ता सैलाब में सूखे पत्ते की तरह बह जायेगी| राजनीति बहुत पहले ही आम आदमी का विश्वास खो चुकी थी अब अदालतों ने भी अपनी विश्वसनीयता को गँवा दिया है, ये सभी मिलकर अराजकता को न्योता दे रहे है, राजनीति को जिन्दा रखने के लिए लोगों का क़त्ल होता था अब तथाकथित विद्वान् अपनी कुंठाओं को न्यायोचित ठहराकर स्त्रियों का दैहिक और मानसिक दमन करने को कानूनी बल प्रदान कर रहे हैं| वैचारिक सहमति का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak chaatak

आदरणीय कृष्ण जी, सादर अभिवादन, हमारे देश का कानून सिर्फ अँधा ही नहीं मनोरोगी भी हो चुका है तो उससे सही-गलत, भले-बुरे की समझ की उम्मीद हम कैसे कर सकते हैं | संविधान के अनुसार भारतीय कानून व्यवस्था कठोर और लचीला दोनों है, कठोर आम आदमी के लिए और लचीला अमीरों के लिए जो कानून को अपनी जेब में लिए घूमते हैं | आम आदमी के लिए इस देश में न्याय पाना आसमान के तारे तोड़ लाने जैसा है जो इसकी आस लिए खुद आसमान के तारों के पास पहुँच जाते हैं | मीडिया को सरकार अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करती है, उसे अपनी जेब में रखती है | मीडिया के लिए कोई कड़े नियम वो क्यूँ नहीं लागू करती उल्टे-सीधे, बेसिर पैर के कार्यक्रमों की बाढ़ सी है जिसे देखकर बच्चे उम्र से पहले बड़े हो रहे हैं | जब वक़्त तेजी से बदल रहा है तो कानून को भी तो उसके अनुसार बदलना ही चाहिए पर यहाँ अब लोकतंत्र रहा कहाँ आपके हमारे लिखने-पढने और कहने-सुनने का कोई फायदा होगा क्या? सब बेकार है यहाँ अब भ्रष्टतंत्र का साम्राज्य है आम जनता का चैन सुकून सब राम भरोसे है | हमारी हालत ऐसी है कि भैंस के आगे बीन बजाओ भैंस रही पगुराय और सरकार अपनी धुन में मगन है जिसकी लाठी उसी की भैंस | माफ़ कीजियेगा प्रतिक्रिया थोड़ी ज्यादा ही बड़ी हो गई, आपके विचारों से पूर्ण सहमती है, उम्दा आलेख |

के द्वारा: sudhajaiswal sudhajaiswal

'सब धान साढ़े बाईस'- बहुत ही पुरानी कहावत है ... मतलब है, गुण दोष का ध्यान दिए बिना एक ही मोल लगाना. त्वरित अदालत का क्या मतलब होता है यह भी ये न्यायाधिपति बतला देते तो भी कुछ समझ में आता. १६ दिसंबर के बाद १६ जुलाई आ गया ... फैसला ... कुछ नहीं ...तब से अब तक प्रतिदिन सामूहिक दुष्कर्म हो रहे हैं किसी को कोई फर्क पड़ रहा है. क्यों फर्क पड़ेगा ... यह घटना न तो किसी संभ्रांत, कुलीन, उच्च पदासीन लोगों की बच्चियों/ महिलाओं के साथ हो रहा है, नहीं किसी को सजा हो रही है ...फिर अपराध क्यों कम होने लगे. अभी कल की ही बात लीजिये जिस कोर्ट ने निर्णय दिया था कि अपराधी न तो चुनाव लड़ सकेंगे न ही वोट दे सकेंगे, पर आज उसी अदालत ने कम से कम तीन सजायाफ्ता कैदी विधायक को झारखण्ड विधान सभा में वर्तमान हेमंत सोरेन सरकार के पक्ष में वोट देने के लिए जमानत पर छोड़ा .... हम सब कानून नहीं जानते. जो अपराधी हैं, वही कानून बनाने के काबिल हैं. सब गोलमाल है .......

के द्वारा: jlsingh jlsingh

अलकनंदा, भागीरथी और मंदाकिनी की लहरों में गूंजने वाला स्वर उसी संहारक का था जो हमें उसके अट्टहास सा प्रतीत हुआ परन्तु वास्तव में वो संहारक की हृदयविदारक गर्जना थी जो इन्हीं तुच्छ इंसानों के दिए जख्मों के कारण उठी थी| केदारनाथ की पूजा पर प्रश्न उठाने वालों अभी भी तुम्हे लगता है कि तुम उसकी पूजा करके कोई अहसान कर रहे हो! उस विराट स्वरुप को तुम्हारी पूजा की आवश्यकता कभी नहीं थी उसकी पूजा तुम हमेशा अपनी गरज से करते आये हो और उस पर जबरदस्ती थोपी गई पूजा के साथ-साथ तुमने उसे सिर्फ आहत ही किया है| CHATAK JI......BAHUT HI SATIK ARTICLE क्या केदारनाथ में मानव ही मरे ? जब 5 रुपए के बिस्कुट के 100 रुपए... जब 15 रुपए के दूध के 200 रुपए..... कुछ महिलाओं के साथ बलात्कार.... लाशों के अंग भंग करके गहने उतर लेना..... नहीं जनाब ....वहाँ मानवता भी मरी... काश कोई इस मानवता को भी राहत दे पाता !

के द्वारा: ajaykr ajaykr

सभी लोग ये सवाल कर रहे भक्तो के साथ ऐसा क्यूँ कर हुआ ....उत्तराखंड में आई आपदा,  प्रकृति के साथ खिलवाड़ का परिणाम है........... और मानव निर्मित ही कहूँगी मैं इसको........ जहाँ पर सडक बनने की इजाजत नहीं है वहाँ रोजाना हेलीकॉप्टरों से यात्री आ जा रहे है.... विकास के नाम पे हम विनाशलीला ही रच रहे हैं.... पैसा कमाने की अंधी दौड में कई कई मंजिला ईमारत खड़ी कर दी गयी ... नदी के मुहानो में दुकाने होटल बना दिए गए... तब भी सरकरी तन्त्र सो रहा था जब अवैध निर्माण हुआ और तब भी तब विनाश हुआ, जगा तो अब है सरकारी महकमा क्यूँ कि आपदा के नाम पे रहत कोष में धन जो बरस रहा है .. प्रकृति ने हमको बहुत कुछ दिया है मगर हम उसका दोहन ही कर रहे है और अब जब प्रकृति रोद्र रूप में आई तो दोष भगवान के सर कर दिया जा रहा है

के द्वारा:

स्नेही भगवन बाबू, ईश्वर तो हर कण में है सर्वव्यापी, अक्षय, अविनाशी उसे समझना और परिभाषित करना मूर्खता है जिसे जहां ईश्वर दिखता है उसे वहां देखने दें, खोजने दे, सिर्फ अपने आपको सही मानकर दूसरों की मान्यताओं का मजाक उड़ाने या उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास न करें संदेह प्रकृति भी साकार है और इसके अलग अलग रूप बेहद खूबसूरत मूर्तिया ही तो हैं जिन्हें समय तराश रहा है सदियों से तराश सकें तो हम भी तराशे लेकिन उसके मार्ग में बाधा बनकर नहीं उसके साथी उसके मित्र उसके सेवक बनकर| वे पंडित पुरोहित और शंकराचार्य सचमुच ईश्वर है, हाँ हो सकता है वे हमारे और आपके लिए ईश्वर ना हों ठीक उसी तरह जैसे हमारे माता-पिता हमारे लिए ईश्वर हैं परन्तु अन्य लोगों की नजर में सिर्फ इंसान तो कुछ अन्य लोगों की नजर में बहुत ही बुरे लोग......... पोस्ट पर राय देने का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak chaatak

अब तनिक भी संदेह नहीं रह जाता कि संहारक ने देवभूमि की पटकथा में इतनी बड़ी विभीषिका का उपसंहार क्यों लिखा! अलकनंदा, भागीरथी और मंदाकिनी की लहरों में गूंजने वाला स्वर उसी संहारक का था जो हमें उसके अट्टहास सा प्रतीत हुआ परन्तु वास्तव में वो संहारक की हृदयविदारक गर्जना थी जो इन्हीं तुच्छ इंसानों के दिए जख्मों के कारण उठी थी| केदारनाथ की पूजा पर प्रश्न उठाने वालों अभी भी तुम्हे लगता है कि तुम उसकी पूजा करके कोई अहसान कर रहे हो! उस विराट स्वरुप को तुम्हारी पूजा की आवश्यकता कभी नहीं थी उसकी पूजा तुम हमेशा अपनी गरज से करते आये हो और उस पर जबरदस्ती थोपी गई पूजा के साथ-साथ तुमने उसे सिर्फ आहत ही किया है| फिर भी अपेक्षा करते हो कि संहारक गंगा को अपनी जटाओं में कैद रखकर तुम्हे विनाश से बचाएगा? या तो तुम बिलकुल बेवक़ूफ़ हो या फिर बेहद मक्कार ! आदरणीय कृष्ण जी, सादर अभिवादन, तीर्थस्थल को विकास के नाम पर पर्यटन स्थल बना दिया गया है, प्रकृति के साथ जिस क्रूरता से इन्सान पेश आया है ये उसी का परिणाम है| आस्था के नाम पर सैर-सपाटा किया जा रहा है कितने लोग मन में सच्ची आस्था रखते हैं किसी जरूरतमंद की मदद के लिए अपने आस-पास तो मदद का हाथ नहीं बढ़ाते उतनी दूर क्या ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए जाते हैं या अपनी जरूरतों के लिए मन्नत मांगने? पूर्ण सहमती है आपके विचारों से | बहुत ही विचारणीय और सार्थक पोस्ट के लिए हार्दिक बधाई| |

के द्वारा: sudhajaiswal sudhajaiswal

बेरोजगारी भत्ते पर गुजर करने वाले नवयुवक क्या खा कर देश और प्रदेश के विकास में सहायक होंगे। उत्तर-प्रदेश को वास्तवथा में उत्तम-प्रदेश बनाना है तो सरकार योग्यता के आधार पर काम बांटे और उसकी मजदूरी ये वेतन दे जिससे प्रदेशवासी गर्व की भावना से प्रेरित होकर काम करें और सर उठा कर आसमान में अपने लिए नई बुलंदियों के सितारों को खोजें। पथ-भ्रष्ट, शोकाकुल और निराश से लटके चेहरे अपनी चमकती किस्मत के सितारों को भला क्या देखेंगे! यदि मेरी राय ली जाए तो मैं कहूँगा, जिला, ब्लॉक, एवं ग्रामसभा स्तर पर योग्य और कुशल लोगों की तलाश की जाए और उन्हें उनकी योग्यता और कुशलता के अनुरूप कार्य दिया जाय। वित्तीय अनुदान और सहायता सिर्फ असहाय, बुजुर्ग और पूरी तरह से अक्षम व्यक्तियों को ही (ससम्मान) प्रदान किया जाए। यदि इस तरह सरकार सभी को रोजगार प्रदान करने में सफल हो तो प्रदेश अपने आप प्रगित के पथ पर बढ़ने लगेगा। हर चेहरे पर ख़ुशी होगी। तेजी से बढ़ रहा नव-धनाढ्य वर्ग और धन का सार्वजनिक प्रदर्शन भी चिंताजनक है। एक ओर जब आडम्बरपूर्ण शानो-शौकत की बिजलियाँ चमक रही हों तो दूसरी तरफ कई दिनों से ठन्डे पड़े चूल्हे का दिल तो दहकने ही लगेगा, लेकिन श्री चातक जी समाजवादी सरकार तो अपने आपको प्रदेश का सबसे बड़ा सुधारक घोषित करने पर लगी हुई है ! कोई समस्या हो तो बसपा की , झगडा फसाद हो तो भाजपा का , कोई कांड हो तो कांग्रेस का किया धरा होता है फिर इनका क्या है ?

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा: rajanidurgesh rajanidurgesh

आदरणीय चातक जी, सादर ! ""एक भी व्यक्ति साहस नहीं कर पा रहा है कि वह स्वयं उठकर अपने परिवार को न्याय दे, विश्वास दिलाये अपनी माँ, बहन, प्रेमिका, पत्नी और बेटी को कि यदि देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति भी तुम्हारी ओर हाथ बढ़ाएगा तो पहले उसके वंश का समूल विनाश करूंगा फिर अदालत अपना काम करेगी। जब परिवार को स्वयं ही अपनी महिलाओं के दर्द का अहसास नहीं होता, उनका कलेजा नहीं फटता तो फिर पडोसी क्या करेगा? क्या करेगा गाँव और क्या करेगा शहर?"""" मेरा भी यही कहना है........ “अनाचारियों के विरुद्ध अब शस्त्र उठाना होगा ! क्रूर भेड़ियों से अपना घर स्वयं बचाना होगा !”" अहिंसा की प्रवृति और कानूनों के मकडजाल में उलझकर आज का आदमी महाकायर और भीरु हो गया है ! मान-सम्मान की परिभाषाएं और मर्यादाएं बदलती जा रही हैं ! इस कापुरुषता का अंत कहाँ होगा.......... यह भविष्य के गर्भ में है ! एक अच्छी रचना ! सादर !

के द्वारा: shashi bhushan shashi bhushan

स्नेही रविन्द्र जी, सादर अभिवादन, आपकी बात काफी हद तक सही है मैंने इस बात को और ज्यादा स्पष्ट करना चाहूँगा कि हमारे देश में दो तरह के परिवार हैं एक तो मध्यमवर्गीय और वे कथित संपन्न लोग जो रद्दी के पन्नो (संविधान) पर लिखे चुटकुलों (संविधान द्वारा दिए गए आश्वासन) के गुलाम बन चुके हैं (दामिनी जैसी बेटियों का परिवार और उनके माडर्न प्रेमी) और दूसरे वे गरीब जिनके पास न खाने को पर्याप्त भोजन है न सर पे ढंग की छत और है भी तो परिश्रम से कमर टूट रही है, यानी सुरक्षा के नाम पर दोनों के पास कुछ नहीं| लेकिन ये बात उतनी ही गलत है जितनी ये कि हम राम और कृष्ण को अवतार मान कर अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ लेते हैं| मैंने आज तक नहीं देखा ना सुना कि कोई ईश्वर किसी निरीह और कायर कि मदद को आया हो| ईश्वर है ये एक हकीकत है लेकिन उसे कायरता पसंद नहीं ये उससे बड़ी सच्चाई है गरीबी, संसाधन-हीनता, जिम्मेदारी, दुनियादारी ये सब अपनी कायरता पर डाले गए परदे हैं सही तो ये है कि आज हमारे दिल में किसी के लिए प्यार ही नहीं है तो जब सबसे बड़ी ताकत हमारे पास है ही नहीं तो हम कुछ करेंगे भी कैसे| आपकी इस विस्तारित प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak chaatak

चातक जी, सादर नमस्कार. मैंने आपके लेख को बार-बार पढ़ा. आज जिस प्रकार का वातावरण देश में बना है, उसमे ऐसी तेजस्वी प्रतिक्रिया होनी ही चाहिए. मैं आपके विचारों से पूरी तरह सहमत हूँ. लेकिन एक प्रश्न उठता है के क्या ये संभव है ? आपने रामायण का उदाहरण दिया, लेकिन कोई ये मान सकता है के राम संसाधन हीन थे ? राम विष्णु के अवतार थे, उनके भाई लक्षमण शेष नाग के अवतार थे. राम के पास विश्वामित्र द्वारा दिए गये तेजस्वी और भयंकर अस्त्र थे. राम के साथ हनुमान और सुग्रीव जैसे न जाने कितने ही योद्धा थे. तो एक गरीब, दिन भर मजदूरी करने वाले व्यक्ति की तुलना आप राम के तेज से कैसे कर सके हैं ? जो लोग संपन है. जिनके पास बल, बुद्धि और धन की ताकत है उनके साथ रेप जैसी घटनाएँ नहीं होती (एकाध को छोड़ कर) और वहां जैसा आप चाहते हैं वैसी प्रतिक्रिया भी होती है. एक ऐसा व्यक्ति जिसके पास ना जाति का गौरव है, जिसके पास ना धन की लाठी है, जिसको पेट भरने से ही फुर्सत नहीं, ऐसा आदमी बदले के बारे में कैसे सोच सकता है ? अगर उसको ऐसा करना पड़े तो शासन प्रशासन किस काम के ? अगर ये काम नहीं करते तो बंद करना चाहिए इन दुकानों को. इसका भार हम अकेले पीड़ित पर नहीं डाल सकते. हम ये नहीं कर सकते के हम तो बेड पर पसर कर टीवी पर चटपटे समाचारों का आनद लेते रहें और पीड़ित अकेला अपनी लड़ाई लड़ता रहे. रेप एक सामाजिक अपराध है. इसके लिए दंड भी समाज को निर्धारित करना चाहिए . अकेले पीड़ित के सम्बन्धी बदला लें, ऐसा करना उनके प्रति एक और अपराध होगा. नमस्ते जी.

के द्वारा: Ravinder kumar Ravinder kumar

रचना जी, सादर अभिवादन, पोस्ट में रखे गए विचारों पर आपकी राय जानकर हर्ष हुआ| आपकी राय से सहमत होते हुए एक बात मैं और जोड़ना चाहूँगा इस देश में अंग्रेज जिस स्वाभिमान को कुचल नहीं पाए थे वो काम स्वतंत्र भारत में कांग्रेस ने कर दिखाया जिस तरह भीख में बटोरे गए चुटकुलों को इकट्ठा करके हमारे ऊपर थोप गया और जिस ग्तारह अपनी संस्कृति और सभ्यता को ताक पे रखकर हमें इस सड़ी-गली चीज के प्रति निष्ठावान बनाने की कवायद ६० वर्षों तक की गई अब बहुतों के खून में दौड़ना शुरू कर चुकी है और उसी का परिणाम है आज का दीन-हीन इंसान ये सफ़ेद पानी खौले भी तो कैसे? कितना भी ताप दो ये सिर्फ बुजबुजाता है ज्वालामुखी की तरह फटता नहीं है|

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा: Rachna Varma Rachna Varma

आदरणीय कृष्ण जी, सादर अभिवादन, मेरे विचार से लाचार या बेबस दिखने जैसा कोई फैशन नहीं है ना ही हमदर्दी पाने जैसा कोई नशा या लत | यही विश्वास मेरा भी है कि आज भी राम कि संख्या रावण से ज्यादा है और ऐसे सारे लोग जिनके दिल में राम हैं अपने परिवार के साथ न्याय करते हैं, एक उदाहरण आपने ही बताया | किसी भी पीड़िता का परिवार किसी पड़ोसी के मोमबत्ती की आशा में नहीं रहता न्याय और हमदर्दी की भीख नहीं मांगता विरले अगर ऐसा कोई है तो वो रावण से भी बदतर है | किसी भी पीड़िता के परिवार का हर सदस्य असहनीय पीड़ा महसूस करता है उनके मन की हालत विक्षिप्त सी होती है और ऐसे में हर संवेदनशील इन्सान स्वयं उनसे हमदर्दी से रखता है, कोई नाता न हो तब भी इंसानियत के नाते उनको न्याय दिलाने एवं राहत पहुँचाने का प्रयास करता है | आज रावणराज्य है इसलिए कहा क्योंकि हमारे देश की शासन-व्यवस्था राम जैसे इन्सान के हाथों में नहीं है |

के द्वारा: sudhajaiswal sudhajaiswal

स्नेही सुधा जी, सादर अभिवादन, आपकी बात सौ प्रतिशत सही है लोगों के मन में दहशत है, लाचार और बेबस दिखना इस वक्त का फैशन है| हमदर्दी पाने का नशा अफीम के नशे से ज्यादा खराब है और आज लोगों को लत पड़ गई है इसकी| मुझे विश्वास है कि आज भी राम की संख्या रावण से ज्यादा है और जिनके दिल में राम हैं उनकी महिलायें आज भी सुरक्षति हैं मैंने अभी सुना कि (शायद) राजस्थान में कोई ऐसी ही घटना हुई हैं और बच्ची के परिवार वालों ने एक बलात्कारी के पहले नाक और कान काट दिए और फिर न्याय की पूरी जिम्मेदारी उठाते हुए उसकी गंदी आत्मा को उसके जिस्म से बलपूर्वक खींच कर बाहर निकाल लिए और फिर फेंक दिया रास्ते पर| न्याय हो गया !

के द्वारा: chaatak chaatak

आज देश में हर तरफ अपहरण और बलात्कार हो रहे है लेकिन एक भी व्यक्ति साहस नहीं कर पा रहा है कि वह स्वयं उठकर अपने परिवार को न्याय दे, विश्वास दिलाये अपनी माँ, बहन, प्रेमिका, पत्नी और बेटी को कि यदि देश का प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति भी तुम्हारी ओर हाथ बढ़ाएगा तो पहले उसके वंश का समूल विनाश करूंगा फिर अदालत अपना काम करेगी। जब परिवार को स्वयं ही अपनी महिलाओं के दर्द का अहसास नहीं होता, उनका कलेजा नहीं फटता तो फिर पडोसी क्या करेगा? क्या करेगा गाँव और क्या करेगा शहर? यही तो हो रहा है हर जगह ! हम इस उम्मीद में बैठे हैं की कोई कृष्णा आएगा जो कभी गोवेर्धन पर्वत उठाएगा हमारी रक्षा के लिए और कभी द्रोपदी को बचाने आएगा ! हमने औरों से अपनी रक्षा की उम्मीद पाले राखी है ! लेकिन शायद काली रात जाए , उजियारा भी होगा चातक साब और मैं कहता हूँ जरुर होगा !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

स्नेही भगवन बाबू, सादर अभिवादन, इंसान ने स्वयं को इतना जटिल बना लिया है कि सीधा, उचित और सही रास्ता उसे पसंद ही नहीं आता है| इंसान के सामने शैतानी दुष्प्रवृत्तियाँ हमेशा चुनौती बनती रही हैं और हर बार उसका समाधान एक ही रहा है स्वयं उनका सामना करना| राम के लिए ये कार्य मुश्किल था क्योंकि उनके समक्ष आई हुई चुनौती अपूर्व थी फिर भी उन्होंने अपनी आत्मा के न्याय का अनुसरण किया और मिसाल कायम की| हमारे सामने उनके जैसी दुष्कर स्थिति नहीं है बल्कि उनके द्वारा किया गया साहसिक कृत्य हमारा पथ-प्रदर्शक है फिर हम हर मोर्चे पर सिर्फ मोमबत्ती क्यों जलाते हैं? आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रया का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा: yamunapathak yamunapathak

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के द्वारा: PRADEEP KUSHWAHA PRADEEP KUSHWAHA

प्रिय मित्र चातक जी... पहले सोचा था की इस आलेख पर कोई टिप्पडी नहीं करूँगा क्योंकि आप तो विधर्मी (नास्तिक नहीं) हैं और मैं एक हिंदू आतंकवादी (दिग्विजयी मानकों के अनुसार)..फिर सोचा प्रिती भी तो दो विपरीत धुरियों के ही मध्य होता है (सम वाली मानसिकता राम राम राम) ..बहरहाल मेरी यह मान्यता है की काम जगद्विजयी और उसके तीन फलक वाले त्रैलोक्य विजयी तीक्ष्ण शरों से या तो हनुमान ही बच सकते हैं या फिर भगवान शंकर...उर्ध्वरेता की स्थिति प्राप्त करना सहज नहीं हैं...नर हो अथवा नारी...विह्वल दोनों ही होते हैं फिर दोष केवल एक को नहीं दिया जा सकता...थोडा सा अंतर अवश्य है...पुरुष जब धोखा खाता है तो उसकी सम्पूर्ण हत्या हो जाती है (यदि भावनाएं निःस्वार्थ हुई तो) और स्त्री बहुधा परिस्थितियों से तालमेल बिठा लेती है किन्तु वर्तमान संदर्भो में यह दोनों ही बेमानी हो गए हैं क्योंकि जमाना ही यूज एंड थ्रो का हो चूका है...परदे का सौंदर्य अद्वितीय होता है यह बात आधुनिकों के समझ में नहीं आती..जन्मदिन कि हार्दिक शुभकामनाएं नहुष का सर्पः सर्पः...पुरु का आजीवन भोग और कमातुराणां न भयं न लज्जा वाली बात तो प्रसिद्द है ही

के द्वारा: atharvavedamanoj atharvavedamanoj

सराहनीय विश्लेषण चातक जी । देश में जबतक आतंकवाद और उग्रवाद को दो आँख से देखे जाने की परिपाटी ज़ारी रहेगी, सम्भवत: आपके कथन का अभिप्राय भी तबतक जीवित रहेगा । चरमपंथ बिना किसी भेद-भाव के निन्दनीय है और पूरी ताक़त से कुचल दिये जाने के योग्य । अन्तर्राष्ट्रीय आतंकवाद हो, या फ़िर हमारे मुल्क़ में कश्मीर और खालिस्तान का अलगाववादी आतंकवाद, चाहे माओवादी उग्रवाद । प्रकारान्तर से सभी सभ्य समाज और मानवता के दुश्मन हैं । अमेरिका दूसरे देश में घुसकर अपने दुश्मन को उसकी मांद में ज़मींदोज़ कर सराहना का यदि पात्र बनता है, तो इसका श्रेय उसकी आंतरिक एकजुटता और राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर कोई समझौता न करने की नीतियों को जाता है । जबकि हमारे यहाँ गम्भीर से गम्भीर प्रकरण को भी राजनीतिक फ़ायदे-घाटे के दृष्टिकोण से तौलने की रीति बन चुकी है । यह दोगलापन और राष्ट्रवादी सिद्धांतों के बिल्कुल उलट है । हमारी संसद का हमलावर चाहे देशी हो या विदेशी, हमारी अ-स्मिता पर चोट पहुँचाने वाला आततायी है, और त्वरित कार्रवाई के तहत मार गिराए जाने के योग्य है । किसी भी ढुलमुलपने के कारण यदि न्यायिक कार्रवाई में विलम्ब होता है, तो चर्चाओं और बहस का वातावरण बनने में मदद मिलेगी ही । कसाब जैसे विदेशी दरिन्दों को भी हमें दुनिया से छुपा कर यदि फ़ाँसी देनी पड़ती है, तो यह हमारी भीरुता और साफ़्टनेस ही है । धन्यवाद !

के द्वारा: आर.एन. शाही आर.एन. शाही

के द्वारा: Rita Singh, 'Sarjana' Rita Singh, 'Sarjana'

स्नेही अलीन जी, सादर अभिवादन, आपकी बात से सहमत हूँ प्यार सिर्फ प्यार होता है इसमें न कुछ दिया जाता है ना लिया जाता है इसमें न मिलन होती है ना जुदाई होती है, इसमें सिर्फ एक विश्वास होता है जो यकीन नहीं दिलाता सिर्फ महसूस कराता है कि हम आपके साथ हर हाल में हैं विचारों में ख्यालों में हवाओं में खुशबू में हर उस जगह पर जहां तुम्हे मेरी जरूरत है जहाँ तुम्हे मेरी जरूरत नहीं है, मैं हमेशा तुम्हरे लिये एक भावनात्मक ताकत की तरह तुम्हारे साथ हूँ जो तुम्हे टूटने नहीं देगा, बिखरने नहीं देगा| लेकिन अफ़सोस ये प्यार इस दुनिया में राधा और कृष्ण के बाद न किसी ने किया न किसी से हुआ ! एक अच्छी प्रतिक्रया का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak chaatak

‘व्यापारियों की दुनिया में प्यार जैसी कोई चीज़ नहीं सिर्फ दुकानें लगी हैं। व्यापार हो रहा है- कोई किसी के साथ व्यापार शुरू करता है, तो किसी के साथ बंद कर देता है।’.सच तो यह है की हरेक चीज का अब व्यवसायीकरण होता जा रहा है.........................इस भाग-दौड़ के युग में हम भौतक रूप से जितने नजदीक हो रहे हैं, मानसिक रूप से उतने ही दूर होते जा रहे हैं........................हमसे पूछिये तो प्यार न सच्चा होता है, न झूठा होता है.......न एक बार होता है न हजार बार होता है.................प्यार तो बस प्यार होता है.................. कोई मुझसे भी तो पूछे प्यार क्या होता है? http://merisada.jagranjunction.com/2012/04/30/%e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%88-%e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%9d%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ad%e0%a5%80-%e0%a4%a4%e0%a5%8b-%e0%a4%aa%e0%a5%82%e0%a4%9b%e0%a5%87-%e0%a4%aa%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be%e0%a4%b0/

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आदरणीय चातक जी सार्थक अभिव्यक्ति के लिए बधाई, राजनीति में वंशवाद हमेशा से चलता आ रहा है...राजनीति हो या कोई और क्षेत्र जब तक मूल में सेवा का भाव नहीं होगा यह सब चलता रहेगा....कुछ अपवादों को छोड़कर हम देखे उच्च वर्गीय परिवारों में वंशवाद एक आम बात है...डॉक्टर के बच्चे डॉक्टर.उद्योगपति के बच्चे उद्योगपति,खिलाडी के बच्चे खिलाडी और राजनेता के बच्चे भी राजनेता....शायद इसलिए क्यों की भविष्य की नीव पहले से तैयार मिलती है....किसी भी क्षेत्र में भविष्य तय करने के पहले अगर युवा इस बात का मूल्यांकन करे की क्या उस क्षेत्र में वो सच में मानवसेवा कर पायेगा तो शायद वंशवाद ख़त्म हो. वंशवाद एक गंभीर और व्यापक समस्या है.इसके परिणामस्वरूप व्यक्ति विशेष तो प्रभावित होता ही है राष्ट्र की प्रगति और भविष्य पर भी असर पड़ता है.

के द्वारा: deepakk deepakk

आदरणीय चातक जी सप्रेम अभिवादन हम भारतवासी खुलेआम गुलामी की जिंदगी जी रहे हैं . यह गुलामी अंग्रेजों की गुलामी से ज्यादा भयावह है क्योंकि यहाँ तो हमारे पास मीडिया का भी पूरा साथ नहीं है . सब कुछ बिका पडा है . कोई भी सरकार समर्थित व्यक्ति , अल्पसंख्यक अथवा प्रभावशाली उच्च वर्ग का आदमी जब चाहे हमारे साथ कुछ भी कर लेता है और हम कुछ बोल भी नहीं पाते . पाश्चात्य लोग हमारी माँ बहनों के साथ रेप कर के हमारी बेचैनी पर मुस्कुराते हैं . राष्ट्रभक्तों की समाधियाँ उखाड़ कर वहां क्रूर अंग्रेज शाशकों की मूर्तियाँ लगाईं जाती हैं . हमारी सन्यासिनों को जबरन पकड़कर जेल में रखकर विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित किया जाता है . साथ हीं हमें दुनिया के सामने बदनाम भी किया जाता है . इतने सब के वावजूद हमारे अपने देशवासी कभी भय से तो कभी लालच में इन्ही लोगों का गुणगान किया करते हैं . पता नहीं क्यूँ हमारा खून पानी हो गया है . भारतीय होने पर आज शर्म से मर जाने का मन करता है .

के द्वारा:

मैं नहीं मान सकता कि हिन्दुस्तान के सभी न्यायाधीश इतने अक्षम है कि वे ‘बाल-अपराध’ और ‘नाबालिग’ शब्द की कानूनी व्याख्या तक नहीं कर सकते। और यदि इनकी क्षमता इतनी खराब है तो मैं चुनौती देता हूँ उन सभी न्यायधीशों को (जो मान बैठे हैं कि इस केस में नाबालिग की वही व्याख्या होगी जो आज उस गंवार जज ने की है) कि हमारे कानून के अनुसार व्याख्या नहीं की गई है और गलत तरीके से अपराधी को संरक्षण दिया जा रहा है। आज हर हिन्दुस्तानी का विश्वास न्याय से उठ चुका है देखो न्याधीशों आज हुए इस अन्याय से आसमान फट चुका है, जमीन रो रही है, हमारी आत्माएं तुम्हें श्राप दे रही है, बस एक ही बात कहूँगा "जाके पाँव न फटी बिवाई वो का जाने पीर पराई " सार्थक लेखन चातक साब

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

प्रिय अनुज ,,मै मि0 थर्ड की विद्वता का लोहा मानता नही अदमय साहस पराक्रम उनके जीवन मे न जाने कितनी बाधाएँ आयीं होंगी लेकिन अर्जुन की तरह वह सदेव थर्ड को भेदने मे कामयाब रहे इसके लिए वह बधाई के पात्र हैं :) खैर उक्त भागमभाग बालिका /स्त्री /महिला /के आरोप मे अगर सच्चाई है तो उचित दंड आवश्यक है लेकिन अगर दुर्भावना से प्रेरित होकर उसने ऐसा दुषारोप से नयाय के अति सम्मानित पद को लाछित करने का प्रयाश किया है तो उसे कठोरतम दंड मिले ताकि भविष्य मे किसी ऐसे दुशचक्रियों की घृणित योजनाबद्ध कार्यों परलगाम लगाई जा सके ,,,भाई भाई मै इसे समझ नही पाया ---- अपराधी को सजा मिले वहां पर लिंगभेद करना भी गलत है------दोषी लडकी है तो उसे मैं सुधार का मौक़ा दिए जाने और कोमल दंड दिए जाने की भी सिफारिश करूंगा क्योंकि कुछ भी हो वो स्त्री है|----पुनश्च अनुज अनुज ............जय भारत

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स्नेही अग्रज, सादर अभिवादन, आपकी दी गई लिंक पर जो खबर है वो कमोवेश मेरे ही शहर से सम्बंधित है आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि आरोपित ACJM महोदय काफी प्रकांड विद्वान् है इन्होने B.A. Third डिवीज़न M.A. Third डिवीज़न और LL.B. सेकंड डिवीज़न में पास किया है ये दोषी हैं या नहीं इसका फैसला तो जस्टिस सुधीर अग्रवाल जी जो कि मामले की जांच कर रहे है वही करेंगे और मुझे लगता है शायद वे न्याय भी कर सकें, लेकिन जिन लड़कियों ने इनके विरुद्ध शिकायत की है उनमे से एक के बारे में तो ये भी कहा जा रहा है कि वो अबला नारी तीन बार अपने प्रेमियों के साथ पहले भी फरार हो चुकी है और उसने अपने माता-पिता के विरुद्ध भी शिकायत कर रखी है यदि इन बातों में सच्चाई है तो सजा सिर्फ जज साहब को नहीं वरन उसके माता पिता को भी होनी चाहिए| इस केस में हकीकत कम और अफसाना ज्यादा नजर आ रहा है और इसकी तुलना दामिनी केस से करना मैं समझूंगा अपमानजनक है| जहाँ ये जरूरी है कि अपराधी को सजा मिले वहां पर लिंगभेद करना भी गलत है हर बार पुरुष ही गलत है मैंने कभी ना कहा है और न ही इस मामले में मेरी कोई अंधभक्ति है दामिनी केस में भी मैं अपराधी को जघन्यतम सजा का पक्षधर हूँ और गोंडा केस में भी लेकिन गोंडा केस में यदि दोषी लडकी है तो उसे मैं सुधार का मौक़ा दिए जाने और कोमल दंड दिए जाने की भी सिफारिश करूंगा क्योंकि कुछ भी हो वो स्त्री है|

के द्वारा: chaatak chaatak

प्रिय अनुज समग्र चिंतन के साथ लिखा गया व्यंगात्मक लेख अपने लक्ष्य को भेदने मे सफल रहा ,,अभी कुछ दिनो पहले टी वी पर चर्चा चल रही थी जिसमे फ़िल्मकार कलाकार निर्देशक इत्यादि तमाम मूर्धन्य लोग विराजमान थे चर्चा का विषय था समाज मे मीडिया का प्रभाव उक्त विषय पर फिल्म क्षेत्र के तमाम लोग एक जुट होकर केवल और केवल समाज को परिपक्व होने की ही बात कर रहे थे और माँ बाप को बच्चे को उचित संस्कार न दे पाने का दोषी का ठहरा रहे थे ,,, मुझे समझ नही आया प्रस्तोता ने यह प्रश्न क्यों नही किया की मीडिया या फिल्मों का दायित्व क्या है कुछ लोगों ने यह भी कहा की लोग जो देखना चाहते हैं हम वही दिखाते हैं < तो यार अभी ताजा ताजा करीना की शहादत हुई है और पक्का सर्वे करावा लिया जाये बहुत से लोग करीना का बेड सीन देखना चाहते हैं तो दिखाएंगे /अपनी ही बात को मै काटता हूँ हाँ एक समय ऐसा आयेगा की वह भी दिखायेंगे / फिर सेंसर का दायित्व क्या है अब बात आती है अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता की तो भाई मै रोड पर खड़ा होकर माँ बहन करू ,,फिर बोलूँ मेरे अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का हनन किया जा रहा है  भाई मेरे प्रश्न तो तमाम है ,,,एक समय वह था जब ;;यह देश है वीर जवानो का ;;आदि गीतों से सैनिक उत्साहित होते थे तो आज की फिल्मों से लोग प्रभावित होते हैं तो गलत क्या है ......................जय भारत

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बहुत कुछ कह डाला आपने और आपके साथ श्री शशि भूषण जी ने भी ! भड़ास निकालने का बेहतर माध्यम है ये ! यानी ये मंच !विचार इस पर होना चाहिए कि क्या समाज इनपर अंकुश लगा सकता है ! समाज की इच्छाएं और क़ानून की धाराएं इन्हें कब बदल पाएंगी, यह देखना है ! बहुत शानदार और समयोचित व्यंग्य ! आपने गंभीर विषय को इतना हल्का फुल्का बनाकर पेश किया है बस पढ़ते ही जाओ ! और हाँ ! एक बात और पूछनी है ५-६ कम पड़ जाती होंगी ? कैसे संभालते हैं आप ? लेकिन जब मैंने कुछ न्यूज़ चैनलों और पत्र-पत्रिकाओं को खंगाला तो इनका ‘मोटिव’ भी आईने की तरह साफ़ और मंशा बनारस की अलकनंदा या कानपुर की गंगा से ज्यादा मैली और दुर्गन्धयुक्त थी [इन पवित्र नदियों का नाम तुलना के लिए इस्तेमाल करने का उद्देश्य यह है कि मैं लोगों का ध्यान मीडिया की पूर्ण गंदगी की तरफ आकृष्ट कर सकूं, जो सिर्फ परम्परागत सोच के कारण पवित्र मानी जा रही है।] अब मुझे दिखाई दिए अर्ध(पूर्ण)नग्न स्त्रियों के ‘बोल्ड’ चित्र और मादक अदाएं जिनके सहारे आज का मीडिया ‘दिख रहा है जो दीखता है वाही बिकता है श्री चातक जी !

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

स्नेही बहन सुमन जी, सादर अभिवादन, आपने न्यायालय के मार्ग में जितनी बाधाएं बताई हैं कमोवेश ये दर्शाई जाती हैं लेकिन हैं नहीं| जिस तरह राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने संसद और विधानसभाओं को सिर्फ जनता को बेवक़ूफ़ बनाने और लूटने का अखाड़ा बना रखा है उसी तरह न्यायालय की इच्छाशक्ति की कमी ने न्याय को कमजोर कर रखा है बहुत हद तक जवाब आपने ही दे दिया है- जिस कानून का इस्तेमाल न्यायाधीश अपनी कमजोर इच्छाशक्ति के कारण दोषी को दंड देने में नहीं कर पाता है उसी कानून का इस्तेमाल करके वकील केस का फैसला नहीं होने देता क्योंकि उसकी कमाने की इच्छाशक्ति, न्यायायाधीश के न्याय करने की इच्छाशक्ति से ज्यादा प्रबल है| समाज तो साथ साल पहले ही इतिहास रच चुका है आज किसी भी तरह का असामाजिक कृत्य समाज को स्वीकार नहीं है रही बात लड़कों को चरित्रवान बनाने की तो क्या किस एक माँ के बारे में या किसी एक पिता के बारे में आप बताएं जो सामाजिक है फिर भी अपने पुत्र को चरित्रहीन बना रहा हो? अब बात करते हैं असामाजिक माता-पिता की तो आप ही बताएं असामाजिकता रोकने के लिए समाज को अधिकार दिए गए हैं या फिर कानून, राजनीति और प्रशासन को? मुझे हिन्दुस्तान के समाज पर पूरा यकीन है और मुझे बिलकुल संदेह नहीं है कि ये समाज अपने अन्दर की सभी बुराइयों को दूर करके इतिहास रच चुका है लेकिन राजनीति और न्यायालय इसके असामाजिक इकाइयों को संरक्षण देकर इसके ऊपर मानसिक दबाव डालती हैं और आत्म-मंथन की सलाह देकर इसकी जुबान में गाँठ डालने की हरकत करती है| आपने कुछ और बेहतरीन बिन्दुओं को उठा कर ब्लॉग पर विचार का क्रम आगे बढाने में जो सकारात्मक योगदान दिया है उसके लिए आपको हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak chaatak

आदरणीय रेखा जी, सादर अभिवादन, बीमार पड़ चुकी क़ानून व्यवस्था को अब कुर्बानियाँ चाहियें लेकिन इस बार अच्छे लोगों की नहीं इन अपराधियों और दरिंदों की| हमें सबक लेना होगा सजा के सार्वभौम प्रभाव से- आजादी के दीवानों ने भले ही हिन्दुस्तान को आज़ाद करा दिया हो लेकिन उन्हें वीभत्स मौत की सजा देकर अंग्रेजों ने जो डर हमारे दिलों में पैदा किया था उसी का परिणाम है कि हम चाहते तो हैं कि क्रांतिकारी पैदा हों लेकिन हामारे घर में नहीं, पडोसी के घर में! इसका मतलब है कि ये एक सिद्ध तथ्य है कि मौत की भयानक सजा यदि क्रांतकारियों को धरती पर दुबारा जन्म लेने से रोक सकता है तो फिर अपराधी और दरिंदों की क्या बिसात है? मुझे इस सिद्धांत पर पूरा विश्वास है और किसी भी भारतीय को इस पर संदेह भी नहीं होना चाहिए| आपकी सकारात्मक प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak chaatak

स्नेही अमन जी, आपकी बात हद दर्जे तक सही है लेकिन इस समय सारी हदें टूट चुकी हैं| यदि न्याय नहीं मिल रहा है तो आप इसका दोष वोट देने वालों पर कैसे डाल सकते है जबकि मतदान का कुल प्रतिशत ४० से कम और सरकार को मिलने वाले वोट कुल जनसँख्या के १० प्रतिशत से भी कम हैं| ये सिर्फ हमें और आपको बेवकूफ बनाने की बात है जो लोग कहते हैं- इन्हें चुना किसने है? जवाब है ९० प्रतिशत लोगों ने नहीं चुन है १० प्रतिशत चोर, गुनाहगार और बलातिकारी लोगों द्वार किया गया चुनाव हमारी मंशा नही सिर्फ हमारी मजबूरी दर्शाता है वो भी इसलिए कि हमारे पास इसका कोई इलाज इन्हें लोगों ने नहीं दिया है| अगर है तो नेगेटिव वोटिंग का बटन किसी मशीन पर क्यों नहीं है???? क्या वो बटन भी जनता लगाएगी???

के द्वारा: chaatak chaatak

स्नेही योगी जी, सादर अभिवादन, न्यायालय के बारे में बहुत बड़ी जानकारी होने की आवश्यकता नहीं है न्याय और अन्याय दोनों नंगी आँखों से दिखने वाली हकीकत है लेकिन कानून के किताबी कीड़े स्पष्ट दिख रही अन्याय व्यवस्था को रद्दी की टोकरी बनचुकी पंक्तियों से छनकर सिर्फ अपने आपको बड़ा मेधावी दिखाने की कोशिश में लगे हैं| संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि पीड़ित को न्याय देने में अपराधी को बचाने वाले तर्क बाधा हैं| क़ानून की किसी किताब में नहीं लिखा है कि इंसानियत की हदें पार कर जाने वाले दरिंदों पर इंसानी क़ानून का सुरक्षा कवच पहनाया जाए हाँ ये जरूर लिखा है कि वादी का पक्ष सर्वोपरि है और इसी आधार पर मैं कह सकता हूँ कि मेरे द्वारा जो मांग की गई है वो कतई असंवैधानिक नहीं है|

के द्वारा: chaatak chaatak

स्नेही अलीन जी, आपने जो कहा है वह देश के आदर्श स्थिति में पहुँचने के बाद की बात है आप नैतिकता की इतनी लम्बी छलांग नहीं लगा सकते इसलिए स्वप्नलोक से बाहर निकल कर एक ठोस शुरुआत की जरूरत है, एक बाप यदि चाहे भी तो ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि कानून फिर लंगड़ी मारने चला आएगा क्योंकि ये ठेका कानून ने खुद उठा रखा है इसलिए करना भी उसी को पड़ेगा| जिस बाप की नैतिकता इस स्तर की होगी उस बाप का बेटा बलात्कारी तो दूर की बात बदतमीज़ तक नहीं हो सकता मैंने कमीने बापों की कमीनी संतानों पर सवाल उठाया है जिनकी दरिन्दिगी को कानून, सरकार और न्यायालय मिलकर दामादों की तरह पाल रहे हैं| मैं सीधे सादे इलाज को कठिन करके देखने के पक्ष में कतई नहीं हूँ| ये समस्या विकट नहीं है इसे क्षद्म बुद्धिजीवी और बलात्कारी कानून व्यवस्था मिलकर कठिन बना रही है|

के द्वारा: chaatak chaatak

सवाल तो आपका जायज है.....................दूसरा सवाल यह भी उठता है कि क्या न्यायलय इंसानों से नहीं चलता ? क्या वह अपराधीकरण, तुष्टिकरण, आरक्षण, भ्रष्टाचार, और बलात्कार नहीं करता? दूसरा सवाल ....क्यों नहीं एक आम आदमी.............दरवाज़े बंद करके अपराधियों के शरीर में सलाखें डाल देता? क्यों नहीं एक आम आदमी जीवन का मोह छोड़कर घसीट लाता बलात्कारी को चौराहे पर और जिन्दा दाह करवाता बलात्कारी का? क्यों नहीं एक बाप.............दरवाज़े बंद करके अपने अपराधी बेटे के शरीर में सलाखें डाल देता? क्यों नहीं एक बाप बेटे का मोह छोड़कर घसीट लाता बलात्कारी बेटे को चौराहे पर और जिन्दा दाह करवाता बलात्कारी का? क्यों नहीं अभी और कुछ भी है ..............आप बेहतर समझ सकते हैं........................मतलब एक ही हैं हम में से कोई भी स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व से ऊपर नहीं उठना चाहता......................

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा: seemakanwal seemakanwal

भाई चातक जी , काफी दिनों बाद ब्लॉग पर आये। लेकिन फिर उसी अंदाज में आक्रोशित स्वरों में आपकी वेदना साफ़ झलक रही है। आज जब सारा देश बलात्कार जैसे मुद्दे पर गुस्सा दिखा रहा है उसने निश्चित ही संवेदनहीन हो चुकी सरकार और व्यवस्था पर करारी चोट की है। बलात्कार तो रोजाना देश के हर कोने में हो रहे है लेकिन सिर्फ एक या दो कालम का समाचार बन कर रह जाते हैं। इस बार यह सिर्फ समाचार नहीं रहा बल्कि इसने क़ानून के रखवालों और कानून बनाने वालों को झकझोर कर रख दिया है। देश के बिगडते हालात का आईना दिखा दिया है। समाधान के नए- नए रास्ते सुझाये जा रहे है लेकिन आपका विचार काफी हद तक सही जान पड़ता है। मेरा मानना भी यही है की "भय बिन होए न प्रीत" . ऐसे अपराधियों को सरे आम चौराहे पर खड़ा कर उनका अंग भंग कर देना चाहिए ताकि जिन्दगी भर वो यह कृत्य करने के लायक ही न रहे . साथ ही दूसरे लोगों में भी भय व्याप्त हो .

के द्वारा: anilsaxena anilsaxena

निशा जी, बात न्याय और अन्याय से ऊपर जा चुकी है अब तो बाकायदा कानूनी संरक्षण दिया जा रहा है| वास्तविकता से मुझ चुराने के लिए तर्कों का सहारा लिया जा रहा है क्या ये सही नहीं है कि दुष्कर्म का शिकार हुई किसी भी महिला का जीवन नर्क से भी ज्यादा बुरा हो जाता है? वह कितना भी प्रयत्न करे उसके देह और मष्तिष्क में जो विष भर जाता है वह उसे किसी लकवे के रोगी से ज्यादा दीन-हीन बना देता है| एक सामान्य व्यक्ति दुःख में भी अकेले बैठ कर उससे निजात पाने के लिए सकारात्मक राह सोचता है जबकि पीड़ित स्त्री अकेले हो तो उसे नर्क की जलन और भीड़ में हो तो दुष्कर्मियों की तपिश को छोड़कर कुछ और महसूस नहीं होता| जघन्यतम अपराध की जघन्यतम सजा हो और वो भी एक सूत्र को अपनाते हुए- भले ही १०० बेगुनाह सूली चढ़ जाएँ लेकिन एक गुनाहगार नहीं बचना चाहिए|

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा: chaatak chaatak

स्नेही जे० एल० सिंह जी, सादर अभिवादन, हिन्दुस्तान का क़ानून सिर्फ एक मजाक है इससे ज्यादा कुछ नहीं| यहाँ पर न्याय और कानून बेवक़ूफ़ सांसदों के फैसले का मोहताज है जैसे ही न्यायाधीश फैसला देता है सांसद और विधायक अपनी छाती पीटते हुए उस फैसले को बदल देते है| मूर्खों के लिए लिखी गई एक किताब को पढ़कर जज बन गए बुद्दू को अब नए शिगूफे के पूज्यनीय क़ानून होने की व्याख्या करनी पड़ेगी| भाड़ में जाए ऐसे क़ानून और ऐसे बुद्दू जज जिनका फैसला घुरहू बदल देते है और वे खिसियानी बिल्ली की तरह घुरहुओं की बेवकूफी को कानून की तरह पूजने पर विवश हैं| विस्तारित प्ररिक्रिया द्वारा पीड़ा को व्यक्त करने का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak chaatak

आदरणीय चातक जी                          सादर, जब मन में आक्रोश हो तो फिर ऐसी बात जबान पर आना स्वाभाविक हि है. किन्तु जब इसको हकीकत में तब्दील करने की बात आती है तो कई और नए प्रश्न खड़े हो जाते हैं. एक बार आदरणीय ओ पी पारिक जी ने भी कुछ इसी तरह का सुझाव दिया था कि सब टैक्स जमा करना बंद करदें तो सरकार दो दिन में सही रास्ते पर आ जायेगी. किन्तु इस प्रकार की बातें  आदर्श उदाहरण तो हो सकती हैं किन्तु जमीनी विफलता इसमें निश्चित है. क्योंकि इस तरह के क़ानून से तात्कालिक लाभ हानि जब नही दीखता तो कई लोग आपके विरुद्ध हो जाते हैं. जिन लोगों कि तत्काल लाभ होने वाला है वे आपका साथ नहीं देते.                                  हाँ ऐसे क़ानून कि मुखालफत तो होना ही चाहिए और ठोस तरीके से होना चाहिए. यह क़ानून देश को एक जातीय विभाजन की ओर ले जा रहे हैं. लोकसभा ने फिलहाल इसे रोक दिया है किन्तु यह बोतल में बंद जिन्न कि तरह ही है. इसका नुक्सान भि मै पिछले सप्ताह हि भुगत भि चुका हूँ जब मुझसे १०-१२ वर्ष बाद लगा साथी लगातार तीन आउट ऑफ टर्न प्रमोशन लेकर मुझसे भी आगे निकल गया दुःख इस बात का हुआ कि एक साथी जो मात्र कुछ कुछ माह बाद सेवानिवृत होने वाला है वह सीधे सीधे प्रभावित हुआ.                                    आपका आक्रोशित होना जायज है और मेरी भी आपसे सहमति है दिल्ली सरकार वोट कि राजनीति से ऊपर उठकर विचार करे अब सिर्फ गुजरात ही नहीं पूरे देश कि जनता जाग चुकी है. वे इसका खामियाजा भुगतने तैयार रहें.

के द्वारा: akraktale akraktale

आदरणीय चातक जी, सादर अभिवादन! आज ही मैंने अखबार में पढ़ा कि अपराधी का 'इकबालिया बयान' को 'सबूत' नहीं माना जाएगा. उसे सोचने समझने के लिए पूरा वक्त दिया जाएगा. फिर साबित होगा पता नहीं अब क्या साबित होगा??? कुछ सच्चाई जो आज मुझे मालूम हुई ... कदापि बिस्वास नहीं होता कि एक मनुष्य ऐसा भी कर सकता है ...आखिर उन दरिंदों को उस लड़की से क्या दुश्मनी थी, जिसने इतना नृशंश अत्याचार करने के लिए उसे उकसाता रहा... शराब का नशा क्या इतना अमानवीय कृत्य करने को मजबूर करता है??? ... फिर भी पता नहीं क्यों मुझे लगता है कि कुछ दिन बीतने के उपरांत मामला ठंढा पड़ जाएगा और यह केस भी ठंढे बस्ते में चला जायेगा! आजतक आरुषी कांड, भंवरी प्रकरण, गोपाल हांडा की गीतिका हत्याकांड आदि अनेकों उदाहरण है, जिसका कोई सार्थक फैसला अभी तक नहीं दीखता ... जब अपराधी ने जुल्म कबूल कर लिया है, तो उसको तुरंत दर्दनाक सजा देने से ही अपराध रुकेगा. नहीं तो आप भी पढ़ सुन रहे होंगे कि इस दरिन्दगी के बाद भी दिल्ली और अन्य जगहों पर बलात्कार की घटनाएँ रोजमर्रा के हिशाब से चल ही रही है! ... आज चुनाव चर्चा है... कल २१.१२.१२ होगा, फिर क्रिसमस और नया साल ... आपने भी सुना होगा नए साल के जश्न की तैयारियां.... मल्लिका शेरावत और करीना आदि के मिनट भर के शो के लिए करोड़ो का खर्च और आज बिहार/ झारखण्ड की शिल्पा विश्व सुन्दरी के ख़िताब के लिए फाइनल में शामिल होंगी..... बातें बहुत है ... बहुत कुछ लिखा कहा जा रहा है पर असर.....?????

के द्वारा: jlsingh jlsingh

चातक भाई...........................जबरदस्त लिखा है आपने ...चरों खाने सबके चित कर दिया....................................................................................कार्यालय खुलते ही सभी विरोधी अपने इस्तीफे मेज पर रखो, और जो भी कार्य आता है उस कार्य को करने निकलो भीड़ मत बनाओ जिसे रिक्शा चलाना आता है वो किराए का रिक्शा लेकर निकलो जिन्हें खाना बनाना आता है वो पूरी-सब्जी का ठेला लेकर निकलो, जिन्हें कुछ नहीं आता वो मजदूर की तरह काम मांगने निकलो और शाम को कमाई लेकर घर पहुँचो और अपने परिवार की जरूरतें पूरी करो। देखो २४ घंटे में देश की क्या हालत होती है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश से लेकर अनारक्षित चपरासी तक सभी इस्तीफ़ा दो और लौट जाओ कार्यालय से, कायरों की तरह घर मत जाना। बहुत काम है हिन्दुस्तान में और मेधावी हो तो १०० रूपया तो कमा ही लोगे। ये कार्य एक दिन का नहीं जरूरत पड़े तो जिन्दगी भर करना लेकिन सरकारी नौकर तब तक न बनना जब तक जातीय और धार्मिक विभाजन की ये रेखा पूरी तरह से मिट ना जाए। हिम्मत और मेधा है तो जीत तुम्हारी, साहस और मेरिट की सिर्फ डींग हांकते हो तो तुम्हारे वश का कुछ नहीं। हराम की तनख्वाह का खून मुंह में लग चुका है तो जूते साफ़ करने और मुंह की खाने में लाज नहीं आएगी। जाओ चुप-चाप अपनी नौकरी देखो चार दिन छुट्टी उड़ा के हुडदंग कर चुके हो अब फिर १० से ४ कुर्सी तोड़ो........................मजा आ गया .....सुबहान अल्लाह................

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा:

चातक जी, आपके चेताने वाले लेख ने बहुत प्रभावित किया | परमात्मा से प्रार्थना है, कि आपके के ऐसे जाग्रति लाने वाले लेख हम सब को मिलते रहें | धन्यवाद | बर्बाद गुलिस्तां करने को जब एक ही उल्लू काफी था, हर शाखपे उल्लू बैठा है अन्जामें गुलिस्तां क्या होगा | जायें तो जायें कहाँ, समझेगा कौन यहाँ | दर्द भरे दिल की जुबां, जायें तो जायें कहाँ | मुझे तो अँधेरे में प्रकाश की किरण भी नज़र नहीं आ रही | पूरे उत्तर-पूर्व में आंतक का बोलबाला है जिसकी आवाज में मार्कसिस्ट विचारधारा के बीज नज़र आते हैं | उसके बाद नेपाल, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र तक नक्सलवाद की की गहरी जढ़े फैली हुई हैं | जवाहरलाल यूनिवर्सिटी को अगर कार्ल मार्क्स यूनिवर्सिटी कहे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी | देहली और देश की दूसरी कई युनिवर्सितिस में भी मार्कसिज्म का बोलबाला है | कश्मीर और मुस्लिम बाहुल्य वाले क्षेत्रों में जिहादी विचार और बंगलादेशी पूरे असाम और देश यहाँ - वहां बस गए है | महाराष्ट्र में ऍम-अन-अस ने तो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के गुर्गो ने आंतक मचा रखा है | सरकार की शह पर हरयाणा और राजस्थान में भू माफिया का आंतक सिर उठाये हुये है तो पंजाब में सिख गुरद्वारा प्रबंधक कमेटी ( SGPC ) श्रोमणी अकाली दल (SAD) की शह पर आंतकवादियों के सम्मान में समारक - गुरद्वारे बना रहा है | जायें तो जायें कहाँ, समझेगा कौन यहाँ | दर्द भरे दिल की जुबां, जायें तो जायें कहाँ | मुझे तो अँधेरे में प्रकाश की किरण भी नज़र नहीं आ रही | पूरे उत्तर-पूर्व में आंतक का बोलबाला है जिसकी आवाज में मार्कसिस्ट विचारधारा के बीज नज़र आते हैं | उसके बाद नेपाल, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र तक नक्सलवाद की की गेहरी जढ़े फैली हुई हैं | जवाहरलाल यूनिवर्सिटी को अगर कार्ल मार्क्स यूनिवर्सिटी कड़े तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी | देहली और देश की दूसरी कई युनिवर्सितिस में भी मार्कसिज्म का बोलबाला है | कश्मीर और मुस्लिम बाहुल्य वाले क्षेत्रों में इस्लामिक विचारबंगलादेशी पूरे असाम और देश यहाँ - वहां बस गए है | महाराष्ट्र में ऍम-अन-अस ने तो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के गुर्गो ने आंतक मचा रखा है | सरकार की शह पर हरयाणा और राजस्थान में भू माफिया का आंतक सिर उठाये हुये है तो पंजाब में आंतकवादियों के सामान के लिये सिख गुरुद्वारे प्रबंधक कमेटी ( SGPC ) श्रोमनी अकाली दल (SAD) की शह पर आंतकवादियों के सम्मान में समारक - गुरद्वारे बना रहा है | जायें तो जायें कहाँ, समझेगा कौन यहाँ | दर्द भरे दिल की जुबां, जायें तो जायें कहाँ | मुझे तो अँधेरे में प्रकाश की किरण भी नज़र नहीं आ रही | पूरे उत्तर-पूर्व में आंतक का बोलबाला है जिसकी आवाज में मार्कसिस्ट विचारधारा के बीज नज़र आते हैं | उसके बाद नेपाल, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र तक नक्सलवाद की और दूसरी और बंगलादेशी जढ़े फैली हुई हैं | जवाहरलाल यूनिवर्सिटी को अगर कार्ल मार्क्स यूनिवर्सिटी कहे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी | देहली और देश की दूसरी कई युनिवर्सितिस में भी मार्कसिज्म का बोलबाला है | कश्मीर और मुस्लिम बाहुल्य वाले क्षेत्रों में जिहादी विचार और दूसरी और बंगलादेशी पूरे असाम और देश यहाँ - वहां बस गए है | महाराष्ट्र में ऍम-अन-अस ने तो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के गुर्गो ने आंतक मचा रखा है | सरकार की शह पर हरयाणा और राजस्थान में भू माफिया का आंतक सिर उठाये हुये है तो पंजाब में आंतकवादियों के सामान के लिये सिख गुरुद्वारे प्रबंधक कमेटी ( SGPC ) श्रोमनी अकाली दल (SAD) की शह पर आंतकवादियों के सम्मान में समारक - गुरद्वारे बना रहा है | समस्या का समाधान शायद राष्ट्रपति शासन और फिर राष्ट्रपति प्रणाली -व्यवस्था कायम करने में है | अन्यथा देश में ओलिगार्ची ( OLIGARCHY) व्यवस्था कायम हो चुकी है अर्थात देश में गिने - चुने व्यक्तियों - परिवारों का राजपाठ कायम हो चुका है |

के द्वारा:

चातक जी, आपके चेताने वाले लेख ने बहुत प्रभावित किया | परमात्मा से प्रार्थना है, कि आपके के ऐसे जाग्रति लाने वाले लेख हम सब को मिलते रहें | धन्यवाद | बर्बाद गुलिस्तां करने को जब एक ही उल्लू काफी था, हर शाखपे उल्लू बैठा है अन्जामें गुलिस्तां क्या होगा | जायें तो जायें कहाँ, समझेगा कौन यहाँ | दर्द भरे दिल की जुबां, जायें तो जायें कहाँ | मुझे तो अँधेरे में प्रकाश की किरण भी नज़र नहीं आ रही | पूरे उत्तर-पूर्व में आंतक का बोलबाला है जिसकी आवाज में मार्कसिस्ट विचारधारा के बीज नज़र आते हैं | उसके बाद नेपाल, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र तक नक्सलवाद की की गहरी जढ़े फैली हुई हैं | जवाहरलाल यूनिवर्सिटी को अगर कार्ल मार्क्स यूनिवर्सिटी कहे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी | देहली और देश की दूसरी कई युनिवर्सितिस में भी मार्कसिज्म का बोलबाला है | कश्मीर और मुस्लिम बाहुल्य वाले क्षेत्रों में जिहादी विचार और बंगलादेशी पूरे असाम और देश यहाँ - वहां बस गए है | महाराष्ट्र में ऍम-अन-अस ने तो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के गुर्गो ने आंतक मचा रखा है | सरकार की शह पर हरयाणा और राजस्थान में भू माफिया का आंतक सिर उठाये हुये है तो पंजाब में सिख गुरद्वारा प्रबंधक कमेटी ( SGPC ) श्रोमणी अकाली दल (SAD) की शह पर आंतकवादियों के सम्मान में समारक - गुरद्वारे बना रहा है | जायें तो जायें कहाँ, समझेगा कौन यहाँ | दर्द भरे दिल की जुबां, जायें तो जायें कहाँ | मुझे तो अँधेरे में प्रकाश की किरण भी नज़र नहीं आ रही | पूरे उत्तर-पूर्व में आंतक का बोलबाला है जिसकी आवाज में मार्कसिस्ट विचारधारा के बीज नज़र आते हैं | उसके बाद नेपाल, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र तक नक्सलवाद की की गेहरी जढ़े फैली हुई हैं | जवाहरलाल यूनिवर्सिटी को अगर कार्ल मार्क्स यूनिवर्सिटी कड़े तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी | देहली और देश की दूसरी कई युनिवर्सितिस में भी मार्कसिज्म का बोलबाला है | कश्मीर और मुस्लिम बाहुल्य वाले क्षेत्रों में इस्लामिक विचारबंगलादेशी पूरे असाम और देश यहाँ - वहां बस गए है | महाराष्ट्र में ऍम-अन-अस ने तो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के गुर्गो ने आंतक मचा रखा है | सरकार की शह पर हरयाणा और राजस्थान में भू माफिया का आंतक सिर उठाये हुये है तो पंजाब में आंतकवादियों के सामान के लिये सिख गुरुद्वारे प्रबंधक कमेटी ( SGPC ) श्रोमनी अकाली दल (SAD) की शह पर आंतकवादियों के सम्मान में समारक - गुरद्वारे बना रहा है | जायें तो जायें कहाँ, समझेगा कौन यहाँ | दर्द भरे दिल की जुबां, जायें तो जायें कहाँ | मुझे तो अँधेरे में प्रकाश की किरण भी नज़र नहीं आ रही | पूरे उत्तर-पूर्व में आंतक का बोलबाला है जिसकी आवाज में मार्कसिस्ट विचारधारा के बीज नज़र आते हैं | उसके बाद नेपाल, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र तक नक्सलवाद की और दूसरी और बंगलादेशी जढ़े फैली हुई हैं | जवाहरलाल यूनिवर्सिटी को अगर कार्ल मार्क्स यूनिवर्सिटी कहे तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी | देहली और देश की दूसरी कई युनिवर्सितिस में भी मार्कसिज्म का बोलबाला है | कश्मीर और मुस्लिम बाहुल्य वाले क्षेत्रों में जिहादी विचार और दूसरी और बंगलादेशी पूरे असाम और देश यहाँ - वहां बस गए है | महाराष्ट्र में ऍम-अन-अस ने तो उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के गुर्गो ने आंतक मचा रखा है | सरकार की शह पर हरयाणा और राजस्थान में भू माफिया का आंतक सिर उठाये हुये है तो पंजाब में आंतकवादियों के सामान के लिये सिख गुरुद्वारे प्रबंधक कमेटी ( SGPC ) श्रोमनी अकाली दल (SAD) की शह पर आंतकवादियों के सम्मान में समारक - गुरद्वारे बना रहा है | समस्या का समाधान शायद राष्ट्रपति शासन और फिर राष्ट्रपति प्रणाली -व्यवस्था कायम करने में है | अन्यथा देश में ओलिगार्ची ( OLIGARCHY) व्यवस्था कायम हो चुकी है अर्थात देश में गिने - चुने व्यक्तियों - परिवारों का राजपाठ कायम हो चूका है |

के द्वारा:

स्नेही अनिल जी, सादर अभिवादन, यु०पी० में तो स०पा० सरकार आने के बाद से बाकायदा सरकारी संरक्षण मिला है आताताइयों को, इनकी हिमाकत इतनी ज्यादा है कि इस बलात्कारी सिपाही का बाप अगले ही दिन प्रधान जी की गवाही तोड़ने के लिए उनके घर पैसा लेकर पहुँच गया, बदतमीज को देशी गालियाँ और जूते चप्पल लेकर खदेड़ना पड़ा| जनता जिम्मेदार है इस बात पर मुझे शक है हाँ व्यवस्था को करवट दिलाने वाली बात बिलकुल सही है| आप मेरे ब्लॉग पढ़ रहे हैं ये जानकर अत्यंत प्रसन्नता हुई, मैं आपके ब्लॉग का इन्तजार करूंगा, मेरी हार्दिक इच्छा है कि युवा जागृत हो और हर क्षेत्र में हर आयुध के साथ राष्ट्र सेवा में मुखर होकर सामने आये| कलम एक बेहतरीन आयुध है बशर्ते इसका इस्तेमाल सावधानी और जिम्मेदारी से किया जाय| शुभकामनाएं!

के द्वारा: chaatak chaatak

चातक जी , पुलिस वाला बेख़ौफ़ वैसे ही नहीं हो जाता. जब तक उसे किसी बड़े नेता या अफसर का संरक्षण नहीं मिला होता है. आज शासन और प्रशासन मिलकर देश में कोहराम मचाये हुए है. आम जनता रो रही है लेकिन उसे कोई रास्ता नहीं सूझ रहा . वैसे इस दुर्दशा के लिए मैं जनता को भी काफी हद तक जिम्मेदार मानता हूँ . क्यों नहीं दूसरे के दर्द को अपना दर्द समझती? क्यों संवेदनाएं मृत कर रखी है. जब अपने पर बीतती है तभी क्यों गला फाड़ती है. हमें संवेदनशील होना पडेगा. हमें व्यवस्था को करवट दिलानी पड़ेगी. भगवान् भी उन्ही का साथ देते है जो जीतने की आशा के साथ आगे बढते है. चातक जी मैं आपके सारे ब्लॉग पढ़ रहा हूँ . आपकी पैनी लेखनी मुझे कुछ न कुछ लिखने को मजबूर कर रही है. भगवान् आपकी लेखन धार बनाये रखे.

के द्वारा:

बहुत ज्वलंत मुद्दे पर सकारात्मक लिखा है आपने. हमें किसी धर्म से बैर भाव नहीं , लेकिन जब अकेले हिन्दू के बोलने पर उसे सांप्रदायिक कहा जायेगा तो आक्रोश पैदा होना स्वाभाविक है. अभी दो दिन पहले बरेली में बी. टेक. के एक छात्र को महज इसलिए जेल में डाल दिया गया क्यों कि उसने फेस बुक पर मुसलमानों द्वारा हमारे देवी देवताओं को गाली लिखने पर मोहम्मद साहब के बारे में कुछ 'अभद्र' लिख दिया. मुसलमान खिसिया गए और मुसलमानों की हिमायती सपा सरकार के कारिंदों ने सांप्रदायिक सौहार्द के नाम पर उस बेचारे छात्र के जीवन को अंधकारमय बना दिया. शहर का हिन्दू ख़ामोशी से सब हज़म कर गया. आखिर क्या है इस देश का भविष्य ? हिन्दू होने की प्रताड़ना हम कब तक झेलते रहेंगे. इस देश के सौहार्द को वास्तव में यह नेता, ये लोकतंत्र खाए जा रहे हैं. चातक जी कृपया इसका कोई सार्थक समाधान बताये , मुझे तो अन्धकार ही अन्धकार दिखाई दे रहा है.

के द्वारा:

प्रिय अनुज यूं ही भटकते भटकते अचानक जागरण जंकशन पर पहुच आया ,,लेकिन अच्छा ही हुआ जो तुम मिल गए तो नूर आ गया वर्ना चरागों से .... ,,यकीन मानो जिस व्यवस्था की सड़ांध से हम व्यथित हैं यह समस्या आज की नही है यह चली आ रही है और चलती रहेगी कुछ काल के लिए इसमे कमी अवश्य आ जाती है वैसे ही जैसे वर्ष मे एक बार बसंत का मौसम आता है और फिर चला जाता है क्योंकि कमीनों की दुनिया मे कमीनगी अधिकतर बहुमत मे आ ही जाती है विगत एक वर्षों से राजनेता इनके आचरण और आंदोलन इत्यादि को बेहतर तरेके से समझने का प्रयाश कर रहा हूँ ,,और अब मुझे कोई ताज्जुब नही होगा अगर अमुक नेत्री पिता बन जाये और अमुक नेता माँ अरे भाई ई तो कब्र मे पूरी तरह से शायद उर्वर रहते होंगे अपना D.N.A देने को आतुर ......खैर सुना अपने बेनी बाबू भूँक रहे थे कि कोई नेता न न केंद्रीय मंत्री तो कम से कम 71 करोड़ की चीटिंग करेगा तभी उसे चीटिंग मानना चाहिए वर्ना वो कह रहा है की उसने चीटिंग नही की तो नही की ,, अब खुजलीवाल को लाख खुजली होती रहे या या स्टेम्प्ड्यूटी चोर सियारों के झुंड मे हुवाँ हुवाँ करता रहे ,, अभी टीवी पर डाक्यूमेंटरी चल रही है मुमताज़ और शाहजहाँ की ,,कहा जा रहा है बेचारे शाहजहाँ ने अपनी शरीके हयात के गम मे सात दिनों तक खाना नही खाया और बेचारे की दाढ़ी सफ़ेद हो गई जिसकी कीमत रिआया को बीस वर्षों तक चुकानी पड़ी ताजमहल बना के,, कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा साले ने एक नुक्ता जोड़ा --मुमताज़,, वैसे कहा तो यह भी जाता है की हरम मे माहाना माकूल रकम अदा किया जाता था बीबियों को उनकी कार्यकुशलता के अनुसार ,,ये तो सियासत है ये उनका ही है काम ,,महबूब का जो :-( अरे फिर याद आया एक पत्रकार महोदय टी0 वी0 पर मोदी से बार बार माफी मांगने के लिए कह रहे थे और और मोदी साहब आराम से जनता के तरफ देखकर हाथ हिला रहे थे ,,मै आज तक नही समझ पाया की किस बात की माफी और किस्से ,,अरे यार माफी उससे मांगी जाती है जो उसका पात्र हो अन्यथा शठे शाठ्यम ......... उस पत्रकार ने जरूर अम्मा से बैक डोर से कुछ न कुछ लिया जरूर होगा ...पागल हुआ पड़ा था .. भाई विषय से भटकने के सारी............जय भारत

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चातक जी नमस्कार सर्वप्रथम सप्ताह के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर का सम्मान के लिए आपको हार्दिक बधाई ! वाकई में आज राजनीती एक तरह के आतंकवाद ही हो गयी है ... एक भ्रस्त राजनेता किस तरह सत्तासीन होने के बाद आपने कर्तव्यो की पूर्ति करता है ..उसका कच्चा चिठा आपने बखूबी दिया जो बेहद चिंतनीय और आक्रोश पैदा करने वाला है .. पर इन सबके पीछे कंही ना कंही आम जनता का भी परोक्ष रूप से हाथ है जो ज्यादातर टाइम जाति के नाम पर वोट करती है या फिर थोड़ी सी शराब और अन्य कमजोरियों की वजह से इनके कुसी पे बिठाती है / अगर आज का पढ़ा लिखा शहरी युवा वास्तव में देश के प्रति जागरूक होकर .. अपना योगदान करें .... और लोगो को जागरुक करें .तो इस राजनितिक आतंकवाद का सफाया किया जा सकता है ..... पुन बधाई आपको

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

स्नेही अनिल जी, सादर अभिवादन, सार्वजनिक यातायात के साधनों में महिलाओं को जिस तरह की बेज्जती का सामना करना पड़ता है उसका अंदाजा सभी को है उसके बावजूद ना तो शासन कुछ करता है ना प्रशासन क्योंकि हमारे समाज का सबसे असामाजिक तत्व शासन में होता है और जिनका चरित्र बिलकुल खत्म हो चुका हो वे प्रशासन में होते हैं| कारण है कि सार्वजनिक जीवन और प्रशासनिक सेवाओं दोनों की चयन प्रणाली दूषित है परिणामतः यहाँ पर असामाजिक तत्वों की भरमार है| थोड़ी बहुत गुंजायश जो न्यायालय से न्याय मिलने की बची है अगले कुछ दशकों में ये भी पूरी तरह लुप्त होती प्रतीत होती है क्योंकि जिस तरह से बाहुबली और धनपशुओं द्वारा चालाये जा रहे कालेजों में क़ानून की डिग्री बांटी जा रही है आम आदमी की एकलौती आशा को भी ग्रहण लगाने की शुरुआत है| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak chaatak

चातक जी वाकई आपकी लेखनी में बहुत दम है. छोटी छोटी बातों पर इतनी पैनी निगाह वाकई काबिले तारीफ़ है. ट्रेनों में महिलाओ के साथ छेड़खानी और अभद्रता रोजमर्रा की बात है. हम सब देखते है और खामोश रह जाते है. लेकिन जब हमारे परिवार की किसी महिला के साथ छेड़खानी और अभद्रता होती है तो हमारा खून खौल जाता है. शायद उस वख्त अगर कोई हथियार हमारे पास हो तो उसका इस्तेमाल करने से भी नहीं चूकेंगे. बाद में हश्र चाहे कुछ भी हो. शासन और प्रशासन की कार्य प्रणाली से तो सभी वाकिफ है. पिछले दिनों एक सिपाही ट्रेन में महिलाओ से छेड़खानी कर रहा था, महिला के घर वालो ने बहुत मना किया लेकिन वर्दी के रोब में वो घर वालो को भी गालिया बकने लगा. तब उन लोगो ने उसको बुरी तरह पीट दिया . अगले स्टेशन पर सिपाही ने पुरे परिवार को उतार कर आर पी ऍफ़ थाने में बीसिओ धाराओ में मुकदमा लिखा दिया. परिवार वालो की सुनने वाला कोई नहीं था. यह सब देखकर आक्रोश भर जाना स्वाभाविक है. अगर वाकई कोर्ट कोई समुचित व्यवस्था लागू कर दे तो कुछ हद तक आंसू पूछ सकते है.

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चातक जी, बहुत ही नपे तुले शब्दों में बहुत कुछ कह दिया आपने. देखा जाये तो हमारे देश में लोकतंत्र का जितना दुरूपयोग हुआ है शायद यही लगता है कि यह देश इसके लायक था ही नहीं. सिर्फ वोटों की खातिर देश को बारूद के ढेर पर बैठाने में इन नेताओ को जरा भी संकोच नहीं होता. देश प्रेम का जज्बा तो जैसे इनके दिलों से मिट चुका है. कोई भी पार्टी चुनावो में ऐसे लोगो को टिकट देना चाहती है जिसकी हैसियत कम से कम एक करोड़ से ज्यादा हो. उसका इतिहास कुछ भी रहा हो. ज़ाहिर है कि कितना भी शरीफ या देश प्रेमी कोई क्यों न हो अगर उसके पास करोड़ों की रकम नहीं है तो चुनाव की सोच भी नहीं सकता. युवा आक्रोश आज चरम पर है. सही लिखा है आपने कि यह ज्वालामुखी कभी भी फट सकता है. गागर में सागर भरे इस लेख के लिए आपको बधाई.

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गांधी जी के विरोध की बहार आ गयी है ( पूर्ण सहमति ) विशेष रूप से अंतरताना के माध्यम पर , अब इसके क्या निहितार्थ है इस पर भी विचार की आवश्यकता है | गांधी के बारे में आलोचना करने से पूर्व यह जान लेने की जरुरत है की अहिंसा उनके लिए एक स्वयंसिद्ध प्रमेय के सामान थी और उनके बारे में कोई भी बात इस विचार के बरक्स ही करनी चाहिये | गांधी में निहित भारतीयता और आध्यात्मिकता का विचार ही समकालीन परिस्थितियों में प्रकाशस्तंभ के सामान है | आज राष्ट्रवाद पूजीवाद और हिंदुत्व को गांधी के आलोक में समझने की आवश्यकता है | जिस बात को जनरल स्मट्स ( द.अफ्रीका ) जैसे उनके प्रथम विरोधी ने समझ लिया ( मे उनके जूते में खड़े होने योग्य भी नही हूँ ) उसे हम उनके अपने देश के लोग आज तक नही समझ पाए |

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सप्ताह के सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगर को मेरा सादर प्रणाम। आपकी पोस्ट वास्तव में विचारोत्तेजक एवं पैनी होती हैं। वर्तमान राजनीतिक रणनीति पर कम शब्दों में बहुत प्रभावकारी प्रहार किया आपने। वास्तव में आज चुनावों के माध्यम 'जनप्रतिनिधि' बनना एक आम ईमानदार व्यक्ति के लिए बहुत महंगी और टेढ़ी खीर है, यही बात अपने आप में एक बड़ा प्रमाण है कि आम आदमी और एक वर्तमान जनप्रतिनिधि (?) के बीच एक बड़ी वैचारिक खाई है। शहरों में वोटिंग का प्रतिशत कम होना भी इसी बात का द्योतक है कि साक्षर लोगों को वर्तमान उम्मीदवारों में से किसी से भी कोई उम्मीद नहीं होती। इसी विपरीत वैचारिक ध्रुव के कारण आमजन में असंतोष लावे की भांति पनप रहा है। इस लावे का ज्वालामुखी बीच-बीच में क्षेत्रीय नक्सलवाद के रूप में फटता भी है। परन्तु उसका भी लाभ ये जनप्रतिनिधि किस प्रकार लेते हैं, इसको भी ठीक से बताया है आपने। नेताओं द्वारा महंगे चुनावी इन्वेस्टमेंट का रिटर्न लेने का तरीका भी खूब बताया आपने। सही बात यह है कि आज नैतिकता मात्र किताबों, प्रवचनों और व्याख्यानों में ही सिमट कर रह गई है। उत्तम पोस्ट के लिए आपको हार्दिक बधाई !

के द्वारा: सचेतक सचेतक

स्नेही वासुदेव जी, सादर अभिवादन, नक्सलवाद पर आपकी राय काफी हद तक सही प्रतीत होती है लेकिन ये समस्या हमारे अपने शरीर में होने वाले किसी रोग की तरह है जिसे सुधारने के लिए अब अंग को काटना पड़ेगा| ये गलत भी ना होता और पीड़ादायक भी यदि रोग स्वमेव होता हमें अपना ही अंग भंग करना पड़ रहा है क्योंकि इसे जानबूझ कर सडाया गया है इसलिए जितना आवश्यक ये है कि अंग को काटा जाए उससे भी ज्यादा आवश्यक है कि उन लोगों के हाथों को काटा जाए जिन्होंने व्यक्तिगत हित के लिए अंगों में विकार पैदा किये वर्ना ईलाज का क्या फायदा एक अंग काटिए तो दूसरे को विकृत कर दिया जाएगा| आपकी दूसरी बात कि पहले सवा अरब जनता को जागृत, शिक्षित और समर्थ बनाया जाय फिर राजनीतिक आतंकवाद से मुक्ति मिलेगी किसी यूटोपियन कहानी से कम नहीं| और यदि ऐसे समाज का निर्माण किया जाए तो कैसे जबकि सारी नीतियां ये आतंकवादी ही बनाते हैं| सभी समस्याओं को दरकिनार मान कर ये असंभव, संभव भी बना लिया जाय तो सवाल ये है कि देवदूतों के उस देश में शासन और प्रशासन की आवश्यकता ही क्या है| ब्लॉग पर प्रतिक्रिया द्वारा इसे एक और आयाम प्रदान करने का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak chaatak

आदरणीय गुरूजी! सादर चरणस्पर्श, सबसे पहले तो आपको दूसरी बार "बेस्ट ब्लोगेर ऑफ द वीक" चुने जाने पर हार्दिक बधाई, और माँ सरस्वती और माँ हिंदी से यही प्रार्थना है कि ये सिलसिला आगे भी जारी रखें. मुझे भी मंत्री विनोद कुमार उर्फ़ पंडित सिंह जी के शर्मनाक कारनामो की जानकारी हुई थी, आपकी उस पोस्ट को भी पढ़ा था जिसमे आपने आदरणीय श्री रामबहादुरजी को पुनः गोंडा में लाने की मांग की थी, तब भी मेरी पूर्ण सहमति थी और अब तो और ज्यादा इच्छा है इन डरपोक लोगो के बीच एक सच्चा शेर तो आये.पदवी की द्रष्टि से शेर तो ये भी जो डर के भाग गए तभी तो किसी की पंक्तियाँ याद आ गईं- "दिखाओ चाबुक तो सलाम करते हैं, ये वे शेर हैं जो सर्कस में काम करते हैं..."

के द्वारा: ashishgonda ashishgonda

उनका अपना दल कांग्रेस ही गांधीवाद को नहीं पचा पाया , गांधीवाद एक आदर्श परिकल्पना है और सामाजिक वर्जनाएं कडवी सच्चाई , आज के दिन गाँधी जी जीवित होते तो रामराज्य की बात करने पर उन्हें भी सांप्रदायिक करार कर दिया गया होता , मुस्लिम लीग समर्थक उस काल में भी उन्हें हिन्दू नेता ही कहते थे .गांधीवाद भारत के बंटवारे के समय ही दम तोड़ गया था.... भारतीय राजनीतिक पटल पर उनके बहुमूल्य योगदान को नाकारा नहीं जा सकता , वो महान ज्ञानी थे , लेकिन प्रक्टिकल नहीं. देश वास्तविकता के धरातल पर चलता है ..... वैसे भी अगर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम , आज़ादी और उसके बाद हुई पिछले ६५ वर्ष की घटनाओं पर गौर करें तो अंग्रेजों ने आसपास के देशों में उन्हीं नेताओं को सत्ता में रहने दिया है जिन्होंने उनके कानून और डेमोक्रेटिक सिस्टम को follow किया है , और गाँधी नेहरु एवं कांग्रेस कहीं न कहीं अंग्रेजों द्वारा ही पोषित थी , शिक्षा से लेकर संस्कारों तक.. यदि उनकी पार्टी कांग्रेस उनके आदर्शों पर चली होती तो हमें गांधीवाद को किताबों के पन्नों में नहीं खोजना पड़ता.... गांधीजी के पार्थिव शरीर को समाप्त करने में यदि नाथू राम गोडसे जिम्मेदार कहा जायेगा तो गांधीवाद को सिसक सिसक कर मारने के लिए कांग्रेस ही दोषी मानी जानी चाहिए जो आज तक उनके नाम पर सत्ता सुख ले रही है... व्यक्ति से विचार ज्यादा महत्वपूर्ण होता है..... इसलिए गांधीवध के लिए कांग्रेस को नाथूराम गोडसे से ज्यादा बड़ा दोषी मन जाना चाहिए....... आइये गांधीवाद को उसके असल रूप का जमा पहिनने के लिए आगे बढ़ कर इनकी सजा का भी निर्धारण करें ! एक अच्छे सामायिक लेख के लिए साधुवाद !

के द्वारा:

चातक जी, निश्चित रूप से राजनैतिक आतंकवाद नक्सलवाद जैसी समस्यायों के लिए काफी सीमा तक उत्तरदायी है किन्तु फिर भी नक्सलवाद को मात्र आम आदमी के भ्रष्ट तंत्र के विरुद्ध आक्रोश की संज्ञा नहीं दी जा सकती.! नक्सलवाद निश्चित रूप से आतंकवाद है जिसे किसी भी तर्क से सही नहीं ठहराया जा सकता|| राजनैतिक तानाशाही से मुक्ति का मार्ग जनता की जागरूकता से होकर ही जाता है, जनता की मानसिकता को इन्हीं नेताओं द्वारा बंधक बनाकर रखा गया है जिसे मुक्त कराना होगा तभी सार्थक परिवर्तन हो सकता अन्यथा नक्सलवाद तो पैदा हो सकता है राष्ट्र रक्षक क्रान्ति नहीं..!! ब्लॉगर ऑफ़ द वीक के सम्मान के लिए हार्दिक बधाइयाँ|

के द्वारा: vasudev tripathi vasudev tripathi

के द्वारा: chaatak chaatak

के द्वारा: mishraamrish mishraamrish

आशीष जी, सस्नेह आशीर्वाद, इस गंभीर विषय पर आपकी राय जानकर बेहद ख़ुशी हुई| युवा अभी भी नहीं जागेगा तो ये नेता हर युवा को नक्सली और आतंकी बनाकर छोड़ेंगे| मैंने तो सिर्फ इनके आतंक की ओर इशारा मात्र किया था और कल ही हमारे अपने शहर के मंत्री विनोद कुमार उर्फ़ पंडित सिंह जी ने घृणित आतंकी कार्यवाही को अंजाम दिया हालत ये हैं की गोंडा में इस समय एस० पी०, डी० एम् और सी० एम० ओ० सभी इस राजनीतिक आतंकवाद के डर से छुट्टी पर चले गए हैं| ये है असली आतंकवाद! मैंने पहले भी समस्या नाम से एक ब्लॉग लिखकर सूबे की मुख्यमंत्री से गुजारिश की थी कि पूर्व जिलाधिकारी श्री राम बहादुर जी को दुबारा गोंडा में भेजा जाए क्योंकि जनता को राजनीतिक आतंक से बचाने का काम सिर्फ वे ही कर सकते हैं लेकिन सत्ता में आते ही ब०स०पा० के फैसलों के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित मुख्यमंत्री जी को जनता की आवाज सुनाई ही नहीं पड़ी| अब जनता स्वयं फैसला करे कि उसे क्या चाहिए, राजनीतिक आतंकवाद या न्याय| प्रतिक्रिया का हार्दिक धन्यवाद!

के द्वारा: chaatak chaatak

आदरणीय चातक जी, सादर ! आप इसे नक्सलवाद न कहें ! यह जनविद्रोह है, जिसे सरकारी अमला नक्सलवाद की संज्ञा दे देता है ! अभी तक तो यह कुछ ही क्षेत्रों में है, पर अब लगता है कि इन नेताओं के कारनामों से यह विस्तृत होकर सम्पूर्ण देश में फ़ैल जाएगा ! अभी कल "आजतक" चैनल पर एक खबर दिखाई जा रही है, जिसमें क़ानून मंत्री सलमान खुर्शीद और उनकी पत्नी के घृणित काले कारनामों को उजागर किया जा रहा है ! इन नीचों ने मासूम, बेबस विकलांगों के हिस्से का पैसा जाली कागजात बनाकर जिस ढंग से हडपा है, उसे देखकर तो यहीं लगता है कि हम वास्तव में जंगल राज में जी रहे हैं ! मंत्री क़ानून का........ और काम गैरकानूनी ! थू........थू.......!!!!! सोनिया के दामाद कि कथा से सभी अवगत हो चुके हैं ! घोटालों की लिस्ट इतनी लम्बी होती जा रही है कि आप को याद रखना मुश्किल है, फिर भी ये बेशर्म सीना ताने गद्दी पर बैठे हैं, और हम बेबस हैं ! हालात ऐसे हैं कि अब यह सोचना पड़ रहा है कि जनता जन विद्रोह क्यों न करे ? सादर !

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

के द्वारा: ragini ragini